रविवार, 28 मई 2023

सजाति अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से वर्णन करें।

Question -  What do you mean by construction 'ejusdem generis'? Explain with the help of leading cases.
सजाति अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से वर्णन करें।

सजाति अर्थान्वयन (Construction Ejusdem Generis);

सजाति अर्थान्वयन का अर्थ (Meaning of Ejusdem Generis)

"एजुस्डेम जेनेरिस" का अर्थ है "उसी प्रकार का" । साधारणतः साधारण शब्दों को दूसरे शब्दों की भाँति उनके प्राकृतिक अर्थ में ही समझना चाहिए जब तक कि सन्दर्भ दूसरा अर्थ लेने को बाध्य न करें । परन्तु जब एक साधारण शब्द का प्रयोग एक सुस्पष्ट कोटि के शब्दों के पृष्ठ में किया गया हो तो साधारण शब्द को भी उस सुस्पष्ट कोटि के सीमित अर्थ में निर्वचित किया जा सकता है। साधारण शब्द पूर्ववर्ती विशिष्ट अभिव्यक्तियों से अपना अर्थ लेता है क्योंकि विधायिका ने एक सुस्पष्ट कोटि के विशिष्ट शब्दों द्वारा ऐसा करने के लिए अपना आशय स्पष्ट कर दिया है। यह सिद्धान्त कम साधारण शब्दों के पृष्ठ में प्रयोग किए गए साधारण शब्दों पर लागू होने तक ही सीमित है। यदि विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ एक सुस्पष्ट कोटि में नहीं आती हैं तो इस नियम को लागू नहीं किया जा सकता। इस कारण यदि कोई साधारण शब्द केवल एक विशिष्ट शब्द का अनुसरण करता है तो उस एक विशिष्ट शब्द से कोई सुस्पष्ट कोटि नहीं बनती और इसलिए ऐसे में सजाति- अर्यान्वयन नहीं किया जा सकता ।
परन्तु उक्त नियम के अपवाद स्वरूप कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें केवल मात्र एक शब्द को कोटि मानकर इस सिद्धान्त के आधार पर सीमित अर्थ देकर निर्वचन किए गए हैं। यदि प्रयोग किए गए विशिष्ट शब्दों से एक सम्पूर्ण कोटि समाप्त हो जाती है तो इसका अर्थ यही है कि विधायिका का आशय किसी विस्तृत या बड़ी कोटि से था जिसको खोजने का प्रयत्न न्यायालय करेगा। सजाति अर्थान्वयन का सिद्धान्त सार्विक लागू करने का सिद्धान्त नहीं है। यदि किसी विधान का सन्दर्भ इस सिद्धान्त को लागू करने के विरुद्ध हो तो इसे लागू नहीं किया जा सकता । सजाति अर्थान्वयन के सिद्धान्त का आधार यह है कि यदि विधायिका का आशय साधारण शब्दों को असीमित अर्थ में प्रयोग करना होता तो विधायिका को विशिष्ट शब्दों को प्रयोग करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। उदाहरणार्थ-

(i) बम्बई राज्य बनाम अली गुलशन AIR 1955 SC 810 में बम्बई भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1948 की धारा 6 (4) (क) में प्रयुक्त भाषा "राज्य सरकार राज्य के उद्देश्य या. किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए अधिग्रहण कर सकती है" के निर्वचन का प्रश्न था। अपीलार्थी का तर्क था कि इस प्रावधान के अन्तर्गत उसे विदेशी वाणिज्यिक दूतावास के सदस्य के लिए परिसर अधिग्रहण करने का अधिकार है। उच्च न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए” को अभिव्यक्ति "राज्य के उद्देश्य" की सजाति के रूप में निर्वाचित किया जाना चाहिए और विदेशी वाणिज्यिक दूतावास के सदस्य के लिए आवास का प्रबन्ध करना चूंकि संघ का उद्देश्य है राज्य का नहीं इसलिए राज्य सरकार के पास अधिग्रहण का कोई अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि उच्च न्यायालय ने सजाति अर्थान्वयन का नियम लागू करके भूल की है क्योंकि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए" केवल एक अभिव्यक्ति “राज्य के उद्देश्य" का अनुसरण करता है जो एक सुस्पष्ट कोटि नहीं है। कोटि की अनुपस्थिति में इस सिद्धान्त को लागू नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त उपबन्ध की भाषा से विधायिका का आशय स्पष्ट है। शब्दों को उनका प्राकृतिक अर्थ देने से स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए" के अन्तर्गत विदेशी वाणिज्यिक दूतावासों के सदस्यों के लिए आवास की व्यवस्था करना भी शामिल है।

(ii) लीलावती बनाम बम्बई राज्य A.I.R. 1957 SC 521 में याची जो किसी परिसर के किरायेदार की विधवा थी, घटना के समय उस परिसर में न रह रही थी। उत्तरदाता ने बम्बई भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1948 की धारा 6 (4) (क) के अन्तर्गत उस परिसर का अधिग्रहण किसी राज्य कर्मचारी के आवास के लिए कर लिया। याची ने इस अधिग्रहण को इस आधार पर चुनौती दी कि परिसर धारा के साथ जुड़े हुए स्पष्टीकरण के अनुसार "खाली" नहीं था। स्पष्टीकरण के अन्तर्गत किसी स्थान को खाली तब माना जाएगा जब किराएदार का "अपनी किराएदारी की समाप्ति, बेदखली या समनुदेशन पर, अधिभोग समाप्त हो जाता है या परिसर में किसी अन्य प्रकार से उसके हित का अन्तरण हो जाता है अथवा अन्यथा"। याची के अनुसार " अथवा अन्यथा " शब्दों का इसके पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियों के साथ सजाति निर्वचन होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने नर्धारित किया कि इस नियम को प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि "अथवा अन्यथा " शब्दों को पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियाँ समान प्रकृति की जाति न होने के कारण एक सुस्पष्ट कोटि में नहीं आती । अनियमितता में प्रयोग किए गए शब्दों को उनके प्राकृतिक अर्थ में पढ़ने से यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "अथवा अन्यथा" का आशय पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियों में सम्मिलित न होने वाली दशाओं को समावेशित करना है। यह निर्वचन विधान के उद्देश्य के अनुकूल भी है।

(iii) हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ A.I.R. 1965 SC 1167 में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत जारी किए गए फल उत्पादक आदेश 1955 द्वारा फल की चाशनी में फल का रस पच्चीस प्रतिशत होना बाध्यकर बना दिया गया। अपीलार्थी ने तर्क दिया कि यह आदेश उनके उत्पाद " रूह अफजा " पर लागू नहीं होता यद्यपि उसके अन्दर फलों का रस भी है। इसका कारण यह है कि इस आदेश के खण्ड 2 (घ) (v) में शरबत, पेराई, वल्य जौ का जल, पीपी में बन्द फलों का रस तथा परोसने के लिए तैयार पेय या कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो, शामिल है तथा अभिव्यक्ति "कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो" का अर्थ सजाति होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर करते हुए निर्णय दिया कि यह सिद्धान्त इस उदाहरण में लागू नहीं होता क्योंकि अभिव्यक्ति "कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो" के पूर्व प्रयोग किए गए शब्द किसी स्पष्ट कोटि में नहीं आते। न्यायालय ने यह भी कहा कि आदेश के सन्दर्भ से यह स्पष्ट है कि सभी पेय जिनमें फलों का रस हो इसमें शामिल है।

(iv) एक्सप्रेस होटेल्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम गुजरात राज्य A.I.R, 1989 SC 1949 में विलासिता पर गुजरात कर (होटल और बासा) अधिनियम, 1977 की धारा 2 (क) के निर्वाचन का प्रश्न था जिस परिभाषा के अनुसार "वासा के लिए प्रभार" से वातानुकूल, टेलीफोन, टेलीविजन, रेडियो, संगीत, अतिरिक्त बिस्तर, "और अन्य इस प्रकार की वस्तुएँ" सम्मिलित थीं। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति " और अन्य प्रकार की वस्तुएँ" को सजाति के आधार पर अर्थान्वयित किया जाना उचित है। अभिव्यक्ति के पूर्व में प्रयुक्त शब्दों का वर्ग समाप्त न हो जाने के कारण, विधायिका ने जानबूझकर इसके अन्दर इसी वर्ग की अन्य वस्तुओं को शामिल करने के लिए इस अभिव्यक्ति का प्रयोग किया है।

(v) सहायक कलेक्टर, कन्द्रीय उत्पाद शुल्क बनाम रामदेव टोबेको कम्पनी A.I.R. 1991 SC 506 में केन्द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 में 1973 के संशोधन के पूर्व धारा 40 (2) के निर्वचन का प्रश्न था जिसके अनुसार वाद हेतुक के उत्पन्न से छह माह बीत जाने के पश्चात् विधि के अन्तर्गत कुछ किए गए अथवा किए जाने के आदेश दिए जाने के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही स्थापित नहीं की जा सकेगी।

उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति 'अन्य विधिक कार्यवाही' को पूर्वलिखित शब्दों 'वाद' एवं 'अभियोजन' की सजाति के रुप में पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि वे एक विशिष्ट कोटि के अन्तर्गत आते हैं। अतः शास्ति तथा न्यायनिर्णयन की कार्यवाहियाँ धारा 40 (2) मैं प्रयुक्त अभिव्यक्ति अन्य विधिक कार्यवाही के अन्तर्गत नहीं आतीं और इसलिए ये कार्यवाहियाँ इस उप-धारा के अन्तर्गत निर्धारित परिसीमा के अधीन, नहीं हैं। 'वाद' अथवा 'अभियोजन के न्यायिक या विधिक कार्यवाहियां हैं जिन्हें किसी कार्यपालक प्राधिकारी, चाहे वह कानूनी ही क्यों न हो, के समक्ष न दाखिल कर न्यायालय के समक्ष दाखिल किया गया हो। इस विश्वास को धारा में अभिव्यक्ति 'संस्थित' से बल मिलता है।


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