सोमवार, 29 मई 2023

आच्छादन के सिद्धांत की विवेचना कीजिए।

Question: Discuss the Doctrine of Eclips.

आच्छादन के सिद्धांत की विवेचना कीजिए।


उत्तर - इसे ग्रहण का सिद्धांत भी कहा जाता है। यह संविधानिक निर्वचन का एक प्रमुख सिद्धांत है ।


संविधान के अनुच्छेद 13(1) के अनुसार, इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले भारत के राज्य क्षेत्र में लागू सभी विधियां उस मात्रा तक शून्य होगी जिस तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत हैं।


अनुच्छेद 13(2) के अनुसार, राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनायेगा जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती हैं या न्यून करती है और इस खण्ड के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी।


इस प्रकार आच्छादन अनुच्छेद 13(1) पर लागू होता है; 13(2) पर नहीं क्योंकि 13(2) अंतर्गत निर्मित विधि आरंभ से ही मृत रूप में आती है, जिसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।


अनुच्छेद 13(1) के अनुसार संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले भारत के राज्य क्षेत्र में लागू विधि पर जो ग्रहण लगा था अर्थात शून्य हो गई थी उसे संशोधन दोबारा पुनर्जीवित किया जा सकता है।


ग्रहण आच्छादन का सिद्धान्त भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 के उपखण्ड (1) पर आधारित है जिसके अनुसार संविधान-पूर्व विधियाँ संविधान लागू होने पर उस मात्रा तक अवैध होंगी जिस तक ये मूल अधिकारों से असंगत हैं। ऐसी विधियाँ प्रारम्भ से ही शून्य नहीं होतीं, बल्कि अधिकारों के लागू हो जाने के कारण वे मृतप्राय हो जाती हैं और उनको लागू नहीं किया जा सकता। ऐसे कानून बिल्कुल मिट नहीं जाते, वे केवल मूल अधिकारों द्वारा आच्छादित हो जाते हैं और निद्रा अवस्था में रहते हैं। संविधान लागू होने से पहले के सभी संव्यवहारों के लिये उनका अस्तित्व यथावत् वैध बना रहता है और ऐसी विधि के अन्तर्गत अर्जित किये गये अधिकारों और दायित्वों को लागू किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-


(i) भीखाजी नारायण ठाकरस बनाम मध्य प्रदेश राज्य A.I.R. 1955 SC 781 में यह प्रश्न विचारणीय था कि क्या ऐसी विधियों को, जो संविधान लागू होने पर मृतप्राय हो जाती हैं, संविधान में संशोधन करके पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसी प्रश्न को हल करने के लिये उच्चतम न्यायालय ने आच्छादन का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है। इस वाद में एक संविधान-पूर्व विधि में एक ऐसा उपबन्ध था जो राज्य सरकार को प्राधिकृत करता था कि वह सभी निजी व्यक्तियों को मोटर-यातायात-व्यापार से बहिष्कृत कर सकता है। कानून यद्यपि जब बना था, वैध था, लेकिन 1950 में संविधान के लागू होने पर शून्य हो गया, क्योंकि यह उपबन्ध अनुच्छेद 19 (1) (घ) का उल्लंघन करता था, जो नागरिकों को जीविका, पेशा, व्यापार या वाणिज्य करने का मूल अधिकार प्रदान करता है । परन्तु सन् 1951 में संविधान के प्रथम संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 19 (1) में संशोधन किया गया और राज्य को किसी व्यापार के करने का एकाधिकार (Monopoly) प्रदान किया गया। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि संशोधन के फलस्वरूप मृतप्राय विधि पुनः सजीव हो उठी है, क्योंकि संशोधन ने उस पर से मूल अधिकारों के ग्रहण को हटा दिया और विधि को सभी दोषों एवं अयोग्यताओं से मुक्त कर दिया। ऐसी विधि केवल कुछ समय के लिये मूल अधिकारों द्वारा आच्छादित हो जाती है। किन्तु जैसे ही उस पर से आच्छादन हटा दिया जाता है, वह सजीव हो उठती है और उसी दिन से लागू हो जाती है। ऐसी विधि को फिर से अधिनिमित करने की आवश्यकता नहीं होती ।


(ii) केशवन माधव मेनन बनाम मुम्बई राज्य, A.I.R. 1951 S.C.128 में यह प्रश्न उठाये गए कि क्या स्वतंत्रता से पूर्व अधिनियमित भारतीय प्रेस (आपात अधिकार) अधिनियम, 1913 की धारा 18 के अन्तर्गत प्रारम्भ किया गया। अभियोजन संविधान के अनुच्छेद 13(1) के अस्तित्व में आने के पश्चात् भी जारी रह सकता है और क्या यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) और (2) का अतिक्रमण करती है ? उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से यह निर्धारित किया कि अभियोजन जारी रहेगा क्योंकि प्रत्यक्ष या आवश्यक विवक्षित उपबंध की अनुपस्थिति में संविधान को भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जा सकता और न ही इस प्रकार की किसी बात का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 13(1) में ही है।"


(iii) सगीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश, A.I.R. 1955 S.C. 728 में उत्तर प्रदेश पथ परिवहन अधिनियम, 1951 की संविधानिकता का प्रश्न उठाया गया। उच्चतम न्यायालय ने इसे अनुच्छेद 19(1) (घ) के विरुद्ध मानते हुए अनुच्छेद 13 (2) के अन्तर्गत शून्य निर्धारित किया और यह स्पष्ट किया कि असंवैधानिक विधि मृत विधि होती है जिसकी बेड़ियां सांविधानिक संशोधन द्वारा हटाकर उसे पुनः जीवन नहीं दिया जा सकता और केवल मात्र उपाय उसका पुनः अधिनियमन है ।


(iv) दीप चन्द बनाम उत्तर प्रदेश राज्य A.I.R. 1959 SC 648 में याची ने उत्तर प्रदेश परिवहन सेवा (विकास) अधिनियम, 1955 की सांविधानिकता का प्रश्न इस आधार पर उठाया कि यह अनुच्छेद 31 अब अनु० 300 (क) का अतिक्रमण करता है। उच्चतम न्यायालय ने एक मत से यह निर्धारित किया कि यह अधिनियम अनुच्छेद 31 के विपरीत नहीं है। दो विद्वान अल्पमत न्यायाधीशों ने कहा कि असक्षम विधायिका के द्वारा बनाई गई विधि और संवैधानिक सीमाओं के अतिक्रमण में बनाई गई विधि के बीच अन्तर पर विचार करना आवश्यक नहीं है। परन्तु वशेशर नाथ के मामले में अपना मत प्रकट करने वाले विद्वान न्यायाधीश ने इस मामले में भी अपने पूर्व में कहीं बात को दोहराते हुए पुन: कहा कि उपर्युक्त विधियों में कोई अन्तर नहीं है ।


(v) महेन्द्र लाल जैनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य AIR. 1963 SC 1019 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि ग्रहण का सिद्धान्त केवल संविधान-पूर्व विधियों पर लागू होता है संविधान-पश्चात् पर नहीं । अनुच्छेद 13 (1) में शब्दों 'जिस तक' तथा अनुच्छेद 13 (2) में शब्दों 'उल्लंघन की मात्रा तक' का प्रयोग यह साबित करता है कि उद्देश्य ऐसी विधि को बचाने का था जो मूल अधिकारों के असंगत हो या उसका अतिक्रमण करता हो। 'शून्य' शब्द का प्रयोग अनुच्छेद 13 (1) और (2) में उसी अर्थ में किया गया है। ग्रहण का सिद्धान्त ऐसी विधियों को पुनर्जीवित कर देगा जो संविधान के अस्तित्व में आने के पूर्व जब वे अधिनियमित की गई थी तब वैधानिक थीं पर संविधान के अस्तित्व में आने के पश्चात् मूल अधिकारों का अतिक्रमण करने लगी । परन्तु संविधान के पश्चात् मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती हुई अधिनियमित विधियाँ मृतजात या नास्ति अभिवाक् थीं और उन्हें पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 19 का अतिक्रमण करने वाली विधि गैर-नागरिकों के सन्दर्भ में वैधानिक होगी परन्तु इसमें ग्रहण का सिद्धान्त लागू नहीं होगा ।


(vi) मधुलिमये बनाम उपखंड मजिस्ट्रेट A.I.R. 1971 SC 2486 में संविधान पूर्व विधि, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 144 और अध्याय आठ को इस आधार पर आक्षेपित किया गया कि वे अनुच्छेद 19 (1) (क) का अतिक्रमण करते थे और उन्हें अनु० 19 (2), 1951 के संशोधन के पूर्व जैसा वह तब था, के द्वारा बचाया नहीं जा सकता, जिसके अन्तर्गत राज्य के पास लोक व्यवस्था के आधार पर वाक्-स्वातंत्रता पर पाबन्दी लगाने की शक्ति नहीं थी। साथ ही, अनु 19 (2) में प्रयुक्त अभिव्यक्त 'राज्य की सुरक्षा' का उच्चतम न्यायालय ने बार-बार अर्थान्वयन केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को गम्भीर खतरा के अर्थ में किया है, और इसलिए आक्षेपित धाराएं अभिव्यक्ति 'राज्य की सुरक्षा' के अन्तर्गत नहीं आती हैं और इस कारण संविधान के अस्तित्व में आने के पश्चात् शून्य हो गईं। इसका अर्थ यह हुआ कि ग्रहण का सिद्धान्त लागू होता है जिसके अन्तर्गत आक्षेपित धाराओं पर ग्रहण लग जाएगा और संविधान में संशोधन करने के पश्चात् ही पुनः जीवन पा सकेंगी। उच्चतम न्यायालय ने ग्रहण का सिद्धान्त लागू नहीं किया । न्यायालय ने संशोधन के भूतलक्षी प्रवर्तन में एक कल्पना बनाई और इस प्रकार उन उपबंधों को असंवैधानिक होने से बचा लिया।


(vii) गुजरात राज्य बनाम श्री अम्बिका मिल्स A.I.R. 1974 SC 1300 में मुम्बई श्रम कल्याण निधि (गुजरात विस्तार और संशोधन) अधिनियम, 1961 और मुम्बई श्रम कल्याण निधि नियम, के कुछ उपबंधों को उत्तरदाता जो कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत रजिस्ट्रीकृत कम्पनी थी, ने आक्षेपित किया। इन उपबंधों को अनुच्छेद 19 का अतिक्रमण करता हुआ मानते हुए उच्च न्यायालय ने उन्हें शून्य घोषित किया। उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए यह निर्धारित किया कि उपबंध अनुच्छेद 14 का अतिक्रमण नहीं करते थे, और उच्च न्यायालय का यह कहना है कि वे अनुच्छेद 19 का अतिक्रमण करते थे, के प्रश्न पर विचार करना आवश्यक नहीं है क्योंकि परम्परा के अनुरूप न्यायालय वहाँ हस्तक्षेप नहीं करेगा जहाँ किसी न किसी विधि की संवैधानिकता को आक्षेपित किया है जिसका उसे स्वयं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा पर दूसरों पर पड़ेगा। न्यायालय ने यह दोहराया कि अनुच्छेद 19 के लिए निगम एक नागरिक नहीं है। न्यायालय ने इस पर भी जोर दिया कि संविधान पूर्व की किसी विधि को अनुच्छेद 13 (1) के अन्तर्गत शून्य घोषित किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि उसे कानून की पुस्तक से हटा दिया जाएगा। यदि वह किसी नागरिक के मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती है और इसलिए उसके विरुद्ध वह खराब विधि है, तो भी गैर-नागरिकों पर उसका लागू रहना जारी रहेगा क्योंकि संविधान के अन्तर्गत मूल अधिकार केवल नागरिकों को प्रदान किए गए हैं। उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि इस मामले में ग्रहण का सिद्धान्त एक विवाद्यक था, और यह भी कि मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती हुई संविधान-पूर्व विधियाँ मृतजात या नास्ति अभिवाक् नहीं कही जा सकती


(viii) दुलारे लोध बनाम तृतीय अतिरिक्त जिला जज, कानपुर A.I.R. 1984 SC 1260 में उच्चतम न्यायालय ने एक अधिनियम की एक धारा को ग्रहण का सिद्धान्त लागू किया जिसके अन्तर्गत एक किरायेदार के विरुद्ध पूर्व में पारित बेदखली की डिक्री का निष्पादन नहीं किया जा सकता था। मकान मालिकों के कष्ट को समाप्त करने के लिए इस धारा का भूतलक्षी संशोधन किया गया था । यह निर्धारित किया गया कि मूल धारा के द्वारा डिक्री पर ग्रहण पड़ गया था जिस कारण उसे निष्पादित नहीं किया जा सका, और ग्रहण की परछाई संशोधन द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से समाप्त कर दिए जाने के बाद डिक्री पुनर्जीवित और निष्पादनीय हो गई।


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