रविवार, 28 मई 2023

अर्थान्वयन साहचर्यण ज्ञापते का अर्थ क्या है?

Question - Explain " Noscitur a Sociis "
" अर्थान्वयन साहचर्यण ज्ञापते " का अर्थ क्या है?

अर्थान्वयन साहचर्येणा ज्ञायते (Construction Noscitur A Sociis);

अर्थान्वयन साहचर्येण ज्ञायते (नॉसिटर अ सोसायस) का अर्थ (Meaning of , Noscitur a Sociis) - "नॉसिटर" का अर्थ जानता तथा "सोसायस" का अर्थ साहचर्य अथवा सहयोजन हैं। अतः "नॉसिटर अ सोसायस" का अर्थ साहचर्य से जानना है। जब दो या दो से अधिक ऐसे शब्द जिनके अर्थ सदृश हों एक साथ प्रयोग किए जाएँ तो उन्हें उनके सजातीय अर्थ में समझा जाना चाहिए। वे अपना रंग एक दूसरे से लेते हैं जिससे उनमें से अधिक साधारण शब्द का अर्थ कम साधारण शब्द के सदृश अर्थ में निर्बन्धित हो जाता है। किसी शब्द को उसकी संगिति में 'कौन है' से जाना जा सकता है। साहचर्चित शब्द परस्पर व्याख्या तथा सीमित करते हैं। यह सिद्धान्त विधायिका के वास्तविक आशय को प्राप्त करने में सहायक होने के कारण उस जगह अभिभावी नहीं हो सकता जहाँ यह स्पष्ट हो कि ज्ञानबूझकर व्यापक शब्दों का प्रयोग किया गया नें है। उदाहरणार्थ - (1) मंगू सिंह बनाम चुनाव अधिकरण A.I.R. 1957 S.C. 871 में अपीलार्थी द्वारा चुनाव लड़ने के लिए अपना नामांकन पत्र भरते समय एक वर्ष से अधिक "माँग" का नगरपालिका कर देय था। उसने वोट डालने की तिथि से पूर्व पूरा कर अदा कर दिया तथा वह चुनाव में विजयी हुआ। उसके चुनाव को अवैध घोषित कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय के समक्ष उसका तर्क यह था कि सुसंगत तिथि नामांकन पत्र दाखिल करने की नहीं वरन् वोट डालने की थी तथा इसके अतिरिक्त उसको "माँग" का कोई नोटिस भी नहीं दिया गया था। याचिका को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्णीत किया कि सुसंगत तिथि नामांकन भरने की तिथि ही थी न कि वोट डालने की। न्यायालय ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति "माँग" को उसके साथ प्रयुक्त किए गए अन्य शब्दों के सन्दर्भ में निर्वाचित किया जाना चाहिए। ऐसा करने से स्पष्ट है कि "माँग" का वास्तविक अर्थ नगरपालिका कर अथवा अन्य देय है यद्यपि "माँग" का साधारण अर्थ माँगा जाना या माँगना होता है पर यह अर्थ यहाँ पर सर्वथा अनुपयुक्त है यदि यह देखा जाए कि और किन शब्दों के साहचर्य में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। अतः इस शब्द का निर्वचन बकाया रकम अथवा देय के रूप में ही होना चाहिए।

(II) आलमगीर बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1959 SC 436 में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 के निर्वचन का प्रश्न था। इस धारा के अनुसार जो कोई किसी स्त्री को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, जिसका अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है, या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष के पास से, या किसी ऐसे व्यक्ति के पास से, जो उस पुरुष की ओर से देखरेख करता है, इस आशय से ले जाएगा, या फुसलाकर ले जाएगा कि वह किसी व्यक्ति के साथ नाजायज संभोग करे या इस आशय से ऐसी किसी स्त्री को छिपाएगा या 'निरुद्ध' करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा। इस मामले में तथ्य यह थे कि एक विवाहित स्त्री, अपने पति को छोड़कर, खुले रूप में अपीलार्थी के साथ रहने लगी। अपीलार्थी के विरुद्ध संहिता की धारा 498 का मामला प्रारम्भ किया गया। अपीलार्थी का तर्क यह था कि उसके विरुद्ध अभियोग निरस्त कर दिया जाना चाहिए क्योंकि न हीं वह उस स्त्री को ले गया था, न ही फुसला कर ले गया था, न ही उसने उसे छिपाकर रखा था और न ही उसने उसे 'निरुद्ध' किया था। न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि चूँकि अपीलार्थी के द्वारा स्त्री का ले जाना, फुसलाकर ले जाना अथवा छिपाना, हुआ ही नहीं था क्योंकि वह स्त्री जानबूझकर ही उसके साथ खुले रूप से रहने लग गई थी, तो क्या अपीलार्थी द्वारा उस स्त्री को "निरुद्ध" किया जाना कहा जा सकता है या नहीं। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति "निरुद्ध करेगा" का साधारणतः अर्थ इच्छा के विरुद्ध रोका जाना है परन्तु यह अर्थ प्रस्तुत सन्दर्भ में उचित नहीं है क्योंकि इस अभिव्यक्ति को उसके साहचर्य में प्रयोग किए गए दूसरे शब्दों के प्रकाश में ही निर्वाचित किया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि शब्द "निरुद्ध करेगा" को धारा 498 में प्रयोग शब्दों "ले जाएगा", "फुसलाकर ले जाएगा" तथा "छिपाएगा" के सन्दर्भ में ही निर्वचित किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर "निरुद्ध करेगा" का अर्थ पति की सहमति के बगैर निरुद्ध क्रिया जाना है। धारा 498 पति के अधिकारों की संरक्षा करती है जिसे पत्नी के सानिध्य से वंचित कर दिया गया है। इस उद्देश्य के सन्दर्भ में भी शब्द "निरुद्ध करेगा" का अर्थ किसी स्त्री को उसके पति की सहमति के बगैर रखना है। अतः इस उपबन्ध के अन्तर्गत स्त्री की सहमति का कोई महत्व नहीं है।

(iii) राजस्थान राज्य बनाम श्रीपाल जैन AIR 1963. SC 1323 में उत्तरदाता को राजस्थान सेवा नियम के नियम 244 के अन्तर्गत अनिवार्यतः निवृत्त कर दिया गया। इस नियम के अन्तर्गत राज्य सरकार को किसी राज्य कर्मचारी को बगैर कोई कारण बताए 25 वर्ष तक नौकरी (सेवा) कर लेने के बाद निवृत्त करने का पूर्ण अधिकार है। उत्तरदाता ने अपनी निवृत्ति के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी कि उसके मामले को कामकाज के नियम 37 (vii) (क) के अनुसार "किसी अधिकारी को पदच्युत करने, हटाने अथवा अनिवार्य निवृत्ति करने के प्रस्तावों को मुख्य मन्त्री द्वारा राज्यपाल को भेजा जाना चाहिए।" उच्च न्यायालय ने कहा कि राजस्थान सेवा नियम के अन्तर्गत तीन प्रकार की अनिवार्य निवृत्तियाँ नियम 56 के अन्तर्गत दण्ड के रूप में आनुपातिक पेन्शन पर, अधिवर्षिता की आयु प्राप्त करने पर, तथा नियम 241 के अन्तर्गत है। दृश्यतः ऐसा लगता है कि कामकाज के नियम का नियम 31 (vii) (क) अभिव्यक्ति "दण्ड के रूप में" से विशेषित नहीं है। अतः उपर्युक्त तीनों ही प्रकार की अनिवार्य निवृत्तियाँ इसकी परिसीमा में हैं। परन्तु नियम को ध्यानपूर्वक पढ़ने से ज्ञात होता है कि विधायिका का आशय यह नहीं है। इसका कारण स्पष्ट है कि नियम 31 (vii) (क) पदच्युत करने, हटाने तथा अनिवार्य निवृत्ति करने के प्रस्तावों के बारे में ही विचार करता है। इन तीनों अभिव्यक्तियों का निर्वचन 'साहचर्येण ज्ञायते' के सिद्धान्त के आधार पर ही होना चाहिए और ऐसा करने पर अभिव्यक्ति " अनिवार्य निवृत्ति" की प्रकृति हटाने या पदच्युत करने की होनी चाहिए। चूंकि हटाया जाना या पदच्युत करना सदा दण्ड के रूप में ही होता है। अतः नियम 31 (vii) (क) के अन्तर्गत शब्द "अनिवार्य निवृत्ति" नहीं की गई है अतः नियम 31 (vii) (क) यहाँ पर लागू नहीं होता। इसलिए यह स्पष्ट है कि नियम 244 के अन्तर्गत की गई अनिवार्य निवृत्ति के मामलों को मुख्य मन्त्री द्वारा राज्यपाल को भेजा जाना आवश्यक नहीं है जैसा नियम 31 (vii) (क) के अन्तर्गत निर्देशित है। 

(iv) के० जनार्दन पिल्लई बनाम भारत संघ A.L.R. 1981 SC 1485 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि कच्चे काजू आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 2 (क) (v) अन्तर्गत खाद्य पदार्थ हैं और इसलिए इसे केरल आवश्यक वस्तु नियन्त्रण (अस्थायी शक्तियाँ) के अधिनियम, 1962 की धारा 2 (क) के अन्तर्गत आवश्यक वस्तु घोषित नहीं किया जा सकता । उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि साहचर्यित शब्द अपना अर्थ एक दूसरे से लेते हैं और इसको ही साहचर्येण ज्ञायते का नियम कहते हैं। जब "खाद्य पदार्थों" को खाद्य तिलहनों, जिनकों एक प्रक्रिया से होकर गुजरने के बाद ही उनके भीतर के तेल का उपयोग किया जा सकता है, के साहचर्य में रखा गया हो तो यह उचित है कि "खाद्य पदार्थों" को विस्तृत रूप में, जिसमें ऐसी सभी खाद्य वस्तुएँ शामिल हों जिनको एक निश्चित प्रक्रिया से होकर गुजरने के बाद ही मानव के द्वारा खाया जा सके, निर्वचित किया जाए। इसके अतिरिक्त खाद्य पदार्थों के विधाने का इतिहास एवं 'केन्द्रीय विधान के उद्देश्य जिसके द्वारा भारत की गरीब जनता में आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन, पूर्ति तथा वितरण को विनियमित किया जाता है, को ध्यान में रखने से यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "खाद्य पदार्थों" को व्यापक अर्थ में जिसमें कच्ची वस्तुएँ भी, जो बाद में खाद्य में बदल जाती हैं, लिया जाना चाहिए।

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