कानूनी निर्वचन के तीन साधारण नियम क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर- व्याख्या की पद्धतियाँ (Methods (Rules) of Interpretation) – व्याख्या (निर्वचन) की निम्नलिखित तीन मुख्य पद्धतियाँ हैं :-
1. शाब्दिक या व्याकरणीय व्याख्या (The Literal or Grammatical Interpretation) -
शाब्दिक या व्याकरणिक व्याख्या (निर्वचन) से तात्पर्य यह है कि शब्दों को उनका साधारण एवं स्वाभाविक अर्थ प्रदान किया जाए और यदि ऐसा अर्थ स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो किसी भी कानून के उपबन्ध को लागू किया जाना चाहिये भले ही उसका परिणाम कुछ भी हो। इस सिद्धान्त का आधार यह है कि व्याख्या के सभी सिद्धान्तों का एकमात्र उद्देश्य विधायिका का आशय (Intention) है और चूंकि विधायिका अपने आशय को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती है अतः उन शब्दों को व्याकरणिक नियमों के आधार पर निर्वचित किया जाना उचित है। इसे सबसे सुरक्षित नियम कहा गया है क्योंकि विधायिका के उद्देश्य को केवल उन शब्दों के द्वारा ही जाना जा सकता है जिनके द्वारा उसने अपने आपको व्यक्त किया है। यदि किसी कानून की भाषा स्पष्ट हो तो ऐसी दशा में न्यायालय का एक मात्र कर्त्तव्य यह है कि वह उस भाषा को लागू करे न कि उस व्याख्या के परिणामों को देखें। उदाहरणार्थ-
(i) मकबूल हुसैन बनाम बम्बई राज्य ए० आई० आर० 1953 एस० सी० 325, में अपीलार्थी जब बम्बई हवाई अड्डे पर उतरा तो उसने यह घोषित नहीं किया कि वह अपने साथ विदेश से "सोना" लाया है। तलाशी लेने पर उसके कब्जे से सोना पाया गया। सागर सीमा शुल्क अधिनियम, 1878 की धारा 167 (8) के अधीन वह सोना जब्त कर लिया गया। उस पर विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 की धारा 8 के अन्तर्गत मामला दर्ज किया गया। अपीलार्थी का तर्क यह था कि 1947 के अधिनियम के अन्तर्गत दोहरे दण्ड से संरक्षण प्रदान किया गया है। जबकि स्वर्ण जब्त करके उसे पहले ही दण्डित किया जा चुका है। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सागर सीमा शुल्क प्राधिकारी न्यायालय या नाविक अधिकरण नहीं है और इसलिए इस अधिनियम के अन्तर्गत सोने को जब्त करना शास्ति न होने के कारण अभियोजन नहीं कहा जा सकता। अतः 1947 के अधिनियम के अन्तर्गत उसका परीक्षण वैध है।
(ii) रामअवतार बनाम सहायक विक्रय कर अधिकारी A.I.R. 1961 SC 1325 में प्रश्न यह था कि क्या पान के पत्तों के विक्रय पर विक्रय कर आरोपित किया जा सकता है या नहीं। अपीलार्थी ने यह तर्क दिया कि पान के पत्तों के विक्रय पर विक्रय कर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि यह "वेजीटेबल" है जो कर योग्य नहीं हैं। अपीलार्थी ने अपना तर्क केवल वेजीटेबल के शब्दकोशीय अर्थ पर आधारित किया कि वेजीटेबल वह होता है जो पौधों या उनके भागों से सम्बन्धित हो, या उसमें सम्मिलित हो, या उनसे निकाली जाए, या उनसे प्राप्त हों। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि जब स्वाभाविक या साधारण अर्थ स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो पान के पत्तों को शब्दकोश, तकनीकी या वनस्पतिशास्त्रीय अर्थ प्रदान नहीं किया जा सकता । प्रतिदिन प्रयोग होने वाले शब्दों को उनके लोकप्रिय अर्थ में समझा जाना चाहिये जिस अर्थ में उन्हें आप लोग समझते हैं, अतः पान का पत्ता वेजीटेबल नहीं हैं और उसका विक्रय कर योग्य है।
(iii) नगरपालिका मण्डल बनाम राज्य परिवहन प्राधिकारी, राजस्थान A.I.R. 1965 S.C. 458 में किसी बस स्टैण्ड का स्थान क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी द्वारा बदल दिया गया। मोटर यान अधिनियम, 1939 की धारा 64-क के अन्तर्गत क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी के आदेश पारित करने के पश्चात् 30 दिन के भीतर राज्य परिवहन प्राधिकारी के पास ऐसे आदेश के विरुद्ध आवेदन किया जा सकता है। प्रस्तुत मामले में आवेदन 30 दिन के पश्चात् किया गया था। यह तर्क दिया गया कि क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी के आदेश के बारे में “ज्ञान” होने के पश्चात् 30 दिन के भीतर आवेदन पेश किया जा सकता था। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि जब किसी कानून की परिभाषा स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो बिना परिणामों का ध्यान रखे उसे वही अर्थ दिया जाना चाहिये। न्यायालय ने यह भी कहा कि सीमा से सम्बन्धित कानून को निर्वाचित करते समय साम्या का ध्यान नहीं रखा जाता अतः स्पष्ट एवं व्याकरणिक अर्थ ही लागू होगा।
(iv) सरस्वती चीनी मिल बनाम हरियाणा राज्य बोर्ड A.I.R. 1992 SC 224 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि जल (प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण) उपकर अधिनियम, 1977 की प्रथम अनुसूची की प्रविष्टि 15 में प्रयुक्त शब्द 'वेजीटेबल' को आम अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। इस शब्द को वानस्पतिक अर्थ नहीं दिया जा सकता। अतः गन्ना 'वेजीटेबल' नहीं है। इस प्रकार गन्ने से चीनी बनाने वाले उद्योग इस प्रविष्टि के अन्तर्गत नहीं आते हैं और उनसे उपकर नहीं लिया जा सकता। शीरा से मद्यसार बनाने वाले उद्योग के अन्तर्गत उद्योग नहीं कहे जा सकते।
2. रिष्टि का नियम या अनिष्ट परिहार नियम (The Mischief Rule)- रिष्टि के नियम का प्रतिपादन हेडन 76 ER 637 में किया गया। इसमें एक्सचेकर के बैरन्स ने प्रस्तावित किया कि सामान्य रूप में सभी कानूनों का आश्वस्त एवं सच्चा निर्वचन करते समय (चाहे वे दाण्डिक हों या हितकारी, सामान्य विधि को प्रतिबन्धित करते हों या विस्तारित) निम्नलिखित चार बातों की पहचान करना और उन पर विचार करना आवश्यक है-
(i) अधिनियम को पारित करने से पूर्व सामान्य विधि क्या थी?
(ii) वह रिष्टि या दोष क्या था जिसके लिए सामान्य विधि में कोई प्रावधान नहीं था ?
(iii) राष्ट्रमण्डल के रोग के निदान के लिए संसद ने क्या उपचार प्रदान किया ? तथा
(iv) उपचार का वास्तविक कारण क्या था ?
और तब सभी न्यायाधीशों का कर्त्तव्य सदैव ऐसी व्याख्या करना है जो रिष्टि को दबाये और उपचार को बढ़ायें और रिष्टि को बनाये रखने के लिए गूढ़ आविष्कारों और परिहारों को रोके तथा लोकहित में अधिनियम के निर्माताओं के वास्तविक आशय के आधार पर उपाय और उपचार में शक्ति तथा जीवन की वृद्धि करें। उदाहरणार्थ-
(i) बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1955 S.C. 661 में अपीलार्थी वित्त बंगाल (विक्रय कर) अधिनियम के अन्तर्गत एक पंजीकृत व्यवहारी था। बिहार में उसका कोई कार्यालय प्रबन्धक या अभिकर्ता नहीं था। विक्रय कर प्राधिकारियों ने यह घोषित किया कि पश्चिमी बंगाल राज्य में हुआ समस्त विक्रय, या अन्य राज्य में किया गया विक्रय जिस माल की सुर्पदगी बिहार राज्य में होनी हो और उस माल की प्रत्यक्ष खपत भी बिहार राज्य में होनी हो, संविधान के अनुच्छेद 286 के अन्तर्गत बिहार विक्रय कर के अधीन होगा। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि विधायिका का वास्तविक आशय ज्ञात करने के लिए, उस विधान को उसके इतिहास, रिष्टि जो वह समाप्त करना चाहता था एवं कानून के उपबन्ध के सन्दर्भ में निर्वाचित किया जाना चाहिये। इस प्रकार निर्वचित करते हुए बहुमत ने निर्धारित किया कि अनुच्छेद 286 का खण्ड (2) “ अन्तर्राज्यीय विक्रय या कर" से सम्बन्धित था जो अपने आप में पूर्णतः भिन्न विषय था। अतः अनुच्छेद 286 (1) (क) एवं अनुच्छेद 286(2) एक ही विषय से सम्बन्धित नहीं थे, तथा यह कहना एक भूल थी कि एक ही विषय पर एक सामान्य एवं दूसरा विशेष नियम था।
(ii) कंवर सिंह बनाम दिल्ली प्रशासन A.I.R. 1965 S.C. 871 में उत्तरदाता के अधिकारी जब आवारा पशुओं को पकड़ने का प्रयास कर रहे थे तो उन्हें अपीलार्थियों, जो कुछ पशुओं के मालिक थे, द्वारा पीटा गया। अपीलार्थियों पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 332 के अन्तर्गत अभियोग लगाया गया। अपीलार्थियों ने सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का तर्क दिया। उनका तर्क यह भी था कि पशुओं को दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 418 के अन्तर्गत "परित्यक्त" नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परित्यक्त का तात्पर्य पूर्णतः अपने दायित्व से मुक्त हो जाना अर्थात् मालिक विहीन होना होता है जैसा शब्दकोश में वर्णित है। उच्चतम न्यायालय ने उपर्युक्त तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि जब अधिनियम का सन्दर्भ ऐसा न हो तो शब्दकोश अर्थ को सदैव मानना आवश्यक नहीं है। वर्तमान मामले में विधायिका के आशय को जानने के लिए यह देखना उचित है कि किस रिष्टि को समाप्त किया जाना था और क्या उपचार प्रदान किया गया था। अतः “परित्यक्त" शब्द का अर्थ खुला छोड़ना या बिना देखरख के छोड़ना है।
(iii) रणजीत बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1965 S.C. 881 में अपीलार्थी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 292 के अधीन "लेडी चैटरलीज लवर" नामक अश्लील पुस्तक बेचने का दोषी पाया गया। उसका तर्क था कि अभियोजन को उसके विरुद्ध दोषपूर्ण मस्तिष्क अर्थात् इस बात का ज्ञान कि पुस्तक में अश्लील साहित्य था, साबित करना चाहिये। उसने यह भी तर्क दिया कि पुस्तकों की दुकानों में बहुत सारी पुस्तकें होती हैं और दुकानकार के लिए यह असम्भव है कि वह हर पुस्तक को यह जानने के लिए कि वह अश्लील है या नहीं पढ़े। उच्चतम न्यायालय ने इन तर्कों से असहमति व्यक्ति करते हुए कहा कि धारा 292 की भाषा स्पष्ट है एवं अश्लील साहित्य बेचना अथवा बेचने के लिये रखना इस उपबन्ध के अन्तर्गत दोषपूर्ण है। इस रिष्टि के उपचार के लिए ही यह उपबन्ध पारित किया गया । अतः अपीलार्थी का तर्क मान्य स्वीकार नहीं किया जा सकता ।
(iv) महाराष्ट्र राज्य बनाम नटवरलाल A.I.R. 1980 S.C. 593 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि भारत रक्षा नियम, 1962 का नियम 126 (त) (2) (ii) किसी व्यक्ति को जिसके कब्जे या नियन्त्रण में इस भाग के किसी उपबन्ध का उल्लंघन करते हुए स्वर्ण प्राप्त हो, दण्डित करता है। न्यायालय विधायिका द्वारा प्रयुक्त भाषा को तोड़-फोड़ करने में सक्षम नहीं है। उसे इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिये कि राज्य का स्वर्ण की कोई मात्रा के अन्तर्गत 'तस्करी के स्वर्ण' को कोई छूट प्रदान नहीं की गई थी। अतः इन उपबन्धों को विशेषतः इस प्रकार निर्वाचित किया जाना चाहिये जिससे रिष्टि को दबाया व विधान के उद्देश्य को बढ़ाया किया जा सके। उच्च न्यायालय ने यह निर्धारित करके गलती की कि यह नियम लागू नहीं होंगे क्योंकि अभियुक्त ने इन नियमों के अन्तर्गत स्वर्ण बिस्कुट खरीदकर या अन्य प्रकार से अपना कब्जा नहीं बनाया। इस प्रकार का संकीर्ण निर्वचन स्वर्ण की तस्करी रोकने के कानून को बिल्कुल प्रभावहीन बना देगा।
3. स्वर्णिम नियम (The Golden Rule ) - स्वर्णिम नियम के अनुसार सामान्यतः न्यायालय विधायिका का आशय कानून में उसके द्वारा प्रयोग किये गये शब्दों से ही शब्दों के प्राकृतिक अभिप्राय के आधार पर ही ज्ञात करेगा। परन्तु ऐसा करने पर यदि कोई निरर्थकता, असंगति, असुविधा, कष्ट, अन्याय या अस्पष्टता होती हो तो अभिप्राय को केवल इतना ही रूपान्तरित कर दिया जायेगा जितने से इस परिणाम को रोका जा सके। चूँकि यह नियम सारी समस्याओं का समाधान करती है, इसलिये इसे स्वर्णिम नियम का नाम दिया गया है। इसमें चूँकि शब्दिक तात्पर्य को कुछ सीमा तक रूपान्तरित किया जाता है इसलिए इस ढंग को निर्वाचन का रूपानतरक ढंग भी कहा जाता है। इस नियम का यह सुझाव है कि निर्वचन के परिणाम या प्रभाव को बहुत अधिक महत्व दिया जाना चाहिये क्योंकि यही विधान का सही अर्थ ज्ञात करने का सूत्र या संकेत है। यह उपधारणा है कि विधायिका कुछ उद्देश्यों में से किन्हीं की ओर ले जाता हो तो उसे तत्काल अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। जब न्यायालय के समक्ष किसी उपबन्ध के एक से अधिक सम्भावित अर्थ निकल रहे हों तो न्यायालय को यह अधिकार है कि वह प्रत्येक निर्वाचन के परिणाम को ध्यानपूर्वक विवेचित करे ताकि उसे विधायिका के सच्चे आशय का ज्ञान हो सके। उदाहरणार्थ-
(i) तीरथ सिंह बनाम वछित्तर सिंह A.I.R. 1955 S.C. 850 में अपीलार्थी ने तर्क दिया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 99 (1) के अन्तर्गत अधिकरण के लिये यह आवश्यक है कि वह उन सभी व्यक्तियों के नाम दर्ज करे जिन्हें भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया गया है और इनमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो याचिका के पक्षकार या अपक्षकार हैं। इसी धारा के परन्तुक के अनुसार उन सभी व्यक्तियों को जिनके नाम धारा 99 (1) (क) (ii) के अन्तर्गत वर्णित है, नोटिस दिया जाना चाहिये। अतः अपीलार्थी का तर्क यह था कि चूँकि वह भी याचिका में पक्षकार है तो उसे भी नोटिस दिया जाना आवश्यक था। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को निरर्थक एवं बेतुका कहते हुए कहा कि परन्तुक, खण्ड (ख) एवं धारा के विन्यास को देखने से स्पष्ट है कि केवल याचिका के अपक्षकारों को ही नोटिस दिया जाना आवश्यक है।
(ii) मै० सैनिक मोटर्स बनाम राजस्थान राज्य A.I.R. 1961 S.C. 1480 में राज्य सरकार ने राजस्थान यात्री एवं माल कराधान अधिनियम, 1959 पारित किया जिसके अन्तर्गत मोटर वाहनों के द्वारा ले जाये जाने वाले यात्रियों एवं माल पर कर लगाया गया। उसको इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह कर संविधान की द्वितीय सूची में “यात्री एवं माल" पर नहीं लगाया गया है बल्कि प्रथम सूची (जिस पर राज्य सरकार कानून नहीं बना सकती) में "यात्रा भाड़ा एवं दुलाई" पर संविधान के अनुच्छेद 301 व 304 के विपरीत लगाया गया है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया। कि कर चालकों की आय पर नहीं बल्कि यात्री एवं माल पर लगाया गया है तथा यद्यपि कर की राशि यात्री भाड़ा एवं ढुलाई के आधार पर ही निर्धारित की जाती है, इससे यह नहीं कहा जा सकता है कि कर "यात्री एवं माल" पर नहीं लगाया गया है।
(iii) पंजाब राज्य बनाम कैंसर जहाँ बेगम A.I.R. 1963 S.C. 1604 में उत्तरदाता ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 18 के अन्तर्गत् निर्देश के लिये दीवानी न्यायालय के समक्ष आवेदन किया। अधिनियम के अन्तर्गत प्रतिकर के विरुद्ध ऐसा प्रार्थनापत्र “ अधिनिर्णय के छह माह के भीतर" पेश हो सकता है जबकि उत्तरदाता ने इसे " अधिनिर्णय के ज्ञान के छह माह के भीतर" पेश किया। उच्चतम न्यायालय ने यह मानते हुए कि आवेदन समय पर ही कर दिया गया था, निर्धारित किया कि जब तक प्रतिकर के बारे में अधिनिर्णय का ज्ञान, चाहे वास्तविक या आन्वयिक, ही न हो तब तक उसके विरुद्ध निर्देश के लिये आवेदन कैसे किया जा सकता है। अतः न्याय एवं न्याय-व्यवहार यही कहता है कि परिसीमा की गणना निर्णय के ज्ञान की तिथि से ही प्रारम्भ होनी चाहिये।
(iv) निर्धारण प्राधिकारी बनाम पटियाला विस्किट्स मैन्यूफैक्चरर्स A.I.R. 1977 S.C 1339 में पंजाब साधारण बिक्री कर अधिनियम, 1948 और उसके अन्तर्गत पारित नियमों में शब्दों " रजिस्ट्रीकरण प्रमाण-पत्र का कब्जा" के निर्वचन का प्रश्न था । उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि शब्द “कब्जा” का अर्थ “तथ्य पूर्ण कब्जा" मानने से अनावश्यक एवं परिहार्य कष्ट ही होगा। इतना ही पर्याप्त है कि व्यापारी ने सभी आवश्यक औपचारिकताएँ पूर्ण करने के पश्चात् अपना आवेदन रजिस्ट्रीकरण के लिए जमा किया। अतः व्यापारी प्रथम अवधि को पूर्ण करने के पश्चात् एक घोषणा के साथ अलीलार्थी को अपना रजिस्ट्रीकरण नम्बर वाद में दे सकता है।
उपरोक्त वर्णीत तीन प्रमुख व्याख्या के नियमों के अलावा व्याख्या के सामान्य नियम निम्न प्रकार हैं-
4. सामन्जस्यपूर्ण नियम (Harmonious Construction); सामंजस्यपूर्ण (समन्वयपूर्ण) अर्थान्वयन का अर्थ (Meaning of the Harmonius Construction) –
जब किसी कानून के एक से अधिक उपबन्ध एक दूसरे के विरुद्ध हों तो न्यायालय उन उपबन्धों का निर्वचन इस प्रकार करने का प्रयास करता है जिससे, यदि सम्भव हो तो, सभी उपबन्धों में सामंजस्य बना रहे एवं कोई उपबन्ध प्रभावहीन या निरर्थक न जाए। ऐसा तभी सम्भव है जब न्यायालय या तो ऐसे विरोधपूर्ण लगने वाले उपबन्धों को अलग-अलग क्षेत्रों से सम्बन्धित माने अथवा यह माने कि एक उपबन्ध दूसरे उपबन्ध के अन्तर्गत दिये गए साधारण नियम का अपवाद है। यह मालूम रहना कि एक ही कानून के विभिन्न उपबन्ध एक दूसरे के व्यापी हैं या एक दूसरे से अलग-अलग हैं बहुत कठिन हो सकता है। सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन के सिद्धान्त का आधार सम्भवतः यह है कि विधायिका का आशय स्वयं को ही खण्डित करना नहीं होता । उदाहरणार्थ-
(i) एम० एस० एम० शर्मा बनाम कृष्ण सिन्हा A.I.R. 1959 SC 395 में याची एक समाचार पत्र का संपादक था। उसे राज्य विधान सभा में कही गई टिप्पणियों को विधान सभा अध्यक्ष के आदेशों के विपरीत बिना काँट-छाँट किये हुये प्रकाशित करने के लिये क्यों न सविधान क अनुच्छेद 194 (3) के अन्तर्गत सदन के विशेषाधिकार भंग करने के लिये दण्डित किया जाय, का के कारण बताओ नोटिस दिया गया। अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत अपनी याचिका में उसने तर्क दिया कि. उसे भविष्य में दण्डित किया जाना संविधान के अनुच्छेद 12(1) (क) के अंतर्गत उसके भाषण एक अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार के विरुद्ध है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यक्ति यही अपेक्षा रखती है कि अनुच्छेद 19 (1) (क) तथा 194 (3) का सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकाला जाय। दोनों उपबन्धों का प्रभाव बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि यह निर्धारित किया जाए कि अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 194 (3) में वर्णित संसद के विशेषाधिकार के अधीन है। उपर्युक्त आधार पर न्यायालय ने याचिका अस्वीकार कर दी।
(ii) वेव्हरली जूट मिल्स बनाम रेंमन और कम्पनी A.I.R. 1963 SC 90 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान की सप्तम अनुसूची में दी गई विभिन्न सूचियों की प्रविष्टियों की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिये कि उनमें से कोई विषय प्रभावहीन न रहे तथा सभी विषय प्रभावपूर्ण बने रहें । इसीलिए ऐसी व्याख्या जिससे उनमें से कुछ विषय बिल्कुल निरर्थक तथा व्यर्थ हो जाये कभी नहीं कीया जानी चाहिये। जब कहीं पर दो प्रविष्टियाँ दी हों जिनमें से एक की प्रकृति साधारण तथा दूसरे की विनिर्दिष्ट (Specified) हो तो पहले का अर्थ ऐसा लगाया जाना चाहिए जिससे दूसरे उसके क्षेत्र से बाहर ही रहे ।
(iii) बनारसी बनाम आयकर अधिकारी A.I.R. 1964 S.C. 1742 में अपीलार्थी का तर्क था कि उस पर जो नोटिस तामील किये गये वे सभी अवधि बाधित थे क्योंकि उनकी तामील आयकर अधिनियम, 1922 की धारा 34 (1) के अन्तर्गत आठ वर्ष की कानूनी अवधि के बाद की गई। उसने यह भी कहा कि यह नोटिस 1969 के संशोधन करने वाले अधिनियम की धारा 4 के द्वारा भी बच नहीं सकती थी जिसके अनुसार किसी नोटिस को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह अवधि समाप्त हो चुकी है जिसके भीतर उसे जारी किया जाना चाहिए था। इसका आधार यह है कि धारा 4 ऐसे नोटिस को तो बचाती है जिसे आठ वर्ष की अवधि के बाद जारी किया गया हो पर ऐसे नोटिस को नहीं बचाती जिसे अवधि के भीतर ही जारी किया गया हो पर जिसकी तामील आठ वर्ष की अवधि के बाद हुई हो। उच्चतम न्यायालय ने दोनों उपबन्धों का सांमजस्यपूर्ण निर्वचन करते हुए निर्धारित किया कि अभिव्यक्तियों "जारी की" तथा "तामील की" के अर्थ प्रस्तुत सन्दर्भ में एक ही हैं क्योंकि केवल ऐसा निर्वचन करने से ही विधायिका के आशय को बचाया जा सकता है। अतः यद्यपि आठ वर्ष की अवधि के पश्चात् जारी किये गये थे तो भी वे 1959 के अधिनियम के अन्तर्गत संरक्षित थे ।
(iv) डी० संजीवय्या बनाम चुनाव अधिकरण AIR. 1967 S.C. 1211 में अपीलार्थी के राज्य विधान सभा में चुने जाने को याची द्वारा चुनौती दी गई जिसमें उसने प्रार्थना की कि उसे चुनाव में विजयी घोषित किया जाये। इस याचिका के लंबित रहने के दौरान अपीलार्थी को राज्य सभा में चुन लिया जाने के कारण उसने विधान सभा से त्यागपत्र दे दिया। उसने उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दाखिल की जिसमें प्रार्थना की गई कि चुनाव आयुक्त को यह निर्देश दिया जाये कि वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 150 के अंतर्गत अपीलार्थी के द्वारा खाली की गई सीट पर उप चुनाव करवाने की प्रक्रिया प्रारम्भ करें। उच्च न्यायालय ने यह याचिका खारिज कर दी। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय से सहमत होते हुए निर्धारित किया कि धारा 150 को अलग रूप में निर्वाचित नहीं किया जा सकता क्योंकि इसी प्रकार के विभिन्न उपबन्धों जैसे धाराओं 84 और 98 (स) को भी ध्यान में रखना पड़ेगा। यदि अपीलार्थी की यह दलील कि किसी के द्वारा खाली की गई सीट पर तत्काल उप-चुनाव की प्रक्रिया को प्रारम्भ कर दिया जाना चाहिए चाहे खाली की गई सीट पर चुनाव जीतने वाले व्यक्ति के विरुद्ध चुनाव याचिका ही क्यों न लंबित हो, मान ली जाए तो इसका प्रभाव यह होगा कि ऐसे बेतुके तथा निरर्थक निष्कर्ष निकलेंगे जैसा कभी भी संसद का आशय नहीं हो सकता। दृष्टान्त के लिए, यदि याची सीट खाली करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध अपनी चुनाव याचिका जीत जाता है और उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है तो ऐसे में एक ही चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले दो व्यक्ति हो जायेंगे, एक वह जिसे विजयी घोषित किया गया तथा दूसरा वह जो इस बीच हुए उप-चुनाव में विजयी हुआ हो । चूंकि संसद का आशय इतना बेतुका तथा निरर्थक कभी नहीं हो सकता इसलिए धारा 150 पारित करते समय संसद का यह आशय नहीं था कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध चुनाव याचिका दाखिल की गई है, तयाग-पत्र देते ही चुनाव याचिका को खारिज मान लिया जायेगा।
(v) शम्भू नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य A.I.R. 1973 SC. 1425 में संविधान के अनुच्छेद 22 (4) (क), 22 (4) (ख) तथा (7) (क) के बीच दृश्यतः विरोध को समाप्त करने का प्रश्न था । समस्या यह थी कि क्या संसद अनुच्छेद 22 (4) (क) के अन्तर्गत सलाहकार बोर्ड से प्राधिकार लेकर निवारक निरोध की अवधि तीन माह से अधिक बढ़ा सकती है, या निवारक निरोध की अवधि तीन माह से अधिक बढ़ाने के लिए साथ पढ़ते हुए अनुच्छेद 22 (4)(ख) तथा 22 (7) (क) के अन्तर्गत सलाहकार बोर्ड से प्राधिकार लिए बिना ही नया विधान बनाना आवश्यक है। उच्चतम न्यायालय ने महसूस किया कि सामंजस्य लाने का केवल एक ढंग यहाँ है कि साथ पढ़ते हुये अनुच्छेद 22 (4) (ख) तथा 22 (4) (क) का अपवाद घोषित किया जाये।
(vi) शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ A.I.R. 1957 SC 458 में मुख्य विवाद यह था कि क्या संविधान के अनुच्छेद 13 (2) के द्वारा संसद की मूलभूत अधिकारों को संशोधित करने की शक्ति पर अंकुश लगाया गया है। चूँकि संसद अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत संशोधन कर सकती है क्योंकि संशोधन करने की शक्ति सार्वभौम शक्ति है। परन्तु संसद अपनी इस विधायी शक्ति द्वारा मूलभूत अधिकारों को वापस नहीं ले सकती और न ही उनको कम कर सकती।
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य A.I.R. 1965 SC 845 में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने संसद की संशोधन की शक्ति पर विचार करने के अतिरिक्त संविधान के मूलभूत अधिकारों तथा राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों के परस्पर सम्बन्ध की व्याख्या भी की। ऑस्टिन के लेखों की चर्चा करते हुए मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर ने कहा कि संविधान के तृतीय एवं चतुर्थ अध्याय संविधान के अन्तःकरण हैं और यदि कोई विरोध हो तो न्यायालयों को सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन करते हुए दोनों अध्यायों की रक्षा करने का प्रयत्न करना चाहिए।
परन्तु मुख्य न्यायाधीश सुब्बाराव ने उपर्युक्त सिद्धान्त को गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1967 में नहीं माना। उन्होंने मूलभूत अधिकारों को प्राकृतिक अधिकार माना तथा सरकार के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि समाज समाजवादी ढाँचे को स्थापित करने के नीति निदेशक सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर संविधान का संशोधन किया गया। संसद की संशोधन की शक्ति के बारे में भी मुख्य न्यायाधीश सुब्बाराव ने कठोर रवैया अपनाया और कहा कि संसद को संशोधन की शक्ति अनुच्छेद 248 तथा संघ सूची को प्रविष्टि 97 के द्वारा मिली है और इसीलिए यह एक विधायी शक्ति है जो अनुच्छेद 13 (2) के द्वारा नियन्त्रित है।
संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 द्वारा गोलकनाथ के मामले में उत्पन्न 'मतभेद दूर हो गया तथा केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य AIR. 1975 SC 1467 में मुख्य न्यायाधीश सीकरी ने शंकरी प्रसाद तथा सज्जन सिंह के मामलों में क्रमशः न्यायाधीश शास्त्री व मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को फिर से स्वीकार कर लिया। उच्चतम न्यायालय ने संविधान की मूलभूत विशिष्टता के सिद्धान्त की संकल्पना की रचना की। न्यायालय ने कहा कि संसद को संविधान में संशोधन करने की सार्वभौम शक्ति है परन्तु ऐसा कोई संशोधन नहीं किया जा सकता जिससे संविधान की मूलभूत विशिष्टता समाप्त होती हो। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय ने भारत के लोकहित तथा विधान पारित करने वाली शक्तियों में सामंजस्य लाने के अपने न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति को बनाए रखा। संविधान के अनुच्छेद 31 (ग) जिसे संविधान (पचीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 द्वारा पारित किया गया, की संवैधानिकता स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह व्यक्तिगत हित तथा समाज के हित में ठीक सामंजस्य बनाए रख सकने में सक्षम है।
5. 'कानून को सम्पूर्ण रूप में पढ़ा जाना चाहिये' (Statute Should be Read as a Whole);
कानून को सम्पूर्ण रूप में पढ़ा जाना चाहिये (The Statute should be Read as a Whole) – लैटिन भाषा में इस सिद्धान्त को इस प्रकार कि कानून का निर्वचन एक्स विसरि एक्ट्स (Ex visceribus actus) किया जाना चाहिए। किसी उपबन्ध को अलग-अलग रूप में निर्वचित नहीं किया जा सकता। कभी-कभी शब्दों के अर्थ उसी उपबन्ध में उपयोग किए गए अन्य शब्दों से तथा कभी उसी कानून में कुछ अन्य उपबन्धों के सन्दर्भ में समझे जाते हैं। परन्तु न्यायालय को इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि अन्य उपबन्धों की सहायता से किसी उपबन्ध का अर्थान्वयन खींच तानकर नहीं किया जाना चाहिये। ऐसा केवल तभी किया जाना चाहिये जब न्यायालय की दृष्टि में विधायिका का ऐसा ही आशय है। न्यायालय को यदि ऐसा सन्देह हो कि विधायिका का ऐसा आशय नहीं भी हो सकता तो इतना ही आधार यह कहने के लिए पर्याप्त है कि विधायिका का आशय ऐसा नहीं था। इसी प्रकार एक ही उपबन्ध में एक शब्द का एक से अधिक बार प्रयोग साधारणतः एक ही अर्थ में होता है। कभी-कभी किसी धारा को अन्य उपबन्ध के सन्दर्भ में निर्वाचित न करने का ठोस आधार भी रहता है। सभी दशाओं में अधिनियम की सम्पूर्ण योजना ही दिशासूचक है। उदाहरणार्थ-
(i) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस A.I.R. 1952 SC 369 में याची, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता था, ने रजिस्ट्री में मूल शाखा में कक्षीकार (मुवक्किल) की ओर से उपस्थित होने के लिए अपने पक्ष में निष्पादित प्राधिकारी का समुचित आधार दाखिल किया। इस आधार पर कि उच्च न्यायालय नियम और मूल शाखा आदेश के अन्तर्गत अधिवक्ता को केवल कार्य करने की शक्ति है पैरवी की नहीं, उसके समुचित आधार पर लौटा दिया गया। याची ने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता होने के कारण उसे स्वयं ही कार्य को स्वीकार करने तथा बगैर अटर्नी की सहायता से पैरवी करने का अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से इस तर्क को स्वीकार कर लिया। बहुमत के एक न्यायाधीश ने निर्णय दिया कि विधायिका के सत्य आशय को जानने के लिए यह आवश्यक है कि किसी उपबन्ध के निर्वचन में कानून के सभी भागों को एक साथ पढ़ा जाय ।
(ii) न्यूजपेपर्स लिमिटेड बनाम औद्योगिक अधिकरण A.I.R. 1957 SC 532 में अपीलार्थी ने अपने एक टाइपिस्ट को पदच्युत कर दिया। उत्तर प्रदेश कार्यरत पत्रकार संघ, जिसके साथ कर्मचारी का कोई सम्बन्ध नहीं था, के मध्यक्षेप द्वारा मामले को उत्तरदाता को सौंप दिया। गया। उच्चतम न्यायालय ने मामले के इस प्रकार सौंपे जाने को इस आधार पर अवैध ठहराया कि यह औद्योगिक विवाद न होने के कारण पदच्युत व्यक्ति नियोक्ता का कर्मचारी नहीं है। न्यायालय ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के किसी भाग का निर्वचन करते समय इस अधिनियम को सम्पूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिये।
(iii) गुरमेज सिंह बनाम प्रताप सिंह A.I.R. 1960 SC 122 में अपीलार्थी ने उत्तरदाता के चुनाव को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 (7) के अन्तर्गत इस आधार पर चुनौती दी कि उसने अपने चुनाव अभियान में गाँव के मुखियाओं या लम्बरदारों को अपना मतदान अभिकर्ता तथा गणन अभिकर्ता बनाया जो भ्रष्ट आचरण की कोटि में आता है। उस समय विधि यह थी कि राजस्व अधिकारी जिनमें ग्राम लेखपाल भी सम्मिलित थे चुनाव प्रक्रिया में सहायता करने के अधिकारी नहीं थे यद्यपि दूसरे ग्राम अधिकारी ऐसा कर सकते थे। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी कानून के एक उपबन्ध का निर्वचन करते समय उस कानून के एक उपबन्ध का निर्वचन करते समय उस कानून के सभी भागों को ध्यान में रखना आवश्यक है। इस व्याख्या से यह स्पष्ट है कि विधायिका ने दो प्रकार के अधिकारियों, राजस्व अधिकारी जिनमें ग्राम लेखपाल भी शामिल हैं तथा दूसरे ग्राम अधिकारी, में भिन्नता रखी है। चूँकि गाँव का मुखिया अथवा लम्बरदार न तो राजस्व अधिकारी थे और न ही वे ग्राम लेखपाल थे, वे दूसरे प्राम अधिकारियों की श्रेणी में आते हैं जिनके ऊपर चुनाव में इस रूप में सहायता करने पर कोई पाबन्दी नहीं लगी हुई थी।
6. अर्थान्वयन 'अमान्य से मान्य करना अच्छा है' (Construction Utres Magis Valeat Quam Pereat);
अर्थान्वयन अमान्य से मान्य करना अच्छा है (Ut Res Magis Valeat Quam Pereat) – जहाँ पर दो विपरीत व्याख्या सम्भव हों न्यायालय उस अर्थ को चुनेगा जो उस पद्धति को, जिसके लिए उस कानून को पारित किया गया है, बनाये रखकर कार्य करता रहे, न कि ऐसे जिससे रास्ते में रोड़े अटकें। दोनों निर्वचनों में से वह जो सीमित हों और जिससे विधान का उद्देश्य प्राप्त नहीं होता अस्वीकार किया जाना चाहिये तथा वह जिसके प्रभावकारी परिणाम हों लागू किया जाना चाहिए। इस सिद्धान्त को " अमान्य से मान्य करना अच्छा है” का नियम भी कहते हैं। उदाहरणार्थ-
(i) अवतार सिंह बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1965 SC 666 में अपीलार्थी, जिसे विद्युत अधिनियम, 1910 की धारा 39 के अन्तर्गत विद्युत चोरी के लिए दोषी पाया गया, ने तर्क दिया कि उसकी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया जाना चाहिये क्योंकि उसके विरुद्ध प्रक्रिया इस अधिनियम की धारा 50 के अनुसार प्रारम्भ नहीं की गई क्योंकि उसका प्रारम्भ उस धारा के अन्तर्गत वर्णित लोगों में से किसी के द्वारा नहीं किया गया। उत्तरदाता का तर्क यह था कि विद्युत की चोरी यद्यपि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 378 के अन्तर्गत चोरी नहीं है परन्तु विद्युत अधिनियम, 1910 की धारा 39 के अन्तर्गत चोरी होने के कारण भारतीय दण्ड संहिता की धारा 379 के अन्तर्गत दण्डनीय है। उच्चतम न्यायालय ने 'अमान्य से मान्य करना अच्छा है' निर्वचन का सिद्धान्त लागू किया और निर्धारित किया कि चूंकि यह अपराध अधिनियम विरुद्ध कार्य है संहिता विरुद्ध कार्य नहीं। की अतः धारा 50 के अन्तर्गत दी हुई आवश्यकताएँ पूर्ण की जानी चाहिये थीं। परन्तु अभियुक्त, जिसे अधिनियम की धारा 39 एक कल्पना का निर्माण करती है जिसका प्रभाव यह है कि इस धारा के अन्तर्गत किए गए अपराध को संहिता के अन्तर्गत अपराध मानकर दण्डित किया जाए।
(ii) धूम सिंह बनाम प्रकाश चन्द्र सेठी A.I.R. 1975 S.C. 1012 में विजयी घोषित प्रत्याशी उत्तरदाता ने तर्क दिया कि उसके विरुद्ध हारे हुए प्रत्याशी द्वारा दाखिल की गई चुनाव याचिका लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81 (1) के अन्तर्गत खारिज कर दी जानी चाहिये क्योंकि धारा 81 (3) के अन्तर्गत वर्णित औपचारिकताएँ कि चुनाव याचिका तथा संलग्नकों पर चुनाव याची के हस्ताक्षर होने चाहिए याची ने पूर्ण नहीं की। उत्तरदाता के इस तर्क को उच्च न्यायालय ने स्वीकार करते हुए अपीलार्थी का आवेदन खारिज कर दिया जिस पर अपीलार्थी ने यह कहते हुए हस्तक्षेप करने की माँग की कि विजयी घोषित उत्तरदाता और चुनाव याची के बीच मिली भगत है। उच्चतम न्यायालय ने अर्थान्वयन का सिद्धान्त "अमान्य से मान्य करना अच्छा है" लागू किया। न्यायालय ने कहा कि ऐसा करने से यह स्पष्ट है कि विधायिका का आशय चुनाव याचिकाओं के अस्वीकार किए जाने पर हस्तक्षेप की अनुमति देना नहीं था चाहे विजयी प्रत्याशी तथा चुनाव याची के बीच मिली भगत हो या नहीं। अधिनियम में इस प्रकार का कोई प्रावधान नहीं है और किसी कानून को उन विलक्षण परिस्थितियों में लागू नहीं किया जा सकता जिनमें लागू करने का विधायिका का आशय कभी भी नहीं रहा हो।
(iii) तिनसुकिया एलेक्ट्रिक सप्लाई कम्पनी लिमिटेड बनाम असम राज्य A.I.R. 1990 SC 123 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यायालय किसी ऐसे अर्थान्वयन के विपरीत सशक्त रूप से झुकाव रखता है जो किसी कानून को निरर्थक बना देता है। कानून के उपबन्ध का अर्थान्वयन इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे अमान्य से मान्य करना अच्छा है के सिद्धान्त के आधार पर उसे प्रभावी व सक्रिय बनाया जा सके। निस्सन्देह यह सत्य है कि यदि कोई कानून पूर्णतः अस्पष्ट है एवं उसकी भाषा सम्पूर्णतः असाध्य और अर्थहीन है तो उस कानून को अस्पष्टता के कारण शून्य करार दिया जा सकता है। उस विधि को संविधान के अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत निरंकुशता या अयुक्तियुक्तता के लिए परखना न्यायिक पुनर्विलोकन में नहीं है, परन्तु किसी कानून की व्याख्या के समय न्यायालय उसके उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए विधायिका के आशय का ध्यान रखता है । अतः यह न्यायालय का कर्त्तव्य है कि वह देखे कि कानून के साथ कैसा बर्ताव किया जा सकता है और वह ऐसा इस बात को सदा जानते हुए करे कि कानून को अप्रभावी नहीं बल्कि प्रभावी बनाने के लिए पारित किया जाता है तथा केवल असम्भवता की स्थिति में ही किसी कानून को अव्यवहार्य कहा जाना चाहिए। इस प्रकार न्यायालय ने तिनसुकिया और डिब्रूगढ़ बिजली पूर्ति उपक्रम (ग्रहण) अधिनियम, 1973 को अव्यवहार्य नहीं माना।
7. 'समरूप अभिव्यक्तियाँ समान अर्थ रखती हैं '(Identical Expression to have the Same Meaning);
समरूप अभिव्यक्तियाँ समान अर्थ रखती हैं (Identical Expressions to have Same Meaning) - यह एक तर्क संगत विचार है कि जब विधायिका ने एक विशिष्ट अभिव्यक्ति का प्रयोग किसी कानून में कई बार किया है तो उस अभिव्यक्ति का अर्थ सभी स्थानों पर समान है। समान वस्तु को समान नाम से पुकारना एक अति सुरक्षित प्रतिज्ञप्ति है । परन्तु न्यायालय को इस सिद्धान्त को लागू करते समय बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि समान अभिव्यक्ति पहले से भिन्न सन्दर्भ में अभिव्यक्त किए जाने पर हो सकता है कि विधायिका उसका अन्य अर्थ लगा रही हो। अतः यह मालूम करना कि क्या समान शब्द का समान अर्थ है न्यायालय के लिए एक बहुत कठिन कार्य है। इसीलिए साधारणतः न्यायालय समान अभिव्यक्ति को भिन्न अर्थ में निर्वाचित करते समय सन्दर्भ भिन्न हैं कारण कहलाता है। ऐसा करने का कारण यह भी हो सकता है कि शब्द समेकन कानून (Consolidating Law) में प्रयुक्त हों जहाँ पर उसे दो भिन्न अधिनियमितियों से प्राप्त किया गया हो।
इस नियम के सर्वोत्तम सामान्य उदाहरण जहाँ पर "समरूप अभिव्यक्तियाँ समान अर्थ रखती हैं" के सिद्धान्त को स्वीकार न किया गया हो अभिव्यक्तियाँ “कर सकता है" तथा "करेगा" के निर्वचन के समय मिलती है जहाँ पर कई बार यह दोनों अभिव्यक्तियाँ कभी आज्ञापक (Mandatory) तथा कभी निदेशात्मक (Directory) रूप में सन्दर्भ के आधार पर निर्वाच की गई हैं। उदाहरणार्थ-
(i) एन० टी० वेलुस्वामी बनाम जी० राजा नयनार A.I.R. 1959 SC 122 - में अपीलार्थी राज्य विधान सभा के चुनाव में विजयी प्रत्याशी था। उत्तरदाता, जो एक मतदाता था, ने एक चुनाव याचिका अपीलार्थी के विरुद्ध उसके चुनाव को इस आधार पर चुनौती देते हुए दाखिल की कि सभी भावी प्रत्याशियों के नामांकन पत्रों की जाँच के समय एक प्रत्याशी का नामांकन पत्र गलत तौर पर नामंजूर कर दिया गया था। इसके पश्चात् अपीलार्थी ने नामांकन पत्र नामंजूर किए जाने को अन्य आधारों पर उचित ठहराने का प्रयास किया और चुनाव अधिकरण ने निर्णय दिया कि ऐसे आधार लिए जा सकते थे। तब उत्तरदाता ने एक रिट याचिका दाखिल की जिस पर उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अधिकरण केवल उस आधार के बारे में अपना निर्णय दे सकता है जिस आधार पर नामांकन किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि प्रस्तुत दृष्टान्त में सम्पूर्ण विवाद लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 (1) (ग) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति “अनुचित रूप से अस्वीकार किया गया" के चारों ओर घूमती है। धारा 100 (1) (घ) (i) में भी शब्द "अनुचित" का प्रयोग अधिनियम की धारा 36 (2) के अन्तर्गत वर्णित अयोग्यता के आधार के परिप्रेक्ष्य में किया गया है। अतः यह निर्धारित किया गया कि धारा 100 (1)(ग) और 100 (1) (घ) (i) में प्रयुक्त शब्द "अनुचित" समान आशय ही रखता है क्योंकि सन्दर्भ में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे इसके विपरीत कुछ कहा जा सके।
(ii) रघुबंस नारायण बनाम उत्तर प्रदेश सरकार A.I.R. 1967 SC 465 में भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 28 के निर्वचन का प्रश्न था जिसके अनुसार यदि न्यायालय की राय में कलेक्टर को जितने प्रतिकर का निर्णय किया जाना चाहिए था वह राशि उसके द्वारा प्रतिकर के रूप में निर्णीत की गई राशि से अधिक है तो न्यायालय अपने निर्णय में यह कह सकता है कि कलेक्टर इस अधिक राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से ब्याज अदा करेगा। अपीलार्थी का तर्क था कि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से राशि अदा करना आज्ञापक (Mondatory) हैं जबकि उत्तरदाता का तर्क था कि यह ब्याज की अधिकतम दर हो सकती है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कलेक्टर के द्वारा 6 प्रतिशत ब्याज देकर राशि अदा करना अधिनियम की धारा 34 के अन्तर्गत उन मामलों में भी कहा गया है जिनमें भूमि पर सरकार द्वारा कब्जा लेने के पूर्व प्रतिकर अदा या जमा नहीं किया गया। निर्वचन का सिद्धान्त कि "समान अभिव्यक्तियों का समान अर्थ होता है जब तक कि सन्दर्भ भिन्न न हो" के परिप्रेक्ष्य में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि धारा 28 का प्रथम भाग जिसमें "निर्देश दे सकता है" शब्दों का प्रयोग किया गया है आदेशात्मक या आज्ञापक नहीं है, अतः न्यायालय कलेक्टर को निर्देश दे भी सकता है और नहीं भी। परन्तु उस धारा के पृष्ठ भाग में प्रयुक्त शब्द "करेगा" आदेशात्मक (Mandatory) है। अतः एक बार यदि न्यायालय ने यह निर्णीत कर दिया है कि कलेक्टर ब्याज देगा तो इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है कि वह 6 प्रतिशत की दर से ब्याज दे ।
8. अर्थान्वयन साहचर्येणा ज्ञायते (Construction Noscitur A Sociis); नोट -
अर्थान्वयन साहचर्येण ज्ञायते (नॉसिटर अ सोसायस) का अर्थ (Meaning of , Noscitur a Sociis) - "नॉसिटर" का अर्थ जानता तथा "सोसायस" का अर्थ साहचर्य अथवा सहयोजन हैं। अतः "नॉसिटर अ सोसायस" का अर्थ साहचर्य से जानना है। जब दो या दो से अधिक ऐसे शब्द जिनके अर्थ सदृश हों एक साथ प्रयोग किए जाएँ तो उन्हें उनके सजातीय अर्थ में समझा जाना चाहिए। वे अपना रंग एक दूसरे से लेते हैं जिससे उनमें से अधिक साधारण शब्द का अर्थ कम साधारण शब्द के सदृश अर्थ में निर्बन्धित हो जाता है। किसी शब्द को उसकी संगिति में 'कौन है' से जाना जा सकता है। साहचर्चित शब्द परस्पर व्याख्या तथा सीमित करते हैं। यह सिद्धान्त विधायिका के वास्तविक आशय को प्राप्त करने में सहायक होने के कारण उस जगह अभिभावी नहीं हो सकता जहाँ यह स्पष्ट हो कि ज्ञानबूझकर व्यापक शब्दों का प्रयोग किया गया नें है। उदाहरणार्थ - (1) मंगू सिंह बनाम चुनाव अधिकरण A.I.R. 1957 S.C. 871 में अपीलार्थी द्वारा चुनाव लड़ने के लिए अपना नामांकन पत्र भरते समय एक वर्ष से अधिक "माँग" का नगरपालिका कर देय था। उसने वोट डालने की तिथि से पूर्व पूरा कर अदा कर दिया तथा वह चुनाव में विजयी हुआ। उसके चुनाव को अवैध घोषित कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय के समक्ष उसका तर्क यह था कि सुसंगत तिथि नामांकन पत्र दाखिल करने की नहीं वरन् वोट डालने की थी तथा इसके अतिरिक्त उसको "माँग" का कोई नोटिस भी नहीं दिया गया था। याचिका को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्णीत किया कि सुसंगत तिथि नामांकन भरने की तिथि ही थी न कि वोट डालने की। न्यायालय ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति "माँग" को उसके साथ प्रयुक्त किए गए अन्य शब्दों के सन्दर्भ में निर्वाचित किया जाना चाहिए। ऐसा करने से स्पष्ट है कि "माँग" का वास्तविक अर्थ नगरपालिका कर अथवा अन्य देय है यद्यपि "माँग" का साधारण अर्थ माँगा जाना या माँगना होता है पर यह अर्थ यहाँ पर सर्वथा अनुपयुक्त है यदि यह देखा जाए कि और किन शब्दों के साहचर्य में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। अतः इस शब्द का निर्वचन बकाया रकम अथवा देय के रूप में ही होना चाहिए।
(II) आलमगीर बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1959 SC 436 में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 के निर्वचन का प्रश्न था। इस धारा के अनुसार जो कोई किसी स्त्री को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, जिसका अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है, या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष के पास से, या किसी ऐसे व्यक्ति के पास से, जो उस पुरुष की ओर से देखरेख करता है, इस आशय से ले जाएगा, या फुसलाकर ले जाएगा कि वह किसी व्यक्ति के साथ नाजायज संभोग करे या इस आशय से ऐसी किसी स्त्री को छिपाएगा या 'निरुद्ध' करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा। इस मामले में तथ्य यह थे कि एक विवाहित स्त्री, अपने पति को छोड़कर, खुले रूप में अपीलार्थी के साथ रहने लगी। अपीलार्थी के विरुद्ध संहिता की धारा 498 का मामला प्रारम्भ किया गया। अपीलार्थी का तर्क यह था कि उसके विरुद्ध अभियोग निरस्त कर दिया जाना चाहिए क्योंकि न हीं वह उस स्त्री को ले गया था, न ही फुसला कर ले गया था, न ही उसने उसे छिपाकर रखा था और न ही उसने उसे 'निरुद्ध' किया था। न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि चूँकि अपीलार्थी के द्वारा स्त्री का ले जाना, फुसलाकर ले जाना अथवा छिपाना, हुआ ही नहीं था क्योंकि वह स्त्री जानबूझकर ही उसके साथ खुले रूप से रहने लग गई थी, तो क्या अपीलार्थी द्वारा उस स्त्री को "निरुद्ध" किया जाना कहा जा सकता है या नहीं। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति "निरुद्ध करेगा" का साधारणतः अर्थ इच्छा के विरुद्ध रोका जाना है परन्तु यह अर्थ प्रस्तुत सन्दर्भ में उचित नहीं है क्योंकि इस अभिव्यक्ति को उसके साहचर्य में प्रयोग किए गए दूसरे शब्दों के प्रकाश में ही निर्वाचित किया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि शब्द "निरुद्ध करेगा" को धारा 498 में प्रयोग शब्दों "ले जाएगा", "फुसलाकर ले जाएगा" तथा "छिपाएगा" के सन्दर्भ में ही निर्वचित किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर "निरुद्ध करेगा" का अर्थ पति की सहमति के बगैर निरुद्ध क्रिया जाना है। धारा 498 पति के अधिकारों की संरक्षा करती है जिसे पत्नी के सानिध्य से वंचित कर दिया गया है। इस उद्देश्य के सन्दर्भ में भी शब्द "निरुद्ध करेगा" का अर्थ किसी स्त्री को उसके पति की सहमति के बगैर रखना है। अतः इस उपबन्ध के अन्तर्गत स्त्री की सहमति का कोई महत्व नहीं है।
(iii) राजस्थान राज्य बनाम श्रीपाल जैन AIR 1963. SC 1323 में उत्तरदाता को राजस्थान सेवा नियम के नियम 244 के अन्तर्गत अनिवार्यतः निवृत्त कर दिया गया। इस नियम के अन्तर्गत राज्य सरकार को किसी राज्य कर्मचारी को बगैर कोई कारण बताए 25 वर्ष तक नौकरी (सेवा) कर लेने के बाद निवृत्त करने का पूर्ण अधिकार है। उत्तरदाता ने अपनी निवृत्ति के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी कि उसके मामले को कामकाज के नियम 37 (vii) (क) के अनुसार "किसी अधिकारी को पदच्युत करने, हटाने अथवा अनिवार्य निवृत्ति करने के प्रस्तावों को मुख्य मन्त्री द्वारा राज्यपाल को भेजा जाना चाहिए।" उच्च न्यायालय ने कहा कि राजस्थान सेवा नियम के अन्तर्गत तीन प्रकार की अनिवार्य निवृत्तियाँ नियम 56 के अन्तर्गत दण्ड के रूप में आनुपातिक पेन्शन पर, अधिवर्षिता की आयु प्राप्त करने पर, तथा नियम 241 के अन्तर्गत है। दृश्यतः ऐसा लगता है कि कामकाज के नियम का नियम 31 (vii) (क) अभिव्यक्ति "दण्ड के रूप में" से विशेषित नहीं है। अतः उपर्युक्त तीनों ही प्रकार की अनिवार्य निवृत्तियाँ इसकी परिसीमा में हैं। परन्तु नियम को ध्यानपूर्वक पढ़ने से ज्ञात होता है कि विधायिका का आशय यह नहीं है। इसका कारण स्पष्ट है कि नियम 31 (vii) (क) पदच्युत करने, हटाने तथा अनिवार्य निवृत्ति करने के प्रस्तावों के बारे में ही विचार करता है। इन तीनों अभिव्यक्तियों का निर्वचन 'साहचर्येण ज्ञायते' के सिद्धान्त के आधार पर ही होना चाहिए और ऐसा करने पर अभिव्यक्ति " अनिवार्य निवृत्ति" की प्रकृति हटाने या पदच्युत करने की होनी चाहिए। चूंकि हटाया जाना या पदच्युत करना सदा दण्ड के रूप में ही होता है। अतः नियम 31 (vii) (क) के अन्तर्गत शब्द "अनिवार्य निवृत्ति" नहीं की गई है अतः नियम 31 (vii) (क) यहाँ पर लागू नहीं होता। इसलिए यह स्पष्ट है कि नियम 244 के अन्तर्गत की गई अनिवार्य निवृत्ति के मामलों को मुख्य मन्त्री द्वारा राज्यपाल को भेजा जाना आवश्यक नहीं है जैसा नियम 31 (vii) (क) के अन्तर्गत निर्देशित है।
(iv) के० जनार्दन पिल्लई बनाम भारत संघ A.L.R. 1981 SC 1485 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि कच्चे काजू आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 2 (क) (v) अन्तर्गत खाद्य पदार्थ हैं और इसलिए इसे केरल आवश्यक वस्तु नियन्त्रण (अस्थायी शक्तियाँ) के अधिनियम, 1962 की धारा 2 (क) के अन्तर्गत आवश्यक वस्तु घोषित नहीं किया जा सकता । उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि साहचर्यित शब्द अपना अर्थ एक दूसरे से लेते हैं और इसको ही साहचर्येण ज्ञायते का नियम कहते हैं। जब "खाद्य पदार्थों" को खाद्य तिलहनों, जिनकों एक प्रक्रिया से होकर गुजरने के बाद ही उनके भीतर के तेल का उपयोग किया जा सकता है, के साहचर्य में रखा गया हो तो यह उचित है कि "खाद्य पदार्थों" को विस्तृत रूप में, जिसमें ऐसी सभी खाद्य वस्तुएँ शामिल हों जिनको एक निश्चित प्रक्रिया से होकर गुजरने के बाद ही मानव के द्वारा खाया जा सके, निर्वचित किया जाए। इसके अतिरिक्त खाद्य पदार्थों के विधाने का इतिहास एवं 'केन्द्रीय विधान के उद्देश्य जिसके द्वारा भारत की गरीब जनता में आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन, पूर्ति तथा वितरण को विनियमित किया जाता है, को ध्यान में रखने से यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "खाद्य पदार्थों" को व्यापक अर्थ में जिसमें कच्ची वस्तुएँ भी, जो बाद में खाद्य में बदल जाती हैं, लिया जाना चाहिए।
9. सजाति अर्थान्वयन (Construction Ejusdem Generis);
सजाति अर्थान्वयन का अर्थ (Meaning of Ejusdem Generis)
"एजुस्डेम जेनेरिस" का अर्थ है "उसी प्रकार का" । साधारणतः साधारण शब्दों को दूसरे शब्दों की भाँति उनके प्राकृतिक अर्थ में ही समझना चाहिए जब तक कि सन्दर्भ दूसरा अर्थ लेने को बाध्य न करें । परन्तु जब एक साधारण शब्द का प्रयोग एक सुस्पष्ट कोटि के शब्दों के पृष्ठ में किया गया हो तो साधारण शब्द को भी उस सुस्पष्ट कोटि के सीमित अर्थ में निर्वचित किया जा सकता है। साधारण शब्द पूर्ववर्ती विशिष्ट अभिव्यक्तियों से अपना अर्थ लेता है क्योंकि विधायिका ने एक सुस्पष्ट कोटि के विशिष्ट शब्दों द्वारा ऐसा करने के लिए अपना आशय स्पष्ट कर दिया है। यह सिद्धान्त कम साधारण शब्दों के पृष्ठ में प्रयोग किए गए साधारण शब्दों पर लागू होने तक ही सीमित है। यदि विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ एक सुस्पष्ट कोटि में नहीं आती हैं तो इस नियम को लागू नहीं किया जा सकता। इस कारण यदि कोई साधारण शब्द केवल एक विशिष्ट शब्द का अनुसरण करता है तो उस एक विशिष्ट शब्द से कोई सुस्पष्ट कोटि नहीं बनती और इसलिए ऐसे में सजाति- अर्यान्वयन नहीं किया जा सकता ।
परन्तु उक्त नियम के अपवाद स्वरूप कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें केवल मात्र एक शब्द को कोटि मानकर इस सिद्धान्त के आधार पर सीमित अर्थ देकर निर्वचन किए गए हैं। यदि प्रयोग किए गए विशिष्ट शब्दों से एक सम्पूर्ण कोटि समाप्त हो जाती है तो इसका अर्थ यही है कि विधायिका का आशय किसी विस्तृत या बड़ी कोटि से था जिसको खोजने का प्रयत्न न्यायालय करेगा। सजाति अर्थान्वयन का सिद्धान्त सार्विक लागू करने का सिद्धान्त नहीं है। यदि किसी विधान का सन्दर्भ इस सिद्धान्त को लागू करने के विरुद्ध हो तो इसे लागू नहीं किया जा सकता । सजाति अर्थान्वयन के सिद्धान्त का आधार यह है कि यदि विधायिका का आशय साधारण शब्दों को असीमित अर्थ में प्रयोग करना होता तो विधायिका को विशिष्ट शब्दों को प्रयोग करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। उदाहरणार्थ-
(i) बम्बई राज्य बनाम अली गुलशन AIR 1955 SC 810 में बम्बई भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1948 की धारा 6 (4) (क) में प्रयुक्त भाषा "राज्य सरकार राज्य के उद्देश्य या. किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए अधिग्रहण कर सकती है" के निर्वचन का प्रश्न था। अपीलार्थी का तर्क था कि इस प्रावधान के अन्तर्गत उसे विदेशी वाणिज्यिक दूतावास के सदस्य के लिए परिसर अधिग्रहण करने का अधिकार है। उच्च न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए” को अभिव्यक्ति "राज्य के उद्देश्य" की सजाति के रूप में निर्वाचित किया जाना चाहिए और विदेशी वाणिज्यिक दूतावास के सदस्य के लिए आवास का प्रबन्ध करना चूंकि संघ का उद्देश्य है राज्य का नहीं इसलिए राज्य सरकार के पास अधिग्रहण का कोई अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि उच्च न्यायालय ने सजाति अर्थान्वयन का नियम लागू करके भूल की है क्योंकि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए" केवल एक अभिव्यक्ति “राज्य के उद्देश्य" का अनुसरण करता है जो एक सुस्पष्ट कोटि नहीं है। कोटि की अनुपस्थिति में इस सिद्धान्त को लागू नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त उपबन्ध की भाषा से विधायिका का आशय स्पष्ट है। शब्दों को उनका प्राकृतिक अर्थ देने से स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए" के अन्तर्गत विदेशी वाणिज्यिक दूतावासों के सदस्यों के लिए आवास की व्यवस्था करना भी शामिल है।
(ii) लीलावती बनाम बम्बई राज्य A.I.R. 1957 SC 521 में याची जो किसी परिसर के किरायेदार की विधवा थी, घटना के समय उस परिसर में न रह रही थी। उत्तरदाता ने बम्बई भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1948 की धारा 6 (4) (क) के अन्तर्गत उस परिसर का अधिग्रहण किसी राज्य कर्मचारी के आवास के लिए कर लिया। याची ने इस अधिग्रहण को इस आधार पर चुनौती दी कि परिसर धारा के साथ जुड़े हुए स्पष्टीकरण के अनुसार "खाली" नहीं था। स्पष्टीकरण के अन्तर्गत किसी स्थान को खाली तब माना जाएगा जब किराएदार का "अपनी किराएदारी की समाप्ति, बेदखली या समनुदेशन पर, अधिभोग समाप्त हो जाता है या परिसर में किसी अन्य प्रकार से उसके हित का अन्तरण हो जाता है अथवा अन्यथा"। याची के अनुसार " अथवा अन्यथा " शब्दों का इसके पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियों के साथ सजाति निर्वचन होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने नर्धारित किया कि इस नियम को प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि "अथवा अन्यथा " शब्दों को पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियाँ समान प्रकृति की जाति न होने के कारण एक सुस्पष्ट कोटि में नहीं आती । अनियमितता में प्रयोग किए गए शब्दों को उनके प्राकृतिक अर्थ में पढ़ने से यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "अथवा अन्यथा" का आशय पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियों में सम्मिलित न होने वाली दशाओं को समावेशित करना है। यह निर्वचन विधान के उद्देश्य के अनुकूल भी है।
(iii) हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ A.I.R. 1965 SC 1167 में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत जारी किए गए फल उत्पादक आदेश 1955 द्वारा फल की चाशनी में फल का रस पच्चीस प्रतिशत होना बाध्यकर बना दिया गया। अपीलार्थी ने तर्क दिया कि यह आदेश उनके उत्पाद " रूह अफजा " पर लागू नहीं होता यद्यपि उसके अन्दर फलों का रस भी है। इसका कारण यह है कि इस आदेश के खण्ड 2 (घ) (v) में शरबत, पेराई, वल्य जौ का जल, पीपी में बन्द फलों का रस तथा परोसने के लिए तैयार पेय या कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो, शामिल है तथा अभिव्यक्ति "कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो" का अर्थ सजाति होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर करते हुए निर्णय दिया कि यह सिद्धान्त इस उदाहरण में लागू नहीं होता क्योंकि अभिव्यक्ति "कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो" के पूर्व प्रयोग किए गए शब्द किसी स्पष्ट कोटि में नहीं आते। न्यायालय ने यह भी कहा कि आदेश के सन्दर्भ से यह स्पष्ट है कि सभी पेय जिनमें फलों का रस हो इसमें शामिल है।
(iv) एक्सप्रेस होटेल्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम गुजरात राज्य A.I.R, 1989 SC 1949 में विलासिता पर गुजरात कर (होटल और बासा) अधिनियम, 1977 की धारा 2 (क) के निर्वाचन का प्रश्न था जिस परिभाषा के अनुसार "वासा के लिए प्रभार" से वातानुकूल, टेलीफोन, टेलीविजन, रेडियो, संगीत, अतिरिक्त बिस्तर, "और अन्य इस प्रकार की वस्तुएँ" सम्मिलित थीं। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति " और अन्य प्रकार की वस्तुएँ" को सजाति के आधार पर अर्थान्वयित किया जाना उचित है। अभिव्यक्ति के पूर्व में प्रयुक्त शब्दों का वर्ग समाप्त न हो जाने के कारण, विधायिका ने जानबूझकर इसके अन्दर इसी वर्ग की अन्य वस्तुओं को शामिल करने के लिए इस अभिव्यक्ति का प्रयोग किया है।
(v) सहायक कलेक्टर, कन्द्रीय उत्पाद शुल्क बनाम रामदेव टोबेको कम्पनी A.I.R. 1991 SC 506 में केन्द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 में 1973 के संशोधन के पूर्व धारा 40 (2) के निर्वचन का प्रश्न था जिसके अनुसार वाद हेतुक के उत्पन्न से छह माह बीत जाने के पश्चात् विधि के अन्तर्गत कुछ किए गए अथवा किए जाने के आदेश दिए जाने के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही स्थापित नहीं की जा सकेगी।
उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति 'अन्य विधिक कार्यवाही' को पूर्वलिखित शब्दों 'वाद' एवं 'अभियोजन' की सजाति के रुप में पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि वे एक विशिष्ट कोटि के अन्तर्गत आते हैं। अतः शास्ति तथा न्यायनिर्णयन की कार्यवाहियाँ धारा 40 (2) मैं प्रयुक्त अभिव्यक्ति अन्य विधिक कार्यवाही के अन्तर्गत नहीं आतीं और इसलिए ये कार्यवाहियाँ इस उप-धारा के अन्तर्गत निर्धारित परिसीमा के अधीन, नहीं हैं। 'वाद' अथवा 'अभियोजन के न्यायिक या विधिक कार्यवाहियां हैं जिन्हें किसी कार्यपालक प्राधिकारी, चाहे वह कानूनी ही क्यों न हो, के समक्ष न दाखिल कर न्यायालय के समक्ष दाखिल किया गया हो। इस विश्वास को धारा में अभिव्यक्ति 'संस्थित' से बल मिलता है।
10. एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है (Construction Expressio Unius Est Exclusio Atterius);
"एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है" (Expressio Unius Est Exclusio Alterius)—यह संविधि की व्याख्या का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त यह भी है कि एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है। जहाँ किसी कानून में किसी विशिष्ट श्रेणी की एक या अधिक वस्तुओं को स्पष्ट रूप से वर्णित कर दिया गया हो तो इसका अर्थ यह होता है कि उस कानून के क्षेत्र में उसी श्रेणी की अन्य वस्तुओं को अलग रखा गया है। विधायिका का यही आशय है। यदि कानून में दो पदावलियाँ उपयोग की गई हों जिनमें से एक साधारणतः दूसरों को अपने अन्दर शामिल करती हो तो अधिक साधारण अभिव्यक्ति कम साधारण अभिव्यक्ति को अपने से बाहर रखती है। "एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है" नियम का अनुसरण कानूनों अथवा दस्तावेजों की व्याख्या में प्रायः एक मूल्यवान नौकर परन्तु खतरनाक मालिक है। "अपवर्जन" प्रायः एक दुर्घटना का परिणाम है, तथा यदि इसके लागू करने से, उस विषय सामग्री को ध्यान में रखकर जिसमें इसे लागू किया जा रहा हो, असंगति या अन्याय उत्पन्न हो तो इस नियम को लागू नहीं किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ -
(i) परभणी ट्रान्सपोर्ट बनाम सड़क परिवहन प्राधिकारी A.I.R. 1960 SC 801 में मोटर यान अधिनियम, 1939 के अन्तर्गत बस सेवा चलाने का परमिट बम्बई राज्य को दे दिया गया। याची ने तर्क दिया कि चूँकि अधिनियम एक प्रणाली (स्कीम) के अन्तर्गत सरकार को बस सेवा चलाने का अधिकार देता है अतः इसके द्वारा अन्यथा बस नहीं चलाई जा सकती। सूत्र “एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है” को भी याची के द्वारा अपने समर्थन में उत्कथित किया गया । उच्चतम न्यायालय ने इस सूत्र को लागू होने को इस आधार पर नामंजूर कर दिया कि धारा 42 (3) (क) की भाषा स्पष्ट है कि सरकार को बस चलाने के लिए धारा 42 (1) के अन्तर्गत परमिट लेना आवश्यक है।
(ii) खेमका और कम्पनी बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1975 SC 1549 में केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 की धारा 9 (2) की व्याख्या का प्रश्न था। इस धारा के प्रथम भाग के अन्तर्गत राज्य अधिकारियों को केन्द्र सरकार की ओर से कर के निर्धारण, पुनर्निर्धारण तथा पालन कराने की शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इस धारा के पृष्ठ भाग के अनुसार यह ऐसा ही होगा जैसे केन्द्रीय अधिनियम के अन्तर्गत देय कर या दण्ड राज्य के साधारण विक्रय कर विधि के अन्तर्गत कर या दण्ड है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केन्द्रीय तथा राज्य के अधिनियमों में दण्ड के उपबन्ध प्रत्येक अधिनियम में विशेष प्रावधान हैं तथा यह केन्द्रीय या राज्य के साधारण विक्रय कर विधि के भाग नहीं हैं। अतः निया "एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है" प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू होता है तथा इस प्रकार निर्वाचित करने से धारा 9 (2) के पृष्ठ भाग में दण्डों के निर्देश केवल केन्द्रीय अधिनियम में विशेष दण्ड उपबन्धों पर लागू होंगे।
11. तत्कालीन व्याख्या सर्वोत्तम और प्रभावी होती है (Construction Contemporanea Expositio Fortissima in Lege);
" तत्कालीन व्याख्या सर्वोत्तम और प्रभावी होती है।" (Contemporanea Expositio Est Fortissima in Lege)-
जब किसी कानून को पारित किया गया था तो तत्कालीन व्यक्तियों के बारे में यह धारणा है कि वे उसके पारित किये जाने की पृष्ठभूमि तथा उस समय के कारणों से वर्तमान पीढ़ी के लोगों से अधिक परिचित थे। प्राचीन कानूनों के निर्वचन के समय तत्कालीन न्यायाधीशों द्वारा दिए गए अर्थ उच्च सम्मान के योग्य हैं क्योंकि तत्कालीन विधायिका के आशय के बारे में वे वर्तमान न्यायाधीशों से अधिक ज्ञान रखते थे। साधारणतः नियम यही है। कि किसी कानून के शब्दों को तत्कालीन अर्थ में समझना चाहिए जिस समय उन्हें पारित किया गया हो। परन्तु यदि यह साबित हो जाये कि किसी उपबन्ध का निर्वचन बार-बार गलत हुआ तो न्यायालय को पूर्व की गलतियों को सुधारकर उसका उचित अर्थ बताना चाहिये। ऐसी दशा में प्राचीन निर्वचन के अन्तर्गत निहित हुए हक बने रहेंगे।
“तत्कालीन व्याख्या सर्वोत्तम और प्रभावी होती है” के सिद्धान्त की आलोचना का आधार यह है कि आधुनिक प्रगतिशील समाज में विधायिका का आशय कानून को पारित किए जाने के 'समय में सीमित कर दिया जाना असंगत और तर्क विरुद्ध है क्योंकि विधि का निर्वचन इस प्रकार होना चाहिए कि वह बदलते हुए समाज के साथ कदम मिलाकर चल सके। इस आलोचना की प्रति आलोचना इस आधार पर की गई है कि यदि कोई प्राचीन कानून निरर्थक बनकर रह गया है तो उसे आधुनिक परिवेश में नये विधान द्वारा परिवर्तित कर दिया जाना चाहिये। उदाहरणार्थ-
(i) राजा राम बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1964 SC 828 में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 25 का निर्वचन करते समय "तत्कालीन व्याख्या" के नियम को लागू करने से इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि यह अधिनियम तुलनात्मक रूप में एक आधुनिक अधिनियम है तथा इसके पारित होते समय नये क्रांतिकारी विचार मनुष्य के मस्तिष्क में आने प्रारम्भ हो गए थे तथा विज्ञान ने पर्याप्त प्रगति कर ली थी। यह निर्धारित किया गया कि उत्पाद शुल्क अधिकारी अधिनियम की धारा 25 के अन्तर्गत एक पुलिस अधिकारी है। (ii) के० पी० वर्गीज बनाम आयकर AIR. 1981 SC 1922 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि "तत्कालीन व्याख्या" का अर्थान्वयन का सिद्धान्त कानून पारित किए जाने के समय के विशेषज्ञों द्वारा दिए गए अर्थों के सन्दर्भ में एक सुस्थापित नियम है यद्यपि कानून की भाषा स्पष्ट तथा स्वच्छ होने पर इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। अतः आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 52 (2) के संशोधन उपबन्धों को स्पष्ट करते हुए प्रत्यक्ष करों के केन्द्रीय बोर्ड ने परिपत्र जारी किए हों तो अधिनियम की धारा 119 के अनुसार उनके बाध्यकर होने के अतिरिक्त वे स्पष्टतः "तत्कालीन व्याख्या" की प्रकृति में हैं जिनसे आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 52 (2) का निर्वचन करने में विधिसम्मत सहायता मिलती है।
(iii) मैं० जे० कॉटन स्पिनिंग एण्ड बीविंग मिल्स बनाम भारत संघ AIR. 1988 में उच्चतम् न्यायालय ने निर्धारित किया कि सूत्र “तत्कालीन व्याख्या." केवल प्राचीन कानूनों की व्याख्या में ही लागू होती है और इसे तुलनात्मक रूप से आधुनिक कानून जैसे प्रस्तुत दृष्टान्त उत्पाद शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 के उपबन्धों के निर्वचन में लागू नहीं किया जा सकता। आधुनिक प्रगतिशील समाज में विधायिका के आशय को विधान निर्माण के समय के शब्दों के अर्थों में सीमित रखना अयुक्तियुक्त होगा तथा, जब तक इसके विपरीत आशय न हो, उन शब्दों को नवीन तथ्य तथा परिस्थितियों में निर्वाचित किया जाना उचित होगा, बशर्ते कि प्रयुक्त शब्द ऐसा करने की अनुमति देते हों।
निष्कर्ष (Conclusion ) – उपरोक्त 11 सामान्य व्याख्या नियमों के वर्णन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि व्याख्या के ये नियम काष्ठकार या मूर्तिकार के उपकरणों के समान हैं। इनका मूल्य बहुत सीमा तक इस बात पर निर्भर करता है कि इन्हें कितनी सावधानी व योग्यता से प्रयोग में लाया जाता है। वस्तुतः यह न्यायाधीशों की कुशाग्र बुद्धी पर निर्भर करता है कि वे इन उपकरणों का प्रयोग कितनी सावधानी बुद्धिमानी से करते हैं।
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