Question - What do you mean by "Literal or Grammatical Interpretation".
संविधियों के निर्वचन में शाब्दिक या व्याकरणमूलक व्याख्या से आप क्या समझते हैं?
शाब्दिक या व्याकरणिक व्याख्या (निर्वचन) से तात्पर्य यह है कि शब्दों को उनका साधारण एवं स्वाभाविक अर्थ प्रदान किया जाए और यदि ऐसा अर्थ स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो किसी भी कानून के उपबन्ध को लागू किया जाना चाहिये भले ही उसका परिणाम कुछ भी हो। इस सिद्धान्त का आधार यह है कि व्याख्या के सभी सिद्धान्तों का एकमात्र उद्देश्य विधायिका का आशय (Intention) है और चूंकि विधायिका अपने आशय को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती है अतः उन शब्दों को व्याकरणिक नियमों के आधार पर निर्वचित किया जाना उचित है। इसे सबसे सुरक्षित नियम कहा गया है क्योंकि विधायिका के उद्देश्य को केवल उन शब्दों के द्वारा ही जाना जा सकता है जिनके द्वारा उसने अपने आपको व्यक्त किया है। यदि किसी कानून की भाषा स्पष्ट हो तो ऐसी दशा में न्यायालय का एक मात्र कर्त्तव्य यह है कि वह उस भाषा को लागू करे न कि उस व्याख्या के परिणामों को देखें। उदाहरणार्थ-
(i) मकबूल हुसैन बनाम बम्बई राज्य ए० आई० आर० 1953 एस० सी० 325, में अपीलार्थी जब बम्बई हवाई अड्डे पर उतरा तो उसने यह घोषित नहीं किया कि वह अपने साथ विदेश से "सोना" लाया है। तलाशी लेने पर उसके कब्जे से सोना पाया गया। सागर सीमा शुल्क अधिनियम, 1878 की धारा 167 (8) के अधीन वह सोना जब्त कर लिया गया। उस पर विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 की धारा 8 के अन्तर्गत मामला दर्ज किया गया। अपीलार्थी का तर्क यह था कि 1947 के अधिनियम के अन्तर्गत दोहरे दण्ड से संरक्षण प्रदान किया गया है। जबकि स्वर्ण जब्त करके उसे पहले ही दण्डित किया जा चुका है। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सागर सीमा शुल्क प्राधिकारी न्यायालय या नाविक अधिकरण नहीं है और इसलिए इस अधिनियम के अन्तर्गत सोने को जब्त करना शास्ति न होने के कारण अभियोजन नहीं कहा जा सकता। अतः 1947 के अधिनियम के अन्तर्गत उसका परीक्षण वैध है।
(ii) रामअवतार बनाम सहायक विक्रय कर अधिकारी A.I.R. 1961 SC 1325 में प्रश्न यह था कि क्या पान के पत्तों के विक्रय पर विक्रय कर आरोपित किया जा सकता है या नहीं। अपीलार्थी ने यह तर्क दिया कि पान के पत्तों के विक्रय पर विक्रय कर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि यह "वेजीटेबल" है जो कर योग्य नहीं हैं। अपीलार्थी ने अपना तर्क केवल वेजीटेबल के शब्दकोशीय अर्थ पर आधारित किया कि वेजीटेबल वह होता है जो पौधों या उनके भागों से सम्बन्धित हो, या उसमें सम्मिलित हो, या उनसे निकाली जाए, या उनसे प्राप्त हों। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि जब स्वाभाविक या साधारण अर्थ स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो पान के पत्तों को शब्दकोश, तकनीकी या वनस्पतिशास्त्रीय अर्थ प्रदान नहीं किया जा सकता । प्रतिदिन प्रयोग होने वाले शब्दों को उनके लोकप्रिय अर्थ में समझा जाना चाहिये जिस अर्थ में उन्हें आप लोग समझते हैं, अतः पान का पत्ता वेजीटेबल नहीं हैं और उसका विक्रय कर योग्य है।
(iii) नगरपालिका मण्डल बनाम राज्य परिवहन प्राधिकारी, राजस्थान A.I.R. 1965 S.C. 458 में किसी बस स्टैण्ड का स्थान क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी द्वारा बदल दिया गया। मोटर यान अधिनियम, 1939 की धारा 64-क के अन्तर्गत क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी के आदेश पारित करने के पश्चात् 30 दिन के भीतर राज्य परिवहन प्राधिकारी के पास ऐसे आदेश के विरुद्ध आवेदन किया जा सकता है। प्रस्तुत मामले में आवेदन 30 दिन के पश्चात् किया गया था। यह तर्क दिया गया कि क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी के आदेश के बारे में “ज्ञान” होने के पश्चात् 30 दिन के भीतर आवेदन पेश किया जा सकता था। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि जब किसी कानून की परिभाषा स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो बिना परिणामों का ध्यान रखे उसे वही अर्थ दिया जाना चाहिये। न्यायालय ने यह भी कहा कि सीमा से सम्बन्धित कानून को निर्वाचित करते समय साम्या का ध्यान नहीं रखा जाता अतः स्पष्ट एवं व्याकरणिक अर्थ ही लागू होगा।
(iv) सरस्वती चीनी मिल बनाम हरियाणा राज्य बोर्ड A.I.R. 1992 SC 224 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि जल (प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण) उपकर अधिनियम, 1977 की प्रथम अनुसूची की प्रविष्टि 15 में प्रयुक्त शब्द 'वेजीटेबल' को आम अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। इस शब्द को वानस्पतिक अर्थ नहीं दिया जा सकता। अतः गन्ना 'वेजीटेबल' नहीं है। इस प्रकार गन्ने से चीनी बनाने वाले उद्योग इस प्रविष्टि के अन्तर्गत नहीं आते हैं और उनसे उपकर नहीं लिया जा सकता। शीरा से मद्यसार बनाने वाले उद्योग के अन्तर्गत उद्योग नहीं कहे जा सकते।
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