प्रश्न, संविधि से आप क्या समझते हैं, संविधि का वर्गीकरण,
उत्तर, संविधि विधायिका की इच्छा होती है, और विधायिका राष्ट्र की प्रतिनिधि होती है, जो जनता की इच्छाओं को विधायिका के माध्यम से अभिव्यक्त करती है, विधायिका अपनी इच्छा को संविधि द्वारा क्रियान्वित करती है।
संविधि का वर्गीकरण -
अवधि के संदर्भ में वर्गीकरण,- अवधि के संदर्भ में संविधि दो प्रकार की होती है,
1, अस्थाई विधियां, - ऐसी विधियां जिनकी वैधता का समय निश्चित कर दिया जाता है, यदि इन्हें निश्चित समय के भीतर समाप्त नहीं किया जाता तो वह निर्धारित अवधि तक बनी रहती हैं, यदि अवधि बीतने पर उसकी आवश्यकता बनी रहे तो विधायिका उसका नवीनीकरण करती है, अस्थाई विधियां कहलाती हैं, वित्त अधिनियम एक अस्थाई अधिनियम होता है, इसे प्रत्येक वर्ष पारित करना पड़ता है।
2, स्थाई विधियां,- ऐसी विधियां जिनके संचालन के लिए कोई निश्चित समय नहीं दिया जाता जब तक कि किसी दूसरे अधिनियम द्वारा संशोधित या परिवर्तित न किया जाए, तब तक इनके विस्तार की अवधि विद्यमान रहती है, जैसे भारतीय संविदा विधि, साक्ष्य विधि, भारतीय दंड संहिता।
ढंग के संदर्भ में या कार्यप्रणाली के आधार पर संविधियां दो प्रकार की होती है।
1, आदेशात्मक संविधियां या आज्ञापक या बाध्यकर कानून, ऐसी विधि जिसमें निश्चित कार्यों को निश्चित तरीके से करने की बाध्यता होती है, या इस बात के लिए बाध्य करता है कि एक निश्चित कार्य को एक विशिष्ट ढंग से पूर्ण किया जाए।
2, निदेशात्मक संविधियां या अनुमति बोधक कानून, ऐसी विधि जिसमें किसी कार्य को करने का निर्देश दिया जाता है, इसमें विवेकीय शक्ति होती है, निदेशात्मक कानून मात्र निदेश देता है कि किसी कार्य को किया जाए लेकिन ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं करता, कुछ दशाओं में कानून द्वारा निर्धारित शर्तों या ढंग का पूर्ण किया जाना आवश्यक माना जाता है, और यदि उन शर्तों या ढंग को पूर्ण किया जाए तो ऐसा करना उसकी वैधता के लिए घातक होता है, कुछ अन्य दशाओं में निर्धारित शर्तों या ढंग को केवल एक निदेश के रूप में माना जाता है, इन शर्तों या ढंग का पालन न करना शासित योग्य होता है, एक आज्ञापक या आदेशात्मक उपबंद का कठोरता से पालन करना अनिवार्य है जबकि निदेशात्मक उपबंद की सारभूत पालन ही पर्याप्त है।
उद्देश्य के संदर्भ में वर्गीकरण,
1, संहिताकारी संविधियां, यह एसी विधि है जो विधायन विधि को एक संहिता या सूत्र में समाविष्ट करती है, संहिताकारी कानून वह कानून है जो विधि को संहिताबद्ध करता है, या किसी विशिष्ट विषय पर विधि को संपूर्णत: स्पष्ट करता है।
2, समेकनकारी संविधियां, समेकनकारी संविधियों (Consolidating Statutes) से आशय ऐसी संविधियों से है जो किसी विषय-विशेष पर विधियों को एक स्थान पर समेकित करती हैं अर्थात् एक स्थान पर संग्रहित करती हैं,
समेकनकारी कानून वह कानून है जो किसी विशिष्ट विषय से संबंधित सभी कानूनी उपबंधों को एक स्थान पर यदि आवश्यक हो तो कुछ संशोधन तथा सुधार करके एक अधिनियम में इकट्ठा करता है, दूसरे शब्दों में जो कानून किसी विशिष्ट विषय से संबंधित कानूनों को आवश्यक संशोधनों के बाद एक स्थान पर एक विधायी अधिनियम में संग्रहित अथवा एकत्रित करता है, उसे समेकनकारी कानून कहते हैं, उदाहरण के लिए माध्यस्थम अधिनियम 1940, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 आदि,
किसी समेकनकारी अधिनियम का निर्वचन करते समय उपधारणा यह है कि विधायिका वर्तमान विधि को परिवर्तित करने का आशय नहीं रखती क्योंकि उसने कोई नया विधान पारित नहीं किया है बल्कि किसी विशिष्ट विषय पर अलग-अलग फैले हुए सभी सुसंगत कानूनी उपबंधों को मात्र एक स्थान पर एकत्रित किया है,
यदि किसी समेकनकारी कानून का एक से अधिक युक्तियुक्त एवं सुसंगत अर्थान्वयन संभव हो तो वह अर्थान्वयन मान्य होगा जो वर्तमान विधि में कम से कम हस्तक्षेप करें।
3, घोषणात्मक संविधियां,- ऐसी विधियां किसी नए अधिकारों का सृजन नहीं करती है बल्कि केवल विद्यमान विधि की घोषणा करती है, घोषणात्मक कानून वह कानून है जो सामान्य या कानूनी विधि के संदेहों को दूर करता है, जब कुछ निश्चित अभिव्यक्तियों को गलत अर्थ में समझा जाने लगता है तो ऐसी दशा में घोषणात्मक कानून पारित करना आवश्यक हो जाता है, यह तब भी हो सकता है जब न्यायालय किसी विशिष्ट अभिव्यक्ति को ऐसे अर्थ में लेता है जो विधायिका के अनुसार गलत है, ऐसी दशा में विधायिका उचित अर्थ बताते हुए कानून को पारित कर सकती है ताकि अभिव्यक्ति के उचित अर्थ द्वारा संबंधित विवाद समाप्त हो जाए।
4, उपचारिक संविधियां, - ऐसी संविधियां व्यक्ति को उपचार प्रदान करती है, ऐसी विधियां सामाजिक न्याय की आधारशिला होती है, उपचारी कानून वह कानून है जिससे एक नया उपचार प्रदान किया जाता है, ऐसे कानून को पारित करने का मुख्य उद्देश्य किसी के अधिकार के प्रवर्तन में सुधार लाना या भूलों को ठीक करना एवं पूर्व विधि के दोषों को दूर करना होता है, उदाहरणार्थ, मातृत्व लाभ अधिनियम, कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, आदि।
5, समर्थकारी संविधियां, - समर्थकारी संविधियों से तात्पर्य ऐसी संविधियों से है, जिसके माध्यम से विधायिका किसी कार्य के किये जाने को समर्थ बनाती है, इसका मुख्य उद्देश्य विधि को सामर्थ्य प्रदान करता है, समर्थकारी कानून वह कानून है जो उस सामान्य विधि का विस्तार करता है जहाँ वह संकुचित है, यह किसी अन्यथा अवैध कार्य को वैध बनाता है, ऐसे कानून से विधायिका किसी कार्य के किए जाने को समर्थ बनाती है, साथ ही विधायिका के उद्देश्य को लागू करने के लिए आवश्यक कार्य किया जाए इस बात के लिए भी यह कानून आवश्यक उपलक्षित रूप से समर्थ बनाता है।
6, असमर्थकारी संविधियां या निःशक्तकारी, - यह वह कानून है जो सामान्य विधि के अन्तर्गत प्राप्त अधिकार को प्रतिबन्धित या समाप्त करता है।
7, दण्ड संविधियां, ऐसी संविधियां जो किसी कार्य को अपराध घोषित करते हुए उन्हें दंडनीय बनाती है, यह वह कानून है जो कुछ निश्चित कार्यों या गलतियों को दण्डित करता है, यह कानून विस्तृत दण्ड संहिता या बहुत सी धाराओं जिनमें विभिन्न गलतियों के लिए दण्ड का प्रावधान हो, के रूप में होता है, उदाहरणार्थ,- भारतीय दण्ड संहिता 1860 ।
8. कर संविधियां, ऐसी संविधियां जो आय या कुछ निश्चित प्रकार के व्यवहारों पर कर आरोपित करती है, यह आयकर, धनकर, विक्रयकर, दानकर, के रूप में हो सकता है। इस प्रकार के कानून का उद्देश्य सरकार के लिए राजस्व एकत्रित करना होता है।
9. व्याख्यापक संविधियां, - ऐसी संविधियां जो विधि की व्याख्या करता है, पूर्व विधियों की कमियों को दूर करती है तथा संदेहों का निवारण करती है, ऐसे कानून को प्रायः किसी लोप की पूर्ति करने या पूर्व कानून में प्रयुक्त अभिव्यक्ति के सन्देह को दूर करने के लिए अधिनियमित किया जाता है।
10. संशोधनकारी संविधियां,- ऐसी संविधियां जो मूल अधिनियम में कुछ परिवर्तन या संशोधन करती है संशोधनकारी संविधियां कहलाती है,
यह वह कानून है जो मौलिक रूप में पारित विधि में कुछ जोड़ता है या उसमें कुछ परिवर्तन लाता है ताकि उसे सुधारा जा सके या उसके उद्देश्य को अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से पूर्ण किया जा सके, संशोधनकारी कानून को निरसनकारी कानून नहीं कहा जा सकता, यह संशोधित किये जाने वाली विधि का ही भाग होता है।
11. निरसनकारी संविधियां, - ऐसी संविधियां जो विद्यमान विधियों को निरस्त घोषित करती है,
यह वह कानून है जो पूर्व में अधिनियमित कानून को निरसित करता है। ऐसा निरसन कानून की भाषा द्वारा स्पष्ट रूप में या आवश्यक उपलक्षित रूप में हो सकता है।
12. आरोग्यकारी या विधिमान्यकारी संविधियां, - यह वह संविधियां है जो पूर्व विधि में स्थित दोष के नीरोग हेतु या विधिक हेतु या विधिक प्रक्रिया को विधिमान्यता प्रदान करने हेतु पारित किया जाता है, और यदि ऐसा न किया गया होता तो ऐसे कार्य शून्य होते।
प्रर्वतन के आधार पर या लागू होने की सीमा के सन्दर्भ में संविधियां दो प्रकार का हो सकती है---1. सार्वजनिक विधि, (लोक) तथा 2. वैयक्तिक विधि, (निजी)।
1, सार्वजनिक संविधियां, - सार्वजनिक विधि वह विधि होती है जो सार्वजनिक नीति से जुड़ कर सभी पर लागू होती है।
2, वैयक्तिक संविधियां, - ऐसी संविधि जिसका संबंध वैयक्तिक मामलो से होता है, भले ही उन मामलों में जन साधारण से कोई संबंध न हो,
उदाहरण,- हिंदू विधि मुस्लिम विधि, आदि।
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