संविधान के अधिकारातीत के सिद्धांत का वर्णन करें।
उत्तर- संविधान का शक्ति वाह्य सिद्धान्त (Doctrine of Ultra Vires of the Constitution) -अधिकारातीत के सिद्धान्त का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है- 1. वास्तविकत: अधिकारातीत, और 2. प्रक्रिया संबन्धी अधिकारातीत।
जहाँ किसी विषय पर विधान बनाने की शक्ति न होने पर भी विधि बनाई जाती है तो उसको वस्तुतः अधिकारातीत कहा जायेगा। उदाहरणार्थ; संविधान के अन्तर्गत विदेशी नीति बनाने की शक्ति केन्द्रीय सरकार को है, राज्य सरकार को नहीं। यदि राज्य विधानमंडल विदेश नीति बनाता है, तो उसको वास्तविकत: अधिकारातीत होने के कारण शून्य माना जाएगा। इसके विपरीत, जहाँ किसी विषय पर विधि बनाने का अधिकार प्राप्त है और इस वास्ते प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है, किन्तु विधि उस प्रक्रिया का पालन करके नहीं बनाई जाती है, तो इसको प्रक्रिया संबन्धी अधिकारातीत कहा जायेगा। अतः प्रदत्त शक्ति के बाहर चला जाना अधिकारातीत माना जायेगा।
शक्ति वाह्य का नियम प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) में भी लागू होता है। प्रत्यायोजित विधान पर आक्षेप अधिकारातीत की दृष्टि से निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है-
1. मूल अधिनियम का संविधान के अधिकारातीत प्रवर्तन-संविधान उन सीमाओं को निर्धारित करता है जिनके भीतर विधानमंडल कार्य कर सकता है।
(i) स्पष्ट सांविधानिक सीमाएँ-भारत में संसद और राज्य विधानमंडल की शक्तियाँ असीमित नहीं हैं। विधायी शक्तियाँ संविधान में प्रगणित तथा निर्धारित हैं। प्रत्येक अधिनियम संविधान की इस सीमा के भीतर ही बनाया जा सकता है। इसलिये यदि मूल अधिनियम इस सीमा का उल्लंघन करता है तो उसको अधिकारातीत घोषित किया जा सकता है क्योंकि ऐसा विधान विधायिका की अधिकारिता के बाहर होगा।
(ii) उपलक्षित सांविधानिक सीमाएँ-भारत के संविधान के लागू होने पर उच्चतम न्यायालय ने उपलक्षित सांविधानिक सीमाओं का वर्णन रि देहली लॉज ऐक्ट में किया है। इस मामले में प्रत्यायोजन की सीमा के अवधारण के सम्बन्ध में दो विचार धाराओं को प्रतिपादित किया गया है- 1. विधानमंडल आवश्यक विधायी कार्य का त्याग नहीं कर सकता है, और 2. विधायी नीति की घोषणा और मार्गदर्शी नियमों या मान दण्डों के निर्धारण के पश्चात् ही प्रत्यायोजन किया जा सकता है।
(iii) सांविधानिक अधिकार कोई भी मूल अधिनियम सांविधानिक अधिकार का जिसके अन्तर्गत मूल अधिकार, सम्पत्ति का अधिकार और वाणिज्य खण्ड आते हैं, अतिक्रमण नहीं कर सकता।
2. प्रक्रिया सम्बंधी शक्ति वाह्य-जहाँ विधि बनाने का अधिकार दिया गया है और उसके लिए प्रक्रिया भी निश्चित की गई है, वहाँ यदि विधि प्रक्रिया का पालन किए बिना बनाई जाती है तो उसको अधिकारातीत घोषित कर दिया जाएगा। रामकृष्ण बनाम मध्य प्रदेश राज्य A.I.R. 1958 नाग० 467, में केन्द्रीय सरकार की सहमति से राज्य सरकार को नियम बनाने के लिए निदेश दिया गया था। किन्तु राज्य सरकार ने इस प्रकार की सहमति के बिना ही नियम बना दिया। इस नियम को अधिकारातीत होने के कारण अवैध निर्णीत किया गया।
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