गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?

 डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?

 

उत्तर- डा० अन्डरहिल के अनुसार, “अपकृत्य एक ऐसा कार्य या कार्यलोप है जो कानून द्वारा अनाधिकृत तथा संविदा से स्वतन्त्र है तथा जिसके द्वारा या तो किसी व्यक्ति के - (i) पूर्ण अधिकार (Absolute Right) का उल्लंघन होता है, या (ii) सीमित अधिकार (Qualified Right) का उल्लंघन होता है, जिससे हानि होती है, या (iii) लोक अधिकार (Public Right) का उल्लंघन होता है जिससे उसे सामान्य जनता की अपेक्षा अधिक सारवान (Substantial) तथा विशेष हानि होती है तथा जिसके फलस्वरूप वह क्षतिकर्ता के विरूद्ध क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिये मुकदमा चलाने का अधिकारी हो जाता है।

विद्वेषपूर्ण गिरफ्तारी (Malicious Arrest) से आप क्या समझते हैं?

 विद्वेषपूर्ण गिरफ्तारी (Malicious Arrest ) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- विद्वेषपूर्ण गिरफ्तारी (Malicious Arrest ) - इसमें किसी दीवानी विधि के अंतर्गत किसी व्यक्ति को द्वेषपूर्ण से प्रेरित होकर बिना किसी समुचित आधार पर जानबूझकर गिरफ्तार करवाने की कोशिश की जाती है। लेकिन ऐसी कार्यवाही से जब तक किसी व्यक्ति की वास्तव में स्वतन्त्रता को अवरोध न पहुँचे तब तक उसके विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। विद्वेषपूर्ण गिरफ्तारी में यह आवश्यक है कि प्रतिवादी ने दुर्भावना से प्रेरित होकर न्यायालय के माध्यम से गिरफ्तारी करवायी है।

टेलीफोन डाइरेक्ट्री प्रकाशित न करना क्या कमी की परिभाषा में आयेगा?

टेलीफोन डाइरेक्ट्री प्रकाशित न करना क्या कमी की परिभाषा में आयेगा?

 

उत्तर- नहीं? इस सम्बन्ध में टेलीकाम डिस्ट्रिक्ट मैनेजर बनाम् देवराज एण्ड संस (1994)। C.P.J.23 N. C. राष्ट्रीय आयोग ने निर्धारित किया है कि इस कथन पर ध्यान नहीं दिया जा सकता कि टेलीफोन विभाग टेलीफोन निर्देशिका वार्षिक रूप से प्रकाशित करने के लिये बाध्य है। भारतीय तार नियमावली, 1951 का नियम 452 जिसका दृष्टांन्त प्रतिविरोध के समर्थन में दिया गया था, के बारे में आयोग ने यह पाया कि वह केवल यह अभिकथित करता था कि टेलीफोन निर्देशिका की एक प्रति प्रत्येक टेलीफोन विस्तार या अभिदाता को निःशुल्क उपलब्ध करायी जायेगी। नियम किसी ऐसे अंतराल के बारे में अभिकचन नहीं करता जिसके बीत जाने के बाद नई निर्देशिका प्रकाशित और वितरित की जायेगी।

वक्रोक्ति (Innuendo) से आप क्या समझते हैं?

 वक्रोक्ति (Innuendo) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- सामण्ड के अनुसार, कथन दो प्रकार के होते हैं- (i) प्रथम दृष्टया मानहानिजनक (Defamatory) तथा (ii) प्रथम दृष्टया निर्दोष (Innocent) पहले प्रकार के कथन मानहानिजनक होते है तथा स्वतः अभियोज्य होते हैं जब तक कि वह कथन किसी अपवाद की श्रेणी में ही न आ जाये। इसके विपरीत, दूसरे प्रकार के कथन प्रथम दृष्टया निर्दोष मालूम होते हैं किन्तु उनका अर्थ परिस्थितियों के सन्दर्भ में मानहानिजनक बन जाता है। ऐसे कचन को 'वक्रोक्ति या व्यंगात्मक कथन ( Innuendo) कहा जाता है, जैसे 'अ', 'ब' के बारे में 'स' कहता है कि 'ब' वैसा ही है जैसा उसका पिता यदि पिता चोर हो तो इन शब्दों का अर्थ यह होगा कि 'ब' भी चोर है। यदि 'ब' सिद्ध चोर नहीं है यह कथन मानहानिजनक होगा, भले ही ऊपर से देखने में कथन निर्दोष मालूम होता है। इसी प्रकार, जहाँ 'अ' 'ब' के बारे में यह कथन करता है कि 'ब' एक साधु है और यदि उसका संकेत यह है कि 'ब' साधुओं के एक ऐसे ग्रुप का सदस्य है जो तश्करी करते है तो कथन निर्दोष होते हुये भी मानहानिजनक होगा।

शिकायतकर्त्ता , उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण, जिला फोरम की संरचना, राष्ट्रीय आयोग का गठन

 शिकायतकर्त्ता (Complainant) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर - शिकायतकर्ता (Complainant)- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1993 की संशोधित धारा 2(1)(b) के अन्तर्गत निम्नलिखित में से कोई भी व्यक्ति जो शिकायत प्रस्तुत करता है, वह शिकायतकर्त्ता कहा जाता है- (i) एक उपभोक्ता, अथवा (ii) कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत पंजीकृत कोई भी स्वयं सेवी उपभोक्ता संघ, अथवा (iii) देश में प्रचलित किसी भी अन्य कानून के अन्तर्गत पंजीकृत स्वयंसेवी उपभोक्ता संघ, अथवा (iv) शिकायत पेश करने वाली केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार, अथवा (v) समान प्रकार का हित रखने वाले उपभोक्ताओं की दशा में उनकी ओर से कोई एक या अधिक उपभोक्ता

 

उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण कितने प्रकार के होते हैं?

 

उत्तर - उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं- (i) "जिला पीठ" (District Forum) के नाम से ज्ञात एक उपभोक्ता विवाद प्रतितोष पीठ इसकी स्थापना राज्य सरकार के द्वारा प्रत्येक जिले में अधिसूचना के द्वारा की जायेगी। राज्य सरकारें किसी जिले में एक से अधिक पीठों की स्थापना भी कर सकती है। (ii) "राज्य आयोग" (State Commission) के नाम से ज्ञात एक उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग इसकी स्थापना भी राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा की जायेगी। (iii) राष्ट्रीय आयोग (National Commission)- केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा एक राष्ट्रीय उपभोक्ता प्रतितोष आयोग की स्थापना की जायेगी। इस प्रकार, जिला पीठें राज्य आयोग, राष्ट्रीय आयोग के रूप में तीन प्रतितोष पीठों की स्थापना की गई है।

 

जिला फोरम की संरचना (Constitution) बताइये।

 

उत्तर- जिला पीठ की संरचना (Constitution of District Forum) – उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 10 के अनुसार, प्रत्येक जिला फोरम का गठन निम्न प्रकार होगा - (क) ऐसा एक व्यक्ति जो जिला न्यायाधीश हो या रह चुका हो या होने के योग्यता रखता हो राज्य सरकार द्वारा मनोनीत किया जायेगा जो उसका अध्यक्ष होगा (ख) दो अन्य व्यक्ति ( सदस्य ) जो शिक्षा, व्यापार या वार्णिज्य के क्षेत्र में प्रख्यात हों जिनमें से एक महिला होगी। राज्य सरकारें इन नियुक्तियों को एक चयन समिति की अनुशंसा पर करेगी जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे- (i) राज्य आयोग का अध्यक्ष जो चेयरमैन होगा। (ii) राज्य के विधि विभाग का सचिव। (iii) राज्य के उपभोक्ता मामलों के विभाग का प्रभारी सचिव |

 

जिला फोरम के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का या पैंसठ वर्ष की आयु पूरी होने तक जो पूर्व स्तर हो, होगा और नये संशोधन के अनुसार, जबकि संशोधन से पूर्व वे पुनः नियुक्ति के पात्र नहीं थे, वे पुनः नियुक्ति के पात्र होंगे कोई भी सदस्य राज्य सरकार को लिखित रूप में त्यागपत्र दे सकता है और राज्य सरकार उसका त्यागपत्र स्वीकृत करने के बाद रिक्त पद उसी प्रवतर्ग से सम्बन्धित व्यक्त्यिों में से भी कर सकती है। राज्य सरकार सदस्यों के वेतन या मानदेय और अन्य भत्तों और उनकी सेवा के निबन्धन एवं शर्तों के सम्बन्ध में नियमावली बनायेगी। 1993 के संशोधन द्वारा बढ़ायी गई धारा 29 ( क ) अब यह प्रावधान करती है कि जिला फोरम राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग या कोई कार्य या कार्यवाही मात्र उसके सदस्यों में से किसी की रिक्ति या उसकी संरचना में किसी कमी के कारण अमान्य नहीं होगी।

 

जिला फोरम के निर्णय से अपील कहाँ और कितने दिन की अवधि के भीतर की जा सकती है?

उत्तर- जिला फोरम के निर्णय से अपील (धारा 5) - जिला पीठ द्वारा किये गये किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर ऐसे प्रारूप में और ऐसी रीति से जो विहित की जाये, उस आदेश के विरूद्ध राज्य आयोग को अपील कर सकेगा। परन्तु राज्य आयोग, तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर फाइल न करने का पर्याप्त कारण था ।

 

राज्य आयोग कब जिला फोरम अपील किये जाने की निर्धारित अवधि के बाद भी अपील स्वीकार कर सकता है?

 

उत्तर- जिला फोरम द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित कोई पक्षकार ऐसे व्यक्ति ऐसे आदेश के विरूद्ध राज्य आयोग को अपील कर सकता है। इस प्रयोजन के लिये आदेश की तिथि से 30 दिन का समय स्वीकृत है इस अधिनियम के अन्तर्गत बनाई गयी नियमावली में अपील के प्रारूप और रीति का उपबन्ध किया गया है। राज्य आयोग को 30 दिन का समय बीत जाने के बाद भी अपील ग्रहण करने के लिये सशक्त किया गया है यदि वह सन्तुष्ट हो कि निर्धारित समय के अन्दर अपील न दाखिल कर पाने का पर्याप्त कारण था।

 

राष्ट्रीय आयोग के गठन को बताइये।

 

उत्तर- राष्ट्रीय आयोग का गठन (Composition of National Commission)- धारा 20(1) के अनुसार, राष्ट्रीय आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

 

धारा 20(1) (क) एक ऐसा व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जायेगा और जो उसका अध्यक्ष होगा। परन्तु इस खण्ड के अन्तर्गत कोई नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बगैर नहीं की जायेगी। धारा 20 (1) (ख) चार अन्य सदस्य जो योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति होंगे और जिनको अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन का पर्याप्त ज्ञान या अनुभव होगा या उससे सम्बन्धित समस्याओं के सम्बन्ध में कार्यवाही करने की योग्यता हो और उनमें से एक महिला होगी। परन्तु शर्त यह है कि इस खण्ड के अन्तर्गत प्रत्येक रिसीवर केन्द्रीय सरकार द्वारा निम्नलिखित सदस्यों वाली चयन समिति की अनुशंसा पर की जायेगी - (क) भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित कोई व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश हो (ख) भारत सरकार के विधायी कार्य विभाग का सचिव (ग) भारत सरकार में, उपभोक्ता कार्यों का निष्पादन करने वाले विभाग का सचिव |

 

राष्ट्रीय आयोग की पुनर्विलोकन और पर्यवेक्षण सम्बन्धी शक्तियों का वर्णन कीजिए।

 

उत्तर- राष्ट्रीय आयोग की पुनर्विलोकन और पर्यवेक्षण की शक्तियाँ (Powers of Review & Supervision of National Commission ) - जब कभी राष्ट्रीय आयोग को यह प्रतीत हो कि राज्य आयोग ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो विधि द्वारा उसमें निहित नहीं है, या ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है जो विधि द्वारा उसमें निहित हैं या उसने अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने में अवैध रूप से या सारवान नियमितता के साथ कार्य किया है वहाँ राष्ट्रीय आयोग की पर्यवेक्षात्मक अधिकारिता किसी ऐसे उपभोक्ता विवाद के अभिलेख को मंगवाने और उसमें उचित आदेश करने की शक्ति को कहते हैं जो किसी राज्य आयोग के समक्ष लम्बित है या उसका निश्चय कर दिया गया हो।

 

राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील कहाँ दायर की जा सकती है?

 

उत्तर-अपील- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 23 में यह अधिकार है कि कोई भी पीड़ित पक्षकार राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरूद्ध तीस दिनों में या उच्चतम न्यायालय द्वारा बढ़ायी गई अवधि में उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है किन्तु नियम 14(5) के अनुसार, यदि निर्धारित अवधि में उस आदेश के विरूद्ध अपील नहीं की जाती है अथवा उच्च न्यायालय द्वारा आयोग के आदेशका अनुमोदन कर दिया जाता है तो राष्ट्रीय आयोग उस आदेश को राजकीय गजट में या अन्य किसी माध्यम से प्रकाशित करने का आदेशदे सकता है। ऐसी स्थिति में, उस आदेश के प्रकाशन करने का आदेश दे सकता है। ऐसी स्थिति में, उस आदेश के प्रकाशन के विरूद्ध किसी भी माध्यम या राष्ट्रीय आयोग के विरूद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती।

 

किस वर्ष उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया गया और इसमें कितनी धारायें है?

 

उत्तर- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सन् 1986 में संसद द्वारा 24 दिसम्बर को पारित किया गया था। यह 2002 के संशोधन के पश्चात् 1986 का 68 वाँ अधिनियम है तथा इसमें 31 धारायें हैं।

व्यक्ति की मृत्यु के साथ उसका मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है

व्यक्ति की मृत्यु के साथ उसका मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है। 


उत्तर- व्यक्ति की मृत्यु के साथ मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है। (Actio Personalis Moritur Cum Persona ) -- "सामान्य विधि" के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति या उसकी सम्पत्ति को कोई एक ऐसी हानि पहुँचाई गई है जिसके लिये वह क्षतिपूर्ति की माँग का अधिकारी है तो ऐसी हानि के लिये दावा करने का अधिकार उस व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है जिसने हानि पहुँचाई है या जिसको हानि पहुँची हो दूसरे शब्दों में, व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही उसका मुकदमा चलाने का अधिकार भी समाप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ-यदि 'अ' ने 'ब' के साथ मारपीट की है तो 'व' को 'अ' के खिलाफ क्षतिपूर्ति की कार्यवाही 'ब' के जीवनकाल में ही लानी चाहिये। यदि क्षतिपूर्ति की कार्यवाही के दौरान 'अ' या 'ब' अर्थात् वादी या प्रतिवादी की मृत्यु हो जाती है तो कार्यवाही भी समाप्त हो जायेगी। किन्तु यह नियम अत्यन्त ही अन्यायपूर्ण (Unjust ) था अतः न्यायालय द्वारा इसके निम्नलिखित अपवाद स्वीकार किये गये।

जानबूझकर आपत्ति लेना

 "जानबूझकर आपत्ति लेना" (Volenti non fit injuria) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- " जानबूझकर आपत्ति लेना” (Volenti non fit injuria) - "जान-बूझकर आपत्ति लेना" या "सम्मत कार्य से दुष्कृति नहीं होती" नामक सूत्र का अर्थ है कि जहाँ व्यक्ति स्वेच्छा से हानि उठाता है, वहाँ कानूनी क्षति नहीं होती सामण्ड के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने स्वेच्छा से अपने अधिकार को त्याग दिया है तो वह फिर उस अधिकार का लाभ नहीं उठा सकता । अपकृत्य के बचाव का यह महत्वपूर्ण सूत्र है। उदाहरणार्थ- यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को अपने घर पर आने के लिये आमन्त्रित करता है या उसे सावधानी से अपने शरीर पर ऑपरेशन करने की अनुमति देता है तो वह बाद में उन कार्यों के लिये उस व्यक्ति के खिलाफ अतिचार या मारपीट का दावा नहीं कर सकता।

घटना स्वयं बोलती है

 घटना स्वयं बोलती है (Res Ipsa Loquitor) से आपका क्या आशय है?

 

उत्तर- घटना स्वयं बोलती है (Res Ipsa Loquitor) सामान्यतः असावधानी को सिद्ध करने का भार वादी पर होता है। लेकिन कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनमें वादी दुर्घटना तो सिद्ध कर सकता है, किन्तु यह सिद्ध नहीं कर सकता है कि घटना किस प्रकार घटी। इसका ज्ञान तो केवल प्रतिवादी को ही हो सकता है, जो दुर्घटना के लिये जिम्मेदार है। ऐसी अवस्था में दादी को न्यायालय के सामने केवल उन्हीं तथ्यों को देना पर्याप्त है, जिनमें घटना घटी हैं शेष तथ्यों की उपधारणा कानून स्वयं करेगा। इसे 'घटना स्वयं बोलती है' का नियम कहते हैं। इस नियम को लागू करने हेतु दो शर्तों का होना आवश्यक है- (i) हानि पहुँचाने वाली वस्तु प्रतिवादी या उसके सेवकों के नियन्त्रण में होनी चाहिये तथा (ii) पटना ऐसी हो जो बिना असावधानी के न घट सकती हो ।

क्यू फेसिट पर ऐलियम परसी

 क्यू फेसिट पर ऐलियम परसी (Qui facit per alium perse) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- क्यू फेसिट पर ऐलियम परसी (Qui facit per alium perse) इससूत्र का तात्पर्य यह है कि, "जो दूसरे व्यक्ति के माध्यम से कार्य कराता है वह कानून की दृष्टि में खुद ही कर्त्ता समझा जाता है।" एक स्वामी अपने नौकर द्वारा किये गये अपकृत्यों के लिये इसी सिद्धान्त के आधार पर उत्तरदायी ठहराया जाता है। इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति अपना कार्य अन्य व्यक्ति से कराताहै, वह दूसरे व्यक्ति का यह स्वतन्त्रता देता है कि वह परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेकर कार्य करे। फलस्वरूप, ऐसे व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य के लिये कार्य कराने वाला ही उत्तरदायी होता है।

अनैतिक कार्य से कोई कार्यवाही उत्पन्न नहीं होती

अनैतिक कार्य से कोई कार्यवाही उत्पन्न नहीं होती (Ex Turpi Causa non Oritur Actio) से आप क्या समझते हैं?

 

उत्तर- अनैतिक कार्य से कोई कार्यवाही उत्पन्न नहीं होती (Ex Turpi Causa non Oritur Action) – यह एक लेटिन सूत्र है अर्थात् कोई कार्य चाहे कितना भी बुरा या अनैतिक क्यों न हो यदि उससे किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं होता तो उसके लिये दावा दायर नहीं किया जा सकता। उदाहरणार्थ - (1) यदि एक चोर किसी मकान में चोरी करने के लये कूदते समय भूमि पर पढ़े हुए कांटेदार तारों में उलझकर घायल हो जाता है तो वह मकान मालिक के खिलाफ क्षतिपूर्ति का दावा दायर नहीं कर सकता, क्योंकि चोर कानूनों न होकर एक अनैतिक कार्य है। (ii) हीग बनाम शाइन, 1878 में एक महिला जो अपने मित्र के साथ सम्भोग किया करती थी, को पेशाब की बीमारी लग गई। उसके मित्र ने उससे इस बीमारी को छिपा रखा था। महिला ने क्षतिपूर्ति के लिये वाद दायर किया | निर्णय हुआ कि अनैतिक कार्य से कार्यवाही का आधार उत्पन्न नहीं होता। अतः महिला क्षतिपूर्ति की हकदार नहीं है। 

डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?

  डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?   उत्तर- डा० अन्डरहिल के अनुसार, “अपकृत्य एक ऐसा कार्य या कार्यलोप है जो कानून...