सोमवार, 12 जून 2023

संविधान की व्याख्या सम्बन्धी निम्नलिखित सूत्रों पर टिप्पणी

प्रश्न संविधान की व्याख्या सम्बन्धी निम्नलिखित सूत्रों पर टिप्पणी लिखिये। Write short notes on the Doctrines relating to interpretation of Constitution.

उत्तर-1. सार तत्व का सिद्धान्त (Doctrine of Pith and Substance) – यह देखने के लिए कि क्या कोई विशेष विधि उस विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार में है जिसने इनको पारित किया है, न्यायालय को यह विचार करना चाहिये कि विधायन की सच्ची विषय-वस्तु "सार तत्व या वास्तविक प्रकृति और स्वरूप" क्या है और क्या ऐसी विषय-वस्तु उस विधान मण्डल से सम्बन्धित विधायी सूची में दिये गये शीर्षकों में निहित है। वास्तव में विधायन की सच्ची विषय-वस्तु को तय करने के लिये विधान-मण्डल द्वारा इसको दिया गया नाम निर्णायक नहीं है। यदि किसी विधि का 'तत्व एवं सार' किसी विशेष विधान-मण्डल के विधान क्षेत्र में पड़ता है। जिसके द्वारा वह निर्मित की गई है, तो ऐसी विधि की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती भले ही वह अनुसागिक रूप से किसी अन्य विधान-मण्डल के विधायन क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत किसी शीर्षक पर पड़ती है। इसे 'तत्व एवं सार' का सिद्धान्त कहते हैं। दूसरे शब्दों में जब एक विधान-मण्डल द्वारा निर्मित विधि दूसरे विधान-मण्डल के क्षेत्र में अतिक्रमण करती है तो यह जानने के लिये कि वह विधि उस विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आती है या नहीं, जिसने उसे निर्मित किया है, न्यायालय सार एवं तत्व का सिद्धान्त लागू करता है। उदाहरणार्थ-

(i) ए० एम० कृष्ण बनाम मद्रास राज्य AIR. 1975 S.C. 297 में कहा गया है कि जब किसी अधिनियम का कोई प्रावधान आनुषांषिक रूप में (Incidentally) दूसरे विधान-मण्डल के विधान विषयों पर अतिक्रमण करता है तो शाब्दिक व्याख्या के आधार पर ऐसा प्रावधान अवैध होगा। किन्तु यदि विधान सारवान रूप से या विधान का वास्तविक उद्देश्य ऐसे विषय से सम्बन्धित है जिस पर वह विधान मण्डल कानून बनाने में सक्षम है, तो उसे वैध घोषित किया जायेगा; भले ही वह दूसरे विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार में आने वाले विषय पर अनुषागिक रूप से अतिक्रमण करता हो । उस विधान की वास्तविक प्रकृति और स्वरूप का पता लगाने के लिये पूरे अधिनियम पर विचार किया जायेगा और उसके उद्देश्य, विस्तार और उसके प्रावधान के प्रभाव की जाँच की जायेगी।

(ii) बम्बई राज्य बनाम बाल तारा A.I.R. 1951 S.C. 368 में बम्बई विधान मण्डल ने बम्बई मद्य निषेध अधिनियम पारित किया जिसके द्वारा राज्य में मादक द्रव्यों को खरीदने और रखने की मनाही कर दी गई थी। इस अधिनियम की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती गई थी कि वह संघ-सूची में वर्णित विषय "मादक द्रव्यों के आयात-निर्यात" का अतिक्रमण करता है क्योंकि मादक द्रव्यों के क्रय-विक्रय और उपयोग को रोकने से उसके आयात-निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय देते हुए कहा कि चूँकि अधिनियम का मुख्य उद्देश्य राज्य सूची के विषय से सम्बन्धित था, संघ-सूची के विषय से नहीं इसलिये अधिनियम पूर्णत: संवैधानिक है ।

(iii) प्रफुल्ल कुमार बनाम बैंक ऑफ खुलना AIR. 1947 P.C. 64 में प्रिवी कौंसिल ने 'सार-तत्व' के सिद्धान्त को लागू किया। प्रस्तुत मामले में बंगाल विधान मण्डल द्वारा ऋण का व्यापार नियन्त्रण करने के लिये बंगाल मनीलेण्डर्स ऐक्ट, 1940 पारित किया। इस अधिनियम द्वारा बंगाल प्रान्त में ऋण पर ब्याज दर की सीमा निश्चित कर दी ताकि ऋणदाता संविदा करके भी ऋणी से अधिक ब्याज न वसूल कर सकें। वादी ऋणदाताओं ने विवादित अधिनियम को इस आधार पर चुनौती दी कि यह बंगाल विधान मण्डल की विधायन-शक्ति से बाहर है, क्योंकि यह संघ सूची में वर्णित प्रविष्टि "बचत पत्र" का अतिक्रमण करती है, जिस पर केवल केन्द्र को ही कानून बनाने का अधिकार है। प्रिवी कौंसिल ने निर्णय देते हुए कहा कि विवादित अधिनियम बंगाल विधान मण्डल की विधायी शक्ति के अधीन है; क्योंकि उसका सार तत्व या प्रमुख उद्देश्य सूची के विषय ऋण और ऋणदाता से सम्बन्ध रखता है, भले ही यह अनुषांगिक रूप में संघ-सूची के विषय 'वचन-पत्र' का अतिक्रमण करता है। अतः यह अधिनियम संवैधानिक है।

2. रंगीय (आभासी या छम्) विधायन का सिद्धान्त (Doctrine of Colourable Legislation) - संघ और राज्य विधान मण्डल दोनों संविधान से अपनी विधायी शक्ति प्राप्त करते हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में विधि-निर्माण के लिए स्वतन्त्र हैं। छद्म विधायन का सिद्धान्त उन अवस्थाओं में लागू होता है जिनमें व्यवस्थापिका अपनी विधायी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपनी विधायी शक्ति सीमा से बाहर कार्य करती है। इस प्रकार का अतिक्रमण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी प्रकार का हो सकता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि यद्यपि विधायिका किसी कानून को बनाने में ऊपरी तौर से अपनी शक्तियों के भीतर कार्य करती है तथापि सारतः या वास्तव में वह संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करती है। ऐसे परोक्ष विधायन को ही छदम् या रंगनीय विधायन कहते हैं। ऐसे मामलों में अधिनियम का सार महत्वपूर्ण होता है उसका बाह्य रूप या आकृति (Form) नहीं। यदि किसी विधान की विषय-वस्तु सारतः उस विधान मण्डल की शक्ति के बाहर है तो उसका बाह्य रूप उसे न्यायालय द्वारा अमान्य घोषित करने से नहीं बचा सकेगा। अतः विधान मण्डल कोई अप्रत्यक्ष या परोक्ष तरीका अपनाकर संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता (के० सी० जी० नारायण देव ब० उड़ीसा राज्य A.I.R. 1953 S.C. 375)

जस्टिस श्रीकृष्ण अय्यर के अनुसार, "छद्भ्यता (Colourability) से तात्पर्य अक्षमता (Incompetemcy) से है। कोई वस्तु छद्मय तब होती है जब वह जिस रूप में प्रकट की जाती है वास्तव में उस रूप में नहीं होती। "

कामेश्वर सिंह ब० बिहार राज्य A. I.R.1952 S.C. 255 में बिहार लैन्ड्स रिफोर्म्स एक्ट 1950 की वैधता को चुनौती दी गई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने छम् विधायन सिद्धान्त के आधार पर अवैध घोषित कर दिया क्योंकि इसमें मुआवजे के निर्धारण के लिये वास्तव में कोई आधार निर्धारित नहीं किया गया था, यद्यपि ऊपरी तौर से ऐसा करने का प्रयास किया गया था। वास्तव में अधिनियम में दी गई व्यवस्था के फलस्वरूप जमीदारों को कोई मुआवजा नहीं मिलता था।

3. राज्य क्षेत्रीय सम्बन्ध का सिद्धान्त (Doctrine of Territorial Nexus) – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 245 (1) के अनुसार इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संसद भारत के सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकेगी और किसी राज्य का विधान-मंडल सम्पूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकेगा। अनुच्छेद 245 (2) में यह वर्णित है कि संसद द्वारा बनाई गई कोई विधि इस आधार पर अवैध नहीं समझी जाएगी कि उसका राज्यक्षेत्रातीत लागू होगा। अतः संविधान राज्यक्षेत्रातीत विधि बनाने की शक्ति केवल संसद को प्रदान करता है राज्य विधान-मंडल को नहीं, और इसलिए राज्य विधान-मंडल के द्वारा अधिनियमित किसी भी विधि पर आक्षेप किया जा सकता है जब तक कि वह राज्यक्षेत्रीय सम्बन्ध के आधार पर संरक्षित न हो। यदि किसी राज्य विधि का उस विधि की विषय-वस्तु के साथ पर्याप्त सम्बन्ध है तो वह राज्य विधि वैध है चाहे उसका राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन हो। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि राज्य विधान-मंडल की राज्यक्षेत्रातीत विधि बनाने की अधिकारिता है, चाहे उस विधि की विषय-वस्तु उस राज्य की क्षेत्रीय सीमा के भीतर अवस्थित न हो, बशर्ते कि इन दोनों के बीच पर्याप्त सम्बन्ध विद्यमान हो। भारत में राज्य क्षेत्रीय सम्बन्ध का सिद्धान्त कर आरोपण के मामलों में सर्वाधिक लागू होता है। उदाहरणार्थ-

(i) मुम्बई राज्य बनाम आर० एस० डी० चमर बागवाला A.I.R. 1957 SC 689 में एक समाचार पत्र जिसका मुद्रण और प्रकाशन बंगलौर से होता था, मुम्बई राज्य में भी पर्याप्त प्रचलित था। इस समाचार पत्र के द्वारा उत्तरदाता पुरस्कार प्रतियोगिताओं का संचालन किया करता था जिसके लिए मुम्बई राज्य में स्थित अभिकर्ताओं और आगारों के द्वारा लोगों से प्रवेश-पत्र और फीस ली जाती थी जिसे बंगलौर भेजा जाता था। मुम्बई विधान-मंडल ने 1952 के अधिनियम को अधिनियमित कर उसके अन्तर्गत पुरस्कार प्रतियोगिताओं के व्यवसाय पर कर लगा दिया। उत्तरदाता ने यह तर्क दिया कि इस कर का भुगतान करने के लिए वह बाध्य नहीं था क्योंकि यह अधिनियम राज्यक्षेत्रातीत होने के कारण अवैध था। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि जब किसी अधिनियम की वैधता का प्रश्न उठाया जाता है तो न्यायालय के द्वारा प्रथम योग्य कार्य यह है कि वह यह परीक्षण करे कि वह विधि जिस विधायिका ने बनाई थी उसे वह विधि बनाने का अधिकार था क्योंकि अपनी विधायी शक्तियों के अन्तर्गत एक राज्य विधान-मंडल को स्वयं के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति है, और राज्यक्षेत्रीय सम्बन्ध के अभाव में ऐसी कोई विधि नहीं बना सकता जिसका प्रभाव राज्य से परे पड़े। राज्यक्षेत्रीय सम्बन्ध की पर्याप्तता के लिए न्यायालय ने दो बातों पर जोर दिया— (i) सम्बन्ध वास्तविक होना चाहिए, भ्रांतिपूर्ण नहीं, और (ii) आरोपित किया जाने वाला दायित्व उस सम्बन्ध के संगत होना चाहिए। यह निर्धारित किया गया कि वे सारे कार्य जो उस प्रतियोगिता से साधारणतः आशा किए जाने योग्य राज्य में किए जाते थे, और पर्याप्त राज्यक्षेत्रीय सम्बन्ध होने के कारण मुम्बई विधान-मंडल उत्तरदाता, जो राज्य के बाहर रहता था, पर कर लगाने के लिए सक्षम था।

(ii) टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी बनाम बिहार राज्य AIR 1998 SC 452 में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राज्य क्षेत्रीय सम्बन्ध का सिद्धान्त कर आरोपित नहीं करता, पर जब भी किसी विधायिका द्वारा पारित किसी विधि के अन्तर्गत कर आरोपित किया जाता है, तो किसी विशिष्ट मामले में इसे किन परिस्थितियों में लागू किया जाएगा यह केवल उसी का संकेत देती है। कराधायक राज्य में माल का उत्पादन या निर्माण, इस सिद्धान्त के लागू होने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यह स्पष्ट है क्योंकि किसी माल के विक्रय में सम्पत्ति माल में हस्तांतरित होती है। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय ने राज्य क्षेत्रीय सम्बन्ध के सिद्धान्त को विक्रय कर के मामलों पर भी लागू कर दिया।

(iii) बिहार राज्य बनाम चारूशीला दास A.I.R. 1959 SC 1002 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी राज्य जहां भी धर्मार्थ प्रतिष्ठान स्थित है, उस राज्य के विधान-मंडल को विधि बनाने की शक्ति है, और यह शक्ति तब भी बनी रहती है जब उस प्रतिष्ठान की सम्पत्ति का बड़ा या छोटा भाग किसी अन्य राज्य में स्थित हो। इसका स्वाभाविक परिणाम यह है कि इस विधि को अधिनियमित करने वाला राज्य विधान-मंडल को न्यासियों और उनके सेवकों और अभिकर्त्ताओं, जो न्याय के प्रशासन के लिए उस राज्य में निवास करते हैं, के लिए भी विधि बनाने के लिए सक्षम हैं।

4. दखलकृत क्षेत्र का सिद्धान्त (Doctrine of Occupied Field) – दखलकृत क्षेत्र के सिद्धान्त का अर्थ यह है कि जब संघ या केन्द्रीय विधायिका किसी विशिष्ट विषय पर विधि बनाती है और इस प्रकार उस क्षेत्र पर दखल कर लेती है तो राज्य विधायिकाओं का उस क्षेत्र पर विधि निर्माण का कोई अधिकार नहीं रहता। फिर भी यदि राज्य विधायिका उस क्षेत्र पर कोई विधि बनाती है तो राज्य द्वारा अधिनियमित विधि उस सीमा तक असंवैधानिक होगी। भारत में क्रमशः संघ सूची और राज्य सूची के रूप में संघ विधायिका और राज्य विधायिका को विधि निर्माण की शक्ति है। इस विषय पर संविधान का अनुच्छेद 254 (1) यह स्पष्ट करता है कि यदि किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि का कोई उपबन्ध संसद द्वारा बनाई गई विधि के, जिसे अधिनियमित करने के लिए संसद सक्षम है, किसी उपबंध के या समवर्ती सूची में वर्णित किसी विषय के सम्बन्ध में विद्यमान विधि के किसी उपबंध के विरुद्ध है तो खंड (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, संसद द्वारा बनाई गई विधि, चाहे वह ऐसे राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि से पहले या उसके बाद में पारित की गई हो, यह विद्यमान विधि, अभिभावी होगी और उस राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि उस विरोध की मात्रा तक शून्य होगी।

अनुच्छेद 254 (2) के अनुसार जहाँ राज्य के विधान मंडल द्वारा समवर्ती सूची में वर्णित किसी विषय के सम्बन्ध में बनाई गई विधि में कोई ऐसा उपबंध शामिल है जो संसद द्वारा पहले बनाई गई विधि के या उस विषय के सम्बन्ध में किसी विद्यमान विधि के उपबंधों के विरुद्ध है तो ऐसे राज्य के विधान मंडल द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया है और उस पर उसकी अनुमति मिल गई है तो वह विधि उस राज्य में अभिभावी होगी- परन्तु इस खंड की कोई बात संसद को उसी विषय के सम्बन्ध में कोई विधि जिसके अन्तर्गत ऐसी विधि है, जो राज्य के विधान-मंडल द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि का परिवर्द्धन, संशोधन, परिवर्तन या निरसन करती है, किसी भी समय अधिनियमित करने से वर्जित नहीं करेगी।

5. भविष्यलक्षी प्रत्यादेश (Doctrine of Prospective Overruling) - आई० सी० गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1967 SC 1643 में उच्चतम न्यायालय ने भविष्यलक्षी प्रत्यादेश का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। न्यायालय का विचार था कि संसद को मूल अधिकारों में संशोधन का कोई अधिकार नहीं है। मुख्य न्यायमूर्ति सुब्बाराव ने यह प्रश्न किए कि जब संसद् एकमत होते हुए भी अपनी साधारण विधायी प्रक्रिया के अन्तर्गत एक विधेयक अधिनियमित कर मूल अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकती, तो वह केवल दो-तिहाई बहुमत से किसी मूल अधिकार को कैसे निराकृत कर सकती है, और जब संविधान के कम महत्वपूर्ण अनुच्छेदों के संशोधन को संघ के राज्यों के बहुमत का अनुसमर्थन आवश्यक है, तो इस आवश्यकता को बगैर पूरा किए हुए एक मूल अधिकार को कैसे संशोधित किया जा सकता है। विद्वान न्यायाधीश का विचार था कि अनुच्छेद 368 ने संविधान के संशोधन की केवल प्रक्रिया प्रतिपादित की है, और संशोधन की कोई शक्ति प्रदान नहीं की है, जिसे केवल संसद की अवशिष्ट शक्ति के भीतर अनुच्छेद 248 में प्रदान किया गया है। उनका यह भी मत था कि अनुच्छेद 13 (2) में 'विधि' शब्द का अर्थ साधारण विधि और संवैधानिक विधि दोनों से है, और इस कारण राज्य ऐसा कोई संविधानिक संशोधन नहीं कर सकता जो मूल अधिकारों को छीनता है या न्यून करता है क्योंकि 'विधि' शब्द में संशोधन भी शामिल है। अतः यह निर्धारित करते हुए कि संसद मूल अधिकारों में संशोधन करने के लिए सक्षम नहीं है, पांच न्यायाधीशों ने एक साथ यह घोषणा की कि यह सिद्धान्त केवल भविष्य में लागू होगा और इसका भूतलक्षी प्रभाव नहीं हो सकता। इस कारण ही इस सिद्धान्त का नाम 'भविष्यलक्षी प्रत्यादेश' रखा गया।

इस निर्णय का प्रभाव यह हुआ कि इस निर्णय के दिन तक मूल अधिकारों के सम्बन्ध में सभी संशोधन वैधानिक और प्रभावपूर्ण होंगे, और उसके पश्चात् मूल अधिकारों में संशोधन का कोई अधिकार संसद को नहीं होगा। विद्धान् न्यायाधीशों ने इस सिद्धान्त के लागू किए जाने पर तीन निर्बन्धन भी लगाए—पहला, कुछ समय के लिए भविष्यलक्षी प्रत्यादेश का सिद्धान्त केवल सांविधानिक विषयों पर ही लागू होगा; दूसरा, केवल मात्र उच्चतम न्यायालय ही, और अन्य कोई न्यायालय नहीं, इस सिद्धान्त को लागू कर सकने का अधिकारी होगा; और तीसरा, आरोपित किए जाने वाली भविष्यलक्षिता की परिधि क्या होगी यह विषय उच्चतम न्यायालय के विवेकाधिकार का है जिसको जो कारण या विषय उस न्यायालय के समक्ष है उसको न्याय के आधार पर ही तय किया जाएगा।

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि भविष्यलक्षी प्रत्यादेश का सिद्धान्त विधि बनाने और नीति बनाने दोनों के ही सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय की भूमिका को मान्यता देता है। इस सिद्धान्त को लागू किए जाने की परिधि भी इस अर्थ में बहुत सीमित है कि इसे केवल सांविधानिक संशोधन के क्षेत्र में ही लागू किया गया है। इस सिद्धान्त में यह भी परिकल्पित है कि कोई उलट देने वाला निर्णय उलट दिए गए निर्णय के आधार पर किए गये मध्यवर्ती संव्यवहारों को प्रभावित नहीं करेगा और भविष्य के विषयों पर ही लागू होगा। दूसरे शब्दों में, कोई विधि जिसे अवैध घोषित किया गया तो भूत में किए गए संव्यवहारों और निहित अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकेगी, और केवल भविष्य में होने वाले अर्थात् न्यायिक अमान्यता के बाद के संव्यवहारों और अधिकारों के सम्बन्ध में ही लागू हो सकेगी। जबकि भूतलक्षी प्रत्यादेश से कई बार कठोर परिणाम निकलने की सम्भावना है जब निहित अधिकारों पर बाधा पड़े या जब तात्कालिक नियमों के अन्तर्गत पूर्व में ही कार्यवाही कर ली गई हो, भविष्यलक्षी प्रत्यादेश इस प्रकार की कठिनाईयों को दूर करता है। भारत में भविष्यलक्षी सिद्धान्तों और विनिर्दिष्ट रूप से संविधान का पहला, और सत्रहवां संशोधन, उच्चतम न्यायालय ने शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ A.I.R. 1951 SC 458 और सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य A.I.R. 1965 SC 845 में उचित ठहराया था। दूसरा, 1950 से 1967 की अवधि में बहुत सारे विधानों को अधिनियमित किया गया जिससे भारत में भूमि सम्बन्धी क्रांति का दौर आया।


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