रविवार, 25 जून 2023

भारतीय तार अधिनियम, 1885 (The Indian Telegraph Act, 1885)

भारतीय तार अधिनियम, 1885 
(The Indian Telegraph Act, 1885)

(अधिनियम सं० 13 सन् 1885) (22 जुलाई, 1885)

भाग एक : प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, स्थानीय विस्तार और प्रारम्भ - (1) यह अधिनियम भार अधिनियम, 1885 कहा जा सकेगा। (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है । (3) यह अक्टूबर, 1885 के प्रथम दिन से प्रवृत्त होगा ।

2. निरसित ।

3. परिभाषाएँ – इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या सन्दर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो—

[(i)] “निधि” धारा 9-क की उपधारा (2) के अधीन स्थापित की गयी सर्वव्यापी सेवा बाध्यता से अभिप्रेत है । 

[(1) क क] "तार” से संकेतों, सिग्नलों, लिखतों, बिम्बो, ध्वनियों या किसी प्रकार की अधिसूचना, तार, दृश्य या अन्य विद्युत चुम्बकीय लोपों, रेडियो तरंगों या हर्टजियन तरंगों, रासायनिक विद्युत चुम्बकीय या विद्युत साधन द्वारा पारेषण या प्राप्त करने के लिए प्रयोग को समर्थ या प्रयुक्त कोई साधित्र, उपकरण, सामग्री या यन्त्र अभिप्रेत है ।

स्पष्टीकरण - "रेडियो तरंगों " या "हर्टडियन तरंगों" से 300 गाईना साइकिल्स प्रति सेकेण्ड से कम आवृत्तियों की कृत्रिम मार्गदर्शन के अन्तरिक्ष में प्रचारित विद्युत चुम्बकीय किरणें अभिप्रेत है।

(2) “तार अधिकारी” से केन्द्रीय सरकार या इस अधिनियम द्वारा अनुज्ञप्ति किसी व्यक्ति द्वारा संस्थापित, अनुरक्षित या कार्यकारित तार के संबंध में नियोजित कोई व्यक्ति, चाहे स्थाई या अस्थाई अभिप्रेत है । 

(3) “संदेश” से तार भेजा गया या तार अधिकारी को तार द्वारा भेजे जाने को या परिदान को दिया गया कोई पत्रादि अभिप्रेत है ।

(4) "तार लाइन" से तार के प्रयोजन के लिए तार या तारें, उसमें जुड़ी हुई केसिंग, विलेपित ट्यूब और पाइप साधित्र या यन्त्र अभिप्रेत है 

(5) " खम्भा" से कोई तार लाइन के आलम्बन या कुछ काल तक रोके रखने के लिए कोई खम्भा, पोल, स्टैन्डर्ड स्टे, थूनी या भूमि ऊपर कोई प्रयुक्ति अभिप्रेत है । 

(6) "तार प्राधिकारी” से डाक और तार के महानिदेशक अभिप्रेत है और उसमें अधिनियम के अधीन तार प्राधिकारी के किसी या सभी कृत्यों को सम्पन्न करने को, उसके द्वारा सशक्त, कोई अधिकारी भी सम्मिलित हैं। 

भाग दो : सरकार की शक्तियाँ और विशेषाधिकार

4. तारों के संबंध में अनन्य विशेषाधिकार और अनुज्ञप्तियों मन्जूर करने की शक्ति- 

(1) भारत के भीतर,तारों के स्थान, अनुरक्षण और कार्यकरण का विशेषाधिकार होगा परन्तु केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के अधीन बनाये गये और शासकीय राजपत्र में बनाये गये नियमों द्वारा, ऐसे निर्बन्धनों और शर्तों के अध्यधीन जैसी वह उचित समझे-

(क) राज्यक्षेत्रीय समुद्र के भीतर पोतों पर या भारत के भीतर या ऊपर वायुयान पर या भारतीय राज्यक्षेत्रीय समुद्र पर वायुयानों पर बेतार तार, और

(ख) बेतार तारों के अतिरिक्त, भारत के किसी भाग में तारों का स्थापन, अनुकरण और कार्यकरण करना अनुज्ञात कर सकेगी।

(2) केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उपधारा (1) के प्रथम परन्तुक के अधीन कोई या सभी शक्तियाँ तार प्राधिकारी को प्रत्यायोजित कर सकेगी। 

तार प्राधिकारी द्वारा इस प्रकार प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग ऐसे निर्बन्धनों और शर्तों के अधीन होगा, जैसा केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा अधिरोपित करना उचित समझे । 

(1-क) “सर्वव्यापी सेवा बाध्यता" दिया जा सकने योग्य एवं युक्तियुक्त मूल्य के ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में लोगों की आधारभूत टेलीग्राफ सेवाओं तक पहुँच मार्ग का उपबन्ध करने की बाध्यता से अभिप्रेत है ।)

1. (स्पष्टीकरण - इस उपधारा के अधीन एक लाइसेंस की मंजूरी के लिए किये गये संदाय के अन्तर्गत सर्वव्यापी सेवा बाध्यता के फलस्वरूप ऐसी रकम आयेगी जिसका अवधारण टेलीकाम एथारिटी आफ इण्डिया एक्ट 1997 (24 आफ 1997) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित किये गये टेलीकाम एथारिटी आफ इण्डिया द्वारा इस निमित्त की गयी सिफारिश पर विचार करने के पश्चात केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जा सके ।)

5. अनुज्ञप्ति तारों का कब्जा लेने और संदेशों को अन्तर्रूद्ध करने की सरकार की शक्ति लोक सुरक्षा के हित में या लोक आपात् की घटना होने पर केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से प्राधिकृत अन्य अधिकारी, यदि वह समाधान हो जाये कि वैसा करना समीचीन और आवश्यक है, इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञापित किसी व्यक्ति द्वारा स्थापित, अनुरक्षित या कार्यकारित किसी तार का अस्थाई कब्जा (तब तक के लिए जब तक कि लोक आपात् विद्यमान रहता है या लोक सुरक्षा के हित में ऐसी कार्यवाही किया जाना अपेक्षित हो) ले सकेगा । 

(2) लोक सुरक्षा के हित में लोक आपात् की घटना होने पर केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा इस निमित विशेष रूप से प्राधिकृत अन्य अधिकारी यदि उसे समाधान हो जाये कि वैसा करना भारत की प्रभुता और अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों की मैत्रीपूर्ण संबंधों और लोक व्यवस्था के हित में या किसी अपराध के कारित के उद्दीपन को निवारित करने के लिए, लिखित में अभिलिखित कारणों के लिए, आदेश द्वारा पारेषण के लिए लाया गया या पारेषित या प्राप्त किया गया कोई सन्देश या सन्देशों का वर्ग पारेषित नहीं किया जायेगा या अन्तर्रुद्ध या निरुद्ध किया जायेगा अथवा आदेश बनाने वाली सरकार या आदेश में वर्णित उसके किसी अधिकारी को प्रकट किया जायेगा ।

परन्तु केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को प्रत्यायित संवाददाता का, प्रकाशन को आशयित, प्रेस सन्देश अन्तर्रुद्ध या निरुद्ध नहीं किया जायेगा जब तक कि उनका पारेषण इस उपधारा के अधीन प्रतिषिद्ध किया गया हो ।

6. रेलवे कम्पनियों की भूमि पर तारों के स्थापन की शक्ति- 
कोई रेलवे कम्पनी केन्द्रीय सरकार द्वारा वैसा करने के लिए अपेक्षा किया जाने पर सरकार को कम्पनी के भूमि के किसी भाग पर तार स्थापित और अनुरक्षित करना अनुज्ञात करेगी और उसे कार्य करने की प्रत्येक युक्तियुक्त सुविधा देगी।

6. (क) भारत से बाहर के देशों को संदेशों के पारेषण के लिए दरों को अधिसूचित करने की शक्ति–
केन्द्रीय सरकार समय-समय पर आदेश द्वारा दरें जिन पर अन्य शर्तें और निर्बन्धन जिनके अध्यधीन, सन्देश भारत से बाहर किसी देश को सन्देश पारेषित किये जाये अधिसूचित करेगी।

(2) उपधारा (1) में दरें अधिसूचित करते समय केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित तथ्यों में से किसी या सभी का सम्यक ध्यान रखेगी, अर्थात् 

(क) भारत से बाहर के देशों में सन्देशों के पारेषण के लिए तत्समय प्रवृत्ति दरें;

(ख) तत्समय प्रवृत्त विदेशी मुद्रा की दरें;

(ग) भारत के भीतर सन्देशों के पारेषण के लिए तत्समय प्रवृत्त दरें;

(घ) ऐसे अन्य संगी तथ्य जैसे केन्द्रीय सरकार मामले की परिस्थितियों में उचित समझा।

7. तारों के संचालन के नियम बनाने की शक्ति-

(1) केन्द्रीय सरकार समय-समय पर शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, सरकार या इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञपित व्यक्तियों द्वारा स्थापित, अनुरक्षित और कार्यकारित किसी भी तारों के संचालन के लिए इस अधिनियम से संगत नियम बना सकेगी।

(2) इस धारा के अधीन नियम, निम्नलिखित में से किसी या सभी विषयों और अन्य विषयों के साथ, उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्-

(क) दरें जिन पर शर्तें और निर्बन्धन जिनके अध्ययधीन, भारत के भीतर संदेश पारेषित किये जायेंगे;

(ख) सन्देश के प्रकटन और अनुचित अन्तर्रुद्धकरण को निवारित करने के लिए बरती जाने वाली पूर्वावधानियाँ;

(ग) कालावधि जिसके लिए और शर्तें जिनके अध्यधीन, तार और तार अधिकारी की अभिरक्षा में होने वाले या उसके होने वाले अन्य दस्तावेज परिरक्षित किये जायेंगे; और

(घ) तार अधिकारी की अभिरक्षा में अन्य दस्तावेजों और तारों की तलाश करने के लिए प्रभारित की जाने वाली फीस। 

(ङ) शर्तें निर्बन्धन जिनके अध्यधीन तार संबंधी संचार के लिए तार लाइनें, साधित्र

या यन्त्र स्थापित, अनुरक्षित, कार्यकारित मरम्मत, अन्तरित, परिवर्तित, प्रत्यारहित या डिस्कनेक्ट किये जायेंगे । 

[(1. ड.ड़क)] जिस रीति से निधि प्रदान की जाय ।

(ड. ड. ड. ख) मानदण्ड जिस पर आधारित रकम निर्मोचित कर दी जाये

(च) (i) किसी तार लाइन, साधित्र या यन्त्र के स्थापन, अनुरक्षण, कार्यकारण, मरम्मत, [1] अन्तरण या परिवर्तनः

(ii) ऐसी लाइन, साधित्र या यन्त्र के परिचालन में आपरेटर की सेवाओं की बाबत प्रभारें;

(छ) किसी प्रणाली से, जिसके अधीन तार यन्त्र सम्बन्धी संचार के लिए तार लाइन, साधित्र या यन्त्र के स्थान, अनुरक्षण, मरम्मत, अन्तरण या परिवर्तन से संबंधित अधिकार और बाध्यतायें किसी करार के अधीन संलग्न हो, किसी प्रणाली में, जिसके अधीन ऐसे अधिकारी और बाध्यतायें इस धारा के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा संलग्न हों, संक्रमण से संबंधित विषय;

(ज) समय जिस पर, रीति जिसमें शर्तें जिनके अध्यधीन और व्यक्ति जिनके द्वारा इस धारा में वर्णित दरें प्रभार और फीसें संदत्त की जायेंगी और ऐसी दरों, प्रभारों, फीसों के संदाय के लिए प्रतिभूति का दिया जाना;

(झ) किसी व्यक्ति के लाभ के लिए उपबन्धित किसी साधित्र, यन्त्र या तार लाइन के सम्बन्ध में उपगत किसी हानि के लिए केन्द्रीय सरकार को प्रतिकर का संदाय -

(क) जहाँ लाइन, साधित्र यन्त्र उसके प्रयोग किये जाने के लिए कनेक्शन किये जाने के पश्चात् इन नियमों द्वारा नियत कालाविध के अवसान के पूर्व उस व्यक्ति द्वारा छोड़ दी जाय, या 

(ख) जहाँ लाइन, साधित्र यन्त्र, उसके प्रयोग किये जाने के लिए कनेक्शन किये जाने के पश्चात् इन नियमों द्वारा नियम कालावधि के अवसान के पूर्व; उस व्यक्ति के किसी कार्य या लोप द्वारा निष्फल बना देता है। 

(ञ) सिद्धान्त जिनके अनुसरण में और प्राधिकारी जिसके द्वारा खण्ड (झ) में निर्देशित प्रतिकर का निर्धारण किया जायेगा;

( ञ ञ) किसी तार के स्थापन, अनुसरण का कार्यकारण के नियोजित व्यक्तियों द्वारा उत्तीर्ण की जाने वाली परीक्षायें और रखी जाने वाली अर्हतायें, यदि कोई हो और ऐसी परीक्षा में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीस: 

(त) कोई अन्य विषय, जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन किसी या सभी तारों के उचित और सक्षम संचालन के लिए उपबन्ध करना आवश्यक हो ।

(3) नियम बनाते समय इस अधिनियम के अनुज्ञापित किसी व्यक्ति द्वारा स्थापित, अनुरक्षित या कार्यकारित किसी तार के संचालन के लिए केन्द्रीय सरकार नियमों द्वारा उनके किसी भंग के लिए जुर्माने विहित कर सकेगी; 

परन्तु इस प्रकार विहित किये गये जुर्माने निम्नलिखित किसी से अनधिक होंगे, नामत- 

(क) इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञापित व्यक्ति भंग के लिए दण्डनीय हो, एक हजार रुपये के निरन्तर भंग के मामले में प्रथम पश्चात् ऐसा भंग निरन्तर रहने वाले पूरे या किसी भाग के दौरान प्रत्येक दिन के लिए दो सौ रुपये और जुर्माना;

(ख) जब इस प्रकार अनुज्ञापित व्यक्ति का सेवक या अन्य कोई व्यक्ति भंग के लिए दण्डनीय हो, (क) में विनिर्दिष्ट रकम के एक-चौथाई से । 

(4) इस धारा या इसके अधीन बनाये गये नियमों की किसी बात का अर्थ नहीं लगाया जायेगा-

(क) केन्द्रीय सरकार को किसी व्यक्ति के साथ, तार संचार उपलब्ध कराने के प्रयोजन के लिए, जहाँ उस व्यक्ति द्वारा अपेक्षित लाइनों, साधित्रों या यंत्रों की संख्या को ध्यान में रखते हुए उसके साथ ऐसे करार करना और समीचीन हो, किन्हीं तार लाइन, साधित्रों या यंत्रों के उस सरकार द्वारा करार में विनिर्दिष्ट शर्तों और निर्बन्धों पर स्थापन, अनुरक्षण और कार्यकारण के लिए करार के प्रवारित करने का, या

(ख) तार संचार के साधनों को उपलब्ध कराने के प्रयोजन के लिए कोई तार लाइन, साधित्र या यन्त्र उपबन्धित करने को केन्द्रीय सरकार को किसी बाध्यता के अध्यधीन करने की ।

(5) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाये जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जायेगा। यह अवधि एक सत्र में या दो अथवा अधिक अनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी, यदि उस सत्र के पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई उपांतरण करने को सहमत हो जायें या दोनों सदन सहमत हो जायें कि नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात वह केवल ऐसे उपान्तरित रूप में प्रभावी होगी यथास्थिति प्रभावी नहीं होगी, किन्तु ऐसा कोई उपान्तरण या बातिलीकरण उसके अधीन इसके पूर्व की गई किसी बात की विधित मान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।

7. (क) विद्यमान करारों की व्यावृत्ति-धारा 7 की कोई बात केन्द्रीय सरकार के किसी व्यक्ति के साथ भारतीय तार (संशोधन) अधिनियम, 1957 के प्रारम्भ के पूर्व, तार संचार के लिए किसी तार लाइन, साधित्र या यन्त्र के स्थापन, अनुरक्षण या कार्यकरण के संबंध में, हुए किसी करार को अवधारित करने को कोई नियम बनाने को अधिकृत नहीं करेगी और ऐसे स्थापन, अनुरक्षण या कार्यकरण से संबंधित तद्धीन सभी अधिकार और बाध्यतायें उस करार की शर्तों और निर्बन्धनों द्वारा अवधारित होंगी।

7. (ख) विवादों की मध्यस्ता - (1) इस अधिनियम में अन्यथा स्पष्ट रूप से उपबन्धित के सिवाय, किसी तार लाइन, साधित्र या यन्त्र संबंधी तार प्राधिकारी और व्यक्ति, जिसके लाभ के लिए लाइन, साधित्र या यन्त्र उपबन्धित है या की गई हो, के मध्य कोई विवाद मध्यस्थता के द्वारा अवधारित किया जायेगा और ऐसे अवधारण के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार द्वारा या तो उस विवाद के अवधारण के लिए विशेष रूप में या इस धारा के अधीन विवादों के अवधारण के लिए सामान्य रूप से नियुक्त मध्यस्थ को निर्देशित किया जायेगा । 

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त मध्यस्थ का अधिनिर्णय विवादों के पक्षकारों के मध्य निश्चायक होगा और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जायेगा । 

8. अनुज्ञप्तियों का प्रतिसंहरण - केन्द्रीय सरकार द्वारा 4 के अधीन मंजूर किसी अनुज्ञप्ति का, किसी भी समय अन्तर्विष्ट किसी शर्त के भंग या तद्धीन संदेश किसी प्रतिफल के संदाय में व्यतिक्रम पर, प्रतिसंहरण कर सकेगी।

9. सरकार हानि या नुकसान का जिम्मेदार नहीं है-सरकार किसी हानि या नुकसान की जिम्मेदार नहीं होगी, जो किसी सन्देश की प्राप्ति, पारेषण या परिदान की बाबत किसी तार अधिकारी द्वारा उसके कर्त्तव्यों में असफल रहने के परिणामस्वरूप घटित होती है; और ऐसा कोई अधिकारी हानि या नुकसान का जिम्मेदार नहीं होगा, यदि वह उसे उपेक्षापूर्वक, विद्वेषपूर्वक या कपटपूर्वक नहीं करता ।

भाग दो क 
सर्वव्यापी सेवा बाध्यता निधि

9. (क) सर्वव्यापी सेवा बाध्यता निधि - (1) भारतीय टेलीग्राफ (संशोधन) अधिनियम, 2003 के प्रारम्भ होने पर या उससे, सर्वव्यापी सेवा बाध्यता निधि कही जानी वाली एक निधि इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ स्थापित किया जाना समझ जायेगा।

(2) निधि० केन्द्रीय सरकार के नियन्त्रण के अधीन होगी और उसमें जमा की जायेगी- 

(क) धारा 9 ख के अधीन संदाय की गयी कोई भी धनराशि,

(ख) धारा 9-ग के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया कोई अनुदान और दिया गया कोई ऋण;

(3) निधि की जमा का अतिशेष वित्तीय वर्ष के अन्त में व्ययगत नहीं होगा । 

9. (ख) भारत वर्ष की समेकित निधि में रकम को जमा करना

धारा 4 के अधीन सर्वव्यापी सेवा बाध्यता की और प्राप्त की गयी धनराशि भारतीय समेकित निधि में जमा की जायेगी, और केन्द्रीय सरकार, यदि संसद इस निमित्त विधि द्वारा निर्मित विनियोजन द्वारा वैसा उपलब्ध करती हो तो सर्वव्यापी सेवा बाध्यता बैठक के लिए अनन्य रूप से उपयोग किय जाने हेतु समय-समय पर ऐसे निधि में ऐसे उत्पादों को जमा करेगी ।

9. (ग) केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान एवं ऋण-

केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विधि द्वारा संसद द्वारा किये गये सम्यक् विनियोजन के पश्चात् ऐसी धनराशियों को अनुदानी एवं ऋणों के रूप में जमा करेगी जिसे वह सरकार निधि में आवश्यक समझे। 

9. (घ) निधि का दिया जाना और उपयोग

(1) . केन्द्रीय सरकार के पास ऐसी रीति से निधि देने की शक्ति होगी जो इस अधिनियम के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा विहित किया जाय । 

(2) निधि का उपयोग सर्वव्यापी सेवा बाध्यता बैठक के लिए अनन्य रूप से किया जायेगा ।

(3) केन्द्रीय सरकार उन मानदण्डों के अनुसार समन्वय तथा समय से रकम का उपयोग एवं निर्मोचन सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी होगी जिन्हें इस अधिनियम के अधीन नियमों द्वारा विहित किया जाय ।

भाग तीन
तारों की लाइनों और खम्भों के लगाने की शक्ति

10. तार लाइनों और खम्भों को लगाने और अनुरक्षण करने को तार प्राधिकारी के लिए शक्ति

तार प्राधिकारी समय-समय पर किसी स्थावर सम्पत्ति के नीचे ऊपर साथ-साथ या आर-पार कोई तार लाइन में या खम्भे पर लगा और अनुरक्षित कर सकेगी :

परन्तु — 
(क) तार प्राधिकारी इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग सिवाय भारत सरकार द्वारा स्थापित या अनुरक्षित या स्थापित और अनुरक्षित किये जाने को तारों के सिवाय नहीं करेगा ।

(ख) परन्तु केन्द्रीय सरकार की सम्पत्ति में प्रयोगकर्ता के अतिरिक्त अन्य कोई अधिकार अर्जित नहीं करती; जिसके नीचे ऊपर साथ-साथ या आर-पार कोई तार लाइन या खम्भज्ञे तार पाधिकारी लगाता हैं;

(ग) इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित के सिवाय तार प्राधिकारी किसी स्थानीय प्राधिकारी के नियंत्रण या प्रबन्धन के अधीन अथवा में निहित किसी सम्पत्ति की बाबत अधिकारों का प्रयोग उस प्राधिकारी की अनुज्ञा के बिना नहीं करेगा।

(घ) तार प्राधिकारी इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने में कम से कम सम्भव नुकसान करेगा और जब वह खण्ड (ग) में निर्देशित के सिवाय किसी सम्पत्ति की बाबत शक्तियों का प्रयोग कर चुका हो उन शक्तियों के प्रयोग के कारण उन्हें पहुँचे किसी नुकसान के लिए हितबद्ध व्यक्तियों को पूरा प्रतिकर संदत्त करेगा ।

11. तारों की लाइन या खम्भों को हटाने या मरम्मत करने के लिए सम्पत्ति पर प्रवेश करने की शक्ति-

तार प्राधिकारी किसी समय तार लाइन या खम्भों का परीक्षा, मरम्मत, परिवर्तन या हटाये जाने के प्रयोजन के लिए किसी सम्पत्ति पर जिसके नीचे, साथ-साथ या आर-पार में या पर तार खम्भे लगाये गये है, प्रवेश कर सकेगा ।

उपबन्ध स्थानीय प्राधिकारियों के नियंत्रण या प्रबन्ध के अधीन या में निहित सम्पत्तियों को लागू होंगे।

12. स्थानीय प्राधिकारी की शर्तों के अध्यधीन, धारा 10 खण्ड (ग) के अधीन अनुज्ञप्ति देने की शक्ति-धारा 10 खण्ड (ग) के अधीन स्थानीय प्राधिकारी द्वारा दी गई कोई अनुज्ञा, , ऐसी युक्तियुक्त शर्तों के अध्यधीन दी जा सकेगी, जैसी वह प्राधिकारी किन्हीं व्ययों के संदाय के बारे में, जो उस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग के परिणामस्वरूप उस प्राधिकारी को करना आवश्यक होंगे, या किसी कार्य के निष्पादन से ढंग या समय के बारे में उन शक्तियों के अधीन या प्राधिकारी द्वारा उपक्रमित किसी अन्य कार्य से संबंधित या जुड़ी हुई अन्य चीज के बारे में अधिरोपित करना उचित समझे ।

13. तार की लाइनों या खम्भों को हटाने या परिवर्तित करने की अपेक्षा करने की स्थानीय प्राधिकारी की शक्ति-जब इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन तार प्राधिकारी द्वारा कोई तार लाइन या खम्भा, स्थानीय प्राधिकारी के नियन्त्रण या प्रबन्ध की या में निहित किसी सम्पत्ति पर नीचे या ऊपर, साथ-साथ, आर-पार, में या लगाया गया तो था स्थानीय प्राधिकारी उन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जो ऐसे खम्भा या लाइन से उत्पन्न हो गई हों, यह समीचीन समझे कि यह हटा लिया जाना चाहिए या उसकी स्थिति में परिवर्तित कर देना चाहिए, स्थानीय प्राधिकारी तार प्राधिकारी से यथास्थिति, इसे हटाये जाने या इसकी स्थिति परिवर्तित करने की अपेक्षा कर सकेगा।

14. गैस और जल पाइपों और नालियों की स्थिति परिवर्तित करने की शक्ति- तार प्राधिकारी इस अधिनियम के अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के प्रयोजन के लिए, स्थानीय प्राधिकारी नियंत्रण या प्रबन्ध के अधीन की या में निहित किसी सम्पत्ति की बाबत, तद्धीन गैस या जल के प्रदाय के लिए किसी पाइप (मुख्य न होने पर) या किसी नाली (मुख्य नाली न होने पर) की स्थिति परिवर्तित कर सकेगा;

परन्तु — 
(क) जब तार प्राधिकारी ऐसी किसी नाली या पाइप की स्थिति परिवर्तित करने की इच्छा करे, वह जैसा करने के अपने आशय का युक्तियुक्त नोटिस, समय विनिर्दिष्ट करते हुए जब कि वैसा करना प्रारम्भ किया जायेगा, स्थानीय प्राधिकारी को और जहाँ पाइप और नाली स्थानीय प्राधिकारी के नियंत्रणाधीन न हो, उस व्यक्ति को जिसको नियंत्रणाधीन नाली या पाइप हो, देगा।

(ख) खण्ड (क) के अधीन नोटिस प्राप्त होने पर स्थानीय प्राधिकारी या वह व्यक्ति 'कार्य के अधीक्षण के लिए एक व्यक्ति को भेज सकेगा और तार प्राधिकारी कार्य को इस प्रकार भेजे गये व्यक्ति के युक्तियुक्त समाधान में निष्पादन करेगा।

15. तार प्राधिकारियों और स्थानीय प्राधिकारियों के मध्य विवाद- 

(1) यदि स्थानीय प्राधिकारी द्वारा धारा 10 में निर्देशित अनुज्ञा से इंकार या धारा 12 के अधीन कोई शर्त विहित करने के परिणामस्वरूप अथवा तार प्राधिकारी के धारा 13 में की गई अपेक्षा का अनुपालन करने में लोप के परिणामस्वरूप या इस अधिनियम के अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने में अन्यथा स्थानीय प्राधिकारी के माध्य कोई विवाद उत्पन्न होता है, वह ऐसे प्राधिकारी द्वारा अवधारित किया जायेगा जैसा केन्द्रीय सरकार सामान्य तौर पर या विशेष रूप से इस निमित्त नियुक्त करे । 

(2) इस प्रकार नियुक्त प्राधिकारी के अवधारण की अपील केन्द्रीय सरकार को होगी और सरकार का आदेश अन्तिम होगा ।

अन्य सम्पत्तियों पर लागू होने वाले उपबन्ध

16. स्थानीय प्राधिकारी के अतिरिक्त अन्य सम्पत्ति के मामले में प्रतिकर के विवादों और धारा 10 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग- 

(1) यदि धारा 10 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग उस धारा के खण्ड (घ) में निर्देशित सम्पत्ति, बाबत, प्रतिरोधित या बाधित किया जाता है, जिला मजिस्ट्रेट अपने विवेक से आदेश कर सकेगा कि तार प्राधिकारी उसका प्रयोग करने को अनुज्ञात होगा।

(2) यदि, उपधारा (1) के अधीन ऐसा आदेश करने के पश्चात् कोई व्यक्ति उन शक्तियों के प्रयोग करने में प्रतिरोध करता है या सम्पत्ति पर नियंत्रण रखते हुए उनके प्रयोग किये जाने के लिए सभी सुविधायें नहीं देता है, वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 188 के अधीन अपराध कारित करने वाला समझा जायेगा ।

(3) यदि कोई विवाद धारा 10 के खण्ड (घ) के अधीन संदत्त किये जाने वाले प्रतिकर की पर्याप्तता से संबंधित उत्पन्न हो, यह उस प्रयोजन के लिए विवादग्रस्त पक्षकारों में से किसी के आवेदन पर जिला न्यायाधीश द्वारा अवधारित किया जायेगा, जिसकी अधिकारिता में सम्पत्ति स्थित हो ।

(4) यदि प्रतिकर प्राप्त करने के हकदार व्यक्तियों के बारे में उसके हिस्सों के अनुपात जिसमें कि हितबद्ध व्यक्ति हकदार हैं, के बारे में कोई विवाद उत्पन्न होता है, तार प्राधिकारी जिला न्यायाधीश के न्यायालय में ऐसी रकम का, जैसी वह पर्याप्त समझता है अथवा जहाँ सभी विवादग्रस्त पक्षकार निविदत्त रकम का पर्याप्त होना लिखित में स्वीकार करें अथवा वह रकम जो उपधारा (3) के अधीन अवधारित की गई हो, संदाय कर सकेगा और जिला न्यायाधीश पक्षकारों को नोटिस देते हुए उनमें से सुने जाने की इच्छा करें, सुनवाई करते हुए प्रतिकर के प्राप्त करने के हकदार व्यक्तियों को या उसके हिस्सों के अनुपात का अवधारण, जैसी स्थिति हो, करेगा ।

(5) उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन जिला न्यायाधीश द्वारा विवाद का प्रत्येक अवधारण अन्तिम होगा । 

परन्तु इस उपधारा की कोई बात पर प्राधिकारी के द्वारा संदत्त प्रतिकर के किसी भाग सम्पूर्ण वाद द्वारा उस व्यक्ति से जिसने उसे प्राप्त किया है, वसूली के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगी। 

17. स्थानीय प्राधिकारी के अतिरिक्त की सम्पत्ति पर से तार लाइन और खम्भों का परिवर्तन या हटाया जाना-

(1) जब इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन स्थानीय प्राधिकारी के नियंत्रण या प्रबन्ध के अधीन या में निहित सम्पत्ति में या पर, नीचे, ऊपर, साथ-साथ या आर-पार तार प्राधिकारी द्वारा कोई खम्भा या तार लाइन लगाई गई हो और यदि वैसा करने को हकदार व्यक्ति सम्पत्ति से ऐसी रीति में संव्यवहार करता है; कि तार लाइन या खम्भे को उसके अन्य भाग में या उच्च या निम्न स्तर पर हटाया अथवा रूप में परिवर्तित करना आवश्यक या सुविधाजनक हो जाये वह तार प्राधिकारी से तद्नुसार लाइन या खम्भे को हटाने या परिवर्तित करने की अपेक्षा कर सकेगा ।

परन्तु यदि धारा 10 के खण्ड (घ) के अधीन प्रतिकर संदत्त किया गया हो, वह जब तार प्राधिकारी अपेक्षा करे परिवर्तन या हटाने के व्यय को चुकाने को अपेक्षित रकम या प्रतिकर के रूप में संदत्त रकम की आधी जो भी छोटी धनराशि हो, निविदत्त करेगा ।

(2) यदि तार प्राधिकारी अपेक्षा का अनुपालन करने में लोप करता है, करने वाला व्यक्ति जिला मजिस्ट्रेट को, जिसकी अधिकारिता में सम्पत्ति स्थित है, हटाये जाने या परिवर्तन करने के आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा ।

(3) जिला मजिस्ट्रेट उपधारा (2) के अधीन आवेदन प्राप्त होने पर अपने विवेक से उसे नामंजूर कर सकेगा या पूर्ण रूप से या शर्तों के अध्यधीन तार लाइन या खम्भों, सम्पत्ति के किसी भाग या निम्न स्तर पर हटाने या इसके रूप को परिवर्तित करने के आदेश दे सकेगा।

सभी सम्पत्तियों पर लागू होने वाले उपबन्ध 

18. तार संचार में अवरोध डालने वाले वृक्षों को हटाया जाना-

(1) यदि किसी तार लाइन के समीप खड़ा हुआ कोई वृक्ष तार संचार में अवरोध पैदा करता है या अवरोध पैदा करने को सभाव्य हो, प्रथम या द्वितीय वर्ग का मजिस्ट्रेट तार प्राधिकारी के आवेदन पर वृक्ष को कटवा सकेगा या ऐसी रीति में व्यवहार कर सकेगा, जैसी वह उचित समझता है ।

(2) जब उपधारा (1) के अधीन आवेदन के निपटारे में, मजिस्ट्रेट तार लाइन तार लगाये जाने के पूर्व विद्यमान वृक्ष के मामले में, वृक्ष में हितबद्ध व्यक्तियों को ऐसे प्रतिकर का अधिनिर्णय कर सकता है, जैसा वह युक्तियुक्त समझे और ऐसा अधिनिर्णय अन्तिम होगा ।

19. इस अधिनियम के पारित होने के पूर्व लगाये गये तार संबंधी खम्भे और लाइनें केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित या सुरक्षित तार के प्रयोजन के लिए किसी सम्पत्ति के नीचे, ऊपर, साथ-साथ, आर-पार में या पर इस अधिनियम के पारित होने के पूर्व लगाई गई प्रत्येक तार लाइन और खम्भा अधिनियम की अपेक्षाओं के पश्चात् और द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में लगाया गया समझा जायेगा ।

19. (क) तारों को नुकसान पहुँचाने या तार संचार में हस्तक्षेप करने की संभावना में अधिकार का वैध प्रयोग करने वाले व्यक्ति द्वारा नोटिस दिया जाना-

(1) किसी सम्पत्ति में वैध अधिकारों का प्रयोग, ऐसी रीति में संव्यवहार करने की इच्छा करता है जो किसी तार, लाइन या खम्भे को, जो इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में सम्यक् रूप से लगाया गया हो, नुकसान पहुँचाना या तार संचार में अवरोध या हस्तक्षेप करना संभावित हो, ऐसे अधिकार के आशयित प्रयोग का एक माह से कम का न होने वाला नोटिस तार प्राधिकारी या तार अधिकारी को, जिसे तार प्राधिकार द्वारा इस निमित्त सशक्त किया हो; देग।|

(2) यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबन्धों के अनुपालन के बिना सम्पत्ति से ऐसी रीति में संव्यवहार करता है, जो किसी तार लाइन या खम्भे को नुकसान पहुँचाने या तार संचार में अवरोध या हस्तक्षेप करने को संभाव्य है, प्रथम या द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट तार प्राधिकारी के आवेदन पर ऐसे व्यक्ति को ऐसी रीति में ऐसी सम्पत्ति से संव्यवहार करने के उसके आदेश की तारीख से एक माह से अधिक कालावधि के लिए प्रविरत करने का आदेश कर सकेगा और उसके साथ ही उस सम्पत्ति के बाबत ऐसी कालावधि के दौरान ऐसे नुकसान अवरोध या हस्तक्षेप के निवारण या उपचार के लिए मजिस्ट्रेट उसकी आवश्यक कार्यवाही ' कर सकेगा ।

(3) उपधारा (1) में निर्देशित रीति में किसी सम्पत्ति से संव्यवहार करने वाला व्यक्ति, उसे स्वयं को या किसी मानव की व्यक्तिगत क्षति को आसन्न संकट के टालने के सद्भावपूर्ण आशय उक्त धारा के उपबन्धों का अनुपालन करने को समझा जायेगा, यदि वह आशयित अधिकारों का प्रयोग का ऐसा नोटिस जैसा परिस्थितियों में संभव हो, दे देता है या जहाँ पर ऊपर निर्देशित आसन्न संकट को उपगत किये बिना ऐसा पूर्व नोटिस न दिया जा सकता हो, यदि वह तत्काल ऐसे अधिकार के वास्तविक प्रयोग का नोटिस पूर्वोक्त उपधारा में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या अधिकारी को दे देता है। 

19. (ख) इस भाग के अधीन तार प्राधिकारियों की शक्तियाँ अनुज्ञप्तिधारी को प्रदत्त करने की शक्ति- 
केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा धारा 4 के अधीन किसी अनुज्ञप्तिधारी को उसकी अनुज्ञप्ति के विस्तार के और किन्हीं शर्तों और निर्बन्धनों जो केन्द्रीय सरकार अधिरोपित करना उचित समझे तथा इस भाग में उपबन्ध के अधीन कोई या सभी शक्तियाँ प्रदत्त कर सकेगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित या अनुरक्षित या स्थापित या अनुरक्षण किये जाने की बाबत इस धारा के अधीन तार प्राधिकारी को होती है;

परन्तु धारा 19-क में विहित नोटिस सदैव तार प्राधिकारी या धारा 19-क (1) के अधीन नोटिस प्राप्त करने को सशक्त अधिकारी को ही दिया जायेगा ।

भाग चार: शक्तियाँ

20. अनाधिकृत तार का स्थापन, अनुरक्षण और कार्यकारण-

(1) यदि कोई व्यक्ति धारा 4 के उल्लंघन में या उस धारा के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा यथा— अनुज्ञात से अन्यथा भारत के भीतर तार स्थापित, अनुरक्षित या कार्यकारित करता है, वह यदि तार कोई बेतार का तार है, तीन वर्ष तक के हो सकने वाले कारावास या जुर्मान से या दोनों से तथा अन्य किसी मामले में एक हजार रुपयों तक के हो सकने वाले जुर्मान से दण्डनीय होगा । 

(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में किसी बात के अन्तर्विष्ट होने पर भी इस धारा के अधीन बेतार के तार की बाबत अपराध, उस संहिता के प्रयोजन के लिए जमानतीय और असंज्ञेय होंगे।

(3) जहाँ कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन अपराध का सिद्धदोष हो, न्यायालय जिसके समक्ष उसे सिद्धदोष किया जाता है, निर्देश कर सकेगा कि तार जिसकी बाबत अपराध कारित किया गया हो या ऐसे तार का कोई भाग सरकार को समपहत होगा ।

20. (क) अनुज्ञप्ति की शर्त का भंग-यदि धारा 4 के अधीन मंजूरी अनुज्ञप्ति का धारक उसकी अनुज्ञप्ति में अन्तर्विष्ट किसी शर्त का उल्लंघन करता है, वह एक हजार रुपये तक के हो सकने वाले जुर्माने से और जुर्माने से जो पाँच सौ रुपये प्रति सप्ताह तक का हो सकेगा, जिस दौरान कि शर्त भंग निरन्तर रहता है ।

21. अनधिकृत तारों का प्रयोग करना-यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए यह विश्वास करने के कारण होते हुए कि कोई तार उस अधिनियम के उल्लंघन में स्थापित, अनुरक्षित या कार्यकारित है, ऐसे तार द्वारा कोई संदेश प्राप्त या पारेषित करता है, या उसकी आनुषंगिक किसी सेवा को सम्पन्न करता है, या तार द्वारा पारेषण के लिए संदेश परिदत्त करता है या इसके द्वारा भेजे जाने के किसी संदेश के परिदान को स्वीकार करता है, वह पंचास रुपयों तक के हो सकने वाले जुर्माने से दण्डनीय होगा ।

22. रेलवे भूमि पर तारों के स्थापन का विशेष-यदि कोई रेल कम्पनी या रेल कम्पनी का अधिकारी धारा 6 के उपबन्धों का अनुपालन करने से इन्कार करता है या उपेक्षा करता है, वह प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान उपेक्षा या इन्कार निरन्तर रहता है, एक सौ रुपये तक के हो सकने वाले जुर्मान से दण्डनीय होगा ।

23. संकेत कक्ष में अतिक्रमण, तार कार्यालय में अतिचार या बाधा - यदि कोई व्यक्ति- 
(क) सक्षम प्राधिकारी की अनुज्ञा के बिना सरकार या इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञापित व्यक्ति के तार कार्यालय के संकेत कक्ष में प्रवेश करता है, या

(ख) ऐसे तार कार्यालय के चारों ओर लगी हुई बाड़ में किसी नियम या वैसा न करने के किसी नोटिस के उल्लंघन में प्रवेश करता है, या

(ग) ऐसे कक्ष या संलग्न को उसमें नियोजन किसी सेवक या अधिकारी द्वारा वैसा अनुरोध किये जाने, पर छोड़ने से इन्कार करता है, या

(घ) ऐसे किसी अधिकारी या सेवक को अपने कर्त्तव्यों के पालन में बाधा या अड़चन डालता है, या वह पाँच सौ रुपयों तक के हो सकने वाले जुर्माने से दण्डनीय होगा । 

24. सन्देशों की विषय-वस्तु को विधि विरुद्धतया जानने का प्रयत्न करना

यदि कोई व्यक्ति धारा 23 में वर्णित कार्य, किसी संदेश की विषय-वस्तु को विधिविरुद्ध जानने के अथवा इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के कारित करने के आशय से करता है, वह (जुर्माने की वृद्धि में, जिससे वह धारा 23 दण्डनीय है) एक वर्ष तक के हो सकने वाले कारावास से दण्डनीय किया जा सकेगा।

25. आशयपूर्वक तारों से छेड़छाड़ करना या नुकसान पहुँचाना - यदि -

(क) किसी सन्देश परिदान या पारेषण में बाधा डालने या निवारण करने, या 

(ख) किसी सन्देश की विषय-वस्तु से स्वयं को अवगत कराने या अन्तर्रुद्ध करने, या

(ग) रिष्टि कारित करने :

को आशयित कोई व्यक्ति किसी तार में उसके कार्यकरण में लगभग प्रयुक्त या उसका भाग होते हुए किसी बैटरी मशीनरी, तार लाइन, खम्भा या कोई भी अन्य चीज को छूता है, से छेड़छाड़ करता है, हटाता है या नुकसान पहुँचाता है, वह तीन वर्ष तक के हो सकने वाले कारावास से या जुर्माने से या दोनों से दण्डनीय होगा । 

25. (क) तार लाइनों या खम्भे में हस्तक्षेप या क्षति पहुँचाना - यदि किसी मामले में धारा 25 द्वारा जिस के लिए उपबन्ध न किया गया हो, कोई व्यक्ति किसी सम्पत्ति से संव्यवहार करता है और एतद्वारा जान-बूझकर या उपेक्षा या इस अधिनियम के अनुसरण में ऐसी सम्पत्ति पर सम्यक् से लगे किसी तार लाइन या खम्भे को नुकसान पहुँचाता है, तो वह तार प्राधिकरण द्वारा ऐसे व्ययों, (यदि कोई हो) जैसे उस नुकसान को ठीक करने में उपगत हो सके, के संदाय का दायी होगा और यदि इस प्रकार कारित नुकसान के कारण तार संचार अवरुद्ध हुआ, एक हजार रुपयों तक के हो सकने वाले जुर्मान से भी दण्डनीय होगा ।

परन्तु इस धारा के उपबन्ध लागू नहीं होंगे जहाँ ऐसा अवरोध या नुकसान सम्पत्ति से संव्यवहार करने वाले व्यक्ति द्वारा वैध अधिकारियों के द्वारा कारित हुए हों, यदि उसने धारा 19-क (1) के उपबन्धों की अनुपालन कर दी हो। 

26. तार अधिकारी या अन्य पदाधिकारी द्वारा सन्देशों को विधि विरुद्ध अन्तरुद्ध या प्रकट करना या परिवर्तित करना या संकेतों के तात्पर्य प्रकट करना - यदि कोई तार अधिकारी या तारघर के रूप में प्रयुक्त किसी कार्यालय से संबंधित पदीय कर्त्तव्य करने, तार प्राधिकारी न होते हुए,

कोई व्यक्ति-

(क) कोई संदेश, जिसने उसे पारेषण या परिदान के लिए प्राप्त किया हो, जान-बूझकर परिवर्तित करता है, छिपाता है या लेकर भाग जाता है या

(ख) जानबूझकर और केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार अथवा राज्य या केन्द्रीय सरकार द्वारा आदेश बनाने की विशेषतया अधिकृत अधिकारी के आदेश के अनुपालन से अन्यथा, किसी सन्देश या उसके किसी भाग के पारेषण में लोप या अन्तर्रुद्ध या निरुद्ध करता है। अथवा उसके पदीय कर्त्तव्य के अनुसरण में या सक्षम न्यायालय के निर्देश से अन्यथा, संदेश की विषय-वस्तु या विषय-वस्तु का कोई भाग उसे प्राप्त करने का हकदार न होने वाले किसी व्यक्ति को प्रकट करता है, या

(ग) किसी तार संबंधी संकेत या तात्पर्य, उससे अवगत न होने के हकदार व्यक्ति की प्रकट करता है, 

वह तीन मास तक हो सकने वाले कारावास से या जुर्मान से या दोनों दण्डित किया जायेगा । 

(27) बिना भुगतान के कपटपूर्वक संदेश भेजने वाला तार अधिकारी-यदि कोई तार अधिकारी केन्द्रीय सरकार या इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञाप्ति किसी व्यक्ति द्वारा, जैसी स्थिति हो, प्रभारों के भुगतान किये बिना तार द्वारा कोई संदेश, एतद्द्वारा सरकार या • व्यक्ति को कपटपूर्वक आशय से, पारेषित करता है, वह तीन वर्ष तक के हो सकने वाले कारावास से या जुर्मान से या दोनों से दण्डित किया जायेगा।

28. अवचार - यदि कोई तार अधिकारी या तार के रूप में प्रयुक्त किसी कार्यालय से संबंधित पदीय कर्तव्यों को करने वाले अन्य कोई व्यक्ति भत्ता, लापरवाही या किसी अवचार का दोषी है, जिसके द्वारा संदेश का सही पारेषण या परिदान में अड़चन हुई हो या विलंब हुआ है, अथवा यदि कोई तार अधिकारी किसी संदेश के पारेषण से विलम्ब करता है या यत्र-तत्र घुमाता है, वह तीन मास तक के हो सकने वाले कारावास से या एक सौ रुपये तक के हो सकने वाले जुर्माने से दण्डित किया जायेगा ।

29. (विलुप्त ) 

29. (क) शास्ति - यदि कोई व्यक्ति बिना प्राधिकार के—

(क) ऐसी प्रकृति का कोई दस्तावेज, जिसके युक्तियुक्त रूप में विश्वास करने की संगणना हो सके कि वह दस्तावेज डाक और तार के महानिदेशक के द्वारा प्राधिकारी द्वारा या के अधीन जारी करता है, या

(ख) किसी दस्तावेज पर डाक और तार के महानिदेशक के अधीन किसी तार कार्यालय का कोई चिन्ह या स्टाम्प होने को तात्पर्यत या समान रूप का या अनुकृति में चिन्ह बनाता है अथवा ऐसा चिन्ह बनाता है, जिससे उसमें युक्तियुक्त रूप से विश्वास करने को संगणना की जा सके कि इस प्रकार चिन्हांकित दस्तावेज डाक और तार के महानिदेशन प्राधिकार के अधीन या द्वारा जारी किया गया है। वह पचास रुपये तक के हो सकने वाले जुर्माने से दण्डित किया जायेगा।

30. गलती के परिदत्त सन्देश प्रतिधारित करना-यदि कोई व्यक्ति ऐसा सन्देश जिसे किसी अन्य व्यक्ति को परिदत्त किया जाना चाहिए, कपटपूर्वक प्रतिधारित करता है या जानबूझकर छुपाता है, लेकर भाग जाता है या निरुद्ध करता है, अथवा तार अधिकारी द्वारा ऐसे संदेश को परिदत्त करने की अपेक्षा करता है या वैसा करने से इन्कार कर देता है, वह दो वर्ष तक के हो सकने वाले कारावास से या जुर्मान से या दोनों से दण्डित किया जायेगा। 

31. रिश्वत - तार अधिकारी भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 161, 162, 163, 164 और 165 के अभिप्रायों में लोक सेवक समझा जायेगा और उक्त धारा 161 में अन्तर्विष्ट “वैध पारिश्रमिक” की परिभाषा में शब्द “सरकार" के अन्तर्गत इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञाति कोई व्यक्ति सम्मिलित समझा जायेगा ।

32. अपराध करने का प्रयत्न करना जो कोई इस अधिनियम के अधीन दण्ड कोई अपराध कारित करने का प्रयत्न करता है, उस अपराध के लिए इसमें उपबन्धित दण्ड से दण्डित किया जायेगा ।

भाग पाँच : अनुपूरक

33. उन स्थानों में जहाँ तारों की रिष्टि बार-बार होती है, अतिरिक्त पुलिस का नियोजन करने की शक्ति-

(1) जब कभी भी राज्य सरकार को यह प्रतीत होता हो कि किसी तार को सदोष नुकसान करने वाला या करने को संभाव्य कोई कार्य किसी स्थान में बार-बार और विद्वेषपूर्वक कारित होता है, तथा एतद्द्वारा उस स्थान में अतिरिक्त पुलिस बल का नियोजन आवश्यक बन गया है, राज्य सरकार ऐसे अतिरिक्त पुलिस बल को, जैसा वह उचित समझे, उस स्थान को भेज सकेगी और उसे वहाँ तक नियोजित रखेगी, जैसा सरकार की राय में वैसा करने की आवश्यकता निरन्तर रहे।

(2) उस स्थान के निवासी अतिरिक्त पुलिस बल के खर्चों से प्रभावित होंगे और जिला मजिस्ट्रेट राज्य सरकार के आदेशों के अध्यधीन, अनुपात निर्धारित करेगा, जिसमें निवासियों द्वारा उसके निर्णय उनके अपने-अपने साधनों के अनुसार संदत्त किये जायेंगे ।

(3) उपधारा (2) के अधीन संदेय सभी धन या तो मजिस्ट्रेट के वारण्ट के अधीन उसकी स्थानीय अधिकारिता की परिसीमा में व्यतिक्रमी की जंगम सम्पत्ति के करस्थम और बिक्री द्वारा वसूल किये जायेंगे । 

(4) राज्य सरकार लिखित आदेश द्वारा इस धारा के प्रयोजनों के लिए परिसीमा का परिभाषा कर सकेगी।

34. अधिनियम का प्रेसीडेन्सी नगरों पर लागू होना - यह अधिनियम इनके प्रेसीडेन्सी नगरों में लागू होते समय इस प्रकार पढ़ा जायेगा गानों धारा 16, उपधारा (1) और धाग 17. उपधारा (2) और (3) में "जिला मजिस्ट्रेट" शब्दों के लिए धारा 18 उपधारा (1) और धारा 19-क उपधारा (2) में "प्रथम द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट" के लिए, तथा धारा 18 उपधारा (2) में मजिस्ट्रेट शब्द के लिए, “पुलिस का आयुक्त " शब्द तथा धारा 16 उपधाराओं (3) (4) और (5) में "जिला न्यायाधीश” शब्दों के लिए "लघुवाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश” अधिनियमित किये गये हो ।

(2) निरसित ।

(3) धारा 16 की उपधारा (3) के अधीन प्रेसीडेन्सी के लघुवाद न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की किसी आवेदन के बारे में फीस उसी प्रकार होगी जैसी न्यायालय फीस अधिनियम, 1870 के अधीन प्रेसीडेन्सी नगरों की परिसीमा के परे जिला न्यायाधीश को किसी आवेदन के बारे में संदेय होती तथा उपधारा (3) और (4) के अधीन मुख्य न्यायाधीश के समक्ष कार्यावाही में समनों और आदेशिकाओं के लिए फीस प्रेसीडेन्सी लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1882 की चतुर्थ अनुसूची में दिये गये मान के अनुसार सन्देय होगी।

35. (भारत एवं राज्यों को कतिपय विधियों के प्रतिनिर्देश) अधिनियम सं० 3 सन् 1951 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा निरसित ।

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में संशोधन

अनुसूची 1 ( धारा 91 देखें)
भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में संशोधन

(1) धारा 29 के पश्चात् निम्न धारायें अन्तः स्थापित की जायेंगी -

29. (अ) इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड - शब्द इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड सूचना तकनीकी अधिनियम, 2000 की धारा 2 के उपधारा (1) के खण्ड (7) में समनुदेशित अर्थों में होगा । 

2. धारा 167 में शब्द "ऐसे लोक सेवक” से किसी दस्तावेज का तैयार किया जाना या भाषान्तरण उस दस्तावेज का बनाया जाना तथा भाषान्तरण आरोपित होगा शब्द "ऐसा 

लोक सेवक किसी दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का बनाया जाना, तैयार किया जाना अथवा उस अभिलेख अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का भाषान्तरण आरोपित है। 

3. धारा 172 में शब्द न्यायालय में किसी दस्तावेज का पेश किए जाने के लिए शब्द न्यायालय में किसी दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड का पेश किया जाना प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

4. धारा 173 में शब्द न्यायालय में किसी दस्तावेज को पेश करने के लिए शब्द न्यायालय में किसी दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के पेश करने से है । 

5. धारा 175 में शब्द दस्तावेज के लिए सभी स्थानों पर शब्द दस्तावेज इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

6. धारा 192 में शब्द "किसी पुस्तिका अथवा रिकार्ड में मिथ्या प्रविष्टि करना अथव मिथ्या कथन अन्तर्विष्ट करने वाले दस्तावेज का बनाने के लिए शब्द किसी पुस्तिका अभिलेख अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड में मिथ्या प्रविष्टि करना अथवा मिथ्या कथन अन्तर्विष्ट करने वाले किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड को बनाना प्रतिस्थापित किया जायेगा ।”

7. धारा 204 में शब्द " दस्तावेज” के लिए सभी स्थानों पर जहाँ " दस्तावेज” अथवा "इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड" प्रतिस्थापित किया जायेगा । 

8. धारा 463 में शब्द "जो कोई मिथ्या दस्तावेज को या उसके किसी भाग को नुक्सान पर क्षति करने के आशय से बनाता है" के लिए शब्द "जो कोई मिथ्या दस्तावेज अथवा मिथ्या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड अथवा दस्तावेज के या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के किसी भाग को क्षति नुकसान कारित करने के आशय से बनाता है" प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

8. धारा 464 में—

(क) उस अंश के लिए जो कि निम्न शब्दों से प्रारम्भ होते हैं, “उस व्यक्ति के बारे में यह कहा जाता है कि वह व्यक्ति मिथ्या दस्तावेज रखता है” और निम्न शब्दों से समाप्त होता है " प्रवंचना के कारण जो उससे की गयी, जानता नहीं है, कि उस दस्तावेज का सार क्या है अथवा बदलाव की प्रवृत्ति क्या है 92 के स्थान पर निम्नलिखित को प्रतिस्थापित किया जायेगा- 

उस व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि वह व्यक्ति मिथ्या दस्तावेज अथवा मिथ्या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड बनाता है—

पहला - जो बेइमानी से या कपटपूर्वक-

(क) दस्तावेज अथवा दस्तावेज के किसी भाग को रचित, हस्ताक्षरित, मुद्रांकित अथव निष्पादित करता है;

(ख) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के किसी भाग को बनाता या • पारेषित करता है; 

(ग) किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड पर अँगूठे के हस्ताक्षर करता है;

(घ) दस्तावेज या अँगूठे के हस्ताक्षर की प्रमाणिकता के लिए दस्तावेज का द्योतन करने वाला कोई चिन्ह लगाता है;

कि यह विश्वास किया जायेक कि ऐसी दस्तावेज या दस्तावेज का भाग, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, की रचना, हस्ताक्षर, मुद्राकरण या निष्पादन पारेषण ऐसे व्यक्ति द्वारा या ऐसे व्यक्ति के प्राधिकार द्वारा किया गया था जिसके द्वारा या जिसके प्राधिकार के द्वारा उसकी रचना हस्ताक्षरण मुद्राकरण. या निष्पादन होने की बात वह जानता था ।

दूसरा- जो किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के किसी तात्विक भाग परिवर्तन उसके द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा चाहे ऐसा व्यक्ति परिवर्तन के समय जीवित हो या नहीं उस दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के रचित निष्पादित किये जाने के पश्चात् उसे रद्द करने के द्वारा या अन्यथा विधिपूर्वक प्राधिकार के बिना बेइमानी या कपट पूर्वक करता है; अथवा

तीसरा - जो किसी व्यक्ति द्वारा जानते हुए कि ऐसा व्यक्ति किसी दस्तावेज अथवा किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की विषय वस्तु को परिवर्तन के रूप को चित्रविकृत्ति या मत्ता की हालत में होने के कारण जान नहीं सकता या उस प्रवंचता के कारण जो उससे की गयी है जानता नहीं उस दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड का बेइमानी से या कपटपूर्वक हस्ताक्षर मुद्रांकित निष्पादित या परिवर्तित किया जाना कारित करता है।

(ब) स्पष्टीकरण 2 के पश्चात् निम्न स्पष्टीकरण अन्तः स्थापित किये जायेंगे । 

स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए अभिव्यक्ति "अँगूठे का निशान लगाना, सूचना तकनीक अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (घ) के अर्थों में समनुदेशित होगा ।

10. धारा 466 में-

(क) शब्द 'जो कोई किसी दस्तावेज की कूट रचना" के स्थान पर शब्द "जो कोई किसी दस्तावेज या किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की कूटरचना", प्रतिस्थापित किया जायेगा; 

(ख) अन्त में निम्न स्पष्टीकरण अन्तः स्थापित किये जायेंगे ।

स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए “रजिस्टर" किसी सूची, विषय वस्तु अथवा सूचना तकनीक अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा की (1) के खण्ड (द) के रूप में परिभाषित इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में वर्णित प्रविष्टियों को सम्मिलित करता है । 

11. धारा 468 में - शब्द "दस्तावेज" की कूट रचना के स्थान पर शब्द " दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड" की कूट रचना प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

12. धारा 469 में - शब्द "इस आशय से दस्तावेज” की कूट रचना के स्थान पर शब्द "इस आशय से दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड" की कूट रचना प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

13. धारा 470 में - शब्द " दस्तावेज" सभी स्थानों पर जहाँ भी यह प्रयुक्त हुआ हैं के स्थान पर शब्द " दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक" रिकार्ड प्रतिस्थापित किया जायेगा । 

14. धारा 471 में - शब्द " दस्तावेज" जहाँ भी प्रयुक्त है के स्थान पर शब्द " दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड" प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

15. धारा 474 में - शब्द "जो कोई किसी दस्तावेज को अपने कब्जे में रखता है" से शुरु होने वाले भाग और शब्द “यदि दस्तावेज इस संहिता की धारा 466 में वर्णित विस्तारों में से एक से समाप्त होने वाले भाग के लिए निम्न शब्द-

“जो कोई किसी दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड को उसे कूट रचित यह जानते हुए और आशय रखते हुए कि यह कपटपूर्वक या बेइमानी से असली के रूप में उपयोग में लायी जायेगी अपने कब्जे में रखेगा यदि वह दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड इस संहिता की धारा 466 में वर्णित प्रकारों में से एक है" प्रतिस्थापित किया जायेगा।

16. धारा 467 में शब्द "किसी दस्तावेज" के लिए शब्द "कोई दस्तावेज यां इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड” प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

17. धारा 477 अ में— शब्दों "पुस्तिका कागज, लिखित सभी स्थानों जहाँ भी वे प्रयुक्त हो के लिए शब्द "पुस्तिका, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड कागज, लिखित" को प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

अनुसूची II (धारा 92 देखें)

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में संशोधन

1. धारा 3 में- (क) साक्ष्य की परिभाषा में शब्दों "न्यायालय के लिए सभी दस्तावेजों का पेश किया • जाना" के लिए शब्द “न्यायालय के निरीक्षण के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड सहित सभी - दस्तावेजों का पेश किया जाना" प्रतिस्थापित किया जायेगा । 

(ख) “भारत” की परिभाषा के वाद निम्न को अन्तः स्थापित किया जायेगा—-

अभिव्यक्तियों “प्रमाणन प्राधिकारी" अँगूठे के हस्ताक्षर का प्रमाणपत्र, इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, सूचना, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की सुरक्षा अँगूठे के हस्ताक्षर की सुरक्षा और उपभोक्ता को सूचना तकनीकी अधिनियम, 2000 में समनुदेशित अर्थों में रखा जायेगा ।

2. धारा 17 में— शब्दों "मौखिक अथवा दस्तावेजी" के लिए शब्दों, "मौखिक, दस्तावेजी अथवा इलेक्ट्रॉनिक फार्म" को प्रतिस्थापित किया जायेगा । 

3. धारा 22 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी—

22. (अ) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की अन्तर्वस्तुओं मौखिक स्वीकृतियाँ सुसंगत हो — इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की अन्तर्वस्तुओं की मौखिक स्वीकृतियाँ तक तक सुसंगत नहीं होती हैं जब तक कि पेश किये गये इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की असलियत प्रश्नगत न हो। 

4. धारा 34 में - शब्दों "खाता पुस्तिका में की प्रविष्टियों" के लिए शब्दों "इलेक्ट्रॉनिक फार्म में की अन्तर्विष्टियों के सहित खाता पुस्तिका की प्रविष्टियों" को प्रतिस्थापित किया जायेगा।

5. धारा 35 में - शब्द “ अभिलेख" के लिए सभी स्थानों पर जहाँ पर प्रयुक्त हैं के लिए " अभिलेख या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

6. धारा 39 के पश्चात् निम्न धारा प्रतिस्थापित की जायेगी- 

कौन साक्ष्य दिया जायेगा जब वार्तालाप 34 दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, पुस्तिका अथवा पत्रों की आवली अथवा कागजातों का स्वरूप कथन के रूप में हो - जब किसी कथन जिसका साक्ष्य दिया जाता है। कथन अथवा वार्तालाप का विस्तृत स्वरूप हो अथवा अलग-अलग दस्तावेज का भाग हो अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के भाग में अन्तर्विष्ट हैं अथवा, पत्रों या कागजातों की आवली का भाग हो तब इस प्रकार दिया गया साक्ष्य, कथन, वार्तालाप दस्तावेज इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, पुस्तिका अथवा पत्रों की आवली अथवा कागजात जिन्हें न्यायालय उस विशिष्ट मामले की प्रकृति और कथन का प्रभाव और कथन का प्रभाव .. और परिस्थितियाँ जिनमें ये किये गये को समझने के लिए आवश्यक समझता हैं में किये गये कथन से अधिक नहीं हैं।

7. धारा 47 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी

47. (अ) डिजिटल हस्ताक्षर के बारे में राय कब सुसंगत हैं-जब न्यायालय किसी व्यक्ति के डिजिटल हस्ताक्षर के बारे में राय बनाना चाहता है डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करने वाले प्रमाणन प्राधिकारी की रायें सुसंगत तथ्य हैं।

8. धारा 59 में - शब्दों “दस्तावेजों की अन्तर्वस्तुयें" के लिए शब्दों “दस्तावेजों या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की अन्तर्वस्तुओं" को प्रतिस्थापित किया जायेगा ।

9. धारा 65 के पश्चात् निम्न को अन्तः स्थापित किया जायेगा-

65. (अ) इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख से सम्बन्धित साक्ष्य के लिए विशेष उपबन्ध - इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तुयें धारा 65-ब, के उपबन्धों के अनुसार साबित की जा सकेंगी।

65. (ब) इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की ग्राह्यता - (1) इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में अन्तर्विष्ट कोई सूचना जो कि कागज पर मुद्रित, अभिलिखित है, आप्टिकल की प्रतियाँ अथवा ( एतस्मिनपश्चात् कम्प्यूटर आउटपुट के रूप में निर्दिष्ट) कम्प्यूटर द्वारा पेश मैग्नेटिक मीडिया हों भी दस्तावेज समझे जायेंगे यदि इस धारा में अन्तर्विष्ट शर्तें सूचना के सम्बन्ध में सन्तोषजनक हैं और कम्प्यूटर प्रश्नगत है तो ये अतिरिक्त सबूत या मूल के पेश किये बिना ही मूल की अन्तर्वस्तु अथवा उसमें कथित तथ्य जिनका प्रत्यक्ष साक्ष्य ग्राह्य होगा किसी कार्यवाही में ग्राह्य होंगे।

(2) कम्प्यूटर आउटपुट के सम्बन्ध में उपधारा (1) में निर्दिष्ट शर्तें निम्नलिखित होंगी 
(क) उस अवधि के दौरान जब कम्प्यूटर नियमित रूप से उपयोग में लाया गया था कम्प्यूटर द्वारा सूचना अन्तर्विष्ट करने वाला पेश किया गया कम्प्यूटर आउटपुट रखा जायेगा अथवा उस अवधि के दौरान कम्प्यूटर के उपयोग पर विधिपूर्ण प्राधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा नियमित रूप से की गयी कार्यवाहियों के प्रयोजन के लिए सूचना की प्रक्रिया होगी;

(ख) कथित अवधि के दौरान सूचना के वर्ग को इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में अथवा कथित कार्यवाहियों के सामान्य अनुक्रम में कम्प्यूटर द्वारा नियमित रूप से अन्तर्विष्ट की गयी सूचना के रूप में अन्तर्विष्ट होती है;

(ग) कथित अवधि जिसके दौरान कम्प्यूटर उचित तरीके से संचालित किया गया था तात्विक भाग अथवा यदि ऐसा नहीं है तो तब किसी अवधि के सम्बन्ध में जब यह उचित तरीके से संचालित नहीं किया गया था अथवा उस अवधि के किसी भाग में संक्रिया से परे था इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड अथवा अन्तर्वस्तु की शुद्धता के रूप में प्रभावी नहीं था ।

(घ) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड में अन्तर्विष्ट सूचना पुनः पेश की जाती है अथवा कथित कार्यवाहियों के सामान्य अनुक्रम में कम्प्यूटर में फेड ऐसी सूचना का स्वरूप होती है। 
(3) जहाँ किसी अवधि में संचयन की कार्यवाही अथवा किसी कार्यवाही के प्रयोजन के लिए दी गयी सूचना उपधारा (2) के खण्ड (क) में अन्तर्विष्ट नियमित कार्यवाहियाँ कम्प्यूटर द्वारा नियमित रूप से पालन की गयी थी चाहे-

(क) उप सम्पूर्ण अवधि में कम्प्यूटर के संचालन के संयोग द्वारा; अथवा 
(ख) उस सम्पूर्ण अवधि में विभिन्न कम्प्यूटरों के संचालन के क्रम में; अथवा 
(ग) उस अवधि में कम्प्यूटर के विभिन्न संयोगों; अथवा
(घ) उस अवधि के दौरान पश्चात्वर्ती संक्रिया अन्तर्विष्ट करने वाले किसी ढंग जो कि एक या अधिक कम्प्यूटरों के क्रम अथवा एक या अधिक कम्प्यूटरों के संयोग के क्रम में हों, उस अवधि के दौरान प्रयुक्त सभी कम्प्यूटर इस धारा के प्रयोजन के लिए एकल कम्प्यूटर गठित करने वाले के रूप व्यवहृत किये जायेंगे और इस धारा के संदर्भ में कम्प्यूटरों.. को तद्नुसार व्याख्या की जायेगी।

(4) किसी कार्यवाही में जहाँ इस धारा के आधार पर साक्ष्य में किसी कथन का दिया जाना इच्छित है निम्न चीजों को करने वाला कोई प्रमाण पत्र - 

(क) कथन को अन्तर्विष्ट करने वाला इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और जिसमें यह पेश किया गया था उसे वर्णित करने वाले ढंग के प्रमाणन; 

(ख) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के पेश किये जाने में अन्तर्गस्त युक्ति की ऐसी विशिष्टियाँ देमा जो यह दर्शित करने के प्रयोजन के लिए कि इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड कम्प्यूटर द्वारा पेश किया गया था के लिए पर्याप्त हो सकेंगी;

(ग) किसी मामले जिनकी शर्तें उपधारा (2) में वर्णित होंगी और सुसंगत युक्ति की संक्रिया के सम्बन्ध में युक्तियुक्त पदीय स्थित धारण करने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित होंगी अथवा सुसंगत कार्यवाहियाँ (जो कि समुचित) होंगी प्रमाणपत्र में कथित मामले के सम्बन्ध में साक्ष्य होंगी और इस उपधारा के प्रयोजन के लिए इसे करने वाले व्यक्ति द्वारा मार्मले के कथन के लिए अच्छे ज्ञान और विश्वास के लिए पर्याप्त होगा । 

( 5 ) इस धारा के प्रयोजन के लिए-

(क) सूचना कम्प्यूटर को दिये जाने के पश्चात् ली जायेगी यदि यह उचित स्वरूप में दी गयी है और यह उचित स्वरूप में दी गयी है और चाहे यह प्रत्यक्ष रूप से (मानव हस्तक्षेप के सहित या रहित) उचित उपस्कर द्वारा दी गयी है; 

(ख) किसी पदीय कार्यवाहियों के अनुक्रम में यदि सूचना कम्प्यूटर द्वारा की उन कार्यवाहियों के अनुक्रम में भण्डारित या धारित करने के प्रयोजन से दी जाती है और उन कार्यवाहियों से भिन्न क्रियाशील की जाती है तो यदि वह सूचना कम्प्यूटर को सम्यक् रूप में आपूर्ति की गयी है तो वह उन कार्यवाहियों के अनुक्रम में आपूर्ति की गयी समझी जायेगी;

(ग) कम्प्यूटर आउटपुट कम्प्यूटर द्वारा किया जायेगा चाहे यह इसके द्वारा प्रत्यक्ष अथवा (मानव हस्तक्षेप के सहित या रहित) समुचित उपस्कर द्वारा दी गयी हो । 

स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए सूचना से सम्बन्धित कोई निर्देश इस निर्देश के सम्बन्धित अन्य सूचना से क्रियाशील होगी। 

10. धारा 67 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी -

67. (अ) डिजिटल हस्ताक्षर का सबूत - सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर के सिवाय यदि किसी उपभोक्ता का डिजिटल हस्ताक्षर इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख पर किया जाता है तो तथ्य यह है कि ऐसा डिजिटल हस्ताक्षर उपभोक्ता का डिजिटल हस्ताक्षर है आवश्यक रूप से साबित किया जायेगा ।

11. धारा 73 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी- 

(अ) डिजिटल हस्ताक्षर के सत्यापन का सबूत - यह अभिनिश्चित करने के क्रम में कि डिजिटल हस्ताक्षर उस व्यक्ति के हैं जिसके द्वारा किया जाना तात्पर्यित है तो न्यायालय निदेश कर सकेगी कि—

(क) वह व्यक्ति अथवा कन्ट्रोलर अथवा प्रमाणन प्राधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर पेश करें; 

(ख) कोई अन्य व्यक्ति डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध लोक कुंजी के लिए आवेदन करेगा और उस व्यक्ति द्वारा तात्पर्यित डिजिटल हस्ताक्षर को सत्यापित करेगा । 

स्पष्टीकरण—इस धारा के प्रयोजन के लिए कन्ट्रोलर से आशय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त कन्ट्रोलर 17 से है।

12. धारा 81 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी- 

81. (अ) इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में गजट के बारे में उपधारणा -- न्यायालय हर ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा जिसका शासकीय गजट या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड जिसका किसी व्यक्ति द्वारा किसी विधि के निदेश में रखा जाना तात्पर्यित है यदि ऐसा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड विधि द्वारा अपेक्षित पश्चात्वर्ती स्वरूप में रखा जाता है और उचित - अभिरक्षा से पेश किया जाता है

13. धारा 85 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी- 

85. (अ) इलेक्ट्रॉनिक करारों के बारे में उपधारणा-

न्यायालय उपधारित कर सकेगा कि प्रत्येक इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख पक्षकारों को डिजिटल हस्ताक्षर अन्तर्विष्ट करने वाले करार के रूप में तात्पर्यित है जो पक्षकारों के हस्ताक्षर किये जाने के द्वारा किया गया था ।

85. (ब) इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों और डिजिटल हस्ताक्षरों के बारे में उपधारणा- 

(1) सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में अन्तग्रस्त किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में जब तक प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता न्यायालय उपधारित करेगा कि सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख विशिष्ट समय बिन्दु जो कि सुरक्षित स्तर से सम्बन्धित है तक परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। 

(2) डिजिटल हस्ताक्षर अन्तग्रस्त करने वाली किसी कार्यवाही में जब तक प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता न्यायालय उपधारित करेगी कि -

(क) उपभोक्ता द्वारा सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के साबित करने और हस्ताक्षर करने के प्रयोजन से किया जाता है,

(ख) सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर के सिवाय इस धारा की कोई भी बात इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख अथवा डिजिटल हस्ताक्षर की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता से सम्बन्धित नहीं है।

85. (स) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र के बारे में उपधारणा - जब तक कि प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता न्यायालय यह उपधारित करेगा कि उपभोक्ता की सूचना के रूप में विनिर्दिष्ट सूचना जो कि सत्यापित नहीं है के सिवाय डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध सूचना सही है यदि प्रमाण पत्र उपभोक्ता द्वारा स्वीकार किया गया था ।

14. धारा 88 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी- 
88. (अ) इलेक्ट्रॉनिक सन्देश के रूप में उपधारणा- न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि उत्पादक द्वारा इलेक्ट्रॉनिक मेलसरवेयर के माध्यम से सम्बोधिती जिसे सन्देश पारेषण के लिए उसके कम्प्यूटर में फेड सन्देश के समवर्ती सम्बोधिती होना तात्पर्यित है इलेक्ट्रॉनिक सन्देश द्वारा भेजा गया था लेकिन न्यायालय उस व्यक्ति के बारे में जिसे ऐसा सन्देश भेजा गया था कोई उपधारणा नहीं करेगा।

स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए अभिव्यक्ति "सम्बोधिती" और "उत्पादक' " सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (b) और (Za) में समनुदेशन के सम्बन्ध में समान अर्थ रखते हैं ।

15. धारा 90 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी - 
90. (अ) पाँच वर्ष पुराने दस्तावेज के रूप में उपधारणा- जहाँ कोई इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख पाँच वर्ष पुराने दस्तावेज के रूप में साबित और तात्पर्पित है, और किसी की अभिरक्षा से पेश किया जाता है, जिसे न्यायालय विशिष्ट मामले में उचित विचारित करता है तो न्यायालय उपधारित कर सेगा कि डिजिटल हस्ताक्षर जो कि किसी विशिष्ट को डिजिटल हस्ताक्षर के रूप में तात्पयित है वह उसके या उसके या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किया गया था ।

स्पष्टीकरण- इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख उचित अभिरक्षा में कहा जाता है यदि वे ऐसे सथान और ऐसे व्यक्ति जिसके वे हैं की देख-रेख में है। लेकिन कोई अभिरक्षा अनुचित नहीं है यदि इसकी उत्पत्ति वैध साबित है अथवा मामले की विशिष्ट परिस्थितियों में ऐसी उत्पत्ति सम्भाव्य है;

यह स्पष्टीकरण धारा 81 क को भी लागू होता है । 

16. धारा 131 के लिए निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी

131. उन दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों का पेश किया जाना जिन्हें कोई दूसरा व्यक्ति जिन पर उसका कब्जा है पेश करने से इन्कार कर सकता था— कोई भी व्यक्ति अपने कब्जे ऐसे दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को पेश करने के लिए जिनको पेश करने से कोई अन्य व्यक्ति से यदि उसके कब्जे में होती इंकार करने का हकदार होता विवश नहीं किया जायेगा जब तक कि ऐसा अंतिम वर्णित व्यक्ति उनके पेश कारण की सम्मति नहीं देता ।

अनुसूची III (धारा 93 देखें)

बैंकर्स पुस्तिका साक्ष्य अधिनियम, 1891 में संशोधन 

1. धारा 2 में 

(क) खण्ड 3 के लिए निम्न खण्ड अन्तः स्थापित किया जायेगा -

(3) "बैंकर्स पुस्तिका " खाता बही, डे पुस्तिका, कैश पुस्तिका, खाता पुस्तिका और अन्य सभी पुस्तिकाओं जो कि बैंक के कारबार के सामान्य अनुक्रम में प्रयुक्त की जाती है चाहे वे लिखित रूप में रखी गयी हो चाहे वे फ्लोपी में भण्डारित विवरण के मुद्रण के रूप में हो, या डिस्क, टेप अथवा इलेक्ट्रॉनिक भण्डारित किसी अन्य रूप में हो को सम्मिलित करता है;

(ख) खण्ड 8 के लिए निम्न खण्ड प्रतिस्थापित किया जायेगा- “ 

(8) लिखित रूप में वर्णित है"

(क) ऐसी पुसतिकाओं में किसी प्रविष्टि प्रति जो ऐसी प्रति के याद पर लिखित प्रमाण पत्र के साथ है ऐसी प्रविष्टि की सत्य प्रतिलिपि है यह कि ऐसी प्रविष्टि बैंक की सामान्य पुस्तिकाओं में से एक में अन्तर्विष्ट है और कारबार के सामान्य अनुक्रम में की गयी है और कि ऐसी पुस्तिका बैंक के कब्जे में है और जहाँ कि प्रति मेकेनिकल अथवा अन्य प्रक्रियाओं द्वारा जो स्वयं ही प्रति की शुद्धता सुनिश्चित करती है प्राप्त की गयी है, उस प्रभाव का अग्रिम प्रमाण पत्र है लेकिन जहाँ कि पुस्तिका जिससे ऐसी प्रति तैयारी की गयी थी ऐसी प्रति के तैयार किये जाने के पश्चात् बैंक के कारबार के कारबार के सामान्य अनुक्रम में नष्ट हो गयी है उस प्रभाव का अग्रिम प्रमाण पत्र है जो कि दिनांकित है और बैंक के मुख्य खाता पालक अथवा प्रबन्धक द्वारा अपने नाम से और पदीय रूप में हस्ताक्षरित किया गया है,

(ख) फ्लोपी डिस्क, टेप अथवा किसी अन्य इलेक्ट्रोमैग्निटिक डाटा में भण्ड 'युक्ति से मुद्रित है ऐसी प्रविष्टि का मुद्रण तथा ऐसे प्रिन्ट की प्रति जो धारा 2- अ के उपबन्धों के अनुसार प्रमाणित ऐसे कथन के साथ है।

2. धारा 2 के पश्चात् निम्न को अन्तः स्थापित किया जायेगा-

2. (अ) मुद्रण की शर्तें - प्रविष्टि का मुद्रण अथवा धारा 2 की उपधारा 8 में निर्दिष्ट मुद्रण की प्रति निम्न के साथ होंगी-

(क) इस प्रभाव के प्रमाण पत्र के साथ कि यह ऐसी प्रविष्टि का मुद्रण है अथवा मुख्य खाता पालक अथवा शाखा प्रबन्धक द्वारा ऐसे मुद्रण की प्रति है; 

(ख) कम्प्यूटर तंत्र भारसाधक द्वारा कम्प्यूटर तंत्र के संक्षिप्त विवरण अन्तर्विष्ट करने वाले प्रमाण पत्र और विशिष्टियों-

(क) कम्प्यूटर द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए कि आँकड़े ग्रहण किये गये हों सुरक्षा अंगीकृत की गयी है अथवा अन्य संक्रियाओं का पालन केवल प्राधिकृत व्यक्तियों द्वारा किया गया है ।

(ख) आँकड़े का अप्राधिकृत परिवर्तन रोकने के लिए सुरक्षा अंगीकार की गयी है; 

(ग) आँकड़े में कम बद्धता की असफलता अथवा अन्य कारणों से जो हानि हो गयी थी उनके पुनः प्राप्ति के लिए सुरक्षा;

(घ) ढंग जिसमें आँकड़े;

(ङ) यह सुनिश्चित करने के क्रम में सत्यापन का तरीका कि आँकड़े शुद्ध रूप ऐसे माध्यम हटाये गये;

(च) ऐसे भण्डारित आँकड़े की पहचान का ढंग; 

(छ) ऐसी युक्ति के भण्डारण और अभिरक्षा के लिए व्यवस्थापन;

(ज) तंत्र के साथ छेड़छाड़ के दोष को निवारित करने की सुरक्षा; 

(झ) कोई अन्य चीजें जो कि तंत्र की यथार्थता और विश्वसनीयता के लिए सत्य प्रमाणित होगी;

(ग) कम्प्यूटर तंत्र के भारसाधक व्यक्ति अग्रिम प्रमाण पत्र इस प्रभाव के लिए कि उसके अच्छे ज्ञान और विश्वास के साथ, ऐसा कम्प्यूटर सिस्टम तात्विक समय पर उचित तरीके से क्रियाशील किया गया उसने सभी सुसंगत आँकड़े उपलब्ध कराये और प्रश्नगत प्रिन्ट को सही ढंग से प्रस्तुत किया अथवा सुसंगत आँकड़े से समुचित तरीके से चलाया गया।

अनुसूची IV (धारा 94 देखें)

रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया अधिनियम, 1934 में संशोधन

रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया, अधिनियम, 1934 की धारा 58 की उपधारा (2) में खण्ड (p) के पश्चात् निम्न् अन्तः स्थापित किया जायेगा— 

"(pp) निधि का विनियम इलेक्ट्रॉनिक साधनों के माध्यम से बैंक से बैंक को और धारा 45 (1) के खण्ड (c) निर्दिष्ट अन्य वित्तीय संस्थाओं को अभिलिखित ऐसी शर्तों पर जिस पर बैंक या अन्य वित्तीय संस्थायें निधि के ऐसे स्थानान्तर में भाग लेंगी। ऐसी निधि के स्थानान्तरण का ढंग और अधिकार और दायित्व ऐसे निधि के स्थानान्तरण में होगा।”

The Information Technology Act, 2000

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 
(The Information Technology Act, 2000)

(i) डिजिटल हस्ताक्षर

(ii) इलेक्ट्रॉनिक नियन्त्रण

(iii) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण-पत्र 

(iv) उपभोक्ता के कर्तव्य 

(v) साइबर विनिमय अपीलीय अधिकरण 

भारत गणराज्य के इक्यानवें वर्ष में संसद द्वारा यह अधिनियमित हो-

अध्याय 1: प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार प्रारम्भ और लागू होना-

(1) यह अधिनियम सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 कहा जायेगा ।

(2) इसका विस्तार इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर होगा यह किसी अधिनियम, किसी व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर किये गये अपराध अथवा उल्लंघन के सम्बन्ध में भी लागू होगा।

(3) इस केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित तथा नियत ऐसी तिथि को लागू होगा और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिए भिन्न-भिन्न तारीख नियत की जा सकती है और इस अधिनियम के उपबन्धों के संदर्भ में यह माना जायेगा कि वह उस प्रावधान के प्रारम्भ के संदर्भ में बनाया गया था

(4) इस अधिनियम की कोई भी बात- 

3. [(क)] परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) की धारा 13 में परिभाषित परक्राम्य लिखत (चेक से अन्य); 

(ख) मुख्तार नाभा अधिनियम, 1882 (1882 का 7) की धारा 1-4 में परिभाषित मुख्तार नामा;

(ग) भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) की धारा 3 में परिभाषित न्यासः

(घ) किसी भी अन्य नाम से पुकारे जाने वाले अन्य वसीयती कथनों के सहित भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 ( 1925 का 39) की धारा 2 के खण्ड (h) में परिभाषित वसीयत;

(ङ) विक्रय की किसी संविदा अथवा किसी अचल सम्पत्ति अथवा ऐसी सम्पत्ति के किसी हित के अभिहस्तान्तरण; 

(च) केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किये जा सकने वाले ऐसे किसी दस्तावेजों अथवा संव्यवहारों को लागू नहीं होगा।

2. परिभाषायें - (1) इस अधिनियम में जब तक अन्यथा संदर्भित, अपेक्षित न हो-

(क) “पहुँच" अपने व्याकरणीय, भिन्नता और समान अभिव्यक्ति के साथ इसका अर्थ है, कम्प्यूटर, कम्प्यूटर व्यवस्था अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क के, लाजिकल, अर्थमेटिकल, मेमोरी फंक्शन, स्त्रोतों में प्रवेश करना निर्देशित करना अथवा संसूचित करना है;

ख) "सम्बोधित" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड का ओरिजेनेटर है लेकिन इसमें कोई मध्यवर्ती शामिल नहीं है;

(ग) “न्याय निर्णयन करने वाले अधिकारी” से अभिप्रेत है धारा 46 की उपधारा के अधीन नियुक्त न्याय करने वाला अधिकारी; 

(घ) “अंकीय हस्ताक्षर अपने व्याकरणीय भिन्नता”, समानभावों के सहित अर्थ है, (1) डिजिटल हस्ताक्षर के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक रिकार्डों को प्रमाणीकरण के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति द्वारा प्रक्रिया अथवा ढंग के अंगीकृत किये जाने से है । 

(ङ) समुचित सरकार से अभिप्रेत हैं किसी मामले के सम्बन्ध में-
(i) संविधान की सातवीं अनुसूची की दूसरी सूची में उल्लिखित सरकार से है;

(ii) संविधान की सातवीं अनुसूची की तीसरी सूची में अधिनियम किसी राज्य की विधि के सम्बन्ध में, राज्य सरकार और अन्य मामलों में केन्द्रीय सरकार;

(च) “एसाइमेट्रिक किष्टो सिस्टम" से अभिप्रेत है डिजिटल हस्ताक्षर और डिजिटल हस्ताक्षर को सत्यापित करने वाली लोक कुंजी को सृजित करने वाली प्राइवेट कुंजी से बनी हुई सुरक्षित कुंजी के जोड़ों की व्यवस्था,

(छ) “प्रमाणन प्राधिकारी” से अभिप्रेत है ऐसा व्यक्ति जो कि धारा 24 के अधीन डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करने के लिए अनुज्ञप्ति प्रदान करना है; 

(ज) “प्रमाणन अभ्यास" कथन से अभिप्रेत है डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र के जारी करने में प्रमाण प्राधिकारी के कर्मचारी द्वारा अभ्यास के उल्लेख के लिए प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा जारी किये गये कथन से है;

(झ) “कम्प्यूटर" से अभिप्रेत है, कोई इलेक्ट्रॉनिक, मैग्नेटिक आप्टिकल अथवा अन्य किसी युक्ति की प्रगति अथवा व्यवसथा जो कि तार्किक, अर्थमेटिकल यादगार कार्यों को इलेक्ट्रॉनिक, मैग्नेटिक आप्टिकल इम्प्यूलस और सभी इनपुट आउटपुट, प्रगति भण्डारण कम्प्यूटर साफ्टवेयर, संसूचना सुविधा के सहित जो कि कम्प्यूटर व्यवस्था अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क से कम्प्यूटर से संपृक्त अथवा सम्बन्धित है के कुशल प्रबन्ध द्वारा पालन करता है;

(ञ) "कम्प्यूटर नेटवर्क" से अभिप्रेत है-

(i) सेटेलाइट, माइक्रोवेव, टेरिस्ट्रियल लाइन अथवा अन्य संसूचना साधन के प्रयोग, और

(ii) टर्मिनल अथवा आपस में जुड़े हुए दो या दो से अधिक कम्प्यूटर जटिलता चाहे यह लगातार जुड़े हुए हों अथवा नहीं के माध्यम से आपस में जुड़े हुए दो या दो से अधिक कम्प्यूटरों से है । 

(ट) “कम्प्यूटर स्त्रोत" से अभिप्रेत है, कम्प्यूटर, कम्प्यूटर व्यवस्था नेटवर्क, विवरण, कम्प्यूटर डेटाबेस अथवा साफ्टवेयर से है; 

(ठ) “कम्प्यूटर पद्धति” से अभिप्रेत है, ऐसी युक्ति के एकत्रण इनपुट और आउटपुट के सहित और संगणन को छोड़कर जो कि प्रोग्राम के लायक नहीं है और बाहरी फाइल के साथ प्रयुक्त नहीं किये जा सकते हैं जिसके अन्तर्गत कम्प्यूटर प्रोग्राम, इलेक्ट्रॉनिक निदेश इनपुट डाटा तथा आउटपुट डाटा सम्मिलित होता है जो कि तर्क, अंकाणिक, डाटा भण्डारण एवं पुनर्स्थापन एवं संसूचना नियंत्रण तथा अन्य कार्य सम्मिलित है; 

(ड) “नियंत्रक” से अभिप्रेत है धारा 17 की उपधारा 1 के अधीन नियुक्त प्रमाणन प्राधिकारियों के कन्टोलर से है;

(ढ़) “साइबर अपीलीय अधिकरण" से अभिप्रेत है धारा 48 की उपधारा 1 के अधीन स्थापित साइबर विनियमन अपीलीय अधिकरण;

(ण) “आँकड़ा (डाटा)" से अभिप्रेत है, ऐसी सूचना, ज्ञान, तथ्य अवधारणा निर्देश जो कि तैयार किये गये हैं, तैयारी के क्रम में हैं, और कम्प्यूटर तंत्र अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क की प्रगति की प्रक्रिया से आशयित है और जो कि कम्प्यूटर प्रिन्टर्स मेग्नेटिक, आप्टिकल स्टोरेज पंच्ड कार्ड पंच्ड टाइप (के सहित) कम्प्यूटर की याददाशत प्रतिसेधित्व करते हैं;

(त) “डिजिटल हस्ताक्षर” से अभिप्रेत है, किसी उपभोक्ता द्वारा किसी इलेक्ट्रॉनिक तरीके अथवा धारा 3 के उपबन्धों की प्रक्रिया के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड का प्रमाणीकरण; 

(थ) “डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र" से अभिप्रेत है धारा 35 की उपधारा 4 के अधीन जारी डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र;

(द) “सूचना के संदर्भ में इलेक्ट्रॉनिक फार्म" से अभिप्रेत है, कोई सूचना उत्पन्न करना, भेजना, प्राप्त करना या किसी चुम्बकीय, प्रकाशीय, कम्प्यूटर याददाशत, माइक्रोफिल्म, माइक्रोफिच या उसी तरह की अन्य युक्ति द्वारा कम्प्यूटर को संचालित करना; 

(ध) “इलेक्ट्रॉनिक गजट” से अभिप्रेत है इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में प्रकाशित आफिसियल गजट;

(न) "इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख " से अभिप्रेत है, ऐसा आँकड़ा, अभिलेख उत्पन्न आँकड़े प्रतिबिम्ब या आवाज का भण्डारण अथवा प्राप्त करना अथवा किसी इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप, अथवा माइक्रो फिल्म अथवा कम्प्यूटर संचालित माइक्रो फिच का भेजना;

(प) "कम्प्यूटर के सम्बन्ध में कार्य”, तर्क, नियंत्रण गणितीय प्रक्रिया, समापन, भण्डारण और पुनः प्राप्ति और संसूचना, दूर संचार अथवा कम्प्यूटर को सम्मिलित करता है; 

(फ) "सूचना”, आँकड़े मूल प्रति, प्रतिबिम्ब, ध्वनि स्वर संहिता कम्प्यूटर कार्यक्रम, सॉफ्टवेयर और अंक आधार सूक्ष्म-परत या कम्प्यूटर निर्मित परतों को सम्मिलित करती है;

(व) "किसी विशिष्ट इलेक्ट्रॉनिक संदेश के सम्बन्ध में मध्यस्थ" से आशय व्यक्ति जो किसी उस संदेश को भंडारित अथवा पारेषित करता है अथवा कोई सेवा उपलब्ध कराता है; 

(भ) "कुंजी जोड़ा” असमरूप गुप्त तंत्र से आशय एक व्यक्तिगत तंत्र और उसकी सम्बन्धित गणितीय कुंजी जो कि इस प्रकार सम्बन्धित है कि लोक कुंजी व्यक्तिगत कुंजी द्वारा सृजित डिजिटल हस्ताक्षर को सत्यापित कर सके;

(म) "विधि" संसद अथवा राज्य विधान मण्डल, राष्ट्रपति, राज्यपाल द्वारा जारी अधिसूचना और जैसी भी दशा हो सकेगी अनुच्छेद 240 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा बनाये गये विनियमों, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 357 के खण्ड के उपखण्ड अ के अधीन राष्ट्रपति द्वारा अधिनियमित बिलों, विनियमों और उनके अधीन बनाये गये और जारी किये ये आदेशों को समाहित करती है; 

(य) “अनुज्ञप्ति ” से अभिप्रेत है धारा 24 के अधीन प्रमाणन प्राधिकारी के लिए स्वीकृत अनुज्ञप्ति; 

(य-क) “उत्पादक” से अभिप्रेत है ऐसा व्यक्ति जो किसी इलेक्ट्रॉनिक सन्देश को भेजता है, उत्पन्न भण्डारित अथवा पारेषित करता है अथवा किसी इलेक्ट्रॉनिक संदेह को किसी अन्य व्यक्ति को भेजना, उत्पन्न करना, भण्डारित करना, पारेषित करना कारित करता है लेकिन इसमें कोई मध्यस्थ सम्मिलित नहीं होता है;

(य-ख) "विहित" से अभिप्रेत है इस अधिनियम के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा "विहित"; 

(य-ग) “व्यक्तिगत कुंजी” से अभिप्रेत है डिजिटल हस्ताक्षर सृजित करने में प्रयुक्त कुंजी जोड़े की कुंजी;

य-घ) “लोक कुंजी” से अभिप्रेत है डिजिटल हस्ताक्षर के सत्यापन और डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र को सूचीबद्ध करने में प्रयुक्त कुंजी जोड़े की कुंजी; 

(य-ड) “सुरक्षित तंत्र" से अभिप्रेत है कम्प्यूटर हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और प्रक्रिया जो कि 

(क) अप्राधिकृत पहुँच और दुरुपयोग से युक्तियुक्त रूप से सुरक्षित है; 

(ख) जो कि संक्रिया की शुद्धता, विश्वसनीयता के स्तर को युक्तियुक्त रूप से उपबन्धित करती है;

(ग) जो कि आशयित कार्यों के पालन को युक्तियुक्त रूप से अनुकूलन बनाती है;

(घ) सुरक्षित प्रक्रिया को साधारणतया स्वीकार करती है; 

(य-च) “सुरक्षित प्रक्रिया" से अभिप्रेत है, धारा 16 के अधीन केन्द्र सरकार द्वारा विहित प्रक्रिया; 

(य-छ) “उपभोक्ता” से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसके नाम डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी किया जाता है;

(य-ज) “सत्यापन” डिजिटल हस्ताक्षर, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख लोक कुंजी और इनकी गणितीय भिन्नता और समान अभिव्यक्तियों के सम्बन्ध में सत्यापन के आशय यह अभिनिश्चित करना है कि-

(क) आरम्भिक इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख डिजिटल हस्ताक्षर के साथ उपभोक्ता की लोक कुंजी के सहित व्यक्तिगत कुंजी के प्रयोग द्वारा चिपकाया गया था । 

(ख) आरम्भिक इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख वास्तव में प्रतिधारित है अथवा ऐसा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख जो डिजिटल हस्ताक्षर के साथ इस प्रकार चिपकाया गया या परिवर्तित किया गया है।

(2) इस अधिनियम के संदर्भ में किसी अधिनियम अथवा उसके कोई उपबन्ध किसी ऐसे क्षेत्र के सम्बन्ध में होंगे जिसके लिए ऐसा अधिनियम अथवा ऐसा उपबन्ध लागू नहीं है, समवर्ती विधि अथवा समवर्ती विधि से सम्बन्धित सुसंगत उपबन्धों यदि कोई उस क्षेत्र के लिए लागू हो के सन्दर्भ में निर्मित होगा ।

डिजिटल हस्ताक्षर

3. इलेक्ट्रॉनिक, अभिलेखों का प्रमाणीकरण-

1. इस धारा के उपबन्धों के सम्बन्ध में कोई उपभोक्ता अपने डिजिटल हस्ताक्षर करने के द्वारा किसी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को प्रमाणित कर सकेगा ।

2. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का प्रमाणीकरण असमरूप गुप्त तंत्र और हैश कार्यों जो कि आरम्भिक इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को अन्य इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख से आवृत्त करता है या परिवर्तित करता है कि प्रयोग द्वारा प्रभावी होगा ।

स्पष्टीकरण- इस उपधारा के प्रयोजन के लिए " हैश कार्य” से आशय किसी एल्गोरियम मैपिंग अथवा किसी क्रम को अन्य क्रम में अनुवादित करता है अथवा साधारणतया छोटा है है परिणाम के नाम से जाना जाता है इस प्रकार कि कोई इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख प्रत्येक समय ऐसा हैरा परिणाम पैदा करता है एल्गोरिथ्म उसी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख जैसा कि इसका इनपुट आंकलन करता है से निर्मित होता है। 

(क) एल्गोरिथ्म द्वारा पेश किये गये हैश परिणाम से मूल इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख प्राप्त करता है अथवा पुननिर्मित करता है ।

(ख) दो इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख एल्गोरिथ्म के प्रयोग द्वारा हैश परिणाम को पेश कर सकते हैं।

3) कोई व्यक्ति उपभोक्ता की लोक कुंजी के प्रयोग द्वारा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को सत्यापित कर सकता है। 

(4) व्यक्तिगत कुंजी और लोक कुंजी उपभोक्ता की अनुपम है और कार्यकारी कुंजी जोड़ा को निर्मित करती है।

इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण

4. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की विधि मान्यता-

जहाँ कोई विधि यह उपबन्ध करती है कि सूचना और अन्य मामले लिखित रूप में अथवा टाइप में अथवा मुद्रित रूप में होंगे तब ऐसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए ऐसी अपेक्षा सन्तोषजनक समझी जायेगी यदि ऐसी सूचना या अन्य मामले-

(क) किसी इलेक्ट्रॉनिक रूप में बनाये गये हैं अथवा उपलब्ध हैं; 

(ख) पश्चातवर्ती संदर्भ विषय के प्रयोग के लिए सुगम हैं।

5. डिजिटल हस्ताक्षरों की विधिक मान्यता-

जहाँ कोई विधि यह उपबन्धित करती है कि कोई इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख या अन्य मामले हस्ताक्षर के किये जाने के द्वारा प्रमाणित होंगे अथवा कोई दस्तावेज हस्ताक्षरित किया जाना चाहिए अथवा उस पर किसी व्यक्ति का हस्ताक्षर होना चाहिए तब इस विधि में किसी बात के होते हुए भी ऐसी अपेक्षा सन्तोषजनक समझी जायेंगी यदि ऐसी सूचना अथवा मामले केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किये जा सकने वाले ढंग से हस्ताक्षर किये जाने के द्वारा प्रमाणीकृत किये जाते हैं।

स्पष्टीकरण - इस धारा के लिए "हस्ताक्षर "

अपनी व्याकरणीय भिन्नता और समान अभिव्यक्ति के सहित किसी दस्तावेज पर किसी व्यक्ति के हस्तलेख में हस्ताक्षर करने के द्वारा, सम्बन्ध में होंगे और अभिव्यक्ति हस्ताक्षर तद्नुसार निर्मित की गयी कही जायेगी ।

6. सरकार और इसके अभिकरणों में इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और डिजिटल हस्ताक्षर का प्रयोग - (1) जहाँ कोई विधि—

(क) किसी फार्म, आवेदन, अथवा किसी अन्य दस्तावेज के किसी कार्यालय प्राधिकारी, निकाय अथवा समुचित सरकार द्वारा नियंत्रित या धारित किसी अभिकरण में विहित ढंग से फाइल करने; 

(ख) विशिष्ट ढंग के नामों से पुकारे जाने वाले के अनुमोदन और मंजूरी से किसी अनुज्ञप्ति के दिये जाने या जारी किये जाने के लिए;

(ग) विशिष्ट ढंग में धन के भुगतान की रसीद प्राप्त करने के लिए उपबन्धित है, तब उस समय प्रवृत्त विधि में किसी बात के होते हुए भी ऐसी अपेक्षा सन्तोषजनक समझी जायेगी यदि ऐसा फाइल किया जाना, जारी अथवा प्राप्त किया जाना समुचित सरकार द्वारा विहित किए जा सकने वाले इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप द्वारा प्रभावित होता है;

(2) समुचित सरकार उपधारा 1 के प्रयोजन के लिए नियमों द्वारा- 

(क) ढंग और आकार जिसमें इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड फाइल, सृजित अथवा जारी किया जा सकेगा; 

(ख) उपखण्ड (क) के अधीन किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड फाइल, सृजित अथवा जारी किये जाने का शुल्क अथवा प्रभार का भुगतान का तरीका विहित कर सकेगी।

7. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों का प्रतिधारण - 1. जहाँ कोई विधि यह उपबन्धित करती है कि दस्तावेज, अभिलेख अथवा सूचना किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए प्रतिधारित की जाए तब वह अपेक्षा सन्तोषजनक समझी जायेगी यदि ऐसा दस्तावेज, अभिलेख, सूचना इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में प्रतिधारित है, यदि - 

(क) उसमें अन्तर्विष्ट सूचना इस प्रकार सुगम है कि पश्चातवर्ती प्रयोजन के लिए उपयुक्त है:

(ख) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड ऐसे आधार में प्रतिधारित है जिनमें यह मूल रूप से उत्पन्न भेजा जाना अथवा प्राप्त किया जाना है अथवा आकार जिसमें यह मूल रूप में उत्पन्न भेजे जाने अथवा किये जाने के लिए प्रदर्शित है; 

(ग) विवरण जो कि उत्पत्ति शन्तव्य पारेषण की तिथि, समय इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में उपलब्ध ऐसे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की प्राप्ति के पहचान को सुगम करेंगे;

परन्तु यह कि यह खण्ड किसी ऐसी सूचना को लागू नहीं होगा जो इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के डिस्पैच अथवा प्राप्त होने के प्रयोजन को समर्थ बनाने के लिए धीरे-धीरे उत्पन्न होती है। 

(2) इस धारा की कोई भी बात किसी निधि जो कि दस्तावेजों, अभिलेखों अथवा सूचनाओं के प्रयोजन के लिए स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त है लागू नहीं होगी 

8. इलेक्ट्रॉनिक गजट में नियमों और विनियमों का प्रकाशन

जहाँ कोई विधि यह उपबन्धित करती है कि कोई नियम, विनियम, आदेश उपनियम अधिसूचना अथवा कोई अन्य मामला किसी आफिशियल गजट में प्रकाशित होगा तब ऐसी अपेक्षा संतोषजनक समझी जायेगी यदि ऐसी नियम, विनियम, आदेश उपनियम अधिसूचना अथवा अन्य मामले आफिशियल शासकीय गजट अथवा इलेक्ट्रॉनिक गजट में प्रकाशित है-

परन्तु यह कि जहाँ कोई नियम, विनियम, आदेश, उपनियम, अधिसूचना अथवा अन्य मामले सरकारी (आफिशियल) गजट अथवा इलेक्ट्रॉनिक गजट में प्रकाशित है प्रकाशन की तिथि गजट की तिथि समझी जायेगी जो कि पहले प्रकाशित की गयी थी । 

9. धारा 6, 7 और 8 यह आग्रह करने का अधिकार नहीं देती है कि दस्तावेज इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में स्वीकार की जानी चाहिए ।

धारा 6, 7 और 8 में ऐसी कोई बात अन्तर्विष्ट नहीं है जो किसी व्यक्ति को यह आग्रह करने का अधिकार देती हो कि केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार का कोई भी मंत्रालय अथवा विभाग अथवा कोई प्राधिकारी निकाय जो कि किसी विधि के अधीन अथवा विधि के द्वारा स्थापित है अथवा केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा स्थापित अथवा नियंत्रित है स्वीकार जारी, सृजित प्रातिधारित किया जाना चाहिए और इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के रूप में है, प्रतिरक्षित किया जाना चाहिए अथवा इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप संव्यवहारों को प्रभावी होना चाहिए।

10. डिजिटल हस्ताक्षर के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार को नियम बनाने की शक्ति - केन्द्र . सरकार इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए नियमों द्वारा -

(क) डिजिटल हस्ताक्षर के प्रकार;

(ख) ढंग और तरीका जिनमें डिजिटल हस्ताक्षर किया जायेगा; 

(ग) ढंग और प्रक्रिया जिसमें डिजिटल हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति की पहचान;

(घ) पर्याप्त विश्वसनीयता और सुरक्षा अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की गोपनीयता भुगतान सुनिश्चित करने वाली नियंत्रण विधि और प्रक्रिया;

(ङ) कोई अन्य मामले जो डिजिटल हस्ताक्षर के प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है ।

इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों का लगाया जाना, अभिस्वीकृति और प्रेषण  

11. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों का लगाया जाना 
कोई इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख अपने मूल रूप में लगाया जायेगा-

(क) यदि यह स्वयं उत्पादक द्वारा भेजा गया था;

(ख) ऐसे व्यक्ति द्वारा जो ऐसे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के सम्बन्ध में उत्पादक की ओर से कार्य करने के लिए प्राधिकृत हैं; 

(ग) किसी सूचना तंत्र कार्यक्रम अथवा उत्पादक की ओर से स्वतः संक्रिया द्वारा ।

12. रसीद की अभिस्वीकृति - (1) जहाँ कि उत्पादक सम्बोधिती से सहमत नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की रसीद की अभिस्वीकृति विशिष्ट रूप में अथवा विशिष्ट ढंग से दी गयी है कोई भी अभिस्वीकृति-

(क) किसी सम्बोधिती, अथवा अन्यथा द्वारा दी गयी संसूचना; अथवा

(ख) सम्बोधिती का ऐसा कोई आचरण जो उत्पादक को इस बात के लिए संकेतित करने के लिए पर्याप्त है कि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख प्राप्त किया गया था ।

(2) जहाँ उत्पादक यह अनुबद्ध करता है कि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख केवल इस इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की अभिस्वीकृत की रसीद पर ही बाध्यकर होगा तब जब तक कि • अभिस्वीकृति इस प्रकार प्राप्त नहीं की जाती यह समझा जायेगा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड उत्पादक द्वारा कभी भेजा नहीं गया हैं ।

(3) जहाँ उत्पादक यह अनुबद्ध नहीं करता है कि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख इसकी अभिस्वीकृति की रसीद पर बाध्यकर होगा और अभिस्वीकृति उत्पादक द्वारा विनिर्दिष्ट, अथवा सहमत समय के भीतर प्राप्त नहीं की गयी है अथवा यदि युक्तियुक्त समय के भीतर कोई समय विनिर्दिष्ट या सहमत नहीं किया गया है तब उत्पादक यह कहते हुए सम्बोधिती को नोटिस दे सकेगा कि उसके द्वारा कोई भी अभिस्वीकृति प्राप्त नहीं की गयी है और वह युक्तियुक्त समय भी विनिर्दिष्ट करेगा जिसके भीतर उसे अवश्य ही अभिस्वीकृति प्राप्त हो जाये यदि उपरोक्त कथित समय के भीतर कोई भी अभिस्वीकृति प्राप्त नहीं की जाती है तो वह सम्बोधिती को नोटिस देने के पश्चात् इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के साथ ऐसा व्यवहार करेगा जैस वह कभी भेजा ही न गया हो ।

13. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के प्रेषण और प्राप्ति का स्थान और समय- 
(1) उत्पादक और सम्बोधिती के बीच सहमति के सिवाय किसी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का प्रेषण तब होगा जब यह उत्पादक की शक्ति के बाहर कम्प्यूटर स्त्रोतों में प्रवेश करता है । 
(2) उत्पादक और सम्बोधिती के बीच सहमति के होने के सिवाय किसी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की प्राप्ति के लिए समय निम्न प्रकार अभिनिश्चित किया जायेगा- 
(क) यदि सम्बोधिती नामित है कम्प्यूटर स्त्रोत इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की प्राप्ति के प्रयोजन के लिए रखता है-

(i) रसीद उस समय प्राप्त हुई मानी जाती है, जब इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख नामित कम्प्यूटर स्त्रोत में प्रवेश करता है;

(ii) यदि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख सम्बोधिती के कम्प्यूटर स्त्रोत में भेजा जाता है और यह कम्प्यूटर स्त्रोत नामित स्त्रोत नहीं हैं तबं रसीद उस समय प्राप्त होगी जब इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख सम्बोधिती द्वारा प्राप्त किया जाता है;

(ख) यदि सम्बोधिती कम्प्यूटर स्त्रोत को विनिर्दिष्ट समय के भीतर पदनामित नहीं करता और यदि कोई रसीद उस समय प्राप्त होती है जब इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख सम्बोधिती के कम्प्यूटर स्त्रोत में प्रवेश करता है।

(3) उत्पादक और सम्बोधिती के बीच सहमति के बीच सहमति के सिवाय किसी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को ऐसे स्थान पर प्रेषित समझा जाता है जहाँ उत्पादक अपने कारबार का स्थान रखता है और यह उस स्थान पर प्राप्त समझा जाता है जहाँ सम्बोधिती अपने कारबार का स्थान रखता है। 

(4) उपधारा 2 के उपबन्ध इस बात के होते हुए भी लागू होंगे कि स्थान जहाँ कम्प्यूटर स्त्रोत स्थित है उस स्थान से भिन्न हो सकेगा जहाँ इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख उपधारा (3) के अधीन स्वीकार किया गया समझा जाता है । 

(5) इस धारा के प्रयोजन के लिए-

(क) यदि उत्पादक और सम्बोधिती कारबर के प्रयोजन के लिए एक से अधिक स्थान रखते हैं तो कारबार का मुख्य स्थान कारबार का स्थान होगा; 

(ख) यदि उत्पादक और सम्बोधित कारबार का स्थान नहीं रखते हैं तो उनके निवास का स्थान कारबर का स्थान समझा जायेगा;

(ग) निवास का स्थान निगमित निकाय के सम्बन्ध में निवास स्थान से आशय स्थान जहाँ यह रजिस्ट्रीकृत है ।

सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर

14. सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख - जहाँ कोई सुरक्षित प्रक्रिया सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को विनिर्दिष्ट समय पर लागू होती है तब ऐसा अभिलेख ऐसे सत्यापन के समय पर सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख समझा जायेगा । 

15. सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर - यदि सुरक्षित प्रक्रिया लागू किये जाने के बारे में संपृक्त पक्षकारों के बीच सहमति होती है तो वह सत्यापित हो सकेगा कि डिजिटल हस्ताक्षर जब यह किया गया था तो यह-

(क) इसे करने वाले उपभोक्ता के लिए अनुपम था; 

(ख) ऐसे उपभोक्ता की शिनाख्त के लिए समर्थ था;

(ग) ऐसे ढंग में सृजित अथवा उपभोक्ता के नियंत्रण के अधीन अन्य साधनों के प्रयोग द्वारा सृजित किया गया था, और यह इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख से इस प्रकार जुड़ा होता है कि जिसमें कि यदि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में डिजिटल हस्ताक्षर परिवर्तित किया गया होता तो अवैध होता ।

तब ऐसा डिजिटल हस्ताक्षर सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर समझा जाता है । 

16. सुरक्षित प्रक्रिया- केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा के प्रयोजन के लिए वाणिज्यिक परिस्थितियों के सम्बन्ध में उस समय जब प्रक्रिया प्रयुक्त की गयी थी सुरक्षित प्रक्रिया निम्न के सहित विहित करेगा-

(क) संव्यवहार की प्रकृति;

(ख) पक्षकारों की तकनीकी क्षमता में कुतर्क करने के सम्बन्ध स्तर;

(ग) अन्य पक्षकारों के समान संव्यवहारों में लगे होने के विस्तार; 

(घ) विकल्पात्मक प्रस्तावित उपलब्धता जो पक्षकारों द्वारा नामंजूर कर दी गयी हो;

(ङ) विकल्पात्मक प्रक्रिया का खर्च,

(च) समान प्रकार के संव्यवहारों अथवा संसूचनाओं के लिए सामान्य उपयोग की प्रक्रिया ।

प्रमाणन प्राधिकारियों के विनियम

17. कन्ट्रोलर और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति - ( 1 ) केन्द्रीय सरकार सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा इस धारा के प्रयोजन के लिए प्रमाणन प्राधिकारियों के कन्ट्रोलर की नियुक्ति कर सकेगी और उसी अथवा पश्चातवर्ती अधिसूचना द्वारा ऐसे उप कन्ट्रोलर और सहायक कन्ट्रोलर जैसा भी वह उचित समझेगी नियुक्त कर सके ।

(2) इस अधिनियम के अधीन कन्ट्रोलर केन्द्र सरकार के सामान्य नियंत्रण और निर्देशों के अधीन अपने कार्यों से उन्मुक्त होगा ।

(3) उप कन्ट्रोलर और सहायक कन्ट्रोलर अपने समनुदेशित कर्त्तव्यों का पालन कन्ट्रोलर के सामान्य प्रबन्ध और कन्ट्रोलर के नियंत्रण में करेगा । 

(4) कन्ट्रोलर, उप कन्ट्रोलर और सहायक कन्ट्रोलर की सेवा की अर्हतायें, अनुभव, निबन्धन और शर्तें ऐसी होगी जैसा कि केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जा सकेगी। 

(5) कन्ट्रोलर का प्रधान कार्यालय और शाखा कार्यालय ऐसे स्थान पर होगा जैसा कि केन्द्र सरकार विनिर्दिष्ट करे और ये ऐसे स्थानों पर स्थापित किये जा सकेंगे जैसा केन्द्र सरकार उचित समझती है।

(6) कन्ट्रोलर के कार्यालय की एक मुहर होगी ।

18. कन्ट्रोलर के कार्य - कन्ट्रोलर निम्न कर्त्तव्यों में से सभी या किसी का पालन कर सकेगा-

(क) प्रमाणन प्राधिकारी की कार्यवाही की देखरेख करना;

(ख) प्रमाणन प्राधिकारी की लोक कुंजी का प्रमाणन;

(ग) प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा बनाये रखे जाने वाले स्तर को अधिकथित करना; 

(घ) ऐसे अर्हता और अनुभव विनिर्दिष्ट करना जिसे प्रमाणन प्राधिकारियों के कर्मचारी धारण करेंगे;

(ङ) ऐसी शर्तें विनिर्दिष्ट करना जिन पर प्रमाणन प्राधिकारी अथवा कारबार करेंगे;

(च) लिखित, मुद्रित, दृष्टिगत तत्त्वों को विनिर्दिष्ट करना और प्रकाशन जो कि अथवा डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र और लोक कुंजी के प्रयोग के सम्बन्ध में प्रयुक्त किया जा सकेगा। 

(छ) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र और कुंजी के स्वरूप और विनिर्दिष्ट अन्तर्वस्तुयें; 

(ज) प्रमाणन प्राधिकारियों द्वारा खातों के व्यवस्थित रखने के लिए ढंग और स्वरूप का विनिर्दिष्टीकरण; 

(झ) निबंधन और शर्तें जिन पर संपरीक्षण नियुक्त किये जा सकेंगे और भत्ते जो उन्हें दिये जा सकेंगे; 

(ञ) प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा किसी इलेक्ट्रॉनिक तंत्र का व्यवस्थापन और ऐसे तंत्र का विनियमन;

(ट) ढंग जिसमें प्रमाणन प्राधिकारी उपभोक्ताओं के साथ व्यवहार करेंगे;

(ठ) प्रमाणन प्राधिकारियों और उपभोक्ताओं के बीच हितों के संघर्ष को दूर करना; 

(ड) प्रमाणन प्राधिकारियों के कर्त्तव्यों को अभिलिखित करना;

(ढ) प्रत्येक प्रमाणन प्राधिकारी के प्रकटित अभिलेख जिनमें विनियम द्वारा विनिर्दिष्ट ऐसी शर्तें जो कि लोक के लिए सुगम हों की अन्तर्विष्ट करना और उनका व्यवस्थापन ।

19. विदेशी प्रमाणन प्राधिकारी की मान्यता-

(1) विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जा सकने वाली शर्तें और प्रतिबन्धों के अनुसार कन्ट्रोलर केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति से और सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा किसी विदेशी प्रमाणन प्राधिकारी को इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए प्रमाण प्राधिकारी के रूप में मान्यता प्रदान कर सकेगा । 

(2) जहाँ कोई प्रमाणन प्राधिकारी उपधारा (1) के अधीन मान्यता प्राप्त है ऐसे प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया डिजिटल प्रमाण पत्र इस धारा के प्रयोजन के लिए वैध होगा । 
(3) कन्ट्रोलर यदि सन्तुष्ट है कि किसी प्रमाणन प्राधिकारी ने ऐसी शर्तों और प्रतिबन्धों का उल्लंघन किया है जिन पर उसे उपधारा (1) के अधीन मान्यता प्रदान की गयी थी तो वह ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किये जायेंगे सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा ऐसी मान्यता को प्रतिसंहृत कर सकेगा ।

20. कन्ट्रोलर कोषाध्यक्ष के रूप में करेंगे - ( 1 ) कन्ट्रोलर इस अधिनियम के अधीन | जारी सभी डिजिटल प्रमाण पत्र के कोषाध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।

(2) कन्ट्रोलर-
(क) हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर का उपयोग और ऐसी प्रक्रिया का उपयोग करेगा जो अप्राधिकृत और अनुचित प्रयोग से सुरक्षित हों;

(ख) ऐसे अन्य मापदण्डों का संप्रेक्षण कर सकेगा जो केन्द्र सरकार द्वारा विहित किये जा सकेंगे; यह सुनिश्चित करता है कि डिजिटल हस्ताक्षर की गोपनीयता और सुरक्षा सुरक्षित रहे । 

(3) कन्ट्रोलर सभी लोक कुंजियों के लिए ऐसे ढंग से सभी लोक कुंजियों का कम्प्यूटरीकृत विवरण व्यवस्थित रखेगा और लोक कुंजी सभी लोक सदस्यों के लिए उपलब्ध करायेगा ।

21. डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र जारी किये जाने के लिए अनुज्ञप्ति - (1) उपधारा (2) के उपबन्धों के विषयों के लिए कोई भी व्यक्ति डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करने की अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन कर सकेगा ।

(2) उपधारा (2) के अधीन कोई भी अनुज्ञप्ति तब तक जारी नहीं की जायेगी जब तक कि ऐसा आवेदक, अर्हता, जन शक्ति, वित्तीय संसाधनों और अन्य सुविधाएँ जो कि डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करने के लिए आवश्यक है और केन्द्रीय सरकार द्वारा वहित की जा सकेगी उनसे सम्बन्धित अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं कर दी जाती है । 

(3) इस धारा के अधीन प्रदान की गयी अनुज्ञप्ति-

(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किये जा सकने वाले समय तक के लिए वैध होगी;

(ख) अन्तरणीय और दाययोग्य नहीं होगी;

(ग) विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किये जा सकने वाले शर्तों और निबन्धनों के अधीन होगी । 

22. अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन - (1) अनुज्ञप्ति जारी किये जाने के लिए प्रत्येक आवेदन ऐसे फार्म में हो सकेगा जो केन्द्र सरकार विहित करें ।

(2) अनुज्ञप्ति जारी किये जाने के लिए दिया गया प्रत्येक आवेदन-

(क) प्रमाणिक अभ्यासिक कथन;

(ख) आवेदक की पहचान के सम्बन्ध में प्रक्रिया अन्तर्विष्ट करने वाला कथन; 

(ग) ऐसी फीस का भुगतान जो पच्चीस हजार रुपये से अधिक न होगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जा सकेगी;

(घ) केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किये जा सकने वाले अन्य दस्तावेज के साथ दिया जायेगा ।

23. अनुज्ञप्ति का नवीनीकरण - अनुज्ञप्ति के नवीनीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन- (क) ऐसे फार्म में;

(ख) और ऐसी फीस के सहित होगा जो पाँच हजार रुपये से अधिक न होगी अथवा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जा सकेगी और अनुज्ञप्ति की वैधता की अवधि समाप् के पैंतालीस दिन के पूर्व दिया जा सकेगा ।

24. अनुज्ञप्ति दिये जाने और खारिज किये जाने के लिए प्रक्रिया 21 की उपधारा 1 के आवेदन की प्राप्ति पर कन्ट्रोलर आवेदन के साथ दिये दस्तावेजों और अन्य बातों पर विचार करने के पश्चात् यदि वह उचित समझता है तो अनुज्ञप्ति प्रदान करेगा अथवा आवेदन को खारिज कर देगा: 

परन्तु यह कि इस धारा के अधीन कोई भी आवेदन तब तक खारिज नहीं किया. जायेगा जब तक कि आवेदक को अपने मामले को प्रस्तुत करने का युक्तियुक्त अवसर नहीं दिया जाता है।

25. अनुज्ञप्ति का निलम्बन - (1) कन्ट्रोलर यदि संतुष्ट है तो वह ऐसी जाँच जिसे वह उचित समझता है करने के पश्चात्—

(क) प्रमाणन प्राधिकारी ने आवेदन जारी किये जाने अथवा उसके सम्बन्ध में ऐसा कथन किया जो कि असत्य है अथवा तात्विक विशिष्टियों में झूठा है ।

(ख) ऐसी शर्तों और निबन्धों जिन पर आवेदन किया गया था पालन करने में असफल रहा है । 

1. [ (ग)] धारा 30 के अधीन प्रक्रियाओं और विनिर्दिष्ट, मापदण्डों को व्यवस्थित रखने में असफल रहा है।

(घ) इस अधिनियम के किसी उपबन्धों, नियमों, विनियमों अथवा उसके अधीन किये गये आदेशों का उल्लंघन किया है तो अनुज्ञप्ति को प्रतिसंहृत कर देगा । 

परन्तु यह कि कोई भी अनुज्ञप्ति तब तक प्रतिसंह्यत न की जायेगी जब तक कि " प्रमाणन प्राधिकारी को प्रस्तावित प्रतिसंहरण के विरुद्ध कारण दर्शित करने के लिए युक्तियुक्त अवसर नहीं दिया जाता है

(2) कन्ट्रोलर यदि यह विश्वास करने का युक्तियुक्त कारण रखता है कि उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति के प्रतिसंहृत किये जाने के लिए युक्तियुक्त आधार है तो आदेश द्वारा ऐसी अनुज्ञप्ति उसके द्वारा आदेशित की जाने वाली जाँच को पूरा होने तक निलम्बित होगा-

परन्तु यह कि कोई भी अनुज्ञप्ति दस दिन से अधिक समय के लिए निलम्बित न की जायेगी जब तक कि प्रमाणन प्राधिकारी को प्रस्तावित निलम्बन के सम्बन्ध में कारण दर्शित करने के लिए युक्तियुक्त अवसर नहीं दिया जाता है । निलम्बित की गयी हैं ऐसे

(3) प्रमाणन प्राधिकारी जिसकी अनुज्ञप्ति इस प्रकार निलम्बन के दौरान डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी नहीं करेगा ।

26. अनुज्ञप्ति के निलम्बन अथवा प्रतिसंहरण के लिए सूचना-

(1) जहाँ कि प्रमाणन प्राधिकारी की अनुज्ञप्ति निलम्बित की जाती है कन्ट्रोलर ऐसे निलम्बन अथवा प्रतिसंहरण जैसी भी दशा हो अपने द्वारा व्यवस्थित विवरण में नोटिस प्रकाशित करेगा ।

(2) जहाँ कि एक था एक से अधिक रिपोजिटरीज विनिर्दिष्ट हों तो कनट्रोलर ऐसे निलम्बन और प्रतिसंहरण, जैसी भी दशा हो ऐसी सभी रिपोजिटरीज में नोटिस प्रकाशित करेगा 

परन्तु यह कि ऐसे निलम्बन और प्रतिसंहरण की नोटिस अन्तर्विष्ट करने वाले प्रत्येक विवरण वेब साइट के माध्यम से जो कि सुगम हो उपलब्ध कराया जायेगा ।

परन्तु यह कि कन्ट्रोलर यदि आवश्यक समझता है तो विवरण की अन्तर्वस्तुओं की ऐसे इलेक्ट्रॉनिक अथवा अन्य माध्यमों जिन्हें वह उचित समझता है में प्रकाशित कर सकेगा। 

27. शक्ति का प्रव्यायोजन – कन्ट्रोलर लिखित रूप से उप कन्ट्रोलर और सहायक कन्ट्रोलर को अथवा किसी अन्य अधिकारी को इस अध्याय के अधीन कन्ट्रोलर की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।

28. उल्लंघनों के अन्वेषण की शक्ति- कन्ट्रोलर अथवा उसके द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी इस अधिनियम, नियमों अथवा उनके अधीन बनाये गये विनियमों के उल्लंघन के लिए अन्वेषण करेगा।

(2) कन्ट्रोलर या कोई अन्य अधिकारी जो उसके द्वारा प्राधिकृत है आयकर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अध्याय XIII के अधीन आयकर अधिकारी को दी गयी शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसी शक्तियों का प्रयोग ऐसे सीमाओं के अधीन करेगा जो इस अधिनियम में अभिलिखित की गयी हो ।

29. कम्प्यूटर और आँकड़े तक पहुँच - ( 1 ) धारा 68 की उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कन्ट्रोलर अथवा उसके प्राधिकृत कोई व्यक्ति यदि इस के बारे मैं सन्देह के लिए युक्तियुक्त कारण रखता है कि इस अधिनियम, नियमों अथवा उनके अधीन बनाये गये विनियमों का उल्लंघन किया है तो वह किसी कम्प्यूटर तंत्र, किसी पत्र, आँकड़े अथवा ऐसे तंत्र से संपृक्त अन्य मामलों के लिए ऐसे कम्प्यूटर तंत्र के सम्बन्ध में कोई सूचना, अन्तर्विष्ट आँकड़े या उपलब्ध आँकड़े को प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए अनुसंधान कर सकेंगे।

(2) उपधारा 1 के प्रयोजन के लिए कन्ट्रोलर अथवा उसके द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति आदेश द्वारा किसी अन्य व्यक्ति जो कि कम्प्यूटर तंत्र की संक्रिय आँकड़े, यंत्र जिनका कि वह भारसाधक है उसे युक्तियुक्त तकनीकी और अन्य सहायता जिसे वह आवश्यक समझता है उपलब्ध कराने के लिए निदेशित कर सकेगा।

30. प्रमाणन प्राधिकारी कुछ प्रक्रियाओं का पालन करेंगे- प्रत्येक प्रमाणन प्राधिकारी-

(क) हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और प्रक्रिया जो कि अनाधिकार प्रवेश के सम्बन्ध में है प्रयोग करेंगे; 

(ख) उनकी सेवा की विश्वसनीयता के युक्तियुक्त स्तर जो कि आशयित कार्यों के पालन में युक्तियुक्त है उपलब्ध करायेंगे; 

(ग) ऐसी सुरक्षित प्रक्रियायें सुनिश्चित करेंगे कि डिजिटल हस्ताक्षर की गोपनीयता अथवा गुप्तता सुरक्षित रहे;

(घ) ऐसे अन्य संप्रेक्षण करेंगे जो विनियम में विनिर्दिष्ट हों ।

31. प्रमाणन प्राधिकारी इस अधिनियम आदि का पालन सुनिश्चित करेंगे - प्रत्येक प्रमाणन प्राधिकारी यह सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक नियोजित व्यक्ति अथवा अन्यथा कार्य में लगा हुआ व्यक्ति अपने नियोजन अथव हुए कार्य के अनुक्रम में इस अधिनियम उपबन्धों, नियमों, विनियमों और इसके अधीन किये गये आदेशों का पालन करेंगे।

32. अनुज्ञप्ति का प्रदर्शन - प्रत्येक प्रमाणन प्राधिकारी अपनी अनुज्ञप्ति को दृष्यमान स्थान जहाँ कारबार किया जा रहा हो, प्रदर्शित करेगा ।

33. अनुज्ञप्ति का समर्पण - (1) प्रत्येक प्रमाणन प्राधिकारी जिसकी अनुज्ञप्ति निलम्बित अथवा प्रति संहृत कर दी गयी है ऐसे निलम्बन अथवा प्रतिसंहरण के तुरन्त पश्चात् अनुज्ञप्ति को कन्ट्रोलर को समर्पित करेगा ।

(2) जहाँ कोई प्रमाणन प्राधिकारी उपधारा के अधीन अनुज्ञप्ति का समर्पण करने में असफल होता है व्यक्ति जिसके पक्ष में अनुज्ञप्ति जारी की जाती है किसी अपराध का दोषी होगा और कारावास जिसकी अवधि छः माह तक की हो सकेगी अथवा जुर्माने से जो दस हजार रुपये तक हो सकेगा अथवा दोनों से दण्डित किया जायेगा ।

34. प्रकटीकरण - (1) प्रत्येक प्रमाणन प्राधिकारी विनियमों में विनिर्दिष्ट ढंग से - 
(क) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जिसमें कि लोक कुंजी और व्यक्तिगत कुंजी अन्तर्विष्ट हो उसका उपयोग प्रमाणन प्राधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर को अन्य डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्रों पर डिजिटल हस्ताक्षर करने के लिए करता है,

(ख) उससे सुसंगत कथनों का कोई प्रमाण पत्र;

(ग) अपने प्रमाणन प्राधिकारी प्रमाण पत्र के निलम्बन अथवा प्रतिसंहरण की सूचना; 

(घ) कोई अन्य तथ्य जो कि डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जो कि उसे जारी किया है कि विश्वसनीयता के प्रतिकूल हो अथवा प्राधिकारी द्वारा अपनी सेवा के पालन की उपलब्धता प्रकटित करेगा।

(2) जहाँ प्रमाणन प्राधिकारी की राय में कोई घटना घटित होती है अथवा इसके कम्प्यूटर तंत्र की विश्वसनीयता पर अथवा विषय जिनके लिए डिजिटल प्रमाण पत्र जारी किया गया है पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कोई तथ्य उत्पन्न होता है तब प्रमाणन प्राधिकारी-

(क) उस घटना से प्रमाणित होने वाले किसी व्यक्ति को सूचित करने के लिए युक्तियुक्त प्रयास करेगा; 

(ख) ऐसी घटनाओं और स्थितियों के व्यवहार करने के लिए अपने प्रमाणीकरण कथनों में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार कार्य करेंगा।

डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र

35. प्रमाणन प्राधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करेगा-

(1) कोई व्यक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित फार्म में डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी किये जाने के लिए प्रमाणन प्राधिकारी से आवेदन कर सकेगा।

(2) ऐसा प्रत्येक आवेदन ऐसी फीस जो पच्चीस हजार रुपये से अधिक न होगी जो कि केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जा सकेगी के साथ दिया जायेगा और उसका भुगतान प्रमाणन प्राधिकारी को किया जायेगा ।

परन्तु यह कि उपधारा (2) के उपबन्धित शुल्क विभिन्न आवेदनों के लिए भिन्न-भिन्न रूप में विहित किये जा सकेंगे।

(3) प्रत्येक ऐसा आवेदन प्रमाणन अभ्यास कथनों के सहित अथवा जहाँ ऐसे कथन न हों विनियमों में विनिर्दिष्ट की जा सकने वाली विशिष्टियों को अन्तर्विष्ट करने वाले कथनों के साथ दिया जायेगा ।

(4) उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर प्रमाणन प्राधिकारी प्रमाणन अभ्यास कथनों अथवा उपधारा (3) के अधीन किये गये अन्य कथनों पर विचार करने के पश्चात् और ऐसी जाँच जिसे वह उचित समझता है करने के पश्चात् डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र प्रदान करेगा अथवा अभिलिखित किये जाने वाले कारणों के आधार पर आवेदन को खारिज कर देगा।

परन्तु यह कि कोई भी डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र तब तक जारी नहीं किया जायेगा जब तक प्रमाणन प्राधिकार इस बात से सन्तुष्ट नहीं हो जाता है कि-

(क) आवेदन डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध व्यक्तिगत कुंजी और साथ ही साथ लोक कुंजी को धारण करता है।

(ख) आवेदक व्यक्तिगत कुंजी जो कि डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र के सृजित किये जाने के लिए समर्थ है धारण करता था । 

(ग) प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध लोक कुंजी आवेदक द्वारा धारण की जाने वाली व्यक्तिगत कुंजी द्वारा किये गये डिजिटल हस्ताक्षर के सत्यापन के लिए प्रयुक्त की जा सकती है ।

परन्तु यह कि कोई भी आवेदन तब तक खानिज न किया जायेगा जब तक कि प्रस्तावित खारिजी के लिए कारण दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर आवेदक को नहीं दिया जाता है।

36. डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी किये जाने पर प्रतिनिधित्व - प्रमाणन प्राधिकारी जो कि डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करता है यह प्रमाणित करेगा कि-

(क) यह इस अधिनियम के उपबन्धों और उनके अधीन बनाये गये नियमों और विनियमों का पालन करता है । 

(ख) यह डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र को प्रकाशित करता है अथवा इसे इस पर निर्भर करने वाले ऐसे व्यक्तियों को उपलब्ध करायेगा ।

(ग) उपभोक्ता ने डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध व्यक्तिगत कुंजी के साथ-साथ लोक कुंजी को धारण किया है।

(घ) उपभोक्ता की लोक कुंजी और व्यक्तिगत कुंजी जोड़े का कार्य करती है ।

(ङ) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में अन्तर्विष्ट सूचना यथार्थ है और; 

(च) इसमें कोई ऐसा तात्विक तथ्य नहीं है जिसे यदि डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में मिला दिया जाये तो खण्ड क घ तक में किये गये प्रतिनिधित्वों और विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव होगा ।

37. डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र का निलम्बन-

(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के लिए प्रमाणन प्राधिकारी जो कि डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करता है ऐसे डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र को निलम्बित कर सकेगा- 

(क) उसके प्रभाव की प्रार्थना प्राप्त होने पर --

(i) उपभोक्ता डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध करेगा; या

(ii) उस उपभोक्ता द्वारा उस कार्य के लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत द्वारा सूचीबद्ध करेगा । 

(ख) यदि यह राय है कि डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र लोक हित में निलम्बित किया जाना चाहिए ।

(2) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र पन्द्रह दिन से अधिक अवधि के लिए निलम्बित नहीं किया जायेगा जब तक कि उस मामले के सम्बन्ध में सुनवायी का अवसर नहीं दिया जाता है।

(3) इस धारा के अधीन डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र के निलम्बन पर प्रमाणन प्राधिकारी उसके बारे में उपभोक्ता को सूचित करेगा ।

38. डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र का प्रतिसंहरण-

प्रमणन प्राधिकारी अपने द्वारा जारी डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र प्रतिसंहृत कर सकेगा- 

(क) जहाँ कि उपभोक्ता अथवा उसके द्वारा प्राधिकृत कोई व्यक्ति उसके लिए प्रार्थना करता है।

(ख) उपभोक्ता की मृत्यु पर ।

(ग) फर्म के विघटन अथवा कम्पनी के परिसमापन पर जहाँ कि उपभोक्ता फर्म कम्पनी है।

(2) उपधारा (3) के उपबन्धों के लिए और उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्रमाणन प्राधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जिसे उसने किसी भी समय जारी किया है प्रतिसंहृत कर सकेगा यदि उसकी राय है कि-

(क) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में प्रस्तुत तथ्य झूठे हैं अथवा छिपाये गये हैं। 

(ख) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी किये जाने की अपेक्षायें सन्तोष जनक नहीं हैं।

(ग) प्रमाणन प्राधिकारी की व्यक्तिगत कुंजी और सुरक्षित तंत्र में इस ढंग से सहमति हो गयी है कि डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र की विश्वसनीयता प्रमाणित होती है।

(घ) उपभोक्ता के दिवालिया घोषित किये जाने पर अथवा उसकी मृत्यु पर जहाँ उपभोक्ता कोई फर्म है अथवा कम्पनी है जिसे कि विघटित या परिसमापित कर दिया गया अथवा अन्यथा समाप्त किये जाने पर ।

(3) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र तब तक प्रतिसंहत नहीं किया जायेगा जब तक कि उपभोक्ता मामले में सुनवाई का अवसर नहीं दिया जाता है। 

(4) इस धारा के अधीन डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र के प्रतिसंहृत किये जाने पर प्रमाणन प्राधिकारी उसके बारे में उपभोक्ता को संसूचित करेगा ।

39. निलम्बन अथवा प्रतिसंहरण की सूचना-

(1) जहाँ धारा 37 या 38 के अधीन डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र निलम्बित या प्रतिसंहृत किया जाता है प्रमाणन प्राधिकारी ऐसे निलम्बन या प्रतिसंहरण की सूचना ऐसी नोटिस के प्रकाशन के लिए डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में विनिर्दिष्ट कोष में करेगा । 

(2) जहाँ एक से अधिक कोष विनिर्दिष्ट है वहाँ प्रमाणन प्राधिकारी ऐसे सभी कोषों के निलम्बन, पर प्रतिसंहरण के बारे में सूचना देगा।

उपभोक्ता के कर्त्तव्य

40. कुंजी जोड़ा उत्पन्न करना - जहाँ डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र और जिसकी लोक कुंजी और साथ ही साथ उपभोक्ता की व्यक्तिगत कुंजी जो किं डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध है और उपभोक्ता द्वारा स्वीकार की गयी है 1[तब] उपभोक्ता सुरक्षित प्रक्रिया द्वारा 2 [वह कुंजी] जोड़ा उत्पन्न करेगा ।

41. डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र का प्रतिग्रहण-

(1) उपभोक्ता डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र का प्रतिग्रहीता समझा जायेगा यदि वह इसे प्रकाशित करता हैं अथवा डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र के प्रकाशन के लिए-

(क) एक या अधिक व्यक्तियों को प्राधिकृत करता है । 

(ख) कोष में अथवा ।

किसी ढंग से डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण-पत्र के अपने अनुमोदन को प्रदर्शित करता है । 

(2) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र स्वीकार करने के पश्चात् उपभोक्ता डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में अन्तर्विष्ट सूचना पर युक्तियुक्त रूप से विश्वास करता है यह प्रमाणित करता है कि-

(क) उपभोक्ता डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध व्यक्तिगत कुंजी के साथ लोक कुंजी धारण करता है और उसको धारण करने का हकदार है ।

(ख) उपभोक्ता द्वारा प्रमाणन प्राधिकारी से किये गये सभी प्रतिनिधित्वों और डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में अन्तर्विष्ट सभी सूचनायें से सुसंगत सभी तथ्य सत्य हैं। 

(ग) डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र की सभी सूचनाओं जो कि उपभोक्ता के ज्ञान में है सत्य हैं। ।

42. व्यक्तिगत कुंजी का नियंत्रण - (1) प्रत्येक उपभोक्ता अपने डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध लोक कुंजी के साथ व्यक्तिगत कुंजी का नियंत्रण प्रतिधारित करने के लिए युक्तियुक्त सावधानी बरतेगा और प्रकटीकरण को रोकने के लिए सभी कदम उठायेगा 3 (***) ।

शास्ति और न्याय निर्णयन 

43. कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र की नुकसानी के लिए शास्ति-

यदि कोई व्यक्ति कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क के स्वामी या उसके भारसाधक किसी अन्य व्यक्ति अनुमति के बिना - 

(क) ऐसे कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क में पहुँचता है या पहुँचना सुरक्षित करता है। 

(ख) ऐसे कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क की सूचनायें, धारित विवरण के सहित कम्प्यूटर के विवरण आधार पर किसी विवरण को निकालता या उसकी नकल करता है या उनका वजन कम करता है ।

(ग) किसी ऐसे कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क के कम्प्यूटर वाईरस (Virus) अथवा कम्प्यूटर कन्टमिनेन्ट (Contaminant) से परिचय करता है या परिचय करने का कार्य करता है।

(घ) किसी कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क के विवरण, कम्प्यूटर विवरण आधार की नुकसानी करता है या ऐसे कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क कार्यक्रम की नुकसानी कारित करता है।

(ङ) किसी कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क को तितर-बितर करता है या कारित करता है। 

(च) किसी व्यक्ति को जो कि ऐसे कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क तक पहुँचने के लिए प्राधिकृत है पहुँचने से इंकार करता है या इन्कारी कारित करता है । 

(छ) इस अधिनियम के उपबन्धों या इसके अधीन बनाये गये नियमों और विनियमों उल्लंघन में किसी व्यक्ति को ऐसे कम्प्यूटर, कम्प्यूटर तंत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क तक पहुँचने में सहायता या सुविधा प्रदान करता है ।

(ज) एक व्यक्ति द्वारा ली गई सेवा को दूसरे व्यक्ति के मद में मशीनी छेड़छाड़ करने के द्वारा अथवा किसी कम्प्यूटर अथवा किसी कम्प्यूटर पद्धति को अथवा कम्प्यूटर -नेटवर्क को छल शादित करता है। 

तो उसे प्रभावित व्यक्ति को प्रतिकर देना पड़ेगा जो कि एक करोड़ रुपये से अधिक न हो।

स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए कम्प्यूटर कन्टेनमेन्ट से आशय कम्प्यूटर का कोई भी सेंट जो भी निर्देश पदनामित करता है- 

(1) "कम्प्यूटर कन्टामिनेन्ट" से अभिप्रेत है, कम्प्यूटर निदेश का कोई जोड़ा जो कि एसा बनाया गया है।

(क) कि संशोधित कर सके, विनाश कर सके, अभिलिखित कर सके डाटा अथवा प्रोग्राम को भेज सके जो कि एक कम्प्यूटर में अथवा कम्प्यूटर पद्धति अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क में अवस्थित हैं ।

(ख) किसी पद्धति से कम्प्यूटर के साधारण कार्य प्रणाली को हड़पना अथवा कम्प्यूटर पद्धति के अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क को हड़पना ।

(ii) कम्प्यूटर डाटा बेस से अभिप्रेत है सूचनाओं का ज्ञान, तथ्य संकल्पना या निदेश प्रतिबिम्ब, आडियो वीडियो जो कि तैयार किये जा रहे हैं अथवा तैयार किये जा चुके हैं एक औपचारिक तरीके से अथवा किसी कम्प्यूटर द्वारा निर्मित किये गये हैं अथवा किसी कम्प्यूटर पद्धति द्वारा अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क द्वारा और कम्प्यूटर में प्रयुक्त किये जाने के लिए आशयित हैं अथवा कम्प्यूटर पद्धति, अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क का प्रतिनिधित्व ।

(iii) कम्प्यूटर वाइरस से अभिप्रेत है कोई कम्प्यूटर निदेश सूचना डाटा अथव प्रोग्राम जो विनाश करता है, नुकसान पहुँचाता है, अपमानित करता है, अथवा कम्प्यूटर की कार्य प्रणाली को गलत तरीके से प्रभावित करता है अथवा अपने आप को किसी अन्य कम्प्यूटर स्त्रोत से सम्मिलित करता है और संचालित करता है जब एक प्रोग्राम डाटा अथवा निदेश को क्रियान्वित किया जाता है अथवा जब कोई अन्य घटना उस कम्प्यूटर स्त्रोत से घटित होती है।

(iv) नुकसानी से अभिप्रेत है विनाश करना, बदलाव करना, समाप्त करना, जोड़ना संशोधित करना अथवा किसी कम्प्यूटर रिसोर्स को किसी भी तरीके से पुनः व्यवस्थित करना। 

सूचना वापसी दिये जाने में असफलता के लिए 44 शास्ति-

यदि कोई व्यक्ति जिससे कि इस अधिनियम अथवा किसी नियम अथवा इनके अधीन बनाये गये विनियमों के अधीन अपेक्षा की जाती है कि-

(क) कोई दस्तावेज, वापसी, अथवा रिपोर्ट प्रमाणन प्राधिकारी के कन्ट्रोलर को दे यदि वह ऐसा करने में असफल रहता है तो वह ऐसे उल्लंघन के लिए ऐसी शास्ति जो कि एक लाख पचास हजार रुपये से अधिक न होगी के लिए जिम्मेदार होगा । 

(ख) विनियमों में समय के भीतर वापसी फाइल करेगा अथवा कोई सूचना पुस्तिका या अन्य दस्तावेज देगा यदि विनिर्दिष्ट समय के भीतर वापसी फाइल करने या अन्य चीज़ों के दिये जाने में असफल रहता है तो ऐसी असफलता के लिए ऐसी शास्ति जो कि पाँच हजार रुपये से अधिक न होगी ऐसी असफलता के बने रहने तक प्रत्येक दिन के लिए देगा ।

(ग) बही खातों अथवा स्त्रोतों का प्रतिपादन करेगा यदि उनका प्रतिपादन करने में असफल रहता है तो वह ऐसी सफलता के लिए ऐसी शास्ति जो कि दस हजार रुपये न होगी ऐसी असफलता के बने रहने तक प्रत्येक दिन के लिए देगा ।

45. अवशिष्ट शास्तियाँ - जो कोई किन्हीं नियमों अथवा इस अधिनियम के अधीन बनाये गये विनियमों का उल्लंघन करता है तो ऐसा उल्लंघन जिसके लिए शास्ति पृथक रूप से उपबन्धित नहीं है वह ऐसे उल्लंघन के लिए प्रतिकर जो पच्चीस हजार रुपये से अधिक न होगा के भुगतान के लिए जिम्मेदार होगा ।

46. न्याय निर्णयन की शास्ति इस अध्याय के अधीन न्याय निर्णयन के प्रयोजन के लिए जहाँ कोई व्यक्ति इस अधिनियम के उपबन्धों अथवा इसके किसी नियम, विनियम या उनके अधीन किये गये किसी निर्देश या आदेश का उल्लंघन करता है तो केन्द्रीय सरकार उपधारा (3) के उपबन्धों के लिए ऐसे किसी अधिकारी जिसकी पंक्ति केन्द्रीय सरकार के डाइरेक्टर से कम न होगी अथवा राज्य सरकार के किसी समान अधिकारी जो कि न्याय निर्णयन करने वाला अधिकारी होगा केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित ढंग से जाँच किये जाने के लिए नियुक्त करेगा ।

(2) न्याय निर्णयन करने वाला अधिकारी उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति को मामले के सम्बन्ध में प्रतिनिधित्व करने के लिए युक्तियुक्त अवसर देगा यदि ऐसी पाँच पर वह संतुष्ट है कि उस व्यक्ति ने उल्लंघन किया है तो वह ऐसी शास्ति अधिरोपित कर सकेगा अथवा ऐसा प्रतिकर जिसे वह उस धारा के उपबन्धों के अनुसार उचित समझता हो अधिनिर्णीत करेगा ।

(3) कोई व्यक्ति न्याय निर्णयन करने वाला अधिकारी नियुक्त न किया जायेगा जब तक कि वह सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुभव न रखता हो और केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किये जा सकने वाले न्यायिक अथवा विधिक अनुभव न रखता हो । 

(4) जहाँ एक से अधिक न्याय निर्णयन करने वाले अधिकारी नियुक्त किये जाते हैं केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा ऐसे मामले और स्थान विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिसके सम्बन्ध में ऐसे अधिकारी अपनी न्यायिक अधिकारिता का प्रयोग करेंगे।

(5) प्रत्येक न्यायनिर्णयन करने वाला अधिकारी धारा 58 की उपधारा (2) के अधीन साइबर अपीलीय अधिकरण को दी गयी सिविल न्यायालय की शक्तियों से युक्त होगा; और- 

(क) इसके समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धाराओं 193 और 228 के अर्थों में न्यायिक कार्यवाही 228 समझी जायेगी; तथा

(ख) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धाराओं 345, 346 के प्रयोजन के लिए सिविल न्यायालय समझा जायेगा ।

47. न्याय निर्णयन करने वाले अधिकारी द्वारा विचार में ली जाने वाली बातें- 

जब इस अध्याय के अधीन प्रतिकर की मात्रा पर न्याय निर्णयन किया जा रहा हो तो वहाँ न्याय निर्णयन करने वाला अधिकारी निम्न बातों पर ध्यान देगा-

(क) अनुसूचित लाभ द्वारा प्राप्त रकम जहाँ परिमाणिक हो तो, निर्धारण व्यतिक्रम के परिणाम के अनुसार किया जायेगा । 

(ख) किसी व्यक्ति को कारित नुकसान की रकम व्यतिक्रम के परिणाम के अनुसार किया जायेगा ।

(ग) व्यतिक्रम की पुनरावृत्तिक प्रकृति ।

डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?

  डा० अन्दरहिल ने अपकृत्य को किस प्रकार परिभाषित किया है?   उत्तर- डा० अन्डरहिल के अनुसार, “अपकृत्य एक ऐसा कार्य या कार्यलोप है जो कानून...