1. शब्द-कोष (Dictionaries) – किसी कानून में प्रयोग किए गए शब्दों का निर्वचन उनके साधारण अर्थ के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए। चूँकि शब्दकोश किसी शब्द के कई अर्थों को स्पष्ट करता है इसीलिए सामान्यतः उन अर्थों की जानकारी के लिए शब्दकोश सहायक है। अतः किसी शब्द के साधारण अर्थ को जानने के लिए न्यायालय शब्दकोश का सहयोग ले सकता है। परन्तु ऐसा करने के लिए न्यायालय को बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि कानून के विशिष्ट सन्दर्भ में उन अर्थों में से कोई अर्थ वास्तव में उचित ही हो। इसीलिए कई बार न्यायालय बहुत से अर्थों में से कोई अर्थ ठीक मानकर चुन लेता है, और कई बार कानून के सन्दर्भ को देखते हुए न्यायालय अर्थों को अस्वीकार भी कर देता है। प्रत्येक परिस्थिति में न्यायालय को विशिष्ट कानून के उद्देश्य, ध्येय और सन्दर्भ का ध्यान रखना पड़ता है। उदाहरणार्थ-
(i) आलमगीर बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1956 S.C. 436 में अपीलार्थी पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 के अन्तर्गत अपराध करने का आरोप था। इस धारा के अनुसार "जो कोई किसी स्त्री को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, जिसका अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है, या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष के पास से, या किसी ऐसे व्यक्ति के पास से जो उस पुरुष की ओर से उसकी देखरेख करता है, इस आशय से ले जाएगा, या फुसलाकर ले जाएगा कि वह किसी व्यक्ति के साथ नाजायज संभोग करे या इस आशय से ऐसी किसी स्त्री को छिपाएगा या “निरुद्ध करेगा", वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जाएगा।” अपीलार्थी का एक तर्क यह भी था कि चूँकि वह स्त्री अपने पति को छोड़कर उसके साथ स्वेच्छा से रह रही थी अतः यह कहना अनुचित है कि उसने उस स्त्री को "निरुद्ध” किया और इस कारण वह उत्तरदायी नहीं है। इस तर्क को अस्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि "निरुद्ध" का शब्दकोश में अर्थ किसी को उसकी इच्छा के विरुद्ध रोक कर रखना है परन्तु प्रस्तुत सन्दर्भ में यह अर्थ उचित नहीं है। यह उपबन्ध पति के अधिकार को संरक्षित रखने के उद्देश्य से इस प्रकार बनाया गया है कि कोई भी पति को उसकी पत्नी के साहचर्य से अलग न रखे और इसलिए ऐसा करने में पत्नी की इच्छा भी पति के अधिकार को कम नहीं कर सकती।
(ii) रामावतार बनाम सहायक विक्रय कर अधिकारी A.I.R. 1961 S.C. 1325 में प्रश्न यह था कि क्या "पान" एक "वेजीटेब्ल" होने के कारण उसके विक्रय पर विक्रय कर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि बिहार विक्रय कर अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत "वेजीटेब्ल" के विक्रय पर विक्रय कर से छूट प्रदान की गई है। अपीलार्थी का तर्क यह था कि "वेजीटेब्ल" शब्द का शब्द-कोश अर्थ ही उचित अर्थ है जिसके अनुसार पौधों के भागों से सम्बन्धित, समाविष्ट हुई, बनी हुई, प्राप्त की गई या पाई गई वस्तु 'वेजीटेब्ल' है और चूँकि "पान" इस परिभाषा के अन्तर्गत है आता है अतः वह भी "बेजीटेब्ल" है और इस कारण विक्रय से परे है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि शब्दकोश अर्थ इस दृष्टान्त में उचित अर्थ नहीं हो सकता क्योंकि विधायिका का आशय 1947 के अधिनियम के सन्दर्भ में यह नहीं है। "पान" शब्द को जिस अर्थ में सामान्य व्यक्ति समझता है उसी अर्थ में इसे विधायिका ने प्रयुक्त किया है। अतः पान के विक्रय पर विक्रय कर आरोपित किया जाना उचित है।
(iii) कर्मचारी राज्य बीमा निगम बनाम टाटा इलेक्ट्रिक एण्ड लोकोमोटिव कम्पनी A.I.R. 1976 SC 66 में प्रश्न यह था कि क्या उत्तरदाता कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अंतर्गत कम्पनी के “शिक्षार्थियों" (अप्रेन्टिसेज) को धन का अंशदान देने के लिए बाध्य है। “शिक्षार्थी” शब्द के शब्द-कोश अर्थ से यह स्पष्ट है कि शिक्षार्जन का प्रमुख उद्देश्य आपस में तय की गयी शर्तों के अन्तर्गत कम्पनी के द्वारा प्रशिक्षण देना है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि यद्यपि शिक्षार्थी को कम्पनी द्वारा कुछ धन दिया जाता है तथापि ऐसा करने से वह कम्पनी का कर्मचारी नहीं बन जाता। उसकी स्थिति सदा ही एक सीखने वाले व्यक्ति के रूप में बनी रहती है। अतः कम्पनी उसे अंशदान के रूप में धन देने को बाध्य नहीं है।
2. पाठ्य पुस्तकें (Text Books) – किसी कानून के वास्तविक अर्थ को जानने के लिये न्यायालय पाठ्य पुस्तकों का सहयोग ले सकता है परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उनमें दी गई राय न्यायालय की राय भी हो। पाठ्य पुस्तकों में दी गई राय को न्यायालय द्वारा स्वीकार किए जाने के तथा अस्वीकार किए जाने के, दोनों प्रकार के ही, उदाहरण उपलब्ध हैं। मनु, याज्ञवल्क्य, विज्ञानेश्वर, जीमूतवाहन तथा कौटिल्य आदि को न्यायालय के द्वारा अनेक बार उद्धृत किया गया है तथा उनके विचारों को मान्यता दी गई है। मुल्ला की पुस्तक भी इसी प्रकार सहायक सिद्ध होती रही है।
केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य AIR. 1973 S.C. 146 में पर्याप्त संख्या में पाठ्य-पुस्तकों में वर्णित विचार न्यायालय के सामने पेश किये गए। परन्तु उच्चतम न्यायालय के कई न्यायाधीशों ने विचार व्यक्त किये हैं कि इनमें वर्णित विचारों व प्रतिकूल विचारों की अधिक संख्या को देखते हुए यही उचित है कि उनको अधिक महत्व न देकर कानून के संदर्भ को सदा ध्यान में रखकर ही निर्वचन किया जाये। यही कुशल नीति है ।
3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background) - किसी संविधि के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए न्यायालय को विधि और विधान के इतिहास से तथा अन्य ऐतिहासिक तथ्यों, जो न्यायालय के विचार में आवश्यक हों के सहयोग लेने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। न्यायालय इस पर भी सोच विचार कर सकता है कि किसी अधिनियम की विधि को लागू करने या उसमें कोई परिवर्तन न करने के लिए पारित किया गया। परन्तु न्यायालय को इस बारे में सावधान रहना चाहिये कि वह स्वयं को विधायिका के क्षेत्र से दूर रखे और कहीं ऐसी व्याख्या न करे जो उस कानून की परिभाषा से प्राप्त न हो पर न्यायालय सोच ले कि कदाचित् विधायिका का आशय यही रहा होगा। उदारहणार्थ-
(i) हरिप्रसाद बनाम दिविकर A.I.R. 1957 S.C. 121 में उच्चतम न्यायालय ने 'छंटनी' शब्द का अर्थ चालू उद्योग में बेशी कर्मचारी-गण जैसा पूर्व में विकसित किया गया था और जिसे विधायिका ने भी औद्योगिक विवाद (संशोधन तथा विविध) अधिनियम, 1956 पारित करके मान लिया था, स्वीकार कर लिया। इस प्रकार न्यायालय ने भी यह स्वीकार कर लिया कि पूर्व विधि की व्याख्या हेतु कानून पारित किया जाता है।
(ii) एक्सप्रेस-न्यूजपेपर्स लिमिटेड बनाम भारत संघ AIR 1958 SC 578 में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कहा कि विधान का इतिहास तथा इसी प्रकार के अन्य बाह्य स्रोतों को न्यायालय संदिग्धता समाप्त करने के उद्देश्य से देख सकता है।
(iii) पश्चिम बंगाल राज्य बनाम नृपेन्थ नाथ AIR 1966 5.C. 447 में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि किसी कानून का वास्तविक अर्थ जानने के लिए न्यायालय विधि की पूर्व अवस्था से परामर्श लेने के लिए स्वतन्त्र है।
4. विधायी इतिहास (Legislative History) - प्राचीन काल में किसी कानून का वास्तविक सन्दर्भ जानने के लिए कभी-कभी न्यायालय उस कानून के विधायी इतिहास को भी देखता था । परन्तु आधुनिक बहुमत विचारधारा कदाचित् यही है कि विधायी इतिहास को निर्वचन के बाह्य सहयोगी के रूप में नहीं लिया जा सकता। अतः सदनों के मंच पर किए गए विचार-विमर्श, प्रवर समिति (Select committees) की रिपोर्ट तथा उद्देश्यों व कारणों के कथन व्याख्या के बाह्य सहयोगी के रूप में अग्राह्य हैं। इस नियम का आधार कदाचित यही है कि विधायकों के मस्तिष्क में जो कुछ था उसे उनके द्वारा स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया जा चुका है तथा विधायक अपने व्यक्तिगत विचारों से न्यायालय को प्रभावित नहीं कर सकते। उदाहरणार्थ-
(i) ए० के गोपालन बनाम केरल राज्य A.I.R. 1950 S.C. 27 में उच्चतम न्यायाल ने एक भाषण को निर्वचन के सहयोगी के रूप में अमान्य घोषित करते हुए कहा कि किसी विधेयक के विचार-विमर्श के दौरान दिए गए भाषण से अधिक से अधिक भाषण देने वाले विधायक के व्यक्तिनिष्ठ आशय का संकेत मात्र मिलता है परन्तु इससे उस बिल को पारित करने वाले बहुमत के पृष्ठ में लगी मानसिक प्रक्रिया का कोई ज्ञान नहीं होता और न ही यह मान लेना युक्तियुक्त है कि उन सभी विधायकों के मस्तिष्क में मेल या संगति थी।
(ii) केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य A.I.R. 1973 S.C. 144 में मुख्य न्यायाधीश सीकरी ने कहा कि किसी संविधि पर विचार-विमर्श के दौरान विधायिका के सदस्यों द्वारा दिये गए भाषणों को उस कानून के किसी उपबन्ध की व्याख्या में सहयोगी के पक्ष में नहीं लिया जा सकता । उन्होंने उन प्रसिद्ध पंक्तियों को अनुमोदन के साथ उत्कधित किया कि वे जिन्होंने कुछ नहीं कहा कदाचित् एक दूसरे से भिन्न मत रखते हों। दूसरी ओर, न्यायाधीश शेलद, ग्रोवर, 'जगमोहन रेड्डी, पालेकर तथा मैथ्यू का विचार था कि संविधान सभा में दिये गये भाषण संविधान की व्याख्या के सन्दर्भ में संविधान निर्माताओं के वास्तविक आशय को जानने के लिये सदा देखे जा सकते हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह विचार केवल संविधान के निर्वचन तक ही सीमित है तथा अन्य कानूनों पर लागू नहीं होते।
(iii) के० पी० वर्गीज बनाम आयकर अधिकारी A.I.R. 1981 S.C. 1922 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह सच है कि कानूनी उपबन्धों की व्याख्या में किसी विधेयक के सदन के मंच पर हुए विचार- विर्मश के दौरान विधायकों के द्वारा दिए गए भाषणों व बयानों को ग्राह्य नहीं किया जा सकता। परन्तु बिल के संचालक के भाषण को निश्चित रूप से विधान द्वारा किस प्रकार की रिष्टि को समाप्त करने के लिये तथा विधान को अधिनियमित करने के पृष्ठ में उद्देश्य व ध्येय को जानने के लिये ध्यान में रखा जा सकता है। यह न केवल पश्चिमी देशों में बल्कि भारत में भी आधुनिक विधिशास्त्रियों के विचारों की प्रवृत्ति के अनुरूप है कि कानून का निर्वचन वस्तुतः उसका अर्थ जानने का प्रयास होने के कारण उन सभी से सहयोग लिया जा सकता है जो नीति स्वरूप सहयोग के लिए आवश्यक हों। अतः आयकर अधिनियम, 1961 में संशोधन के रूप में प्रस्तावित धारा 52 (2) के समय वित्त मन्त्री का भाषण बहुत सुसंगत है।
(iv) मिथिलेश कुमारी बनाम प्रेम बिहारी खरे AIR. 1989 SC 1447 में बेनामी संव्यवहार (प्रतिषेघ) अधिनियम, 1988 के कुछ उपबन्धों के निर्वचन का प्रश्न था। वादी ने इस घोषणा के लिए एक वाद दाखिल किया कि वह वादग्रस्त मकान का वास्तविक स्वामी था तथा वह संव्यवहार बेनामी था। विचारण न्यायालय द्वारा वाद पर डिक्री पारित कर दी गई जिसकी पुष्टि अपीलीय न्यायालय ने भी कर दी। उच्चतम न्यायालय में अपील के लंबन के दौरान बेनामी संव्यवहार (प्रतिषेध) अधिनियम, 1988 अस्तित्व में आ गया। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि इस परवर्ती घटना को ध्यान में रखा जाना चाहिये और चूँकि इस अधिनियम का प्रवर्तन भूतलक्षी है अतः इस वाद पर डिक्री पारित नहीं की जा सकती। न्यायालय ने बल देकर कहा कि जहाँ कोई विशिष्ट अधिनियमिति या संशोधन भारत के विधि कमीशन की सलाह पर किया गया हो तो कमीशन की उस रिपोर्ट को न्यायालय देख सकता है। इस रिपोर्ट को कितना महत्व दिया जाये यह उस मामले के तथ्य एवं परिस्थितियों पर निर्भर करता है। परन्तु न्यायालय अधिनियम की स्पष्ट एवं असंदिग्ध भाषा को प्रभावी बनाने के लिए बाध्य है। कमीशन की रिपोर्ट पर व्याख्या के बाह्य सहयोगी के रूप में विचार किया जा सकता है।
5. प्रशासकीय हस्तान्तरण-लेखन तथा वाणिज्यिक प्रथा-यद्यपि प्रशासकीय प्रथा को साधारणतः निर्वचन के सहयोगी के रूप में नहीं माना जाता तो भी कभी-कभी न्यायालय ने इसे महत्व दिया है । दूसरी ओर न्यायालय ने प्रसिद्ध हस्तान्तरण लेखकों की प्रथाओं को पर्याप्त सम्मान दिया है। वाणिज्यिक प्रथा को निर्वचन के महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में भी उचित मान्यता प्रदान की गई है। उदाहणार्थ-
(i) राज्य बनाम सज्जन सिंह A.I.R. 1953 पेप्सू 146 में पूप्सू उच्च न्यायालय ने इस आधार पर प्रशासकीय प्रथा को मानने से इन्कार कर दिया कि यदि इस प्रकार की प्रथा मूल रूप से गलत हो तो यह ध्यान देने योग्य नहीं है चाहे वह प्रथा बहुत समय से चली आ रही हो। इस आधार पर न्यायालय ने निर्णय दिया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 497 के अन्तर्गत अग्रिम जमानत स्वीकार नहीं की जा सकती ।
(ii) राज्य बनाम छदामी लाल AIR 1957 All. 639 में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की : धारा 208 का निर्वचन करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी विधि एवं प्रशासकीय प्रथा में विरोध होने पर विधि को ही मान्यता दी जायेगी।
6. पूर्ववर्ती विधान (Previous Legislation) - जहाँ एक ही विषय से सम्बन्धित विधियों का संहिताकरण किया गया है, या तत्सम्बन्धित न्यायिक दृष्टांतों और विधियों को एक अधिनियम का रूप प्रदान कर दिया गया है वहाँ व्याख्या-संरचना का नियम यह है कि संविधियों की प्रकट भाषा का ही अवलोकन किया जाय और उसके आधार पर ही अधिकारों की प्रस्थापना की जाय । न्यायालय का यह कार्य नहीं है कि एक संहिताबद्ध विधि की व्याख्या करने के प्रकरणों में उससे पूर्ववर्ती अनेक निर्णयों का सहारा न लिया जाय।
ऐसे प्रकरण भिन्न हो सकते हैं जहाँ न्यायालयों को इस बात को मानने का आधार हो कि संहिताकरण में पूर्ववर्ती विधि को परिवर्तित करने का आशय नहीं रहा है और यदि कोई सन्देह की स्थिति उत्पन्न होती है तो निष्कर्ष अपनाया जा सकता है कि विधानांग का आशय था कि प्रवर्तित विधि ज्यों की त्यों बनी रहे। ऐसे प्रसंगों में उत्तरवर्ती विधि में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ को जानने के लिये पूर्ववर्ती विधि के इतिहास को देखा जा सकता है।
गुलाबचन्द बनाम बुदी लाल A.I.R. 1955 मध्य भारत 15 में यह निष्कर्ष दिया गया था कि किसी संविधि की व्याख्या संरचना में सामान्य नियम यह है कि प्रयुक्त शब्दों का व्याकरणमूलक यह और साधारण अर्थ प्रतिष्ठित किया जाय। ऐसी संविधियों में, जिनमें कि विधि का संहिताकरण किया गया है, और भी आवश्यक है। किन्तु जहाँ केवल पूर्ववर्ती विधि के संशोधन का उद्देश्य रहा हो, और यह देखना हो कि यह प्रभाव में पूर्वलक्षी है, या नहीं, तो विधि की पूर्ववर्ती स्थिति का अवलोकन करना आवश्यक हो सकता है।
7. पूर्ववर्ती निर्णय (Previous Decision ) - ऐंग्लो- अमेरिकी वैध व्यवस्था का यह एक आधारभूत सिद्धान्त है कि पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टान्त पर अधिक बल दिया जाय। किन्तु केवल निर्णयांधार (Ratio Decidendi) को ही विधि का बल प्रदान किया जा सकता है।
न्यायाधीश जेम्स का अवलोकन है कि 'यदि संसद् के किसी अधिनियम में ठीक उसी भाषा का प्रयोग किया गया है जिसका कि उसी विषय पर पूर्ववर्ती अधिनियम में प्रयोग है, और उसी प्रयोजन से पारित किया गया है तो व्याख्या संरचना का सुरक्षित और सुविदित नियम यह है कि विधानांग ने उन्हीं शब्दों को जान-बूझकर प्रयोग किया है जिन पर पूर्ववर्ती सुविदित निर्णय भी उपलब्ध हैं, तो विधानांग ने उन शब्दों को उसी अर्थ में प्रयुक्त किया है जिसे पूर्ववर्ती निर्णयों ने निर्धारित कर रखा है।'
जहाँ किसी संविधि की भाषा संदिग्ध है, तो उसके निवारण के लिए सादृश्यमूलक भाषा के निराकरण हेतु दिये गये निर्णयों का सहारा लिया जा सकता है, किन्तु संविधि के विषय, उद्देश्य, और प्रयोजन में साम्य का होना नितान्त आवश्यक है।
किन्तु यदि भाषा स्पष्ट है और उसमें किसी संदिग्धता के लिये कोई स्थान नहीं है तो वहाँ न्यायालय की विधि की त्रुटियों को संशोधित नहीं करना चाहिये, या विधानांग के आशय के प्रतिकूल किये गये निर्णयों से विधान का प्रयोजन ही विफल हो जाएगा।
8. बाह्य उपकरणों का साक्ष्य (Evidence of Extrinsic Aids) – किसी अस्पष्ट या संदिग्ध विधान की व्याख्या करने में जो उपकरण सहायक हो सकते हैं वे सार्वजनिक सरकारी प्रलेख हैं, या राज्य-पत्र, या वैध लेखकों की कृतियाँ, शब्दकोष और विषय से सम्बन्धित सरकारी पदाधिकारियों की सम्मतियाँ हैं ।
न्यायालय की राय है कि, 'जब कभी किसी विधि-न्यायालय में यह प्रश्न उठता है कि संविधि का अस्तित्व है या नहीं, या यह कि किस समय किसी संविधि को प्रभावकारी रूप मिला था, या यह कि किसी संविधि के संक्षिप्त उपबन्ध क्या थे, तो उन न्यायाधीशों को, जिन्हें कि इस बात का निर्णय करना रहता है, यह अधिकार है कि वे ऐसे किसी भी साधन का सहारा ले सकते हैं, जिनसे कि न्यायिक बुद्धि को इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर मिल सकता है।
9. साम्य विषय-वस्तु अनुरूपी संविधियाँ (Statutes in 'Pari Materia') - ऐसी भी संविधियाँ उपलब्ध हो सकती हैं जो उसी विषय-वस्तु से सम्बन्धित हो जो व्याख्या के लिये विचारधीन हैं। उनका सम्बन्ध उन्हीं मनुष्यों या वस्तुओं से भी हो सकता है। प्रत्येक शब्द वाक्यांश और वाक्य का अर्थ सामान्यतः वही लेना है जो अधिनियम के प्रयोजन के अनुकूल हो । सन्देह नहीं कि संविधि की सम्पूर्ण भाषा को विधानांग का आशय निर्धारित करने में अत्यधिक महत्वपूर्ण • सहायक उपकरण के रूप में माना जा सकता है, किन्तु विषय-वस्तु से मिलते-जुलते अन्य बाह्य उपकरण के प्रकरण में मान्य हैं। ये बाह्य उपकरण सन्दर्भ के क्षेत्र को विस्तारित कर देते हैं क्योंकि उसी संविधि के अन्य उपबन्ध ही उसमें आकर नहीं जुड़ते, अपितु उसकी प्रस्तावना, विधि की वर्तमान स्थिति, उसी विषय वस्तु पर अन्य संविधियाँ और वह रिष्टि जिसे संविधि दूर करने के लिये आशयित है, आदि सभी जुड़ जाते हैं।
10. मौखिक या लिपिक भूलें (Verbal or Clerical Errors) – यदि कोई मौखिक या लेख्य भूल हो गई है तो विधानांग के आशय को प्रभावकारी बनाने के लिये उसे सुधारा जा सकता है ।
'यदि केवल लेख्य भूल है तो न्यायालय को यह अधिकार है कि वह उसे सुधार दे, भले ही विधान-सभा के किसी ऐसे अधिनियम में, जब वह लिखित हुआ था कोई स्पष्ट प्रयुक्तता आ गई हो । किन्तु यदि भूल स्पष्ट और प्रकट है तो उसे न्यायालय द्वारा स्वयं सुधारा जा सकता है। इस शक्ति में कोई संदेह नहीं है, किन्तु उसका प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब भूल इतनी स्पष्ट और प्रकट है कि अधिनियम का निरीक्षण करने पर, सभी सन्देहों से परे, ऐसा प्रतीत हो कि उस सुधार से संविधि में जो अयुक्तता आ गई है, वह दूर हो जाएगी और विधानांग का आशय स्पष्ट हो जायेगा, तभी इस शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।'
11. सामान्य वाक्य खंडों के अधिनियम के उपबन्ध (Provisions in the General Clauses Act) - लिंग और वचन (Gender and Number) – 1897 के सामान्य वाक्यखण्डों के अधिनियम की धारा 13 में उपबन्धित है कि केन्द्र के सभी अधिनियमों और विनियमों में जब तक अन्यथा रूप में विशिष्टता किसी अधिनियम या विनियम में उपबन्धित न हो,
(i) पुरुषवाचक शब्दों का अर्थ स्त्री-लिंग के शब्दों का भी बोध देगा, और (ii) एकवचन शब्द का प्रयोग बहुवचन या बहुवचन का प्रयोग एकवचन के रूप में भी माना जायेगा।
जबकि विधानांग के आशय को स्पष्टतः प्रभावकारी बनाने के लिए आवश्यक हो गया है, एकवचन में प्रयुक्त शब्दों का बहुवचन या इसका प्रतिलोम प्रयोग किया जा सकता है।
'व्यक्ति' (Person) शब्द का तात्पर्य स्त्री-पुरुष दोनों से है। अभिव्यक्तियों के अर्थ (Meaning of Expressions) - कुछ शब्दों या अभिव्यक्तियों को स्पष्ट करने के आशय से कुछ शब्द जैसे 'तात्पर्य है कि' (Means) का प्रयोग होता है, तो कुछ भी को इससे प्रकट होता है कि ठोस परिभाषा कठोर और संयुक्त है, और उस परिभाषा में जो निर्धारित कर दिया गया है उससे भिन्न उसका कोई अन्य अर्थ नहीं लिया जा सकता।
'परिलक्षित है' (Denotes) शब्द से प्रकट होता है कि विधानांग ने उस शब्द का कोई अत्यधिक कठोर अर्थ प्रतिपादित नहीं करना चाहा है, अपितु केवल संकेत देना चाहा है कि शब्द का अर्थ हो सकता है।
'ऐसा उचित प्रतीत होता है कि' (Deemed to be) का केवल संभाव्य अर्थ इतना है कि यथार्थ में कोई ऐसी चीज नहीं है, किन्तु अधिनियम निर्धारित करता है कि ऐसा व्यवहार किया जाय कि वह उचित प्रतीत होने लगे।
'सम्मिलित है' (Includes) या 'सम्मिलित माना जायेगा' (shall be deemed to be included) शब्दों का प्रयोग बहुधा संविधि में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ-विस्तार के लिये होता है। ऐसे शब्दों का जब प्रयोग किया जाता है तब यह समझना चाहिये कि उस शब्द को केवल उसके स्वाभाविक अर्थ तक सीमित नहीं रहना है, अपितु उन वस्तुओं को भी उसमें शामिल कर लिया जायेगा जिसे संविधि में सम्मिलित कर लेने का आशय व्यक्त किया गया है।
इसी प्रकार से [आई एल० आर० (1961) मध्य प्रदेश, 67] में 'सम्मिलित है, (includes) और एस० एम० जेम्स बनाम डा० अब्दुल खैर [ ए० आई० आर० 1961 पटना 242] में 'सम्मिलित करते हुये' (Including) शब्दों की व्याख्या की गई है। इन दोनों वादों में शब्द के सामान्य अर्थ के साथ ही वस्तु जोड़ लेने की परिपाटी का समर्थन किया गया है जिसे लेना संविधि में आशयित है
नियुक्ति प्रदान करने की शक्ति (Power to Appoint) - सामान्य उपखण्ड अधिनियम 1897(General Clauses Act) में यह भी उपबन्धित किया गया है कि जहाँ किसी केन्द्रीय अधिनियम या विनियम द्वारा कोई नियुक्ति प्रदान करने की शक्ति दी गई है, वहाँ, जब तक अन्यथा रूप आशय प्रतीत न होता हो, जिसे प्राधिकारी में नियुक्ति करने की शक्ति है, अपने द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति को, या उस शक्ति के प्रयोग के अधीन किसी अन्य माध्यम द्वारा नियुक्त व्यक्ति को निलम्बित या बरखास्त करने की भी शक्ति है ।
12. स्थानीय अधिनियम-स्मरणीय है कि किसी अधिनियम की व्याख्या के मामले में जो किसी राज्य में लागू है, उच्चतम न्यायालय सामान्यतः उस राज्य के उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को बहुत महत्व देती है विशेष रूप से जबकि उस उच्च न्यायालय ने उस पर पूर्णतः विचार कर लिया है क्योंकि वह न्यायालय पर्याप्त रूप से वहां के विभिन्न स्थानीय अधिनियमों से परिचित हैं। ऐसी राय उच्चतम न्यायालय ने गुजरात राज्य बनाम जिना भाई रनछोड़ जी दर्जी, ए० आई० आर० (1972) एस० सी, 999 में दी है।
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