सोमवार, 29 मई 2023

छंद्म विधायन या ' रंगनीय विधायन ' के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं ?

Question:  Explain the doctrine of ' Colorable Legislation '.
छंद्म विधायन या ' रंगनीय विधायन ' के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर - रंगीय (आभासी या छम्) विधायन का सिद्धान्त - 

यह सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू किया जाता है जहां विधायिका अपनी अधिकारिता से परे होकर विधि का निर्माण करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में उत्पन्न समस्या के समाधान हेतु छंद्म विधायन या ' रंगनीय विधायन ' के सिद्धांत का सूत्रपात किया जाता है । 

यह सिद्धांत एक सूत्र पर आधारित है -
" आप जिस कार्य को प्रत्यक्ष रूप से नहीं करते उसे अप्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकते " 

संघ और राज्य विधान मण्डल दोनों संविधान से अपनी विधायी शक्ति प्राप्त करते हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में विधि-निर्माण के लिए स्वतन्त्र हैं। छम् विधायन का सिद्धान्त उन अवस्थाओं में लागू होता है जिनमें व्यवस्थापिका अपनी विधायी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपनी विधायी शक्ति सीमा से बाहर कार्य करती है। इस प्रकार का अतिक्रमण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी प्रकार का हो सकता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि यद्यपि विधायिका किसी कानून को बनाने में ऊपरी तौर से अपनी शक्तियों के भीतर कार्य करती है तथापि सारतः या वास्तव में वह संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करती है। ऐसे परोक्ष विधायन को ही छदम् या रंगनीय विधायन कहते हैं। ऐसे मामलों में अधिनियम का सार महत्वपूर्ण होता है उसका बाह्य रूप या आकृति (Form) नहीं। यदि किसी विधान की विषय-वस्तु सारतः उस विधान मण्डल की शक्ति के बाहर है तो उसका बाह्य रूप उसे न्यायालय द्वारा अमान्य घोषित करने से नहीं बचा सकेगा। अतः विधान मण्डल कोई अप्रत्यक्ष या परोक्ष तरीका अपनाकर संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता (के० सी० जी० नारायण देव ब० उड़ीसा राज्य A.I.R. 1953 S.C. 375) ।

जस्टिस श्रीकृष्ण अय्यर के अनुसार, “छद्भ्यता (Colourability) से तात्पर्य अक्षमता (Incompetemcy) से है। कोई वस्तु छद्मय तब होती है जब वह जिस रूप में प्रकट की जाती है वास्तव में उस रूप में नहीं होती।”

कामेश्वर सिंह ब० बिहार राज्य A. I.R.1952 S.C. 255 में बिहार लैन्ड्स रिफोर्म्स एक्ट, 1950 की वैधता को चुनौती दी गई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने छम् विधायन सिद्धान्त के आधार पर अवैध घोषित कर दिया क्योंकि इसमें मुआवजे के निर्धारण के लिये वास्तव में कोई आधार निर्धारित नहीं किया गया था, यद्यपि ऊपरी तौर से ऐसा करने का प्रयास किया गया था। वास्तव में अधिनियम में दी गई व्यवस्था के फलस्वरूप जमीदारों को कोई मुआवजा नहीं मिलता था।




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