मंगलवार, 30 मई 2023

दण्ड कानूनों के कठोर अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से वर्णन करें।

Question. What do you understand by strict construction of penal statutes? Explain with the help of leading cases.
दण्ड कानूनों के कठोर अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से वर्णन करें।

उत्तर - दण्ड कानून में किसी उपबन्ध की व्याख्या करते हुए यदि कोई युक्तियुक्त सन्देह या संदिग्धता प्रतीत हो तो उसका समाधान उस व्यक्ति के पक्ष में जिसे दण्ड का भागी किया जा रहा हो किया जायगा। यदि किसी दण्ड उपबन्ध का युक्तियुक्त निर्वचन इस प्रकार किया जा सकता हो कि दण्ड से बचा जा सके तो ऐसा ही किया जाना चाहिए। यदि किसी दण्ड उपबन्ध की दो युक्तियुक्त व्याख्या हो सकती हों तो उनमें से अधिक उदार व्याख्या (Lenient interpretation) को ही प्रभाव में लाया जाना उचित है। किसी व्यक्ति को केवल तभी दण्डित किया जा सकता है जब दण्ड उपबन्ध की भाषा स्पष्टतः उस व्यक्ति को दण्डित करने के लिए कहे । इस आधार पर कभी दण्डित नहीं किया जा सकता कि किसी कानून का उद्देश्य ऐसा करना है।

मैक्सवेल के अनुसार दण्ड कानूनों का कठोर अर्थान्वयन चार प्रकार से स्वयं को व्यक्त करता है- (i) अपराध के सर्जन के लिए स्पष्ट भाषा की माँग में; (ii) अपराध के आवश्यक करता तत्वों को व्यक्त करने के शब्दों के कठोर निर्वचन में; (iii) दण्डित किए जाने के पूर्व कानूनी शर्तों के पत्र को पूर्ण करने में, तथा (iv) आपराधिक प्रक्रिया एवं अधिकारिता सम्बन्धी तकनीकी उपबन्धों के कठोर पालन पर जोर देने में।

जब तक कि किसी कानून की भाषा किसी कार्य को स्पष्ट रूप से अपराध नहीं कहती, तब तक उस कार्य को अपराध नहीं माना जाएगा। किसी कार्य या लोप जिसे अपराध माना गया है, में प्रयोग किए गए शब्दों में यदि संदिग्धता हो जिससे ऐसा प्रतीत हो कि वह कार्य या लोप उस कानून की भाषा के अन्तर्गत अपराध हो भी सकता है और नहीं भी, तो ऐसी संदिग्धता को अभियुक्त के पक्ष में निर्णीत किया जाएगा।

न्यायालय किसी व्यक्ति को तभी दण्डित करेगा जब मामले की परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से विधि में प्रयोग किये गए शब्दों के अन्तर्गत आती हों। ऐसे विधान जो दण्डित करने के सन्दर्भ में अधिकारिता तथा प्रक्रिया से सम्बन्धित हों उन्हें कठोर रूप से अर्थान्वयित किया जायेगा। जहाँ पर किसी दण्ड कानून में उस कानून द्वारा कुछ प्रक्रिया सम्बन्धी अपेक्षाएँ निर्धारित की गई हों तो अभियुक्त को दण्डित करने से पूर्व न्यायालय यह देखने को बाध्य है कि सभी अपेक्षाएँ पूर्ण की गई हैं या नहीं । इन परिस्थितियों में किसी शंका का निवारण अभियुक्त के पक्ष में ही होगा। यदि इस शंका निवारण से अभियुक्त को इतना अधिक लाभ मिले कि उसे किसी तकनीकी आधार पर छोड़ दिया जाना चाहिए तो न्यायालय उसको बगैर दण्डित किये ही दोषमुक्त कर देगा। दण्ड उपबन्धों को किन्हीं विशिष्ट मामलों या परिस्थितियों में भी आशय या निहितार्थ के आधार पर विस्तारित नहीं किया जा सकता। ऐसी कोई उपधारणा नहीं हो सकती कि किसी अपराध को आन्वयिक रूप (Constructively) से किया गया है। दण्ड कानूनों का प्रभाव सामान्यतः भविष्यलक्षी होता है। उदाहरणार्थ-

(i) डब्ल्यू० एच० किंग बनाम भारत गणराज्य A.I.R. 1952 SC 156 में अपीलार्थी ने पगड़ी के रूप में धन प्राप्त करने के पश्चात् अपनी किरायेदारी किसी अन्य को समनुदेशित (Assign) कर दी। बम्बई किराया, होटल तथा वासा दर (नियन्त्रण) अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत अपने अभियोजन के विरुद्ध उसने तर्क दिया कि अधिनियम के अन्तर्गत उसका उत्तरदायित्व तभी होगा जब अभियोजन यह साबित कर दे कि उसने प्रतिफल स्वीकार कर अपनी किरायेदारी का अन्तरण कर दिया है। अभियोजन का तर्क था कि "समनुदेशन" लगभग एक समान है एवं "त्याग" शब्द को अधिनियम में तकनीकी अर्थ में प्रयोग नहीं किया गया है। अभियोजन के तर्क से असहमत होते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि चूँकि यह अधिनियम 'एक दण्ड विधान है अतः इसका निर्वचन व्यक्ति के पक्ष में किया जाना चाहिये क्योंकि अधिनियम के अन्तर्गत किरायेदारी का त्याग समनुदेशन के समान नहीं है।

(ii) केदार नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य AIR. 1953 SC 404 में 1947 में अपीलार्थी के द्वारा किसी अधिनियम के अन्तर्गत एक अपराध जिसे कारावास अथवा जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जा सकता था किया गया। 1949 में अधिनियम को संशोधित कर जुर्माने की रकम को बढ़ाकर अपराधी द्वारा अपराध कारित कर जितनी रकम ली गई उसके समान कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविधान के अनु० 20 (1) के कारण अपराधी से यह बढ़ी हुई रकम नहीं ली जा सकती।

(iii) सरजू प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य AIR. 1961 SC 631 में अपीलार्थी को जो एक दूकान में कर्मचारी था अपमिश्रित खाद्य के विक्रय के आरोप में खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 के अंतर्गत दण्डित किया गया। उसने तर्क दिया कि चूँकि उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि उसके द्वारा विक्रय किया गया खाद्य अपमिश्रित था अतः उसे इस मामले में अधिनियम की धारा 16 जो अपमिश्रित खाद्य विक्रय को दण्डित करती है तथा धारा 19 जो यह स्पष्ट करती है कि दोषपूर्ण ज्ञान की अनुपस्थिति वैध प्रतिरक्षा नहीं है, के निर्वचन का प्रश्न था । उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी के दण्ड को बनाये रखा और यह स्पष्ट किया कि किसी दण्ड कानून को अभियुक्त के पक्ष में केवल तभी निर्वाचित किया जा सकता है जब उसके एक से अधिक युक्तियुक्त अर्थ निकलते हों । प्रस्तुत दृष्टान्त में धाराएँ 16 एवं 19 सुस्पष्ट हैं तथा दोषपूर्ण आचरण विधि की भाषा में प्रतिनिहित है। एक से अधिक अर्थ सम्भव न होने के कारण अपीलार्थी की दोष सिद्धि वैध है। दोनों उपबन्धों से यह स्पष्ट है कि विक्रेता का ज्ञान, चाहे वह कर्मचारी हो या नियोक्ता,दोषसिद्धि के लिए पूर्णतः तत्वहीन है और इसलिये अपीलार्थी की अपील स्वीकार्य नहीं है।

(iv) रतन लाल बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1965 SC 444 में सोलह वर्ष के बालक अभियुक्त को गृह अतिचार करके सात वर्ष की बालिका के लज्जा भंग के अभियोग में उत्तरदायी पाया गया। मजिस्ट्रेट ने उसको छह माह का कारावास तथा जुर्माने द्वारा दण्डित किया। इस दण्डादेश के आरोपण के पश्चात् अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 पारित किया गया। अभियुक्त ने बगैर इस अधिनियम का लाभ माँगे पहले अतिरिक्त सेशन न्यायाधीश के समक्ष अपील की और फिर पुनरीक्षण में उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन किया जिसे खारिज कर दिया गया। उसने उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रथम बार यह तर्क दिया कि चूंकि वह इक्कीस वर्ष से कम आयु का अपराधी है अंतः उसे 1958 के अधिनियम का लाभ मिलना चाहिये। उच्चतम ने न्यायालय ने बहुमत द्वारा निर्धारित किया कि उसे परिवीक्षा का लाभ प्राप्त होना चाहिये।

(v) रणजीत बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1965 SC 881 में अपीलार्थी को भारत सरकार- द्वारा अभिनिषिद्ध पुस्तक 'लेडी चैटरलीज लवर' बेचने के आरोप में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 292 के अंतर्गत दोषसिद्ध किया गया। उसका तर्क था कि आपराधिक विधि के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिये आपराधिक मनः स्थिति साबित किया जाना अनिवार्य है। अतः प्रस्तुत मामले में अभियोजन को उसके विरुद्ध यह साबित करना आवश्यक था कि उस पुस्तक में अश्लील विषय का ज्ञान होने के बावजूद अपीलार्थी ने उसको बेचा या विक्रय के लिये अपनी दुकान पर रखा। चूँकि अभियोजन ऐसा सिद्ध नहीं कर सका अतः उसकी दोषसिद्धि को रद्द किया जाना उचित है। उसका यह भी तर्क था कि आजकल दुकानों पर इतनी अधिक संख्या में पुस्तकें होती हैं कि यह जानकारी करना लगभग असम्भव है कि उनमें से किन पुस्तकों में अश्लील विषय हैं क्योंकि विधि कभी भी यह माँग नहीं कर सकती कि दुकानदार विक्रय के लिये रखी हुई सभी पुस्तकों को विक्रय से पूर्व पढ़कर देखे कि कहीं उसमें अश्लील विषय तो नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने इन तर्कों को नामंजूर करते हुए निर्धारित किया कि धारा 292 को केवल एक बार पढ़ने से ही यह स्पष्ट है कि इस धारा के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिये आपराधिक मनः स्थिति का साबित किया जाना अनिवार्य नहीं है। अश्लील साहित्य का विक्रय या विक्रय के लिये उसे रखना ही इस उपबन्ध के अंतर्गत दण्डनीय है। अतः जब इस धारा के दो युक्तियुक्त अर्थ हो ही नहीं सकते तो कठोर निर्वचन के सिद्धान्त का प्रश्न ही नहीं उठता। अपीलार्थी अधिनियमिति की स्पष्ट भाषा के अंतर्गत दोषी है और उसकी अपील खारिज किये जाने योग्य है।

(vi) इंदर सैन बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1973 SCC 372 में प्रश्न यह था कि क्या अफीम का किसी के पास पाया जाना स्वयं में ही अफीम अधिनियम, 1898 की धारा 9 के अन्तर्गत अपराध है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अधिनियम की धारा 9 में शब्द "कब्जा होना" का अर्थ पूर्णतः स्पष्ट नहीं है। चूंकि यह अधिनियम एक दण्ड विधान है अतः दो युक्तियुक्त अर्थ निकलने के समय इसे अभियुक्त के पक्ष में निर्वाचित किया जाना चाहिये। अतः ऐसा करने पर यह उचित है कि अभियोजन के द्वारा यह साबित करना आवश्यक है कि अफीम अभियुक्त के कब्जे से पाया गया एवं इसके अस्तित्व का उसे ज्ञान था। चूँकि अभियोजन ऐसा करने में विफल रहा है अतः अपीलार्थी को दण्ड देना विधि में न्यायसंगत नहीं है।

(vii) मुबारक अली बनाम बम्बई राज्य A.I.R. 1957 SC 857 में एक पाकिस्तानी नागरिक ने कराँची से बम्बई में परिवादी को पत्र, तार व टेलीफोन द्वारा मिथ्या व्यपदेशन किया जिसे सत्य समझकर परिवादी ने उस पाकिस्तानी नागरिक के अभिकर्ता को बम्बई में कुछ धन दिया । उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि वह पाकिस्तानी नागरिक छल का अपराध करने के लिये भारतीय न्यायालयों की अधिकारिता के अन्तर्गत है, क्योंकि वह अपीलार्थी प्रपलायी अपराधी अधिनियम, 1881 के अन्तर्गत भारतीय अधिकारियों के समक्ष किसी अन्य मामले में समर्पण कर चुका था और इसलिए उसकी दोषसिद्धि वैध है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय का एक विचार जो अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं रुढ़िवादी विचारधारा के विरुद्ध है, कि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय दण्ड संहिता का अर्थान्वयन इसी प्रकार किया जाना जिस प्रकार इस संहिता के पारित होने के समय के आपराधिक अधिकारिता की धारणा के आधार पर किया जा रहो हो, न ही आवश्यक है और न ही उचित। तब में और अब में सन्दर्भ में बहुत परिवर्तन आया है। अतः यह आवश्यक है कि संहिता को इस रूप में निर्वाचित किया जाये कि आधुनिक आवश्यकताओं का • ध्यान भी रहे एवं ऐसा करना उचित भी हो। जब संहिता में या उसके किसी विशिष्ट उपबन्ध में ऐसा कुछ हो जो इसके विपरीत निर्वचन करने के लिये बाध्य करे तो निर्वचन विपरीत ही होना चाहिये ।

संक्षेप में उपरोक्त मार्गदर्शक वादों में न्यायालयों द्वारा दण्ड संविधि के बारे में अपनाये गये व्याख्या के नियमों से यह प्रकट होता है कि अब दण्ड विधि की व्याख्या उतनी कठोरता के साथ नहीं की जाती है जितनी की यह न्यायालयों द्वारा प्राचीन काल में की जाती थी। हाल के गत वर्षो में न्यायालयों के रूख में निश्चत परिवर्तन आया है और अब न्यायालय समाज की आधुनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संविधियों की व्याख्या करते हैं।

संविधियों की व्याख्या संरचना में आंतरिक उपकरण सहायता का पूर्णरूपेण मूल्यांकन करें।

Question: Explain fully the values of the intrinsic aids in the construction of statutes. 
संविधियों की व्याख्या संरचना में आंतरिक उपकरण सहायता का पूर्णरूपेण मूल्यांकन करें।

उत्तर- संविधियों की व्याख्या-संरचना में आन्तरिक उपकरणों की भूमिका (Role of Instrinsic Aids in the Construction of Statutes) - संविधियों की व्याख्या संरचना में विभिन्न आन्तरिक सहायता उपकरणों की भूमिका को निम्न प्रकार वर्णित किया जा सकता है-

1. सन्दर्भ (Context) - ब्लैक स्टोन के अनुसार, “यदि किसी संविधि की भाषा के दो अर्थ निकलें तो सन्दर्भ के द्वारा एक उपयुक्त अर्थ निकाला जा सकता है।” संविधि में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है साधारणतया उसका साधारण अर्थ लिया जाता है।

हेल्सबरी के अनुसार, सन्दर्भ से ही व्याख्या करनी चाहिये और परिकल्पना का सहारा नहीं लिया जा सकता । सन्दर्भ की सहायता लेने से संविधि में स्थिरता आ जाती है।

लॉर्ड साइमण्डस के अनुसार, सन्दर्भ के अंतर्गत न केवल उसी संविधि के अन्य निर्णायक वाक्यांश शामिल हैं, अपितु उसकी प्रस्तावना, विधि की वर्तमान स्थिति, विषय से मिलती-जुलती अन्य संविधियाँ और वह रिष्टि जिसका कि उपचार ढूंढना आशयित है, सभी शामिल हैं।

स्मिथ का कहना है कि, 'शब्द तो एक प्रकार के आचरण हैं, उनसे जो आशय प्रकट होता है। वह अवश्य ही उसके संदर्भ पर नियंत्रित रहता है साथ ही यह उन परिस्थितियों पर निर्भर करता है जिनमें संविधि लिखी या कही गई है।' न्यायालयों का मुख्य कार्य बहुत अंश तक शब्दों का अर्थ निर्धारित करना है, इसलिये उनका यह भी काम हो जाता है कि वे उनके संदर्भों का भी अध्ययन करें ।' इसलिए व्याकरणमूलक व्याख्या को कोई ऐसी पूर्ण व्याख्या नहीं कहा जा सकता जो सन्दर्भ से सर्वथा अछूती रह सके। यदि व्याकरणमूलक व्याख्या से निकलने वाला परिणाम स्पष्टतः अव्यवहारिक दिखाई पड़ता है, तो हमें व्याकरण को छोड़कर सन्दर्भ की ओर देखना ही पड़ेगा।

शेख गुलफान बनाम सन्त कुमार गांगुली, (1965)2 एस० सी० जे० 839 में कहा गया कि सामान्यतः संविधि में प्रयोग किये गये शब्दों की व्याख्या उनके साधारण अर्थ में होनी चाहिये, परन्तु बहुत से मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण यह है कि शब्दों के साधारण अर्थ से संविधि की तर्कपूर्ण तथा न्यायोचित व्याख्या नहीं हो सकती केवल शब्दकोशिक अर्थ पर आधारित होने से आवश्यक रूप से सांविधिक व्यवस्था की उचित व्याख्या नहीं की जा सकती । प्रायः सांविधिक व्याख्या करने में संविधि की विषय-वस्तु तथा उद्देश्य का ध्यान रखा जाता है। इसलिये संविधि की व्यवस्था के शब्दों के प्रयोग का संदर्भ, संविधि का उद्देश्य जिसमें व्यवस्था को शामिल किया गया है और संविधि पारित करने की नीति, संविधि की व्याख्या में सुसंगत एवं आवश्यक हो जाते हैं। हाल्सबरी ने कहा है कि 'संविधि की व्याख्या में शब्दों की व्याख्या संविधि के संदर्भ में होनी चाहिये न कि उसके कठोर व्याकरणीय या लोकप्रिय भाव में।'

मैक्सवेल के अनुसार, 'संसद द्वारा निर्मित अधिनियम की व्याख्या में उसके भागों को एक साथ पढ़ना चाहिये न कि प्रत्येक भाग को अलग-अलग। संविधि के प्रत्येक उप-वाक्य की व्याख्या अधिनियम के अन्य उप-वाक्यों के संदर्भ में होनी चाहिये जिससे जहां तक सम्भव हो पूरा अधिनियम एक सुसंगत विधि हो जाय।'

यह एक सुस्थापित नियम है कि संविधि के दुरुपयोग की सम्भावना से न्यायालय उसे शक्ति का गलत प्रयोग नहीं मानेगी यदि विधि वैध है और स्पष्ट रूप से उसके निर्माण का अधिकार प्रदान किया गया है। (आई० सी० गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1963 एस० सी० 164) ।

एस० हरसीरान सिंह बनाम पंजाब राज्य, (1984) क्रिमिनल ला जर्नल, 253 में कहा गया कि सिद्धान्त तथा पूर्व-निणय दोनों के आधार पर यदि व्याख्या का झुकाव संदर्भ तथा उद्देश्य की ओर हो, अपेक्षा कि शाब्दिक अर्थ की व्याख्या पर और यदि शाब्दिक अर्थ का परिणाम असंगत और भ्रामक हो, तब संविधि की व्याख्या उस पक्ष में होनी चाहिये जो उसके उद्देश्य को बढ़ावे न कि उसको विफल करे ।

2. उद्देशिका (प्रस्तावना) (Preamble) – प्राय: यह देखा गया है कि प्रत्येक अधिनियम में एक प्रस्तावना जुड़ी रहती है। प्रस्तावना उस अधिनियम के मूल आशय के प्राक्कथन के रूप में होती है जो उपबन्धों के आरम्भ होने के पूर्व ही भूमिका के रूप में दे दी जाती है। यह उद्देशिका शीर्षक के बाद और अधिनियमित धाराओं के पूर्व दी जाती है जिसमें संविधि के उद्देष्यों और नीति का स्पष्टीकरण किया जाता है तथा उन आधारों और उद्देश्यों को स्पष्ट किया जाता है जो अधिनियम में हैं ।

कोचीन बनाम मद्रास एवं केरल राज्य (1960) 2 S.C.A. 412. में यह कहा गया कि प्रस्तावना संविधि का वह अंग है जिसमें अधिनयम के कारणों का प्रदर्शन होता है। इसी संविधि की प्रस्तावना उसे समझने की एक कुन्जी है, और संविधि में यदि कहीं कोई अस्पष्टता या संदिग्धता आ जाती है तो उसके निवारण हेतु तथा संविधि को उसके वास्तविक क्षेत्र के अनुरूप बनाये रखने के लिए उस प्रस्तावना को वैद रूप में देखा जा सकता है।

बुर्रकपुर कोल कं० लि० ब० भारत सरकार, (1961) 2 SC A 523 में कहा गया है कि यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि किसी संविधि की व्याख्या सम्बन्धी गुत्थियों को सुलझाने के लिये उसकी उद्देशिका एक कुन्जी (Key) के रूप में काम करती है। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक अधिनियम की प्रस्तावना सदैव लाभप्रद उद्देश्य की पूर्ति कर सके या आवश्यकता के समय उनसे पथ-प्रदर्शन मिल सके। इसीलिए किसी प्रस्तावना की व्याख्या के लिये उस अधिनियम को पूर्णतः पढ़ना चाहिये। अधिनियमित भाग की प्रस्तावना उस समय कदापि प्रतिबन्धित या विस्तारित नहीं कर सकती जब अधिनियम की भाषा से उसका प्रयोजन और क्षेत्र बिना किसी संदेह के स्पष्ट हो। प्रस्तावना का सन्दर्भ उस समय लिया जा सकता है जबकि अधिनियम की धाराओं का अर्थ या क्षेत्र बिना प्रस्तावना को सन्दर्भ में लाये स्पष्ट न हो रहा हो। न्यायालय संरचना का निष्कर्ष यह है कि 'किसी अधिनियम के उपबन्धों के अर्थ की संरचना करने में न्यायालयों को उसकी प्रस्तावना से आरंभ नहीं करना है, भले ही ऐसा करने में वे न्यायोचित हों। यही नहीं, ऐसी भी परिस्थिति आ सकती हैं जबकि उन्हें प्रस्तावना को देखना पड़े किन्तु यह तभी होगा जबकि संसद द्वारा प्रयुक्त भाषा संदग्धि हो या इतना अधिक सामान्य हो कि संसद द्वारा सीमित अर्थ की प्रकल्पना करने के बाद भी कोई निश्चित अर्थ न निकल पा रहा हो।'

अवध सुगर मिल्स • हरगाँव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1959 A.L.J. 754F.B. में कहा गया है कि यद्यपि यह सत्य है कि प्रस्तावना या लम्बा शीर्षक किसी अधिनियम की व्याख्या करने में एकमात्र आधार नहीं बन सकता, विशेष रूप में उस समय जबकि शीर्षक और प्रस्तावना उस अधिनियम के उपबन्धों की असंगति में हो। फिर भी यह सच है कि शीर्षक और प्रस्तावना पर उस समय विचार किया जा सकता है जबकि उस अधिनियम के मूल उद्देश्य और तत्वों की परिकल्पना की जा रही हो और इस प्रकार प्रस्तावना व्याख्या के लिए कुंजी के रूप में सहायता पहुँचा देती है ।

इस प्रकार प्रस्तावना संविधि की व्याख्या के लिए यदि अनिवार्य अंग नहीं तो एक आवश्यक अंग है। ब्लैक (Black) के अनुसार, यह स्मरण रखना चाहिये कि किसी संविधि की प्रस्तावना उसके अधिनियम के वास्तविक कारणों को अनिवार्य रूप से व्यक्त नहीं करता। इसमें दिखाया गया तथ्य सम्बन्धी विवरण न तो अनिवार्य होता है न ही निष्कर्षात्मक । अतः प्रस्तावना के आधार पर विधि-निर्माताओं के आशय और प्रयोजन को साक्ष्य मानने की बात पर अत्यधिक बल नहीं दिया जाना चाहिये ।

ऐसी धारायें जो प्रस्तावना और अधिनियम के प्रयोजन की असंगति में होकर भी अवैध नहीं (Sections not invalid for inconsistency with preamble and object of the Act) - अब्दुल रहमान ब० आर० एन० कुलकर्णी, ए० आई० आर० 1962, बम्बई 287. में कहा गया है कि यह एक सामान्य सिद्धान्त है कि न तो प्रस्तावना और न प्रकल्पित प्रयोजन ही, अधिनियम की स्पष्ट भाषा को नियन्त्रित कर सकने में समर्थ हैं। उनसे केवल ऐसी स्थिति में अर्थ- संरचना में सहायता मिलती है, जबकि अर्थ सम्बन्धी कोई अस्पष्टता या संदिग्धता दिखाई पड़ रही हो। जहाँ भाषा स्पष्ट है, वहाँ न्यायालय उस भाषा के प्रभाव को लागू करने के लिए बाध्य है। यदि कहीं एक से अधिक अर्थ दिखाई पड़ रहा है, तो वहाँ वह अर्थ ही ग्राह्य होगा जो अधिनियम के प्रयोजनों का वर्णन करने वाली प्रस्तावना में आशयित होगा।

वास्तव में उद्देशिका में अधिनियम के प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन होता है और इसलिए यह कानून का ही एक भाग है। इस कारण न्यायालयों ने इसको निर्वचन के एक आंतरिक सहयोगी के रूप में मान्यता प्रदान की है। परन्तु यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि किसी अधिनियम की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध है तो निर्वचन के सहयोगी के रूप में उद्देशिका की कोई भूमिका नहीं है। परन्तु जहाँ किसी विशिष्ट उपबन्ध के यदि एक से अधिक अर्थ निकलते हों तो उसके वास्तविक अर्थ की जानकारी के लिए उद्देशिका से सहायता ली जा सकती है। उदाहरणार्थ-

(i) केदार नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य A.I.R. 1953 S.C. 404 में यह प्रश्न था कि क्या पश्चिम बंगाल आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 1949 की धारा 4 संविधान के अनुच्छेद 14 का इसलिए अतिक्रमण करती है क्योंकि यह उपबन्ध राज्य सरकार को यह चुनने का, कि कौन से अपराध विशेष प्रक्रिया के अंतर्गत विशेष न्यायालयों द्वारा विचारणीय हों, मनमाना अधिकार देती है जिससे उन मामलों में अभियुक्त सामान्य प्रक्रिया के अंतर्गत साधारण न्यायालयों द्वारा विचारण किये जाने से मिलने वाले लाभों से वंचित रह जाते हैं। उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम की उद्देशिका, "कतिपय अपराधों के अधिक शीघ्र विचारण व अधिक प्रभावी दण्ड प्रदान करना समीचीन है-" की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इससे यह स्पष्ट है कि कुछ अपराधों का विचारण विशेष प्रक्रिया द्वारा अधिक शीघ्रता से एवं अधिक प्रभावी दण्ड व्यवस्था के अंतर्गत किया जाना चाहिए जिसके लिए अधिनियम ने राज्य सरकार को यह विवेकाधार प्रदान किया है कि वह उन मामलों को चुने । अतः संविधान के अनुच्छेद 14 का कोई अतिक्रमण नहीं होता ।

(ii) ए० सी० शर्मा बनाम दिल्ली प्रशासन A.L.R. 1273 S.C. 913 में अपीलार्थी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 की धारा 5 के अंतर्गत स्वयं की दोषसिद्धि को चुनौती दी। उसका तर्क था कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन की स्थापना के पश्चात् दिल्ली पुलिस के भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का घूसखोरी के मामलों में अन्वेषण का अधिकार समाप्त हो गया क्योंकि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 की उद्देशिका ऐसा ही दर्शाती है। इस तर्क को नामंजूर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी कानून के असंदिग्ध व स्पष्ट शब्दों में कोई उद्देशिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती। 1946 के उपर्युक्त अधिनियम की धारा 13 के द्वारा दिल्ली विशेष पुलिस को भी ऐसे मामलों में अन्वेषण का अधिकार है और यह अधिनियमिति कहीं पर भी यह नहीं कहती कि नियमित दिल्ली पुलिस की भ्रष्टाचार निरोध शाखा के अन्वेषण का अधिकार समाप्त हो गया । 1946 का अधिनियम केवल एक अनुज्ञेय विधान

(iii) आत्म प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य A.I.R. 1986 S.C. 895 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भले ही संविधान की व्याख्या करनी हो या किसी कानून की संवैधानिक प्रामाणिकता की जाँच करनी हो, एक मुख्य नियम यह है कि संविधान की उद्देशिका को पथप्रदर्शक रोशनी तथा राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों को निर्वचन की पुस्तक के रूप में देखना चाहिए। उद्देशिका में लोक आशा और आकांक्षा अन्तर्निहित हैं तथा निदेशक सिद्धान्त प्राप्त करने वाले उद्देश्यों को स्पष्ट करता है। जब संविधान के परिप्रेक्ष्य में कानूनों की जाँच की जानी होती है तो इन्हीं चश्मों की • सहायता से न्यायालय को "दूर दृष्टि" तथा "निकट दृष्टि" देखनी होती हैं। संविधान "सुई जेनेरिस " होने के कारण जहाँ संवैधानिक विवाद्यकों पर ध्यान दिया जा रहा है तंग निर्वचनीय नियम, जो विधायनी अधिनियमितियों के निर्वचन के लिये सुसंगत हैं अयोग्य हो सकते हैं। सन् 1977 में संविधान के बयालीसवें संशोधन द्वारा भारत एक समाजवादी गणतन्त्र बना। शब्द "समाजवादी" को संविधान की उद्देशिका में जोड़ा गया। यह शब्द जो जब जमता की आशा एवं आकांक्षाओं का केन्द्र बन गया है तथा जो संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में वर्णित सभी आशाओं के पथप्रदर्शन एवं प्रेरणा संकेत हैं, प्राचीन सामन्तवादी और शोषित समाज के स्थान पर नवीन गुंजायमान समाजवादी कल्याणकारी समाज निर्माण का स्पष्ट मार्गदर्शक है। चाहे संविधान के किसी अनुच्छेद का निर्वचन हो या किसी अन्य कानून की संवैधानिकता का परीक्षण, न्यायालयों को इस प्रकार की व्याख्या करनी चाहिए जो समाजवादी लोकतान्त्रिक राज्य की ओर बढे।

3. लघु शीर्षक या संक्षिप्त नाम ( Short Title ) - किसी कानून का लघु शीर्षक उसे पहचानने की दृष्टि से नामकरण मात्र है। यद्यपि यह उस कानून की एक विशिष्टि है तथापि उस कानून के किसी उपबन्ध को निर्वचित करते समय इससे कोई सहायता नहीं ली जा सकती। किसी स्पष्ट उपबन्ध को न तो यह विस्तृत कर सकता है और न ही संक्षिप्त ।

4. दीर्घ शीर्षक या विस्तृत नाम (Long Title) - प्रत्येक कानून अपने नाम के बाद दीर्घ शीर्षक से ही प्रारम्भ होता है। इसका हेतु उस कानून के उद्देश्यों के बारे में एक साधारण जानकारी देना है। उदाहरणार्थ; दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का दीर्घ शीर्षक है "दण्ड प्रक्रिया सम्बन्धी विध का समेकन और संशोधन करने के लिए अधिनियम" ।

प्राचीन काल में दीर्घ शीर्षक को कानून का भाग नहीं माना जाता था और इसलिए कानून के निर्वचन में एक आन्तरिक सहयोगी के रूप में इसकी कोई मान्यता नहीं थी। परन्त अब वर्तमान में न्यायालयों के दृष्टिकोण में निश्चित परिवर्तन हुआ है और अनेक अवसरों पर कानून के उपबन्धों के निर्वचन में न्यायालय ने उसके दीर्घ शीर्षक से सहयोग लिया है। उदाहरणार्थ-

(i) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस A.I.R. 1952 S.C. 369 में याची उच्चतम न्यायालय तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय दोनों का ही अधिवक्ता था। उसने रजिस्ट्री की मूल शाखा में स्वयं के पक्ष में अपने मुवक्किल की ओर से उपस्थित होने का समुचित आधार दाखिल किया। इस आधार पर कि उच्च न्यायालय की मूल शाखा के नियम एवं आदेश के अन्तर्गत एक अधिवक्ता केवल अभिवाक् कर सकता है कार्य नहीं, उसके आधार को वापस कर दिया गया। याची ने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय का अधिवक्ता होने के कारण वह अटर्नी से बिना कोई अनुदेश प्राप्त किए स्वयं ही कार्य एवं अभिवाक् दोनों ही कर सकता है। उच्चतम न्यायालय के उच्चतम न्यायालय (उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय) अधिनियम, 1951 के दीर्घ शीर्षक " अधिनियम जो उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ताओं को किसी भी उच्च न्यायालय में अधिकार स्वरूप विधि-व्यवसाय करने को प्राधिकृत करता है” की ओर ध्यान देते हुए याची का तर्क स्वीकार कर उसे अपसे मुवक्किल की ओर से कार्य और अभिवाक् करने की स्वीकृति प्रदान की गई।

(ii) केदार नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य A.I.R. 1953 S.C. 404 में पश्चिम बंगाल आपराधिक संशोधन अधिनियम, 1949 की धारा 4 की व्याख्या का प्रश्न था। इस धारा के अंतर्गत राज्य सरकार को यह चुनने का अधिकार था कि कौन से मामले निर्देश के लिये प्रक्रिया के अन्तर्गत विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय होंगे। इसे इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का अतिक्रमण करता है। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए अन्य बातों के साथ-साथ यह निर्धारित किया कि इस अधिनियम का दीर्घ शीर्षक "अधिनियम जो कतिपय अपराधों का अधिक शीघ्र विचारण व अधिक प्रभावपूर्ण दण्ड का प्रबन्ध करता है" स्पष्ट रूप से राज्य सरकार को विवेकाधिकार प्रदान करता है कि कौन से अपराध विशेष न्यायालयों द्वारा विशेष प्रक्रिया के अन्तर्गत विचारणीय होने चाहियें।

5. हासियाँ टिप्पणियाँ (Marginal Notes) – हासियाँ टिप्पणियाँ वे टिप्पणियाँ हैं जो किसी अधिनियम में धाराओं की बगल में लिखी जाती हैं और धाराओं के प्रभाव को स्पष्ट करती हैं। प्राचीन काल में जब किसी संविधि के वास्तविक अर्थ के बारे में कोई शंका होती थी तो कभी-कभी हासियां टिप्पणी की सहायता से भी उस संविधि का उचित अर्थ ज्ञात कर लिया जाता था। परन्तु न्यायालयों का आधुनिक मत यह है कि कानून के निर्वचन में हासियाँ टिप्पण का कोई योगदान नहीं है। इस मत का आधार यह है कि हासियाँ टिप्पण कानून का भाग नहीं है क्योंकि उन्हें विधायक निर्धारित नहीं करते और न ही उन्हें विधायिका के अनुदेश या प्रभुत्व के अंतर्गत हासियाँ में मुद्रित किया जाता। इन टिप्पण को पाण्डु-लेखक के द्वारा निविष्ट किया जाता है और कभी-कभी तो वे अशुद्ध भी हो सकते हैं। कभी कभी अपवादपूर्ण अवस्थाओं में हासियाँ टिप्पणी, को विधायिका द्वारा भी निविष्ट किया गया है और इसलिए इस प्रकार की किसी अधिनियमिति का निर्वचन करते समय हासियाँ टिप्पण से भी सहयोग लिया जा सकता है। भारतीय संविधान ऐसा ही एक उदाहरण है। इसमें हासियाँ टिप्पण संविधान सभा द्वारा ही निविष्ट किये गये थे और। इसलिये भारतीय संविधान के किसी भाग का निर्वचन करते समय हासियाँ टिप्पणी से सहायता। ली जा सकती है। उदाहरणार्थ-

(i) बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1955 S.C. 661 में उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से यह निर्धारित किया कि संविधान के अनु० 286 की हासियाँ टिप्पणी संविधान का ही भाग है और इस कारण उस अनुच्छेद के उद्देश्य एवं अर्थ को समझने के लिये इसका सहयोग लिया जा सकता है। अनु० 286 की हासियाँ टिप्पणी है—“माल के क्रय या विक्रय पर कर के आरोपण के बारे में बन्धन"। यह ब्रिटिश संसद के अधिनियमों के हासियाँ टिप्पण के विपरीत संविधान सभा द्वारा पारित किये जाने के कारण संविधान का भाग है और प्रथम दृष्ट्या उस अनुच्छेद के उद्देश्य और अर्थ को जानने का संकेत है। परन्तु न्यायमूर्ति वेंकटरामा अय्यर ने अपने अल्पमत निर्णय में कहा कि अनु० 286 (1) (क) के हासियाँ टिप्पण से उसके स्पष्टीकरण के निर्वचन में सहयोग लिया जा सकता है तथा यह संविधान में प्रयुक्त शब्दों के स्पष्ट अर्थ को बदल नहीं सकता।

(ii) के० पी० वर्गीज बनाम आयकर अधिकारी A.I.R. 1981 S.C. 1922 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यद्यपि यह सच है कि किसी धारा का निर्वचन करते समय उस धारा के हासियाँ टिप्पणी से कोई सहयोग नहीं लिया जा सकता फिर भी इससे इस बात का ज्ञान तो हो सकता है कि धारा का झुकाव किस ओर है एवं धारा का सम्बन्ध किस विषय से है। यह किसी धारा के शब्दों के निर्वचन को नियन्त्रित नहीं कर सकता विशेषकर उस समय जब धारा की भाषा स्पष्ट एवं असंदिग्ध हो । परन्तु उस कानून का भाग होने पर यह प्रथमदृष्ट्या धारा के उद्देश्य और अर्थ की ओर कुछ संकेत देता है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 52 के प्रारम्भ में उस भाग का हासियाँ टिप्पण था जो आज उपधारा (1) है और विशेष बात यह है कि उपधारा (2) के जोड़ दिए जाने के बाद भी यह हासियाँ टिप्पण ज्यों का त्यों बना हुआ है। इससे यह स्पष्ट है कि संसद् इसको दोनों उपधाराओं पर लागू करना चाहती थी और इसलिए यह सुस्पष्ट है कि उपधारा (1) की तरह उपधारा (2) भी उन मामलों से सम्बन्धित है जहाँ अन्तरण के सन्दर्भ में प्रतिफल को कम करके बताया गया हो।

6. धाराओं के शीर्षक (Headings of Sections) - प्रायः देखा गया है कि संविधियों में धारा के शीर्षक एक धारा या कुछ धाराओं के समूह के साथ ऊपर दिये जाते हैं। न्यायालयों ने शीर्षक को धारा एवं धाराओं के समूह को उद्देशिका माना है। इसलिए किसी संविधि के निर्वचन में शीर्षक को उद्देशिका के समान ही महत्व प्रदान किया गया है तथा उद्देशिका पर लागू होने वाले नियम लागू होते हैं। अतः यदि अधिनियमिति की भाषा से उसका अर्थ स्पष्ट हो तो शीर्षक से कोई सहयोग नहीं लिया जा सकता। परन्तु यदि उसके एक से अधिक युक्तियुक्त अर्थ निकलते हों तो उनमें से कौन सा अर्थ उचित है ज्ञात करने के लिए शीर्षक से सहायता ली जा सकती है। उदाहरणार्थ - भींका बनाम चरणसिंह A.I.R. 1959 S.C. 960 में अपीलार्थी उत्तरदाता भू-स्वामी का किरायेदार था। उत्तरदाता अपीलार्थी को उत्तर प्रदेश किरायेदारी अधिनियम, 1939 की धारा 180 के अंतर्गत बेदखल करना चाहता था। इस धारा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी भूमि के टुकड़े पर उस व्यक्ति को, जो उसको उसमें प्रवेश देने का हकदार है, अनुमति के बगैर तथा विधि के उपबन्धों के प्रतिकूल कब्जा कर लेता है या कब्जा बनाये रखता है तो उसको बेदखल करने का अधिकार होगा। उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी के इस तर्क से सहमत होते हुए कि यह उपबन्ध प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू नहीं होता क्योंकि उसके पास दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 145 के आदेश के अंतर्गत कब्जा था, स्पष्ट किया कि धारा 180 केवल उन मामलों पर ही लागू होती है जहाँ भू-स्वामी उन व्यक्तियों को बेदखल करने का प्रयत्न करता है जिनके पास कब्जे का कोई अधिकार नहीं है। यह बात और भी अधिक उस धारा के शीर्षक “भूमि पर बिना स्वत्व के कब्जा करने वाले व्यक्ति का निष्कासन" से साबित होती है।

7. परिभाषा या निर्वचन खण्ड (Definition or Interpretation Clauses) - परिभाषा या निर्वचन खण्डों को कानून में साधारणतया कुछ अभिव्यक्तियों के प्राकृतिक अर्थों की परिभाषा के अनुसार विस्तृत करने या उन शब्दों को जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं हैं परिभाषा के अनुसार अर्थ देने के उद्देश्य से शामिल किया जाता है। साधारणतया निर्वचन खंड में दिए गए किसी विशिष्ट शब्द के अर्थ का आशय यही है कि उस कानून में जहाँ पर उस शब्द का प्रयोग हुआ है उसे निर्वचन खंड में स्पष्ट किए गए अर्थ में ही लिया जाए। इस नियम का केवल एक अपवाद यही है कि यदि किसी संदर्भ में उस शब्द का निर्वाचन खंड में दिया गया अर्थ बेतुका व निरर्थक है तो उस उपबन्ध का निर्वचन करते समय न्यायालय उस शब्द का वह अर्थ नहीं लेंगे। इसी प्रकार किसी एक अधिनियम के निर्वचन खंड में दिए गए शब्द के अर्थ को अन्य अधिनियम में लागू नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि दोनों कानून साम्य विषय-वस्तु कानून हैं, तथा एक शब्द जिसका प्रयोग दोनों कानूनों में किया गया है पर जिसे एक कानून के निर्वचन खण्ड द्वारा परिभाषित किया गया 1 है, दूसरे कानून में भी उसी अर्थ में लिया जाएगा। उदाहरणार्थ- (i) प्रद्युत कुमार बनाम मुख्य न्यायाधीश, कलकत्ता AIR. 1956 S.C. 285 में अपीलार्थी, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय का रजिस्ट्रार था, को उत्तरदाता ने बर्खास्त कर दिया। अपीलार्थी ने इसको इस आधार पर चुनौती दी कि उत्तरदाता मुख्य न्यायाधीश के पास बर्खास्त आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि संविधान ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को नियुक्त करने का अधिकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दिया है। साधारण खंड अधिनियम की धारा 16 (1), जो संविधान के अनुच्छेद 367 (1) के अनुसार संविधान पर भी लागू होती है, के अनुसार नियुक्त करने के अधिकार में बर्खास्त करने का अधिकार भी शामिल है अतः अपीलार्थी की अपील स्वीकार करने योग्य नहीं है।

8. परन्तुक (Provisos) – परन्तुक धारा का एक भाग होता है और इसे धारा से अलग नहीं किया जा सकता । परन्तुक धारा को नष्ट नहीं करता बल्कि शर्त लगा देता है। परन्तुक धारा का सहायक होता है। यदि धारा और परन्तुक में संघर्ष (Conflict) हो तो परन्तुक भाग को छोड़ा - जा सकता है। वास्तव में परन्तुक का अभिप्राय मुख्य धारा के उपबन्ध पर कुछ रोक लगाना होता ।। परन्तु परन्तुक किसी अधिनियम की पूरी व्यवस्था को नष्ट नहीं कर सकता। परन्तुक का मुख्य • कार्य किसी संविधि की सामान्य व्यवस्थाओं पर अपवाद पेश करना होता है। दूसरे शब्दों में उस अपवाद को छोड़कर जो परन्तुक द्वारा पेश किया गया है, अधिनियम का सामान्य प्रभाव ज्यों का त्यों बना रहता है। उदाहरणार्थ-

(i) टी० देवदासन बनाम भारत संघ A.I.R. 1964 S.C. 179 में याची ने कहा कि यदि संघ लोक सेवा आयोग ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जातियों के लिए आरक्षित कोटा का पालन किया होता तो उसको भी पदोन्नति का अवसर मिलता। इसके स्थान पर संघ के द्वारा अग्रनयन सिद्धान्त पालन किए जाने के कारण एक वर्ष में आरक्षित कोटा भरा न जाने के कारण उसे अगले वर्ष के लिए अग्रनयित कर दिया गया जिससे अगले वर्ष का आरक्षित कोटा बढ़कर पैंसठ प्रतिशत हो गया। यह संविधान के अनु० 16 (1), का अतिक्रमण है। उत्तरदाता का तर्क था कि संविधान के अनु० 16 (4) के अनुसार इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनके प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी।

अतः अमनयन का सिद्धान्त वैध है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि भारत संघ का तर्क मान्य नहीं हो सकता क्योंकि अनु० 16 (4) के अन्तर्गत नियुक्तियों का असीमित आरक्षण अनु० 16 (1) की आत्मा को नष्ट कर देगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 16 के खण्ड (4) को इसी अनुच्छेद के खण्ड (1) का परन्तुक जैसा समझना चाहिए और इसलिए उसको इस प्रकार निर्वाचित नहीं किया जा सकता जिससे प्रमुख उपबन्ध ही नष्ट हो जाए।

(ii) एस० सुन्दरम् बनाम ही० आर० पट्टाभिरमण A.I.R. 1985 S.C. 582 में कहा गया कि परन्तुक निम्नलिखित चार उद्देश्यों को पूरा कर सकता है- (i) वह मुख्य अधिनियमिति से कुछ विषयों को अपवाद बनाए या विशेषित करें,

(ii) वह अधिनियमित को व्यावहारिक बनाने के लिए कुछ आज्ञापक दशाओं के पूर्ण किए

जाने पर जोर देकर अधिनियमिति की धारणा या आशय को ही सम्पूर्णतः परिवर्तित करे, (iii) वह अधिनियम में ही इस प्रकार शामिल हो कि वह अधिनियमिति का ही एक आवश्यक भाग बन जाए और इस प्रकार स्वयं भी अधिष्ठायी अधिनियमिति का भाव एवं रंग प्राप्त कर ले, तथा

(iv) वह अधिनियमिति के केवल एक वैकल्पिक परिशिष्ट की तरह कार्य करे जिसका केवल उद्देश्य कानूनी उपबन्ध के वास्तविक आशय को स्पष्ट करना हो।

9. उदाहरण या दृष्टान्त (Illustrations) - प्रायः देखा गया है कि कानून की धाराओं में उदाहरण इस आशय से जोड़े जाते हैं कि धाराओं के अन्तर्गत वर्णित विधि के उपबन्धों को और अधिक स्पष्ट किया जा सके। चूँकि उदाहरण विधायिका के आशय का ज्ञान कराते हैं अतः वे कानून बनाने वाले के आशय का अच्छा संकेत हैं। परन्तु किसी स्पष्ट अधिनियमिति को उसमें वर्णित उदाहरणों के आधार पर विस्तृत या सीमित अर्थ नहीं दिया जा सकता। उदाहरणार्थ-

(i) शम्भू नाथ बनाम अजमेर राज्य AIR 1965 S.C. 104 में सबूत के भार की चर्चा करते हुए उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 धारा 101 का अपवाद है एवं धारा 101 अपने उदाहरण (क) के साथ मिलकर आपराधिक विधिशास्त्र का मूल नियम कि किसी मामले को साबित करना अभियोजन का उत्तरदायित्व है, पर जोर देता है। धारा 106 का उदाहरण (ख) भारतीय रेल अधिनियम, 1890 की धाराओं 112 व 113 पर लागू होता है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि उदाहरण जिस धारा को स्पष्ट करता है उसकी सम्पूर्ण मात्रा को खत्म नहीं करता और न ही उसके क्षेत्र को विस्तृत या सीमित करता।

(ii) महेश चन्द्र शर्मा बनाम राजकुमारी शर्मा A.1. R. 1996 S.C. 869 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दृष्टान्त धारा का ही भाग है और यह धारा के सिद्धान्तों को सुस्पष्ट करने में सहायक होता है।

10. अपवाद एवं व्यावृत्ति खण्ड (Exceptions and Saving Clauses ) - आमतौर से किसी संविधि में अपवाद ऐसी विषय-वस्तु को अधिनियमिति के क्षेत्र से परे रखने के लिए शामिल किया जाता है जो, यदि ऐसा न किया जाता तो, अधिनियमित के क्षेत्र में ही होता। अपवाद इस बात की पुष्टि करता है कि जो विषय अपवाद के रूप में अलग नहीं किये गए हैं वे प्रमुख उपबन्ध में शामिल हैं। प्रमुख उपबन्ध व अपवाद में आपस में असंगति या विरोध के समय उपबन्ध को ही महत्वपूर्ण मानना चाहिये यद्यपि अपवादस्वरूप कुछ ऐसे निर्णय भी वर्तमान हैं जिनमें अपवाद को विधायिका का अंतिम आशय मानकर उसे ही अधिक महत्व दिया गया है।

व्यावृत्ति खंड साधारणतः किसी कानून के निरसन व पुनः अधिनियमन की दशा में शामिल किये जाते हैं। इसके द्वारा निरसित कानून के अंतर्गत स्थापित अधिकारों में कोई विघ्न नहीं डाला जाता है और न हीं नये अधिकार दिये जाते हैं। सामान्यतः व्यावृत्ति खंड को निरसन करने वाले कानून में शामिल किया जाता है। कानून के प्रमुख भाग और व्यावृत्ति खंड में विरोध होने पर व्यावृत्ति खंड को अस्वीकार किया जाना चाहिये।

11. स्पष्टीकरण (Explanations) - उपबन्धों के अर्थों को सुस्पष्ट करने के उद्देश्य से तथा शंका व संदिग्धता (Ambiguity) को दूर करने के आशय से स्पष्टीकरण शामिल किए जाते हैं। स्पष्टीकरण उपबन्धों के अर्थ को विस्तारित नहीं करता वरन् केवल उसके सच्चे वास्तविक अर्थ को समझने में सहयोग देता है। उदाहरणार्थ-

(i) बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1955 S.C. 661 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्पष्टीकरण जिस धारा के साथ शामिल किया जाता है उसका ही भाग है और उपबन्ध के वास्तविक अर्थ को जानने के लिए सम्पूर्ण धारा जिसमें स्पष्टीकरण भी शामिल है, को सम्पूर्ण रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए। एक विधिक कल्पना जिस उद्देश्य के लिए गढ़ी गई है वहीं तक सीमित है और उस सीमा के बाहर लागू नहीं की जानी चाहिये। इस मामले में स्पष्टीकरण का प्रकट उद्देश्य अनु० 286 (1) के उपखंड (क) के बाह्य विक्रय को स्पष्ट करना है। खंड 1(1) में दिये गये स्पष्टीकरण को खंड (2) में एक अपवाद के रूप में या उसके परन्तुक के रूप में या खंड (2) के क्षेत्र की सीमित करने के रूप में लागू नहीं किया जा सकता। अतः केवल उन अवस्थाओं को छोड़कर जिनमें संसद विधि द्वारा अन्यथा न पारित करे, कोई राज्य विधान मण्डल विक्रय या क्रय पर कोई कर न तो आरोपित कर सकती है और न ही कर अधिरोपण का अनुमोदन कर सकती है, यदि यह विक्रय या क्रय अन्तर्राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान हुआ हो और भले ही वह स्पष्टीकरण के अन्तर्गत हो या नहीं।

(ii) एस० सुन्दरम् बनाम ह्वी० आर० पट्टाभिरमण AIR. 1985 SC 582 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अब यह निश्चित है कि किसी कानूनी उपबन्ध में जोड़ा गया स्पष्टीकरण किसी प्रकार से अधिष्ठायी उपबन्ध नहीं है, परन्तु जैसा कि इस शब्द के स्पष्ट अर्थ से ही प्रकट है, यह केवल कानूनी उपबन्ध में उपस्थित किसी प्रकार की असंदिग्धता को स्पष्ट करने या सुलझाने के लिए जोड़ा जाता है। किसी कानूनी उपबन्ध में स्पष्टीकरण का निम्नलिखित पाँच उद्देश्य हैं-

(i) स्वयं अधिनियम के अर्थ तथा आशय को स्पष्ट करना;

(ii) जहाँ कहीं मुख्य अधिनियमिति में शंका या संदिग्धता हो उसे इस प्रकार से स्पष्ट करना कि वह अधिनियम के मुख्य उद्देश्य के समनुरूप हो;

(iii) अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य को और अधिक अर्थपूर्ण एवं उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए एक अतिरिक्त स्तम्भ प्रदान करना;

(iv) स्पष्टीकरण किसी प्रकार से अधिनियमिति या उसके किसी भाग में न हो हस्तक्षेप कर सकता है और न ही उसे परिवर्तित कर सकता है, परन्तु जहाँ कोई रिक्त स्थान छोड़ दिया गया हो जो स्पष्टीकरण के उद्देश्य से सुसंगत हो, तो रिष्टि को दबाने और अधिनियम के उद्देश्य को बढ़ाने के लिए यह न्यायालय को, अधिनियमिति के वास्तविक अर्थ एवं आशय को प्राप्त करने के आशय से. उचित निर्वचन में सहायता दे सकता है; तथा

(v). कानून द्वारा प्रदत्त किसी अधिकार को यह छीन नहीं सकता और न ही अधिनियम के निर्वाचन में रोड़ा अटका कर उसके संचालन को नष्ट कर सकता।

12. अनुसूची (Schedules) – अनुसूची सामान्यतः उस अधिनियम के अन्तर्गत और अधिकारों का किस प्रकार निपटारा किया जाय या अधिनियम के द्वारा प्रदान की गई शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जाय, बतलाती है। कभी-कभी अनुसूची में एक तालिका के रूप में कुछ विषय भी वर्णित किये जाते हैं जिनका आशय उपयुक्त या अधिनियम को अधिक कारगर बनाना होता है। भारतीय संविधान एक ऐसा ही उदाहरण है। अनुसूची कानून का भाग होती है और किसी धारा का निर्वचन करते समय न्यायालय अनुसूची से सहयोग ले सकता है। इसी प्रकार अधिनियम की सच्ची आत्मा को समझने के लिए अनुसूची का निर्वचन करते समय धाराओं से भी सहयोग लिया जा सकता है। उदाहरणार्थ- मै० एफाली फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1989 S.C. 2227 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी अधिनियम की अनुसूची एवं मुख्य धारा में विरोध होने पर मुख्य धारा ही प्रबल रहती है और अनुसूची को अमान्य घोषित किया जाता है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि आयुर्वेदिक औषधि "अश्वगंधारिष्ट" जिसमें आत्म उत्पन्न मद्य (एलकोहॉल) रहता है परन्तु जिसे सामान्य मदिरा (मादक पेय) के रूप में नहीं पिया जा सकता, उत्पाद शुल्क से मुक्त होगा।

13. विराम चिन्ह (Punctuations) - स्मरणीय है कि प्राचीन काल में कानून बिना विरामादि-विधानों के पारित किये जाते थे और इसलिये यह स्वाभाविक ही था कि न्यायालय इस ओर ध्यान नहीं देते थे। परन्तु आधुनिक युग में विरामादि विधानों में प्रयोग होते हैं। अतः जब कोई विषय न्यायालय के निर्वचन के लिए आता है तो न्यायालय उस उपबन्ध को पहले उसी आकार में देखता है जिस आकार में विरामादि-विधानों सहित वह अस्तित्व में है और यदि न्यायालय समझता है कि उसके विरामादि-विधानों सहित अर्थ में कोई निरर्थकता या संदिग्धता नहीं है तो वह उसे उसी प्रकार निर्वचित कर देता है। परन्तु विरामादि-विधानों सहित निर्वचन करते समय कोई निरर्थकता या संदिग्धता का बोध होता हो तो न्यायालय पूरे उपबन्ध को बिना विरामादि-विधानों के पढ़ेगा और यदि उससे स्पष्ट हो तो विरामादि-विधानों को कोई महत्व दिये बगैर इस प्रकार व्याख्या कर देगा। उदाहरणार्थ-

(i) ए० के० गोपालन बनाम मद्रास राज्य ए० आई० एस० 1950 एस० सी० 27 में संविधान अनु० 22 (7) में अल्पविराम के महत्व को समझाते हुए उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के न्यायमूर्ति कानिया ने स्पष्ट किया कि उपखंड के प्रथम भाग में शब्द "किन" व "किस" का दो बार प्रयोग एवं प्रत्येक बार के बाद अल्पविराम यह दर्शाता है कि संविधान निर्माता इनका प्रयोग संयुक्त रूप में न कर विभाजन के रूप में करना चाहते थे। इस व्याख्या को बाद में स्वयं उच्चतम . न्यायालय के वृहत् बेंच द्वारा शम्भू नाथ सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य ए० आई० आर० 1973 एस० सी० 1425. में इस आधार पर पलट दिया गया कि अनुच्छेद के संदर्भ में ऐसा उचित नहीं था।

(ii) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस ए० आई० आर० 1952 एस० सी० 369. में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि विरामादि-विधानों को "नियन्त्रण करने वाले तत्व" नहीं माना जा सकता और इसलिये वे विधान के स्पष्ट अर्थ को नियन्त्रित नहीं कर सकते।

14. सामान्य उपशीर्षक (General Sub-Heading) – जहाँ किसी अधिनियम की किसी धारा में प्रयुक्त भाषा स्पष्ट है, वहाँ उस सामान्य शीर्षक का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिसके अन्तर्गत वह धारा वर्णित है। उपशीर्षकों का उस भाषा पर प्रभाव नहीं कहा जा सकता जिसका उपयोग उस धारा में किया गया है। किसी एक संविधि की विभिन्न धाराओं के उपशीर्षकों को किसी अन्य विशिष्ट उपशीर्षक से उत्पन्न होने वाली संदिग्ध अभिव्यक्ति को स्पष्ट करने के उपयोग में लाया जा सकता है। वे उप शीर्षक अधिनियम में प्रयुक्त शब्दों के स्पष्ट अर्थ को नियंत्रित नहीं कर सकते भले ही कुछ ऐसे प्रसंगों में प्रस्तावना में दिखाई गई दिशा के अनुरूप उन उपशीर्षकों से सहायता ली जा सकती हो जबकि किसी धारा का अर्थ उस दृष्टि से संदिग्ध हो ।

आधुनिक संविधियों में प्रत्येक धारा पर दिया गया उपशीर्षक उस धारा के लिए प्रस्तावनास्वरूप माना जाता है। वे संविधि के स्पष्ट शब्दों को नियंत्रित नहीं कर सकते, किन्तु संदिग्ध शब्दों को वे स्पष्ट कर सकते हैं। यदि उस धारा के किन्हीं शब्दों की व्याख्या में कोई सन्देह दिखाई पड़ता है, तो निश्चय ही उपशीर्षक से न्यायालयों को इस बात से सहायता मिलती है कि उस सन्देह को दूर कर सके। मिका ब० चरनसिंह 1959 आल० एल० जे० 557.

15. संयुक्तात्मक और वियुक्तात्मक शब्द (Conjunctive and Disjunctive Words) - न्यायालय द्वारा यह निष्कर्ष दिया गया है कि ऐसी परिस्थितियाँ हो सकती हैं जबकि किसी संविधि में प्रयुक्त संयुक्तात्मक शब्द 'और' का अर्थ वियुक्तात्मक शब्द 'अथवा' के रूप में या 'अथवा' का 'और' के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। किन्तु आपराधिक या दाण्डिक विधायन में संयुक्तात्मक शब्दों को वियुक्तात्मक रूप में या वियुक्तात्मक शब्दों को संयुक्तात्मक के रूप में कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, विशेष रूप से उस समय जब कि ऐसा अर्थ ग्रहण करने से अपराध की मात्रा में और भी वृद्धि हो रही हो। (राज्य बनाम वाल्टर्स, 97 एन० सी० 489) I

न्यायालय को यह मानना पड़ेगा कि विधायिका ने जिस अभिव्यक्ति के लिए जिस विशिष्ट शब्द का चयन किया है, वह उद्देश्यपूर्ण है और वही अर्थ ग्रहण भी किया जाना चाहिये जो विधायिका द्वारा निर्धारित है। जब तक कि व्याख्या में कोई शब्द अभीप्सित अर्थ के अतिरिक्त कोई अन्य अर्थ न देने लगे, तब तक व्याकरणमूल अर्थ को ही स्वीकार किया जाना चाहिये । इसीलिये 'और' के स्थान पर 'अथवा' या 'अथवा' के स्थान पर 'और' का अर्थ तभी स्वीकार किया जाना चाहिये जब व्याख्या सम्बन्धी कोई स्पष्ट भ्रान्ति दिखाई पड़ रही हो, और ऐसा करने से विधायिका के आशय की रक्षा करते हुये संविधि का तर्कसंगत अर्थ निकल रहा हो।

'अथवा' शब्द को 'और' के रूप में कदापि नहीं पढ़ा जा सकता। यदि प्रयुक्त छोटे शब्द स्पष्ट और असंदिग्ध हैं तो अनिवार्य रूप से उनका साधारण अर्थ ही ग्राह्य होगा। केवल यह तथ्य कि एक संविधि के परिणाम अनुचित हो जायेंगे, न्यायालय को इस बात के लिए हकदार नहीं बना देता कि वह उसे प्रभावी बनाने से इन्कार कर दे। यदि एक अधिनियम में किसी शब्द की दो भिन्न-भिन्न व्याख्यायें की गयी हैं, तो वहाँ न्यायालय उस व्याख्या को ग्रहण करेगा जो उचित, युक्तयुक्त और व्यावहारिक हो, में यह उसके मुकाबले में जो इन गुणों से युक्त नहीं है।

16. लिंग (Gender) - प्रायः यह देखा गया है कि संविधियों में केवल पुल्लिंग बोधक शब्दों का ही प्रयोग किया जाता है परन्तु व्याख्या में यह स्त्री-पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है। अर्थात अधिनियम के उद्देश्यों के लिए He के स्थान पर She पढ़ा जा सकता है।

17. शब्दों का अर्थ (Meaning of Words) - ऐसे शब्द, जिनका अर्थ कई प्रकार का हो, वही अर्थ स्वीकार करना चाहिये जो धारा की सामान्य भाषा के अनुरूप हो। कई शब्द जब एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, और भिन्न-भिन्न अर्थ परिभाषित नहीं हैं तो यह अनुमान कर लेना होगा कि इन भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियों का एक ही अर्थ आशयित है। किन्तु व्याख्या करने में इसे सार्वदेशिक नियम नहीं कह सकते। इससे केवल विधायिका के आशय का संकेत मिलता है जिससे न्यायालय इस बात की कल्पना करता है कि विधानांग ने एक ही प्रकार के कुछ शब्दों को एक साथ एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया है।

क्रेइज के मतानुसार शब्दों और अभिव्यक्तियों की व्याख्या के लिये दो नियम हैं—पहला नियम यह है कि सामान्य परिनियम के लिए प्रथम दृष्टया उपधारित किया जायेगा कि वे अपने प्रसिद्ध भावों में शब्दों को प्रयुक्त करते हैं। दूसरे शब्दों में शब्दों, जो किसी विशिष्ट विज्ञान या कला में लागू नहीं किया जाता है, का अर्थान्वयन किया जाता है जैसे कि वे सामान्य भाषा में समझे जाते हैं। भाषा के स्पष्ट और प्रसिद्ध अर्थ का अनुसरण किया जाना चाहिये। (टाटा इन्जीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव कं० लि० जमशेदपुर बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, ए० आई० आर० 1969 पटना 23)।

दूसरा नियम परिनियम की वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा से सम्बन्धित है। यदि परिनियम विशेष व्यापार, कारबार या संव्यवहार के निर्देश के सम्बन्ध में हो, तब उसमें प्रयुक्त शब्द, जिससे प्रत्येक व्यक्ति उस व्यापार, कारबार या संव्यवहार के सम्बन्ध में परिचित हैं, और उसका विशिष्ट अर्थ होना समझता है, तो उन शब्दों का उस विशिष्ट अर्थ के अनुसार अर्थान्वयन किया जाना चाहिये जो साधारण या प्रसिद्ध अर्थ से भिन्न होता है (टाटा इन्जीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव कं०, जमशेदपुर बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, ए० आई० आर० 1989 पटना 23)।

18. सम्मिलित होना (Include) - सामान्यतः 'सम्मिलित होना' शब्द व्याख्या के उपखण्डों में प्रयोग किया जाता है जिससे शब्द तथा उप-वाक्य जो संविधि में प्रयुक्त हुए हैं और जब वे प्रयोग किय गये हैं तो उनका अर्थ शामिल होने से हैं। ऐसा केवल उनके प्राकृतिक अर्थ से नहीं अपितु वे सभी चीजें भी जब व्याख्या के उप-खण्ड यह घोषणा करते हों, कि वे इसमें शामिल होंगे। (अहमेदुल्ला बनाम हफीजद्दीन अहमद, ए० आइ० आर० (1973) गौहाटी, 56) ।

19. सक्षमकारी और अक्षमकारी संविधियाँ (Enabling and Disabling Statutes) - सक्षमकारी संविधियाँ सामान्य विधि की सम्भावनाओं को वहाँ तक विस्तारित करती हैं जहाँ तक वे अत्यधिक सीमित या प्रतिबन्धित हैं। अक्षमकारी संविधियाँ इसका ठीक विपरीत प्रभाव डालती हैं। वे सामान्य विधि को सीमित और संकुचित करने का काम करती हैं। कोई संविधि जब विधि के किसी ऐसे उपबन्ध को वैध कर देती है, जो अन्यथा रूप में अवैध हो जाता है, तो उसे सक्षमकारी संविधि कहते हैं।

20. खण्डनात्मक वाक्यखण्ड (Non Obstante Clause) कभी-कभी किसी धारा में लिखा होता है, ‘इस अधिनियम की अन्य बातों के होते हुये भी ' [ Notwithstanding anything contained in this Act, or any law for the time being in force] यह वाक्य खण्ड अधिनियम के अन्य वाक्यों के ऊपर अधिभावी और सशक्त होता है। यदि इस वाक्य खण्ड और मुख्य उपबन्ध के बीच कोई ऐसी असंगति उत्पन्न हो गई है, जिसका समाधान नहीं हो सकता तो पहला प्रयत्न दोनों के सौजन्य का अर्थ ग्रहण करना होगा, और यदि यह सौजन्य न स्थापित हो सके तो न्यायालय अधिनियम के उपबन्ध को प्रधानता देगा।

इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा भारत अधिराज्य बनाम बम्बई ए० इरानी, 1955 एस० सी० आर० 206. में कहा गया है कि, 'यद्यपि साधारणतया किसी धारा के मुख्य उपबन्ध और खण्डनात्मक वाक्यखण्ड में बहुत ही निकट सामीप्य होना चाहिये, फिर भी यह सदैव आवश्यक नहीं है कि व्यवहार्य उपबन्ध और खण्डनात्मक वाक्यांश में समरूपता बनी ही रहे और यह कि उसका प्रभाव अधिनियम के स्पष्ट उपबन्ध का खण्डन ही मान लिया जाय। यदि अधिनियम की भाषा स्पष्ट है और उसके शब्द ऐसे हैं कि उनका एक स्पष्ट और व्याकरणमूलक अर्थ निकल जाता है तो खण्डनात्मक वाक्यखण्ड उस स्पष्ट उपबन्ध के क्षेत्र-विस्तार को अल्पीकृत या खण्डित नहीं कर सकता। ऐसी स्थितियों में खण्डनात्मक वाक्य खण्डों का तात्पर्य केवल इतना ही होना चाहिये कि उपबन्ध की सामान्य स्थिति के स्पष्टीकरण के लिये इसका प्रयोग हुआ है और यह कि विधानांग ने उसका प्रयोग अधिनियम सम्बन्धी सतर्कता के नाते किया है, अधिनियम के प्रभाव को अस्वीकृत करने या विस्तार-क्षीण करने के लिए नहीं।'

कानून का शासन क्या है? विवेचना कीजिए। कानून को संपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए व्याख्या कीजिए।

Question: What is rule of law? Discuss. Explain the term 'Statute must be read as a whole'.
कानून का शासन क्या है? विवेचना कीजिए। कानून को संपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए व्याख्या कीजिए।

उत्तर - विधि का शासन (Rule of Law) - विधि के शासन का विचार बहुत ही प्राचीन है। मध्य युग में जैकटन ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया था कि सभी शासक विधि द्वारा शासन करने के लिये बाध्य हैं। प्रो० डायसी के मतानुसार, विधि का शासन ब्रिटिश संविधान का मूलभूत सिद्धान्त है और इसका प्रयोग वहाँ तीन भिन्न अर्थों में किया जाता है-

1. कोई भी व्यक्ति सिवाय कानून भंग के दण्डनीय नहीं है (No man is punishable except for the breach of Law) - विधि-शासन का सर्वप्रथम अर्थ यह है कि इंग्लैंड में किसी भी व्यक्ति या अधिकारी को किसी प्राधिकारी द्वारा स्वेच्छाचारी या मनमाने ढंग से दण्डित नहीं किया जा सकता। यह अधिकार केवल न्यायालयों को ही है। इससे यह संकेत मिलता है कि किसी व्यक्ति या निकाय की स्वः विवेकाधिकार शक्ति कानून के अधीन है, कानून के ऊपर नहीं है। इस अर्थ में इंग्लैंड अन्य सरकारों की व्यवस्थाओं से भिन्न है।

2. कोई भी व्यक्ति कानून के ऊपर नहीं है (No man is above the law) - प्रो० डायसी के अनुसार, विधि शासन का दूसरा अर्थ यह है कि कोई भी व्यक्ति, भले ही उसकी स्थिति और पद कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो अपने द्वारा किये गये गैरकानूनी कार्यों के लिये साधारण न्यायालयों के अधीन है।

3. संवैधानिक अधिकार न्यायिक निर्णयों के परिणाम हैं (Constitutional rights are the result of Judicial Decisions )-विधि शासन पदावली का तीसरा अर्थ यह है कि इंग्लैंड में व्यक्तियों के अधिकार संविधान द्वारा प्रदान नहीं किये गये हैं बल्कि संविधान में उन अधिकारों को शामिल किया गया है जो समय-समय पर व्यक्तियों के वादों के निर्णयों के फलस्वरूप न्यायालयों ने उन्हें प्रदान किये हैं।

विधि का शासन किस सीमा तक भारतीय संविधान में स्वीकृत है? (To what extent rule of law is incorporated in Indian Constitution ? ) - प्रो० डायसी द्वारा प्रतिपादित “विधि-सिद्धान्त" को भारतीय संविधान के अनु० 14 में स्वीकृत किया गया है। अनु० 14 का कहना है कि "भारत राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता या विधियों के समान संरक्षण से राज्य द्वारा वंचित नहीं किया जायेगा।" इस अनुच्छेद में दो पदावलियों का प्रयोग किया गया है-

(i) विधि के समक्ष समानता (Equality before Law) - यह पदावली ब्रिटिश संविधान से ली गई है जिसे इंग्लैंड में प्रो० डायसी ने 'विधि-शासन' का नाम दिया है। "विधि शासन" का तात्पर्य है कि कोई भी व्यक्ति विधि के ऊपर नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति, भले ही उसकी स्थिति या पद कुछ भी हो, देश की सामान्य विधियों के अधीन है और साधारण न्यायालय के क्षेत्राधिकार के भीतर है। राष्ट्रपति से लेकर गरीब से गरीब व्यक्ति सभी समान रूप से विधि के अधीन हैं और बिना किसी कानूनी औचित्य के किये गये किसी कार्य के लिये समान रूप से उत्तरदायी होते हैं। “विधि के समक्ष समानता" का अर्थ व्यक्तियों के बीच पूर्ण समानता से नहीं है बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि जन्म, मूलवंश तथा धर्म आदि के आधार पर व्यक्तियों के बीच विशेषाधिकारों को प्रदान करने तथा कर्त्तव्यों के आरोपण करने में कोई भेद नहीं किया जायेगा। समता का यह अधिकार अनु० 14 से 18 तक वर्णित है।

(ii) विधि का समान संरक्षण (Equal Protection of Law) - डा० वी० एन० शुक्ला के अनुसार, नियम यह है कि 'समानों के साथ समान कानून लागू करना चाहिये न कि असमानों के साथ समान।' रघुबीर सिंह बनाम हरियाणा राज्य A.I.R. 1980 S.C. 1086 में कहा गया है कि कानून का शासन राज्य से आशा करता है कि वह पुलिस द्वारा अभियुक्तों के साथ बर्बरपूर्ण व्यवहार से उन्हें संरक्षण देने के लिए हर सम्भव प्रयत्न करे तथा सम्बन्धित व्यक्तियों को दण्ड दे। यदि राज्य ऐसा नहीं करता तो विधि से लोगों का विश्वास उउ जायेगा। अतः अनु० 14 में वर्णित कानून का शासन संविधान का “आधारभूत ढाँचा " है जिसे अनु० 368 के अन्तर्गत संशोधन करके खत्म नहीं किया जा सकता।


Explain the term 'Statute must be read as a whole'.
कानून को संपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए व्याख्या कीजिए।

कानून को सम्पूर्ण रूप में पढ़ा जाना चाहिये (The Statute should be Read as a Whole) – लैटिन भाषा में इस सिद्धान्त को इस प्रकार कि कानून का निर्वचन एक्स विसरिब एक्ट्स (Ex visceribus actus) किया जाना चाहिए। किसी उपबन्ध को अलग-अलग रूप में निर्वचित नहीं किया जा सकता। कभी-कभी शब्दों के अर्थ उसी उपबन्ध में उपयोग किए गए अन्य शब्दों से तथा कभी उसी कानून में कुछ अन्य उपबन्धों के सन्दर्भ में समझे जाते हैं। परन्तु न्यायालय को इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि अन्य उपबन्धों की सहायता से किसी उपबन्ध का अर्थान्वयन खींच तानकर नहीं किया जाना चाहिये। ऐसा केवल तभी किया जाना चाहिये जब न्यायालय की दृष्टि में विधायिका का ऐसा ही आशय है। न्यायालय को यदि ऐसा सन्देह हो कि विधायिका का ऐसा आशय नहीं भी हो सकता तो इतना ही आधार यह कहने के लिए पर्याप्त है कि विधायिका का आशय ऐसा नहीं था। इसी प्रकार एक ही उपबन्ध में एक शब्द का एक से अधिक बार प्रयोग साधारणतः एक ही अर्थ में होता है। कभी-कभी किसी धारा को अन्य उपबन्ध के सन्दर्भ में निर्वाचित न करने का ठोस आधार भी रहता है। सभी दशाओं में अधिनियम की सम्पूर्ण योजना ही दिशासूचक है। उदाहरणार्थ-

(i) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस A.I.R. 1952 SC 369 में याची, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता था, ने रजिस्ट्री, में मूल शाखा में कक्षीकार (मुवक्किल) की ओर से उपस्थित होने के लिए अपने पक्ष में निष्पादित प्राधिकारी का समुचित आधार दाखिल किया। इस आधार पर कि उच्च न्यायालय नियम और मूल शाखा आदेश के अन्तर्गत अधिवक्ता को केवल कार्य करने की शक्ति है पैरवी की नहीं, उसके समुचित आधार पर लौटा दिया गया। याची ने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता होने के कारण उसे स्वयं ही कार्य को स्वीकार करने तथा बगैर अटर्नी की सहायता से पैरवी करने का अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से इस तर्क को स्वीकार कर लिया। बहुमत के एक न्यायाधीश ने निर्णय दिया कि विधायिका के सत्य आशय को जानने के लिए यह आवश्यक है कि किसी उपबन्ध के निर्वचन में कानून के सभी भागों को एक साथ पढ़ा जाय ।

(ii) न्यूजपेपर्स लिमिटेड बनाम औद्योगिक अधिकरण A.I.R. 1957 SC 532 में अपीलार्थी ने अपने एक टाइपिस्ट को पदच्युत कर दिया। उत्तर प्रदेश कार्यरत पत्रकार संघ, जिसके साथ कर्मचारी का कोई सम्बन्ध नहीं था, के मध्यक्षेप द्वारा मामले को उत्तरदाता को सौंप दिया गया। उच्चतम न्यायालय ने मामले के इस प्रकार सौंपे जाने को इस आधार पर अवैध ठहराया कि यह औद्योगिक विवाद न होने के कारण पदच्युत व्यक्ति नियोक्ता का कर्मचारी नहीं है। न्यायालय ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के किसी भाग का निर्वचन करते समय इस अधिनियम को सम्पूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिये ।

(iii) गुरमेज सिंह बनाम प्रताप सिंह A.I.R. 1960 SC 122 में अपीलार्थी ने उत्तरदाता के चुनाव को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 (7) के अन्तर्गत इस आधार पर चुनौती दी कि उसने अपने चुनाव अभियान में गाँव के मुखियाओं या लम्बरदारों को अपना मतदान अभिकर्त्ता तथा गणन अभिकर्ता बनाया जो भ्रष्ट आचरण की कोटि में आता है। उस समय विधि यह थी कि राजस्व अधिकारी जिनमें ग्राम लेखपाल भी सम्मिलित थे चुनाव प्रक्रिया में सहायता करने के अधिकारी नहीं थे यद्यपि दूसरे ग्राम अधिकारी ऐसा कर सकते थे। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी कानून के एक उपबन्ध का निर्वचन करते समय उस कानून के एक उपबन्ध का निर्वचन करते समय उस कानून के सभी भागों को ध्यान में रखना आवश्यक है । इस व्याख्या से यह स्पष्ट है कि विधायिका ने दो प्रकार के अधिकारियों, राजस्व अधिकारी जिनमें ग्राम लेखपाल भी शामिल हैं तथा दूसरे ग्राम अधिकारी, में भिन्नता रखी है। चूँकि गाँव का मुखिया अथवा लम्बरदार न तो राजस्व अधिकारी थे और न ही वे ग्राम लेखपाल थे, वे दूसरे ग्राम अधिकारियों की श्रेणी में आते हैं जिनके ऊपर चुनाव में इस रूप में सहायता करने पर कोई पाबन्दी नहीं लगी हुई थी।

उपचारी कानून से आप क्या समझते हैं?

Question: What do you understand by remedial statutes?
उपचारी कानून से आप क्या समझते हैं?

उत्तर-उपचारी कानून (Remedial Statute)-उपचारी कानून वह कानून है जिससे एक नया उपचार प्रदान किया जाता है। ऐसे कानून को पारित करने का मुख्य उद्देष्य किसी के अधिकार के लागू करने में सुधार लाना या भूलों को ठीक करना एवं पूर्व विधि के दोषों को दूर करना होता है। आजकल कुछ विद्वानों द्वारा एक दूसरी समानार्थक अभिव्यक्ति "सामाजिक आर्थिक विधान" उपचारी कानून के लिये प्रयोग की जाती है। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961; कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923; आदि उपचारी कानून के उदाहरण हैं। कई उपचारी अधिनियमों में अधिनियमिति की भाषा के तत्काल पहले 'जिसके उपचार के लिये' शब्दों का प्रयोग किया गया है। ब्लेकस्टोन सहित कुछ विद्वानों का मत है कि उपचारी कानून विस्तारकारी और अवरोधकारी दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। अधिनियम विस्तारकारी तब होंगे जब संकीर्ण कॉमन लॉ का विस्तार किया गया हो और अवरोधकारी तब होंगे जब विद्यमान कॉमन लॉ का विस्तार किया गया हो और अवरोधकारी तब होंगे जब विद्यमान कामन लॉ अधिकार में कमी हो गई हो। प्रायः यह सत्य है कि कल्याणकारी राज्य में सभी विधानों को सामान्य कल्याण को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से ही अधिनियमित किया जाता है, पर कुछ अधिनियमितियाँ ऐसी भी होती हैं जो कुछ अत्यावश्यक सामाजिक माँगों के अनुकूल होती हैं और जो सामाजिक प्रगति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सामाजिक बुराइयों पर तत्काल प्रत्यक्ष प्रभाव डालकर लागू होती हैं। उपचारी कानून का उदारवादी अर्थान्वयन उदारवादी दृष्टिकोण से किया जाता है और किसी प्रकार की संदिग्धता का निराकरण उन व्यक्तियों के पक्ष में किया जाता है जिनके हित के लिये उस कानून को बनाया गया होता है।

संविधान के अधिकारातीत के सिद्धांत का वर्णन करें।

Question: Explain the Doctrine of Ultra-vires of the Constitution.
संविधान के अधिकारातीत के सिद्धांत का वर्णन करें।

उत्तर- संविधान का शक्ति वाह्य सिद्धान्त (Doctrine of Ultra Vires of the Constitution) -अधिकारातीत के सिद्धान्त का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है- 1. वास्तविकत: अधिकारातीत, और 2. प्रक्रिया संबन्धी अधिकारातीत।

जहाँ किसी विषय पर विधान बनाने की शक्ति न होने पर भी विधि बनाई जाती है तो उसको वस्तुतः अधिकारातीत कहा जायेगा। उदाहरणार्थ; संविधान के अन्तर्गत विदेशी नीति बनाने की शक्ति केन्द्रीय सरकार को है, राज्य सरकार को नहीं। यदि राज्य विधानमंडल विदेश नीति बनाता है, तो उसको वास्तविकत: अधिकारातीत होने के कारण शून्य माना जाएगा। इसके विपरीत, जहाँ किसी विषय पर विधि बनाने का अधिकार प्राप्त है और इस वास्ते प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है, किन्तु विधि उस प्रक्रिया का पालन करके नहीं बनाई जाती है, तो इसको प्रक्रिया संबन्धी अधिकारातीत कहा जायेगा। अतः प्रदत्त शक्ति के बाहर चला जाना अधिकारातीत माना जायेगा।

शक्ति वाह्य का नियम प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) में भी लागू होता है। प्रत्यायोजित विधान पर आक्षेप अधिकारातीत की दृष्टि से निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है-

1. मूल अधिनियम का संविधान के अधिकारातीत प्रवर्तन-संविधान उन सीमाओं को निर्धारित करता है जिनके भीतर विधानमंडल कार्य कर सकता है।

(i) स्पष्ट सांविधानिक सीमाएँ-भारत में संसद और राज्य विधानमंडल की शक्तियाँ असीमित नहीं हैं। विधायी शक्तियाँ संविधान में प्रगणित तथा निर्धारित हैं। प्रत्येक अधिनियम संविधान की इस सीमा के भीतर ही बनाया जा सकता है। इसलिये यदि मूल अधिनियम इस सीमा का उल्लंघन करता है तो उसको अधिकारातीत घोषित किया जा सकता है क्योंकि ऐसा विधान विधायिका की अधिकारिता के बाहर होगा।

(ii) उपलक्षित सांविधानिक सीमाएँ-भारत के संविधान के लागू होने पर उच्चतम न्यायालय ने उपलक्षित सांविधानिक सीमाओं का वर्णन रि देहली लॉज ऐक्ट में किया है। इस मामले में प्रत्यायोजन की सीमा के अवधारण के सम्बन्ध में दो विचार धाराओं को प्रतिपादित किया गया है- 1. विधानमंडल आवश्यक विधायी कार्य का त्याग नहीं कर सकता है, और 2. विधायी नीति की घोषणा और मार्गदर्शी नियमों या मान दण्डों के निर्धारण के पश्चात् ही प्रत्यायोजन किया जा सकता है।

(iii) सांविधानिक अधिकार कोई भी मूल अधिनियम सांविधानिक अधिकार का जिसके अन्तर्गत मूल अधिकार, सम्पत्ति का अधिकार और वाणिज्य खण्ड आते हैं, अतिक्रमण नहीं कर सकता।

2. प्रक्रिया सम्बंधी शक्ति वाह्य-जहाँ विधि बनाने का अधिकार दिया गया है और उसके लिए प्रक्रिया भी निश्चित की गई है, वहाँ यदि विधि प्रक्रिया का पालन किए बिना बनाई जाती है तो उसको अधिकारातीत घोषित कर दिया जाएगा। रामकृष्ण बनाम मध्य प्रदेश राज्य A.I.R. 1958 नाग० 467, में केन्द्रीय सरकार की सहमति से राज्य सरकार को नियम बनाने के लिए निदेश दिया गया था। किन्तु राज्य सरकार ने इस प्रकार की सहमति के बिना ही नियम बना दिया। इस नियम को अधिकारातीत होने के कारण अवैध निर्णीत किया गया।

सोमवार, 29 मई 2023

सार और तत्व के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं ?

Question: Explain the doctrine of Pith and Substance.
सार और तत्व के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर- इसे सार और मर्म का सिद्धांत भी कहा जाता है। संविधान की व्याख्या में इस सिद्धांत को उस समय लागू किया जाता है जब किसी एक विधायिका द्वारा निर्मित अन्य विधायिका के क्षेत्र में अनुसागिक रूप से हो रही हो या प्रभावित कर रही हो तब न्यायालय द्वारा ऐसे मामलों में विधि के सार और तत्व पर विचार किया जाता है।

यह देखने के लिए कि क्या कोई विशेष विधि उस विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार में है जिसने इनको पारित किया है, न्यायालय को यह विचार करना चाहिये कि विधायन की सच्ची विषय-वस्तु "सार तत्व या वास्तविक प्रकृति और स्वरूप" क्या है और क्या ऐसी विषय-वस्तु उस विधान मण्डल से सम्बन्धित विधायी सूची में दिये गये शीर्षकों में निहित है। वास्तव में विधायन की सच्ची विषय-वस्तु को तय करने के लिये विधान-मण्डल द्वारा इसको दिया गया नाम निर्णायक नहीं है। यदि किसी विधि का 'तत्व एवं सार' किसी विशेष विधान-मण्डल के विधान क्षेत्र में पड़ता है। जिसके द्वारा वह निर्मित की गई है, तो ऐसी विधि की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती भले ही वह अनुसागिक रूप से किसी अन्य विधान-मण्डल के विधायन क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत किसी शीर्षक पर पड़ती है। इसे 'तत्व एवं सार' का सिद्धान्त कहते हैं। 

दूसरे शब्दों में जब एक विधान-मण्डल द्वारा निर्मित विधि दूसरे विधान-मण्डल के क्षेत्र में अतिक्रमण करती है तो यह जानने के लिये कि वह विधि उस विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आती है या नहीं, जिसने उसे निर्मित किया है, न्यायालय सार एवं तत्व का सिद्धान्त लागू करता है। उदाहरणार्थ-

(i) ए० एम० कृष्ण बनाम मद्रास राज्य A.I.R. 1975 S.C. 297 में कहा गया है कि जब किसी अधिनियम का कोई प्रावधान आनुषांषिक रूप में (Incidentally) दूसरे विधान-मण्डल के विधान विषयों पर अतिक्रमण करता है तो शाब्दिक व्याख्या के आधार पर ऐसा प्रावधान अवैध होगा। किन्तु यदि विधान सारवान रूप से या विधान का वास्तविक उद्देश्य ऐसे विषय से सम्बन्धित है जिस पर वह विधान मण्डल कानून बनाने में सक्षम है, तो उसे वैध घोषित किया जायेगा; भले ही वह दूसरे विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार में आने वाले विषय पर अनुषागिक रूप से अतिक्रमण करता हो । उस विधान की वास्तविक प्रकृति और स्वरूप का पता लगाने के लिये पूरे अधिनियम पर विचार किया जायेगा और उसके उद्देश्य, विस्तार और उसके प्रावधान के प्रभाव की जाँच की जायेगी।

(ii) बम्बई राज्य बनाम बाल तारा A.I.R. 1951 S.C. 368 में बम्बई विधान मण्डल ने बम्बई मद्य निषेध अधिनियम पारित किया जिसके द्वारा राज्य में मादक द्रव्यों को खरीदने और रखने की मनाही कर दी गई थी। इस अधिनियम की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि वह संघ-सूची में वर्णित विषय "मादक द्रव्यों के आयात-निर्यात" का अतिक्रमण करता है क्योंकि मादक द्रव्यों के क्रय-विक्रय और उपयोग को रोकने से उसके आयात-निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय देते हुए कहा कि चूँकि अधिनियम का मुख्य उद्देश्य राज्य-सूची के विषय से सम्बन्धित था, संघ-सूची के विषय से नहीं इसलिये अधिनियम पूर्णतः संवैधानिक है ।

(iii) प्रफुल्ल कुमार बनाम बैंक ऑफ खुलना AIR. 1947 P.C. 64 में प्रिवी कौंसिल ने 'सार-तत्व' के सिद्धान्त को लागू किया। प्रस्तुत मामले में बंगाल विधान मण्डल द्वारा ऋण का व्यापार नियन्त्रण करने के लिये बंगाल मनीलेण्डर्स ऐक्ट, 1940 पारित किया। इस अधिनियम द्वारा बंगाल प्रान्त में ऋण पर ब्याज दर की सीमा निश्चित कर दी ताकि ऋणदाता संविदा करके भी ऋणी से अधिक ब्याज न वसूल कर सकें। वादी ऋणदाताओं ने विवादित अधिनियम को इस आधार पर चुनौती दी कि यह बंगाल विधान मण्डल की विधायन-शक्ति से बाहर है, क्योंकि यह संघ सूची में वर्णित प्रविष्टि "बचत-पत्र" का अतिक्रमण करती है, जिस पर केवल केन्द्र को ही कानून बनाने का अधिकार है । प्रिवी कौंसिल ने निर्णय देते हुए कहा कि विवादित अधिनियम बंगाल विधान मण्डल की विधायी शक्ति के अधीन है; क्योंकि उसका सार-तत्व या प्रमुख उद्देश्य सूची के विषय ऋण और ऋणदाता से सम्बन्ध रखता है, भले ही यह अनुषांगिक रूप में संघ-सूची के विषय 'वचन-पत्र' का अतिक्रमण करता है। अतः यह अधिनियम संवैधानिक है।

छंद्म विधायन या ' रंगनीय विधायन ' के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं ?

Question:  Explain the doctrine of ' Colorable Legislation '.
छंद्म विधायन या ' रंगनीय विधायन ' के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर - रंगीय (आभासी या छम्) विधायन का सिद्धान्त - 

यह सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू किया जाता है जहां विधायिका अपनी अधिकारिता से परे होकर विधि का निर्माण करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में उत्पन्न समस्या के समाधान हेतु छंद्म विधायन या ' रंगनीय विधायन ' के सिद्धांत का सूत्रपात किया जाता है । 

यह सिद्धांत एक सूत्र पर आधारित है -
" आप जिस कार्य को प्रत्यक्ष रूप से नहीं करते उसे अप्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकते " 

संघ और राज्य विधान मण्डल दोनों संविधान से अपनी विधायी शक्ति प्राप्त करते हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में विधि-निर्माण के लिए स्वतन्त्र हैं। छम् विधायन का सिद्धान्त उन अवस्थाओं में लागू होता है जिनमें व्यवस्थापिका अपनी विधायी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपनी विधायी शक्ति सीमा से बाहर कार्य करती है। इस प्रकार का अतिक्रमण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी प्रकार का हो सकता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि यद्यपि विधायिका किसी कानून को बनाने में ऊपरी तौर से अपनी शक्तियों के भीतर कार्य करती है तथापि सारतः या वास्तव में वह संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करती है। ऐसे परोक्ष विधायन को ही छदम् या रंगनीय विधायन कहते हैं। ऐसे मामलों में अधिनियम का सार महत्वपूर्ण होता है उसका बाह्य रूप या आकृति (Form) नहीं। यदि किसी विधान की विषय-वस्तु सारतः उस विधान मण्डल की शक्ति के बाहर है तो उसका बाह्य रूप उसे न्यायालय द्वारा अमान्य घोषित करने से नहीं बचा सकेगा। अतः विधान मण्डल कोई अप्रत्यक्ष या परोक्ष तरीका अपनाकर संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता (के० सी० जी० नारायण देव ब० उड़ीसा राज्य A.I.R. 1953 S.C. 375) ।

जस्टिस श्रीकृष्ण अय्यर के अनुसार, “छद्भ्यता (Colourability) से तात्पर्य अक्षमता (Incompetemcy) से है। कोई वस्तु छद्मय तब होती है जब वह जिस रूप में प्रकट की जाती है वास्तव में उस रूप में नहीं होती।”

कामेश्वर सिंह ब० बिहार राज्य A. I.R.1952 S.C. 255 में बिहार लैन्ड्स रिफोर्म्स एक्ट, 1950 की वैधता को चुनौती दी गई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने छम् विधायन सिद्धान्त के आधार पर अवैध घोषित कर दिया क्योंकि इसमें मुआवजे के निर्धारण के लिये वास्तव में कोई आधार निर्धारित नहीं किया गया था, यद्यपि ऊपरी तौर से ऐसा करने का प्रयास किया गया था। वास्तव में अधिनियम में दी गई व्यवस्था के फलस्वरूप जमीदारों को कोई मुआवजा नहीं मिलता था।




आच्छादन के सिद्धांत की विवेचना कीजिए।

Question: Discuss the Doctrine of Eclips.

आच्छादन के सिद्धांत की विवेचना कीजिए।


उत्तर - इसे ग्रहण का सिद्धांत भी कहा जाता है। यह संविधानिक निर्वचन का एक प्रमुख सिद्धांत है ।


संविधान के अनुच्छेद 13(1) के अनुसार, इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले भारत के राज्य क्षेत्र में लागू सभी विधियां उस मात्रा तक शून्य होगी जिस तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत हैं।


अनुच्छेद 13(2) के अनुसार, राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनायेगा जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती हैं या न्यून करती है और इस खण्ड के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी।


इस प्रकार आच्छादन अनुच्छेद 13(1) पर लागू होता है; 13(2) पर नहीं क्योंकि 13(2) अंतर्गत निर्मित विधि आरंभ से ही मृत रूप में आती है, जिसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।


अनुच्छेद 13(1) के अनुसार संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले भारत के राज्य क्षेत्र में लागू विधि पर जो ग्रहण लगा था अर्थात शून्य हो गई थी उसे संशोधन दोबारा पुनर्जीवित किया जा सकता है।


ग्रहण आच्छादन का सिद्धान्त भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 के उपखण्ड (1) पर आधारित है जिसके अनुसार संविधान-पूर्व विधियाँ संविधान लागू होने पर उस मात्रा तक अवैध होंगी जिस तक ये मूल अधिकारों से असंगत हैं। ऐसी विधियाँ प्रारम्भ से ही शून्य नहीं होतीं, बल्कि अधिकारों के लागू हो जाने के कारण वे मृतप्राय हो जाती हैं और उनको लागू नहीं किया जा सकता। ऐसे कानून बिल्कुल मिट नहीं जाते, वे केवल मूल अधिकारों द्वारा आच्छादित हो जाते हैं और निद्रा अवस्था में रहते हैं। संविधान लागू होने से पहले के सभी संव्यवहारों के लिये उनका अस्तित्व यथावत् वैध बना रहता है और ऐसी विधि के अन्तर्गत अर्जित किये गये अधिकारों और दायित्वों को लागू किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-


(i) भीखाजी नारायण ठाकरस बनाम मध्य प्रदेश राज्य A.I.R. 1955 SC 781 में यह प्रश्न विचारणीय था कि क्या ऐसी विधियों को, जो संविधान लागू होने पर मृतप्राय हो जाती हैं, संविधान में संशोधन करके पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसी प्रश्न को हल करने के लिये उच्चतम न्यायालय ने आच्छादन का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है। इस वाद में एक संविधान-पूर्व विधि में एक ऐसा उपबन्ध था जो राज्य सरकार को प्राधिकृत करता था कि वह सभी निजी व्यक्तियों को मोटर-यातायात-व्यापार से बहिष्कृत कर सकता है। कानून यद्यपि जब बना था, वैध था, लेकिन 1950 में संविधान के लागू होने पर शून्य हो गया, क्योंकि यह उपबन्ध अनुच्छेद 19 (1) (घ) का उल्लंघन करता था, जो नागरिकों को जीविका, पेशा, व्यापार या वाणिज्य करने का मूल अधिकार प्रदान करता है । परन्तु सन् 1951 में संविधान के प्रथम संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 19 (1) में संशोधन किया गया और राज्य को किसी व्यापार के करने का एकाधिकार (Monopoly) प्रदान किया गया। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि संशोधन के फलस्वरूप मृतप्राय विधि पुनः सजीव हो उठी है, क्योंकि संशोधन ने उस पर से मूल अधिकारों के ग्रहण को हटा दिया और विधि को सभी दोषों एवं अयोग्यताओं से मुक्त कर दिया। ऐसी विधि केवल कुछ समय के लिये मूल अधिकारों द्वारा आच्छादित हो जाती है। किन्तु जैसे ही उस पर से आच्छादन हटा दिया जाता है, वह सजीव हो उठती है और उसी दिन से लागू हो जाती है। ऐसी विधि को फिर से अधिनिमित करने की आवश्यकता नहीं होती ।


(ii) केशवन माधव मेनन बनाम मुम्बई राज्य, A.I.R. 1951 S.C.128 में यह प्रश्न उठाये गए कि क्या स्वतंत्रता से पूर्व अधिनियमित भारतीय प्रेस (आपात अधिकार) अधिनियम, 1913 की धारा 18 के अन्तर्गत प्रारम्भ किया गया। अभियोजन संविधान के अनुच्छेद 13(1) के अस्तित्व में आने के पश्चात् भी जारी रह सकता है और क्या यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) और (2) का अतिक्रमण करती है ? उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से यह निर्धारित किया कि अभियोजन जारी रहेगा क्योंकि प्रत्यक्ष या आवश्यक विवक्षित उपबंध की अनुपस्थिति में संविधान को भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जा सकता और न ही इस प्रकार की किसी बात का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 13(1) में ही है।"


(iii) सगीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश, A.I.R. 1955 S.C. 728 में उत्तर प्रदेश पथ परिवहन अधिनियम, 1951 की संविधानिकता का प्रश्न उठाया गया। उच्चतम न्यायालय ने इसे अनुच्छेद 19(1) (घ) के विरुद्ध मानते हुए अनुच्छेद 13 (2) के अन्तर्गत शून्य निर्धारित किया और यह स्पष्ट किया कि असंवैधानिक विधि मृत विधि होती है जिसकी बेड़ियां सांविधानिक संशोधन द्वारा हटाकर उसे पुनः जीवन नहीं दिया जा सकता और केवल मात्र उपाय उसका पुनः अधिनियमन है ।


(iv) दीप चन्द बनाम उत्तर प्रदेश राज्य A.I.R. 1959 SC 648 में याची ने उत्तर प्रदेश परिवहन सेवा (विकास) अधिनियम, 1955 की सांविधानिकता का प्रश्न इस आधार पर उठाया कि यह अनुच्छेद 31 अब अनु० 300 (क) का अतिक्रमण करता है। उच्चतम न्यायालय ने एक मत से यह निर्धारित किया कि यह अधिनियम अनुच्छेद 31 के विपरीत नहीं है। दो विद्वान अल्पमत न्यायाधीशों ने कहा कि असक्षम विधायिका के द्वारा बनाई गई विधि और संवैधानिक सीमाओं के अतिक्रमण में बनाई गई विधि के बीच अन्तर पर विचार करना आवश्यक नहीं है। परन्तु वशेशर नाथ के मामले में अपना मत प्रकट करने वाले विद्वान न्यायाधीश ने इस मामले में भी अपने पूर्व में कहीं बात को दोहराते हुए पुन: कहा कि उपर्युक्त विधियों में कोई अन्तर नहीं है ।


(v) महेन्द्र लाल जैनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य AIR. 1963 SC 1019 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि ग्रहण का सिद्धान्त केवल संविधान-पूर्व विधियों पर लागू होता है संविधान-पश्चात् पर नहीं । अनुच्छेद 13 (1) में शब्दों 'जिस तक' तथा अनुच्छेद 13 (2) में शब्दों 'उल्लंघन की मात्रा तक' का प्रयोग यह साबित करता है कि उद्देश्य ऐसी विधि को बचाने का था जो मूल अधिकारों के असंगत हो या उसका अतिक्रमण करता हो। 'शून्य' शब्द का प्रयोग अनुच्छेद 13 (1) और (2) में उसी अर्थ में किया गया है। ग्रहण का सिद्धान्त ऐसी विधियों को पुनर्जीवित कर देगा जो संविधान के अस्तित्व में आने के पूर्व जब वे अधिनियमित की गई थी तब वैधानिक थीं पर संविधान के अस्तित्व में आने के पश्चात् मूल अधिकारों का अतिक्रमण करने लगी । परन्तु संविधान के पश्चात् मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती हुई अधिनियमित विधियाँ मृतजात या नास्ति अभिवाक् थीं और उन्हें पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 19 का अतिक्रमण करने वाली विधि गैर-नागरिकों के सन्दर्भ में वैधानिक होगी परन्तु इसमें ग्रहण का सिद्धान्त लागू नहीं होगा ।


(vi) मधुलिमये बनाम उपखंड मजिस्ट्रेट A.I.R. 1971 SC 2486 में संविधान पूर्व विधि, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 144 और अध्याय आठ को इस आधार पर आक्षेपित किया गया कि वे अनुच्छेद 19 (1) (क) का अतिक्रमण करते थे और उन्हें अनु० 19 (2), 1951 के संशोधन के पूर्व जैसा वह तब था, के द्वारा बचाया नहीं जा सकता, जिसके अन्तर्गत राज्य के पास लोक व्यवस्था के आधार पर वाक्-स्वातंत्रता पर पाबन्दी लगाने की शक्ति नहीं थी। साथ ही, अनु 19 (2) में प्रयुक्त अभिव्यक्त 'राज्य की सुरक्षा' का उच्चतम न्यायालय ने बार-बार अर्थान्वयन केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को गम्भीर खतरा के अर्थ में किया है, और इसलिए आक्षेपित धाराएं अभिव्यक्ति 'राज्य की सुरक्षा' के अन्तर्गत नहीं आती हैं और इस कारण संविधान के अस्तित्व में आने के पश्चात् शून्य हो गईं। इसका अर्थ यह हुआ कि ग्रहण का सिद्धान्त लागू होता है जिसके अन्तर्गत आक्षेपित धाराओं पर ग्रहण लग जाएगा और संविधान में संशोधन करने के पश्चात् ही पुनः जीवन पा सकेंगी। उच्चतम न्यायालय ने ग्रहण का सिद्धान्त लागू नहीं किया । न्यायालय ने संशोधन के भूतलक्षी प्रवर्तन में एक कल्पना बनाई और इस प्रकार उन उपबंधों को असंवैधानिक होने से बचा लिया।


(vii) गुजरात राज्य बनाम श्री अम्बिका मिल्स A.I.R. 1974 SC 1300 में मुम्बई श्रम कल्याण निधि (गुजरात विस्तार और संशोधन) अधिनियम, 1961 और मुम्बई श्रम कल्याण निधि नियम, के कुछ उपबंधों को उत्तरदाता जो कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत रजिस्ट्रीकृत कम्पनी थी, ने आक्षेपित किया। इन उपबंधों को अनुच्छेद 19 का अतिक्रमण करता हुआ मानते हुए उच्च न्यायालय ने उन्हें शून्य घोषित किया। उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए यह निर्धारित किया कि उपबंध अनुच्छेद 14 का अतिक्रमण नहीं करते थे, और उच्च न्यायालय का यह कहना है कि वे अनुच्छेद 19 का अतिक्रमण करते थे, के प्रश्न पर विचार करना आवश्यक नहीं है क्योंकि परम्परा के अनुरूप न्यायालय वहाँ हस्तक्षेप नहीं करेगा जहाँ किसी न किसी विधि की संवैधानिकता को आक्षेपित किया है जिसका उसे स्वयं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा पर दूसरों पर पड़ेगा। न्यायालय ने यह दोहराया कि अनुच्छेद 19 के लिए निगम एक नागरिक नहीं है। न्यायालय ने इस पर भी जोर दिया कि संविधान पूर्व की किसी विधि को अनुच्छेद 13 (1) के अन्तर्गत शून्य घोषित किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसे कानून की पुस्तक से हटा दिया जाएगा। यदि वह किसी नागरिक के मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती है और इसलिए उसके विरुद्ध वह खराब विधि है, तो भी गैर-नागरिकों पर उसका लागू रहना जारी रहेगा क्योंकि संविधान के अन्तर्गत मूल अधिकार केवल नागरिकों को प्रदान किए गए हैं। उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि इस मामले में ग्रहण का सिद्धान्त एक विवाद्यक था, और यह भी कि मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती हुई संविधान-पूर्व विधियाँ मृतजात या नास्ति अभिवाक् नहीं कही जा सकती


(viii) दुलारे लोध बनाम तृतीय अतिरिक्त जिला जज, कानपुर A.I.R. 1984 SC 1260 में उच्चतम न्यायालय ने एक अधिनियम की एक धारा को ग्रहण का सिद्धान्त लागू किया जिसके अन्तर्गत एक किरायेदार के विरुद्ध पूर्व में पारित बेदखली की डिक्री का निष्पादन नहीं किया जा सकता था। मकान मालिकों के कष्ट को समाप्त करने के लिए इस धारा का भूतलक्षी संशोधन किया गया था । यह निर्धारित किया गया कि मूल धारा के द्वारा डिक्री पर ग्रहण पड़ गया था जिस कारण उसे निष्पादित नहीं किया जा सका, और ग्रहण की परछाई संशोधन द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से समाप्त कर दिए जाने के बाद डिक्री पुनर्जीवित और निष्पादनीय हो गई।


रविवार, 28 मई 2023

अर्थान्वयन साहचर्यण ज्ञापते का अर्थ क्या है?

Question - Explain " Noscitur a Sociis "
" अर्थान्वयन साहचर्यण ज्ञापते " का अर्थ क्या है?

अर्थान्वयन साहचर्येणा ज्ञायते (Construction Noscitur A Sociis);

अर्थान्वयन साहचर्येण ज्ञायते (नॉसिटर अ सोसायस) का अर्थ (Meaning of , Noscitur a Sociis) - "नॉसिटर" का अर्थ जानता तथा "सोसायस" का अर्थ साहचर्य अथवा सहयोजन हैं। अतः "नॉसिटर अ सोसायस" का अर्थ साहचर्य से जानना है। जब दो या दो से अधिक ऐसे शब्द जिनके अर्थ सदृश हों एक साथ प्रयोग किए जाएँ तो उन्हें उनके सजातीय अर्थ में समझा जाना चाहिए। वे अपना रंग एक दूसरे से लेते हैं जिससे उनमें से अधिक साधारण शब्द का अर्थ कम साधारण शब्द के सदृश अर्थ में निर्बन्धित हो जाता है। किसी शब्द को उसकी संगिति में 'कौन है' से जाना जा सकता है। साहचर्चित शब्द परस्पर व्याख्या तथा सीमित करते हैं। यह सिद्धान्त विधायिका के वास्तविक आशय को प्राप्त करने में सहायक होने के कारण उस जगह अभिभावी नहीं हो सकता जहाँ यह स्पष्ट हो कि ज्ञानबूझकर व्यापक शब्दों का प्रयोग किया गया नें है। उदाहरणार्थ - (1) मंगू सिंह बनाम चुनाव अधिकरण A.I.R. 1957 S.C. 871 में अपीलार्थी द्वारा चुनाव लड़ने के लिए अपना नामांकन पत्र भरते समय एक वर्ष से अधिक "माँग" का नगरपालिका कर देय था। उसने वोट डालने की तिथि से पूर्व पूरा कर अदा कर दिया तथा वह चुनाव में विजयी हुआ। उसके चुनाव को अवैध घोषित कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय के समक्ष उसका तर्क यह था कि सुसंगत तिथि नामांकन पत्र दाखिल करने की नहीं वरन् वोट डालने की थी तथा इसके अतिरिक्त उसको "माँग" का कोई नोटिस भी नहीं दिया गया था। याचिका को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्णीत किया कि सुसंगत तिथि नामांकन भरने की तिथि ही थी न कि वोट डालने की। न्यायालय ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति "माँग" को उसके साथ प्रयुक्त किए गए अन्य शब्दों के सन्दर्भ में निर्वाचित किया जाना चाहिए। ऐसा करने से स्पष्ट है कि "माँग" का वास्तविक अर्थ नगरपालिका कर अथवा अन्य देय है यद्यपि "माँग" का साधारण अर्थ माँगा जाना या माँगना होता है पर यह अर्थ यहाँ पर सर्वथा अनुपयुक्त है यदि यह देखा जाए कि और किन शब्दों के साहचर्य में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। अतः इस शब्द का निर्वचन बकाया रकम अथवा देय के रूप में ही होना चाहिए।

(II) आलमगीर बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1959 SC 436 में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 के निर्वचन का प्रश्न था। इस धारा के अनुसार जो कोई किसी स्त्री को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, जिसका अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है, या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष के पास से, या किसी ऐसे व्यक्ति के पास से, जो उस पुरुष की ओर से देखरेख करता है, इस आशय से ले जाएगा, या फुसलाकर ले जाएगा कि वह किसी व्यक्ति के साथ नाजायज संभोग करे या इस आशय से ऐसी किसी स्त्री को छिपाएगा या 'निरुद्ध' करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा। इस मामले में तथ्य यह थे कि एक विवाहित स्त्री, अपने पति को छोड़कर, खुले रूप में अपीलार्थी के साथ रहने लगी। अपीलार्थी के विरुद्ध संहिता की धारा 498 का मामला प्रारम्भ किया गया। अपीलार्थी का तर्क यह था कि उसके विरुद्ध अभियोग निरस्त कर दिया जाना चाहिए क्योंकि न हीं वह उस स्त्री को ले गया था, न ही फुसला कर ले गया था, न ही उसने उसे छिपाकर रखा था और न ही उसने उसे 'निरुद्ध' किया था। न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि चूँकि अपीलार्थी के द्वारा स्त्री का ले जाना, फुसलाकर ले जाना अथवा छिपाना, हुआ ही नहीं था क्योंकि वह स्त्री जानबूझकर ही उसके साथ खुले रूप से रहने लग गई थी, तो क्या अपीलार्थी द्वारा उस स्त्री को "निरुद्ध" किया जाना कहा जा सकता है या नहीं। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति "निरुद्ध करेगा" का साधारणतः अर्थ इच्छा के विरुद्ध रोका जाना है परन्तु यह अर्थ प्रस्तुत सन्दर्भ में उचित नहीं है क्योंकि इस अभिव्यक्ति को उसके साहचर्य में प्रयोग किए गए दूसरे शब्दों के प्रकाश में ही निर्वाचित किया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि शब्द "निरुद्ध करेगा" को धारा 498 में प्रयोग शब्दों "ले जाएगा", "फुसलाकर ले जाएगा" तथा "छिपाएगा" के सन्दर्भ में ही निर्वचित किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर "निरुद्ध करेगा" का अर्थ पति की सहमति के बगैर निरुद्ध क्रिया जाना है। धारा 498 पति के अधिकारों की संरक्षा करती है जिसे पत्नी के सानिध्य से वंचित कर दिया गया है। इस उद्देश्य के सन्दर्भ में भी शब्द "निरुद्ध करेगा" का अर्थ किसी स्त्री को उसके पति की सहमति के बगैर रखना है। अतः इस उपबन्ध के अन्तर्गत स्त्री की सहमति का कोई महत्व नहीं है।

(iii) राजस्थान राज्य बनाम श्रीपाल जैन AIR 1963. SC 1323 में उत्तरदाता को राजस्थान सेवा नियम के नियम 244 के अन्तर्गत अनिवार्यतः निवृत्त कर दिया गया। इस नियम के अन्तर्गत राज्य सरकार को किसी राज्य कर्मचारी को बगैर कोई कारण बताए 25 वर्ष तक नौकरी (सेवा) कर लेने के बाद निवृत्त करने का पूर्ण अधिकार है। उत्तरदाता ने अपनी निवृत्ति के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी कि उसके मामले को कामकाज के नियम 37 (vii) (क) के अनुसार "किसी अधिकारी को पदच्युत करने, हटाने अथवा अनिवार्य निवृत्ति करने के प्रस्तावों को मुख्य मन्त्री द्वारा राज्यपाल को भेजा जाना चाहिए।" उच्च न्यायालय ने कहा कि राजस्थान सेवा नियम के अन्तर्गत तीन प्रकार की अनिवार्य निवृत्तियाँ नियम 56 के अन्तर्गत दण्ड के रूप में आनुपातिक पेन्शन पर, अधिवर्षिता की आयु प्राप्त करने पर, तथा नियम 241 के अन्तर्गत है। दृश्यतः ऐसा लगता है कि कामकाज के नियम का नियम 31 (vii) (क) अभिव्यक्ति "दण्ड के रूप में" से विशेषित नहीं है। अतः उपर्युक्त तीनों ही प्रकार की अनिवार्य निवृत्तियाँ इसकी परिसीमा में हैं। परन्तु नियम को ध्यानपूर्वक पढ़ने से ज्ञात होता है कि विधायिका का आशय यह नहीं है। इसका कारण स्पष्ट है कि नियम 31 (vii) (क) पदच्युत करने, हटाने तथा अनिवार्य निवृत्ति करने के प्रस्तावों के बारे में ही विचार करता है। इन तीनों अभिव्यक्तियों का निर्वचन 'साहचर्येण ज्ञायते' के सिद्धान्त के आधार पर ही होना चाहिए और ऐसा करने पर अभिव्यक्ति " अनिवार्य निवृत्ति" की प्रकृति हटाने या पदच्युत करने की होनी चाहिए। चूंकि हटाया जाना या पदच्युत करना सदा दण्ड के रूप में ही होता है। अतः नियम 31 (vii) (क) के अन्तर्गत शब्द "अनिवार्य निवृत्ति" नहीं की गई है अतः नियम 31 (vii) (क) यहाँ पर लागू नहीं होता। इसलिए यह स्पष्ट है कि नियम 244 के अन्तर्गत की गई अनिवार्य निवृत्ति के मामलों को मुख्य मन्त्री द्वारा राज्यपाल को भेजा जाना आवश्यक नहीं है जैसा नियम 31 (vii) (क) के अन्तर्गत निर्देशित है। 

(iv) के० जनार्दन पिल्लई बनाम भारत संघ A.L.R. 1981 SC 1485 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि कच्चे काजू आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 2 (क) (v) अन्तर्गत खाद्य पदार्थ हैं और इसलिए इसे केरल आवश्यक वस्तु नियन्त्रण (अस्थायी शक्तियाँ) के अधिनियम, 1962 की धारा 2 (क) के अन्तर्गत आवश्यक वस्तु घोषित नहीं किया जा सकता । उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि साहचर्यित शब्द अपना अर्थ एक दूसरे से लेते हैं और इसको ही साहचर्येण ज्ञायते का नियम कहते हैं। जब "खाद्य पदार्थों" को खाद्य तिलहनों, जिनकों एक प्रक्रिया से होकर गुजरने के बाद ही उनके भीतर के तेल का उपयोग किया जा सकता है, के साहचर्य में रखा गया हो तो यह उचित है कि "खाद्य पदार्थों" को विस्तृत रूप में, जिसमें ऐसी सभी खाद्य वस्तुएँ शामिल हों जिनको एक निश्चित प्रक्रिया से होकर गुजरने के बाद ही मानव के द्वारा खाया जा सके, निर्वचित किया जाए। इसके अतिरिक्त खाद्य पदार्थों के विधाने का इतिहास एवं 'केन्द्रीय विधान के उद्देश्य जिसके द्वारा भारत की गरीब जनता में आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन, पूर्ति तथा वितरण को विनियमित किया जाता है, को ध्यान में रखने से यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "खाद्य पदार्थों" को व्यापक अर्थ में जिसमें कच्ची वस्तुएँ भी, जो बाद में खाद्य में बदल जाती हैं, लिया जाना चाहिए।

संविधियों के निर्वचन में शाब्दिक या व्याकरणमूलक व्याख्या से आप क्या समझते हैं?

Question - What do you mean by "Literal or Grammatical Interpretation".
संविधियों के निर्वचन में शाब्दिक या व्याकरणमूलक व्याख्या से आप क्या समझते हैं?

उत्तर : शाब्दिक या व्याकरणीय व्याख्या (The Literal or Grammatical Interpretation) - 
शाब्दिक या व्याकरणिक व्याख्या (निर्वचन) से तात्पर्य यह है कि शब्दों को उनका साधारण एवं स्वाभाविक अर्थ प्रदान किया जाए और यदि ऐसा अर्थ स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो किसी भी कानून के उपबन्ध को लागू किया जाना चाहिये भले ही उसका परिणाम कुछ भी हो। इस सिद्धान्त का आधार यह है कि व्याख्या के सभी सिद्धान्तों का एकमात्र उद्देश्य विधायिका का आशय (Intention) है और चूंकि विधायिका अपने आशय को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती है अतः उन शब्दों को व्याकरणिक नियमों के आधार पर निर्वचित किया जाना उचित है। इसे सबसे सुरक्षित नियम कहा गया है क्योंकि विधायिका के उद्देश्य को केवल उन शब्दों के द्वारा ही जाना जा सकता है जिनके द्वारा उसने अपने आपको व्यक्त किया है। यदि किसी कानून की भाषा स्पष्ट हो तो ऐसी दशा में न्यायालय का एक मात्र कर्त्तव्य यह है कि वह उस भाषा को लागू करे न कि उस व्याख्या के परिणामों को देखें। उदाहरणार्थ-

(i) मकबूल हुसैन बनाम बम्बई राज्य ए० आई० आर० 1953 एस० सी० 325, में अपीलार्थी जब बम्बई हवाई अड्डे पर उतरा तो उसने यह घोषित नहीं किया कि वह अपने साथ विदेश से "सोना" लाया है। तलाशी लेने पर उसके कब्जे से सोना पाया गया। सागर सीमा शुल्क अधिनियम, 1878 की धारा 167 (8) के अधीन वह सोना जब्त कर लिया गया। उस पर विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 की धारा 8 के अन्तर्गत मामला दर्ज किया गया। अपीलार्थी का तर्क यह था कि 1947 के अधिनियम के अन्तर्गत दोहरे दण्ड से संरक्षण प्रदान किया गया है। जबकि स्वर्ण जब्त करके उसे पहले ही दण्डित किया जा चुका है। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सागर सीमा शुल्क प्राधिकारी न्यायालय या नाविक अधिकरण नहीं है और इसलिए इस अधिनियम के अन्तर्गत सोने को जब्त करना शास्ति न होने के कारण अभियोजन नहीं कहा जा सकता। अतः 1947 के अधिनियम के अन्तर्गत उसका परीक्षण वैध है।

(ii) रामअवतार बनाम सहायक विक्रय कर अधिकारी A.I.R. 1961 SC 1325 में प्रश्न यह था कि क्या पान के पत्तों के विक्रय पर विक्रय कर आरोपित किया जा सकता है या नहीं। अपीलार्थी ने यह तर्क दिया कि पान के पत्तों के विक्रय पर विक्रय कर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि यह "वेजीटेबल" है जो कर योग्य नहीं हैं। अपीलार्थी ने अपना तर्क केवल वेजीटेबल के शब्दकोशीय अर्थ पर आधारित किया कि वेजीटेबल वह होता है जो पौधों या उनके भागों से सम्बन्धित हो, या उसमें सम्मिलित हो, या उनसे निकाली जाए, या उनसे प्राप्त हों। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि जब स्वाभाविक या साधारण अर्थ स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो पान के पत्तों को शब्दकोश, तकनीकी या वनस्पतिशास्त्रीय अर्थ प्रदान नहीं किया जा सकता । प्रतिदिन प्रयोग होने वाले शब्दों को उनके लोकप्रिय अर्थ में समझा जाना चाहिये जिस अर्थ में उन्हें आप लोग समझते हैं, अतः पान का पत्ता वेजीटेबल नहीं हैं और उसका विक्रय कर योग्य है।

(iii) नगरपालिका मण्डल बनाम राज्य परिवहन प्राधिकारी, राजस्थान A.I.R. 1965 S.C. 458 में किसी बस स्टैण्ड का स्थान क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी द्वारा बदल दिया गया। मोटर यान अधिनियम, 1939 की धारा 64-क के अन्तर्गत क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी के आदेश पारित करने के पश्चात् 30 दिन के भीतर राज्य परिवहन प्राधिकारी के पास ऐसे आदेश के विरुद्ध आवेदन किया जा सकता है। प्रस्तुत मामले में आवेदन 30 दिन के पश्चात् किया गया था। यह तर्क दिया गया कि क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी के आदेश के बारे में “ज्ञान” होने के पश्चात् 30 दिन के भीतर आवेदन पेश किया जा सकता था। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि जब किसी कानून की परिभाषा स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो बिना परिणामों का ध्यान रखे उसे वही अर्थ दिया जाना चाहिये। न्यायालय ने यह भी कहा कि सीमा से सम्बन्धित कानून को निर्वाचित करते समय साम्या का ध्यान नहीं रखा जाता अतः स्पष्ट एवं व्याकरणिक अर्थ ही लागू होगा।

(iv) सरस्वती चीनी मिल बनाम हरियाणा राज्य बोर्ड A.I.R. 1992 SC 224 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि जल (प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण) उपकर अधिनियम, 1977 की प्रथम अनुसूची की प्रविष्टि 15 में प्रयुक्त शब्द 'वेजीटेबल' को आम अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। इस शब्द को वानस्पतिक अर्थ नहीं दिया जा सकता। अतः गन्ना 'वेजीटेबल' नहीं है। इस प्रकार गन्ने से चीनी बनाने वाले उद्योग इस प्रविष्टि के अन्तर्गत नहीं आते हैं और उनसे उपकर नहीं लिया जा सकता। शीरा से मद्यसार बनाने वाले उद्योग के अन्तर्गत उद्योग नहीं कहे जा सकते।

सजाति अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से वर्णन करें।

Question -  What do you mean by construction 'ejusdem generis'? Explain with the help of leading cases.
सजाति अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से वर्णन करें।

सजाति अर्थान्वयन (Construction Ejusdem Generis);

सजाति अर्थान्वयन का अर्थ (Meaning of Ejusdem Generis)

"एजुस्डेम जेनेरिस" का अर्थ है "उसी प्रकार का" । साधारणतः साधारण शब्दों को दूसरे शब्दों की भाँति उनके प्राकृतिक अर्थ में ही समझना चाहिए जब तक कि सन्दर्भ दूसरा अर्थ लेने को बाध्य न करें । परन्तु जब एक साधारण शब्द का प्रयोग एक सुस्पष्ट कोटि के शब्दों के पृष्ठ में किया गया हो तो साधारण शब्द को भी उस सुस्पष्ट कोटि के सीमित अर्थ में निर्वचित किया जा सकता है। साधारण शब्द पूर्ववर्ती विशिष्ट अभिव्यक्तियों से अपना अर्थ लेता है क्योंकि विधायिका ने एक सुस्पष्ट कोटि के विशिष्ट शब्दों द्वारा ऐसा करने के लिए अपना आशय स्पष्ट कर दिया है। यह सिद्धान्त कम साधारण शब्दों के पृष्ठ में प्रयोग किए गए साधारण शब्दों पर लागू होने तक ही सीमित है। यदि विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ एक सुस्पष्ट कोटि में नहीं आती हैं तो इस नियम को लागू नहीं किया जा सकता। इस कारण यदि कोई साधारण शब्द केवल एक विशिष्ट शब्द का अनुसरण करता है तो उस एक विशिष्ट शब्द से कोई सुस्पष्ट कोटि नहीं बनती और इसलिए ऐसे में सजाति- अर्यान्वयन नहीं किया जा सकता ।
परन्तु उक्त नियम के अपवाद स्वरूप कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें केवल मात्र एक शब्द को कोटि मानकर इस सिद्धान्त के आधार पर सीमित अर्थ देकर निर्वचन किए गए हैं। यदि प्रयोग किए गए विशिष्ट शब्दों से एक सम्पूर्ण कोटि समाप्त हो जाती है तो इसका अर्थ यही है कि विधायिका का आशय किसी विस्तृत या बड़ी कोटि से था जिसको खोजने का प्रयत्न न्यायालय करेगा। सजाति अर्थान्वयन का सिद्धान्त सार्विक लागू करने का सिद्धान्त नहीं है। यदि किसी विधान का सन्दर्भ इस सिद्धान्त को लागू करने के विरुद्ध हो तो इसे लागू नहीं किया जा सकता । सजाति अर्थान्वयन के सिद्धान्त का आधार यह है कि यदि विधायिका का आशय साधारण शब्दों को असीमित अर्थ में प्रयोग करना होता तो विधायिका को विशिष्ट शब्दों को प्रयोग करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। उदाहरणार्थ-

(i) बम्बई राज्य बनाम अली गुलशन AIR 1955 SC 810 में बम्बई भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1948 की धारा 6 (4) (क) में प्रयुक्त भाषा "राज्य सरकार राज्य के उद्देश्य या. किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए अधिग्रहण कर सकती है" के निर्वचन का प्रश्न था। अपीलार्थी का तर्क था कि इस प्रावधान के अन्तर्गत उसे विदेशी वाणिज्यिक दूतावास के सदस्य के लिए परिसर अधिग्रहण करने का अधिकार है। उच्च न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए” को अभिव्यक्ति "राज्य के उद्देश्य" की सजाति के रूप में निर्वाचित किया जाना चाहिए और विदेशी वाणिज्यिक दूतावास के सदस्य के लिए आवास का प्रबन्ध करना चूंकि संघ का उद्देश्य है राज्य का नहीं इसलिए राज्य सरकार के पास अधिग्रहण का कोई अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि उच्च न्यायालय ने सजाति अर्थान्वयन का नियम लागू करके भूल की है क्योंकि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए" केवल एक अभिव्यक्ति “राज्य के उद्देश्य" का अनुसरण करता है जो एक सुस्पष्ट कोटि नहीं है। कोटि की अनुपस्थिति में इस सिद्धान्त को लागू नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त उपबन्ध की भाषा से विधायिका का आशय स्पष्ट है। शब्दों को उनका प्राकृतिक अर्थ देने से स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए" के अन्तर्गत विदेशी वाणिज्यिक दूतावासों के सदस्यों के लिए आवास की व्यवस्था करना भी शामिल है।

(ii) लीलावती बनाम बम्बई राज्य A.I.R. 1957 SC 521 में याची जो किसी परिसर के किरायेदार की विधवा थी, घटना के समय उस परिसर में न रह रही थी। उत्तरदाता ने बम्बई भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1948 की धारा 6 (4) (क) के अन्तर्गत उस परिसर का अधिग्रहण किसी राज्य कर्मचारी के आवास के लिए कर लिया। याची ने इस अधिग्रहण को इस आधार पर चुनौती दी कि परिसर धारा के साथ जुड़े हुए स्पष्टीकरण के अनुसार "खाली" नहीं था। स्पष्टीकरण के अन्तर्गत किसी स्थान को खाली तब माना जाएगा जब किराएदार का "अपनी किराएदारी की समाप्ति, बेदखली या समनुदेशन पर, अधिभोग समाप्त हो जाता है या परिसर में किसी अन्य प्रकार से उसके हित का अन्तरण हो जाता है अथवा अन्यथा"। याची के अनुसार " अथवा अन्यथा " शब्दों का इसके पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियों के साथ सजाति निर्वचन होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने नर्धारित किया कि इस नियम को प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि "अथवा अन्यथा " शब्दों को पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियाँ समान प्रकृति की जाति न होने के कारण एक सुस्पष्ट कोटि में नहीं आती । अनियमितता में प्रयोग किए गए शब्दों को उनके प्राकृतिक अर्थ में पढ़ने से यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "अथवा अन्यथा" का आशय पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियों में सम्मिलित न होने वाली दशाओं को समावेशित करना है। यह निर्वचन विधान के उद्देश्य के अनुकूल भी है।

(iii) हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ A.I.R. 1965 SC 1167 में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत जारी किए गए फल उत्पादक आदेश 1955 द्वारा फल की चाशनी में फल का रस पच्चीस प्रतिशत होना बाध्यकर बना दिया गया। अपीलार्थी ने तर्क दिया कि यह आदेश उनके उत्पाद " रूह अफजा " पर लागू नहीं होता यद्यपि उसके अन्दर फलों का रस भी है। इसका कारण यह है कि इस आदेश के खण्ड 2 (घ) (v) में शरबत, पेराई, वल्य जौ का जल, पीपी में बन्द फलों का रस तथा परोसने के लिए तैयार पेय या कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो, शामिल है तथा अभिव्यक्ति "कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो" का अर्थ सजाति होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर करते हुए निर्णय दिया कि यह सिद्धान्त इस उदाहरण में लागू नहीं होता क्योंकि अभिव्यक्ति "कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो" के पूर्व प्रयोग किए गए शब्द किसी स्पष्ट कोटि में नहीं आते। न्यायालय ने यह भी कहा कि आदेश के सन्दर्भ से यह स्पष्ट है कि सभी पेय जिनमें फलों का रस हो इसमें शामिल है।

(iv) एक्सप्रेस होटेल्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम गुजरात राज्य A.I.R, 1989 SC 1949 में विलासिता पर गुजरात कर (होटल और बासा) अधिनियम, 1977 की धारा 2 (क) के निर्वाचन का प्रश्न था जिस परिभाषा के अनुसार "वासा के लिए प्रभार" से वातानुकूल, टेलीफोन, टेलीविजन, रेडियो, संगीत, अतिरिक्त बिस्तर, "और अन्य इस प्रकार की वस्तुएँ" सम्मिलित थीं। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति " और अन्य प्रकार की वस्तुएँ" को सजाति के आधार पर अर्थान्वयित किया जाना उचित है। अभिव्यक्ति के पूर्व में प्रयुक्त शब्दों का वर्ग समाप्त न हो जाने के कारण, विधायिका ने जानबूझकर इसके अन्दर इसी वर्ग की अन्य वस्तुओं को शामिल करने के लिए इस अभिव्यक्ति का प्रयोग किया है।

(v) सहायक कलेक्टर, कन्द्रीय उत्पाद शुल्क बनाम रामदेव टोबेको कम्पनी A.I.R. 1991 SC 506 में केन्द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 में 1973 के संशोधन के पूर्व धारा 40 (2) के निर्वचन का प्रश्न था जिसके अनुसार वाद हेतुक के उत्पन्न से छह माह बीत जाने के पश्चात् विधि के अन्तर्गत कुछ किए गए अथवा किए जाने के आदेश दिए जाने के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही स्थापित नहीं की जा सकेगी।

उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति 'अन्य विधिक कार्यवाही' को पूर्वलिखित शब्दों 'वाद' एवं 'अभियोजन' की सजाति के रुप में पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि वे एक विशिष्ट कोटि के अन्तर्गत आते हैं। अतः शास्ति तथा न्यायनिर्णयन की कार्यवाहियाँ धारा 40 (2) मैं प्रयुक्त अभिव्यक्ति अन्य विधिक कार्यवाही के अन्तर्गत नहीं आतीं और इसलिए ये कार्यवाहियाँ इस उप-धारा के अन्तर्गत निर्धारित परिसीमा के अधीन, नहीं हैं। 'वाद' अथवा 'अभियोजन के न्यायिक या विधिक कार्यवाहियां हैं जिन्हें किसी कार्यपालक प्राधिकारी, चाहे वह कानूनी ही क्यों न हो, के समक्ष न दाखिल कर न्यायालय के समक्ष दाखिल किया गया हो। इस विश्वास को धारा में अभिव्यक्ति 'संस्थित' से बल मिलता है।


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