परिभाषा
1. सन्दर्भ (Context) - ब्लैक स्टोन के अनुसार, “यदि किसी संविधि की भाषा के दो अर्थ निकलें तो सन्दर्भ के द्वारा एक उपयुक्त अर्थ निकाला जा सकता है।” संविधि में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है साधारणतया उसका साधारण अर्थ लिया जाता है।
2. उद्देशिका (प्रस्तावना) (Preamble) – उद्देशिका किसी भी संविधि के शुरुआत का वह कथन है जिसके द्वारा संविधि के उद्देश्य का पता चलता है, जब किसी संविधि की भाषा स्पष्ट नहीं होती तब विधायिका के उद्देश्य को जानने के लिए उसकी उद्देशिका को देखना अनिवार्य हो जाता है।
लंदन काउण्टी काउंसिल
प्राय: यह देखा गया है कि प्रत्येक अधिनियम में एक प्रस्तावना जुड़ी रहती है। प्रस्तावना उस अधिनियम के मूल आशय के प्राक्कथन के रूप में होती है जो उपबन्धों के आरम्भ होने के पूर्व ही भूमिका के रूप में दे दी जाती है। यह उद्देशिका शीर्षक के बाद और अधिनियमित धाराओं के पूर्व दी जाती है जिसमें संविधि के उद्देष्यों और नीति का स्पष्टीकरण किया जाता है तथा उन आधारों और उद्देश्यों को स्पष्ट किया जाता है जो अधिनियम में हैं ।
3. लघु शीर्षक या संक्षिप्त नाम ( Short Title ) -
किसी कानून का लघु शीर्षक उसे पहचानने की दृष्टि से नामकरण मात्र है। यद्यपि यह उस कानून की एक विशिष्टि है तथापि उस कानून के किसी उपबन्ध को निर्वचित करते समय इससे कोई सहायता नहीं ली जा सकती। किसी स्पष्ट उपबन्ध को न तो यह विस्तृत कर सकता है और न ही संक्षिप्त ।
4. दीर्घ शीर्षक या विस्तृत नाम (Long Title) - प्रत्येक कानून अपने नाम के बाद दीर्घ शीर्षक से ही प्रारम्भ होता है। इसका हेतु उस कानून के उद्देश्यों के बारे में एक साधारण जानकारी देना है। उदाहरणार्थ; दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973
प्राचीन काल में दीर्घ शीर्षक को कानून का भाग नहीं माना जाता था और इसलिए कानून के निर्वचन में एक आन्तरिक सहयोगी के रूप में इसकी कोई मान्यता नहीं थी। परन्त अब वर्तमान में न्यायालयों के दृष्टिकोण में निश्चित परिवर्तन हुआ है और अनेक अवसरों पर कानून के उपबन्धों के निर्वचन में न्यायालय ने उसके दीर्घ शीर्षक से सहयोग लिया है।
अश्वनी कुमार घोष बनाम अरविंद घोष
5. धाराओं के शीर्षक (Headings of Sections) - प्रायः देखा गया है कि संविधियों में धारा के शीर्षक एक धारा या कुछ धाराओं के समूह के साथ ऊपर दिये जाते हैं। न्यायालयों ने शीर्षक को धारा एवं धाराओं के समूह को उद्देशिका माना है। इसलिए किसी संविधि के निर्वचन में शीर्षक को उद्देशिका के समान ही महत्व प्रदान किया गया है तथा उद्देशिका पर लागू होने वाले नियम लागू होते हैं।
उदाहरणार्थ - भींका बनाम चरणसिंह, धारा के शीर्षक “भूमि पर बिना स्वत्व के कब्जा करने वाले व्यक्ति का निष्कासन" से साबित होती है।
6. सामान्य उपशीर्षक (General Sub-Heading) –
आधुनिक संविधियों में प्रत्येक धारा पर दिया गया उपशीर्षक उस धारा के लिए प्रस्तावनास्वरूप माना जाता है। वे संविधि के स्पष्ट शब्दों को नियंत्रित नहीं कर सकते, किन्तु संदिग्ध शब्दों को वे स्पष्ट कर सकते हैं। यदि उस धारा के किन्हीं शब्दों की व्याख्या में कोई सन्देह दिखाई पड़ता है, तो निश्चय ही उपशीर्षक से न्यायालयों को इस बात से सहायता मिलती है कि उस सन्देह को दूर कर सके। मिका ब० चरनसिंह 1959 आल० एल० जे० 557.
7. हासियाँ टिप्पणियाँ या पार्श्व टिप्पणी (Marginal Notes) – हासियाँ टिप्पणियाँ वे टिप्पणियाँ हैं जो किसी अधिनियम में धाराओं की बगल में लिखी जाती हैं और धाराओं के प्रभाव को स्पष्ट करती हैं। प्राचीन काल में जब किसी संविधि के वास्तविक अर्थ के बारे में कोई शंका होती थी तो कभी-कभी हासियां टिप्पणी की सहायता से भी उस संविधि का उचित अर्थ ज्ञात कर लिया जाता था। परन्तु न्यायालयों का आधुनिक मत यह है कि कानून के निर्वचन में हासियाँ टिप्पण का कोई योगदान नहीं है। इस मत का आधार यह है कि हासियाँ टिप्पण कानून का भाग नहीं है क्योंकि उन्हें विधायक निर्धारित नहीं करते और न ही उन्हें विधायिका के अनुदेश या प्रभुत्व के अंतर्गत हासियाँ में मुद्रित किया जाता।
विद्वानों में एकमत नहीं है क्योंकि
पार्श्व टिप्पणी संविधि का भाग नहीं होती
इनका निर्धारण विधायक द्वारा नहीं किया जाता
ये अशुद्ध भी हो सकती हैं
परंतु इसके विपरीत जब पार्श्व टिप्पणी विधायिका द्वारा जोड़ी जाए तो यह व्याख्या में सहायक भी हो सकती है
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
8. परिभाषा या निर्वचन खण्ड (Definition or Interpretation Clauses) - प्रायः सभी अधिनियमों के प्रारंभ में परिभाषा या निर्वाचन खंड का एक अध्याय होता है, इस भाग में कुछ ऐसे शब्दों की परिभाषा दी गई होती है जो उस अधिनियम में प्रयुक्त किये गए होते हैं इन शब्दों के निर्वचन के दौरान वही अर्थ दिया जाना चाहिए जो परिभाषा खंड में दिया गया हो।
उदाहरणार्थ-
(i) प्रद्युत कुमार बनाम मुख्य न्यायाधीश, कलकत्ता में अपीलार्थी, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय का रजिस्ट्रार था, को उत्तरदाता ने बर्खास्त कर दिया। अपीलार्थी ने इसको इस आधार पर चुनौती दी कि उत्तरदाता मुख्य न्यायाधीश के पास बर्खास्त आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि संविधान ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को नियुक्त करने का अधिकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दिया है। साधारण खंड अधिनियम की धारा 16 (1), जो संविधान के अनुच्छेद 367 (1) के अनुसार संविधान पर भी लागू होती है, के अनुसार नियुक्त करने के अधिकार में बर्खास्त करने का अधिकार भी शामिल है अतः अपीलार्थी की अपील स्वीकार करने योग्य नहीं है।
9. परन्तुक (Provisos) – परन्तुक धारा का एक भाग होता है और इसे धारा से अलग नहीं किया जा सकता । परन्तुक धारा को नष्ट नहीं करता बल्कि शर्त लगा देता है। परन्तुक धारा का सहायक होता है। यदि धारा और परन्तुक में संघर्ष (Conflict) हो तो परन्तुक भाग को छोड़ा - जा सकता है। वास्तव में परन्तुक का अभिप्राय मुख्य धारा के उपबन्ध पर कुछ रोक लगाना होता है। परन्तु परन्तुक किसी अधिनियम की पूरी व्यवस्था को नष्ट नहीं कर सकता। परन्तुक का मुख्य कार्य किसी संविधि की सामान्य व्यवस्थाओं पर अपवाद पेश करना होता है। दूसरे शब्दों में उस अपवाद को छोड़कर जो परन्तुक द्वारा पेश किया गया है, अधिनियम का सामान्य प्रभाव ज्यों का त्यों बना रहता है।
10. उदाहरण या दृष्टान्त (Illustrations) - प्रायः देखा गया है कि कानून की धाराओं में उदाहरण इस आशय से जोड़े जाते हैं कि धाराओं के अन्तर्गत वर्णित विधि के उपबन्धों को और अधिक स्पष्ट किया जा सके। चूँकि उदाहरण विधायिका के आशय का ज्ञान कराते हैं अतः वे कानून बनाने वाले के आशय का अच्छा संकेत हैं। परन्तु किसी स्पष्ट अधिनियमिति को उसमें वर्णित उदाहरणों के आधार पर विस्तृत या सीमित अर्थ नहीं दिया जा सकता। उदाहरणार्थ-
केस: शम्भू नाथ बनाम अजमेर राज्य, में न्यायालय ने जोर देकर कहा कि उदाहरण जिस धारा को स्पष्ट करता है उसकी सम्पूर्ण मात्रा को खत्म नहीं करता और न ही उसके क्षेत्र को विस्तृत या सीमित करता।
महेश चन्द्र शर्मा बनाम राजकुमारी शर्मा, में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दृष्टान्त धारा का ही भाग है और यह धारा के सिद्धान्तों को सुस्पष्ट करने में सहायक होता है।
11. अपवाद एवं व्यावृत्ति खण्ड (Exceptions and Saving Clauses ) - आमतौर से किसी संविधि में अपवाद ऐसी विषय-वस्तु को अधिनियमिति के क्षेत्र से परे रखने के लिए शामिल किया जाता है जो, यदि ऐसा न किया जाता तो, अधिनियमित के क्षेत्र में ही होता। अपवाद इस बात की पुष्टि करता है कि जो विषय अपवाद के रूप में अलग नहीं किये गए हैं वे प्रमुख उपबन्ध में शामिल हैं। प्रमुख उपबन्ध व अपवाद में आपस में असंगति या विरोध के समय उपबन्ध को ही महत्वपूर्ण मानना चाहिये यद्यपि अपवादस्वरूप कुछ ऐसे निर्णय भी वर्तमान हैं जिनमें अपवाद को विधायिका का अंतिम आशय मानकर उसे ही अधिक महत्व दिया गया है।
व्यावृत्ति खंड साधारणतः किसी कानून के निरसन व पुनः अधिनियमन की दशा में शामिल किये जाते हैं। इसके द्वारा निरसित कानून के अंतर्गत स्थापित अधिकारों में कोई विघ्न नहीं डाला जाता है और न हीं नये अधिकार दिये जाते हैं। सामान्यतः व्यावृत्ति खंड को निरसन करने वाले कानून में शामिल किया जाता है। कानून के प्रमुख भाग और व्यावृत्ति खंड में विरोध होने पर व्यावृत्ति खंड को अस्वीकार किया जाना चाहिये।
12. स्पष्टीकरण (Explanations) - प्रायः मुख्य धाराओं के साथ स्पष्टीकरण जोड़ा जाता हैं इसका उद्देश्य मुख्यधारा के उपबंध को स्पष्ट करना होता है। स्पष्टीकरण उपबन्धों के अर्थ को विस्तारित नहीं करता वरन् केवल उसके सच्चे वास्तविक अर्थ को समझने में सहयोग देता है।
कभी-कभी मुख्यधारा की अस्पष्टता को स्पष्टीकरण के माध्यम से दूर किया जा सकता है।
13. अनुसूची (Schedules) – अनुसूची सामान्यतः उस अधिनियम के अन्तर्गत और अधिकारों का किस प्रकार निपटारा किया जाय या अधिनियम के द्वारा प्रदान की गई शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जाय, बतलाती है। कभी-कभी अनुसूची में एक तालिका के रूप में कुछ विषय भी वर्णित किये जाते हैं जिनका आशय उपयुक्त या अधिनियम को अधिक कारगर बनाना होता है। भारतीय संविधान एक ऐसा ही उदाहरण है। अनुसूची कानून का भाग होती है और किसी धारा का निर्वचन करते समय न्यायालय अनुसूची से सहयोग ले सकता है। इसी प्रकार अधिनियम की सच्ची आत्मा को समझने के लिए अनुसूची का निर्वचन करते समय धाराओं से भी सहयोग लिया जा सकता है।
उदाहरणार्थ- मै० एफाली फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य आयुर्वेदिक औषधि "अश्वगंधारिष्ट" त्पाद शुल्क से मुक्त होगा।
14. विराम चिन्ह (Punctuations) - स्मरणीय है कि प्राचीन काल में कानून बिना विरामादि-विधानों के पारित किये जाते थे और इसलिये यह स्वाभाविक ही था कि न्यायालय इस ओर ध्यान नहीं देते थे। परन्तु आधुनिक युग में विरामादि विधानों में प्रयोग होते हैं। अतः जब कोई विषय न्यायालय के निर्वचन के लिए आता है तो न्यायालय उस उपबन्ध को पहले उसी आकार में देखता है जिस आकार में विरामादि-विधानों सहित वह अस्तित्व में है और यदि न्यायालय समझता है कि उसके विरामादि-विधानों सहित अर्थ में कोई निरर्थकता या संदिग्धता नहीं है तो वह उसे उसी प्रकार निर्वचित कर देता है। परन्तु विरामादि-विधानों सहित निर्वचन करते समय कोई निरर्थकता या संदिग्धता का बोध होता हो तो न्यायालय पूरे उपबन्ध को बिना विरामादि-विधानों के पढ़ेगा और यदि उससे स्पष्ट हो तो विरामादि-विधानों को कोई महत्व दिये बगैर इस प्रकार व्याख्या कर देगा।
15. संयुक्तात्मक और वियुक्तात्मक शब्द (Conjunctive and Disjunctive Words) - न्यायालय द्वारा यह निष्कर्ष दिया गया है कि ऐसी परिस्थितियाँ हो सकती हैं जबकि किसी संविधि में प्रयुक्त संयुक्तात्मक शब्द 'और' का अर्थ वियुक्तात्मक शब्द 'अथवा' के रूप में या 'अथवा' का 'और' के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। किन्तु आपराधिक या दाण्डिक विधायन में संयुक्तात्मक शब्दों को वियुक्तात्मक रूप में या वियुक्तात्मक शब्दों को संयुक्तात्मक के रूप में कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, विशेष रूप से उस समय जब कि ऐसा अर्थ ग्रहण करने से अपराध की मात्रा में और भी वृद्धि हो रही हो।
16. लिंग (Gender) - प्रायः यह देखा गया है कि संविधियों में केवल पुल्लिंग बोधक शब्दों का ही प्रयोग किया जाता है परन्तु व्याख्या में यह स्त्री-पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है। अर्थात अधिनियम के उद्देश्यों के लिए He के स्थान पर She पढ़ा जा सकता है।
17. शब्दों का अर्थ (Meaning of Words) - ऐसे शब्द, जिनका अर्थ कई प्रकार का हो, वही अर्थ स्वीकार करना चाहिये जो धारा की सामान्य भाषा के अनुरूप हो।
18. सम्मिलित होना (Include) - सामान्यतः 'सम्मिलित होना' शब्द व्याख्या के उपखण्डों में प्रयोग किया जाता है
19. सक्षमकारी और अक्षमकारी संविधियाँ (Enabling and Disabling Statutes) - सक्षमकारी संविधियाँ सामान्य विधि की सम्भावनाओं को वहाँ तक विस्तारित करती हैं जहाँ तक वे अत्यधिक सीमित या प्रतिबन्धित हैं। अक्षमकारी संविधियाँ इसका ठीक विपरीत प्रभाव डालती हैं। वे सामान्य विधि को सीमित और संकुचित करने का काम करती हैं।
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