सोमवार, 12 जून 2023

हितप्रद अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं?

हितप्रद अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से समझाइये।

What do you mean by Beneficial Construction? Explain with the help of leading cases.

उत्तर- जब किसी संविधि में प्रयोग किये गए शब्दों का प्राकृतिक अर्थ स्पष्ट रूप से कुछ अवस्थाओं को छोड़ देता है तो शब्दों को खींचतान कर उन अवस्थाओं को उसमें शामिल नहीं किया जा सकता । परन्तु यदि शब्दों के प्राकृतिक अर्थ उस कानून के उद्देश्यों को प्राप्त न कर सकें तो उनको विस्तृत अर्थ दिया जा सकता है बशर्ते कि यदि वे शब्द यह विस्तृत अर्थ लेने के योग्य हों। यदि किसी विधान जिसका साधारण उद्देश्य किसी विशिष्ट कोटि के व्यक्तियों को लाभ पहुँचाना है, में कोई उपबन्ध अस्पष्ट है जिससे उसके दो अर्थ निकलते हों जिनमें से एक उस हित की रक्षा करेगा और दूसरा उसे नष्ट करेगा तो वह अर्थ जो हित की रक्षा करे ही ठीक अर्थ है। छोड़ी गई अवस्थाओं की पूर्ति न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती। परन्तु जहाँ न्यायालय को एक विस्तृत अर्थ, जो उसकी राय में विधायिका के उद्देश्य को अधिक अच्छी प्रकार पूर्ण करता है तथा.. एक सीमित अर्थ जो उसे अधिक अच्छी प्रकार नहीं या बिल्कुल पूर्ण नहीं करता है इन दोनों में से चुनना हो, तो न्यायालय पहले अर्थ को ही चुनेगा। वास्तव में हितप्रद अर्थान्वयन एक नियम होने की बजाय एक प्रवृति है । उदाहरणार्थ-

(i) कानाइलाल बनाम परमनिधि A.I.R. 1957 SC 907 में उत्तरदाता ने अपीलाथी, जो एक ठेका किरायेदार था, के विरुद्ध बेदखली की डिक्री निष्पादित करना चाहा। अपीलार्थी का तर्क था कि कलकत्ता ठेका किरायेदारी अधिनियम, 1949 (जिसे पश्चिम बंगाल अधिनियम, 1953, द्वारा संधोधित किया गया) की धारा 5 (1) के अन्तर्गत निष्पादन की कार्यवाही सिविल न्यायालय द्वारा नहीं बल्कि केवल नियन्त्रक द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है और चूँकि यह एक हितप्रद विधान है अतः न्यायालय का कर्त्तव्य है कि अधिनियम का निर्वचन इस प्रकार न करें जिससे ठेका किरायेदार के हितों की हानि हो। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जब तात्विक शब्दों का अर्थान्वयन दो प्रकार से हो सकता हो जिनमें से एक कानून के उद्देश्य के विरुद्ध हो जबकि दूसरा उद्देश्य को पूर्ण करे तो दूसरा अर्थ ही ठीक है। परन्तु यदि प्रयुक्त शब्दों का एक ही अर्थ निकलता हो तो वही विधायिका का आशय माना जाना चाहिये। यह निर्णीत किया गया कि उपबन्ध उन स्थितियों पर लागू नहीं होता जिनमें पूर्व में ही भू-स्वामी ने बेदखली की डिक्री प्राप्त कर ली हो।

(ii) मनोहर लाल बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1961 SC 418 में पंजाब व्यापार कर्मचारी अधिनियम, 1949 की संवैधनिकता का प्रश्न था। इस धारा के अनुसार वे सभी दुकानें और स्थापनाएँ जिन पर अधिनियम लागू होता है, सप्ताह में एक दिन बन्द रहेंगी। अपीलार्थी का तर्क था कि यह संविधान के अनु० 19 (1) (छ) के प्रतिकूल है। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह उस अनुच्छेद के प्रतिकूल नहीं है क्योंकि यह कर्मचारी के स्वास्थ्य तथा दक्षता का ध्यान रखती है और इसलिए दुकानदार के मूलभूत अधिकारों पर युक्तियुक्त पाबन्दी है यदि व्यापार में दुकानदार तथा उसके परिवार के सदस्य ही सम्मिलित हों तो भी यही सिद्धान्त रहेगा। समान आधारों पर कर्मचारीयों के कार्यों की अवधि एवं दुकानों तथा स्थापनाओं के खुलने तथा बन्द होने का निश्चित समय भी अनु० 19 (1) (छः) के अन्तर्गत व्यापार और वाणिज्य के मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं है और इसलिए असंवैधानिकता नहीं है। रामधन दास बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1961 एस० सी० 1559

(ii) जीवा भाई बनाम छगन A.I.R. 1961 SC 1491 में बम्बई किरायेदारी तथा कृषि भूमि अधिनियम, 1948 की धारा 34 में 1952 के संशोधित अधिनियम द्वारा एक नई उप धारा 2(क) जोड़ दी गई। अधिनियम की धारा 34 (1) के साथ पढ़कर नई उपधारा 2 (क) की व्याख्या का प्रश्न न्यायालय के समक्ष आया। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यद्यपि नये उपबन्ध द्वारा भू-स्वामी के निहित अधिकार में बाधा नहीं डाली गई है परन्तु यह निहित अधिकार भू-स्वामी में तब तक उत्पन्न नहीं होते जब तक नोटिस की अवधि समाप्त न हो गई हो। अतः संशोधी अधिनियम द्वारा नोटिसों पर बेदखली के सभी वाद जिनकी अवधि समाप्त होने से पूर्व संशोधी अधिनियम प्रभावी हुआ, प्रभावित होंगे। उच्चतम न्यायालय ने ऐसा निर्णीत करते हुए स्पष्ट किया कि संशोधी अधिनियम किरायेदारों के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने का हितप्रद विधान होने के कारण धारा 34 (2क) के अर्थ की संदिग्धता को किरायेदारों के पक्ष में ही दूर किया जाना उचित है।

(iii) यू० उनिचोयी बनाम केरल राज्य A.I.R. 1962 SC 12 में प्रश्न यह था कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 जिसके अन्तर्गत राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी उद्योग में न्यूनतम मजदूरी निर्धारित कर सकती है, संविधान के अनु० 19 (1) (छ) के प्रतिकूल है क्योंकि अधिनियम में न्यूनतम मजदूरी न ही परिभाषित की गई है और न ही नियोक्ता की मजदूरी देने की क्षमता को ध्यान में रखा गया है। अधिनियम को संविधान के अनुकूल बताते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अधिनियम एक हितप्रद विधान होने के कारण कर्मचारी के पक्ष में ही निर्वचित किया जाएगा। एक अविकसित देश में जहाँ बेकारी एक बहुत बड़ी समस्या हो यह असम्भावित नहीं है कि लोग लगभग भुखमरी के वेतन पर भी कार्य करने को राजी हो जाएँगे, पर ऐसा होने देना उचित नहीं है।

(iv) एस० के० वर्मा बनाम औद्योगिक अधिकरण-सहित उद्योग न्यायालय A. I.R. 1981 SC 422 में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि कल्याण कानूनों को आवश्यक रुप में विस्तृत अर्थ दिया जाना चाहिए। जहाँ किसी विधान को कुछ प्रकार की रिष्टियों से मुक्ति दिलाने के लिए पारित किया गया हो तो न्यायालय को व्युत्पत्ति विषयक भ्रमण करके अतिक्रमण नहीं करना चाहिये। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 जैसा 1964 के अधिनियम 36 के द्वारा संशोधित किया गया है, की धारा 25 (ख) (2) में यह कहीं पर नहीं कहा गया है कि कर्मचारी पूर्ण बारह माह की अवधि तक नियोक्ता के नियोजन में सेवा के लिए रहा हो। सच तो यह है कि उसे नियोजन में रहना आवश्यक नहीं है। इस उपबन्ध का स्पष्ट अर्थ यही है कि वह कर्मचारी जिसने बारह माह की अवधि में वास्तव में कम से कम दो सौ चालीस दिन काम किया हो एक वर्ष की अवधि के लिए निरन्तर सेवा में मान लिया जायेगा।

(v) शीला बारसे बनाम भारत संघ A.I.R. 1986 SC 1773 जो एक लोक हित याचिका थी में समाजसेवी याची अपीलार्थी ने याचिका दाखिल कर विभिन्न जेलों में बन्द सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों को रिहा कर देने की प्रार्थना की। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनु० 39 (च) के अनुसार राज्य अपनी नीति का विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से बालकों को स्वतन्त्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएँ दी जाएं और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए। भारत में नागालैण्ड राज्य को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में बाल . अधिनियम हैं। यह भी सत्य है कि इनमें से कुछ अधिनियम, 1976 में संविधान में संशोधन के · द्वारा 'खण्ड (च) को अनु० 39 में जोड़े जाने के पूर्व से ही हैं। यद्यपि इन अधिनियमों का निर्माण हो चुका है पर कुछ राज्यों में इन्हें अभी भी, अस्तित्व में नहीं लाया गया है। यह विधान एक संवैधानिक दायित्व को पूर्ण करने के लिए है और यह एक हितप्रद विधान है। इनके अभी तक लागू न किए जाने का कोई औचित्य नहीं है। किस कानून को कब से लागू किया जाए यह देखना साधारणतः राज्य सरकार का काम है पर आधुनिक सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय यह उचित समझता है कि प्रत्येक राज्य इन बाल अधिनियमों को तुरन्त प्रभाव से लागू करे तथा उनमें वर्णित उपबन्धों के आधार पर प्रशासन चलाए।

(vi) ऑल इण्डिया रिपोर्टर कर्मचारी संघ बनाम ऑल इण्डिया रिपोर्टर लिमिटेड A.I.R. 1988 SC 1325 एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसमें उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा शर्ते) और विविध प्रावधान अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत विधि रिपोर्ट समाचार पत्र हैं और इसलिए विधि रिपोर्ट के उत्पादन अथवा प्रकाशन में कार्यरत कर्मचारी पालेकर अधिनिर्णय के लाभ प्राप्ति के अधिकारी हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विधि रिपोर्टों में न्यायिक निर्णय वर्णित होते हैं जो लोक महत्व के हैं। विधि रिपोर्टों की विषय-वस्तु भी उनके ग्राहकों एवं पाठकों के लिए समाचार है क्योंकि अन्य विवरणों के साथ-साथ उनमें विशिष्ट विषयों पर देश में प्रचलित विधि की नवीनतम अवस्था की सूचना है। विधि रिपोर्टों में प्रकाशित न्यायिक निर्णय प्रकाशन के कुछ समय पश्चात् सम्भवतः समाचार का रूप खो चुके हों और पुस्तकें बन चुकी हों, परन्तु जब वे ग्राहकों एवं पाठकों को प्राप्त होती हैं तो उनकी प्रकृति समाचार की कृति के रूप में ही है। 1955 का अधिनियम एक हितप्रद विधान है जिसको पारित करने का उद्देश्य समाचार उद्यमों में कार्यरत कर्मचारियों की सेवा शर्तों में सुधार करना है और इसलिए उस समय भी जब इस अधिनियम के उपबन्धों के अर्थान्वयन में दो विचार हों तो जिससे उद्देश्य की पूर्ति होती हो, वही स्वीकार्य है

(vii) श्रीमती शशिगुप्ता बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम AIR 1995 SC 1367 में यह निर्धारित किया गया कि भारतीय जीवन बीमा अधिनियम, 1956 के उपबन्धों का निर्वचन पालिसी धारक के हित में किया जाना चाहिये।

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