गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?

 डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?

 

उत्तर- डा० अन्डरहिल के अनुसार, “अपकृत्य एक ऐसा कार्य या कार्यलोप है जो कानून द्वारा अनाधिकृत तथा संविदा से स्वतन्त्र है तथा जिसके द्वारा या तो किसी व्यक्ति के - (i) पूर्ण अधिकार (Absolute Right) का उल्लंघन होता है, या (ii) सीमित अधिकार (Qualified Right) का उल्लंघन होता है, जिससे हानि होती है, या (iii) लोक अधिकार (Public Right) का उल्लंघन होता है जिससे उसे सामान्य जनता की अपेक्षा अधिक सारवान (Substantial) तथा विशेष हानि होती है तथा जिसके फलस्वरूप वह क्षतिकर्ता के विरूद्ध क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिये मुकदमा चलाने का अधिकारी हो जाता है।

विद्वेषपूर्ण गिरफ्तारी (Malicious Arrest) से आप क्या समझते हैं?

 विद्वेषपूर्ण गिरफ्तारी (Malicious Arrest ) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- विद्वेषपूर्ण गिरफ्तारी (Malicious Arrest ) - इसमें किसी दीवानी विधि के अंतर्गत किसी व्यक्ति को द्वेषपूर्ण से प्रेरित होकर बिना किसी समुचित आधार पर जानबूझकर गिरफ्तार करवाने की कोशिश की जाती है। लेकिन ऐसी कार्यवाही से जब तक किसी व्यक्ति की वास्तव में स्वतन्त्रता को अवरोध न पहुँचे तब तक उसके विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। विद्वेषपूर्ण गिरफ्तारी में यह आवश्यक है कि प्रतिवादी ने दुर्भावना से प्रेरित होकर न्यायालय के माध्यम से गिरफ्तारी करवायी है।

टेलीफोन डाइरेक्ट्री प्रकाशित न करना क्या कमी की परिभाषा में आयेगा?

टेलीफोन डाइरेक्ट्री प्रकाशित न करना क्या कमी की परिभाषा में आयेगा?

 

उत्तर- नहीं? इस सम्बन्ध में टेलीकाम डिस्ट्रिक्ट मैनेजर बनाम् देवराज एण्ड संस (1994)। C.P.J.23 N. C. राष्ट्रीय आयोग ने निर्धारित किया है कि इस कथन पर ध्यान नहीं दिया जा सकता कि टेलीफोन विभाग टेलीफोन निर्देशिका वार्षिक रूप से प्रकाशित करने के लिये बाध्य है। भारतीय तार नियमावली, 1951 का नियम 452 जिसका दृष्टांन्त प्रतिविरोध के समर्थन में दिया गया था, के बारे में आयोग ने यह पाया कि वह केवल यह अभिकथित करता था कि टेलीफोन निर्देशिका की एक प्रति प्रत्येक टेलीफोन विस्तार या अभिदाता को निःशुल्क उपलब्ध करायी जायेगी। नियम किसी ऐसे अंतराल के बारे में अभिकचन नहीं करता जिसके बीत जाने के बाद नई निर्देशिका प्रकाशित और वितरित की जायेगी।

वक्रोक्ति (Innuendo) से आप क्या समझते हैं?

 वक्रोक्ति (Innuendo) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- सामण्ड के अनुसार, कथन दो प्रकार के होते हैं- (i) प्रथम दृष्टया मानहानिजनक (Defamatory) तथा (ii) प्रथम दृष्टया निर्दोष (Innocent) पहले प्रकार के कथन मानहानिजनक होते है तथा स्वतः अभियोज्य होते हैं जब तक कि वह कथन किसी अपवाद की श्रेणी में ही न आ जाये। इसके विपरीत, दूसरे प्रकार के कथन प्रथम दृष्टया निर्दोष मालूम होते हैं किन्तु उनका अर्थ परिस्थितियों के सन्दर्भ में मानहानिजनक बन जाता है। ऐसे कचन को 'वक्रोक्ति या व्यंगात्मक कथन ( Innuendo) कहा जाता है, जैसे 'अ', 'ब' के बारे में 'स' कहता है कि 'ब' वैसा ही है जैसा उसका पिता यदि पिता चोर हो तो इन शब्दों का अर्थ यह होगा कि 'ब' भी चोर है। यदि 'ब' सिद्ध चोर नहीं है यह कथन मानहानिजनक होगा, भले ही ऊपर से देखने में कथन निर्दोष मालूम होता है। इसी प्रकार, जहाँ 'अ' 'ब' के बारे में यह कथन करता है कि 'ब' एक साधु है और यदि उसका संकेत यह है कि 'ब' साधुओं के एक ऐसे ग्रुप का सदस्य है जो तश्करी करते है तो कथन निर्दोष होते हुये भी मानहानिजनक होगा।

शिकायतकर्त्ता , उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण, जिला फोरम की संरचना, राष्ट्रीय आयोग का गठन

 शिकायतकर्त्ता (Complainant) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर - शिकायतकर्ता (Complainant)- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1993 की संशोधित धारा 2(1)(b) के अन्तर्गत निम्नलिखित में से कोई भी व्यक्ति जो शिकायत प्रस्तुत करता है, वह शिकायतकर्त्ता कहा जाता है- (i) एक उपभोक्ता, अथवा (ii) कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत पंजीकृत कोई भी स्वयं सेवी उपभोक्ता संघ, अथवा (iii) देश में प्रचलित किसी भी अन्य कानून के अन्तर्गत पंजीकृत स्वयंसेवी उपभोक्ता संघ, अथवा (iv) शिकायत पेश करने वाली केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार, अथवा (v) समान प्रकार का हित रखने वाले उपभोक्ताओं की दशा में उनकी ओर से कोई एक या अधिक उपभोक्ता

 

उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण कितने प्रकार के होते हैं?

 

उत्तर - उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं- (i) "जिला पीठ" (District Forum) के नाम से ज्ञात एक उपभोक्ता विवाद प्रतितोष पीठ इसकी स्थापना राज्य सरकार के द्वारा प्रत्येक जिले में अधिसूचना के द्वारा की जायेगी। राज्य सरकारें किसी जिले में एक से अधिक पीठों की स्थापना भी कर सकती है। (ii) "राज्य आयोग" (State Commission) के नाम से ज्ञात एक उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग इसकी स्थापना भी राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा की जायेगी। (iii) राष्ट्रीय आयोग (National Commission)- केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा एक राष्ट्रीय उपभोक्ता प्रतितोष आयोग की स्थापना की जायेगी। इस प्रकार, जिला पीठें राज्य आयोग, राष्ट्रीय आयोग के रूप में तीन प्रतितोष पीठों की स्थापना की गई है।

 

जिला फोरम की संरचना (Constitution) बताइये।

 

उत्तर- जिला पीठ की संरचना (Constitution of District Forum) – उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 10 के अनुसार, प्रत्येक जिला फोरम का गठन निम्न प्रकार होगा - (क) ऐसा एक व्यक्ति जो जिला न्यायाधीश हो या रह चुका हो या होने के योग्यता रखता हो राज्य सरकार द्वारा मनोनीत किया जायेगा जो उसका अध्यक्ष होगा (ख) दो अन्य व्यक्ति ( सदस्य ) जो शिक्षा, व्यापार या वार्णिज्य के क्षेत्र में प्रख्यात हों जिनमें से एक महिला होगी। राज्य सरकारें इन नियुक्तियों को एक चयन समिति की अनुशंसा पर करेगी जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे- (i) राज्य आयोग का अध्यक्ष जो चेयरमैन होगा। (ii) राज्य के विधि विभाग का सचिव। (iii) राज्य के उपभोक्ता मामलों के विभाग का प्रभारी सचिव |

 

जिला फोरम के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का या पैंसठ वर्ष की आयु पूरी होने तक जो पूर्व स्तर हो, होगा और नये संशोधन के अनुसार, जबकि संशोधन से पूर्व वे पुनः नियुक्ति के पात्र नहीं थे, वे पुनः नियुक्ति के पात्र होंगे कोई भी सदस्य राज्य सरकार को लिखित रूप में त्यागपत्र दे सकता है और राज्य सरकार उसका त्यागपत्र स्वीकृत करने के बाद रिक्त पद उसी प्रवतर्ग से सम्बन्धित व्यक्त्यिों में से भी कर सकती है। राज्य सरकार सदस्यों के वेतन या मानदेय और अन्य भत्तों और उनकी सेवा के निबन्धन एवं शर्तों के सम्बन्ध में नियमावली बनायेगी। 1993 के संशोधन द्वारा बढ़ायी गई धारा 29 ( क ) अब यह प्रावधान करती है कि जिला फोरम राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग या कोई कार्य या कार्यवाही मात्र उसके सदस्यों में से किसी की रिक्ति या उसकी संरचना में किसी कमी के कारण अमान्य नहीं होगी।

 

जिला फोरम के निर्णय से अपील कहाँ और कितने दिन की अवधि के भीतर की जा सकती है?

उत्तर- जिला फोरम के निर्णय से अपील (धारा 5) - जिला पीठ द्वारा किये गये किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर ऐसे प्रारूप में और ऐसी रीति से जो विहित की जाये, उस आदेश के विरूद्ध राज्य आयोग को अपील कर सकेगा। परन्तु राज्य आयोग, तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर फाइल न करने का पर्याप्त कारण था ।

 

राज्य आयोग कब जिला फोरम अपील किये जाने की निर्धारित अवधि के बाद भी अपील स्वीकार कर सकता है?

 

उत्तर- जिला फोरम द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित कोई पक्षकार ऐसे व्यक्ति ऐसे आदेश के विरूद्ध राज्य आयोग को अपील कर सकता है। इस प्रयोजन के लिये आदेश की तिथि से 30 दिन का समय स्वीकृत है इस अधिनियम के अन्तर्गत बनाई गयी नियमावली में अपील के प्रारूप और रीति का उपबन्ध किया गया है। राज्य आयोग को 30 दिन का समय बीत जाने के बाद भी अपील ग्रहण करने के लिये सशक्त किया गया है यदि वह सन्तुष्ट हो कि निर्धारित समय के अन्दर अपील न दाखिल कर पाने का पर्याप्त कारण था।

 

राष्ट्रीय आयोग के गठन को बताइये।

 

उत्तर- राष्ट्रीय आयोग का गठन (Composition of National Commission)- धारा 20(1) के अनुसार, राष्ट्रीय आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

 

धारा 20(1) (क) एक ऐसा व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जायेगा और जो उसका अध्यक्ष होगा। परन्तु इस खण्ड के अन्तर्गत कोई नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बगैर नहीं की जायेगी। धारा 20 (1) (ख) चार अन्य सदस्य जो योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति होंगे और जिनको अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन का पर्याप्त ज्ञान या अनुभव होगा या उससे सम्बन्धित समस्याओं के सम्बन्ध में कार्यवाही करने की योग्यता हो और उनमें से एक महिला होगी। परन्तु शर्त यह है कि इस खण्ड के अन्तर्गत प्रत्येक रिसीवर केन्द्रीय सरकार द्वारा निम्नलिखित सदस्यों वाली चयन समिति की अनुशंसा पर की जायेगी - (क) भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित कोई व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश हो (ख) भारत सरकार के विधायी कार्य विभाग का सचिव (ग) भारत सरकार में, उपभोक्ता कार्यों का निष्पादन करने वाले विभाग का सचिव |

 

राष्ट्रीय आयोग की पुनर्विलोकन और पर्यवेक्षण सम्बन्धी शक्तियों का वर्णन कीजिए।

 

उत्तर- राष्ट्रीय आयोग की पुनर्विलोकन और पर्यवेक्षण की शक्तियाँ (Powers of Review & Supervision of National Commission ) - जब कभी राष्ट्रीय आयोग को यह प्रतीत हो कि राज्य आयोग ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो विधि द्वारा उसमें निहित नहीं है, या ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है जो विधि द्वारा उसमें निहित हैं या उसने अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने में अवैध रूप से या सारवान नियमितता के साथ कार्य किया है वहाँ राष्ट्रीय आयोग की पर्यवेक्षात्मक अधिकारिता किसी ऐसे उपभोक्ता विवाद के अभिलेख को मंगवाने और उसमें उचित आदेश करने की शक्ति को कहते हैं जो किसी राज्य आयोग के समक्ष लम्बित है या उसका निश्चय कर दिया गया हो।

 

राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील कहाँ दायर की जा सकती है?

 

उत्तर-अपील- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 23 में यह अधिकार है कि कोई भी पीड़ित पक्षकार राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरूद्ध तीस दिनों में या उच्चतम न्यायालय द्वारा बढ़ायी गई अवधि में उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है किन्तु नियम 14(5) के अनुसार, यदि निर्धारित अवधि में उस आदेश के विरूद्ध अपील नहीं की जाती है अथवा उच्च न्यायालय द्वारा आयोग के आदेशका अनुमोदन कर दिया जाता है तो राष्ट्रीय आयोग उस आदेश को राजकीय गजट में या अन्य किसी माध्यम से प्रकाशित करने का आदेशदे सकता है। ऐसी स्थिति में, उस आदेश के प्रकाशन करने का आदेश दे सकता है। ऐसी स्थिति में, उस आदेश के प्रकाशन के विरूद्ध किसी भी माध्यम या राष्ट्रीय आयोग के विरूद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती।

 

किस वर्ष उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया गया और इसमें कितनी धारायें है?

 

उत्तर- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सन् 1986 में संसद द्वारा 24 दिसम्बर को पारित किया गया था। यह 2002 के संशोधन के पश्चात् 1986 का 68 वाँ अधिनियम है तथा इसमें 31 धारायें हैं।

व्यक्ति की मृत्यु के साथ उसका मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है

व्यक्ति की मृत्यु के साथ उसका मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है। 


उत्तर- व्यक्ति की मृत्यु के साथ मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है। (Actio Personalis Moritur Cum Persona ) -- "सामान्य विधि" के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति या उसकी सम्पत्ति को कोई एक ऐसी हानि पहुँचाई गई है जिसके लिये वह क्षतिपूर्ति की माँग का अधिकारी है तो ऐसी हानि के लिये दावा करने का अधिकार उस व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है जिसने हानि पहुँचाई है या जिसको हानि पहुँची हो दूसरे शब्दों में, व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही उसका मुकदमा चलाने का अधिकार भी समाप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ-यदि 'अ' ने 'ब' के साथ मारपीट की है तो 'व' को 'अ' के खिलाफ क्षतिपूर्ति की कार्यवाही 'ब' के जीवनकाल में ही लानी चाहिये। यदि क्षतिपूर्ति की कार्यवाही के दौरान 'अ' या 'ब' अर्थात् वादी या प्रतिवादी की मृत्यु हो जाती है तो कार्यवाही भी समाप्त हो जायेगी। किन्तु यह नियम अत्यन्त ही अन्यायपूर्ण (Unjust ) था अतः न्यायालय द्वारा इसके निम्नलिखित अपवाद स्वीकार किये गये।

जानबूझकर आपत्ति लेना

 "जानबूझकर आपत्ति लेना" (Volenti non fit injuria) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- " जानबूझकर आपत्ति लेना” (Volenti non fit injuria) - "जान-बूझकर आपत्ति लेना" या "सम्मत कार्य से दुष्कृति नहीं होती" नामक सूत्र का अर्थ है कि जहाँ व्यक्ति स्वेच्छा से हानि उठाता है, वहाँ कानूनी क्षति नहीं होती सामण्ड के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने स्वेच्छा से अपने अधिकार को त्याग दिया है तो वह फिर उस अधिकार का लाभ नहीं उठा सकता । अपकृत्य के बचाव का यह महत्वपूर्ण सूत्र है। उदाहरणार्थ- यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को अपने घर पर आने के लिये आमन्त्रित करता है या उसे सावधानी से अपने शरीर पर ऑपरेशन करने की अनुमति देता है तो वह बाद में उन कार्यों के लिये उस व्यक्ति के खिलाफ अतिचार या मारपीट का दावा नहीं कर सकता।

घटना स्वयं बोलती है

 घटना स्वयं बोलती है (Res Ipsa Loquitor) से आपका क्या आशय है?

 

उत्तर- घटना स्वयं बोलती है (Res Ipsa Loquitor) सामान्यतः असावधानी को सिद्ध करने का भार वादी पर होता है। लेकिन कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनमें वादी दुर्घटना तो सिद्ध कर सकता है, किन्तु यह सिद्ध नहीं कर सकता है कि घटना किस प्रकार घटी। इसका ज्ञान तो केवल प्रतिवादी को ही हो सकता है, जो दुर्घटना के लिये जिम्मेदार है। ऐसी अवस्था में दादी को न्यायालय के सामने केवल उन्हीं तथ्यों को देना पर्याप्त है, जिनमें घटना घटी हैं शेष तथ्यों की उपधारणा कानून स्वयं करेगा। इसे 'घटना स्वयं बोलती है' का नियम कहते हैं। इस नियम को लागू करने हेतु दो शर्तों का होना आवश्यक है- (i) हानि पहुँचाने वाली वस्तु प्रतिवादी या उसके सेवकों के नियन्त्रण में होनी चाहिये तथा (ii) पटना ऐसी हो जो बिना असावधानी के न घट सकती हो ।

क्यू फेसिट पर ऐलियम परसी

 क्यू फेसिट पर ऐलियम परसी (Qui facit per alium perse) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- क्यू फेसिट पर ऐलियम परसी (Qui facit per alium perse) इससूत्र का तात्पर्य यह है कि, "जो दूसरे व्यक्ति के माध्यम से कार्य कराता है वह कानून की दृष्टि में खुद ही कर्त्ता समझा जाता है।" एक स्वामी अपने नौकर द्वारा किये गये अपकृत्यों के लिये इसी सिद्धान्त के आधार पर उत्तरदायी ठहराया जाता है। इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति अपना कार्य अन्य व्यक्ति से कराताहै, वह दूसरे व्यक्ति का यह स्वतन्त्रता देता है कि वह परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेकर कार्य करे। फलस्वरूप, ऐसे व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य के लिये कार्य कराने वाला ही उत्तरदायी होता है।

अनैतिक कार्य से कोई कार्यवाही उत्पन्न नहीं होती

अनैतिक कार्य से कोई कार्यवाही उत्पन्न नहीं होती (Ex Turpi Causa non Oritur Actio) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- अनैतिक कार्य से कोई कार्यवाही उत्पन्न नहीं होती (Ex Turpi Causa non Oritur Action) – यह एक लेटिन सूत्र है अर्थात् कोई कार्य चाहे कितना भी बुरा या अनैतिक क्यों न हो यदि उससे किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं होता तो उसके लिये दावा दायर नहीं किया जा सकता। उदाहरणार्थ - (1) यदि एक चोर किसी मकान में चोरी करने के लये कूदते समय भूमि पर पढ़े हुए कांटेदार तारों में उलझकर घायल हो जाता है तो वह मकान मालिक के खिलाफ क्षतिपूर्ति का दावा दायर नहीं कर सकता, क्योंकि चोर कानूनों न होकर एक अनैतिक कार्य है। (ii) हीग बनाम शाइन, 1878 में एक महिला जो अपने मित्र के साथ सम्भोग किया करती थी, को पेशाब की बीमारी लग गई। उसके मित्र ने उससे इस बीमारी को छिपा रखा था। महिला ने क्षतिपूर्ति के लिये वाद दायर किया | निर्णय हुआ कि अनैतिक कार्य से कार्यवाही का आधार उत्पन्न नहीं होता। अतः महिला क्षतिपूर्ति की हकदार नहीं है। 

जहाँ अधिकार वहाँ उपाय

 जहाँ अधिकार वहाँ उपाय (Ubi Jus Ibi Remedium) से आप क्या समझते हैं?

 उत्तर- जहाँ अधिकार वहाँ उपाय (Ubi Jus Ibi Remedium) - इसका अर्थ यह है कि जहाँ अधिकार है, वहाँ उसके साथ ही उसके भंग होने की दशा में उसके लिये उपाय भी उपलब्ध है। वास्तव में, अधिकार तभी कायम रह सकता है जब उसे उपभोग करने की सुविधा हो। और उसके भंग होने की अवस्था में दोषी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही की जा सके। अतः प्रत्येक अपकार (Wrong) के लिये कानूनी उपाय उपलब्ध है। उक्त सूत्र का प्रतिपादन चीफ जस्टिस होल्ट ने एशबी बनाम व्हाइट, 1703 में यह कहते हुये किया था कि प्रत्येक कानूनी अधिकार के उल्लंघन मात्र से हानि होती है, भले ही उससे किसी को एक पैसे का भी नुकसान न हुआ हो।

असावधानी Definition of Negligence

 असावधानी (Negligence) की परिभाषा बताइये।

 

उत्तर-असावधानी की परिभाषा ( Definition of Negligence) सॉमण्ड के अनुसार, "उपेक्षा में सावधानी बरतने के विधिक कर्त्तव्य का उल्लंघन किया गया है, ऐसे मामलों में जहाँ सावधानी बरतना विधि द्वारा आवश्यक होता है।" प्रोफेसर विनफील्ड के अनुसार, "उपेक्षा एक अपकृत्य के रूप में सावधानी बरतने के विधिक कर्त्तव्य का उल्लंघन है जिसके परिणामस्वरूप प्रतिवादी के न चाहने पर भी वादी को क्षति पहुँचती है।" उपर्युक्त परिभाषा के विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उपेक्षा एक निश्चित अपकृत्य के रूप में सावधानी बरतने के कानूनी कर्तव्य की अवहेना है जिसके परिणामस्वरूप वादी को क्षति पहुँचती है।

 

कौन दावा कर सकता है और किस पर दावा नहीं किया जा सकता है?

 

उत्तर- अपकृत्य में सामान्य नियम यह है कि सभी व्यक्ति दावा कर सकते हैं और सभी पर दावा किया जा सकता है लेकिन इस सामान्य नियम के कुछ अपवाद हैं जो निम्न प्रकार हैं-अर्थात् (अ) कौन वाद दायर कर सकता है? किस पर याद नहीं चलाया जा सकता है। (अ) अपकृत्य में (i) सिद्धदोष (ii) विदेशी शत्रु (iii) विवाहित स्त्री; (iv) निगम; (v) गर्भस्थ शिश; (vi) दिवालिया व्यक्ति और (vii) विदेशी राज्य दावा दायर नहीं कर सकते। (ब) अपकृत्य में (i) राज्य के कार्य; (ii) सम्राट (iii) राजदूत; (iv) नाबालिग; (v) पागल व्यक्ति; (vi) लोक अधिकारी; (vii) निगम तथा (viii) श्रमिक संघ पर वाद नहीं चलाया जा सकता।

 

डा0 विनफील्ड ने अपकृत्य' की क्या परिभाषा दी है?

 उत्तर- डा० विनफील्ड के अनुसार, "अपकृत्यपूर्ण दायित्व कानून द्वारा पूर्वनिर्धारित किसी कर्तव्य-भंग से उत्पन्न होता है यह कर्तव्य व्यापक रूप से व्यक्तियों के प्रति होता है तथा इसके भंग होने का उपाय अनिर्धारित हर्जाने की प्राप्ति के लिये लाये गये किसी वाद द्वारा किया जाता है।"

कठोर दायित्व

कठोर दायित्व (Strict Liability) से आप क्या समझते हैं? राइलैण्ड ब० फलेवर के सन्दर्भ में समझाइये।

 

उत्तर-कठोर दायित्व (Strit Liability)- कभी-कभी ऐसे मामले भी हो सकते हैं जिनमें यादी को हुई क्षति के लिये प्रतिवादी को दायी ठहराया जा सकता है यद्यपि वह न तो परिणामों की इच्छा करता है तथा न ही उपेक्षा का दोषी है। इसे कठोर दायित्व कहते हैं। इस सम्बन्ध में सिद्धान्त रायलेण्ड्स बनाम फ्लेचर में प्रतिपादित किया गया था। इस बाद में न्यायमूर्ति ब्लैकबर्न ने सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए कहा कि "विधि का सही नियम यह है कि जो व्यक्ति अपने प्रयोजनों के लिये कोई चीज अपनी भूमि पर लाता है, एकत्रित करता है तथा रखता है जिसके बच निकलने पर शरारत की सम्भावना है तो ऐसा व्यक्ति ऐसी चीज अपने जोखिम पर ही रख सकता है तथा यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह प्रथम दृष्टया ऐसी चीज के बच निकलने के स्वाभाविक परिणामों से उत्पन्न नुकसानी के लिये उत्तरदायी होगा !"

आपराधिक दुष्कृति

आपराधिक दुष्कृति (Felonious Torts) का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

 

उत्तर- आपराधिक दुष्कृति (Felonious Torts) कुछ दुष्कृतियाँ ऐसी भी हो सकती हैं जो साथ-साथ ही अपराध की श्रेणी में भी आती हो, अर्थात् ये एक ही साथ दुष्कृति एवम् अपराध हों। उदाहरणार्थ (i) हमला; (ii) प्रहार (iii) मान-हानि तथा (iv) विद्वेषपूर्ण अभियोजन आदि यदि हम इनके स्वरूप पर दृष्टि डालें तो पायेंगे कि हमला एवं प्रहार किसी व्यक्ति की शारीरिक सुरक्षा के अधिकार का हनन है मानानि द्वारा उसका यशाधिकार भंग होता है। विद्वेषपूर्ण अभियोजन द्वारा उसकी स्वतन्त्रता एवम् सुरक्षा को संकट उत्पन्न होता है। व्यक्ति के दृष्टिकोण से इन चारों ही कार्यों से निजी अधिकारों का हनन होता है, किन्तु व्यक्ति के निजी अधिकारों के अतिरिक्त इनका सामाजिक पहलू भी होता है। ऐसे कार्य समाज में असुरक्षा, अव्यवस्था एवम् आतंक का वातावरण उत्पन्न करते हैं अतः वे अपराध की श्रेणी में भी आते हैं

राज्य आयोग की संरचना , राष्ट्रीय आयोग का गठन कैसे होता है

राज्य आयोग की संरचना कैसे होती है? समझाइये।

 

उत्तर-राज्य आयोग की संरचना के बारे में प्रावधान अधिनियम की धारा 16 में किया गया है। इसके अनुसार राज्य आयोग में कुल तीन सदस्य होंगे जिनमें से एक अध्यक्ष होगा। अन्य दो सदस्यों में से एक सदस्य महिला होगी।


अध्यक्ष - ऐसा व्यक्ति जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है, आयोग के अध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया जा सकता है। ऐसी नियुक्ति के लिए सम्बन्धित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से राय लिया जाना आवश्यक होगा।

सदस्य- सदस्य के लिए ऐसा व्यक्ति पात्र होगा, जो-

(i) योग्यता, सत्यनिष्ठा एवं प्रतिष्ठा युक्त हो,

(ii) अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन का पर्याप्त ज्ञान और अनुभव रखता हो; या

(iii) इनसे सम्बन्धित समस्याओं में कार्यवाही करने की योग्यता / क्षमता रखता हो। चयन समिति सदस्यों की नियुक्ति एक चयन समिति द्वारा की जायेगी जिसके निम्नांकित व्यक्ति सदस्य होंगे-

 

(क) राज्य आयोग का अध्यक्ष,

(ख) राज्य के विधि विभाग का सचिव एवं

(ग) राज्य के उपभोक्ता सम्बन्धी मामलों के विभाग का प्रभारी सचिव

 

सेवाकाल आयोग का सदस्य पांच वर्ष की अवधि या 67 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, इनमें से जो भी पहले हो, पद धारण कर सकेगा। एक बार नियुक्त सदस्य पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा।

 

राष्ट्रीय आयोग का गठन कैसे होता है?

 

उत्तर- अधिनियम की धारा 20 में राष्ट्रीय आयोग गठन के बारे में प्रावधान किया गया है यह उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अक्षिकरणों की श्रेणी में उच्चतम स्तर पर है। गठन राष्ट्रीय आयोग का गठन पांच सदस्यों से मिलकर होता है जिनमें से एक अध्यक्ष होता है। अन्य चार सदस्यों में भी एक महिला सदस्य होती है। अध्यक्ष- अध्यक्ष के एद पर ऐसा व्यक्ति नियुक्त किया जा सकता है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या न्यायाधीश रह चुका है। ऐसी नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय से की जायेगी।

 

सदस्य - सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए ऐसा व्यक्ति पात्र होगा, जो-

(i) योग्य, ईमानदार एवं प्रतिष्ठित हो,

(ii) जिसे अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन का समुचित ज्ञान या अनुभव हो, या

(iii) इनसे सम्बन्धित समस्याओं के बारे में कार्यवाही करने की योग्यता क्षमता हो।

 

चयन समिति सदस्यों की नियुक्ति एक चयन समिति द्वारा की जायेगी जिसमें निम्नांकित सदस्य होंगे-

 

(i) सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश जो सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नाम निदेशित किया जायेगा,

(ii) भारत सरकार का विधि सचिव एवं

(iii) भारत सरकार के उपभोक्ता सम्बन्धी मामलों के विभाग का सचिव।

 

कार्यकाल - आयोग के सदस्यों की नियुक्ति पांच वर्ष या 67 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पहले हो, के लिए की जायेगी। एक बार नियुक्त सदस्य पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा।

कौन व्यक्ति उपभोक्ता नहीं है

कौन व्यक्ति उपभोक्ता (Consumer) नहीं है?

 

उत्तर- स्मरणीय है कि, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अधीन किसी भी प्रकार का अनुतोष प्राप्त करने के लिये परिवादी का उपभोक्ता होना पूर्व शर्त है। यह सही है कि इन अधिनियम में 'उपभोक्ता' शब्द की व्यापक भाव में व्याख्या की गयी है किन्तु इसी अधिनियम के अध्ययन में दर्शित है कि निम्न व्यक्ति 'उपभोक्ता' की कोटि में नहीं आते हैं-

 

(क) जब किसी वस्तु के खरीदार द्वारा वस्तु बेचने वाले को वस्तु डिलीवर करने के लिये किसी प्रतिफल का भुगतान नहीं किया गया है।

(ख) जब किसी सेवा को प्राप्त करने के लिये सेवा प्राप्ति करने वाले व्यक्ति ने सेवा करने वाले व्यक्ति को कोई प्रतिफल नहीं दिया है या उससे प्राप्त नहीं किया है।

(ग) जब किसी व्यक्ति ने किसी वस्तु की खरीद वाणिज्यक ( कॉमर्शियल) प्रयोजन के लिये की है तब ऐसा खरीदार उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के उपबन्धों के प्रयोजन हेतु उपभोक्ता नहीं होगा किन्तु यदि उक्त व्यक्ति ने कोई मशीन आदि अपनी जीविका को चलाने के लिये खरीदी है। तब ऐसी खरीद 'वाणिज्यक प्रयोजन के लिये नहीं मानी जायेगी और ऐसी आजीविका चलाने के लिये खरीदी वस्तु का खरीदार इस उपभोक्ता अधिनियम के अधीन 'उपभोक्ता' हो जायेगा।

 

उच्चतम न्यायालय विभिन्न उच्च न्यायालयों, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग तथा विभिन्न राज्य के उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोगों द्वारा निर्णित निर्णयों के आधार पर निम्न व्यक्ति उपभोक्ता नहीं माने गये हैं-

 

1. सरकारी सेवक, जब वह उपभोक्ता फोरम से अपने वेतन, भविष्य निधि, सामुहिक बीमा तथा ग्रेच्युटी से सम्बन्धित मामलों के लिये अनुतोष मांगता है क्योंकि सरकार तथा उसके कर्मचारी में सेवा भाड़े पर देने वाले व्यक्ति तथा प्रतिफल का मुकदमा करके सेवा भाड़े पर प्राप्त करने वाले व्यक्ति के बीच स्थित उपभोक्ता का सम्बन्ध नहीं है। सरकार तथा उसके बीच स्वामी तथा सेवक का सम्बन्ध है। उपभोक्ता तथा सेवा उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति का सम्बन्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त उपरोक्त वर्णित सरकारी व्यक्ति उक्त मदों में भुगतान पाने के लिये सरकार को कोई प्रतिफल नहीं देते हैं, बल्कि उससे अपनी सेवायें देने के लिये वेतन के रूप में प्रतिफल पाते हैं।

 

2. सरकारी अस्पताल तथा मेडिकल कॉलिज में ईलाज कराने वाले रोगी क्योंकि सरकार उन्हें निःशुल्क स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध कराती है। उच्चतम न्यायालयों ने अस्पताल आदि में नाम मात्र की जाने वाली पंजीकरण धनराशि को प्रतिफल नहीं माना है।

 

3. सरकारी अस्पताल तथा मेडीकल कॉलिज में निःशुल्क परिवार नियोजन का ऑपरेशन कराने वाली महिला क्योंकि उससे उक्त ऑपरेशन के लिये कोई प्रतिफल नहीं लिया गया है बल्कि उसे तो सरकार ने परिवार नियोजन का ऑपरेशन कराने हेतु प्रोत्साहन राशि और प्रदान है।

 

4. नगरपालिका आदि में करदाता क्योंकि कर या टैक्स को उच्चतर न्यायालयों ने ऐसी कानूनी धनराशि माना है जो हर नागरिक राज्य की ओर से प्रदान की जाने वाली सुविधाओं के लिये आवश्यक कानूनी (स्टेटयुटरी) भुगतान है। यह भुगतान कानूनी कहलाता है। ऐसे भुगतान की प्रतिफल मानकर कोई भी करदाता राज्य से किसी विशिष्ट सेवा की अपेक्षा नहीं कर सकता है। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि किसी सेवा को प्राप्त करने वाली फीस या प्रतिफल तथा कर या टैक्स के रूप में दी जानेवाली धनराशि में अन्तर है।

 

5. किसी प्राधिकरण में किसी पद के लिये आवेदन देने वाला आवेदक ।

 

6. व्यक्तिगत सेवा संविदा के अधीन कार्यरत् व्यक्ति क्योंकि उसके तथाउसके स्वामी के बीच सेवक तथा स्वामी नियोजक का सम्बन्ध है।

 

7. हॉयर परचेज एग्रीमेन्ट के अधीन ऋण लेने वाले व्यक्ति।

 

8. निर्माण परियोजना का ठेकेदार।

 

9. वाणिज्यक ( कॉमर्शियल) प्रयोजन का खरीदार

 

10. सोसायटी के सदस्य सहकारिता दाद के मामले में।

 

11 ऐसे व्यक्ति जिन्हें कोई व्यक्ति अपने नियोजन के लिये सेवा नियोजित करता है।

 

12. न्यायालय शुल्क देने वाले वादकारी।

 

13. किसी कम्पनी के परिवर्तनीय डिबेन्चर्स का चारक

 

37. सम्पत्ति सम्बन्धी अपवचन (Slander of Goods) के बारे में आप क्या जानते हैं?

 

उत्तर- सम्पत्ति सम्बन्धी अपवचन (Slander of Goods ) ऐसे मिथ्याकथन जो "किसी व्यक्ति की सम्पत्ति में दोष लगाकर विद्वेषपूर्ण आशय से प्रकाशित किये गये हों तथा इससे उस व्यक्ति को विशिष्ट क्षति पहुंची हो।" इसे ट्रेड लाइवेट भी कहा जाता है अर्थात् जिन मिच्या बचनों से किसी व्यक्ति की सम्पत्ति का अवमूल्यन हो जाता है तो उसे सम्पत्ति सम्बन्धी अपवचन माना जाता है। ऐसे बाद में वादी को यह सिद्ध करना होता है कि- (i) प्रतिवादी ने वादी के माल को दोषपूर्ण या घटिया किस्म का बतलाया है। प्रतिवादी द्वारा अपने माल को वादी की अपेक्षा अच्छा या ऊंचा बताना सम्पत्ति सम्बन्धी अपवचन नहीं होते हैं (ii) प्रतिवादी द्वारा वादी के माल को दोषपूर्ण अथवा घटिया किस्म का बताना मिथ्या है। (iii) प्रतिवादी के उक्त कथन का प्रकाशन हो गया था प्रकाशन मौखिक या लिखित कैसा भी हो सकता है। (iv) प्रतिवादी ने वादी के माल को घटिया द्वेषपूर्ण आशय से बताया था अर्थात् प्रतिवादी का आशय वादी को क्षति पहुँचाने का था। (v) प्रतिवादी के उक्त कृत्य से वादी को विशिष्ट क्षति पहुँची है।

आक्रमण , प्रहार

आक्रमण (Assult) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।

 

उत्तर-आक्रमण (Assult)- प्रोफेसर विनफील्ड के अनुसार, "आक्रमण प्रतिवादी का वह कार्य है जो वादी के मन में ऐसी युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न कर देता है कि प्रतिवादी उस पर प्रहार करेगा ।" 'आक्रमण' की मुख्य कसौटी यह है कि प्रतिवादी द्वारा दी गई धमकी का प्रभाव वादी के मन में इस आशंका के साथ हो कि प्रतिवादी उसके विरूद्ध बल प्रयोग करने वाला है। अर्थात् केवल मात्र चमकी आक्रमण नहीं होगी जब तक धमकी के साथ धमकी देने वाले व्यक्ति का हाव-भाव ऐसा न हो कि उससे वादी के दिमाग में उसके प्रति डर उत्पन्न हो जावे वास्तविक शारीरिक सम्पर्क इसमें आवश्यक नहीं होता। किन्तु धमकी देने वाले व्यक्ति के हाव-भाव अवश्य होने चाहियें जिनसे वादी के मन में यह आशंका हो जाये कि वह उसके विरूद्ध बल प्रयोग करने वाला है।

 

प्रहार (मार-पीट ) (Battery) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

 

उत्तर- प्रहार (मार-पीट ) (Battery)- आक्रमण को क्रियान्वित रूप में परिवर्तित कर देना ही प्रहार है। अर्थात् किसी व्यक्ति के शरीर को बिना किसी कानूनी औचित्य के उसकी इच्छा के विरूद्ध अभद्र तरीके से छूना, प्रहार है सामण्ड ने प्रहार की परिभाषा देते हुए कहा है कि "बिना विधिक औचित्य के किसी व्यक्ति के शरीर के प्रति जानबूझकर या इरादे से बल प्रयोग प्रहार कहलाता है।"

 

इस प्रकार, स्पष्ट है कि प्रहार वास्तविक रूप से प्रतिवादी द्वारा वादी के विरूद्ध बल का प्रयोग है। इस विवेचन से प्रहार के दो तत्व स्पष्ट होते हैं- (i) प्रतिवादी द्वारा वादी के विरूद्ध उसके शरीर के प्रति बल का प्रयोग किया जाना चाहिये। बल का प्रयोग स्वयं के शरीर के द्वारा अथवा अन्य वस्तु के माध्यम से किया जा सकता है शरीर के द्वारा जैसे, चांटा मारना, धक्का देना आदि। वस्तु के माध्यम के द्वारा जैसे पत्थर फेंक कर पानी फेंक कर कुत्ता छोड़ कर आदि; (ii) यह कि बल का प्रयोग साशय तथा विधिक औचित्य से किया गया हो। भीड़ में किसी व्यक्ति के शरीर से छू जाना अथवा किसी व्यक्ति का ध्यानाकर्षण करना प्रहार की कोटि में नहीं आता है।

अतिचार और आरम्भ से अतिचार के मध्य अन्तर

अतिचार और आरम्भ से अतिचार के मध्य अन्तर कीजिए।

उत्तर- अतिचार एवं आरम्भ से अतिचार में अन्तर (Distinction between Trespass and Trespassab-initio) - अतिचार किसी व्यक्ति की भूमि पर अनाधिकार प्रवेश करने या उसकी भूमि के कब्जे में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने को कहते हैं। इस अपकृत्य की तीन विशेषतायें हैं- (अ) अतिचार बिना कानूनी औचित्य के अन्य की भूमि पर प्रदेश होता है। (ब) अतिचार एक निरन्तर जारी रहने वाला अपकृत्य है और जब तक यह रहता है एक नये अपकृत्य को जन्म देता रहता है और प्रतिदिन के अतिचार के लिये एक अलग वाद लाया जा सकता है। (स) अतिचार एक स्वतः अनुयोज्य अपकृत्य है अर्थात् इसमें क्षतिपूर्ति पाप्त करने के लिये क्षति का होना सिद्ध किया जाना आवश्यक नहीं है।

 

प्रारम्भतः अतिचार (Trespass-ab-initio) - जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की भूमि पर कानूनी अधिकार के अन्तर्गत प्रवेश करता है और इसके बाद वह उस अधिकार का दुरूपयोग करके उस भूमि पर कोई अपकरण (Misfeasance) करता है तो उसका प्रवेश आरम्भ से ही अतिचार माना जाता है और वह व्यक्ति न केवल अपकरण के बाद वाले कार्यों के लिये क्षतिपूर्ति के लिये दायी माना जाता है, बल्कि वह प्रारम्भिक प्रवेश के समय से ही अतिचारी और सभी कार्यों के लिये दायी माना जाता है।

 

आरम्भतः अतिचार की दो शर्तें हैं-

 

(i) अधिकार कानून द्वारा प्रदान किया गया होना चाहिये न कि किसी व्यक्ति द्वारा तथा

(ii) पश्चात्वती कार्य अपकरण (Misfeasurice) होना चाहिये न कि अकरण (Non-feasance)। इस प्रकार, किसी व्यक्ति द्वारा सराय में जाकर वहाँ खाये हुए भोजन का मूल्य न चुकाना उसे आरम्भ से अतिचार नहीं बनाता। उपर्युक्त दोनों अपकृत्यों में मुख्य अन्तर यह है कि

(i) अतिचार किसी अन्य व्यक्ति की भूमि पर ऐसा प्रवेश है जिसका कोई कानूनी औचित्य नहीं है जबकि आरम्भतः अतिचार में प्रवेश कानूनी अधिकार के अन्तर्गत होता है।

(ii) अतिचार एक निरन्तर अपकृत्य होता है जैबकि आरम्भतः अतिचार निरन्तर जारी रहने वाला अपकृत्य नहीं होता।

(iii) अतिचार एक स्वतः अभियोज्य अपकृत्य है जबकि आरम्भतः अतिचार में क्षतिपूर्ति तभी प्राप्त की जा सकती है जबकि पश्चात्वर्ती कार्य अपकरण (Mis-feasance) के अन्तर्गत आतें हो न कि अकरण (Non-feasance) के। 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की प्रस्तावना का महत्व

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की प्रस्तावना का महत्व (Importance of the Preamble of Consumer Protection Act, 1986) बताइये।

 

उत्तर - लखनऊ डवलपमेन्ट अथोरिटी बनाम एम० के० गुप्ता (1994) ISCC 243 में जस्टिस आर० एम० सहाय ने कहा कि अधिनियम की प्रस्तावना जो विधायी आशय निश्चित करने में उपयोगी सहायता दे सकती है, से आरम्भ किया जाए तो अधिनियम उपभोक्ताओं के हितों को श्रेष्ठकर संरक्षण प्रदान करने के लिए अधिनियमित किया गया है। "संरक्षण" शब्द का प्रयोग अधिनियम रचयिताओं का आशय समझने की कुन्जी है। विभिन्न परिभाषाएं एवं उपबंध इस उद्देश्य को प्राप्त करने का बड़े विस्तार से प्रयास करते हैं। इस निर्धारित धारणा को छोड़े बिना कि प्रस्तावना किसी उपबंध के अन्यथा साधारण अर्थ को नियंत्रित नहीं कर सकती, उनका अर्थ इसी उद्देश्य के प्रकाश में निकाला जाना चाहिए।

 

इस अभिप्राय का अनुसरण करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया है कि सरकारी निकाय, विधि के अन्तर्गत उन लोगों की सेवाओं में अपर्याप्तता के लिए जो उनकी सेवाएँ प्रतिफल के लिए क्रय करते हैं, दायी निर्धारित किए जायेंगे और प्रभारी अधिकारी यदि वे सेवाओं के उपभोक्ताओं को कोई क्लेश कारित करते हैं तो व्यक्तिगत रूप से दायी निर्धारित किए जाएंगे।

 

7. सेवाओं का अवक्रेता (Hirer of Services) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

 

उत्तर:- सेवाओं का अवक्रेता ( Hirer of Services) - उपभोक्ता की दूसरी कोटि सेवाओं के उपभोक्ता की है। परिभाषा कहती है कि "उपभोक्ता" शब्द उस व्यक्ति को सम्मिलित करता है जो प्रतिफल के लिए कोई सेवाएँ शुल्क पर लेता है।

राष्ट्रीय आयोग ने बाई फोर्ड बनाम एस० एस० श्रीवास्तव (1993) 2 C.P.R. 83 N.C. में यह निर्धारित किया कि संविदा का वह भाग जिसका सम्बन्ध निःशुल्क पुरस्कार है, बिना प्रतिफल का है अतः ऐसे पुरस्कार का विजेता उपभोक्ता नहीं था सेवा की परिभाषा धारा 2 के खण्ड (ब) में इस प्रकार की गई है कि हर प्रकार की सेवा जो संभावी उपभोक्ता को उपलब्ध करायी जाती है और जिसमें बैंकिंग, वित्तीयपोषण, बीमा परिवहन, प्रसंस्करण, विद्युत् या दूसरी ऊर्जा की अपूर्ति, बोडिंग या आवास या दोनों भवन निर्माण, मनोरंजन आमोद या समाचार या अन्य सूचनाएँ जुटाने से सम्बन्धित सुविधाएँ उपलब्ध कराना सम्मिलित है। "अवक्रय" शब्द का अर्थ होता है किसी वस्तु का या किसी व्यक्ति की सेवाओं का भुगतान के बदले में अस्थायी रूप से प्राप्त करना, किसी निश्चित रकम के बदले में अस्थाई रूप से लेना, किसी मूल्य पर सेवाओं का प्राप्त करना, प्रतिकरण पर अस्थायी उपभोग के लिए अनुदान देना।

 

8. उपभोक्ता न्यायालयों के गठन का वर्णन कीजिये।

उत्तर- उपभोक्ता न्यायालयों का गठन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 10 के अधीन सबसे पहले तथा छोटा न्यायालय जिला उपभोक्ता फोरम है जैसा इसके नाम से प्रकट है इसका गठन प्रत्येक जिले के लिये किया गया है। इसका क्षेत्राधिकार सम्बन्धित जिले की सीमाओं तक ही सीमित है। कुछ जिलों में एक से अधिक जिला फोरमों के गठन की व्यवस्था है। जिला फोरम में तीन संख्यकीय न्यायिक पदाधिकारियों की एक बेंच का गठन किया गया है। फोरम का अध्यक्ष कार्यरत या सेवानिवृत्त जिला जज होता है। इसमें अध्यक्ष के अतिरिक्त एक पुरुष सदस्य तथा महिला सदस्य भी होते हैं। निर्णय बैंच के बहुमत से होते हैं। निर्णय पर तथा प्रत्येक न्यायिक आदेश पर बैंच कम से कम दो सदस्यों की सहमति होनी आवश्यक है।

 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की भावना को दृष्टिगत रखते हुये जिला फोरम पुरुष सदस्य की नियुक्ति के लिये स्नातक तक की शिक्षा ट्रेड या व्यापार में प्रसिद्धि की अपेक्षा की गयी है तथा महिला सदस्य से सामाजिक कार्यकर्ता होने की अपेक्षा की गयी है महिला सदस्य का भी स्नातक तक शिक्षित होना आवश्यक है। सदस्यों के लिये कम से कम 35 वर्ष की आयु तथा स्नातक की डिग्री धारक होना अनिवार्य कर दिया गया है। जिला फोरम के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति सम्बन्धित राज्य के राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष, राज्य सरकार के खाद्य तथा रसद सचिव तथा राज्य सरकार प्रमुख न्याय सचिव (एल० आर०) से गठित समिति की सिफारिश पर पांच वर्ष के लिये राज्यपाल द्वारा की जाती है बशर्ते कि ऐसे अध्यक्ष तथा सदस्यों की आयु 65 वर्ष से अधिक नहीं हो जाती है। नये संशोधन में सदस्यों की पुनः नियुक्ति की व्यवस्था है।

 

उपभोक्ता न्यायालय के क्षेत्राधिकार (Juridiction of the Distict Forum) – जिला फोरम की स्थानीय क्षेत्राधिकारिता के सम्बन्ध में सुसंगत उपबन्ध उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 11 (2) के खण्ड 'क' 'ख' तथा 'ग' में दिये गये हैं। इन उपबन्धों का सार यह है कि एक उपभोक्ता किसी जिला फोरम में निम्न स्थितियों में अपना वाद दाखिल कर सकता है-

 

(क) (1) जहाँ विरोधी पक्षकार अपनी स्वेच्छा से (क) निवास करता है, या (ख) कारोबार करता है, या (ग) शाखा कार्यालय रखता है, या (घ) अभिलाभ के लिये स्वयं काम करता है (वर्कस फोर गेन)

अथवा

(2) जहाँ विरोधी पक्षकार ऐसे अधिक हैं वहाँ विरोधी पक्षकारों में से हर विरोधी पक्षकार स्वेच्छा से |

 

(क) निवास करता है, या (ख) कारोबार करता है, या (ग) शाखा कार्यालय रखता है, या (घ) लाभ के लिये स्वयं काम करता है उपरोक्त शर्तों में से केवल एक शर्त ही उपभोक्ता को जिला फोरम में क्षेत्राधिकारिता दिलाने के लिये काफी है। यदि कोई विरोधी पक्षकार किसी जिला फोरम की स्थानीय अधिकारिता के अधीन निवास करता है तब शेष शर्तों का विद्यमान रहता आवश्यक नहीं है। यही कारण है कि हर शर्त के बाद शब्द 'या' का प्रयोग किया गया है अथवा (3) जहाँ वाद - कारण पूर्णतः या अंशतः उत्पन्न होता हो।

हेतु और आशय की व्याख्या करते हुए दुष्कृति सम्बन्धी मामलों में उनकी संगतता पर टिप्पणी

हेतु' और 'आशय' की व्याख्या करते हुए दुष्कृति सम्बन्धी मामलों में उनकी संगतता पर टिप्पणी लिखिये।

 

उत्तर:  हेतु (Motive) हेतु वह मानसिक स्थिति होती है जो किसी कार्य को करने की प्रेरणा देती है। उसके द्वारा ही मन किसी कार्य की ओर अग्रसर होता है सामण्ड ने इसे दूर का आशय बताया है, जो शीघ्र ही प्रकट न हो, वरन् पार्श्व भूमि (Back Ground) में पड़ा हो। जब हम यह निर्णय करते हैं कि "कोई कार्य दुष्कृति है या नहीं" हेतु असंगत मानी जाती है। अपराध में चाहे इसे कितना ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो किन्तु दुष्कृति में इसका कोई स्थान नहीं है। एक वैध कार्य इसलिये अवैध नहीं माना जा सकता क्योंकि वह बुरे हेतु (Motive) से किया गया है। किसी भी कृत्य में महत्व कार्य का होता है, हेतु का नहीं।

इस विषय पर निम्नलिखित मामले उल्लेखनीय है-

 

(i) मेयर आफ ब्रेक फोर्ड कारपोरेशन बनाम पिकिल्स, 1895 AC 587 में प्रतिवादी ने भूमिगत पानी के श्रोत को बदल दिया। यह उसने इसलिये किया कि वादी जोकि एक कारपोरेशन थी उसकी भूमि को खरीद ले उस श्रोत से वादी अपना कार्य चलाती थी। वादी ने क्षतिपूर्ति का दावा किया। न्यायालय ने निर्णय दिया और कहा यद्यपि प्रतिवादी का कार्य कोई निश्चित रूप से एक भले पड़ोसी जैसा नहीं था फिर भी वादी कारपोरेशन किसी तरह की क्षति पाने की अधिकारिणी नहीं है।

 

(ii) विष्णु वासुदेव जोशी बनाम टी० एल० एच० स्मिथ पियर्स 1949, नागपुर 262 का वाद हेतु के सम्बन्ध में उल्लेखनीय है। इस मामले में वादी राजकुमार कालेज, रायपुर में बिजली मिस्त्री का काम कर रहा था और प्रतिवादी कालेज का प्राधानाचार्य था। प्रतिवादी ने वादी को नौकरी से मुअत्तल (Suspend) कर दिया और वादी के पेट में दो तीन लातें मारी जिससे वादी को शारीरिक एवं मानसिक चोट पहुँची तथा उसका अपमान हुआ इसलिये वादी द्वारा प्रतिवादी के खिलाफ उसके उक्त कार्य से हुई क्षति के लिये 100 रूपये का दावा किया प्रतिवादी की ओर से यह कहा गया है कि "इस मामले में यह सिद्ध नहीं हुआ कि गलत हेतु से प्रेरित होकर प्रतिवादी ने यह कृत्य किया था। अतः क्षतिपूर्ति का दायित्व ही उत्पन्न नहीं होता है। न्यायाधीश मधोलकर ने अपने निर्णय में कहा कि "इस मामले में हेतु का महत्व बहुत थोड़ा है। यह अनुमान करना चाहिये कि प्रत्यार्थी ने सआशय अपीलार्थी को मानसिक एवं शारीरिक कष्ट पहुँचाया है।'

 

आशय (Intention) - आशय से तात्पर्य उस उद्देश्य या भावना से है जिससे कोई कार्य किया जाता है। इसमें किसी कार्य का पूर्व ज्ञान तथा इच्छा का सम्मिश्रण होता है जिसके द्वारा उस इच्छा को कार्य रूप प्रदान किया जाता है। सामण्ड के अनुसार, जिस ध्येय को मन में रखकर कोई कार्य किया जाता है उसे आशय या नीयत कहते हैं। इसमें क्षतिकारक परिशास्त्र का पूर्व ज्ञान और उसको कृत्य द्वारा प्राप्त करने की अभिलाषा निहित रहती है उद्देश्य को पाने में आशय एक व्यवहार का निर्देशन है। किसी कृत्य को तभी आशय युक्त कहा जाता है जब वह तथ्य के रूप में आने के पूर्व विचार के रूप में भी रहा हो।" दूसरे शब्दों में, "लक्ष्य को प्राप्त करने की इच्छा और उसके पूर्वज्ञान से प्रेरित होकर किये गये कृत्य को आशय युक्त (Intentional) कृत्य कहेंगे।

 

दुष्कृति विधि के अन्तर्गत आशय (Intention) - का कोई महत्व नहीं है क्योंकि सभी दीवानी मामलों में विधि कर्ता के आशय को इतना महत्व नहीं देता है जितना कि क्षतिग्रस्त पक्ष के नुकसान और क्षति को देता है। इस सन्दर्भ में निम्नलिखित वाद उल्लेखनीय हैं-

 

(i) गिले बनाम स्वान, 1822 - इस मामले में प्रतिवादी एक गुब्बारे में बैठकर उड़ा और कुछ समय आसमान में उड़ने के बाद वादी के उद्यान में उतरा। प्रतिवादी को गुब्बारे में बैठा देखकर वादी और बहुत से व्यक्ति दर्शक के रूप में उद्यान में घुस आये। इससे वादी के उद्यान को बहुत नुकसान हुआ। वादी ने प्रतिवादी पर नुकसानी का मुकदमा चलाया। प्रतिवादी ने अपने बचाव में कहा कि उसका वादी को नुकसान पहुंचाने का कोई आशय नहीं था। न्यायाधीश ने अपने निर्णय में प्रतिवादी को नुकसान के लिये उत्तरदायी ठहराते हुये कहा है कि 'गुब्बारे में उड़ने वाले व्यक्ति को भूमि पर उतरते देखने की इच्छा स्वाभाविक है, अतः भीड़ का उद्यान में घुस आना और पौधों को कुचलना प्रतिवादी के कृत्य का प्रत्यक्ष एवं स्वाभाविक परिणाम है। इसमें प्रतिवादी यह नहीं कह सकता कि उसे अपने कृत्य के स्वाभाविक परिणाम का पूर्व ज्ञान नहीं था। कानून की दृष्टि में उसे अपने कृत्य का पूर्व ज्ञान था। भले ही उसे वास्तव में ऐसा ज्ञान न रहा हो।

 

(ii) विल्किंसन बनाम डाउनटन, 1892 वाद में इस प्रतिवादी ने व्यावहारिक पजाक करते हुये वादी (श्रीमती विल्किंसन को मिथ्या सूचना दी कि उसका पति (जो कि वास्तव में विदेश में था) एक दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गया है और उसकी दोनों टाँगे टूट गई हैं। इस सूचना से वादी (श्रीमती विल्किंसन) को मानसिक ठेस लगी और वह बीमार पड़ गयी तथा उसके बाल भी सफेद हो गये कुछ अवधि तक तो उनके प्राण भी संकट में पड़ गये वह सूचना मिथ्या ज्ञात होने पर यादी, श्रीमती विल्किंसन ने प्रतिवादी (डाउनटन) पर क्षतिपूर्ति का मुकदमा चलाया और कहा कि मिच्या सूचना के कारण उसको बहुत कष्ट हुआ है। न्यायाधीश ने मुकदमे का निर्णय करते हुए कहा कि "व्यक्ति जो कार्य करता है अपने स्वाभाविक परिणाम के उद्देश्य से करता है और इस मामले में यदि प्रतिवादी की मिथ्या सूचना के परिणाम स्वरूप कथित हानि पहुँची तो प्रतिवादी क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है।"

उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 के उद्देश्य एवं कारणों (Objects and Reasons of the Consumer Protection (Amendment) Act, 1993) का संक्षिप्त परिचय लिखिए

उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 के उद्देश्य एवं कारणों (Objects and Reasons of the Consumer Protection (Amendment) Act, 1993) का संक्षिप्त परिचय लिखिए।

 

उत्तर- उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 का मुख्य उद्देश्य 1986 के अधिनियम की कमियों को दूर करने तथा समावेशित क्षेत्र की परिधि को बढ़ाना तथा अधिनियम के अन्तर्गत परितोषीय अभिकरणों को और अधिक शक्तियाँ प्रदान करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह व्यवस्था करना है अर्थात्- (i) अधिनियम की परिधि को बढ़ाना जिससे कि जहाँ ऐसे उपभोक्ताओं के सामान्य हित को उपभोक्ता वर्ग कार्यवाही परिवादों और व्यापारी द्वारा अपनायी गयी अवरोधक व्यापारिक व्यवहारों से सम्बन्धित परिवादों को दाखिल करने में समर्थ करना। (ii) ऐसे उपभोक्ताओं को जो स्वरोजगार में हों उन्हें परितोषीय अभिकरणों के समक्ष जहाँ उनके द्वारा केवल अपने जीविकोपार्जन के लिए क्रय किए गए माल में कोई दोष हो परिवाद दाखिल करने में समर्थ करना। (iii) आवास निर्माण से सम्बन्धित सेवाएं सम्मिलित करना (iv) विभिन्न परितोषीय अभिकरणों के अधिकतर सदस्यों के चयन के लिए समिति के गठन की व्यवस्था करना (v) जिला फोरम, राज्य आयोग, राष्ट्रीय आयोग की आर्थिक अधिकारिता बढ़ाना (vi) पक्षकारों का खर्चा अधिनिर्णित करने के रूप में, सेवाओं से दोषों या कमियों को दूर करने का आदेश देने के लिए तथा ऐसा माल जिनसे सार्वजनिक सुरक्षा के संकटापन्न होने की संभावना हो, वापस कराने के लिए सशक्त करने के लिए परितोषयी अभिकरणों को अतिरिक्त शक्तियाँ प्रदान करना (vii) तुच्छ या तंग करने वाले परिवाद की दशा में दण्ड अधिरोपित करना तथा (viii) परिवाद दाखिल करने के लिए 2 वर्ष की अवधि की परिसीमा की व्यवस्था करना।

बिना त्रुटि के दायित्व से आप क्या समझते हैं? उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से समझाइये?

 बिना त्रुटि के दायित्व से आप क्या समझते हैं  उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से समझाइये

What do you mean by no fault liability? Explain with suitable examples.

 

 उत्तर- रेलेण्ड बनाम फ्लेचर, 1868 में प्रतिपादित कठोर दायित्वका सिद्धान्त इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस मामले में यह नियम प्रतिपादित किया गया है कि यदि काई व्यक्ति अपनी भूमि पर कोई खतरनाक वस्तु इकट्ठा करता है तो उसके पालयन के परिणामस्वरूप होने याले प्रत्यक्ष परिणामों के लिये वह दायी होगा चाहे वह उपेक्षावान न भी रहा हो। दूसरा, उदाहरण, एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ के मामले में प्रतिपादित सिद्धान्त है जिसमें यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संकटपूर्ण या स्वभाव से खतरनाक क्रियाकलापों में लगा है तो उस कार्य से उत्पन्न होने वाला हानि के लिये कठोर या पूर्ण दायित्व होता है तीसरा, उदाहरण, स्वामी का अपने सेवक के द्वारा सेवा के अनुक्रम में किये गये अपकृत्यों के लिये होता है। चौथा वर्तमान काल में ऐसे अनेक कर्त्तव्य या दायित्व हैं जो नियोक्ताओं पर अधिनियमों द्वारा आरोपित किये जाते हैं, जैसे, कारखाना अधिनियम, कर्मकार प्रतिकर अधिनियम जिनमें त्रुटि का तत्व अनुपस्थिति रहता है, फिर भी वे दायी ठहराए जाते हैं वर्तमान समय में मोटर दुर्घटनाओं में हुई अत्यधिक वृद्धि 1 को ध्यान में रखते हुए "बिना त्रुटि के दायित्व" के सिद्धान्त के आधार पर पीड़ित व्यक्ति और उनके आश्रितों को कुछ प्रतिकर तत्काल देने के उद्देश्य से सम्बन्धित विधि के प्रावधान किए जाने की धारणा का जन्म हुआ है।

उपताप और अतिचार में अन्तर कीजिए

 उपताप और अतिचार में अन्तर कीजिए।

Distinguish between nuisance and trespass.

 

उत्तर - उपताप और अतिचार में अन्तर-

उपताप -

1. उपताप किसी व्यक्ति के कब्जे सम्बन्धी अधिकार पर प्रभाव डालता है।

2. उपताप में अधिसेविता के मामलों के सिवाय कार्यवाही तभी हो सकती है जब कि वास्तविक क्षति प्रमाणित की जाये।

3. जब कोई कार्य सीधा नहीं अपितु परिणाम रूप में वादी पर प्रभाव डालता है, जैसे, शोर, धुआं आदि तो वह उपताप होता है।

4. बिना आज्ञा के किसी की सम्पत्ति का उपयोग करना उपताप है।

5. किसी सम्पत्ति पर जाकर उसके सुख एवं शान्तिपूर्ण उपयोग में हस्तक्षेप उपताप होता है।

 

अतिचार -

1. अतिचार किसी व्यक्ति के कब्जे को आघात पहुँचाता है।

2. अतिचार अभियोज्य है।

3. अतिचार में वादी का सीधा कृत्य जैसे किसी की जमीन पर प्रवेश आदि आते हैं।

4. बिना आज्ञा के किसी की सम्पत्ति पर प्रवेश करना अतिचार है।

5. बिना आघात पहुँचाये भी किसी की सम्पत्ति पर प्रवेश अतिचार हो सकता है।

मिथ्या नाम से व्यापार करना से आप क्या समझते हैं? मिथ्या नाम से व्यापार करने के मामले में वादी को प्रतिवादी के खिलाफ क्या सिद्ध करना होता है?

मिथ्या नाम से व्यापार करना से आप क्या समझते हैं? मिथ्या नाम से व्यापार करने के मामले में वादी को प्रतिवादी के खिलाफ क्या सिद्ध करना होता है?

What do you mean by passing off? What a plaintiff must prove in case of passing off against defendant?

 

उत्तर- मिथ्या नाम से व्यापार करना (Passing off) - पासिंग ऑफ का तात्पर्य है, किसी व्यक्ति द्वारा क्रेताओं को धोखा देने के आश्य से मिथ्या निरूपण करना जिससे क्रेता यह विश्वास कर ले कि प्रतिवादी जो वस्तुएँ बेच रहा है, वे वास्तव में वादी की हैं 'अर्थात् यह क्रेताओं को ऐसी मिथ्या सूचना देना है कि जिससे वे इस विश्वास में आ जायें कि प्रतिवादी द्वारा बेचा जाने वाला माल वादी का है।

 

'पासिंग ऑफ' एक प्रकार की अनुचित प्रतियोगिता है जिसमें कपटपूर्ण प्रयत्नों से दूसरे के द्वारा स्थापित व्यापारिक या व्यावासायिक प्रतिष्ठा का लाभ उठाये जाने का प्रयास किया जाता है इसमें ट्रेड मार्क, पेटेन्ट राइट, ट्रेडनाम, कापीराइट आदि सम्मिलित रहते हैं। पासिंग ऑफ के मामले में वादी को क्या सिद्ध करना होता है? इस कार्यवाही में वादी को यह सिद्ध करना होता है कि- (i) वादी का नाम मात्र बाजार में किसी स्पष्ट नाम, चिन्ह या ट्रेडमार्क से प्रसिद्ध था (ii) प्रतिवादी ने क्रेताओं से अपने व्यवहार द्वारा वादी के माल के सम्बन्ध में मिथ्या निरूपण किया। (iii) प्रतिवादी के उक्त मिथ्या निरूपण को क्रेताओं ने सत्य माना। अर्थात् प्रतिवादी द्वारा बेचे जाने वाले माल को वादी का वास्तविक माल माना तथा (iv) इस प्रकार के मिथ्या निरूपण से वादी को विशिष्ट क्षति पहुँची।

केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार की नियम बनान की शक्तियों का उल्लेख कीजिये।

केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार की नियम बनान की शक्तियों का उल्लेख कीजिये।

Mention the Rule making powers' of the Central Government and the State Governments.

 

उत्तर- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 30 एवं 31 में केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार की "नियम" बनाने की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। ऐसे नियम इस अधिनियम के उपबंधों को लागू करने के लिए बनाये जा सकते हैं। केन्द्रीय सरकार अधिनियम के निम्नलिखित उपबंधों को लागू करने के लिए नियम बना सकती है

 

(i) धारा 2 की उपधारा (1) का खण्ड (क)

(ii) धारा 4 की उपधारा (2) का खण्ड (ख)

(iii) धारा 5 की उपधारा (2)

(iv) चारा 13 की उपधारा (4) का खण्ड (vi) तथा

(v) धारा 19,

(vi) धारा 20 की उपधारा (2) और (vii) धारा 22

 

इसी प्रकार, राज्य सरकार अधिनियम के निम्नलिखित उपबंधों को लागू करने के लिए नियम बना सकती है

 

(i) धारा 7 की उपधारा (2) व (4),

(ii) धारा 10 की उपधारा (3),

(iii) धारा 12 की उपधारा (2),

(iv) धारा 13 की उपधारा (1) का खण्ड (ग) (v) धारा 14 की उपधारा (3)

(vi) धारा 15, और

(vii) धारा 16 की उपधारा (2)

 

ऐसे नियम की अधिसूचना (Notification) द्वारा बनाये जायेंगे तथा इन्हें केन्द्रीय सरकार की दशा में संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष एवं राज्य सरकार की दशा में राज्य के विधान मण्डल के समक्ष रखा जायेगा।

 

नियमों का संसद के समक्ष रखा जाना (Laying of the Rules before the Parliament) - धारा 31 (1) के अनुसार इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा - बनाये गये प्रत्यक नियम इसके बनाये जाने के बाद, यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन, जब वह सत्र में हो, के समक्ष तीस दिनों की पूर्ण अवधि के लिए जो एक सत्र में या दो में या अधिक उत्तरवर्ती सत्रों को शामिल कर सकेगा, रखा जाएगा, और यदि उक्त सत्र या आनुक्रमिक सत्रों के तत्काल -बाद सत्र के पूर्व दोनों सदन नियम में किसी परिवर्तन को करने के लिए सहमत होते हैं, या दोनों सदन सहमत होते हैं कि नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, तो इसके बाद नियम का ऐसे परिवर्तित रूप में लागू होगा, या प्रवर्तन नहीं होगा, जैसा कि मामला हो, परन्तु ऐसा कोई उपान्तरण या निस्प्रभाव उस अधिनियम के अधीन पूर्व में किये गए किसी चीज की वैधता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा।

 

इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, इसके बनाये जाने के बाद, यथाशीघ्र विधान मण्डल के समक्ष रखा जाएगा।

 

धारा 31 के उपबन्ध केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों पर यह दायित्व आरोपित करते हैं। कि यदि वे कोई नियम बनाती हैं तो प्रस्तावित नियम को संसद् या विधान मण्डल के दोनों सदनों के पटल पर रखें। यह आवश्यक नहीं है कि सदन उसे उसी रूप में पास ही कर दे। उसमें सदस्यों के विचार-विमर्श और बहस के दौरान आये हुए सुझावों को ध्यान में रखकर नियमों में परिवर्तन भी किया जा सकता है। यदि उपान्तरण (Modification) होता है तो उपान्तरित रूप में ही नियम लागू किये जायेंगे।

 

दूसरी बात नियम के अस्वीकार किये जाने के बारे में विचारणीय होती है। जब केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियम क्रमशः संसद और विधानमण्डल के दोनों सदनों के पटल पर सत्र के दौरान रखे जाते हैं तो ऐसा भी हो सकता है कि अधिसंख्यक सदस्य उसके पक्ष में न हों। जब बहुमत नियम के लागू किए जाने के सम्बन्ध में नहीं हैं तो उसे निरस्त अर्थात् अस्वीकृत माना जाएगा। ऐसी स्थिति बनने पर निर्मित नियम उक्त सरकारों द्वारा लागू नहीं किये जाएँगे

 

निष्कर्ष (Conclusion) निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि प्रस्तावित नियम के पारित होने या न होने, लागू किये जाने या प्रवर्तन में न आ सकने की बात संसद अथवा विधान मण्डल द्वारा स्वीकृत या अस्वीकृत किये जाने पर निर्भर करती है।

 

क, ख के विरुद्ध एक मिथ्या एवं तंग करने वाला परिवाद लाता है। क्या 'क' को इस कार्य के लिए दण्डित किया जा सकता है? यदि हाँ, तो किस धारा के अन्तर्गत ?

प्रश्न . (र) क, ख के विरुद्ध एक मिथ्या एवं तंग करने वाला परिवाद लाता है। क्या 'क' को इस कार्य के लिए दण्डित किया जा सकता है? यदि हाँ, तो किस धारा के अन्तर्गत ?

'A' files a false and vexatious complaint against 'B'. Whether 'A' can be punished for this? If so, under what section of the Consumer protection Act 1986?

 

उत्तर- प्रत्येक परिवादी का यह कर्त्तव्य है कि वह जानबूझकर ऐसा कोई परिवाद न लायें जो मिथ्या एवं तंग करने वाला (Friviolous or Vexatious) हो। यदि ऐसा कोई परिवाद लाया जाता है तो यथास्थिति, जिला फोरम, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग द्वारा:-

 

(i) उसे निरस्त किया जा सकेगा, एवं

(ii) परिवादी को यह आदेश दिया जा सकेगा कि वह विपक्षी को दस हजार रुपये तक की राशि हर्जे के रूप में प्रदान करे।

 

ऐसी व्यवस्था अधिनियम की धारा 26 में की गई है। 'ख' के विरुद्ध भी ऐसा ही आदेश पारित किया जा सकता है।

 

स्मरणीय है कि दस हजार रुपये के हर्जाने की व्यवस्था पहले नहीं थी। यह उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 द्वारा की गई है।

 

प्रश्न  सेवाओं के संदर्भ में "उपभोक्ता" की अनिवार्य शर्तों का उल्लेख करते हुए बताइये कि क्या निम्नलिखित व्यक्ति उपभोक्ता हैं-

(क) सरकारी अस्पतालों से निःशुल्क चिकित्सा सेवायें प्राप्त करने वाला व्यक्ति

(ख) रेलवे में टिकट लेकर यात्रा करने वाला व्यक्ति

(ग) आवासन बोर्ड से आवंटन में भू-खण्ड अथवा मकान प्राप्त करने वाला व्यक्ति

(घ) शिक्षण संस्था से शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र एवं उनके अभिभावक तथा

(ङ) टैक्सी के रूप मे चलाने के लिए वाहन खरीदने वाला व्यक्ति।

Explaining the essential conditions of consumer with reference to services state whether the following persons are consumers-

(a) Person obtaining services from Govt. Hospitals free of charge,

(b) Person travelling by train with ticket,

(c) Person obtaining a plot or house by allotment from Housing Board,

(d) Students obtaining education form educational institutions andtheir parents,

(e) Person purchasing a vehicle for plying as a taxi.

 

उत्तर- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2 (1) (घ) में दो गई परिभाषा के अनुसार सेवाओं के संदर्भ में "उपभोक्ता" के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं---

 

(i) उपभोक्ता को सेवायें प्रदान की गई हों,

(ii) उपभोक्ता द्वारा सेवाओं को खरीदा गया हो, एवं

(iii) ऐसी सेवायें प्रतिफल स्वरूप हो कन्ज्यूमर यूनिटी एण्ड ट्रस्ट सोसायटी, जयपुर बo सेक्रेटरी, मेडिकल एण्ड हेल्थ डिपार्टमेन्ट जयपुर, परिवाद स० । सन् 1988 राजस्थान आयोग 3 जनवरी 1989

 

समस्यायें (Problems) -

 

(क) सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों से निःशुल्क चिकित्सा सेवायें प्राप्त करने वाले व्यक्ति उपभोक्ता नहीं हैं हनुमान प्रसाद दरबान व डॉ० सी० एस० शर्मा, एस० एम० एस० हास्पीटल, जयपुर, परिवाद सं0 3 सन् 1989 राजस्थान आयोग, 200.6.1989 |

 

(ख) रेलवे में टिकिट लेकर यात्रा करने वाला व्यक्ति उपभोक्ता है जनरल मैनेजर, साऊथ ईस्टर्न रेलवे ब० आनन्द प्रसाद सिन्हा, प्रथम अपील सं० 3 सन् 1988 राष्ट्रीय आयोग 28.8.1989

 

(ग) आवासन बोर्ड द्वारा आवंटन-भूखण्ड अथवा मकान प्राप्त करने वाले व्यक्ति उपभोक्ता हैं उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद् ब० गरिमा शुक्ला प्रथम अपील संo 5 सन् 1989 राष्ट्रीय आयोग, 27.8.89

 

(घ) शिक्षण संस्थाओं से शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र एवं उनके अभिभावक उपभोक्ता नहीं हैं ऐज्यूकेशनल सोसायटी ऑफ सोफिया, कोटा ब० कैलाशचन्द्र सिंघल, कोटा, अपील संo 45 सन् 1989 राजस्थान आयोग 25.9.1989

(ङ) टैक्सी के रूप में चलाने के लिए वाहन खरीदने वाला व्यक्ति उपभोक्ता नहीं है क्योंकि टैक्सी ड्राइवर का उद्देश्य व्यवसायिक है। श्रीमती पुष्पा मीण, बून्दी ब० शाह एन्टरप्राइजेज राजस्थान लि०, कोटा, परिवाद सं0 4 सन् 1989 राजस्थान आयोग 4.8.1989 1

 

क्या राष्ट्रीय आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपील की जा सकती है? यदि हाँ, तो कब और कहाँ की जा सकती है ? समझाइये।

क्या राष्ट्रीय आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपील की जा सकती है? यदि हाँ, तो कब और कहाँ की जा सकती है ? समझाइये।

उत्तर- धारा 23 में उपबंधित प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रीय आयोग के आदेशों के विरुद्ध भी अपील की जा सकती है। ऐसी अपील आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर उच्चतम न्यायालय में की जा सकती हैं।

विलम्ब का पर्याप्त कारण होने पर तीस दिन के बाद भी अपील को स्वीकार किया जा सकता है। पर्याप्त कारण क्या है।--

उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 द्वारा अधिनियम में एक नई धारा 24 के अन्तः स्थापित (Insert) कर परिवाद पेश किये जाने की सीमा अवधि निर्धारित की गई है। इसके अनुसार जिला फोरम राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के समक्ष कोई भी परिवाद वाद कारण (Cause of action) उत्पन्न होने की तिथि से दो वर्ष के भीतर पेश किया जा सकता है. उसके बाद नहीं ।

दो वर्ष के बाद परिवाद केवल तभी स्वीकार किया जा सकता है जब जिला फोरम, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग को यह समाधान हो जाये की विलम्ब का कोई पर्याप्त कारण (Sufficient cause) रहा है.

पर्याप्त कारण से अभिप्राय ऐसे कारण से है जो परिवादी की नियंत्रण शक्ति से बाहर रहा हो पी. एच. ई. डी- बीकानेर बनाम जिला फोरम, बीकानेर (1991 आर. एल. टी 45 ) ।

ऐसे मामलों में परिवादी द्वारा शपथ पत्र प्रस्तुत किया जाना वांछनीय है आर. एस. आर. टी. सी. बनाम जिला फोरम, बीकानेर (1992 आर. एल. टी. 45)।

 

 

 

राज्य आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपील कहाँ की जा सकती है ? क्या इसके लिए कोई सीमा निर्धारित की गई है?, राष्ट्रीय आयोग के गठन एवं विभिन्न क्षेत्राधिकार सम्बन्धी प्रावधानों का वर्णन कीजिये

राज्य आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपील कहाँ की जा सकती है ? क्या इसके लिए कोई सीमा निर्धारित की गई है? समझाइये।

Where an appeal can be filed against the orders of state commission ? Whether any limitation has been prescribed for filing appeals ?

 

उत्तर- बारा 19 के अनुसार, राज्य आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपील राष्ट्रीय आयोग में की जा सकती है। राज्य आयोग के आदेश से पीड़ित (Aggrieved ) कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय आयोग में ऐसी अपील दायर कर सकता है।

 

अपील के लिए परिसीमा की अवधि तीस दिन निर्धारित की गई है। आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर ऐसी अपील की जा सकती है। पर्याप्त कारण होने पर तीस दिन के बाद भी अपील ग्रहण की जा सकती है।

 

प्रश्न - राष्ट्रीय आयोग के गठन एवं विभिन्न क्षेत्राधिकार सम्बन्धी प्रावधानों का वर्णन कीजिये।

Explain the provisions relating to composition of National Commission and its various jurisdictions.

 

उत्तर- राष्ट्रीय आयोग का गठन (Constitution of National Commission) - धारा 20 के अनुसार, राष्ट्रीय आयोग का गठन पाँच सदस्यों से मिलकर होता है जिनमें से एक अध्यक्ष होता है। अन्य चार सदस्यों में भी एक महिला सदस्य होती है 1

 

अध्यक्ष (President) - अध्यक्ष के पद पर ऐसा व्यक्ति नियुक्त किया जा सकता है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या न्यायाधीश रह चुका है। ऐसी नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय से की जायेगी।

 

सदस्य (Members) सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए ऐसा व्यक्ति पात्र होगा, जो-

(i) योग्य, ईमानदार एवं प्रतिष्ठित हो,

(ii) जिसे अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन का उचित ज्ञान या अनुभव हो,

(iii) इनसे सम्बन्धित समस्याओं के बारे में कार्यवाही करने की योग्यता हो ।

 

चयन समिति (Selection Committee) - सदस्यों की नियुक्ति एक चयन समिति द्वारा की जायेगी जिसमें निम्नांकित सदस्य होंगे-

 

(i) सवोच्च न्यायालय का न्यायाधीश जो सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नाम निदेशित किया जायेगा,

(ii) भारत सरकार का विधि सचिव एवं

(iii) भारत सरकार के उपभोक्ता सम्बन्धी मामलों के विभाग का सचिव ।

 

कार्यकाल (Term of Office)- आयोग के सदस्यों की नियुक्ति पाँच वर्ष या 67 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक इनमें से जो भी पहले हो, के लिए की जायेगी। एक बार नियक्त सदस्य पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होंगे। राष्ट्रीय आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है।

 

राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता (Jurisdiction of the National Commission) – धारा 21 के अनुसार राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता चार प्रकार की है-

 

1. आर्थिक अधिकारिता (Pecuniary Jurisdiction) - राष्ट्रीय आयोग को ऐसे परिवादों की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार है जिनमें परिवादित माल या सेवा या दावाकृत प्रतिकर का मूल्य बीस लाख रुपये से अधिक हो। सन् 1993 के उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम से पूर्व यह अधिकारिता दस लाख रुपये से अधिक के मामलों की थी।

 

2. प्रादेशिक अधिकारिता (Territorial Jurisdiction) राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता का विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है अर्थात् सम्पूर्ण भारत में उत्पन्न विवादों की सुनवाई करने की इसे अधिकारिता है।

 

3. अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction) राष्ट्रीय आयोग को किसी भी राज्य आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपील की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार है। ।

 

4. पुनरीक्षण अधिकारिता (Revisional Jurisdiction) राष्ट्रीय आयोग को पुनरीक्षण की शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। जहाँ राष्ट्रीय आयोग को यह प्रतीत होता हो कि-

 

(i) राज्य आयोग ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो उसमें निहित नहीं है, या

(ii) राज्य आयोग ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है जो उसमें निहित है,

या

(iii) राज्य आयोग ने अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने में अवैधानिकता या तात्विक अनियमितता बरती है।

 

वहाँ राष्ट्रीय आयोग ऐसे राज्य आयोग से सम्बन्धित अभिलेख मंगवा कर उसमें उचित आदेश पारित कर सकता है।

परिवाद पेश करने की रीति को समझाइये।

 परिवाद पेश करने की रीति को समझाइये।

Explain the procedure of filing a complaint.

or

जिला फोरम में परिवाद किसके द्वारा पेश किया जा सकता है ? क्या अधिवक्ता के माध्यम से कोई परिवाद पेश किया जा सकता है ? किसी निर्णय का उल्लेख करते हुए समझाइये।

Who can file a complaint before the District Forum? Whether a complaint can be filed through an Advocate? Explain referring to a Judgment.

 

उत्तर- परिवाद कौन पेश कर सकता है? - धारा 12 में परिवाद प्रस्तुत करने की रीति का अर्थात् उन व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है जो जिला फोरम में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके अनुसार निम्न व्यक्तियों द्वारा परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है-

 

1. ऐसे किसी उपभोक्ता द्वारा जिसको माल बेचा गया है या दिया गया है या बेचने या परिदान करने के लिए सहमति दी गई है या जिसको सेवा उपलब्ध कराई गई है या सेवा उपलब्ध कराने हेतु सहमति प्रदान की गई है।

2. ऐसे किसी भी मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संगम द्वारा जिसका ऐसा कोई उपभोक्ता चाहे सदस्य हो या नहीं।

 

3. जहाँ बहुसंख्यक उपभोक्ताओं का समान हित हो, वहाँ जिला फोरम की अनुमति से उनमें से किसी एक या एक से अधिक उपभोक्ताओं द्वारा स्मरणीय है कि यह व्यवस्था उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 द्वारा ही की गई है, पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी,

 

4. केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा।

 

अधिवक्ता द्वारा परिवाद का प्रस्तुतीकरण (Presentation of a Complaint by Advocate) - के० एस० शर्मा ब० मै० कृष्णा ट्रेडर्स, बीकानेर रिवीजन संख्या 9 सन् 1989 राजस्थान आयोग 10.1.1990 में राजस्थान आयोग द्वारा यह निर्धारित किया गया है कि अधिवक्ता अभिभाषक, वकील एवं विधि व्यवसायी उपभोक्ता मंच के समक्ष उपस्थिति दे सकते हैं, पक्षकार की ओर से परिवाद पेश कर सकते हैं एवं उसका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।

 

 

 

 

प्रश्न 20 (अ) राज्य आयोग की संरचना एवं विभिन्न क्षेत्राधिकारों सम्बन्धी प्रावधानों का वर्णन कीजिये क्या राज्य आयोग एक जिला फोरम से दूसरे जिला फोरम में मामलों का अन्तरण कर सकता है ?

Explain the Jurisdictions and Constitution of the State Commission. Can State Commission transfer the cases from one District Forum to another District Forum?

 

उत्तर - राज्य आयोग की सरचना (Composition of the State Commission)- धारा 16 के अनुसार राज्य आयोग में कुल तीन सदस्य होंगे जिनमें से एक अध्यक्ष होगा। अन्य दो सदस्यों में से एक सदस्य महिला होगी।

 

अध्यक्ष (President) - ऐसा व्यक्ति जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है, आयोग के अध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया जा सकता है। ऐसी नियुक्ति के लिए सम्बन्धित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से राय लिया जाना आवश्यक होगा।

 

सदस्य (Member) सदस्य के लिए ऐसा व्यक्ति पात्र होगा, जो-

(i) योग्यता, सत्यनिष्ठा एवं प्रतिष्ठा युक्त हो,

(ii) अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन का पर्याप्त ज्ञान और अनुभव रखता हो, या

(iii) इनसे सम्बन्धित समस्याओं में कार्यवाही की योग्यता/ क्षमता रखता हो।

 

चयन समिति (Selection Committee) - सदस्यों को नियुक्ति एक चयन समिति द्वारा - की जायेगी जिसके निम्नांकित व्यक्ति सदस्य होंगे-

 

(क) राज्य आयोग का अध्यक्ष,

(ख) राज्य के विधि विभाग का सचिव एवं

(ग) राज्य के उपभोक्ता सम्बन्धी मामलों के विभाग का प्रभारी सचिव ।

 

सेवाकाल (Term of Office) आयोग का सदस्य पाँच वर्ष की अवधि या 67 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, इनमें से जो भी पहले हो, पद धारण कर सकेगा। एक बार नियुक्त सदस्य पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा।

 

राज्य आयोग का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction of the State Commission)- धारा 17 में वर्णित राज्य आयोग की अधिकारिता को हम चार भागों में बाँट सकते हैं- 1. आर्थिक अधिकारिता (Pecuniary Jurisdiction ) - आर्थिक अधिकारिता के अन्तर्गत राज्य आयोग ऐसे परिवादों की सुनवाई कर सकता है जिनमें परिवादित माल या सेवाओं अथवा दावाकृत का मूल्य पाँच लाख से बीस लाख रुपयों के बीच हो। उल्लेखनीय है कि सन् 1993 के उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम से पूर्व यह अधिकारिता एक लाख से दस लाख रुपये तक की थी।

 

प्रादेशिक अधिकारिता (Territorial Jurisdiction) - राज्य आयोग की अधिकारिता का विस्तार सम्पूर्ण राज्य पर है अर्थात् सम्पूर्ण राज्य में उत्पन्न मामलों को वह सुनवाई कर सकता है।

 

अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction) - अपीलीय अधिकारिता के अन्तर्गत राज्य आयोग राज्य के किसी भी जिला फोरम के आदेशों के विरुद्ध अपीलों को सुनवाई कर सकता है।

 

पुनरीक्षण अधिकारिता (Revisional Jurisdiction) राज्य आयोग को पुनरीक्षण की शक्तियाँ भी प्रदान की गई हैं। जहाँ राज्य आयोग को यह प्रतीत हो कि -

 

(i) जिला फोरम ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो उसमें निहित नहीं है, या

(ii) जिला फोरम ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है जो उसमें निहित है,

या

(iii) जिला फोरम ने अपनी अधिकारिता का प्रयोग अवैध रूप से या तात्विक अनियमितता (Material Irregularity) से किया है,

वहाँ आयोग ऐसे अभिलेखों को अपने पास मंगवा सकेगा और उनमें समुचित आदेश पारित कर सकेगा।

 

मामलों के अन्तरण की शक्ति (Power of Transfering Cases) राज्य आयोग को - एक जिला फोरम से दूसरे जिला फोरम में मामलों का अन्तरण करने का अधिकार नहीं है : अध्यक्ष, चित्तौड़गढ़ जिला उपभोक्ता संरक्षण समिति व जिला फोरम, चित्तौड़गढ़, 1993 R.L.T. 158

 

 

 

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