सार और तत्व के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर- इसे सार और मर्म का सिद्धांत भी कहा जाता है। संविधान की व्याख्या में इस सिद्धांत को उस समय लागू किया जाता है जब किसी एक विधायिका द्वारा निर्मित अन्य विधायिका के क्षेत्र में अनुसागिक रूप से हो रही हो या प्रभावित कर रही हो तब न्यायालय द्वारा ऐसे मामलों में विधि के सार और तत्व पर विचार किया जाता है।
यह देखने के लिए कि क्या कोई विशेष विधि उस विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार में है जिसने इनको पारित किया है, न्यायालय को यह विचार करना चाहिये कि विधायन की सच्ची विषय-वस्तु "सार तत्व या वास्तविक प्रकृति और स्वरूप" क्या है और क्या ऐसी विषय-वस्तु उस विधान मण्डल से सम्बन्धित विधायी सूची में दिये गये शीर्षकों में निहित है। वास्तव में विधायन की सच्ची विषय-वस्तु को तय करने के लिये विधान-मण्डल द्वारा इसको दिया गया नाम निर्णायक नहीं है। यदि किसी विधि का 'तत्व एवं सार' किसी विशेष विधान-मण्डल के विधान क्षेत्र में पड़ता है। जिसके द्वारा वह निर्मित की गई है, तो ऐसी विधि की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती भले ही वह अनुसागिक रूप से किसी अन्य विधान-मण्डल के विधायन क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत किसी शीर्षक पर पड़ती है। इसे 'तत्व एवं सार' का सिद्धान्त कहते हैं।
दूसरे शब्दों में जब एक विधान-मण्डल द्वारा निर्मित विधि दूसरे विधान-मण्डल के क्षेत्र में अतिक्रमण करती है तो यह जानने के लिये कि वह विधि उस विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आती है या नहीं, जिसने उसे निर्मित किया है, न्यायालय सार एवं तत्व का सिद्धान्त लागू करता है। उदाहरणार्थ-
(i) ए० एम० कृष्ण बनाम मद्रास राज्य A.I.R. 1975 S.C. 297 में कहा गया है कि जब किसी अधिनियम का कोई प्रावधान आनुषांषिक रूप में (Incidentally) दूसरे विधान-मण्डल के विधान विषयों पर अतिक्रमण करता है तो शाब्दिक व्याख्या के आधार पर ऐसा प्रावधान अवैध होगा। किन्तु यदि विधान सारवान रूप से या विधान का वास्तविक उद्देश्य ऐसे विषय से सम्बन्धित है जिस पर वह विधान मण्डल कानून बनाने में सक्षम है, तो उसे वैध घोषित किया जायेगा; भले ही वह दूसरे विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार में आने वाले विषय पर अनुषागिक रूप से अतिक्रमण करता हो । उस विधान की वास्तविक प्रकृति और स्वरूप का पता लगाने के लिये पूरे अधिनियम पर विचार किया जायेगा और उसके उद्देश्य, विस्तार और उसके प्रावधान के प्रभाव की जाँच की जायेगी।
(ii) बम्बई राज्य बनाम बाल तारा A.I.R. 1951 S.C. 368 में बम्बई विधान मण्डल ने बम्बई मद्य निषेध अधिनियम पारित किया जिसके द्वारा राज्य में मादक द्रव्यों को खरीदने और रखने की मनाही कर दी गई थी। इस अधिनियम की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि वह संघ-सूची में वर्णित विषय "मादक द्रव्यों के आयात-निर्यात" का अतिक्रमण करता है क्योंकि मादक द्रव्यों के क्रय-विक्रय और उपयोग को रोकने से उसके आयात-निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय देते हुए कहा कि चूँकि अधिनियम का मुख्य उद्देश्य राज्य-सूची के विषय से सम्बन्धित था, संघ-सूची के विषय से नहीं इसलिये अधिनियम पूर्णतः संवैधानिक है ।
(iii) प्रफुल्ल कुमार बनाम बैंक ऑफ खुलना AIR. 1947 P.C. 64 में प्रिवी कौंसिल ने 'सार-तत्व' के सिद्धान्त को लागू किया। प्रस्तुत मामले में बंगाल विधान मण्डल द्वारा ऋण का व्यापार नियन्त्रण करने के लिये बंगाल मनीलेण्डर्स ऐक्ट, 1940 पारित किया। इस अधिनियम द्वारा बंगाल प्रान्त में ऋण पर ब्याज दर की सीमा निश्चित कर दी ताकि ऋणदाता संविदा करके भी ऋणी से अधिक ब्याज न वसूल कर सकें। वादी ऋणदाताओं ने विवादित अधिनियम को इस आधार पर चुनौती दी कि यह बंगाल विधान मण्डल की विधायन-शक्ति से बाहर है, क्योंकि यह संघ सूची में वर्णित प्रविष्टि "बचत-पत्र" का अतिक्रमण करती है, जिस पर केवल केन्द्र को ही कानून बनाने का अधिकार है । प्रिवी कौंसिल ने निर्णय देते हुए कहा कि विवादित अधिनियम बंगाल विधान मण्डल की विधायी शक्ति के अधीन है; क्योंकि उसका सार-तत्व या प्रमुख उद्देश्य सूची के विषय ऋण और ऋणदाता से सम्बन्ध रखता है, भले ही यह अनुषांगिक रूप में संघ-सूची के विषय 'वचन-पत्र' का अतिक्रमण करता है। अतः यह अधिनियम संवैधानिक है।
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