मंगलवार, 30 मई 2023

संविधियों की व्याख्या संरचना में आंतरिक उपकरण सहायता का पूर्णरूपेण मूल्यांकन करें।

Question: Explain fully the values of the intrinsic aids in the construction of statutes. 
संविधियों की व्याख्या संरचना में आंतरिक उपकरण सहायता का पूर्णरूपेण मूल्यांकन करें।

उत्तर- संविधियों की व्याख्या-संरचना में आन्तरिक उपकरणों की भूमिका (Role of Instrinsic Aids in the Construction of Statutes) - संविधियों की व्याख्या संरचना में विभिन्न आन्तरिक सहायता उपकरणों की भूमिका को निम्न प्रकार वर्णित किया जा सकता है-

1. सन्दर्भ (Context) - ब्लैक स्टोन के अनुसार, “यदि किसी संविधि की भाषा के दो अर्थ निकलें तो सन्दर्भ के द्वारा एक उपयुक्त अर्थ निकाला जा सकता है।” संविधि में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है साधारणतया उसका साधारण अर्थ लिया जाता है।

हेल्सबरी के अनुसार, सन्दर्भ से ही व्याख्या करनी चाहिये और परिकल्पना का सहारा नहीं लिया जा सकता । सन्दर्भ की सहायता लेने से संविधि में स्थिरता आ जाती है।

लॉर्ड साइमण्डस के अनुसार, सन्दर्भ के अंतर्गत न केवल उसी संविधि के अन्य निर्णायक वाक्यांश शामिल हैं, अपितु उसकी प्रस्तावना, विधि की वर्तमान स्थिति, विषय से मिलती-जुलती अन्य संविधियाँ और वह रिष्टि जिसका कि उपचार ढूंढना आशयित है, सभी शामिल हैं।

स्मिथ का कहना है कि, 'शब्द तो एक प्रकार के आचरण हैं, उनसे जो आशय प्रकट होता है। वह अवश्य ही उसके संदर्भ पर नियंत्रित रहता है साथ ही यह उन परिस्थितियों पर निर्भर करता है जिनमें संविधि लिखी या कही गई है।' न्यायालयों का मुख्य कार्य बहुत अंश तक शब्दों का अर्थ निर्धारित करना है, इसलिये उनका यह भी काम हो जाता है कि वे उनके संदर्भों का भी अध्ययन करें ।' इसलिए व्याकरणमूलक व्याख्या को कोई ऐसी पूर्ण व्याख्या नहीं कहा जा सकता जो सन्दर्भ से सर्वथा अछूती रह सके। यदि व्याकरणमूलक व्याख्या से निकलने वाला परिणाम स्पष्टतः अव्यवहारिक दिखाई पड़ता है, तो हमें व्याकरण को छोड़कर सन्दर्भ की ओर देखना ही पड़ेगा।

शेख गुलफान बनाम सन्त कुमार गांगुली, (1965)2 एस० सी० जे० 839 में कहा गया कि सामान्यतः संविधि में प्रयोग किये गये शब्दों की व्याख्या उनके साधारण अर्थ में होनी चाहिये, परन्तु बहुत से मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण यह है कि शब्दों के साधारण अर्थ से संविधि की तर्कपूर्ण तथा न्यायोचित व्याख्या नहीं हो सकती केवल शब्दकोशिक अर्थ पर आधारित होने से आवश्यक रूप से सांविधिक व्यवस्था की उचित व्याख्या नहीं की जा सकती । प्रायः सांविधिक व्याख्या करने में संविधि की विषय-वस्तु तथा उद्देश्य का ध्यान रखा जाता है। इसलिये संविधि की व्यवस्था के शब्दों के प्रयोग का संदर्भ, संविधि का उद्देश्य जिसमें व्यवस्था को शामिल किया गया है और संविधि पारित करने की नीति, संविधि की व्याख्या में सुसंगत एवं आवश्यक हो जाते हैं। हाल्सबरी ने कहा है कि 'संविधि की व्याख्या में शब्दों की व्याख्या संविधि के संदर्भ में होनी चाहिये न कि उसके कठोर व्याकरणीय या लोकप्रिय भाव में।'

मैक्सवेल के अनुसार, 'संसद द्वारा निर्मित अधिनियम की व्याख्या में उसके भागों को एक साथ पढ़ना चाहिये न कि प्रत्येक भाग को अलग-अलग। संविधि के प्रत्येक उप-वाक्य की व्याख्या अधिनियम के अन्य उप-वाक्यों के संदर्भ में होनी चाहिये जिससे जहां तक सम्भव हो पूरा अधिनियम एक सुसंगत विधि हो जाय।'

यह एक सुस्थापित नियम है कि संविधि के दुरुपयोग की सम्भावना से न्यायालय उसे शक्ति का गलत प्रयोग नहीं मानेगी यदि विधि वैध है और स्पष्ट रूप से उसके निर्माण का अधिकार प्रदान किया गया है। (आई० सी० गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1963 एस० सी० 164) ।

एस० हरसीरान सिंह बनाम पंजाब राज्य, (1984) क्रिमिनल ला जर्नल, 253 में कहा गया कि सिद्धान्त तथा पूर्व-निणय दोनों के आधार पर यदि व्याख्या का झुकाव संदर्भ तथा उद्देश्य की ओर हो, अपेक्षा कि शाब्दिक अर्थ की व्याख्या पर और यदि शाब्दिक अर्थ का परिणाम असंगत और भ्रामक हो, तब संविधि की व्याख्या उस पक्ष में होनी चाहिये जो उसके उद्देश्य को बढ़ावे न कि उसको विफल करे ।

2. उद्देशिका (प्रस्तावना) (Preamble) – प्राय: यह देखा गया है कि प्रत्येक अधिनियम में एक प्रस्तावना जुड़ी रहती है। प्रस्तावना उस अधिनियम के मूल आशय के प्राक्कथन के रूप में होती है जो उपबन्धों के आरम्भ होने के पूर्व ही भूमिका के रूप में दे दी जाती है। यह उद्देशिका शीर्षक के बाद और अधिनियमित धाराओं के पूर्व दी जाती है जिसमें संविधि के उद्देष्यों और नीति का स्पष्टीकरण किया जाता है तथा उन आधारों और उद्देश्यों को स्पष्ट किया जाता है जो अधिनियम में हैं ।

कोचीन बनाम मद्रास एवं केरल राज्य (1960) 2 S.C.A. 412. में यह कहा गया कि प्रस्तावना संविधि का वह अंग है जिसमें अधिनयम के कारणों का प्रदर्शन होता है। इसी संविधि की प्रस्तावना उसे समझने की एक कुन्जी है, और संविधि में यदि कहीं कोई अस्पष्टता या संदिग्धता आ जाती है तो उसके निवारण हेतु तथा संविधि को उसके वास्तविक क्षेत्र के अनुरूप बनाये रखने के लिए उस प्रस्तावना को वैद रूप में देखा जा सकता है।

बुर्रकपुर कोल कं० लि० ब० भारत सरकार, (1961) 2 SC A 523 में कहा गया है कि यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि किसी संविधि की व्याख्या सम्बन्धी गुत्थियों को सुलझाने के लिये उसकी उद्देशिका एक कुन्जी (Key) के रूप में काम करती है। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक अधिनियम की प्रस्तावना सदैव लाभप्रद उद्देश्य की पूर्ति कर सके या आवश्यकता के समय उनसे पथ-प्रदर्शन मिल सके। इसीलिए किसी प्रस्तावना की व्याख्या के लिये उस अधिनियम को पूर्णतः पढ़ना चाहिये। अधिनियमित भाग की प्रस्तावना उस समय कदापि प्रतिबन्धित या विस्तारित नहीं कर सकती जब अधिनियम की भाषा से उसका प्रयोजन और क्षेत्र बिना किसी संदेह के स्पष्ट हो। प्रस्तावना का सन्दर्भ उस समय लिया जा सकता है जबकि अधिनियम की धाराओं का अर्थ या क्षेत्र बिना प्रस्तावना को सन्दर्भ में लाये स्पष्ट न हो रहा हो। न्यायालय संरचना का निष्कर्ष यह है कि 'किसी अधिनियम के उपबन्धों के अर्थ की संरचना करने में न्यायालयों को उसकी प्रस्तावना से आरंभ नहीं करना है, भले ही ऐसा करने में वे न्यायोचित हों। यही नहीं, ऐसी भी परिस्थिति आ सकती हैं जबकि उन्हें प्रस्तावना को देखना पड़े किन्तु यह तभी होगा जबकि संसद द्वारा प्रयुक्त भाषा संदग्धि हो या इतना अधिक सामान्य हो कि संसद द्वारा सीमित अर्थ की प्रकल्पना करने के बाद भी कोई निश्चित अर्थ न निकल पा रहा हो।'

अवध सुगर मिल्स • हरगाँव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1959 A.L.J. 754F.B. में कहा गया है कि यद्यपि यह सत्य है कि प्रस्तावना या लम्बा शीर्षक किसी अधिनियम की व्याख्या करने में एकमात्र आधार नहीं बन सकता, विशेष रूप में उस समय जबकि शीर्षक और प्रस्तावना उस अधिनियम के उपबन्धों की असंगति में हो। फिर भी यह सच है कि शीर्षक और प्रस्तावना पर उस समय विचार किया जा सकता है जबकि उस अधिनियम के मूल उद्देश्य और तत्वों की परिकल्पना की जा रही हो और इस प्रकार प्रस्तावना व्याख्या के लिए कुंजी के रूप में सहायता पहुँचा देती है ।

इस प्रकार प्रस्तावना संविधि की व्याख्या के लिए यदि अनिवार्य अंग नहीं तो एक आवश्यक अंग है। ब्लैक (Black) के अनुसार, यह स्मरण रखना चाहिये कि किसी संविधि की प्रस्तावना उसके अधिनियम के वास्तविक कारणों को अनिवार्य रूप से व्यक्त नहीं करता। इसमें दिखाया गया तथ्य सम्बन्धी विवरण न तो अनिवार्य होता है न ही निष्कर्षात्मक । अतः प्रस्तावना के आधार पर विधि-निर्माताओं के आशय और प्रयोजन को साक्ष्य मानने की बात पर अत्यधिक बल नहीं दिया जाना चाहिये ।

ऐसी धारायें जो प्रस्तावना और अधिनियम के प्रयोजन की असंगति में होकर भी अवैध नहीं (Sections not invalid for inconsistency with preamble and object of the Act) - अब्दुल रहमान ब० आर० एन० कुलकर्णी, ए० आई० आर० 1962, बम्बई 287. में कहा गया है कि यह एक सामान्य सिद्धान्त है कि न तो प्रस्तावना और न प्रकल्पित प्रयोजन ही, अधिनियम की स्पष्ट भाषा को नियन्त्रित कर सकने में समर्थ हैं। उनसे केवल ऐसी स्थिति में अर्थ- संरचना में सहायता मिलती है, जबकि अर्थ सम्बन्धी कोई अस्पष्टता या संदिग्धता दिखाई पड़ रही हो। जहाँ भाषा स्पष्ट है, वहाँ न्यायालय उस भाषा के प्रभाव को लागू करने के लिए बाध्य है। यदि कहीं एक से अधिक अर्थ दिखाई पड़ रहा है, तो वहाँ वह अर्थ ही ग्राह्य होगा जो अधिनियम के प्रयोजनों का वर्णन करने वाली प्रस्तावना में आशयित होगा।

वास्तव में उद्देशिका में अधिनियम के प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन होता है और इसलिए यह कानून का ही एक भाग है। इस कारण न्यायालयों ने इसको निर्वचन के एक आंतरिक सहयोगी के रूप में मान्यता प्रदान की है। परन्तु यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि किसी अधिनियम की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध है तो निर्वचन के सहयोगी के रूप में उद्देशिका की कोई भूमिका नहीं है। परन्तु जहाँ किसी विशिष्ट उपबन्ध के यदि एक से अधिक अर्थ निकलते हों तो उसके वास्तविक अर्थ की जानकारी के लिए उद्देशिका से सहायता ली जा सकती है। उदाहरणार्थ-

(i) केदार नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य A.I.R. 1953 S.C. 404 में यह प्रश्न था कि क्या पश्चिम बंगाल आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 1949 की धारा 4 संविधान के अनुच्छेद 14 का इसलिए अतिक्रमण करती है क्योंकि यह उपबन्ध राज्य सरकार को यह चुनने का, कि कौन से अपराध विशेष प्रक्रिया के अंतर्गत विशेष न्यायालयों द्वारा विचारणीय हों, मनमाना अधिकार देती है जिससे उन मामलों में अभियुक्त सामान्य प्रक्रिया के अंतर्गत साधारण न्यायालयों द्वारा विचारण किये जाने से मिलने वाले लाभों से वंचित रह जाते हैं। उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम की उद्देशिका, "कतिपय अपराधों के अधिक शीघ्र विचारण व अधिक प्रभावी दण्ड प्रदान करना समीचीन है-" की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इससे यह स्पष्ट है कि कुछ अपराधों का विचारण विशेष प्रक्रिया द्वारा अधिक शीघ्रता से एवं अधिक प्रभावी दण्ड व्यवस्था के अंतर्गत किया जाना चाहिए जिसके लिए अधिनियम ने राज्य सरकार को यह विवेकाधार प्रदान किया है कि वह उन मामलों को चुने । अतः संविधान के अनुच्छेद 14 का कोई अतिक्रमण नहीं होता ।

(ii) ए० सी० शर्मा बनाम दिल्ली प्रशासन A.L.R. 1273 S.C. 913 में अपीलार्थी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 की धारा 5 के अंतर्गत स्वयं की दोषसिद्धि को चुनौती दी। उसका तर्क था कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन की स्थापना के पश्चात् दिल्ली पुलिस के भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का घूसखोरी के मामलों में अन्वेषण का अधिकार समाप्त हो गया क्योंकि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 की उद्देशिका ऐसा ही दर्शाती है। इस तर्क को नामंजूर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी कानून के असंदिग्ध व स्पष्ट शब्दों में कोई उद्देशिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती। 1946 के उपर्युक्त अधिनियम की धारा 13 के द्वारा दिल्ली विशेष पुलिस को भी ऐसे मामलों में अन्वेषण का अधिकार है और यह अधिनियमिति कहीं पर भी यह नहीं कहती कि नियमित दिल्ली पुलिस की भ्रष्टाचार निरोध शाखा के अन्वेषण का अधिकार समाप्त हो गया । 1946 का अधिनियम केवल एक अनुज्ञेय विधान

(iii) आत्म प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य A.I.R. 1986 S.C. 895 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भले ही संविधान की व्याख्या करनी हो या किसी कानून की संवैधानिक प्रामाणिकता की जाँच करनी हो, एक मुख्य नियम यह है कि संविधान की उद्देशिका को पथप्रदर्शक रोशनी तथा राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों को निर्वचन की पुस्तक के रूप में देखना चाहिए। उद्देशिका में लोक आशा और आकांक्षा अन्तर्निहित हैं तथा निदेशक सिद्धान्त प्राप्त करने वाले उद्देश्यों को स्पष्ट करता है। जब संविधान के परिप्रेक्ष्य में कानूनों की जाँच की जानी होती है तो इन्हीं चश्मों की • सहायता से न्यायालय को "दूर दृष्टि" तथा "निकट दृष्टि" देखनी होती हैं। संविधान "सुई जेनेरिस " होने के कारण जहाँ संवैधानिक विवाद्यकों पर ध्यान दिया जा रहा है तंग निर्वचनीय नियम, जो विधायनी अधिनियमितियों के निर्वचन के लिये सुसंगत हैं अयोग्य हो सकते हैं। सन् 1977 में संविधान के बयालीसवें संशोधन द्वारा भारत एक समाजवादी गणतन्त्र बना। शब्द "समाजवादी" को संविधान की उद्देशिका में जोड़ा गया। यह शब्द जो जब जमता की आशा एवं आकांक्षाओं का केन्द्र बन गया है तथा जो संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में वर्णित सभी आशाओं के पथप्रदर्शन एवं प्रेरणा संकेत हैं, प्राचीन सामन्तवादी और शोषित समाज के स्थान पर नवीन गुंजायमान समाजवादी कल्याणकारी समाज निर्माण का स्पष्ट मार्गदर्शक है। चाहे संविधान के किसी अनुच्छेद का निर्वचन हो या किसी अन्य कानून की संवैधानिकता का परीक्षण, न्यायालयों को इस प्रकार की व्याख्या करनी चाहिए जो समाजवादी लोकतान्त्रिक राज्य की ओर बढे।

3. लघु शीर्षक या संक्षिप्त नाम ( Short Title ) - किसी कानून का लघु शीर्षक उसे पहचानने की दृष्टि से नामकरण मात्र है। यद्यपि यह उस कानून की एक विशिष्टि है तथापि उस कानून के किसी उपबन्ध को निर्वचित करते समय इससे कोई सहायता नहीं ली जा सकती। किसी स्पष्ट उपबन्ध को न तो यह विस्तृत कर सकता है और न ही संक्षिप्त ।

4. दीर्घ शीर्षक या विस्तृत नाम (Long Title) - प्रत्येक कानून अपने नाम के बाद दीर्घ शीर्षक से ही प्रारम्भ होता है। इसका हेतु उस कानून के उद्देश्यों के बारे में एक साधारण जानकारी देना है। उदाहरणार्थ; दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का दीर्घ शीर्षक है "दण्ड प्रक्रिया सम्बन्धी विध का समेकन और संशोधन करने के लिए अधिनियम" ।

प्राचीन काल में दीर्घ शीर्षक को कानून का भाग नहीं माना जाता था और इसलिए कानून के निर्वचन में एक आन्तरिक सहयोगी के रूप में इसकी कोई मान्यता नहीं थी। परन्त अब वर्तमान में न्यायालयों के दृष्टिकोण में निश्चित परिवर्तन हुआ है और अनेक अवसरों पर कानून के उपबन्धों के निर्वचन में न्यायालय ने उसके दीर्घ शीर्षक से सहयोग लिया है। उदाहरणार्थ-

(i) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस A.I.R. 1952 S.C. 369 में याची उच्चतम न्यायालय तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय दोनों का ही अधिवक्ता था। उसने रजिस्ट्री की मूल शाखा में स्वयं के पक्ष में अपने मुवक्किल की ओर से उपस्थित होने का समुचित आधार दाखिल किया। इस आधार पर कि उच्च न्यायालय की मूल शाखा के नियम एवं आदेश के अन्तर्गत एक अधिवक्ता केवल अभिवाक् कर सकता है कार्य नहीं, उसके आधार को वापस कर दिया गया। याची ने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय का अधिवक्ता होने के कारण वह अटर्नी से बिना कोई अनुदेश प्राप्त किए स्वयं ही कार्य एवं अभिवाक् दोनों ही कर सकता है। उच्चतम न्यायालय के उच्चतम न्यायालय (उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय) अधिनियम, 1951 के दीर्घ शीर्षक " अधिनियम जो उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ताओं को किसी भी उच्च न्यायालय में अधिकार स्वरूप विधि-व्यवसाय करने को प्राधिकृत करता है” की ओर ध्यान देते हुए याची का तर्क स्वीकार कर उसे अपसे मुवक्किल की ओर से कार्य और अभिवाक् करने की स्वीकृति प्रदान की गई।

(ii) केदार नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य A.I.R. 1953 S.C. 404 में पश्चिम बंगाल आपराधिक संशोधन अधिनियम, 1949 की धारा 4 की व्याख्या का प्रश्न था। इस धारा के अंतर्गत राज्य सरकार को यह चुनने का अधिकार था कि कौन से मामले निर्देश के लिये प्रक्रिया के अन्तर्गत विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय होंगे। इसे इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का अतिक्रमण करता है। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए अन्य बातों के साथ-साथ यह निर्धारित किया कि इस अधिनियम का दीर्घ शीर्षक "अधिनियम जो कतिपय अपराधों का अधिक शीघ्र विचारण व अधिक प्रभावपूर्ण दण्ड का प्रबन्ध करता है" स्पष्ट रूप से राज्य सरकार को विवेकाधिकार प्रदान करता है कि कौन से अपराध विशेष न्यायालयों द्वारा विशेष प्रक्रिया के अन्तर्गत विचारणीय होने चाहियें।

5. हासियाँ टिप्पणियाँ (Marginal Notes) – हासियाँ टिप्पणियाँ वे टिप्पणियाँ हैं जो किसी अधिनियम में धाराओं की बगल में लिखी जाती हैं और धाराओं के प्रभाव को स्पष्ट करती हैं। प्राचीन काल में जब किसी संविधि के वास्तविक अर्थ के बारे में कोई शंका होती थी तो कभी-कभी हासियां टिप्पणी की सहायता से भी उस संविधि का उचित अर्थ ज्ञात कर लिया जाता था। परन्तु न्यायालयों का आधुनिक मत यह है कि कानून के निर्वचन में हासियाँ टिप्पण का कोई योगदान नहीं है। इस मत का आधार यह है कि हासियाँ टिप्पण कानून का भाग नहीं है क्योंकि उन्हें विधायक निर्धारित नहीं करते और न ही उन्हें विधायिका के अनुदेश या प्रभुत्व के अंतर्गत हासियाँ में मुद्रित किया जाता। इन टिप्पण को पाण्डु-लेखक के द्वारा निविष्ट किया जाता है और कभी-कभी तो वे अशुद्ध भी हो सकते हैं। कभी कभी अपवादपूर्ण अवस्थाओं में हासियाँ टिप्पणी, को विधायिका द्वारा भी निविष्ट किया गया है और इसलिए इस प्रकार की किसी अधिनियमिति का निर्वचन करते समय हासियाँ टिप्पण से भी सहयोग लिया जा सकता है। भारतीय संविधान ऐसा ही एक उदाहरण है। इसमें हासियाँ टिप्पण संविधान सभा द्वारा ही निविष्ट किये गये थे और। इसलिये भारतीय संविधान के किसी भाग का निर्वचन करते समय हासियाँ टिप्पणी से सहायता। ली जा सकती है। उदाहरणार्थ-

(i) बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1955 S.C. 661 में उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से यह निर्धारित किया कि संविधान के अनु० 286 की हासियाँ टिप्पणी संविधान का ही भाग है और इस कारण उस अनुच्छेद के उद्देश्य एवं अर्थ को समझने के लिये इसका सहयोग लिया जा सकता है। अनु० 286 की हासियाँ टिप्पणी है—“माल के क्रय या विक्रय पर कर के आरोपण के बारे में बन्धन"। यह ब्रिटिश संसद के अधिनियमों के हासियाँ टिप्पण के विपरीत संविधान सभा द्वारा पारित किये जाने के कारण संविधान का भाग है और प्रथम दृष्ट्या उस अनुच्छेद के उद्देश्य और अर्थ को जानने का संकेत है। परन्तु न्यायमूर्ति वेंकटरामा अय्यर ने अपने अल्पमत निर्णय में कहा कि अनु० 286 (1) (क) के हासियाँ टिप्पण से उसके स्पष्टीकरण के निर्वचन में सहयोग लिया जा सकता है तथा यह संविधान में प्रयुक्त शब्दों के स्पष्ट अर्थ को बदल नहीं सकता।

(ii) के० पी० वर्गीज बनाम आयकर अधिकारी A.I.R. 1981 S.C. 1922 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यद्यपि यह सच है कि किसी धारा का निर्वचन करते समय उस धारा के हासियाँ टिप्पणी से कोई सहयोग नहीं लिया जा सकता फिर भी इससे इस बात का ज्ञान तो हो सकता है कि धारा का झुकाव किस ओर है एवं धारा का सम्बन्ध किस विषय से है। यह किसी धारा के शब्दों के निर्वचन को नियन्त्रित नहीं कर सकता विशेषकर उस समय जब धारा की भाषा स्पष्ट एवं असंदिग्ध हो । परन्तु उस कानून का भाग होने पर यह प्रथमदृष्ट्या धारा के उद्देश्य और अर्थ की ओर कुछ संकेत देता है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 52 के प्रारम्भ में उस भाग का हासियाँ टिप्पण था जो आज उपधारा (1) है और विशेष बात यह है कि उपधारा (2) के जोड़ दिए जाने के बाद भी यह हासियाँ टिप्पण ज्यों का त्यों बना हुआ है। इससे यह स्पष्ट है कि संसद् इसको दोनों उपधाराओं पर लागू करना चाहती थी और इसलिए यह सुस्पष्ट है कि उपधारा (1) की तरह उपधारा (2) भी उन मामलों से सम्बन्धित है जहाँ अन्तरण के सन्दर्भ में प्रतिफल को कम करके बताया गया हो।

6. धाराओं के शीर्षक (Headings of Sections) - प्रायः देखा गया है कि संविधियों में धारा के शीर्षक एक धारा या कुछ धाराओं के समूह के साथ ऊपर दिये जाते हैं। न्यायालयों ने शीर्षक को धारा एवं धाराओं के समूह को उद्देशिका माना है। इसलिए किसी संविधि के निर्वचन में शीर्षक को उद्देशिका के समान ही महत्व प्रदान किया गया है तथा उद्देशिका पर लागू होने वाले नियम लागू होते हैं। अतः यदि अधिनियमिति की भाषा से उसका अर्थ स्पष्ट हो तो शीर्षक से कोई सहयोग नहीं लिया जा सकता। परन्तु यदि उसके एक से अधिक युक्तियुक्त अर्थ निकलते हों तो उनमें से कौन सा अर्थ उचित है ज्ञात करने के लिए शीर्षक से सहायता ली जा सकती है। उदाहरणार्थ - भींका बनाम चरणसिंह A.I.R. 1959 S.C. 960 में अपीलार्थी उत्तरदाता भू-स्वामी का किरायेदार था। उत्तरदाता अपीलार्थी को उत्तर प्रदेश किरायेदारी अधिनियम, 1939 की धारा 180 के अंतर्गत बेदखल करना चाहता था। इस धारा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी भूमि के टुकड़े पर उस व्यक्ति को, जो उसको उसमें प्रवेश देने का हकदार है, अनुमति के बगैर तथा विधि के उपबन्धों के प्रतिकूल कब्जा कर लेता है या कब्जा बनाये रखता है तो उसको बेदखल करने का अधिकार होगा। उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी के इस तर्क से सहमत होते हुए कि यह उपबन्ध प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू नहीं होता क्योंकि उसके पास दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 145 के आदेश के अंतर्गत कब्जा था, स्पष्ट किया कि धारा 180 केवल उन मामलों पर ही लागू होती है जहाँ भू-स्वामी उन व्यक्तियों को बेदखल करने का प्रयत्न करता है जिनके पास कब्जे का कोई अधिकार नहीं है। यह बात और भी अधिक उस धारा के शीर्षक “भूमि पर बिना स्वत्व के कब्जा करने वाले व्यक्ति का निष्कासन" से साबित होती है।

7. परिभाषा या निर्वचन खण्ड (Definition or Interpretation Clauses) - परिभाषा या निर्वचन खण्डों को कानून में साधारणतया कुछ अभिव्यक्तियों के प्राकृतिक अर्थों की परिभाषा के अनुसार विस्तृत करने या उन शब्दों को जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं हैं परिभाषा के अनुसार अर्थ देने के उद्देश्य से शामिल किया जाता है। साधारणतया निर्वचन खंड में दिए गए किसी विशिष्ट शब्द के अर्थ का आशय यही है कि उस कानून में जहाँ पर उस शब्द का प्रयोग हुआ है उसे निर्वचन खंड में स्पष्ट किए गए अर्थ में ही लिया जाए। इस नियम का केवल एक अपवाद यही है कि यदि किसी संदर्भ में उस शब्द का निर्वाचन खंड में दिया गया अर्थ बेतुका व निरर्थक है तो उस उपबन्ध का निर्वचन करते समय न्यायालय उस शब्द का वह अर्थ नहीं लेंगे। इसी प्रकार किसी एक अधिनियम के निर्वचन खंड में दिए गए शब्द के अर्थ को अन्य अधिनियम में लागू नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि दोनों कानून साम्य विषय-वस्तु कानून हैं, तथा एक शब्द जिसका प्रयोग दोनों कानूनों में किया गया है पर जिसे एक कानून के निर्वचन खण्ड द्वारा परिभाषित किया गया 1 है, दूसरे कानून में भी उसी अर्थ में लिया जाएगा। उदाहरणार्थ- (i) प्रद्युत कुमार बनाम मुख्य न्यायाधीश, कलकत्ता AIR. 1956 S.C. 285 में अपीलार्थी, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय का रजिस्ट्रार था, को उत्तरदाता ने बर्खास्त कर दिया। अपीलार्थी ने इसको इस आधार पर चुनौती दी कि उत्तरदाता मुख्य न्यायाधीश के पास बर्खास्त आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि संविधान ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को नियुक्त करने का अधिकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दिया है। साधारण खंड अधिनियम की धारा 16 (1), जो संविधान के अनुच्छेद 367 (1) के अनुसार संविधान पर भी लागू होती है, के अनुसार नियुक्त करने के अधिकार में बर्खास्त करने का अधिकार भी शामिल है अतः अपीलार्थी की अपील स्वीकार करने योग्य नहीं है।

8. परन्तुक (Provisos) – परन्तुक धारा का एक भाग होता है और इसे धारा से अलग नहीं किया जा सकता । परन्तुक धारा को नष्ट नहीं करता बल्कि शर्त लगा देता है। परन्तुक धारा का सहायक होता है। यदि धारा और परन्तुक में संघर्ष (Conflict) हो तो परन्तुक भाग को छोड़ा - जा सकता है। वास्तव में परन्तुक का अभिप्राय मुख्य धारा के उपबन्ध पर कुछ रोक लगाना होता ।। परन्तु परन्तुक किसी अधिनियम की पूरी व्यवस्था को नष्ट नहीं कर सकता। परन्तुक का मुख्य • कार्य किसी संविधि की सामान्य व्यवस्थाओं पर अपवाद पेश करना होता है। दूसरे शब्दों में उस अपवाद को छोड़कर जो परन्तुक द्वारा पेश किया गया है, अधिनियम का सामान्य प्रभाव ज्यों का त्यों बना रहता है। उदाहरणार्थ-

(i) टी० देवदासन बनाम भारत संघ A.I.R. 1964 S.C. 179 में याची ने कहा कि यदि संघ लोक सेवा आयोग ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जातियों के लिए आरक्षित कोटा का पालन किया होता तो उसको भी पदोन्नति का अवसर मिलता। इसके स्थान पर संघ के द्वारा अग्रनयन सिद्धान्त पालन किए जाने के कारण एक वर्ष में आरक्षित कोटा भरा न जाने के कारण उसे अगले वर्ष के लिए अग्रनयित कर दिया गया जिससे अगले वर्ष का आरक्षित कोटा बढ़कर पैंसठ प्रतिशत हो गया। यह संविधान के अनु० 16 (1), का अतिक्रमण है। उत्तरदाता का तर्क था कि संविधान के अनु० 16 (4) के अनुसार इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनके प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी।

अतः अमनयन का सिद्धान्त वैध है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि भारत संघ का तर्क मान्य नहीं हो सकता क्योंकि अनु० 16 (4) के अन्तर्गत नियुक्तियों का असीमित आरक्षण अनु० 16 (1) की आत्मा को नष्ट कर देगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 16 के खण्ड (4) को इसी अनुच्छेद के खण्ड (1) का परन्तुक जैसा समझना चाहिए और इसलिए उसको इस प्रकार निर्वाचित नहीं किया जा सकता जिससे प्रमुख उपबन्ध ही नष्ट हो जाए।

(ii) एस० सुन्दरम् बनाम ही० आर० पट्टाभिरमण A.I.R. 1985 S.C. 582 में कहा गया कि परन्तुक निम्नलिखित चार उद्देश्यों को पूरा कर सकता है- (i) वह मुख्य अधिनियमिति से कुछ विषयों को अपवाद बनाए या विशेषित करें,

(ii) वह अधिनियमित को व्यावहारिक बनाने के लिए कुछ आज्ञापक दशाओं के पूर्ण किए

जाने पर जोर देकर अधिनियमिति की धारणा या आशय को ही सम्पूर्णतः परिवर्तित करे, (iii) वह अधिनियम में ही इस प्रकार शामिल हो कि वह अधिनियमिति का ही एक आवश्यक भाग बन जाए और इस प्रकार स्वयं भी अधिष्ठायी अधिनियमिति का भाव एवं रंग प्राप्त कर ले, तथा

(iv) वह अधिनियमिति के केवल एक वैकल्पिक परिशिष्ट की तरह कार्य करे जिसका केवल उद्देश्य कानूनी उपबन्ध के वास्तविक आशय को स्पष्ट करना हो।

9. उदाहरण या दृष्टान्त (Illustrations) - प्रायः देखा गया है कि कानून की धाराओं में उदाहरण इस आशय से जोड़े जाते हैं कि धाराओं के अन्तर्गत वर्णित विधि के उपबन्धों को और अधिक स्पष्ट किया जा सके। चूँकि उदाहरण विधायिका के आशय का ज्ञान कराते हैं अतः वे कानून बनाने वाले के आशय का अच्छा संकेत हैं। परन्तु किसी स्पष्ट अधिनियमिति को उसमें वर्णित उदाहरणों के आधार पर विस्तृत या सीमित अर्थ नहीं दिया जा सकता। उदाहरणार्थ-

(i) शम्भू नाथ बनाम अजमेर राज्य AIR 1965 S.C. 104 में सबूत के भार की चर्चा करते हुए उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 धारा 101 का अपवाद है एवं धारा 101 अपने उदाहरण (क) के साथ मिलकर आपराधिक विधिशास्त्र का मूल नियम कि किसी मामले को साबित करना अभियोजन का उत्तरदायित्व है, पर जोर देता है। धारा 106 का उदाहरण (ख) भारतीय रेल अधिनियम, 1890 की धाराओं 112 व 113 पर लागू होता है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि उदाहरण जिस धारा को स्पष्ट करता है उसकी सम्पूर्ण मात्रा को खत्म नहीं करता और न ही उसके क्षेत्र को विस्तृत या सीमित करता।

(ii) महेश चन्द्र शर्मा बनाम राजकुमारी शर्मा A.1. R. 1996 S.C. 869 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दृष्टान्त धारा का ही भाग है और यह धारा के सिद्धान्तों को सुस्पष्ट करने में सहायक होता है।

10. अपवाद एवं व्यावृत्ति खण्ड (Exceptions and Saving Clauses ) - आमतौर से किसी संविधि में अपवाद ऐसी विषय-वस्तु को अधिनियमिति के क्षेत्र से परे रखने के लिए शामिल किया जाता है जो, यदि ऐसा न किया जाता तो, अधिनियमित के क्षेत्र में ही होता। अपवाद इस बात की पुष्टि करता है कि जो विषय अपवाद के रूप में अलग नहीं किये गए हैं वे प्रमुख उपबन्ध में शामिल हैं। प्रमुख उपबन्ध व अपवाद में आपस में असंगति या विरोध के समय उपबन्ध को ही महत्वपूर्ण मानना चाहिये यद्यपि अपवादस्वरूप कुछ ऐसे निर्णय भी वर्तमान हैं जिनमें अपवाद को विधायिका का अंतिम आशय मानकर उसे ही अधिक महत्व दिया गया है।

व्यावृत्ति खंड साधारणतः किसी कानून के निरसन व पुनः अधिनियमन की दशा में शामिल किये जाते हैं। इसके द्वारा निरसित कानून के अंतर्गत स्थापित अधिकारों में कोई विघ्न नहीं डाला जाता है और न हीं नये अधिकार दिये जाते हैं। सामान्यतः व्यावृत्ति खंड को निरसन करने वाले कानून में शामिल किया जाता है। कानून के प्रमुख भाग और व्यावृत्ति खंड में विरोध होने पर व्यावृत्ति खंड को अस्वीकार किया जाना चाहिये।

11. स्पष्टीकरण (Explanations) - उपबन्धों के अर्थों को सुस्पष्ट करने के उद्देश्य से तथा शंका व संदिग्धता (Ambiguity) को दूर करने के आशय से स्पष्टीकरण शामिल किए जाते हैं। स्पष्टीकरण उपबन्धों के अर्थ को विस्तारित नहीं करता वरन् केवल उसके सच्चे वास्तविक अर्थ को समझने में सहयोग देता है। उदाहरणार्थ-

(i) बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1955 S.C. 661 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्पष्टीकरण जिस धारा के साथ शामिल किया जाता है उसका ही भाग है और उपबन्ध के वास्तविक अर्थ को जानने के लिए सम्पूर्ण धारा जिसमें स्पष्टीकरण भी शामिल है, को सम्पूर्ण रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए। एक विधिक कल्पना जिस उद्देश्य के लिए गढ़ी गई है वहीं तक सीमित है और उस सीमा के बाहर लागू नहीं की जानी चाहिये। इस मामले में स्पष्टीकरण का प्रकट उद्देश्य अनु० 286 (1) के उपखंड (क) के बाह्य विक्रय को स्पष्ट करना है। खंड 1(1) में दिये गये स्पष्टीकरण को खंड (2) में एक अपवाद के रूप में या उसके परन्तुक के रूप में या खंड (2) के क्षेत्र की सीमित करने के रूप में लागू नहीं किया जा सकता। अतः केवल उन अवस्थाओं को छोड़कर जिनमें संसद विधि द्वारा अन्यथा न पारित करे, कोई राज्य विधान मण्डल विक्रय या क्रय पर कोई कर न तो आरोपित कर सकती है और न ही कर अधिरोपण का अनुमोदन कर सकती है, यदि यह विक्रय या क्रय अन्तर्राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान हुआ हो और भले ही वह स्पष्टीकरण के अन्तर्गत हो या नहीं।

(ii) एस० सुन्दरम् बनाम ह्वी० आर० पट्टाभिरमण AIR. 1985 SC 582 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अब यह निश्चित है कि किसी कानूनी उपबन्ध में जोड़ा गया स्पष्टीकरण किसी प्रकार से अधिष्ठायी उपबन्ध नहीं है, परन्तु जैसा कि इस शब्द के स्पष्ट अर्थ से ही प्रकट है, यह केवल कानूनी उपबन्ध में उपस्थित किसी प्रकार की असंदिग्धता को स्पष्ट करने या सुलझाने के लिए जोड़ा जाता है। किसी कानूनी उपबन्ध में स्पष्टीकरण का निम्नलिखित पाँच उद्देश्य हैं-

(i) स्वयं अधिनियम के अर्थ तथा आशय को स्पष्ट करना;

(ii) जहाँ कहीं मुख्य अधिनियमिति में शंका या संदिग्धता हो उसे इस प्रकार से स्पष्ट करना कि वह अधिनियम के मुख्य उद्देश्य के समनुरूप हो;

(iii) अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य को और अधिक अर्थपूर्ण एवं उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए एक अतिरिक्त स्तम्भ प्रदान करना;

(iv) स्पष्टीकरण किसी प्रकार से अधिनियमिति या उसके किसी भाग में न हो हस्तक्षेप कर सकता है और न ही उसे परिवर्तित कर सकता है, परन्तु जहाँ कोई रिक्त स्थान छोड़ दिया गया हो जो स्पष्टीकरण के उद्देश्य से सुसंगत हो, तो रिष्टि को दबाने और अधिनियम के उद्देश्य को बढ़ाने के लिए यह न्यायालय को, अधिनियमिति के वास्तविक अर्थ एवं आशय को प्राप्त करने के आशय से. उचित निर्वचन में सहायता दे सकता है; तथा

(v). कानून द्वारा प्रदत्त किसी अधिकार को यह छीन नहीं सकता और न ही अधिनियम के निर्वाचन में रोड़ा अटका कर उसके संचालन को नष्ट कर सकता।

12. अनुसूची (Schedules) – अनुसूची सामान्यतः उस अधिनियम के अन्तर्गत और अधिकारों का किस प्रकार निपटारा किया जाय या अधिनियम के द्वारा प्रदान की गई शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जाय, बतलाती है। कभी-कभी अनुसूची में एक तालिका के रूप में कुछ विषय भी वर्णित किये जाते हैं जिनका आशय उपयुक्त या अधिनियम को अधिक कारगर बनाना होता है। भारतीय संविधान एक ऐसा ही उदाहरण है। अनुसूची कानून का भाग होती है और किसी धारा का निर्वचन करते समय न्यायालय अनुसूची से सहयोग ले सकता है। इसी प्रकार अधिनियम की सच्ची आत्मा को समझने के लिए अनुसूची का निर्वचन करते समय धाराओं से भी सहयोग लिया जा सकता है। उदाहरणार्थ- मै० एफाली फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1989 S.C. 2227 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी अधिनियम की अनुसूची एवं मुख्य धारा में विरोध होने पर मुख्य धारा ही प्रबल रहती है और अनुसूची को अमान्य घोषित किया जाता है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि आयुर्वेदिक औषधि "अश्वगंधारिष्ट" जिसमें आत्म उत्पन्न मद्य (एलकोहॉल) रहता है परन्तु जिसे सामान्य मदिरा (मादक पेय) के रूप में नहीं पिया जा सकता, उत्पाद शुल्क से मुक्त होगा।

13. विराम चिन्ह (Punctuations) - स्मरणीय है कि प्राचीन काल में कानून बिना विरामादि-विधानों के पारित किये जाते थे और इसलिये यह स्वाभाविक ही था कि न्यायालय इस ओर ध्यान नहीं देते थे। परन्तु आधुनिक युग में विरामादि विधानों में प्रयोग होते हैं। अतः जब कोई विषय न्यायालय के निर्वचन के लिए आता है तो न्यायालय उस उपबन्ध को पहले उसी आकार में देखता है जिस आकार में विरामादि-विधानों सहित वह अस्तित्व में है और यदि न्यायालय समझता है कि उसके विरामादि-विधानों सहित अर्थ में कोई निरर्थकता या संदिग्धता नहीं है तो वह उसे उसी प्रकार निर्वचित कर देता है। परन्तु विरामादि-विधानों सहित निर्वचन करते समय कोई निरर्थकता या संदिग्धता का बोध होता हो तो न्यायालय पूरे उपबन्ध को बिना विरामादि-विधानों के पढ़ेगा और यदि उससे स्पष्ट हो तो विरामादि-विधानों को कोई महत्व दिये बगैर इस प्रकार व्याख्या कर देगा। उदाहरणार्थ-

(i) ए० के० गोपालन बनाम मद्रास राज्य ए० आई० एस० 1950 एस० सी० 27 में संविधान अनु० 22 (7) में अल्पविराम के महत्व को समझाते हुए उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के न्यायमूर्ति कानिया ने स्पष्ट किया कि उपखंड के प्रथम भाग में शब्द "किन" व "किस" का दो बार प्रयोग एवं प्रत्येक बार के बाद अल्पविराम यह दर्शाता है कि संविधान निर्माता इनका प्रयोग संयुक्त रूप में न कर विभाजन के रूप में करना चाहते थे। इस व्याख्या को बाद में स्वयं उच्चतम . न्यायालय के वृहत् बेंच द्वारा शम्भू नाथ सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य ए० आई० आर० 1973 एस० सी० 1425. में इस आधार पर पलट दिया गया कि अनुच्छेद के संदर्भ में ऐसा उचित नहीं था।

(ii) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस ए० आई० आर० 1952 एस० सी० 369. में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि विरामादि-विधानों को "नियन्त्रण करने वाले तत्व" नहीं माना जा सकता और इसलिये वे विधान के स्पष्ट अर्थ को नियन्त्रित नहीं कर सकते।

14. सामान्य उपशीर्षक (General Sub-Heading) – जहाँ किसी अधिनियम की किसी धारा में प्रयुक्त भाषा स्पष्ट है, वहाँ उस सामान्य शीर्षक का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिसके अन्तर्गत वह धारा वर्णित है। उपशीर्षकों का उस भाषा पर प्रभाव नहीं कहा जा सकता जिसका उपयोग उस धारा में किया गया है। किसी एक संविधि की विभिन्न धाराओं के उपशीर्षकों को किसी अन्य विशिष्ट उपशीर्षक से उत्पन्न होने वाली संदिग्ध अभिव्यक्ति को स्पष्ट करने के उपयोग में लाया जा सकता है। वे उप शीर्षक अधिनियम में प्रयुक्त शब्दों के स्पष्ट अर्थ को नियंत्रित नहीं कर सकते भले ही कुछ ऐसे प्रसंगों में प्रस्तावना में दिखाई गई दिशा के अनुरूप उन उपशीर्षकों से सहायता ली जा सकती हो जबकि किसी धारा का अर्थ उस दृष्टि से संदिग्ध हो ।

आधुनिक संविधियों में प्रत्येक धारा पर दिया गया उपशीर्षक उस धारा के लिए प्रस्तावनास्वरूप माना जाता है। वे संविधि के स्पष्ट शब्दों को नियंत्रित नहीं कर सकते, किन्तु संदिग्ध शब्दों को वे स्पष्ट कर सकते हैं। यदि उस धारा के किन्हीं शब्दों की व्याख्या में कोई सन्देह दिखाई पड़ता है, तो निश्चय ही उपशीर्षक से न्यायालयों को इस बात से सहायता मिलती है कि उस सन्देह को दूर कर सके। मिका ब० चरनसिंह 1959 आल० एल० जे० 557.

15. संयुक्तात्मक और वियुक्तात्मक शब्द (Conjunctive and Disjunctive Words) - न्यायालय द्वारा यह निष्कर्ष दिया गया है कि ऐसी परिस्थितियाँ हो सकती हैं जबकि किसी संविधि में प्रयुक्त संयुक्तात्मक शब्द 'और' का अर्थ वियुक्तात्मक शब्द 'अथवा' के रूप में या 'अथवा' का 'और' के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। किन्तु आपराधिक या दाण्डिक विधायन में संयुक्तात्मक शब्दों को वियुक्तात्मक रूप में या वियुक्तात्मक शब्दों को संयुक्तात्मक के रूप में कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, विशेष रूप से उस समय जब कि ऐसा अर्थ ग्रहण करने से अपराध की मात्रा में और भी वृद्धि हो रही हो। (राज्य बनाम वाल्टर्स, 97 एन० सी० 489) I

न्यायालय को यह मानना पड़ेगा कि विधायिका ने जिस अभिव्यक्ति के लिए जिस विशिष्ट शब्द का चयन किया है, वह उद्देश्यपूर्ण है और वही अर्थ ग्रहण भी किया जाना चाहिये जो विधायिका द्वारा निर्धारित है। जब तक कि व्याख्या में कोई शब्द अभीप्सित अर्थ के अतिरिक्त कोई अन्य अर्थ न देने लगे, तब तक व्याकरणमूल अर्थ को ही स्वीकार किया जाना चाहिये । इसीलिये 'और' के स्थान पर 'अथवा' या 'अथवा' के स्थान पर 'और' का अर्थ तभी स्वीकार किया जाना चाहिये जब व्याख्या सम्बन्धी कोई स्पष्ट भ्रान्ति दिखाई पड़ रही हो, और ऐसा करने से विधायिका के आशय की रक्षा करते हुये संविधि का तर्कसंगत अर्थ निकल रहा हो।

'अथवा' शब्द को 'और' के रूप में कदापि नहीं पढ़ा जा सकता। यदि प्रयुक्त छोटे शब्द स्पष्ट और असंदिग्ध हैं तो अनिवार्य रूप से उनका साधारण अर्थ ही ग्राह्य होगा। केवल यह तथ्य कि एक संविधि के परिणाम अनुचित हो जायेंगे, न्यायालय को इस बात के लिए हकदार नहीं बना देता कि वह उसे प्रभावी बनाने से इन्कार कर दे। यदि एक अधिनियम में किसी शब्द की दो भिन्न-भिन्न व्याख्यायें की गयी हैं, तो वहाँ न्यायालय उस व्याख्या को ग्रहण करेगा जो उचित, युक्तयुक्त और व्यावहारिक हो, में यह उसके मुकाबले में जो इन गुणों से युक्त नहीं है।

16. लिंग (Gender) - प्रायः यह देखा गया है कि संविधियों में केवल पुल्लिंग बोधक शब्दों का ही प्रयोग किया जाता है परन्तु व्याख्या में यह स्त्री-पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है। अर्थात अधिनियम के उद्देश्यों के लिए He के स्थान पर She पढ़ा जा सकता है।

17. शब्दों का अर्थ (Meaning of Words) - ऐसे शब्द, जिनका अर्थ कई प्रकार का हो, वही अर्थ स्वीकार करना चाहिये जो धारा की सामान्य भाषा के अनुरूप हो। कई शब्द जब एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, और भिन्न-भिन्न अर्थ परिभाषित नहीं हैं तो यह अनुमान कर लेना होगा कि इन भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियों का एक ही अर्थ आशयित है। किन्तु व्याख्या करने में इसे सार्वदेशिक नियम नहीं कह सकते। इससे केवल विधायिका के आशय का संकेत मिलता है जिससे न्यायालय इस बात की कल्पना करता है कि विधानांग ने एक ही प्रकार के कुछ शब्दों को एक साथ एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया है।

क्रेइज के मतानुसार शब्दों और अभिव्यक्तियों की व्याख्या के लिये दो नियम हैं—पहला नियम यह है कि सामान्य परिनियम के लिए प्रथम दृष्टया उपधारित किया जायेगा कि वे अपने प्रसिद्ध भावों में शब्दों को प्रयुक्त करते हैं। दूसरे शब्दों में शब्दों, जो किसी विशिष्ट विज्ञान या कला में लागू नहीं किया जाता है, का अर्थान्वयन किया जाता है जैसे कि वे सामान्य भाषा में समझे जाते हैं। भाषा के स्पष्ट और प्रसिद्ध अर्थ का अनुसरण किया जाना चाहिये। (टाटा इन्जीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव कं० लि० जमशेदपुर बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, ए० आई० आर० 1969 पटना 23)।

दूसरा नियम परिनियम की वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा से सम्बन्धित है। यदि परिनियम विशेष व्यापार, कारबार या संव्यवहार के निर्देश के सम्बन्ध में हो, तब उसमें प्रयुक्त शब्द, जिससे प्रत्येक व्यक्ति उस व्यापार, कारबार या संव्यवहार के सम्बन्ध में परिचित हैं, और उसका विशिष्ट अर्थ होना समझता है, तो उन शब्दों का उस विशिष्ट अर्थ के अनुसार अर्थान्वयन किया जाना चाहिये जो साधारण या प्रसिद्ध अर्थ से भिन्न होता है (टाटा इन्जीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव कं०, जमशेदपुर बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, ए० आई० आर० 1989 पटना 23)।

18. सम्मिलित होना (Include) - सामान्यतः 'सम्मिलित होना' शब्द व्याख्या के उपखण्डों में प्रयोग किया जाता है जिससे शब्द तथा उप-वाक्य जो संविधि में प्रयुक्त हुए हैं और जब वे प्रयोग किय गये हैं तो उनका अर्थ शामिल होने से हैं। ऐसा केवल उनके प्राकृतिक अर्थ से नहीं अपितु वे सभी चीजें भी जब व्याख्या के उप-खण्ड यह घोषणा करते हों, कि वे इसमें शामिल होंगे। (अहमेदुल्ला बनाम हफीजद्दीन अहमद, ए० आइ० आर० (1973) गौहाटी, 56) ।

19. सक्षमकारी और अक्षमकारी संविधियाँ (Enabling and Disabling Statutes) - सक्षमकारी संविधियाँ सामान्य विधि की सम्भावनाओं को वहाँ तक विस्तारित करती हैं जहाँ तक वे अत्यधिक सीमित या प्रतिबन्धित हैं। अक्षमकारी संविधियाँ इसका ठीक विपरीत प्रभाव डालती हैं। वे सामान्य विधि को सीमित और संकुचित करने का काम करती हैं। कोई संविधि जब विधि के किसी ऐसे उपबन्ध को वैध कर देती है, जो अन्यथा रूप में अवैध हो जाता है, तो उसे सक्षमकारी संविधि कहते हैं।

20. खण्डनात्मक वाक्यखण्ड (Non Obstante Clause) कभी-कभी किसी धारा में लिखा होता है, ‘इस अधिनियम की अन्य बातों के होते हुये भी ' [ Notwithstanding anything contained in this Act, or any law for the time being in force] यह वाक्य खण्ड अधिनियम के अन्य वाक्यों के ऊपर अधिभावी और सशक्त होता है। यदि इस वाक्य खण्ड और मुख्य उपबन्ध के बीच कोई ऐसी असंगति उत्पन्न हो गई है, जिसका समाधान नहीं हो सकता तो पहला प्रयत्न दोनों के सौजन्य का अर्थ ग्रहण करना होगा, और यदि यह सौजन्य न स्थापित हो सके तो न्यायालय अधिनियम के उपबन्ध को प्रधानता देगा।

इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा भारत अधिराज्य बनाम बम्बई ए० इरानी, 1955 एस० सी० आर० 206. में कहा गया है कि, 'यद्यपि साधारणतया किसी धारा के मुख्य उपबन्ध और खण्डनात्मक वाक्यखण्ड में बहुत ही निकट सामीप्य होना चाहिये, फिर भी यह सदैव आवश्यक नहीं है कि व्यवहार्य उपबन्ध और खण्डनात्मक वाक्यांश में समरूपता बनी ही रहे और यह कि उसका प्रभाव अधिनियम के स्पष्ट उपबन्ध का खण्डन ही मान लिया जाय। यदि अधिनियम की भाषा स्पष्ट है और उसके शब्द ऐसे हैं कि उनका एक स्पष्ट और व्याकरणमूलक अर्थ निकल जाता है तो खण्डनात्मक वाक्यखण्ड उस स्पष्ट उपबन्ध के क्षेत्र-विस्तार को अल्पीकृत या खण्डित नहीं कर सकता। ऐसी स्थितियों में खण्डनात्मक वाक्य खण्डों का तात्पर्य केवल इतना ही होना चाहिये कि उपबन्ध की सामान्य स्थिति के स्पष्टीकरण के लिये इसका प्रयोग हुआ है और यह कि विधानांग ने उसका प्रयोग अधिनियम सम्बन्धी सतर्कता के नाते किया है, अधिनियम के प्रभाव को अस्वीकृत करने या विस्तार-क्षीण करने के लिए नहीं।'

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