मंगलवार, 30 मई 2023

कानून का शासन क्या है? विवेचना कीजिए। कानून को संपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए व्याख्या कीजिए।

Question: What is rule of law? Discuss. Explain the term 'Statute must be read as a whole'.
कानून का शासन क्या है? विवेचना कीजिए। कानून को संपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए व्याख्या कीजिए।

उत्तर - विधि का शासन (Rule of Law) - विधि के शासन का विचार बहुत ही प्राचीन है। मध्य युग में जैकटन ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया था कि सभी शासक विधि द्वारा शासन करने के लिये बाध्य हैं। प्रो० डायसी के मतानुसार, विधि का शासन ब्रिटिश संविधान का मूलभूत सिद्धान्त है और इसका प्रयोग वहाँ तीन भिन्न अर्थों में किया जाता है-

1. कोई भी व्यक्ति सिवाय कानून भंग के दण्डनीय नहीं है (No man is punishable except for the breach of Law) - विधि-शासन का सर्वप्रथम अर्थ यह है कि इंग्लैंड में किसी भी व्यक्ति या अधिकारी को किसी प्राधिकारी द्वारा स्वेच्छाचारी या मनमाने ढंग से दण्डित नहीं किया जा सकता। यह अधिकार केवल न्यायालयों को ही है। इससे यह संकेत मिलता है कि किसी व्यक्ति या निकाय की स्वः विवेकाधिकार शक्ति कानून के अधीन है, कानून के ऊपर नहीं है। इस अर्थ में इंग्लैंड अन्य सरकारों की व्यवस्थाओं से भिन्न है।

2. कोई भी व्यक्ति कानून के ऊपर नहीं है (No man is above the law) - प्रो० डायसी के अनुसार, विधि शासन का दूसरा अर्थ यह है कि कोई भी व्यक्ति, भले ही उसकी स्थिति और पद कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो अपने द्वारा किये गये गैरकानूनी कार्यों के लिये साधारण न्यायालयों के अधीन है।

3. संवैधानिक अधिकार न्यायिक निर्णयों के परिणाम हैं (Constitutional rights are the result of Judicial Decisions )-विधि शासन पदावली का तीसरा अर्थ यह है कि इंग्लैंड में व्यक्तियों के अधिकार संविधान द्वारा प्रदान नहीं किये गये हैं बल्कि संविधान में उन अधिकारों को शामिल किया गया है जो समय-समय पर व्यक्तियों के वादों के निर्णयों के फलस्वरूप न्यायालयों ने उन्हें प्रदान किये हैं।

विधि का शासन किस सीमा तक भारतीय संविधान में स्वीकृत है? (To what extent rule of law is incorporated in Indian Constitution ? ) - प्रो० डायसी द्वारा प्रतिपादित “विधि-सिद्धान्त" को भारतीय संविधान के अनु० 14 में स्वीकृत किया गया है। अनु० 14 का कहना है कि "भारत राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता या विधियों के समान संरक्षण से राज्य द्वारा वंचित नहीं किया जायेगा।" इस अनुच्छेद में दो पदावलियों का प्रयोग किया गया है-

(i) विधि के समक्ष समानता (Equality before Law) - यह पदावली ब्रिटिश संविधान से ली गई है जिसे इंग्लैंड में प्रो० डायसी ने 'विधि-शासन' का नाम दिया है। "विधि शासन" का तात्पर्य है कि कोई भी व्यक्ति विधि के ऊपर नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति, भले ही उसकी स्थिति या पद कुछ भी हो, देश की सामान्य विधियों के अधीन है और साधारण न्यायालय के क्षेत्राधिकार के भीतर है। राष्ट्रपति से लेकर गरीब से गरीब व्यक्ति सभी समान रूप से विधि के अधीन हैं और बिना किसी कानूनी औचित्य के किये गये किसी कार्य के लिये समान रूप से उत्तरदायी होते हैं। “विधि के समक्ष समानता" का अर्थ व्यक्तियों के बीच पूर्ण समानता से नहीं है बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि जन्म, मूलवंश तथा धर्म आदि के आधार पर व्यक्तियों के बीच विशेषाधिकारों को प्रदान करने तथा कर्त्तव्यों के आरोपण करने में कोई भेद नहीं किया जायेगा। समता का यह अधिकार अनु० 14 से 18 तक वर्णित है।

(ii) विधि का समान संरक्षण (Equal Protection of Law) - डा० वी० एन० शुक्ला के अनुसार, नियम यह है कि 'समानों के साथ समान कानून लागू करना चाहिये न कि असमानों के साथ समान।' रघुबीर सिंह बनाम हरियाणा राज्य A.I.R. 1980 S.C. 1086 में कहा गया है कि कानून का शासन राज्य से आशा करता है कि वह पुलिस द्वारा अभियुक्तों के साथ बर्बरपूर्ण व्यवहार से उन्हें संरक्षण देने के लिए हर सम्भव प्रयत्न करे तथा सम्बन्धित व्यक्तियों को दण्ड दे। यदि राज्य ऐसा नहीं करता तो विधि से लोगों का विश्वास उउ जायेगा। अतः अनु० 14 में वर्णित कानून का शासन संविधान का “आधारभूत ढाँचा " है जिसे अनु० 368 के अन्तर्गत संशोधन करके खत्म नहीं किया जा सकता।


Explain the term 'Statute must be read as a whole'.
कानून को संपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए व्याख्या कीजिए।

कानून को सम्पूर्ण रूप में पढ़ा जाना चाहिये (The Statute should be Read as a Whole) – लैटिन भाषा में इस सिद्धान्त को इस प्रकार कि कानून का निर्वचन एक्स विसरिब एक्ट्स (Ex visceribus actus) किया जाना चाहिए। किसी उपबन्ध को अलग-अलग रूप में निर्वचित नहीं किया जा सकता। कभी-कभी शब्दों के अर्थ उसी उपबन्ध में उपयोग किए गए अन्य शब्दों से तथा कभी उसी कानून में कुछ अन्य उपबन्धों के सन्दर्भ में समझे जाते हैं। परन्तु न्यायालय को इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि अन्य उपबन्धों की सहायता से किसी उपबन्ध का अर्थान्वयन खींच तानकर नहीं किया जाना चाहिये। ऐसा केवल तभी किया जाना चाहिये जब न्यायालय की दृष्टि में विधायिका का ऐसा ही आशय है। न्यायालय को यदि ऐसा सन्देह हो कि विधायिका का ऐसा आशय नहीं भी हो सकता तो इतना ही आधार यह कहने के लिए पर्याप्त है कि विधायिका का आशय ऐसा नहीं था। इसी प्रकार एक ही उपबन्ध में एक शब्द का एक से अधिक बार प्रयोग साधारणतः एक ही अर्थ में होता है। कभी-कभी किसी धारा को अन्य उपबन्ध के सन्दर्भ में निर्वाचित न करने का ठोस आधार भी रहता है। सभी दशाओं में अधिनियम की सम्पूर्ण योजना ही दिशासूचक है। उदाहरणार्थ-

(i) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस A.I.R. 1952 SC 369 में याची, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता था, ने रजिस्ट्री, में मूल शाखा में कक्षीकार (मुवक्किल) की ओर से उपस्थित होने के लिए अपने पक्ष में निष्पादित प्राधिकारी का समुचित आधार दाखिल किया। इस आधार पर कि उच्च न्यायालय नियम और मूल शाखा आदेश के अन्तर्गत अधिवक्ता को केवल कार्य करने की शक्ति है पैरवी की नहीं, उसके समुचित आधार पर लौटा दिया गया। याची ने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता होने के कारण उसे स्वयं ही कार्य को स्वीकार करने तथा बगैर अटर्नी की सहायता से पैरवी करने का अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से इस तर्क को स्वीकार कर लिया। बहुमत के एक न्यायाधीश ने निर्णय दिया कि विधायिका के सत्य आशय को जानने के लिए यह आवश्यक है कि किसी उपबन्ध के निर्वचन में कानून के सभी भागों को एक साथ पढ़ा जाय ।

(ii) न्यूजपेपर्स लिमिटेड बनाम औद्योगिक अधिकरण A.I.R. 1957 SC 532 में अपीलार्थी ने अपने एक टाइपिस्ट को पदच्युत कर दिया। उत्तर प्रदेश कार्यरत पत्रकार संघ, जिसके साथ कर्मचारी का कोई सम्बन्ध नहीं था, के मध्यक्षेप द्वारा मामले को उत्तरदाता को सौंप दिया गया। उच्चतम न्यायालय ने मामले के इस प्रकार सौंपे जाने को इस आधार पर अवैध ठहराया कि यह औद्योगिक विवाद न होने के कारण पदच्युत व्यक्ति नियोक्ता का कर्मचारी नहीं है। न्यायालय ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के किसी भाग का निर्वचन करते समय इस अधिनियम को सम्पूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिये ।

(iii) गुरमेज सिंह बनाम प्रताप सिंह A.I.R. 1960 SC 122 में अपीलार्थी ने उत्तरदाता के चुनाव को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 (7) के अन्तर्गत इस आधार पर चुनौती दी कि उसने अपने चुनाव अभियान में गाँव के मुखियाओं या लम्बरदारों को अपना मतदान अभिकर्त्ता तथा गणन अभिकर्ता बनाया जो भ्रष्ट आचरण की कोटि में आता है। उस समय विधि यह थी कि राजस्व अधिकारी जिनमें ग्राम लेखपाल भी सम्मिलित थे चुनाव प्रक्रिया में सहायता करने के अधिकारी नहीं थे यद्यपि दूसरे ग्राम अधिकारी ऐसा कर सकते थे। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी कानून के एक उपबन्ध का निर्वचन करते समय उस कानून के एक उपबन्ध का निर्वचन करते समय उस कानून के सभी भागों को ध्यान में रखना आवश्यक है । इस व्याख्या से यह स्पष्ट है कि विधायिका ने दो प्रकार के अधिकारियों, राजस्व अधिकारी जिनमें ग्राम लेखपाल भी शामिल हैं तथा दूसरे ग्राम अधिकारी, में भिन्नता रखी है। चूँकि गाँव का मुखिया अथवा लम्बरदार न तो राजस्व अधिकारी थे और न ही वे ग्राम लेखपाल थे, वे दूसरे ग्राम अधिकारियों की श्रेणी में आते हैं जिनके ऊपर चुनाव में इस रूप में सहायता करने पर कोई पाबन्दी नहीं लगी हुई थी।

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