शिकायतकर्त्ता (Complainant) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
- शिकायतकर्ता (Complainant)- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1993 की संशोधित धारा
2(1)(b) के अन्तर्गत निम्नलिखित में से कोई भी व्यक्ति जो शिकायत प्रस्तुत करता है,
वह शिकायतकर्त्ता कहा जाता है- (i) एक उपभोक्ता, अथवा (ii) कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत
पंजीकृत कोई भी स्वयं सेवी उपभोक्ता संघ, अथवा (iii) देश में प्रचलित किसी भी अन्य
कानून के अन्तर्गत पंजीकृत स्वयंसेवी उपभोक्ता संघ, अथवा (iv) शिकायत पेश करने वाली
केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार, अथवा (v) समान प्रकार का हित रखने वाले उपभोक्ताओं की
दशा में उनकी ओर से कोई एक या अधिक उपभोक्ता
उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर
- उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं- (i) "जिला
पीठ" (District Forum) के नाम से ज्ञात एक उपभोक्ता विवाद प्रतितोष पीठ इसकी स्थापना
राज्य सरकार के द्वारा प्रत्येक जिले में अधिसूचना के द्वारा की जायेगी। राज्य सरकारें
किसी जिले में एक से अधिक पीठों की स्थापना भी कर सकती है। (ii) "राज्य आयोग"
(State Commission) के नाम से ज्ञात एक उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग इसकी स्थापना
भी राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा की जायेगी। (iii) राष्ट्रीय आयोग (National
Commission)- केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा एक राष्ट्रीय उपभोक्ता प्रतितोष
आयोग की स्थापना की जायेगी। इस प्रकार, जिला पीठें राज्य आयोग, राष्ट्रीय आयोग के रूप
में तीन प्रतितोष पीठों की स्थापना की गई है।
जिला फोरम की संरचना (Constitution) बताइये।
उत्तर-
जिला पीठ की संरचना (Constitution of District Forum) – उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,
1986 की धारा 10 के अनुसार, प्रत्येक जिला फोरम का गठन निम्न प्रकार होगा - (क) ऐसा
एक व्यक्ति जो जिला न्यायाधीश हो या रह चुका हो या होने के योग्यता रखता हो राज्य सरकार
द्वारा मनोनीत किया जायेगा जो उसका अध्यक्ष होगा (ख) दो अन्य व्यक्ति ( सदस्य ) जो
शिक्षा, व्यापार या वार्णिज्य के क्षेत्र में प्रख्यात हों जिनमें से एक महिला होगी।
राज्य सरकारें इन नियुक्तियों को एक चयन समिति की अनुशंसा पर करेगी जिसमें निम्नलिखित
सदस्य होंगे- (i) राज्य आयोग का अध्यक्ष जो चेयरमैन होगा। (ii) राज्य के विधि विभाग
का सचिव। (iii) राज्य के उपभोक्ता मामलों के विभाग का प्रभारी सचिव |
जिला
फोरम के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का या पैंसठ वर्ष की आयु पूरी होने तक जो पूर्व
स्तर हो, होगा और नये संशोधन के अनुसार, जबकि संशोधन से पूर्व वे पुनः नियुक्ति के
पात्र नहीं थे, वे पुनः नियुक्ति के पात्र होंगे कोई भी सदस्य राज्य सरकार को लिखित
रूप में त्यागपत्र दे सकता है और राज्य सरकार उसका त्यागपत्र स्वीकृत करने के बाद रिक्त
पद उसी प्रवतर्ग से सम्बन्धित व्यक्त्यिों में से भी कर सकती है। राज्य सरकार सदस्यों
के वेतन या मानदेय और अन्य भत्तों और उनकी सेवा के निबन्धन एवं शर्तों के सम्बन्ध में
नियमावली बनायेगी। 1993 के संशोधन द्वारा बढ़ायी गई धारा 29 ( क ) अब यह प्रावधान करती
है कि जिला फोरम राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग या कोई कार्य या कार्यवाही मात्र उसके
सदस्यों में से किसी की रिक्ति या उसकी संरचना में किसी कमी के कारण अमान्य नहीं होगी।
जिला फोरम के निर्णय से अपील कहाँ और कितने दिन की अवधि के भीतर की जा सकती है?
उत्तर-
जिला फोरम के निर्णय से अपील (धारा 5) - जिला पीठ द्वारा किये गये किसी आदेश से व्यथित
कोई व्यक्ति आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर ऐसे प्रारूप में और ऐसी रीति
से जो विहित की जाये, उस आदेश के विरूद्ध राज्य आयोग को अपील कर सकेगा। परन्तु राज्य
आयोग, तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि यह समाधान
हो जाता है कि उस अवधि के भीतर फाइल न करने का पर्याप्त कारण था ।
राज्य आयोग कब जिला फोरम अपील किये जाने की निर्धारित अवधि के बाद भी अपील स्वीकार
कर सकता है?
उत्तर-
जिला फोरम द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित कोई पक्षकार ऐसे व्यक्ति ऐसे आदेश के विरूद्ध
राज्य आयोग को अपील कर सकता है। इस प्रयोजन के लिये आदेश की तिथि से 30 दिन का समय
स्वीकृत है इस अधिनियम के अन्तर्गत बनाई गयी नियमावली में अपील के प्रारूप और रीति
का उपबन्ध किया गया है। राज्य आयोग को 30 दिन का समय बीत जाने के बाद भी अपील ग्रहण
करने के लिये सशक्त किया गया है यदि वह सन्तुष्ट हो कि निर्धारित समय के अन्दर अपील
न दाखिल कर पाने का पर्याप्त कारण था।
राष्ट्रीय आयोग के गठन को बताइये।
उत्तर-
राष्ट्रीय आयोग का गठन (Composition of National Commission)- धारा 20(1) के अनुसार,
राष्ट्रीय आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-
धारा
20(1) (क) एक ऐसा व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है, जिसे
केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जायेगा और जो उसका अध्यक्ष होगा। परन्तु इस खण्ड
के अन्तर्गत कोई नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बगैर नहीं की जायेगी।
धारा 20 (1) (ख) चार अन्य सदस्य जो योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति
होंगे और जिनको अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन
का पर्याप्त ज्ञान या अनुभव होगा या उससे सम्बन्धित समस्याओं के सम्बन्ध में कार्यवाही
करने की योग्यता हो और उनमें से एक महिला होगी। परन्तु शर्त यह है कि इस खण्ड के अन्तर्गत
प्रत्येक रिसीवर केन्द्रीय सरकार द्वारा निम्नलिखित सदस्यों वाली चयन समिति की अनुशंसा
पर की जायेगी - (क) भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित कोई व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय
का न्यायाधीश हो (ख) भारत सरकार के विधायी कार्य विभाग का सचिव (ग) भारत सरकार में,
उपभोक्ता कार्यों का निष्पादन करने वाले विभाग का सचिव |
राष्ट्रीय आयोग की पुनर्विलोकन और पर्यवेक्षण सम्बन्धी शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीय आयोग की पुनर्विलोकन और पर्यवेक्षण की शक्तियाँ (Powers of Review &
Supervision of National Commission ) - जब कभी राष्ट्रीय आयोग को यह प्रतीत हो कि
राज्य आयोग ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो विधि द्वारा उसमें निहित नहीं है,
या ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है जो विधि द्वारा उसमें निहित हैं या
उसने अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने में अवैध रूप से या सारवान नियमितता के साथ कार्य
किया है वहाँ राष्ट्रीय आयोग की पर्यवेक्षात्मक अधिकारिता किसी ऐसे उपभोक्ता विवाद
के अभिलेख को मंगवाने और उसमें उचित आदेश करने की शक्ति को कहते हैं जो किसी राज्य
आयोग के समक्ष लम्बित है या उसका निश्चय कर दिया गया हो।
राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील कहाँ दायर की जा सकती है?
उत्तर-अपील-
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 23 में यह अधिकार है कि कोई भी पीड़ित पक्षकार राष्ट्रीय
आयोग के आदेश के विरूद्ध तीस दिनों में या उच्चतम न्यायालय द्वारा बढ़ायी गई अवधि में
उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है किन्तु नियम 14(5) के अनुसार, यदि निर्धारित अवधि
में उस आदेश के विरूद्ध अपील नहीं की जाती है अथवा उच्च न्यायालय द्वारा आयोग के आदेशका
अनुमोदन कर दिया जाता है तो राष्ट्रीय आयोग उस आदेश को राजकीय गजट में या अन्य किसी
माध्यम से प्रकाशित करने का आदेशदे सकता है। ऐसी स्थिति में, उस आदेश के प्रकाशन करने
का आदेश दे सकता है। ऐसी स्थिति में, उस आदेश के प्रकाशन के विरूद्ध किसी भी माध्यम
या राष्ट्रीय आयोग के विरूद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती।
किस वर्ष उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया गया और इसमें कितनी धारायें है?
उत्तर- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सन् 1986 में संसद द्वारा 24 दिसम्बर को पारित किया गया था। यह 2002 के संशोधन के पश्चात् 1986 का 68 वाँ अधिनियम है तथा इसमें 31 धारायें हैं।
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