दण्ड कानूनों के कठोर अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से वर्णन करें।
उत्तर - दण्ड कानून में किसी उपबन्ध की व्याख्या करते हुए यदि कोई युक्तियुक्त सन्देह या संदिग्धता प्रतीत हो तो उसका समाधान उस व्यक्ति के पक्ष में जिसे दण्ड का भागी किया जा रहा हो किया जायगा। यदि किसी दण्ड उपबन्ध का युक्तियुक्त निर्वचन इस प्रकार किया जा सकता हो कि दण्ड से बचा जा सके तो ऐसा ही किया जाना चाहिए। यदि किसी दण्ड उपबन्ध की दो युक्तियुक्त व्याख्या हो सकती हों तो उनमें से अधिक उदार व्याख्या (Lenient interpretation) को ही प्रभाव में लाया जाना उचित है। किसी व्यक्ति को केवल तभी दण्डित किया जा सकता है जब दण्ड उपबन्ध की भाषा स्पष्टतः उस व्यक्ति को दण्डित करने के लिए कहे । इस आधार पर कभी दण्डित नहीं किया जा सकता कि किसी कानून का उद्देश्य ऐसा करना है।
मैक्सवेल के अनुसार दण्ड कानूनों का कठोर अर्थान्वयन चार प्रकार से स्वयं को व्यक्त करता है- (i) अपराध के सर्जन के लिए स्पष्ट भाषा की माँग में; (ii) अपराध के आवश्यक करता तत्वों को व्यक्त करने के शब्दों के कठोर निर्वचन में; (iii) दण्डित किए जाने के पूर्व कानूनी शर्तों के पत्र को पूर्ण करने में, तथा (iv) आपराधिक प्रक्रिया एवं अधिकारिता सम्बन्धी तकनीकी उपबन्धों के कठोर पालन पर जोर देने में।
जब तक कि किसी कानून की भाषा किसी कार्य को स्पष्ट रूप से अपराध नहीं कहती, तब तक उस कार्य को अपराध नहीं माना जाएगा। किसी कार्य या लोप जिसे अपराध माना गया है, में प्रयोग किए गए शब्दों में यदि संदिग्धता हो जिससे ऐसा प्रतीत हो कि वह कार्य या लोप उस कानून की भाषा के अन्तर्गत अपराध हो भी सकता है और नहीं भी, तो ऐसी संदिग्धता को अभियुक्त के पक्ष में निर्णीत किया जाएगा।
न्यायालय किसी व्यक्ति को तभी दण्डित करेगा जब मामले की परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से विधि में प्रयोग किये गए शब्दों के अन्तर्गत आती हों। ऐसे विधान जो दण्डित करने के सन्दर्भ में अधिकारिता तथा प्रक्रिया से सम्बन्धित हों उन्हें कठोर रूप से अर्थान्वयित किया जायेगा। जहाँ पर किसी दण्ड कानून में उस कानून द्वारा कुछ प्रक्रिया सम्बन्धी अपेक्षाएँ निर्धारित की गई हों तो अभियुक्त को दण्डित करने से पूर्व न्यायालय यह देखने को बाध्य है कि सभी अपेक्षाएँ पूर्ण की गई हैं या नहीं । इन परिस्थितियों में किसी शंका का निवारण अभियुक्त के पक्ष में ही होगा। यदि इस शंका निवारण से अभियुक्त को इतना अधिक लाभ मिले कि उसे किसी तकनीकी आधार पर छोड़ दिया जाना चाहिए तो न्यायालय उसको बगैर दण्डित किये ही दोषमुक्त कर देगा। दण्ड उपबन्धों को किन्हीं विशिष्ट मामलों या परिस्थितियों में भी आशय या निहितार्थ के आधार पर विस्तारित नहीं किया जा सकता। ऐसी कोई उपधारणा नहीं हो सकती कि किसी अपराध को आन्वयिक रूप (Constructively) से किया गया है। दण्ड कानूनों का प्रभाव सामान्यतः भविष्यलक्षी होता है। उदाहरणार्थ-
(i) डब्ल्यू० एच० किंग बनाम भारत गणराज्य A.I.R. 1952 SC 156 में अपीलार्थी ने पगड़ी के रूप में धन प्राप्त करने के पश्चात् अपनी किरायेदारी किसी अन्य को समनुदेशित (Assign) कर दी। बम्बई किराया, होटल तथा वासा दर (नियन्त्रण) अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत अपने अभियोजन के विरुद्ध उसने तर्क दिया कि अधिनियम के अन्तर्गत उसका उत्तरदायित्व तभी होगा जब अभियोजन यह साबित कर दे कि उसने प्रतिफल स्वीकार कर अपनी किरायेदारी का अन्तरण कर दिया है। अभियोजन का तर्क था कि "समनुदेशन" लगभग एक समान है एवं "त्याग" शब्द को अधिनियम में तकनीकी अर्थ में प्रयोग नहीं किया गया है। अभियोजन के तर्क से असहमत होते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि चूँकि यह अधिनियम 'एक दण्ड विधान है अतः इसका निर्वचन व्यक्ति के पक्ष में किया जाना चाहिये क्योंकि अधिनियम के अन्तर्गत किरायेदारी का त्याग समनुदेशन के समान नहीं है।
(ii) केदार नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य AIR. 1953 SC 404 में 1947 में अपीलार्थी के द्वारा किसी अधिनियम के अन्तर्गत एक अपराध जिसे कारावास अथवा जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जा सकता था किया गया। 1949 में अधिनियम को संशोधित कर जुर्माने की रकम को बढ़ाकर अपराधी द्वारा अपराध कारित कर जितनी रकम ली गई उसके समान कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविधान के अनु० 20 (1) के कारण अपराधी से यह बढ़ी हुई रकम नहीं ली जा सकती।
(iii) सरजू प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य AIR. 1961 SC 631 में अपीलार्थी को जो एक दूकान में कर्मचारी था अपमिश्रित खाद्य के विक्रय के आरोप में खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 के अंतर्गत दण्डित किया गया। उसने तर्क दिया कि चूँकि उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि उसके द्वारा विक्रय किया गया खाद्य अपमिश्रित था अतः उसे इस मामले में अधिनियम की धारा 16 जो अपमिश्रित खाद्य विक्रय को दण्डित करती है तथा धारा 19 जो यह स्पष्ट करती है कि दोषपूर्ण ज्ञान की अनुपस्थिति वैध प्रतिरक्षा नहीं है, के निर्वचन का प्रश्न था । उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी के दण्ड को बनाये रखा और यह स्पष्ट किया कि किसी दण्ड कानून को अभियुक्त के पक्ष में केवल तभी निर्वाचित किया जा सकता है जब उसके एक से अधिक युक्तियुक्त अर्थ निकलते हों । प्रस्तुत दृष्टान्त में धाराएँ 16 एवं 19 सुस्पष्ट हैं तथा दोषपूर्ण आचरण विधि की भाषा में प्रतिनिहित है। एक से अधिक अर्थ सम्भव न होने के कारण अपीलार्थी की दोष सिद्धि वैध है। दोनों उपबन्धों से यह स्पष्ट है कि विक्रेता का ज्ञान, चाहे वह कर्मचारी हो या नियोक्ता,दोषसिद्धि के लिए पूर्णतः तत्वहीन है और इसलिये अपीलार्थी की अपील स्वीकार्य नहीं है।
(iv) रतन लाल बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1965 SC 444 में सोलह वर्ष के बालक अभियुक्त को गृह अतिचार करके सात वर्ष की बालिका के लज्जा भंग के अभियोग में उत्तरदायी पाया गया। मजिस्ट्रेट ने उसको छह माह का कारावास तथा जुर्माने द्वारा दण्डित किया। इस दण्डादेश के आरोपण के पश्चात् अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 पारित किया गया। अभियुक्त ने बगैर इस अधिनियम का लाभ माँगे पहले अतिरिक्त सेशन न्यायाधीश के समक्ष अपील की और फिर पुनरीक्षण में उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन किया जिसे खारिज कर दिया गया। उसने उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रथम बार यह तर्क दिया कि चूंकि वह इक्कीस वर्ष से कम आयु का अपराधी है अंतः उसे 1958 के अधिनियम का लाभ मिलना चाहिये। उच्चतम ने न्यायालय ने बहुमत द्वारा निर्धारित किया कि उसे परिवीक्षा का लाभ प्राप्त होना चाहिये।
(v) रणजीत बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1965 SC 881 में अपीलार्थी को भारत सरकार- द्वारा अभिनिषिद्ध पुस्तक 'लेडी चैटरलीज लवर' बेचने के आरोप में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 292 के अंतर्गत दोषसिद्ध किया गया। उसका तर्क था कि आपराधिक विधि के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिये आपराधिक मनः स्थिति साबित किया जाना अनिवार्य है। अतः प्रस्तुत मामले में अभियोजन को उसके विरुद्ध यह साबित करना आवश्यक था कि उस पुस्तक में अश्लील विषय का ज्ञान होने के बावजूद अपीलार्थी ने उसको बेचा या विक्रय के लिये अपनी दुकान पर रखा। चूँकि अभियोजन ऐसा सिद्ध नहीं कर सका अतः उसकी दोषसिद्धि को रद्द किया जाना उचित है। उसका यह भी तर्क था कि आजकल दुकानों पर इतनी अधिक संख्या में पुस्तकें होती हैं कि यह जानकारी करना लगभग असम्भव है कि उनमें से किन पुस्तकों में अश्लील विषय हैं क्योंकि विधि कभी भी यह माँग नहीं कर सकती कि दुकानदार विक्रय के लिये रखी हुई सभी पुस्तकों को विक्रय से पूर्व पढ़कर देखे कि कहीं उसमें अश्लील विषय तो नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने इन तर्कों को नामंजूर करते हुए निर्धारित किया कि धारा 292 को केवल एक बार पढ़ने से ही यह स्पष्ट है कि इस धारा के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिये आपराधिक मनः स्थिति का साबित किया जाना अनिवार्य नहीं है। अश्लील साहित्य का विक्रय या विक्रय के लिये उसे रखना ही इस उपबन्ध के अंतर्गत दण्डनीय है। अतः जब इस धारा के दो युक्तियुक्त अर्थ हो ही नहीं सकते तो कठोर निर्वचन के सिद्धान्त का प्रश्न ही नहीं उठता। अपीलार्थी अधिनियमिति की स्पष्ट भाषा के अंतर्गत दोषी है और उसकी अपील खारिज किये जाने योग्य है।
(vi) इंदर सैन बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1973 SCC 372 में प्रश्न यह था कि क्या अफीम का किसी के पास पाया जाना स्वयं में ही अफीम अधिनियम, 1898 की धारा 9 के अन्तर्गत अपराध है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अधिनियम की धारा 9 में शब्द "कब्जा होना" का अर्थ पूर्णतः स्पष्ट नहीं है। चूंकि यह अधिनियम एक दण्ड विधान है अतः दो युक्तियुक्त अर्थ निकलने के समय इसे अभियुक्त के पक्ष में निर्वाचित किया जाना चाहिये। अतः ऐसा करने पर यह उचित है कि अभियोजन के द्वारा यह साबित करना आवश्यक है कि अफीम अभियुक्त के कब्जे से पाया गया एवं इसके अस्तित्व का उसे ज्ञान था। चूँकि अभियोजन ऐसा करने में विफल रहा है अतः अपीलार्थी को दण्ड देना विधि में न्यायसंगत नहीं है।
(vii) मुबारक अली बनाम बम्बई राज्य A.I.R. 1957 SC 857 में एक पाकिस्तानी नागरिक ने कराँची से बम्बई में परिवादी को पत्र, तार व टेलीफोन द्वारा मिथ्या व्यपदेशन किया जिसे सत्य समझकर परिवादी ने उस पाकिस्तानी नागरिक के अभिकर्ता को बम्बई में कुछ धन दिया । उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि वह पाकिस्तानी नागरिक छल का अपराध करने के लिये भारतीय न्यायालयों की अधिकारिता के अन्तर्गत है, क्योंकि वह अपीलार्थी प्रपलायी अपराधी अधिनियम, 1881 के अन्तर्गत भारतीय अधिकारियों के समक्ष किसी अन्य मामले में समर्पण कर चुका था और इसलिए उसकी दोषसिद्धि वैध है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय का एक विचार जो अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं रुढ़िवादी विचारधारा के विरुद्ध है, कि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय दण्ड संहिता का अर्थान्वयन इसी प्रकार किया जाना जिस प्रकार इस संहिता के पारित होने के समय के आपराधिक अधिकारिता की धारणा के आधार पर किया जा रहो हो, न ही आवश्यक है और न ही उचित। तब में और अब में सन्दर्भ में बहुत परिवर्तन आया है। अतः यह आवश्यक है कि संहिता को इस रूप में निर्वाचित किया जाये कि आधुनिक आवश्यकताओं का • ध्यान भी रहे एवं ऐसा करना उचित भी हो। जब संहिता में या उसके किसी विशिष्ट उपबन्ध में ऐसा कुछ हो जो इसके विपरीत निर्वचन करने के लिये बाध्य करे तो निर्वचन विपरीत ही होना चाहिये ।
संक्षेप में उपरोक्त मार्गदर्शक वादों में न्यायालयों द्वारा दण्ड संविधि के बारे में अपनाये गये व्याख्या के नियमों से यह प्रकट होता है कि अब दण्ड विधि की व्याख्या उतनी कठोरता के साथ नहीं की जाती है जितनी की यह न्यायालयों द्वारा प्राचीन काल में की जाती थी। हाल के गत वर्षो में न्यायालयों के रूख में निश्चत परिवर्तन आया है और अब न्यायालय समाज की आधुनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संविधियों की व्याख्या करते हैं।
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