संविधि विधायिका की इच्छा होती है, और विधायिका राष्ट्र की प्रतिनिधि होती है, जो जनता की इच्छाओं को विधायिका के माध्यम से अभिव्यक्त करती है, विधायिका अपनी इच्छा को संविधि द्वारा क्रियान्वित करती है।
संविधि का वर्गीकरण -
अवधि के संदर्भ में वर्गीकरण,- अवधि के संदर्भ में संविधि दो प्रकार की होती है,
1, अस्थाई विधियां, - ऐसी विधियां जिनकी वैधता का समय निश्चित कर दिया जाता है, यदि इन्हें निश्चित समय के भीतर समाप्त नहीं किया जाता तो वह निर्धारित अवधि तक बनी रहती हैं, यदि अवधि बीतने पर उसकी आवश्यकता बनी रहे तो विधायिका उसका नवीनीकरण करती है, अस्थाई विधियां कहलाती हैं, वित्त अधिनियम एक अस्थाई अधिनियम होता है, इसे प्रत्येक वर्ष पारित करना पड़ता है।
2, स्थाई विधियां,- ऐसी विधियां जिनके संचालन के लिए कोई निश्चित समय नहीं दिया जाता जब तक कि किसी दूसरे अधिनियम द्वारा संशोधित या परिवर्तित न किया जाए, तब तक इनके विस्तार की अवधि विद्यमान रहती है, जैसे भारतीय संविदा विधि, साक्ष्य विधि, भारतीय दंड संहिता।
ढंग के संदर्भ में या कार्यप्रणाली के आधार पर संविधियां दो प्रकार की होती है।
1, आदेशात्मक संविधियां या आज्ञापक या बाध्यकर कानून, ऐसी विधि जिसमें निश्चित कार्यों को निश्चित तरीके से करने की बाध्यता होती है, या इस बात के लिए बाध्य करता है कि एक निश्चित कार्य को एक विशिष्ट ढंग से पूर्ण किया जाए।
2, निदेशात्मक संविधियां या अनुमति बोधक कानून, ऐसी विधि जिसमें किसी कार्य को करने का निर्देश दिया जाता है, इसमें विवेकीय शक्ति होती है, निदेशात्मक कानून मात्र निदेश देता है कि किसी कार्य को किया जाए लेकिन ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं करता, कुछ दशाओं में कानून द्वारा निर्धारित शर्तों या ढंग का पूर्ण किया जाना आवश्यक माना जाता है, और यदि उन शर्तों या ढंग को पूर्ण किया जाए तो ऐसा करना उसकी वैधता के लिए घातक होता है, कुछ अन्य दशाओं में निर्धारित शर्तों या ढंग को केवल एक निदेश के रूप में माना जाता है, इन शर्तों या ढंग का पालन न करना शासित योग्य होता है, एक आज्ञापक या आदेशात्मक उपबंद का कठोरता से पालन करना अनिवार्य है जबकि निदेशात्मक उपबंद की सारभूत पालन ही पर्याप्त है।
उद्देश्य के संदर्भ में वर्गीकरण,
1, संहिताकारी संविधियां, यह एसी विधि है जो विधायन विधि को एक संहिता या सूत्र में समाविष्ट करती है, संहिताकारी कानून वह कानून है जो विधि को संहिताबद्ध करता है, या किसी विशिष्ट विषय पर विधि को संपूर्णत: स्पष्ट करता है।
2, समेकनकारी संविधियां, समेकनकारी संविधियों (Consolidating Statutes) से आशय ऐसी संविधियों से है जो किसी विषय-विशेष पर विधियों को एक स्थान पर समेकित करती हैं अर्थात् एक स्थान पर संग्रहित करती हैं,
समेकनकारी कानून वह कानून है जो किसी विशिष्ट विषय से संबंधित सभी कानूनी उपबंधों को एक स्थान पर यदि आवश्यक हो तो कुछ संशोधन तथा सुधार करके एक अधिनियम में इकट्ठा करता है, दूसरे शब्दों में जो कानून किसी विशिष्ट विषय से संबंधित कानूनों को आवश्यक संशोधनों के बाद एक स्थान पर एक विधायी अधिनियम में संग्रहित अथवा एकत्रित करता है, उसे समेकनकारी कानून कहते हैं, उदाहरण के लिए माध्यस्थम अधिनियम 1940, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 आदि,
किसी समेकनकारी अधिनियम का निर्वचन करते समय उपधारणा यह है कि विधायिका वर्तमान विधि को परिवर्तित करने का आशय नहीं रखती क्योंकि उसने कोई नया विधान पारित नहीं किया है बल्कि किसी विशिष्ट विषय पर अलग-अलग फैले हुए सभी सुसंगत कानूनी उपबंधों को मात्र एक स्थान पर एकत्रित किया है,
यदि किसी समेकनकारी कानून का एक से अधिक युक्तियुक्त एवं सुसंगत अर्थान्वयन संभव हो तो वह अर्थान्वयन मान्य होगा जो वर्तमान विधि में कम से कम हस्तक्षेप करें।
3, घोषणात्मक संविधियां,- ऐसी विधियां किसी नए अधिकारों का सृजन नहीं करती है बल्कि केवल विद्यमान विधि की घोषणा करती है, घोषणात्मक कानून वह कानून है जो सामान्य या कानूनी विधि के संदेहों को दूर करता है, जब कुछ निश्चित अभिव्यक्तियों को गलत अर्थ में समझा जाने लगता है तो ऐसी दशा में घोषणात्मक कानून पारित करना आवश्यक हो जाता है, यह तब भी हो सकता है जब न्यायालय किसी विशिष्ट अभिव्यक्ति को ऐसे अर्थ में लेता है जो विधायिका के अनुसार गलत है, ऐसी दशा में विधायिका उचित अर्थ बताते हुए कानून को पारित कर सकती है ताकि अभिव्यक्ति के उचित अर्थ द्वारा संबंधित विवाद समाप्त हो जाए।
4, उपचारिक संविधियां, - ऐसी संविधियां व्यक्ति को उपचार प्रदान करती है, ऐसी विधियां सामाजिक न्याय की आधारशिला होती है, उपचारी कानून वह कानून है जिससे एक नया उपचार प्रदान किया जाता है, ऐसे कानून को पारित करने का मुख्य उद्देश्य किसी के अधिकार के प्रवर्तन में सुधार लाना या भूलों को ठीक करना एवं पूर्व विधि के दोषों को दूर करना होता है, उदाहरणार्थ, मातृत्व लाभ अधिनियम, कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, आदि।
5, समर्थकारी संविधियां, - समर्थकारी संविधियों से तात्पर्य ऐसी संविधियों से है, जिसके माध्यम से विधायिका किसी कार्य के किये जाने को समर्थ बनाती है, इसका मुख्य उद्देश्य विधि को सामर्थ्य प्रदान करता है, समर्थकारी कानून वह कानून है जो उस सामान्य विधि का विस्तार करता है जहाँ वह संकुचित है, यह किसी अन्यथा अवैध कार्य को वैध बनाता है, ऐसे कानून से विधायिका किसी कार्य के किए जाने को समर्थ बनाती है, साथ ही विधायिका के उद्देश्य को लागू करने के लिए आवश्यक कार्य किया जाए इस बात के लिए भी यह कानून आवश्यक उपलक्षित रूप से समर्थ बनाता है।
6, असमर्थकारी संविधियां या निःशक्तकारी, - यह वह कानून है जो सामान्य विधि के अन्तर्गत प्राप्त अधिकार को प्रतिबन्धित या समाप्त करता है।
7, दण्ड संविधियां, ऐसी संविधियां जो किसी कार्य को अपराध घोषित करते हुए उन्हें दंडनीय बनाती है, यह वह कानून है जो कुछ निश्चित कार्यों या गलतियों को दण्डित करता है, यह कानून विस्तृत दण्ड संहिता या बहुत सी धाराओं जिनमें विभिन्न गलतियों के लिए दण्ड का प्रावधान हो, के रूप में होता है, उदाहरणार्थ,- भारतीय दण्ड संहिता 1860 ।
8. कर संविधियां, ऐसी संविधियां जो आय या कुछ निश्चित प्रकार के व्यवहारों पर कर आरोपित करती है, यह आयकर, धनकर, विक्रयकर, दानकर, के रूप में हो सकता है। इस प्रकार के कानून का उद्देश्य सरकार के लिए राजस्व एकत्रित करना होता है।
9. व्याख्यापक संविधियां, - ऐसी संविधियां जो विधि की व्याख्या करता है, पूर्व विधियों की कमियों को दूर करती है तथा संदेहों का निवारण करती है, ऐसे कानून को प्रायः किसी लोप की पूर्ति करने या पूर्व कानून में प्रयुक्त अभिव्यक्ति के सन्देह को दूर करने के लिए अधिनियमित किया जाता है।
10. संशोधनकारी संविधियां,- ऐसी संविधियां जो मूल अधिनियम में कुछ परिवर्तन या संशोधन करती है संशोधनकारी संविधियां कहलाती है,
यह वह कानून है जो मौलिक रूप में पारित विधि में कुछ जोड़ता है या उसमें कुछ परिवर्तन लाता है ताकि उसे सुधारा जा सके या उसके उद्देश्य को अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से पूर्ण किया जा सके, संशोधनकारी कानून को निरसनकारी कानून नहीं कहा जा सकता, यह संशोधित किये जाने वाली विधि का ही भाग होता है।
11. निरसनकारी संविधियां, - ऐसी संविधियां जो विद्यमान विधियों को निरस्त घोषित करती है,
यह वह कानून है जो पूर्व में अधिनियमित कानून को निरसित करता है। ऐसा निरसन कानून की भाषा द्वारा स्पष्ट रूप में या आवश्यक उपलक्षित रूप में हो सकता है।
12. आरोग्यकारी या विधिमान्यकारी संविधियां, - यह वह संविधियां है जो पूर्व विधि में स्थित दोष के नीरोग हेतु या विधिक हेतु या विधिक प्रक्रिया को विधिमान्यता प्रदान करने हेतु पारित किया जाता है, और यदि ऐसा न किया गया होता तो ऐसे कार्य शून्य होते।
प्रर्वतन के आधार पर या लागू होने की सीमा के सन्दर्भ में संविधियां दो प्रकार का हो सकती है---1. सार्वजनिक विधि, (लोक) तथा 2. वैयक्तिक विधि, (निजी)।
1, सार्वजनिक संविधियां, - सार्वजनिक विधि वह विधि होती है जो सार्वजनिक नीति से जुड़ कर सभी पर लागू होती है।
2, वैयक्तिक संविधियां, - ऐसी संविधि जिसका संबंध वैयक्तिक मामलो से होता है, भले ही उन मामलों में जन साधारण से कोई संबंध न हो,
उदाहरण,- हिंदू विधि मुस्लिम विधि, आदि।
व्याख्या के भूतलक्षी प्रवर्तन के सिद्धान्त (Doctrine of Retrospective Operation of Statutes)
व्याख्या के भूतलक्षी प्रवर्तन के सिद्धान्त (Doctrine of Retrospective Operation of Statutes) का वर्णन कीजिये।
उत्तर - भूतलक्षी संविधि -
भूतलक्षी विधि से तात्पर्य ऐसी विधि से है जो विद्यमान विधि के अंतर्गत दिए गए अधिकारों को प्रभावित करती है या उसे समाप्त करती हैं या छीनती है। प्रायः सभी संविधियां भविष्यलक्षी प्रभाव वाली होती है उन्हें तब तक भूतलक्षी प्रभाव का नहीं कहा जा सकता जब तक कि उस संविधि में अभिव्यक्त व्यवस्था न दी गई हो।
भूतलक्षी संविधि के प्रर्वतन का प्रभाव - भूतलक्षी संविधि के प्रर्वतन से तात्पर्य है कि अधिनियम जिस दिन लागू हुआ है उसका प्रभाव उस दिन से नहीं बल्कि उससे पूर्व होने वाले कार्यों पर भी पढ़ता हो या कार्यों पर लागू होता है।
व्याख्या के भूतलक्षी प्रवर्तन के सिद्धान्त - एक विद्यमान पूर्ण अधिकार या आभार का उल्लंघन करने की दृष्टि से एक संविधि को भूतलक्षी प्रभाव वाला नहीं मानना चाहिये बल्कि यह प्रभाव प्रक्रिया सम्बन्धी मामलों में और वहाँ जहाँ अधिनियम की भाषा पर कोई अतिक्रमण न किया गया हो, लागू मानना चाहिये। यदि अधिनियम की भाषा से स्पष्ट रूप से दोनों अर्थ स्वीकार किये जा सकते हों तो भूतलक्षी के स्थान पर भविष्यलक्षी ही मानना चाहिये।
If question in 20 marks
उत्तर- "व्याख्या के भूतलक्षी प्रवर्तन के सिद्धांत" या संनियम का भूतलक्षी संक्रिया सिद्धान्त -
लार्ड राइट के अनुसार, संविधियों की व्याख्या का सर्वाधिक मान्य नियम यह है कि एक विद्यमान पूर्ण अधिकार या आभार का उल्लंघन करने की दृष्टि से एक संविधि (Statute) को भूतलक्षी प्रभाव वाला नहीं मानना चाहिये बल्कि यह प्रभाव प्रक्रिया (Procedure) सम्बन्धी मामलों में और वह भी वहाँ जहाँ अधिनियम की भाषा पर कोई अतिक्रमण न किया गया हो, लागू मानना चाहिये। यदि अधिनियम की भाषा से स्पष्ट रूप से दोनों अर्थ स्वीकार किये जा सकते हों तो उसे भूतलक्षी के स्थान पर भविष्य लक्षी ही मानना चाहिये । यह सिद्धान्त उस धारणा पर आधारित है कि विधायिका का आशय अनुचित व अन्यायपूर्ण नहीं होता। यह नियम सूत्र “नोव्हा कान्स्टीट्यूशिया फ्यूचरिस फारमेम इन्पोनीयर डेवेट नॉन प्रेईटराटिस" में विद्यमान है जिसका अर्थ है नई विधि का प्रभाव भविष्य लक्षी होना चाहिये न कि भूतलक्षी। फलस्वरूप कानून के लागू होने के बारे में यह धारणा है कि कानून उन तथ्यों या परिस्थितियों में आये, जब तक कि निश्चित रूप से यह निष्कर्ष न निकले कि विधायिका का आशय उसको भूतलक्षी प्रवर्तन देना था ।
भूतलक्षी नियम बनाने की शक्ति (Power to Make Rules Having Retrospective (Operation) - इन्द्रमणि बनाम डब्ल्यू० आर० नाटू० ए० आई आर० 1963 उच्चतम न्यायालय, 247 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक संविधि जिसके अन्तर्गत वैध ढंग से एक विधि भूतलक्षी प्रभाव से युक्त अधिनियमित की जा सकती है, सम्बन्धित प्राधिकारी की प्रत्यक्ष शब्दों में भूतलक्षी प्रभाव से युक्त विधि निर्मित करने की शक्ति प्रदान कर सकती है, नियम और उपनियम के सम्बन्ध में भी यही बात है। वही परिणाम ऐसे प्रसंग में भी होगा जहाँ पर कि 'भूतलक्षी प्रभाव से युक्त' नियम या उपविधि बनाने की शक्ति जहाँ तक कि लम्बित व्यवसायों पर प्रभावकारी होने के सम्बन्ध में है, स्पष्ट शब्दों द्वारा प्रदान नहीं की गई है, बल्कि अधिनियम का आवश्यक आशय ऐसी शक्ति प्रदान करने का रहा है।
मौलिक विधि में कोई संशोधन भूतलक्षी नहीं है जब तक अधिकथित न किया जाय या विवक्षित न किया जाय।
भूतलक्षी संक्रिया सम्बन्धित सिद्धान्त (Principles Relating to Retrospective Operation) - भूतलक्षी प्रभाव से युक्त प्रवर्तन के लिये निम्नलिखित सिद्धांत प्रचलित हैं-
1. सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि उस समय तक संविधियों की व्याख्या भविष्यलक्षी प्रभाव से युक्त की जानी चाहिये जब तक कि उसकी भाषा उसे भूत न बनाती हो, भले ही प्रत्यक्ष रूप में या आवश्यक सार ग्रहण रूप में दाण्डिक संविधियों, जिनमें नये अपराधों का निर्माण किया जाता है, को सदैव ही भविष्य लक्षी किया जाता है, को सदैव ही भविष्य लक्षी मानना चाहिये किन्तु ऐसी दांडिक संविधियाँ जिनमें अक्षमतायें (Disabilities) सृजित की गई हैं भले ही साधारणतया भविष्य लक्षी हों, कभी-कभी उनकी व्याख्या भूतलक्षी प्रभाव से युक्त मान ली जाती हैं जबकि इस बात का आशय स्पष्ट है कि उनका प्रवर्तन भूतकाल की घटनाओं पर भी होता है।
2. कुछ ऐसी भी संविधियाँ होती हैं जिनमें कोई नया दण्ड उपबन्धित नहीं होता, किन्तु पिछले आचरण के आधार पर कुछ कार्यवाही प्राधिकृत होती हैं। ऐसी संविधियों की भाषा में यदि स्पष्टतः 'भूतलक्षी प्रभाव से युक्त प्रवर्तन उपबन्धित है तो यह सिद्धान्त लागू नहीं होगा।
3. जहाँ हानिकारक प्रकृति के कार्यों के विरुद्ध जन-साधारण को संरक्षण प्रदान करने वाले एक अधिनियम की व्याख्या, यदि उसकी भाषा से ऐसा करना मान्य है तो भले ही उसका समान रूप से भविष्य लक्षी अर्थ ग्रहण किया जा सकता है, वहाँ उसकी व्याख्या भूतलक्षी प्रभाव से युक्त की जानी चाहिये । बम्बई राज्य बनाम विष्णु रामचन्द्र, (1961) 2 एस० सी० आर० 26 1
4. साधारणतया एक संविधि, जो अस्तित्व में पूर्ण विधियों में निहित अधिकारों का हनन करती है, तो उसका प्रभाव भूतलक्षी प्रकल्पित नहीं होता। जहाँ निहित अधिकार प्रभावित होते हैं, और प्रश्न केवल प्रक्रिया का नहीं रहता, वहाँ के लिये यह प्रकल्पना की जाती है कि विधानांग का आशय यह नहीं था कि निहित अधिकारों को बदल दिया जाय। किन्तु प्रश्न सदैव विधानांग के आशय का होता है जो संविधि में प्रयुक्त भाषा से ग्रहण किया जाता है। एक अधिनियम की व्याख्या करने में न्यायालय इस प्रकल्पना से आरम्भ करता है कि वह विधानांग द्वारा प्रयुक्त की गई भाषा का यथातथ्य अर्थ ग्रहण करेगा। [सी० मुहम्मद यूनुस बनाम सैयद उन्निसा (1962) 1 एस० सी० आर० 607]
5. एक सामान्य नियम के रूप में संशोधनकारी अधिनियम, जो उत्तरवर्ती अधिकारों को प्रभावित करते हैं, भूतलक्षी प्रभाव से युक्त नहीं माने जायेंगे। उनका प्रभाव संशोधन किये जाने के बाद के कार्य-व्यापारों पर ही होगा, पूर्वकृत कार्यों पर नहीं ।
6. जब तक कि, इसके विपरीत उपबन्धित न हों, किसी वाद पर लागू होने वाली अवधि विधि, आदि वही लागू होगी जो उस कार्य के समय लागू थी। संशोधनकारी अधिनियम का प्रभाव साधारणतया संशोधन स्वीकृत करने की तिथि के बाद ही व्यवहारिक रूप से लागू होगा। किन्तु यदि संशोधनकारी विधि प्रक्रिया-मूलक है तो उसका प्रभाव तुरन्त आरम्भ हो जाता है और सभी लम्बित कार्यवाहियों पर उसको लागू की जाती है।
लंबित कार्यवाहियाँ (Pending Actions) - लम्बित कार्यवाहियों के प्रकरण में नियम यह है कि पक्षकारों के अधिकारों का निपटारा उस विधि के अन्तर्गत किया जाता है जो उस समय लागू थीं और इस नियम का पालन उस समय तक किया जाता है जब तक कि नई संविधि में इसके विपरीत आशय न हो।
साधारणतया जबकि विधि को एक र्कावाही के लम्बित होने की अवधि के बीच में परिवर्तित किया जाता है, तो पक्षकारों के अधिकारों का निपटारा उस विधि के अनुसार किया जाता है जो कार्यवाही के आरम्भ करने के समय विद्यमान थी और यह उस समय तक किया जाता है जब तक कि नई विधि में स्पष्टतः अन्यथा रूप में आशयित न हो। यदि एक संविधि अपनी प्रकृति से एक घोषणामूलक अधिनियम (Declaratory Act) है तो यह तर्क कि, उसकी व्याख्या इस रूप में न की जाय कि पूर्ववर्ती अधिकारों का हनन हो, लागू नहीं किया जाना चाहिये ।
इसके विपरीत एक उपचारमूलक अधिनियम (Remedial Act) आवश्यक रूप में भूतलक्षी प्रभाव से युक्त नहीं होता। इसमें उपबन्धित विस्तारण या प्रतिबन्धन भविष्य लक्षी में प्रभाव से युक्त होता है, विशेष रूप से उस समय तक जब तक कि उसमें स्पष्टतः अन्यथा उपबन्धित या आशयित न हो।
भारत में सिद्धान्त का प्रयोग (Application of the Doctrine in India) – भारत में संविधियों की भूतलक्षी व्याख्या के बारे सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न वादों में निम्न प्रकार मत व्यक्त किया है-
(i) हीरालाल रतनलाल बनाम विक्रय कर अधिकारी A.I.R. 1975 SC 1034 में उत्तर प्रदेश विक्रय कर अधिनियम, 1948 को 1970 में संशोधित किया गया, और संशोधनकारी उपबन्धों को जिनसे कर अदा करने का दायित्व आरोपित किया गया था, भूतलक्षी प्रभाव दिया गया । उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सवैधानिक निर्बन्धनों के अधीन, विधान पारित करने की शक्ति का अर्थ भविष्यलक्षी या भूतलक्षी विधान पारित करने की शक्ति है।
इसी प्रकार संसद को भूतलक्षी प्रवर्तन द्वारा विधिमान्यकारी अधिनियम, जिससे न्यायालय द्वारा घोषित शून्य विधान को पुनर्जीवित किया जा सके, पारित करने की शक्ति है। दण्ड विधियों का भूतलक्षी प्रवर्तन नहीं हो सकता क्योंकि संविधन के अनुच्छेद 20 (1) ने स्पष्टतः इसको वर्जित किया है। इस नियम के केवल मात्र अपवाद वे मामले हैं जिनमें अभियुक्त को लाभ मिले।
(ii) जोसड कोस्टा बनाम बासकोरा सदासिव सिनाई नारकोरनिम A.I.R. 1975 SC 1843 में गोवा, दमण और दीव, जो पूर्व में पुर्तगाली राज्य क्षेत्र थे, में भारतीय विधि के लागू होने का प्रश्न था । उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी विधि द्वारा पूर्व में दिये गये अधिष्ठायो अधिकारों को कानून को भूतलक्षी प्रवर्तन देकर छीना नहीं जा सकता, प्रक्रिया सम्बन्धी विषयों का भूतलक्षी प्रवर्तन किया जा सकता है बशर्ते कि कानून ऐसा करने के लिए कहे। अपील का अधिकार एक अधिष्ठायी अधिकार है और इसलिए वाद प्रारम्भ होने के प्रथम दिन से वाद के अन्तिम निर्णय तक उसे सुरक्षित रखा जायेगा। बशर्ते कि कानून स्पष्टतः या आवश्यक उपलक्षित तौर पर ऐसा कहे, या वह न्यायालय जिससे अपील की जा सकती थी तब अस्तित्व में ही नहीं है, तो अपील का अधिकार समाप्त हो जाता है।
(iii) पी० गणेश्वर राव बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य A.I.R. 1988 SC 2068 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि आंध्र प्रदेश पंचायत राज्य इन्जीनियरी सेवा (विशेष) नियम, 1960 के नियम 2 के स्पष्टीकरण (ग) में अप्रैल 28, 1980 को किया गया संशोधन, जिसके अनुसार सहायक इन्जीनियरों की सीधी भर्ती द्वारा अधिष्ठायी पदों के केवल 37-1/2 प्रतिशत पदों को भरने की अनुमति प्रदान की गई, उन रिक्त स्थानों के लिए लागू नहीं होगी जो संशोधन की तिथि के पूर्व उत्पन्न हो गए थे। उक्त स्पष्टीकरण में शब्द 'उत्पन्न हुई' का प्रयोग केवल उन रिक्त स्थानों पर लागू होता है जो संशोधन के पश्चात् अस्तित्व में आए। यदि संशोधन पारित करते समय राज्य सरकार का आशय यह रहा होता कि संशोधन पूर्व में रिक्त स्थानों पर भी लागू होगा। तो सरकार ने राज्य के लोक सेवा आयोग को इस प्रकार की सूचना दे दी होती।
(iv) गुरुवचनसिंह बनाम सतपाल सिंह A.I.R. 1990 SC 209 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि विवाहित महिला के द्वारा आत्महत्या के दुष्प्रेरण के सम्बन्ध में अवधारणा के सन्दर्भ में साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113-क किसी नए अपराध का सृजन नहीं करती। और इसलिए इससे कोई तात्विक अधिकार सृजित नहीं होता। इस प्रकार यह केवल साक्ष्य की प्रक्रिया का विषय होने के कारण भूतलक्षी है और प्रस्तुत मामले में लागू होता है। भूतलक्षी के विरुद्ध अवधारणा केवल साक्ष्य या प्रक्रिया सम्बन्धी विधानों के विषयों पर ही लागू नहीं होती, इसके विपरीत इस प्रकार के उपबन्धों को भूतलक्षी रूप से तब तक अर्थान्वयित किया जाना चाहिये। जब तक इस बात का स्पष्ट संकेत न हो कि संसद का आशय ऐसा नहीं था ।
(v) दर्शनसिंह बनाम रामपालसिंह A.I.R. 1991 SC 1654 में पंजाब सीमा शुल्क बचाव करने की शक्ति अधिनियम 1920 को 1973 के जिस अधिनियम द्वारा संशोधित किया गया उसकी धारा 7 भूतलक्षी है या नहीं का प्रश्न भी था। इस धारा के अनुसार कोई व्यक्ति किसी पैतृक या अपैतृक अचल सम्पत्ति के अन्यसंक्रामण का बचाव नहीं कर सकता और न ही ऐसी सम्पत्ति के लिए वारिस की नियुक्ति का बचाव कर सकता है।
उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि विधायिका का आशय निहित अधिकारको भी समाप्त कर देना था। संशोधनकारी अधिनियम की भाषा से यह स्पष्ट है कि इस अधिनियम का आशय अधिनियम को भूतलक्षी प्रभाव देना था। इस प्रकार के शब्दों का, कि कोई व्यक्ति इस आधार पर किसी अन्यसंक्रामण का बचाव नहीं कर सकता कि अन्यसंक्रामण रूढ़ि के विपरीत है, यदि भविष्यलक्षी निर्वचन भी किया जाये तो भी इससे यही परिणाम निकलता है कि बचाव करने का अधिकार रूढ़ि के विपरीत होने के कारण पूर्णरूप से समाप्त कर दिया गया है।
(vi) के० एस० परिपूर्णन् बनाम केरल राज्य में भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 23 (1-क), जिसको संशोधन अधिनियम, 1984 के द्वारा जोड़ा गया, के सन्दर्भ में यह निर्धारित किया गया कि अधिष्ठायी अधिकारों के सम्बन्ध में निर्मित कानून और प्रक्रिया सम्बन्धी साक्ष्य सम्बन्धी या घोषणात्मक कानून के बीच एक महत्वपूर्ण अन्तर यह भी है कि पूर्ववर्ती (उपर्युक्त पहले लिखा गया) कानून प्रथम दृष्टया भविष्यलक्षी होता है जब तक कि स्पष्टतः या आवश्यक उपलक्षित तौर पर इसको भूतलक्षी न कहा गया हो, जबकि पूर्ववर्ती (उपर्युक्त वाद में लिखा गया) कानून का प्रवर्तन भूतलक्षी ही होता है जब तक कि इस बात का स्पष्ट संकेत न हो कि यह भविष्यलक्षी होगा।
निर्वचन, निर्वचन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से न्यायालय संविधि के अर्थ को अभिव्यक्त करता है, निर्वचन का अर्थ है, अर्थ निर्धारण, जब न्यायालय के समक्ष कोई मामला आता है तो उस स्थिति में न्यायालय संविधि के रूप में अभिव्यक्त किए गए प्राधिकारिक सूत्रों को लागू करता है परंतु जब उसे लागू करने में संदिग्धता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तब न्यायालय निर्वचन की सहायता से उस संदिग्धता को दूर करता है,
ग्रे महोदय के अनुसार, - निर्वचन वह विज्ञान है जिसके द्वारा अधिनियम में प्रयोग किए गए शब्दों का सही अर्थ लगाया जाता है, जो विधायिका का आशय रहा हो या अनुमानित है आशा हो।
मैक्सवेल के अनुसार, - निर्वाचन वह पद्धति है जिसके द्वारा न्यायपालिका अधिनियम में प्रयोग किए गए शब्दों का सही अर्थ निर्धारित करती है।
जम्मू कश्मीर का राज्य बनाम ठाकुर गंगा सिंह - के मामले में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश सुब्बाराव ने निर्वचन को स्पष्ट करते हुए कहा कि निर्वचन वह तरीका है जिसका द्वारा कानून के किसी उपबंध के सही भाव या अर्थ को समझा जा सकता है।
निर्वचन का उद्देश्य
1, विधायिका में प्रयुक्त भाषा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क्या आशय है।
2, किसी वाद विशेष में व्याख्याकार की व्याख्या उपयोगी है या नहीं।
आर एम डी सी बनाम भारत संघ, के वाद मैं उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संविधि का निर्वचन निर्माताओं के आशय के अनुरूप होना चाहिए।
निर्वचन के नियम
1. शाब्दिक या व्याकरणीय व्याख्या (The Literal or Grammatical Interpretation) -
शाब्दिक या व्याकरणिक व्याख्या (निर्वचन) से तात्पर्य यह है कि शब्दों को उनका साधारण एवं स्वाभाविक अर्थ प्रदान किया जाए और यदि ऐसा अर्थ स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो किसी भी कानून के उपबन्ध को लागू किया जाना चाहिये भले ही उसका परिणाम कुछ भी हो। इस सिद्धान्त का आधार यह है कि व्याख्या के सभी सिद्धान्तों का एकमात्र उद्देश्य विधायिका का आशय (Intention) है और चूंकि विधायिका अपने आशय को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करती है अतः उन शब्दों को व्याकरणिक नियमों के आधार पर निर्वचित किया जाना उचित है। इसे सबसे सुरक्षित नियम कहा गया है क्योंकि विधायिका के उद्देश्य को केवल उन शब्दों के द्वारा ही जाना जा सकता है जिनके द्वारा उसने अपने आपको व्यक्त किया है। यदि किसी कानून की भाषा स्पष्ट हो तो ऐसी दशा में न्यायालय का एक मात्र कर्त्तव्य यह है कि वह उस भाषा को लागू करे न कि उस व्याख्या के परिणामों को देखें। उदाहरणार्थ-
(i) मकबूल हुसैन बनाम बम्बई राज्य ए० आई० आर० 1953 एस० सी० 325, में अपीलार्थी जब बम्बई हवाई अड्डे पर उतरा तो उसने यह घोषित नहीं किया कि वह अपने साथ विदेश से "सोना" लाया है। तलाशी लेने पर उसके कब्जे से सोना पाया गया। सागर सीमा शुल्क अधिनियम, 1878 की धारा 167 (8) के अधीन वह सोना जब्त कर लिया गया। उस पर विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 की धारा 8 के अन्तर्गत मामला दर्ज किया गया। अपीलार्थी का तर्क यह था कि 1947 के अधिनियम के अन्तर्गत दोहरे दण्ड से संरक्षण प्रदान किया गया है। जबकि स्वर्ण जब्त करके उसे पहले ही दण्डित किया जा चुका है। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सागर सीमा शुल्क प्राधिकारी न्यायालय या नाविक अधिकरण नहीं है और इसलिए इस अधिनियम के अन्तर्गत सोने को जब्त करना शास्ति न होने के कारण अभियोजन नहीं कहा जा सकता। अतः 1947 के अधिनियम के अन्तर्गत उसका परीक्षण वैध है।
(ii) रामअवतार बनाम सहायक विक्रय कर अधिकारी A.I.R. 1961 SC 1325 में प्रश्न यह था कि क्या पान के पत्तों के विक्रय पर विक्रय कर आरोपित किया जा सकता है या नहीं। अपीलार्थी ने यह तर्क दिया कि पान के पत्तों के विक्रय पर विक्रय कर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि यह "वेजीटेबल" है जो कर योग्य नहीं हैं। अपीलार्थी ने अपना तर्क केवल वेजीटेबल के शब्दकोशीय अर्थ पर आधारित किया कि वेजीटेबल वह होता है जो पौधों या उनके भागों से सम्बन्धित हो, या उसमें सम्मिलित हो, या उनसे निकाली जाए, या उनसे प्राप्त हों। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि जब स्वाभाविक या साधारण अर्थ स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो पान के पत्तों को शब्दकोश, तकनीकी या वनस्पतिशास्त्रीय अर्थ प्रदान नहीं किया जा सकता । प्रतिदिन प्रयोग होने वाले शब्दों को उनके लोकप्रिय अर्थ में समझा जाना चाहिये जिस अर्थ में उन्हें आप लोग समझते हैं, अतः पान का पत्ता वेजीटेबल नहीं हैं और उसका विक्रय कर योग्य है।
(iii) नगरपालिका मण्डल बनाम राज्य परिवहन प्राधिकारी, राजस्थान A.I.R. 1965 S.C. 458 में किसी बस स्टैण्ड का स्थान क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी द्वारा बदल दिया गया। मोटर यान अधिनियम, 1939 की धारा 64-क के अन्तर्गत क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी के आदेश पारित करने के पश्चात् 30 दिन के भीतर राज्य परिवहन प्राधिकारी के पास ऐसे आदेश के विरुद्ध आवेदन किया जा सकता है। प्रस्तुत मामले में आवेदन 30 दिन के पश्चात् किया गया था। यह तर्क दिया गया कि क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकारी के आदेश के बारे में “ज्ञान” होने के पश्चात् 30 दिन के भीतर आवेदन पेश किया जा सकता था। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि जब किसी कानून की परिभाषा स्पष्ट एवं सन्देहहीन हो तो बिना परिणामों का ध्यान रखे उसे वही अर्थ दिया जाना चाहिये। न्यायालय ने यह भी कहा कि सीमा से सम्बन्धित कानून को निर्वाचित करते समय साम्या का ध्यान नहीं रखा जाता अतः स्पष्ट एवं व्याकरणिक अर्थ ही लागू होगा।
(iv) सरस्वती चीनी मिल बनाम हरियाणा राज्य बोर्ड A.I.R. 1992 SC 224 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि जल (प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण) उपकर अधिनियम, 1977 की प्रथम अनुसूची की प्रविष्टि 15 में प्रयुक्त शब्द 'वेजीटेबल' को आम अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। इस शब्द को वानस्पतिक अर्थ नहीं दिया जा सकता। अतः गन्ना 'वेजीटेबल' नहीं है। इस प्रकार गन्ने से चीनी बनाने वाले उद्योग इस प्रविष्टि के अन्तर्गत नहीं आते हैं और उनसे उपकर नहीं लिया जा सकता। शीरा से मद्यसार बनाने वाले उद्योग के अन्तर्गत उद्योग नहीं कहे जा सकते।
2. रिष्टि का नियम या अनिष्ट परिहार नियम (The Mischief Rule)- रिष्टि के नियम का प्रतिपादन हेडन 76 ER 637 में किया गया। इसमें एक्सचेकर के बैरन्स ने प्रस्तावित किया कि सामान्य रूप में सभी कानूनों का आश्वस्त एवं सच्चा निर्वचन करते समय (चाहे वे दाण्डिक हों या हितकारी, सामान्य विधि को प्रतिबन्धित करते हों या विस्तारित) निम्नलिखित चार बातों की पहचान करना और उन पर विचार करना आवश्यक है-
(i) अधिनियम को पारित करने से पूर्व सामान्य विधि क्या थी?
(ii) वह रिष्टि या दोष क्या था जिसके लिए सामान्य विधि में कोई प्रावधान नहीं था ?
(iii) राष्ट्रमण्डल के रोग के निदान के लिए संसद ने क्या उपचार प्रदान किया ? तथा
(iv) उपचार का वास्तविक कारण क्या था ?
और तब सभी न्यायाधीशों का कर्त्तव्य सदैव ऐसी व्याख्या करना है जो रिष्टि को दबाये और उपचार को बढ़ायें और रिष्टि को बनाये रखने के लिए गूढ़ आविष्कारों और परिहारों को रोके तथा लोकहित में अधिनियम के निर्माताओं के वास्तविक आशय के आधार पर उपाय और उपचार में शक्ति तथा जीवन की वृद्धि करें। उदाहरणार्थ-
(i) बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1955 S.C. 661 में अपीलार्थी वित्त बंगाल (विक्रय कर) अधिनियम के अन्तर्गत एक पंजीकृत व्यवहारी था। बिहार में उसका कोई कार्यालय प्रबन्धक या अभिकर्ता नहीं था। विक्रय कर प्राधिकारियों ने यह घोषित किया कि पश्चिमी बंगाल राज्य में हुआ समस्त विक्रय, या अन्य राज्य में किया गया विक्रय जिस माल की सुर्पदगी बिहार राज्य में होनी हो और उस माल की प्रत्यक्ष खपत भी बिहार राज्य में होनी हो, संविधान के अनुच्छेद 286 के अन्तर्गत बिहार विक्रय कर के अधीन होगा। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि विधायिका का वास्तविक आशय ज्ञात करने के लिए, उस विधान को उसके इतिहास, रिष्टि जो वह समाप्त करना चाहता था एवं कानून के उपबन्ध के सन्दर्भ में निर्वाचित किया जाना चाहिये। इस प्रकार निर्वचित करते हुए बहुमत ने निर्धारित किया कि अनुच्छेद 286 का खण्ड (2) “ अन्तर्राज्यीय विक्रय या कर" से सम्बन्धित था जो अपने आप में पूर्णतः भिन्न विषय था। अतः अनुच्छेद 286 (1) (क) एवं अनुच्छेद 286(2) एक ही विषय से सम्बन्धित नहीं थे, तथा यह कहना एक भूल थी कि एक ही विषय पर एक सामान्य एवं दूसरा विशेष नियम था।
(ii) कंवर सिंह बनाम दिल्ली प्रशासन A.I.R. 1965 S.C. 871 में उत्तरदाता के अधिकारी जब आवारा पशुओं को पकड़ने का प्रयास कर रहे थे तो उन्हें अपीलार्थियों, जो कुछ पशुओं के मालिक थे, द्वारा पीटा गया। अपीलार्थियों पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 332 के अन्तर्गत अभियोग लगाया गया। अपीलार्थियों ने सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का तर्क दिया। उनका तर्क यह भी था कि पशुओं को दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 418 के अन्तर्गत "परित्यक्त" नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परित्यक्त का तात्पर्य पूर्णतः अपने दायित्व से मुक्त हो जाना अर्थात् मालिक विहीन होना होता है जैसा शब्दकोश में वर्णित है। उच्चतम न्यायालय ने उपर्युक्त तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि जब अधिनियम का सन्दर्भ ऐसा न हो तो शब्दकोश अर्थ को सदैव मानना आवश्यक नहीं है। वर्तमान मामले में विधायिका के आशय को जानने के लिए यह देखना उचित है कि किस रिष्टि को समाप्त किया जाना था और क्या उपचार प्रदान किया गया था। अतः “परित्यक्त" शब्द का अर्थ खुला छोड़ना या बिना देखरख के छोड़ना है।
(iii) रणजीत बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1965 S.C. 881 में अपीलार्थी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 292 के अधीन "लेडी चैटरलीज लवर" नामक अश्लील पुस्तक बेचने का दोषी पाया गया। उसका तर्क था कि अभियोजन को उसके विरुद्ध दोषपूर्ण मस्तिष्क अर्थात् इस बात का ज्ञान कि पुस्तक में अश्लील साहित्य था, साबित करना चाहिये। उसने यह भी तर्क दिया कि पुस्तकों की दुकानों में बहुत सारी पुस्तकें होती हैं और दुकानकार के लिए यह असम्भव है कि वह हर पुस्तक को यह जानने के लिए कि वह अश्लील है या नहीं पढ़े। उच्चतम न्यायालय ने इन तर्कों से असहमति व्यक्ति करते हुए कहा कि धारा 292 की भाषा स्पष्ट है एवं अश्लील साहित्य बेचना अथवा बेचने के लिये रखना इस उपबन्ध के अन्तर्गत दोषपूर्ण है। इस रिष्टि के उपचार के लिए ही यह उपबन्ध पारित किया गया । अतः अपीलार्थी का तर्क मान्य स्वीकार नहीं किया जा सकता ।
(iv) महाराष्ट्र राज्य बनाम नटवरलाल A.I.R. 1980 S.C. 593 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि भारत रक्षा नियम, 1962 का नियम 126 (त) (2) (ii) किसी व्यक्ति को जिसके कब्जे या नियन्त्रण में इस भाग के किसी उपबन्ध का उल्लंघन करते हुए स्वर्ण प्राप्त हो, दण्डित करता है। न्यायालय विधायिका द्वारा प्रयुक्त भाषा को तोड़-फोड़ करने में सक्षम नहीं है। उसे इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिये कि राज्य का स्वर्ण की कोई मात्रा के अन्तर्गत 'तस्करी के स्वर्ण' को कोई छूट प्रदान नहीं की गई थी। अतः इन उपबन्धों को विशेषतः इस प्रकार निर्वाचित किया जाना चाहिये जिससे रिष्टि को दबाया व विधान के उद्देश्य को बढ़ाया किया जा सके। उच्च न्यायालय ने यह निर्धारित करके गलती की कि यह नियम लागू नहीं होंगे क्योंकि अभियुक्त ने इन नियमों के अन्तर्गत स्वर्ण बिस्कुट खरीदकर या अन्य प्रकार से अपना कब्जा नहीं बनाया। इस प्रकार का संकीर्ण निर्वचन स्वर्ण की तस्करी रोकने के कानून को बिल्कुल प्रभावहीन बना देगा।
3. स्वर्णिम नियम (The Golden Rule ) - स्वर्णिम नियम के अनुसार सामान्यतः न्यायालय विधायिका का आशय कानून में उसके द्वारा प्रयोग किये गये शब्दों से ही शब्दों के प्राकृतिक अभिप्राय के आधार पर ही ज्ञात करेगा। परन्तु ऐसा करने पर यदि कोई निरर्थकता, असंगति, असुविधा, कष्ट, अन्याय या अस्पष्टता होती हो तो अभिप्राय को केवल इतना ही रूपान्तरित कर दिया जायेगा जितने से इस परिणाम को रोका जा सके। चूँकि यह नियम सारी समस्याओं का समाधान करती है, इसलिये इसे स्वर्णिम नियम का नाम दिया गया है। इसमें चूँकि शब्दिक तात्पर्य को कुछ सीमा तक रूपान्तरित किया जाता है इसलिए इस ढंग को निर्वाचन का रूपानतरक ढंग भी कहा जाता है। इस नियम का यह सुझाव है कि निर्वचन के परिणाम या प्रभाव को बहुत अधिक महत्व दिया जाना चाहिये क्योंकि यही विधान का सही अर्थ ज्ञात करने का सूत्र या संकेत है। यह उपधारणा है कि विधायिका कुछ उद्देश्यों में से किन्हीं की ओर ले जाता हो तो उसे तत्काल अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। जब न्यायालय के समक्ष किसी उपबन्ध के एक से अधिक सम्भावित अर्थ निकल रहे हों तो न्यायालय को यह अधिकार है कि वह प्रत्येक निर्वाचन के परिणाम को ध्यानपूर्वक विवेचित करे ताकि उसे विधायिका के सच्चे आशय का ज्ञान हो सके। उदाहरणार्थ-
(i) तीरथ सिंह बनाम वछित्तर सिंह A.I.R. 1955 S.C. 850 में अपीलार्थी ने तर्क दिया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 99 (1) के अन्तर्गत अधिकरण के लिये यह आवश्यक है कि वह उन सभी व्यक्तियों के नाम दर्ज करे जिन्हें भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया गया है और इनमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो याचिका के पक्षकार या अपक्षकार हैं। इसी धारा के परन्तुक के अनुसार उन सभी व्यक्तियों को जिनके नाम धारा 99 (1) (क) (ii) के अन्तर्गत वर्णित है, नोटिस दिया जाना चाहिये। अतः अपीलार्थी का तर्क यह था कि चूँकि वह भी याचिका में पक्षकार है तो उसे भी नोटिस दिया जाना आवश्यक था। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को निरर्थक एवं बेतुका कहते हुए कहा कि परन्तुक, खण्ड (ख) एवं धारा के विन्यास को देखने से स्पष्ट है कि केवल याचिका के अपक्षकारों को ही नोटिस दिया जाना आवश्यक है।
(ii) मै० सैनिक मोटर्स बनाम राजस्थान राज्य A.I.R. 1961 S.C. 1480 में राज्य सरकार ने राजस्थान यात्री एवं माल कराधान अधिनियम, 1959 पारित किया जिसके अन्तर्गत मोटर वाहनों के द्वारा ले जाये जाने वाले यात्रियों एवं माल पर कर लगाया गया। उसको इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह कर संविधान की द्वितीय सूची में “यात्री एवं माल" पर नहीं लगाया गया है बल्कि प्रथम सूची (जिस पर राज्य सरकार कानून नहीं बना सकती) में "यात्रा भाड़ा एवं दुलाई" पर संविधान के अनुच्छेद 301 व 304 के विपरीत लगाया गया है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया। कि कर चालकों की आय पर नहीं बल्कि यात्री एवं माल पर लगाया गया है तथा यद्यपि कर की राशि यात्री भाड़ा एवं ढुलाई के आधार पर ही निर्धारित की जाती है, इससे यह नहीं कहा जा सकता है कि कर "यात्री एवं माल" पर नहीं लगाया गया है।
(iii) पंजाब राज्य बनाम कैंसर जहाँ बेगम A.I.R. 1963 S.C. 1604 में उत्तरदाता ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 18 के अन्तर्गत् निर्देश के लिये दीवानी न्यायालय के समक्ष आवेदन किया। अधिनियम के अन्तर्गत प्रतिकर के विरुद्ध ऐसा प्रार्थनापत्र “ अधिनिर्णय के छह माह के भीतर" पेश हो सकता है जबकि उत्तरदाता ने इसे " अधिनिर्णय के ज्ञान के छह माह के भीतर" पेश किया। उच्चतम न्यायालय ने यह मानते हुए कि आवेदन समय पर ही कर दिया गया था, निर्धारित किया कि जब तक प्रतिकर के बारे में अधिनिर्णय का ज्ञान, चाहे वास्तविक या आन्वयिक, ही न हो तब तक उसके विरुद्ध निर्देश के लिये आवेदन कैसे किया जा सकता है। अतः न्याय एवं न्याय-व्यवहार यही कहता है कि परिसीमा की गणना निर्णय के ज्ञान की तिथि से ही प्रारम्भ होनी चाहिये।
(iv) निर्धारण प्राधिकारी बनाम पटियाला विस्किट्स मैन्यूफैक्चरर्स A.I.R. 1977 S.C 1339 में पंजाब साधारण बिक्री कर अधिनियम, 1948 और उसके अन्तर्गत पारित नियमों में शब्दों " रजिस्ट्रीकरण प्रमाण-पत्र का कब्जा" के निर्वचन का प्रश्न था । उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि शब्द “कब्जा” का अर्थ “तथ्य पूर्ण कब्जा" मानने से अनावश्यक एवं परिहार्य कष्ट ही होगा। इतना ही पर्याप्त है कि व्यापारी ने सभी आवश्यक औपचारिकताएँ पूर्ण करने के पश्चात् अपना आवेदन रजिस्ट्रीकरण के लिए जमा किया। अतः व्यापारी प्रथम अवधि को पूर्ण करने के पश्चात् एक घोषणा के साथ अलीलार्थी को अपना रजिस्ट्रीकरण नम्बर वाद में दे सकता है।
उपरोक्त वर्णीत तीन प्रमुख व्याख्या के नियमों के अलावा व्याख्या के सामान्य नियम निम्न प्रकार हैं-
4. सामन्जस्यपूर्ण नियम (Harmonious Construction); सामंजस्यपूर्ण (समन्वयपूर्ण) अर्थान्वयन का अर्थ (Meaning of the Harmonius Construction) –
जब किसी कानून के एक से अधिक उपबन्ध एक दूसरे के विरुद्ध हों तो न्यायालय उन उपबन्धों का निर्वचन इस प्रकार करने का प्रयास करता है जिससे, यदि सम्भव हो तो, सभी उपबन्धों में सामंजस्य बना रहे एवं कोई उपबन्ध प्रभावहीन या निरर्थक न जाए। ऐसा तभी सम्भव है जब न्यायालय या तो ऐसे विरोधपूर्ण लगने वाले उपबन्धों को अलग-अलग क्षेत्रों से सम्बन्धित माने अथवा यह माने कि एक उपबन्ध दूसरे उपबन्ध के अन्तर्गत दिये गए साधारण नियम का अपवाद है। यह मालूम रहना कि एक ही कानून के विभिन्न उपबन्ध एक दूसरे के व्यापी हैं या एक दूसरे से अलग-अलग हैं बहुत कठिन हो सकता है। सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन के सिद्धान्त का आधार सम्भवतः यह है कि विधायिका का आशय स्वयं को ही खण्डित करना नहीं होता । उदाहरणार्थ-
(i) एम० एस० एम० शर्मा बनाम कृष्ण सिन्हा A.I.R. 1959 SC 395 में याची एक समाचार पत्र का संपादक था। उसे राज्य विधान सभा में कही गई टिप्पणियों को विधान सभा अध्यक्ष के आदेशों के विपरीत बिना काँट-छाँट किये हुये प्रकाशित करने के लिये क्यों न सविधान क अनुच्छेद 194 (3) के अन्तर्गत सदन के विशेषाधिकार भंग करने के लिये दण्डित किया जाय, का के कारण बताओ नोटिस दिया गया। अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत अपनी याचिका में उसने तर्क दिया कि. उसे भविष्य में दण्डित किया जाना संविधान के अनुच्छेद 12(1) (क) के अंतर्गत उसके भाषण एक अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार के विरुद्ध है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यक्ति यही अपेक्षा रखती है कि अनुच्छेद 19 (1) (क) तथा 194 (3) का सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकाला जाय। दोनों उपबन्धों का प्रभाव बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि यह निर्धारित किया जाए कि अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 194 (3) में वर्णित संसद के विशेषाधिकार के अधीन है। उपर्युक्त आधार पर न्यायालय ने याचिका अस्वीकार कर दी।
(ii) वेव्हरली जूट मिल्स बनाम रेंमन और कम्पनी A.I.R. 1963 SC 90 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान की सप्तम अनुसूची में दी गई विभिन्न सूचियों की प्रविष्टियों की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिये कि उनमें से कोई विषय प्रभावहीन न रहे तथा सभी विषय प्रभावपूर्ण बने रहें । इसीलिए ऐसी व्याख्या जिससे उनमें से कुछ विषय बिल्कुल निरर्थक तथा व्यर्थ हो जाये कभी नहीं कीया जानी चाहिये। जब कहीं पर दो प्रविष्टियाँ दी हों जिनमें से एक की प्रकृति साधारण तथा दूसरे की विनिर्दिष्ट (Specified) हो तो पहले का अर्थ ऐसा लगाया जाना चाहिए जिससे दूसरे उसके क्षेत्र से बाहर ही रहे ।
(iii) बनारसी बनाम आयकर अधिकारी A.I.R. 1964 S.C. 1742 में अपीलार्थी का तर्क था कि उस पर जो नोटिस तामील किये गये वे सभी अवधि बाधित थे क्योंकि उनकी तामील आयकर अधिनियम, 1922 की धारा 34 (1) के अन्तर्गत आठ वर्ष की कानूनी अवधि के बाद की गई। उसने यह भी कहा कि यह नोटिस 1969 के संशोधन करने वाले अधिनियम की धारा 4 के द्वारा भी बच नहीं सकती थी जिसके अनुसार किसी नोटिस को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह अवधि समाप्त हो चुकी है जिसके भीतर उसे जारी किया जाना चाहिए था। इसका आधार यह है कि धारा 4 ऐसे नोटिस को तो बचाती है जिसे आठ वर्ष की अवधि के बाद जारी किया गया हो पर ऐसे नोटिस को नहीं बचाती जिसे अवधि के भीतर ही जारी किया गया हो पर जिसकी तामील आठ वर्ष की अवधि के बाद हुई हो। उच्चतम न्यायालय ने दोनों उपबन्धों का सांमजस्यपूर्ण निर्वचन करते हुए निर्धारित किया कि अभिव्यक्तियों "जारी की" तथा "तामील की" के अर्थ प्रस्तुत सन्दर्भ में एक ही हैं क्योंकि केवल ऐसा निर्वचन करने से ही विधायिका के आशय को बचाया जा सकता है। अतः यद्यपि आठ वर्ष की अवधि के पश्चात् जारी किये गये थे तो भी वे 1959 के अधिनियम के अन्तर्गत संरक्षित थे ।
(iv) डी० संजीवय्या बनाम चुनाव अधिकरण AIR. 1967 S.C. 1211 में अपीलार्थी के राज्य विधान सभा में चुने जाने को याची द्वारा चुनौती दी गई जिसमें उसने प्रार्थना की कि उसे चुनाव में विजयी घोषित किया जाये। इस याचिका के लंबित रहने के दौरान अपीलार्थी को राज्य सभा में चुन लिया जाने के कारण उसने विधान सभा से त्यागपत्र दे दिया। उसने उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दाखिल की जिसमें प्रार्थना की गई कि चुनाव आयुक्त को यह निर्देश दिया जाये कि वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 150 के अंतर्गत अपीलार्थी के द्वारा खाली की गई सीट पर उप चुनाव करवाने की प्रक्रिया प्रारम्भ करें। उच्च न्यायालय ने यह याचिका खारिज कर दी। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय से सहमत होते हुए निर्धारित किया कि धारा 150 को अलग रूप में निर्वाचित नहीं किया जा सकता क्योंकि इसी प्रकार के विभिन्न उपबन्धों जैसे धाराओं 84 और 98 (स) को भी ध्यान में रखना पड़ेगा। यदि अपीलार्थी की यह दलील कि किसी के द्वारा खाली की गई सीट पर तत्काल उप-चुनाव की प्रक्रिया को प्रारम्भ कर दिया जाना चाहिए चाहे खाली की गई सीट पर चुनाव जीतने वाले व्यक्ति के विरुद्ध चुनाव याचिका ही क्यों न लंबित हो, मान ली जाए तो इसका प्रभाव यह होगा कि ऐसे बेतुके तथा निरर्थक निष्कर्ष निकलेंगे जैसा कभी भी संसद का आशय नहीं हो सकता। दृष्टान्त के लिए, यदि याची सीट खाली करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध अपनी चुनाव याचिका जीत जाता है और उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है तो ऐसे में एक ही चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले दो व्यक्ति हो जायेंगे, एक वह जिसे विजयी घोषित किया गया तथा दूसरा वह जो इस बीच हुए उप-चुनाव में विजयी हुआ हो । चूंकि संसद का आशय इतना बेतुका तथा निरर्थक कभी नहीं हो सकता इसलिए धारा 150 पारित करते समय संसद का यह आशय नहीं था कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध चुनाव याचिका दाखिल की गई है, तयाग-पत्र देते ही चुनाव याचिका को खारिज मान लिया जायेगा।
(v) शम्भू नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य A.I.R. 1973 SC. 1425 में संविधान के अनुच्छेद 22 (4) (क), 22 (4) (ख) तथा (7) (क) के बीच दृश्यतः विरोध को समाप्त करने का प्रश्न था । समस्या यह थी कि क्या संसद अनुच्छेद 22 (4) (क) के अन्तर्गत सलाहकार बोर्ड से प्राधिकार लेकर निवारक निरोध की अवधि तीन माह से अधिक बढ़ा सकती है, या निवारक निरोध की अवधि तीन माह से अधिक बढ़ाने के लिए साथ पढ़ते हुए अनुच्छेद 22 (4)(ख) तथा 22 (7) (क) के अन्तर्गत सलाहकार बोर्ड से प्राधिकार लिए बिना ही नया विधान बनाना आवश्यक है। उच्चतम न्यायालय ने महसूस किया कि सामंजस्य लाने का केवल एक ढंग यहाँ है कि साथ पढ़ते हुये अनुच्छेद 22 (4) (ख) तथा 22 (4) (क) का अपवाद घोषित किया जाये।
(vi) शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ A.I.R. 1957 SC 458 में मुख्य विवाद यह था कि क्या संविधान के अनुच्छेद 13 (2) के द्वारा संसद की मूलभूत अधिकारों को संशोधित करने की शक्ति पर अंकुश लगाया गया है। चूँकि संसद अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत संशोधन कर सकती है क्योंकि संशोधन करने की शक्ति सार्वभौम शक्ति है। परन्तु संसद अपनी इस विधायी शक्ति द्वारा मूलभूत अधिकारों को वापस नहीं ले सकती और न ही उनको कम कर सकती।
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य A.I.R. 1965 SC 845 में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने संसद की संशोधन की शक्ति पर विचार करने के अतिरिक्त संविधान के मूलभूत अधिकारों तथा राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों के परस्पर सम्बन्ध की व्याख्या भी की। ऑस्टिन के लेखों की चर्चा करते हुए मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर ने कहा कि संविधान के तृतीय एवं चतुर्थ अध्याय संविधान के अन्तःकरण हैं और यदि कोई विरोध हो तो न्यायालयों को सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन करते हुए दोनों अध्यायों की रक्षा करने का प्रयत्न करना चाहिए।
परन्तु मुख्य न्यायाधीश सुब्बाराव ने उपर्युक्त सिद्धान्त को गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1967 में नहीं माना। उन्होंने मूलभूत अधिकारों को प्राकृतिक अधिकार माना तथा सरकार के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि समाज समाजवादी ढाँचे को स्थापित करने के नीति निदेशक सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर संविधान का संशोधन किया गया। संसद की संशोधन की शक्ति के बारे में भी मुख्य न्यायाधीश सुब्बाराव ने कठोर रवैया अपनाया और कहा कि संसद को संशोधन की शक्ति अनुच्छेद 248 तथा संघ सूची को प्रविष्टि 97 के द्वारा मिली है और इसीलिए यह एक विधायी शक्ति है जो अनुच्छेद 13 (2) के द्वारा नियन्त्रित है।
संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 द्वारा गोलकनाथ के मामले में उत्पन्न 'मतभेद दूर हो गया तथा केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य AIR. 1975 SC 1467 में मुख्य न्यायाधीश सीकरी ने शंकरी प्रसाद तथा सज्जन सिंह के मामलों में क्रमशः न्यायाधीश शास्त्री व मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को फिर से स्वीकार कर लिया। उच्चतम न्यायालय ने संविधान की मूलभूत विशिष्टता के सिद्धान्त की संकल्पना की रचना की। न्यायालय ने कहा कि संसद को संविधान में संशोधन करने की सार्वभौम शक्ति है परन्तु ऐसा कोई संशोधन नहीं किया जा सकता जिससे संविधान की मूलभूत विशिष्टता समाप्त होती हो। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय ने भारत के लोकहित तथा विधान पारित करने वाली शक्तियों में सामंजस्य लाने के अपने न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति को बनाए रखा। संविधान के अनुच्छेद 31 (ग) जिसे संविधान (पचीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 द्वारा पारित किया गया, की संवैधानिकता स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह व्यक्तिगत हित तथा समाज के हित में ठीक सामंजस्य बनाए रख सकने में सक्षम है।
5. 'कानून को सम्पूर्ण रूप में पढ़ा जाना चाहिये' (Statute Should be Read as a Whole);
कानून को सम्पूर्ण रूप में पढ़ा जाना चाहिये (The Statute should be Read as a Whole) – लैटिन भाषा में इस सिद्धान्त को इस प्रकार कि कानून का निर्वचन एक्स विसरि एक्ट्स (Ex visceribus actus) किया जाना चाहिए। किसी उपबन्ध को अलग-अलग रूप में निर्वचित नहीं किया जा सकता। कभी-कभी शब्दों के अर्थ उसी उपबन्ध में उपयोग किए गए अन्य शब्दों से तथा कभी उसी कानून में कुछ अन्य उपबन्धों के सन्दर्भ में समझे जाते हैं। परन्तु न्यायालय को इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि अन्य उपबन्धों की सहायता से किसी उपबन्ध का अर्थान्वयन खींच तानकर नहीं किया जाना चाहिये। ऐसा केवल तभी किया जाना चाहिये जब न्यायालय की दृष्टि में विधायिका का ऐसा ही आशय है। न्यायालय को यदि ऐसा सन्देह हो कि विधायिका का ऐसा आशय नहीं भी हो सकता तो इतना ही आधार यह कहने के लिए पर्याप्त है कि विधायिका का आशय ऐसा नहीं था। इसी प्रकार एक ही उपबन्ध में एक शब्द का एक से अधिक बार प्रयोग साधारणतः एक ही अर्थ में होता है। कभी-कभी किसी धारा को अन्य उपबन्ध के सन्दर्भ में निर्वाचित न करने का ठोस आधार भी रहता है। सभी दशाओं में अधिनियम की सम्पूर्ण योजना ही दिशासूचक है। उदाहरणार्थ-
(i) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस A.I.R. 1952 SC 369 में याची, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता था, ने रजिस्ट्री में मूल शाखा में कक्षीकार (मुवक्किल) की ओर से उपस्थित होने के लिए अपने पक्ष में निष्पादित प्राधिकारी का समुचित आधार दाखिल किया। इस आधार पर कि उच्च न्यायालय नियम और मूल शाखा आदेश के अन्तर्गत अधिवक्ता को केवल कार्य करने की शक्ति है पैरवी की नहीं, उसके समुचित आधार पर लौटा दिया गया। याची ने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता होने के कारण उसे स्वयं ही कार्य को स्वीकार करने तथा बगैर अटर्नी की सहायता से पैरवी करने का अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से इस तर्क को स्वीकार कर लिया। बहुमत के एक न्यायाधीश ने निर्णय दिया कि विधायिका के सत्य आशय को जानने के लिए यह आवश्यक है कि किसी उपबन्ध के निर्वचन में कानून के सभी भागों को एक साथ पढ़ा जाय ।
(ii) न्यूजपेपर्स लिमिटेड बनाम औद्योगिक अधिकरण A.I.R. 1957 SC 532 में अपीलार्थी ने अपने एक टाइपिस्ट को पदच्युत कर दिया। उत्तर प्रदेश कार्यरत पत्रकार संघ, जिसके साथ कर्मचारी का कोई सम्बन्ध नहीं था, के मध्यक्षेप द्वारा मामले को उत्तरदाता को सौंप दिया। गया। उच्चतम न्यायालय ने मामले के इस प्रकार सौंपे जाने को इस आधार पर अवैध ठहराया कि यह औद्योगिक विवाद न होने के कारण पदच्युत व्यक्ति नियोक्ता का कर्मचारी नहीं है। न्यायालय ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के किसी भाग का निर्वचन करते समय इस अधिनियम को सम्पूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिये।
(iii) गुरमेज सिंह बनाम प्रताप सिंह A.I.R. 1960 SC 122 में अपीलार्थी ने उत्तरदाता के चुनाव को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 (7) के अन्तर्गत इस आधार पर चुनौती दी कि उसने अपने चुनाव अभियान में गाँव के मुखियाओं या लम्बरदारों को अपना मतदान अभिकर्ता तथा गणन अभिकर्ता बनाया जो भ्रष्ट आचरण की कोटि में आता है। उस समय विधि यह थी कि राजस्व अधिकारी जिनमें ग्राम लेखपाल भी सम्मिलित थे चुनाव प्रक्रिया में सहायता करने के अधिकारी नहीं थे यद्यपि दूसरे ग्राम अधिकारी ऐसा कर सकते थे। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी कानून के एक उपबन्ध का निर्वचन करते समय उस कानून के एक उपबन्ध का निर्वचन करते समय उस कानून के सभी भागों को ध्यान में रखना आवश्यक है। इस व्याख्या से यह स्पष्ट है कि विधायिका ने दो प्रकार के अधिकारियों, राजस्व अधिकारी जिनमें ग्राम लेखपाल भी शामिल हैं तथा दूसरे ग्राम अधिकारी, में भिन्नता रखी है। चूँकि गाँव का मुखिया अथवा लम्बरदार न तो राजस्व अधिकारी थे और न ही वे ग्राम लेखपाल थे, वे दूसरे प्राम अधिकारियों की श्रेणी में आते हैं जिनके ऊपर चुनाव में इस रूप में सहायता करने पर कोई पाबन्दी नहीं लगी हुई थी।
6. अर्थान्वयन 'अमान्य से मान्य करना अच्छा है' (Construction Utres Magis Valeat Quam Pereat);
अर्थान्वयन अमान्य से मान्य करना अच्छा है (Ut Res Magis Valeat Quam Pereat) – जहाँ पर दो विपरीत व्याख्या सम्भव हों न्यायालय उस अर्थ को चुनेगा जो उस पद्धति को, जिसके लिए उस कानून को पारित किया गया है, बनाये रखकर कार्य करता रहे, न कि ऐसे जिससे रास्ते में रोड़े अटकें। दोनों निर्वचनों में से वह जो सीमित हों और जिससे विधान का उद्देश्य प्राप्त नहीं होता अस्वीकार किया जाना चाहिये तथा वह जिसके प्रभावकारी परिणाम हों लागू किया जाना चाहिए। इस सिद्धान्त को " अमान्य से मान्य करना अच्छा है” का नियम भी कहते हैं। उदाहरणार्थ-
(i) अवतार सिंह बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1965 SC 666 में अपीलार्थी, जिसे विद्युत अधिनियम, 1910 की धारा 39 के अन्तर्गत विद्युत चोरी के लिए दोषी पाया गया, ने तर्क दिया कि उसकी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया जाना चाहिये क्योंकि उसके विरुद्ध प्रक्रिया इस अधिनियम की धारा 50 के अनुसार प्रारम्भ नहीं की गई क्योंकि उसका प्रारम्भ उस धारा के अन्तर्गत वर्णित लोगों में से किसी के द्वारा नहीं किया गया। उत्तरदाता का तर्क यह था कि विद्युत की चोरी यद्यपि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 378 के अन्तर्गत चोरी नहीं है परन्तु विद्युत अधिनियम, 1910 की धारा 39 के अन्तर्गत चोरी होने के कारण भारतीय दण्ड संहिता की धारा 379 के अन्तर्गत दण्डनीय है। उच्चतम न्यायालय ने 'अमान्य से मान्य करना अच्छा है' निर्वचन का सिद्धान्त लागू किया और निर्धारित किया कि चूंकि यह अपराध अधिनियम विरुद्ध कार्य है संहिता विरुद्ध कार्य नहीं। की अतः धारा 50 के अन्तर्गत दी हुई आवश्यकताएँ पूर्ण की जानी चाहिये थीं। परन्तु अभियुक्त, जिसे अधिनियम की धारा 39 एक कल्पना का निर्माण करती है जिसका प्रभाव यह है कि इस धारा के अन्तर्गत किए गए अपराध को संहिता के अन्तर्गत अपराध मानकर दण्डित किया जाए।
(ii) धूम सिंह बनाम प्रकाश चन्द्र सेठी A.I.R. 1975 S.C. 1012 में विजयी घोषित प्रत्याशी उत्तरदाता ने तर्क दिया कि उसके विरुद्ध हारे हुए प्रत्याशी द्वारा दाखिल की गई चुनाव याचिका लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81 (1) के अन्तर्गत खारिज कर दी जानी चाहिये क्योंकि धारा 81 (3) के अन्तर्गत वर्णित औपचारिकताएँ कि चुनाव याचिका तथा संलग्नकों पर चुनाव याची के हस्ताक्षर होने चाहिए याची ने पूर्ण नहीं की। उत्तरदाता के इस तर्क को उच्च न्यायालय ने स्वीकार करते हुए अपीलार्थी का आवेदन खारिज कर दिया जिस पर अपीलार्थी ने यह कहते हुए हस्तक्षेप करने की माँग की कि विजयी घोषित उत्तरदाता और चुनाव याची के बीच मिली भगत है। उच्चतम न्यायालय ने अर्थान्वयन का सिद्धान्त "अमान्य से मान्य करना अच्छा है" लागू किया। न्यायालय ने कहा कि ऐसा करने से यह स्पष्ट है कि विधायिका का आशय चुनाव याचिकाओं के अस्वीकार किए जाने पर हस्तक्षेप की अनुमति देना नहीं था चाहे विजयी प्रत्याशी तथा चुनाव याची के बीच मिली भगत हो या नहीं। अधिनियम में इस प्रकार का कोई प्रावधान नहीं है और किसी कानून को उन विलक्षण परिस्थितियों में लागू नहीं किया जा सकता जिनमें लागू करने का विधायिका का आशय कभी भी नहीं रहा हो।
(iii) तिनसुकिया एलेक्ट्रिक सप्लाई कम्पनी लिमिटेड बनाम असम राज्य A.I.R. 1990 SC 123 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यायालय किसी ऐसे अर्थान्वयन के विपरीत सशक्त रूप से झुकाव रखता है जो किसी कानून को निरर्थक बना देता है। कानून के उपबन्ध का अर्थान्वयन इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे अमान्य से मान्य करना अच्छा है के सिद्धान्त के आधार पर उसे प्रभावी व सक्रिय बनाया जा सके। निस्सन्देह यह सत्य है कि यदि कोई कानून पूर्णतः अस्पष्ट है एवं उसकी भाषा सम्पूर्णतः असाध्य और अर्थहीन है तो उस कानून को अस्पष्टता के कारण शून्य करार दिया जा सकता है। उस विधि को संविधान के अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत निरंकुशता या अयुक्तियुक्तता के लिए परखना न्यायिक पुनर्विलोकन में नहीं है, परन्तु किसी कानून की व्याख्या के समय न्यायालय उसके उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए विधायिका के आशय का ध्यान रखता है । अतः यह न्यायालय का कर्त्तव्य है कि वह देखे कि कानून के साथ कैसा बर्ताव किया जा सकता है और वह ऐसा इस बात को सदा जानते हुए करे कि कानून को अप्रभावी नहीं बल्कि प्रभावी बनाने के लिए पारित किया जाता है तथा केवल असम्भवता की स्थिति में ही किसी कानून को अव्यवहार्य कहा जाना चाहिए। इस प्रकार न्यायालय ने तिनसुकिया और डिब्रूगढ़ बिजली पूर्ति उपक्रम (ग्रहण) अधिनियम, 1973 को अव्यवहार्य नहीं माना।
7. 'समरूप अभिव्यक्तियाँ समान अर्थ रखती हैं '(Identical Expression to have the Same Meaning);
समरूप अभिव्यक्तियाँ समान अर्थ रखती हैं (Identical Expressions to have Same Meaning) - यह एक तर्क संगत विचार है कि जब विधायिका ने एक विशिष्ट अभिव्यक्ति का प्रयोग किसी कानून में कई बार किया है तो उस अभिव्यक्ति का अर्थ सभी स्थानों पर समान है। समान वस्तु को समान नाम से पुकारना एक अति सुरक्षित प्रतिज्ञप्ति है । परन्तु न्यायालय को इस सिद्धान्त को लागू करते समय बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि समान अभिव्यक्ति पहले से भिन्न सन्दर्भ में अभिव्यक्त किए जाने पर हो सकता है कि विधायिका उसका अन्य अर्थ लगा रही हो। अतः यह मालूम करना कि क्या समान शब्द का समान अर्थ है न्यायालय के लिए एक बहुत कठिन कार्य है। इसीलिए साधारणतः न्यायालय समान अभिव्यक्ति को भिन्न अर्थ में निर्वाचित करते समय सन्दर्भ भिन्न हैं कारण कहलाता है। ऐसा करने का कारण यह भी हो सकता है कि शब्द समेकन कानून (Consolidating Law) में प्रयुक्त हों जहाँ पर उसे दो भिन्न अधिनियमितियों से प्राप्त किया गया हो।
इस नियम के सर्वोत्तम सामान्य उदाहरण जहाँ पर "समरूप अभिव्यक्तियाँ समान अर्थ रखती हैं" के सिद्धान्त को स्वीकार न किया गया हो अभिव्यक्तियाँ “कर सकता है" तथा "करेगा" के निर्वचन के समय मिलती है जहाँ पर कई बार यह दोनों अभिव्यक्तियाँ कभी आज्ञापक (Mandatory) तथा कभी निदेशात्मक (Directory) रूप में सन्दर्भ के आधार पर निर्वाच की गई हैं। उदाहरणार्थ-
(i) एन० टी० वेलुस्वामी बनाम जी० राजा नयनार A.I.R. 1959 SC 122 - में अपीलार्थी राज्य विधान सभा के चुनाव में विजयी प्रत्याशी था। उत्तरदाता, जो एक मतदाता था, ने एक चुनाव याचिका अपीलार्थी के विरुद्ध उसके चुनाव को इस आधार पर चुनौती देते हुए दाखिल की कि सभी भावी प्रत्याशियों के नामांकन पत्रों की जाँच के समय एक प्रत्याशी का नामांकन पत्र गलत तौर पर नामंजूर कर दिया गया था। इसके पश्चात् अपीलार्थी ने नामांकन पत्र नामंजूर किए जाने को अन्य आधारों पर उचित ठहराने का प्रयास किया और चुनाव अधिकरण ने निर्णय दिया कि ऐसे आधार लिए जा सकते थे। तब उत्तरदाता ने एक रिट याचिका दाखिल की जिस पर उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अधिकरण केवल उस आधार के बारे में अपना निर्णय दे सकता है जिस आधार पर नामांकन किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि प्रस्तुत दृष्टान्त में सम्पूर्ण विवाद लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 (1) (ग) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति “अनुचित रूप से अस्वीकार किया गया" के चारों ओर घूमती है। धारा 100 (1) (घ) (i) में भी शब्द "अनुचित" का प्रयोग अधिनियम की धारा 36 (2) के अन्तर्गत वर्णित अयोग्यता के आधार के परिप्रेक्ष्य में किया गया है। अतः यह निर्धारित किया गया कि धारा 100 (1)(ग) और 100 (1) (घ) (i) में प्रयुक्त शब्द "अनुचित" समान आशय ही रखता है क्योंकि सन्दर्भ में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे इसके विपरीत कुछ कहा जा सके।
(ii) रघुबंस नारायण बनाम उत्तर प्रदेश सरकार A.I.R. 1967 SC 465 में भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 28 के निर्वचन का प्रश्न था जिसके अनुसार यदि न्यायालय की राय में कलेक्टर को जितने प्रतिकर का निर्णय किया जाना चाहिए था वह राशि उसके द्वारा प्रतिकर के रूप में निर्णीत की गई राशि से अधिक है तो न्यायालय अपने निर्णय में यह कह सकता है कि कलेक्टर इस अधिक राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से ब्याज अदा करेगा। अपीलार्थी का तर्क था कि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से राशि अदा करना आज्ञापक (Mondatory) हैं जबकि उत्तरदाता का तर्क था कि यह ब्याज की अधिकतम दर हो सकती है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कलेक्टर के द्वारा 6 प्रतिशत ब्याज देकर राशि अदा करना अधिनियम की धारा 34 के अन्तर्गत उन मामलों में भी कहा गया है जिनमें भूमि पर सरकार द्वारा कब्जा लेने के पूर्व प्रतिकर अदा या जमा नहीं किया गया। निर्वचन का सिद्धान्त कि "समान अभिव्यक्तियों का समान अर्थ होता है जब तक कि सन्दर्भ भिन्न न हो" के परिप्रेक्ष्य में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि धारा 28 का प्रथम भाग जिसमें "निर्देश दे सकता है" शब्दों का प्रयोग किया गया है आदेशात्मक या आज्ञापक नहीं है, अतः न्यायालय कलेक्टर को निर्देश दे भी सकता है और नहीं भी। परन्तु उस धारा के पृष्ठ भाग में प्रयुक्त शब्द "करेगा" आदेशात्मक (Mandatory) है। अतः एक बार यदि न्यायालय ने यह निर्णीत कर दिया है कि कलेक्टर ब्याज देगा तो इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है कि वह 6 प्रतिशत की दर से ब्याज दे ।
8. अर्थान्वयन साहचर्येणा ज्ञायते (Construction Noscitur A Sociis); नोट -
अर्थान्वयन साहचर्येण ज्ञायते (नॉसिटर अ सोसायस) का अर्थ (Meaning of , Noscitur a Sociis) - "नॉसिटर" का अर्थ जानता तथा "सोसायस" का अर्थ साहचर्य अथवा सहयोजन हैं। अतः "नॉसिटर अ सोसायस" का अर्थ साहचर्य से जानना है। जब दो या दो से अधिक ऐसे शब्द जिनके अर्थ सदृश हों एक साथ प्रयोग किए जाएँ तो उन्हें उनके सजातीय अर्थ में समझा जाना चाहिए। वे अपना रंग एक दूसरे से लेते हैं जिससे उनमें से अधिक साधारण शब्द का अर्थ कम साधारण शब्द के सदृश अर्थ में निर्बन्धित हो जाता है। किसी शब्द को उसकी संगिति में 'कौन है' से जाना जा सकता है। साहचर्चित शब्द परस्पर व्याख्या तथा सीमित करते हैं। यह सिद्धान्त विधायिका के वास्तविक आशय को प्राप्त करने में सहायक होने के कारण उस जगह अभिभावी नहीं हो सकता जहाँ यह स्पष्ट हो कि ज्ञानबूझकर व्यापक शब्दों का प्रयोग किया गया नें है। उदाहरणार्थ - (1) मंगू सिंह बनाम चुनाव अधिकरण A.I.R. 1957 S.C. 871 में अपीलार्थी द्वारा चुनाव लड़ने के लिए अपना नामांकन पत्र भरते समय एक वर्ष से अधिक "माँग" का नगरपालिका कर देय था। उसने वोट डालने की तिथि से पूर्व पूरा कर अदा कर दिया तथा वह चुनाव में विजयी हुआ। उसके चुनाव को अवैध घोषित कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय के समक्ष उसका तर्क यह था कि सुसंगत तिथि नामांकन पत्र दाखिल करने की नहीं वरन् वोट डालने की थी तथा इसके अतिरिक्त उसको "माँग" का कोई नोटिस भी नहीं दिया गया था। याचिका को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्णीत किया कि सुसंगत तिथि नामांकन भरने की तिथि ही थी न कि वोट डालने की। न्यायालय ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति "माँग" को उसके साथ प्रयुक्त किए गए अन्य शब्दों के सन्दर्भ में निर्वाचित किया जाना चाहिए। ऐसा करने से स्पष्ट है कि "माँग" का वास्तविक अर्थ नगरपालिका कर अथवा अन्य देय है यद्यपि "माँग" का साधारण अर्थ माँगा जाना या माँगना होता है पर यह अर्थ यहाँ पर सर्वथा अनुपयुक्त है यदि यह देखा जाए कि और किन शब्दों के साहचर्य में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। अतः इस शब्द का निर्वचन बकाया रकम अथवा देय के रूप में ही होना चाहिए।
(II) आलमगीर बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1959 SC 436 में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 के निर्वचन का प्रश्न था। इस धारा के अनुसार जो कोई किसी स्त्री को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, जिसका अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है, या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष के पास से, या किसी ऐसे व्यक्ति के पास से, जो उस पुरुष की ओर से देखरेख करता है, इस आशय से ले जाएगा, या फुसलाकर ले जाएगा कि वह किसी व्यक्ति के साथ नाजायज संभोग करे या इस आशय से ऐसी किसी स्त्री को छिपाएगा या 'निरुद्ध' करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा। इस मामले में तथ्य यह थे कि एक विवाहित स्त्री, अपने पति को छोड़कर, खुले रूप में अपीलार्थी के साथ रहने लगी। अपीलार्थी के विरुद्ध संहिता की धारा 498 का मामला प्रारम्भ किया गया। अपीलार्थी का तर्क यह था कि उसके विरुद्ध अभियोग निरस्त कर दिया जाना चाहिए क्योंकि न हीं वह उस स्त्री को ले गया था, न ही फुसला कर ले गया था, न ही उसने उसे छिपाकर रखा था और न ही उसने उसे 'निरुद्ध' किया था। न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि चूँकि अपीलार्थी के द्वारा स्त्री का ले जाना, फुसलाकर ले जाना अथवा छिपाना, हुआ ही नहीं था क्योंकि वह स्त्री जानबूझकर ही उसके साथ खुले रूप से रहने लग गई थी, तो क्या अपीलार्थी द्वारा उस स्त्री को "निरुद्ध" किया जाना कहा जा सकता है या नहीं। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति "निरुद्ध करेगा" का साधारणतः अर्थ इच्छा के विरुद्ध रोका जाना है परन्तु यह अर्थ प्रस्तुत सन्दर्भ में उचित नहीं है क्योंकि इस अभिव्यक्ति को उसके साहचर्य में प्रयोग किए गए दूसरे शब्दों के प्रकाश में ही निर्वाचित किया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि शब्द "निरुद्ध करेगा" को धारा 498 में प्रयोग शब्दों "ले जाएगा", "फुसलाकर ले जाएगा" तथा "छिपाएगा" के सन्दर्भ में ही निर्वचित किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर "निरुद्ध करेगा" का अर्थ पति की सहमति के बगैर निरुद्ध क्रिया जाना है। धारा 498 पति के अधिकारों की संरक्षा करती है जिसे पत्नी के सानिध्य से वंचित कर दिया गया है। इस उद्देश्य के सन्दर्भ में भी शब्द "निरुद्ध करेगा" का अर्थ किसी स्त्री को उसके पति की सहमति के बगैर रखना है। अतः इस उपबन्ध के अन्तर्गत स्त्री की सहमति का कोई महत्व नहीं है।
(iii) राजस्थान राज्य बनाम श्रीपाल जैन AIR 1963. SC 1323 में उत्तरदाता को राजस्थान सेवा नियम के नियम 244 के अन्तर्गत अनिवार्यतः निवृत्त कर दिया गया। इस नियम के अन्तर्गत राज्य सरकार को किसी राज्य कर्मचारी को बगैर कोई कारण बताए 25 वर्ष तक नौकरी (सेवा) कर लेने के बाद निवृत्त करने का पूर्ण अधिकार है। उत्तरदाता ने अपनी निवृत्ति के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी कि उसके मामले को कामकाज के नियम 37 (vii) (क) के अनुसार "किसी अधिकारी को पदच्युत करने, हटाने अथवा अनिवार्य निवृत्ति करने के प्रस्तावों को मुख्य मन्त्री द्वारा राज्यपाल को भेजा जाना चाहिए।" उच्च न्यायालय ने कहा कि राजस्थान सेवा नियम के अन्तर्गत तीन प्रकार की अनिवार्य निवृत्तियाँ नियम 56 के अन्तर्गत दण्ड के रूप में आनुपातिक पेन्शन पर, अधिवर्षिता की आयु प्राप्त करने पर, तथा नियम 241 के अन्तर्गत है। दृश्यतः ऐसा लगता है कि कामकाज के नियम का नियम 31 (vii) (क) अभिव्यक्ति "दण्ड के रूप में" से विशेषित नहीं है। अतः उपर्युक्त तीनों ही प्रकार की अनिवार्य निवृत्तियाँ इसकी परिसीमा में हैं। परन्तु नियम को ध्यानपूर्वक पढ़ने से ज्ञात होता है कि विधायिका का आशय यह नहीं है। इसका कारण स्पष्ट है कि नियम 31 (vii) (क) पदच्युत करने, हटाने तथा अनिवार्य निवृत्ति करने के प्रस्तावों के बारे में ही विचार करता है। इन तीनों अभिव्यक्तियों का निर्वचन 'साहचर्येण ज्ञायते' के सिद्धान्त के आधार पर ही होना चाहिए और ऐसा करने पर अभिव्यक्ति " अनिवार्य निवृत्ति" की प्रकृति हटाने या पदच्युत करने की होनी चाहिए। चूंकि हटाया जाना या पदच्युत करना सदा दण्ड के रूप में ही होता है। अतः नियम 31 (vii) (क) के अन्तर्गत शब्द "अनिवार्य निवृत्ति" नहीं की गई है अतः नियम 31 (vii) (क) यहाँ पर लागू नहीं होता। इसलिए यह स्पष्ट है कि नियम 244 के अन्तर्गत की गई अनिवार्य निवृत्ति के मामलों को मुख्य मन्त्री द्वारा राज्यपाल को भेजा जाना आवश्यक नहीं है जैसा नियम 31 (vii) (क) के अन्तर्गत निर्देशित है।
(iv) के० जनार्दन पिल्लई बनाम भारत संघ A.L.R. 1981 SC 1485 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि कच्चे काजू आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 2 (क) (v) अन्तर्गत खाद्य पदार्थ हैं और इसलिए इसे केरल आवश्यक वस्तु नियन्त्रण (अस्थायी शक्तियाँ) के अधिनियम, 1962 की धारा 2 (क) के अन्तर्गत आवश्यक वस्तु घोषित नहीं किया जा सकता । उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि साहचर्यित शब्द अपना अर्थ एक दूसरे से लेते हैं और इसको ही साहचर्येण ज्ञायते का नियम कहते हैं। जब "खाद्य पदार्थों" को खाद्य तिलहनों, जिनकों एक प्रक्रिया से होकर गुजरने के बाद ही उनके भीतर के तेल का उपयोग किया जा सकता है, के साहचर्य में रखा गया हो तो यह उचित है कि "खाद्य पदार्थों" को विस्तृत रूप में, जिसमें ऐसी सभी खाद्य वस्तुएँ शामिल हों जिनको एक निश्चित प्रक्रिया से होकर गुजरने के बाद ही मानव के द्वारा खाया जा सके, निर्वचित किया जाए। इसके अतिरिक्त खाद्य पदार्थों के विधाने का इतिहास एवं 'केन्द्रीय विधान के उद्देश्य जिसके द्वारा भारत की गरीब जनता में आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन, पूर्ति तथा वितरण को विनियमित किया जाता है, को ध्यान में रखने से यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "खाद्य पदार्थों" को व्यापक अर्थ में जिसमें कच्ची वस्तुएँ भी, जो बाद में खाद्य में बदल जाती हैं, लिया जाना चाहिए।
9. सजाति अर्थान्वयन (Construction Ejusdem Generis);
सजाति अर्थान्वयन का अर्थ (Meaning of Ejusdem Generis)
"एजुस्डेम जेनेरिस" का अर्थ है "उसी प्रकार का" । साधारणतः साधारण शब्दों को दूसरे शब्दों की भाँति उनके प्राकृतिक अर्थ में ही समझना चाहिए जब तक कि सन्दर्भ दूसरा अर्थ लेने को बाध्य न करें । परन्तु जब एक साधारण शब्द का प्रयोग एक सुस्पष्ट कोटि के शब्दों के पृष्ठ में किया गया हो तो साधारण शब्द को भी उस सुस्पष्ट कोटि के सीमित अर्थ में निर्वचित किया जा सकता है। साधारण शब्द पूर्ववर्ती विशिष्ट अभिव्यक्तियों से अपना अर्थ लेता है क्योंकि विधायिका ने एक सुस्पष्ट कोटि के विशिष्ट शब्दों द्वारा ऐसा करने के लिए अपना आशय स्पष्ट कर दिया है। यह सिद्धान्त कम साधारण शब्दों के पृष्ठ में प्रयोग किए गए साधारण शब्दों पर लागू होने तक ही सीमित है। यदि विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ एक सुस्पष्ट कोटि में नहीं आती हैं तो इस नियम को लागू नहीं किया जा सकता। इस कारण यदि कोई साधारण शब्द केवल एक विशिष्ट शब्द का अनुसरण करता है तो उस एक विशिष्ट शब्द से कोई सुस्पष्ट कोटि नहीं बनती और इसलिए ऐसे में सजाति- अर्यान्वयन नहीं किया जा सकता ।
परन्तु उक्त नियम के अपवाद स्वरूप कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें केवल मात्र एक शब्द को कोटि मानकर इस सिद्धान्त के आधार पर सीमित अर्थ देकर निर्वचन किए गए हैं। यदि प्रयोग किए गए विशिष्ट शब्दों से एक सम्पूर्ण कोटि समाप्त हो जाती है तो इसका अर्थ यही है कि विधायिका का आशय किसी विस्तृत या बड़ी कोटि से था जिसको खोजने का प्रयत्न न्यायालय करेगा। सजाति अर्थान्वयन का सिद्धान्त सार्विक लागू करने का सिद्धान्त नहीं है। यदि किसी विधान का सन्दर्भ इस सिद्धान्त को लागू करने के विरुद्ध हो तो इसे लागू नहीं किया जा सकता । सजाति अर्थान्वयन के सिद्धान्त का आधार यह है कि यदि विधायिका का आशय साधारण शब्दों को असीमित अर्थ में प्रयोग करना होता तो विधायिका को विशिष्ट शब्दों को प्रयोग करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। उदाहरणार्थ-
(i) बम्बई राज्य बनाम अली गुलशन AIR 1955 SC 810 में बम्बई भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1948 की धारा 6 (4) (क) में प्रयुक्त भाषा "राज्य सरकार राज्य के उद्देश्य या. किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए अधिग्रहण कर सकती है" के निर्वचन का प्रश्न था। अपीलार्थी का तर्क था कि इस प्रावधान के अन्तर्गत उसे विदेशी वाणिज्यिक दूतावास के सदस्य के लिए परिसर अधिग्रहण करने का अधिकार है। उच्च न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए” को अभिव्यक्ति "राज्य के उद्देश्य" की सजाति के रूप में निर्वाचित किया जाना चाहिए और विदेशी वाणिज्यिक दूतावास के सदस्य के लिए आवास का प्रबन्ध करना चूंकि संघ का उद्देश्य है राज्य का नहीं इसलिए राज्य सरकार के पास अधिग्रहण का कोई अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि उच्च न्यायालय ने सजाति अर्थान्वयन का नियम लागू करके भूल की है क्योंकि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए" केवल एक अभिव्यक्ति “राज्य के उद्देश्य" का अनुसरण करता है जो एक सुस्पष्ट कोटि नहीं है। कोटि की अनुपस्थिति में इस सिद्धान्त को लागू नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त उपबन्ध की भाषा से विधायिका का आशय स्पष्ट है। शब्दों को उनका प्राकृतिक अर्थ देने से स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "किसी अन्य लोक उद्देश्य के लिए" के अन्तर्गत विदेशी वाणिज्यिक दूतावासों के सदस्यों के लिए आवास की व्यवस्था करना भी शामिल है।
(ii) लीलावती बनाम बम्बई राज्य A.I.R. 1957 SC 521 में याची जो किसी परिसर के किरायेदार की विधवा थी, घटना के समय उस परिसर में न रह रही थी। उत्तरदाता ने बम्बई भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1948 की धारा 6 (4) (क) के अन्तर्गत उस परिसर का अधिग्रहण किसी राज्य कर्मचारी के आवास के लिए कर लिया। याची ने इस अधिग्रहण को इस आधार पर चुनौती दी कि परिसर धारा के साथ जुड़े हुए स्पष्टीकरण के अनुसार "खाली" नहीं था। स्पष्टीकरण के अन्तर्गत किसी स्थान को खाली तब माना जाएगा जब किराएदार का "अपनी किराएदारी की समाप्ति, बेदखली या समनुदेशन पर, अधिभोग समाप्त हो जाता है या परिसर में किसी अन्य प्रकार से उसके हित का अन्तरण हो जाता है अथवा अन्यथा"। याची के अनुसार " अथवा अन्यथा " शब्दों का इसके पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियों के साथ सजाति निर्वचन होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने नर्धारित किया कि इस नियम को प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि "अथवा अन्यथा " शब्दों को पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियाँ समान प्रकृति की जाति न होने के कारण एक सुस्पष्ट कोटि में नहीं आती । अनियमितता में प्रयोग किए गए शब्दों को उनके प्राकृतिक अर्थ में पढ़ने से यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति "अथवा अन्यथा" का आशय पूर्ववर्ती अभिव्यक्तियों में सम्मिलित न होने वाली दशाओं को समावेशित करना है। यह निर्वचन विधान के उद्देश्य के अनुकूल भी है।
(iii) हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ A.I.R. 1965 SC 1167 में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत जारी किए गए फल उत्पादक आदेश 1955 द्वारा फल की चाशनी में फल का रस पच्चीस प्रतिशत होना बाध्यकर बना दिया गया। अपीलार्थी ने तर्क दिया कि यह आदेश उनके उत्पाद " रूह अफजा " पर लागू नहीं होता यद्यपि उसके अन्दर फलों का रस भी है। इसका कारण यह है कि इस आदेश के खण्ड 2 (घ) (v) में शरबत, पेराई, वल्य जौ का जल, पीपी में बन्द फलों का रस तथा परोसने के लिए तैयार पेय या कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो, शामिल है तथा अभिव्यक्ति "कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो" का अर्थ सजाति होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर करते हुए निर्णय दिया कि यह सिद्धान्त इस उदाहरण में लागू नहीं होता क्योंकि अभिव्यक्ति "कोई अन्य पेय जिसमें फलों का रस या फलों की लुगदी हो" के पूर्व प्रयोग किए गए शब्द किसी स्पष्ट कोटि में नहीं आते। न्यायालय ने यह भी कहा कि आदेश के सन्दर्भ से यह स्पष्ट है कि सभी पेय जिनमें फलों का रस हो इसमें शामिल है।
(iv) एक्सप्रेस होटेल्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम गुजरात राज्य A.I.R, 1989 SC 1949 में विलासिता पर गुजरात कर (होटल और बासा) अधिनियम, 1977 की धारा 2 (क) के निर्वाचन का प्रश्न था जिस परिभाषा के अनुसार "वासा के लिए प्रभार" से वातानुकूल, टेलीफोन, टेलीविजन, रेडियो, संगीत, अतिरिक्त बिस्तर, "और अन्य इस प्रकार की वस्तुएँ" सम्मिलित थीं। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति " और अन्य प्रकार की वस्तुएँ" को सजाति के आधार पर अर्थान्वयित किया जाना उचित है। अभिव्यक्ति के पूर्व में प्रयुक्त शब्दों का वर्ग समाप्त न हो जाने के कारण, विधायिका ने जानबूझकर इसके अन्दर इसी वर्ग की अन्य वस्तुओं को शामिल करने के लिए इस अभिव्यक्ति का प्रयोग किया है।
(v) सहायक कलेक्टर, कन्द्रीय उत्पाद शुल्क बनाम रामदेव टोबेको कम्पनी A.I.R. 1991 SC 506 में केन्द्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 में 1973 के संशोधन के पूर्व धारा 40 (2) के निर्वचन का प्रश्न था जिसके अनुसार वाद हेतुक के उत्पन्न से छह माह बीत जाने के पश्चात् विधि के अन्तर्गत कुछ किए गए अथवा किए जाने के आदेश दिए जाने के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही स्थापित नहीं की जा सकेगी।
उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभिव्यक्ति 'अन्य विधिक कार्यवाही' को पूर्वलिखित शब्दों 'वाद' एवं 'अभियोजन' की सजाति के रुप में पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि वे एक विशिष्ट कोटि के अन्तर्गत आते हैं। अतः शास्ति तथा न्यायनिर्णयन की कार्यवाहियाँ धारा 40 (2) मैं प्रयुक्त अभिव्यक्ति अन्य विधिक कार्यवाही के अन्तर्गत नहीं आतीं और इसलिए ये कार्यवाहियाँ इस उप-धारा के अन्तर्गत निर्धारित परिसीमा के अधीन, नहीं हैं। 'वाद' अथवा 'अभियोजन के न्यायिक या विधिक कार्यवाहियां हैं जिन्हें किसी कार्यपालक प्राधिकारी, चाहे वह कानूनी ही क्यों न हो, के समक्ष न दाखिल कर न्यायालय के समक्ष दाखिल किया गया हो। इस विश्वास को धारा में अभिव्यक्ति 'संस्थित' से बल मिलता है।
10. एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है (Construction Expressio Unius Est Exclusio Atterius);
"एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है" (Expressio Unius Est Exclusio Alterius)—यह संविधि की व्याख्या का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त यह भी है कि एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है। जहाँ किसी कानून में किसी विशिष्ट श्रेणी की एक या अधिक वस्तुओं को स्पष्ट रूप से वर्णित कर दिया गया हो तो इसका अर्थ यह होता है कि उस कानून के क्षेत्र में उसी श्रेणी की अन्य वस्तुओं को अलग रखा गया है। विधायिका का यही आशय है। यदि कानून में दो पदावलियाँ उपयोग की गई हों जिनमें से एक साधारणतः दूसरों को अपने अन्दर शामिल करती हो तो अधिक साधारण अभिव्यक्ति कम साधारण अभिव्यक्ति को अपने से बाहर रखती है। "एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है" नियम का अनुसरण कानूनों अथवा दस्तावेजों की व्याख्या में प्रायः एक मूल्यवान नौकर परन्तु खतरनाक मालिक है। "अपवर्जन" प्रायः एक दुर्घटना का परिणाम है, तथा यदि इसके लागू करने से, उस विषय सामग्री को ध्यान में रखकर जिसमें इसे लागू किया जा रहा हो, असंगति या अन्याय उत्पन्न हो तो इस नियम को लागू नहीं किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ -
(i) परभणी ट्रान्सपोर्ट बनाम सड़क परिवहन प्राधिकारी A.I.R. 1960 SC 801 में मोटर यान अधिनियम, 1939 के अन्तर्गत बस सेवा चलाने का परमिट बम्बई राज्य को दे दिया गया। याची ने तर्क दिया कि चूँकि अधिनियम एक प्रणाली (स्कीम) के अन्तर्गत सरकार को बस सेवा चलाने का अधिकार देता है अतः इसके द्वारा अन्यथा बस नहीं चलाई जा सकती। सूत्र “एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है” को भी याची के द्वारा अपने समर्थन में उत्कथित किया गया । उच्चतम न्यायालय ने इस सूत्र को लागू होने को इस आधार पर नामंजूर कर दिया कि धारा 42 (3) (क) की भाषा स्पष्ट है कि सरकार को बस चलाने के लिए धारा 42 (1) के अन्तर्गत परमिट लेना आवश्यक है।
(ii) खेमका और कम्पनी बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1975 SC 1549 में केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 की धारा 9 (2) की व्याख्या का प्रश्न था। इस धारा के प्रथम भाग के अन्तर्गत राज्य अधिकारियों को केन्द्र सरकार की ओर से कर के निर्धारण, पुनर्निर्धारण तथा पालन कराने की शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इस धारा के पृष्ठ भाग के अनुसार यह ऐसा ही होगा जैसे केन्द्रीय अधिनियम के अन्तर्गत देय कर या दण्ड राज्य के साधारण विक्रय कर विधि के अन्तर्गत कर या दण्ड है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केन्द्रीय तथा राज्य के अधिनियमों में दण्ड के उपबन्ध प्रत्येक अधिनियम में विशेष प्रावधान हैं तथा यह केन्द्रीय या राज्य के साधारण विक्रय कर विधि के भाग नहीं हैं। अतः निया "एक वस्तु का स्पष्ट उल्लेख दूसरे का अपवर्जन है" प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू होता है तथा इस प्रकार निर्वाचित करने से धारा 9 (2) के पृष्ठ भाग में दण्डों के निर्देश केवल केन्द्रीय अधिनियम में विशेष दण्ड उपबन्धों पर लागू होंगे।
11. तत्कालीन व्याख्या सर्वोत्तम और प्रभावी होती है (Construction Contemporanea Expositio Fortissima in Lege);
" तत्कालीन व्याख्या सर्वोत्तम और प्रभावी होती है।" (Contemporanea Expositio Est Fortissima in Lege)-
जब किसी कानून को पारित किया गया था तो तत्कालीन व्यक्तियों के बारे में यह धारणा है कि वे उसके पारित किये जाने की पृष्ठभूमि तथा उस समय के कारणों से वर्तमान पीढ़ी के लोगों से अधिक परिचित थे। प्राचीन कानूनों के निर्वचन के समय तत्कालीन न्यायाधीशों द्वारा दिए गए अर्थ उच्च सम्मान के योग्य हैं क्योंकि तत्कालीन विधायिका के आशय के बारे में वे वर्तमान न्यायाधीशों से अधिक ज्ञान रखते थे। साधारणतः नियम यही है। कि किसी कानून के शब्दों को तत्कालीन अर्थ में समझना चाहिए जिस समय उन्हें पारित किया गया हो। परन्तु यदि यह साबित हो जाये कि किसी उपबन्ध का निर्वचन बार-बार गलत हुआ तो न्यायालय को पूर्व की गलतियों को सुधारकर उसका उचित अर्थ बताना चाहिये। ऐसी दशा में प्राचीन निर्वचन के अन्तर्गत निहित हुए हक बने रहेंगे।
“तत्कालीन व्याख्या सर्वोत्तम और प्रभावी होती है” के सिद्धान्त की आलोचना का आधार यह है कि आधुनिक प्रगतिशील समाज में विधायिका का आशय कानून को पारित किए जाने के 'समय में सीमित कर दिया जाना असंगत और तर्क विरुद्ध है क्योंकि विधि का निर्वचन इस प्रकार होना चाहिए कि वह बदलते हुए समाज के साथ कदम मिलाकर चल सके। इस आलोचना की प्रति आलोचना इस आधार पर की गई है कि यदि कोई प्राचीन कानून निरर्थक बनकर रह गया है तो उसे आधुनिक परिवेश में नये विधान द्वारा परिवर्तित कर दिया जाना चाहिये। उदाहरणार्थ-
(i) राजा राम बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1964 SC 828 में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 25 का निर्वचन करते समय "तत्कालीन व्याख्या" के नियम को लागू करने से इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि यह अधिनियम तुलनात्मक रूप में एक आधुनिक अधिनियम है तथा इसके पारित होते समय नये क्रांतिकारी विचार मनुष्य के मस्तिष्क में आने प्रारम्भ हो गए थे तथा विज्ञान ने पर्याप्त प्रगति कर ली थी। यह निर्धारित किया गया कि उत्पाद शुल्क अधिकारी अधिनियम की धारा 25 के अन्तर्गत एक पुलिस अधिकारी है। (ii) के० पी० वर्गीज बनाम आयकर AIR. 1981 SC 1922 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि "तत्कालीन व्याख्या" का अर्थान्वयन का सिद्धान्त कानून पारित किए जाने के समय के विशेषज्ञों द्वारा दिए गए अर्थों के सन्दर्भ में एक सुस्थापित नियम है यद्यपि कानून की भाषा स्पष्ट तथा स्वच्छ होने पर इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। अतः आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 52 (2) के संशोधन उपबन्धों को स्पष्ट करते हुए प्रत्यक्ष करों के केन्द्रीय बोर्ड ने परिपत्र जारी किए हों तो अधिनियम की धारा 119 के अनुसार उनके बाध्यकर होने के अतिरिक्त वे स्पष्टतः "तत्कालीन व्याख्या" की प्रकृति में हैं जिनसे आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 52 (2) का निर्वचन करने में विधिसम्मत सहायता मिलती है।
(iii) मैं० जे० कॉटन स्पिनिंग एण्ड बीविंग मिल्स बनाम भारत संघ AIR. 1988 में उच्चतम् न्यायालय ने निर्धारित किया कि सूत्र “तत्कालीन व्याख्या." केवल प्राचीन कानूनों की व्याख्या में ही लागू होती है और इसे तुलनात्मक रूप से आधुनिक कानून जैसे प्रस्तुत दृष्टान्त उत्पाद शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 के उपबन्धों के निर्वचन में लागू नहीं किया जा सकता। आधुनिक प्रगतिशील समाज में विधायिका के आशय को विधान निर्माण के समय के शब्दों के अर्थों में सीमित रखना अयुक्तियुक्त होगा तथा, जब तक इसके विपरीत आशय न हो, उन शब्दों को नवीन तथ्य तथा परिस्थितियों में निर्वाचित किया जाना उचित होगा, बशर्ते कि प्रयुक्त शब्द ऐसा करने की अनुमति देते हों।
निष्कर्ष (Conclusion ) – उपरोक्त 11 सामान्य व्याख्या नियमों के वर्णन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि व्याख्या के ये नियम काष्ठकार या मूर्तिकार के उपकरणों के समान हैं। इनका मूल्य बहुत सीमा तक इस बात पर निर्भर करता है कि इन्हें कितनी सावधानी व योग्यता से प्रयोग में लाया जाता है। वस्तुतः यह न्यायाधीशों की कुशाग्र बुद्धी पर निर्भर करता है कि वे इन उपकरणों का प्रयोग कितनी सावधानी बुद्धिमानी से करते हैं।
-संविधियों की व्याख्या संरचना में आंतरिक उपकरण सहायता का पूर्णरूपेण मूल्यांकन करें।
उत्तर- संविधियों की व्याख्या-संरचना में आन्तरिक उपकरणों की भूमिका (Role of Instrinsic Aids in the Construction of Statutes) - संविधियों की व्याख्या संरचना में विभिन्न आन्तरिक सहायता उपकरणों की भूमिका को निम्न प्रकार वर्णित किया जा सकता है-
1. सन्दर्भ (Context) - ब्लैक स्टोन के अनुसार, “यदि किसी संविधि की भाषा के दो अर्थ निकलें तो सन्दर्भ के द्वारा एक उपयुक्त अर्थ निकाला जा सकता है।” संविधि में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है साधारणतया उसका साधारण अर्थ लिया जाता है।
हेल्सबरी के अनुसार, सन्दर्भ से ही व्याख्या करनी चाहिये और परिकल्पना का सहारा नहीं लिया जा सकता । सन्दर्भ की सहायता लेने से संविधि में स्थिरता आ जाती है।
लॉर्ड साइमण्डस के अनुसार, सन्दर्भ के अंतर्गत न केवल उसी संविधि के अन्य निर्णायक वाक्यांश शामिल हैं, अपितु उसकी प्रस्तावना, विधि की वर्तमान स्थिति, विषय से मिलती-जुलती अन्य संविधियाँ और वह रिष्टि जिसका कि उपचार ढूंढना आशयित है, सभी शामिल हैं।
स्मिथ का कहना है कि, 'शब्द तो एक प्रकार के आचरण हैं, उनसे जो आशय प्रकट होता है। वह अवश्य ही उसके संदर्भ पर नियंत्रित रहता है साथ ही यह उन परिस्थितियों पर निर्भर करता है जिनमें संविधि लिखी या कही गई है।' न्यायालयों का मुख्य कार्य बहुत अंश तक शब्दों का अर्थ निर्धारित करना है, इसलिये उनका यह भी काम हो जाता है कि वे उनके संदर्भों का भी अध्ययन करें ।' इसलिए व्याकरणमूलक व्याख्या को कोई ऐसी पूर्ण व्याख्या नहीं कहा जा सकता जो सन्दर्भ से सर्वथा अछूती रह सके। यदि व्याकरणमूलक व्याख्या से निकलने वाला परिणाम स्पष्टतः अव्यवहारिक दिखाई पड़ता है, तो हमें व्याकरण को छोड़कर सन्दर्भ की ओर देखना ही पड़ेगा।
शेख गुलफान बनाम सन्त कुमार गांगुली, (1965)2 एस० सी० जे० 839 में कहा गया कि सामान्यतः संविधि में प्रयोग किये गये शब्दों की व्याख्या उनके साधारण अर्थ में होनी चाहिये, परन्तु बहुत से मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण यह है कि शब्दों के साधारण अर्थ से संविधि की तर्कपूर्ण तथा न्यायोचित व्याख्या नहीं हो सकती केवल शब्दकोशिक अर्थ पर आधारित होने से आवश्यक रूप से सांविधिक व्यवस्था की उचित व्याख्या नहीं की जा सकती । प्रायः सांविधिक व्याख्या करने में संविधि की विषय-वस्तु तथा उद्देश्य का ध्यान रखा जाता है। इसलिये संविधि की व्यवस्था के शब्दों के प्रयोग का संदर्भ, संविधि का उद्देश्य जिसमें व्यवस्था को शामिल किया गया है और संविधि पारित करने की नीति, संविधि की व्याख्या में सुसंगत एवं आवश्यक हो जाते हैं। हाल्सबरी ने कहा है कि 'संविधि की व्याख्या में शब्दों की व्याख्या संविधि के संदर्भ में होनी चाहिये न कि उसके कठोर व्याकरणीय या लोकप्रिय भाव में।'
मैक्सवेल के अनुसार, 'संसद द्वारा निर्मित अधिनियम की व्याख्या में उसके भागों को एक साथ पढ़ना चाहिये न कि प्रत्येक भाग को अलग-अलग। संविधि के प्रत्येक उप-वाक्य की व्याख्या अधिनियम के अन्य उप-वाक्यों के संदर्भ में होनी चाहिये जिससे जहां तक सम्भव हो पूरा अधिनियम एक सुसंगत विधि हो जाय।'
यह एक सुस्थापित नियम है कि संविधि के दुरुपयोग की सम्भावना से न्यायालय उसे शक्ति का गलत प्रयोग नहीं मानेगी यदि विधि वैध है और स्पष्ट रूप से उसके निर्माण का अधिकार प्रदान किया गया है। (आई० सी० गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1963 एस० सी० 164) ।
एस० हरसीरान सिंह बनाम पंजाब राज्य, (1984) क्रिमिनल ला जर्नल, 253 में कहा गया कि सिद्धान्त तथा पूर्व-निणय दोनों के आधार पर यदि व्याख्या का झुकाव संदर्भ तथा उद्देश्य की ओर हो, अपेक्षा कि शाब्दिक अर्थ की व्याख्या पर और यदि शाब्दिक अर्थ का परिणाम असंगत और भ्रामक हो, तब संविधि की व्याख्या उस पक्ष में होनी चाहिये जो उसके उद्देश्य को बढ़ावे न कि उसको विफल करे ।
2. उद्देशिका (प्रस्तावना) (Preamble) – प्राय: यह देखा गया है कि प्रत्येक अधिनियम में एक प्रस्तावना जुड़ी रहती है। प्रस्तावना उस अधिनियम के मूल आशय के प्राक्कथन के रूप में होती है जो उपबन्धों के आरम्भ होने के पूर्व ही भूमिका के रूप में दे दी जाती है। यह उद्देशिका शीर्षक के बाद और अधिनियमित धाराओं के पूर्व दी जाती है जिसमें संविधि के उद्देष्यों और नीति का स्पष्टीकरण किया जाता है तथा उन आधारों और उद्देश्यों को स्पष्ट किया जाता है जो अधिनियम में हैं ।
कोचीन बनाम मद्रास एवं केरल राज्य (1960) 2 S.C.A. 412. में यह कहा गया कि प्रस्तावना संविधि का वह अंग है जिसमें अधिनयम के कारणों का प्रदर्शन होता है। इसी संविधि की प्रस्तावना उसे समझने की एक कुन्जी है, और संविधि में यदि कहीं कोई अस्पष्टता या संदिग्धता आ जाती है तो उसके निवारण हेतु तथा संविधि को उसके वास्तविक क्षेत्र के अनुरूप बनाये रखने के लिए उस प्रस्तावना को वैद रूप में देखा जा सकता है।
बुर्रकपुर कोल कं० लि० ब० भारत सरकार, (1961) 2 SC A 523 में कहा गया है कि यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि किसी संविधि की व्याख्या सम्बन्धी गुत्थियों को सुलझाने के लिये उसकी उद्देशिका एक कुन्जी (Key) के रूप में काम करती है। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक अधिनियम की प्रस्तावना सदैव लाभप्रद उद्देश्य की पूर्ति कर सके या आवश्यकता के समय उनसे पथ-प्रदर्शन मिल सके। इसीलिए किसी प्रस्तावना की व्याख्या के लिये उस अधिनियम को पूर्णतः पढ़ना चाहिये। अधिनियमित भाग की प्रस्तावना उस समय कदापि प्रतिबन्धित या विस्तारित नहीं कर सकती जब अधिनियम की भाषा से उसका प्रयोजन और क्षेत्र बिना किसी संदेह के स्पष्ट हो। प्रस्तावना का सन्दर्भ उस समय लिया जा सकता है जबकि अधिनियम की धाराओं का अर्थ या क्षेत्र बिना प्रस्तावना को सन्दर्भ में लाये स्पष्ट न हो रहा हो। न्यायालय संरचना का निष्कर्ष यह है कि 'किसी अधिनियम के उपबन्धों के अर्थ की संरचना करने में न्यायालयों को उसकी प्रस्तावना से आरंभ नहीं करना है, भले ही ऐसा करने में वे न्यायोचित हों। यही नहीं, ऐसी भी परिस्थिति आ सकती हैं जबकि उन्हें प्रस्तावना को देखना पड़े किन्तु यह तभी होगा जबकि संसद द्वारा प्रयुक्त भाषा संदग्धि हो या इतना अधिक सामान्य हो कि संसद द्वारा सीमित अर्थ की प्रकल्पना करने के बाद भी कोई निश्चित अर्थ न निकल पा रहा हो।'
अवध सुगर मिल्स • हरगाँव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1959 A.L.J. 754F.B. में कहा गया है कि यद्यपि यह सत्य है कि प्रस्तावना या लम्बा शीर्षक किसी अधिनियम की व्याख्या करने में एकमात्र आधार नहीं बन सकता, विशेष रूप में उस समय जबकि शीर्षक और प्रस्तावना उस अधिनियम के उपबन्धों की असंगति में हो। फिर भी यह सच है कि शीर्षक और प्रस्तावना पर उस समय विचार किया जा सकता है जबकि उस अधिनियम के मूल उद्देश्य और तत्वों की परिकल्पना की जा रही हो और इस प्रकार प्रस्तावना व्याख्या के लिए कुंजी के रूप में सहायता पहुँचा देती है ।
इस प्रकार प्रस्तावना संविधि की व्याख्या के लिए यदि अनिवार्य अंग नहीं तो एक आवश्यक अंग है। ब्लैक (Black) के अनुसार, यह स्मरण रखना चाहिये कि किसी संविधि की प्रस्तावना उसके अधिनियम के वास्तविक कारणों को अनिवार्य रूप से व्यक्त नहीं करता। इसमें दिखाया गया तथ्य सम्बन्धी विवरण न तो अनिवार्य होता है न ही निष्कर्षात्मक । अतः प्रस्तावना के आधार पर विधि-निर्माताओं के आशय और प्रयोजन को साक्ष्य मानने की बात पर अत्यधिक बल नहीं दिया जाना चाहिये ।
ऐसी धारायें जो प्रस्तावना और अधिनियम के प्रयोजन की असंगति में होकर भी अवैध नहीं (Sections not invalid for inconsistency with preamble and object of the Act) - अब्दुल रहमान ब० आर० एन० कुलकर्णी, ए० आई० आर० 1962, बम्बई 287. में कहा गया है कि यह एक सामान्य सिद्धान्त है कि न तो प्रस्तावना और न प्रकल्पित प्रयोजन ही, अधिनियम की स्पष्ट भाषा को नियन्त्रित कर सकने में समर्थ हैं। उनसे केवल ऐसी स्थिति में अर्थ- संरचना में सहायता मिलती है, जबकि अर्थ सम्बन्धी कोई अस्पष्टता या संदिग्धता दिखाई पड़ रही हो। जहाँ भाषा स्पष्ट है, वहाँ न्यायालय उस भाषा के प्रभाव को लागू करने के लिए बाध्य है। यदि कहीं एक से अधिक अर्थ दिखाई पड़ रहा है, तो वहाँ वह अर्थ ही ग्राह्य होगा जो अधिनियम के प्रयोजनों का वर्णन करने वाली प्रस्तावना में आशयित होगा।
वास्तव में उद्देशिका में अधिनियम के प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन होता है और इसलिए यह कानून का ही एक भाग है। इस कारण न्यायालयों ने इसको निर्वचन के एक आंतरिक सहयोगी के रूप में मान्यता प्रदान की है। परन्तु यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि किसी अधिनियम की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध है तो निर्वचन के सहयोगी के रूप में उद्देशिका की कोई भूमिका नहीं है। परन्तु जहाँ किसी विशिष्ट उपबन्ध के यदि एक से अधिक अर्थ निकलते हों तो उसके वास्तविक अर्थ की जानकारी के लिए उद्देशिका से सहायता ली जा सकती है। उदाहरणार्थ-
(i) केदार नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य A.I.R. 1953 S.C. 404 में यह प्रश्न था कि क्या पश्चिम बंगाल आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 1949 की धारा 4 संविधान के अनुच्छेद 14 का इसलिए अतिक्रमण करती है क्योंकि यह उपबन्ध राज्य सरकार को यह चुनने का, कि कौन से अपराध विशेष प्रक्रिया के अंतर्गत विशेष न्यायालयों द्वारा विचारणीय हों, मनमाना अधिकार देती है जिससे उन मामलों में अभियुक्त सामान्य प्रक्रिया के अंतर्गत साधारण न्यायालयों द्वारा विचारण किये जाने से मिलने वाले लाभों से वंचित रह जाते हैं। उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम की उद्देशिका, "कतिपय अपराधों के अधिक शीघ्र विचारण व अधिक प्रभावी दण्ड प्रदान करना समीचीन है-" की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इससे यह स्पष्ट है कि कुछ अपराधों का विचारण विशेष प्रक्रिया द्वारा अधिक शीघ्रता से एवं अधिक प्रभावी दण्ड व्यवस्था के अंतर्गत किया जाना चाहिए जिसके लिए अधिनियम ने राज्य सरकार को यह विवेकाधार प्रदान किया है कि वह उन मामलों को चुने । अतः संविधान के अनुच्छेद 14 का कोई अतिक्रमण नहीं होता ।
(ii) ए० सी० शर्मा बनाम दिल्ली प्रशासन A.L.R. 1273 S.C. 913 में अपीलार्थी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 की धारा 5 के अंतर्गत स्वयं की दोषसिद्धि को चुनौती दी। उसका तर्क था कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन की स्थापना के पश्चात् दिल्ली पुलिस के भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का घूसखोरी के मामलों में अन्वेषण का अधिकार समाप्त हो गया क्योंकि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 की उद्देशिका ऐसा ही दर्शाती है। इस तर्क को नामंजूर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी कानून के असंदिग्ध व स्पष्ट शब्दों में कोई उद्देशिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती। 1946 के उपर्युक्त अधिनियम की धारा 13 के द्वारा दिल्ली विशेष पुलिस को भी ऐसे मामलों में अन्वेषण का अधिकार है और यह अधिनियमिति कहीं पर भी यह नहीं कहती कि नियमित दिल्ली पुलिस की भ्रष्टाचार निरोध शाखा के अन्वेषण का अधिकार समाप्त हो गया । 1946 का अधिनियम केवल एक अनुज्ञेय विधान
(iii) आत्म प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य A.I.R. 1986 S.C. 895 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भले ही संविधान की व्याख्या करनी हो या किसी कानून की संवैधानिक प्रामाणिकता की जाँच करनी हो, एक मुख्य नियम यह है कि संविधान की उद्देशिका को पथप्रदर्शक रोशनी तथा राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों को निर्वचन की पुस्तक के रूप में देखना चाहिए। उद्देशिका में लोक आशा और आकांक्षा अन्तर्निहित हैं तथा निदेशक सिद्धान्त प्राप्त करने वाले उद्देश्यों को स्पष्ट करता है। जब संविधान के परिप्रेक्ष्य में कानूनों की जाँच की जानी होती है तो इन्हीं चश्मों की • सहायता से न्यायालय को "दूर दृष्टि" तथा "निकट दृष्टि" देखनी होती हैं। संविधान "सुई जेनेरिस " होने के कारण जहाँ संवैधानिक विवाद्यकों पर ध्यान दिया जा रहा है तंग निर्वचनीय नियम, जो विधायनी अधिनियमितियों के निर्वचन के लिये सुसंगत हैं अयोग्य हो सकते हैं। सन् 1977 में संविधान के बयालीसवें संशोधन द्वारा भारत एक समाजवादी गणतन्त्र बना। शब्द "समाजवादी" को संविधान की उद्देशिका में जोड़ा गया। यह शब्द जो जब जमता की आशा एवं आकांक्षाओं का केन्द्र बन गया है तथा जो संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में वर्णित सभी आशाओं के पथप्रदर्शन एवं प्रेरणा संकेत हैं, प्राचीन सामन्तवादी और शोषित समाज के स्थान पर नवीन गुंजायमान समाजवादी कल्याणकारी समाज निर्माण का स्पष्ट मार्गदर्शक है। चाहे संविधान के किसी अनुच्छेद का निर्वचन हो या किसी अन्य कानून की संवैधानिकता का परीक्षण, न्यायालयों को इस प्रकार की व्याख्या करनी चाहिए जो समाजवादी लोकतान्त्रिक राज्य की ओर बढे।
3. लघु शीर्षक या संक्षिप्त नाम ( Short Title ) - किसी कानून का लघु शीर्षक उसे पहचानने की दृष्टि से नामकरण मात्र है। यद्यपि यह उस कानून की एक विशिष्टि है तथापि उस कानून के किसी उपबन्ध को निर्वचित करते समय इससे कोई सहायता नहीं ली जा सकती। किसी स्पष्ट उपबन्ध को न तो यह विस्तृत कर सकता है और न ही संक्षिप्त ।
4. दीर्घ शीर्षक या विस्तृत नाम (Long Title) - प्रत्येक कानून अपने नाम के बाद दीर्घ शीर्षक से ही प्रारम्भ होता है। इसका हेतु उस कानून के उद्देश्यों के बारे में एक साधारण जानकारी देना है। उदाहरणार्थ; दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का दीर्घ शीर्षक है "दण्ड प्रक्रिया सम्बन्धी विध का समेकन और संशोधन करने के लिए अधिनियम" ।
प्राचीन काल में दीर्घ शीर्षक को कानून का भाग नहीं माना जाता था और इसलिए कानून के निर्वचन में एक आन्तरिक सहयोगी के रूप में इसकी कोई मान्यता नहीं थी। परन्त अब वर्तमान में न्यायालयों के दृष्टिकोण में निश्चित परिवर्तन हुआ है और अनेक अवसरों पर कानून के उपबन्धों के निर्वचन में न्यायालय ने उसके दीर्घ शीर्षक से सहयोग लिया है। उदाहरणार्थ-
(i) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस A.I.R. 1952 S.C. 369 में याची उच्चतम न्यायालय तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय दोनों का ही अधिवक्ता था। उसने रजिस्ट्री की मूल शाखा में स्वयं के पक्ष में अपने मुवक्किल की ओर से उपस्थित होने का समुचित आधार दाखिल किया। इस आधार पर कि उच्च न्यायालय की मूल शाखा के नियम एवं आदेश के अन्तर्गत एक अधिवक्ता केवल अभिवाक् कर सकता है कार्य नहीं, उसके आधार को वापस कर दिया गया। याची ने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय का अधिवक्ता होने के कारण वह अटर्नी से बिना कोई अनुदेश प्राप्त किए स्वयं ही कार्य एवं अभिवाक् दोनों ही कर सकता है। उच्चतम न्यायालय के उच्चतम न्यायालय (उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय) अधिनियम, 1951 के दीर्घ शीर्षक " अधिनियम जो उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ताओं को किसी भी उच्च न्यायालय में अधिकार स्वरूप विधि-व्यवसाय करने को प्राधिकृत करता है” की ओर ध्यान देते हुए याची का तर्क स्वीकार कर उसे अपसे मुवक्किल की ओर से कार्य और अभिवाक् करने की स्वीकृति प्रदान की गई।
(ii) केदार नाथ बनाम पश्चिम बंगाल राज्य A.I.R. 1953 S.C. 404 में पश्चिम बंगाल आपराधिक संशोधन अधिनियम, 1949 की धारा 4 की व्याख्या का प्रश्न था। इस धारा के अंतर्गत राज्य सरकार को यह चुनने का अधिकार था कि कौन से मामले निर्देश के लिये प्रक्रिया के अन्तर्गत विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय होंगे। इसे इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का अतिक्रमण करता है। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए अन्य बातों के साथ-साथ यह निर्धारित किया कि इस अधिनियम का दीर्घ शीर्षक "अधिनियम जो कतिपय अपराधों का अधिक शीघ्र विचारण व अधिक प्रभावपूर्ण दण्ड का प्रबन्ध करता है" स्पष्ट रूप से राज्य सरकार को विवेकाधिकार प्रदान करता है कि कौन से अपराध विशेष न्यायालयों द्वारा विशेष प्रक्रिया के अन्तर्गत विचारणीय होने चाहियें।
5. हासियाँ टिप्पणियाँ (Marginal Notes) – हासियाँ टिप्पणियाँ वे टिप्पणियाँ हैं जो किसी अधिनियम में धाराओं की बगल में लिखी जाती हैं और धाराओं के प्रभाव को स्पष्ट करती हैं। प्राचीन काल में जब किसी संविधि के वास्तविक अर्थ के बारे में कोई शंका होती थी तो कभी-कभी हासियां टिप्पणी की सहायता से भी उस संविधि का उचित अर्थ ज्ञात कर लिया जाता था। परन्तु न्यायालयों का आधुनिक मत यह है कि कानून के निर्वचन में हासियाँ टिप्पण का कोई योगदान नहीं है। इस मत का आधार यह है कि हासियाँ टिप्पण कानून का भाग नहीं है क्योंकि उन्हें विधायक निर्धारित नहीं करते और न ही उन्हें विधायिका के अनुदेश या प्रभुत्व के अंतर्गत हासियाँ में मुद्रित किया जाता। इन टिप्पण को पाण्डु-लेखक के द्वारा निविष्ट किया जाता है और कभी-कभी तो वे अशुद्ध भी हो सकते हैं। कभी कभी अपवादपूर्ण अवस्थाओं में हासियाँ टिप्पणी, को विधायिका द्वारा भी निविष्ट किया गया है और इसलिए इस प्रकार की किसी अधिनियमिति का निर्वचन करते समय हासियाँ टिप्पण से भी सहयोग लिया जा सकता है। भारतीय संविधान ऐसा ही एक उदाहरण है। इसमें हासियाँ टिप्पण संविधान सभा द्वारा ही निविष्ट किये गये थे और। इसलिये भारतीय संविधान के किसी भाग का निर्वचन करते समय हासियाँ टिप्पणी से सहायता। ली जा सकती है। उदाहरणार्थ-
(i) बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1955 S.C. 661 में उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से यह निर्धारित किया कि संविधान के अनु० 286 की हासियाँ टिप्पणी संविधान का ही भाग है और इस कारण उस अनुच्छेद के उद्देश्य एवं अर्थ को समझने के लिये इसका सहयोग लिया जा सकता है। अनु० 286 की हासियाँ टिप्पणी है—“माल के क्रय या विक्रय पर कर के आरोपण के बारे में बन्धन"। यह ब्रिटिश संसद के अधिनियमों के हासियाँ टिप्पण के विपरीत संविधान सभा द्वारा पारित किये जाने के कारण संविधान का भाग है और प्रथम दृष्ट्या उस अनुच्छेद के उद्देश्य और अर्थ को जानने का संकेत है। परन्तु न्यायमूर्ति वेंकटरामा अय्यर ने अपने अल्पमत निर्णय में कहा कि अनु० 286 (1) (क) के हासियाँ टिप्पण से उसके स्पष्टीकरण के निर्वचन में सहयोग लिया जा सकता है तथा यह संविधान में प्रयुक्त शब्दों के स्पष्ट अर्थ को बदल नहीं सकता।
(ii) के० पी० वर्गीज बनाम आयकर अधिकारी A.I.R. 1981 S.C. 1922 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यद्यपि यह सच है कि किसी धारा का निर्वचन करते समय उस धारा के हासियाँ टिप्पणी से कोई सहयोग नहीं लिया जा सकता फिर भी इससे इस बात का ज्ञान तो हो सकता है कि धारा का झुकाव किस ओर है एवं धारा का सम्बन्ध किस विषय से है। यह किसी धारा के शब्दों के निर्वचन को नियन्त्रित नहीं कर सकता विशेषकर उस समय जब धारा की भाषा स्पष्ट एवं असंदिग्ध हो । परन्तु उस कानून का भाग होने पर यह प्रथमदृष्ट्या धारा के उद्देश्य और अर्थ की ओर कुछ संकेत देता है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 52 के प्रारम्भ में उस भाग का हासियाँ टिप्पण था जो आज उपधारा (1) है और विशेष बात यह है कि उपधारा (2) के जोड़ दिए जाने के बाद भी यह हासियाँ टिप्पण ज्यों का त्यों बना हुआ है। इससे यह स्पष्ट है कि संसद् इसको दोनों उपधाराओं पर लागू करना चाहती थी और इसलिए यह सुस्पष्ट है कि उपधारा (1) की तरह उपधारा (2) भी उन मामलों से सम्बन्धित है जहाँ अन्तरण के सन्दर्भ में प्रतिफल को कम करके बताया गया हो।
6. धाराओं के शीर्षक (Headings of Sections) - प्रायः देखा गया है कि संविधियों में धारा के शीर्षक एक धारा या कुछ धाराओं के समूह के साथ ऊपर दिये जाते हैं। न्यायालयों ने शीर्षक को धारा एवं धाराओं के समूह को उद्देशिका माना है। इसलिए किसी संविधि के निर्वचन में शीर्षक को उद्देशिका के समान ही महत्व प्रदान किया गया है तथा उद्देशिका पर लागू होने वाले नियम लागू होते हैं। अतः यदि अधिनियमिति की भाषा से उसका अर्थ स्पष्ट हो तो शीर्षक से कोई सहयोग नहीं लिया जा सकता। परन्तु यदि उसके एक से अधिक युक्तियुक्त अर्थ निकलते हों तो उनमें से कौन सा अर्थ उचित है ज्ञात करने के लिए शीर्षक से सहायता ली जा सकती है। उदाहरणार्थ - भींका बनाम चरणसिंह A.I.R. 1959 S.C. 960 में अपीलार्थी उत्तरदाता भू-स्वामी का किरायेदार था। उत्तरदाता अपीलार्थी को उत्तर प्रदेश किरायेदारी अधिनियम, 1939 की धारा 180 के अंतर्गत बेदखल करना चाहता था। इस धारा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी भूमि के टुकड़े पर उस व्यक्ति को, जो उसको उसमें प्रवेश देने का हकदार है, अनुमति के बगैर तथा विधि के उपबन्धों के प्रतिकूल कब्जा कर लेता है या कब्जा बनाये रखता है तो उसको बेदखल करने का अधिकार होगा। उच्चतम न्यायालय ने अपीलार्थी के इस तर्क से सहमत होते हुए कि यह उपबन्ध प्रस्तुत दृष्टान्त में लागू नहीं होता क्योंकि उसके पास दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 145 के आदेश के अंतर्गत कब्जा था, स्पष्ट किया कि धारा 180 केवल उन मामलों पर ही लागू होती है जहाँ भू-स्वामी उन व्यक्तियों को बेदखल करने का प्रयत्न करता है जिनके पास कब्जे का कोई अधिकार नहीं है। यह बात और भी अधिक उस धारा के शीर्षक “भूमि पर बिना स्वत्व के कब्जा करने वाले व्यक्ति का निष्कासन" से साबित होती है।
7. परिभाषा या निर्वचन खण्ड (Definition or Interpretation Clauses) - परिभाषा या निर्वचन खण्डों को कानून में साधारणतया कुछ अभिव्यक्तियों के प्राकृतिक अर्थों की परिभाषा के अनुसार विस्तृत करने या उन शब्दों को जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं हैं परिभाषा के अनुसार अर्थ देने के उद्देश्य से शामिल किया जाता है। साधारणतया निर्वचन खंड में दिए गए किसी विशिष्ट शब्द के अर्थ का आशय यही है कि उस कानून में जहाँ पर उस शब्द का प्रयोग हुआ है उसे निर्वचन खंड में स्पष्ट किए गए अर्थ में ही लिया जाए। इस नियम का केवल एक अपवाद यही है कि यदि किसी संदर्भ में उस शब्द का निर्वाचन खंड में दिया गया अर्थ बेतुका व निरर्थक है तो उस उपबन्ध का निर्वचन करते समय न्यायालय उस शब्द का वह अर्थ नहीं लेंगे। इसी प्रकार किसी एक अधिनियम के निर्वचन खंड में दिए गए शब्द के अर्थ को अन्य अधिनियम में लागू नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि दोनों कानून साम्य विषय-वस्तु कानून हैं, तथा एक शब्द जिसका प्रयोग दोनों कानूनों में किया गया है पर जिसे एक कानून के निर्वचन खण्ड द्वारा परिभाषित किया गया 1 है, दूसरे कानून में भी उसी अर्थ में लिया जाएगा। उदाहरणार्थ- (i) प्रद्युत कुमार बनाम मुख्य न्यायाधीश, कलकत्ता AIR. 1956 S.C. 285 में अपीलार्थी, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय का रजिस्ट्रार था, को उत्तरदाता ने बर्खास्त कर दिया। अपीलार्थी ने इसको इस आधार पर चुनौती दी कि उत्तरदाता मुख्य न्यायाधीश के पास बर्खास्त आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि संविधान ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को नियुक्त करने का अधिकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दिया है। साधारण खंड अधिनियम की धारा 16 (1), जो संविधान के अनुच्छेद 367 (1) के अनुसार संविधान पर भी लागू होती है, के अनुसार नियुक्त करने के अधिकार में बर्खास्त करने का अधिकार भी शामिल है अतः अपीलार्थी की अपील स्वीकार करने योग्य नहीं है।
8. परन्तुक (Provisos) – परन्तुक धारा का एक भाग होता है और इसे धारा से अलग नहीं किया जा सकता । परन्तुक धारा को नष्ट नहीं करता बल्कि शर्त लगा देता है। परन्तुक धारा का सहायक होता है। यदि धारा और परन्तुक में संघर्ष (Conflict) हो तो परन्तुक भाग को छोड़ा - जा सकता है। वास्तव में परन्तुक का अभिप्राय मुख्य धारा के उपबन्ध पर कुछ रोक लगाना होता ।। परन्तु परन्तुक किसी अधिनियम की पूरी व्यवस्था को नष्ट नहीं कर सकता। परन्तुक का मुख्य • कार्य किसी संविधि की सामान्य व्यवस्थाओं पर अपवाद पेश करना होता है। दूसरे शब्दों में उस अपवाद को छोड़कर जो परन्तुक द्वारा पेश किया गया है, अधिनियम का सामान्य प्रभाव ज्यों का त्यों बना रहता है। उदाहरणार्थ-
(i) टी० देवदासन बनाम भारत संघ A.I.R. 1964 S.C. 179 में याची ने कहा कि यदि संघ लोक सेवा आयोग ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जातियों के लिए आरक्षित कोटा का पालन किया होता तो उसको भी पदोन्नति का अवसर मिलता। इसके स्थान पर संघ के द्वारा अग्रनयन सिद्धान्त पालन किए जाने के कारण एक वर्ष में आरक्षित कोटा भरा न जाने के कारण उसे अगले वर्ष के लिए अग्रनयित कर दिया गया जिससे अगले वर्ष का आरक्षित कोटा बढ़कर पैंसठ प्रतिशत हो गया। यह संविधान के अनु० 16 (1), का अतिक्रमण है। उत्तरदाता का तर्क था कि संविधान के अनु० 16 (4) के अनुसार इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनके प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी।
अतः अमनयन का सिद्धान्त वैध है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि भारत संघ का तर्क मान्य नहीं हो सकता क्योंकि अनु० 16 (4) के अन्तर्गत नियुक्तियों का असीमित आरक्षण अनु० 16 (1) की आत्मा को नष्ट कर देगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 16 के खण्ड (4) को इसी अनुच्छेद के खण्ड (1) का परन्तुक जैसा समझना चाहिए और इसलिए उसको इस प्रकार निर्वाचित नहीं किया जा सकता जिससे प्रमुख उपबन्ध ही नष्ट हो जाए।
(ii) एस० सुन्दरम् बनाम ही० आर० पट्टाभिरमण A.I.R. 1985 S.C. 582 में कहा गया कि परन्तुक निम्नलिखित चार उद्देश्यों को पूरा कर सकता है- (i) वह मुख्य अधिनियमिति से कुछ विषयों को अपवाद बनाए या विशेषित करें,
(ii) वह अधिनियमित को व्यावहारिक बनाने के लिए कुछ आज्ञापक दशाओं के पूर्ण किए
जाने पर जोर देकर अधिनियमिति की धारणा या आशय को ही सम्पूर्णतः परिवर्तित करे, (iii) वह अधिनियम में ही इस प्रकार शामिल हो कि वह अधिनियमिति का ही एक आवश्यक भाग बन जाए और इस प्रकार स्वयं भी अधिष्ठायी अधिनियमिति का भाव एवं रंग प्राप्त कर ले, तथा
(iv) वह अधिनियमिति के केवल एक वैकल्पिक परिशिष्ट की तरह कार्य करे जिसका केवल उद्देश्य कानूनी उपबन्ध के वास्तविक आशय को स्पष्ट करना हो।
9. उदाहरण या दृष्टान्त (Illustrations) - प्रायः देखा गया है कि कानून की धाराओं में उदाहरण इस आशय से जोड़े जाते हैं कि धाराओं के अन्तर्गत वर्णित विधि के उपबन्धों को और अधिक स्पष्ट किया जा सके। चूँकि उदाहरण विधायिका के आशय का ज्ञान कराते हैं अतः वे कानून बनाने वाले के आशय का अच्छा संकेत हैं। परन्तु किसी स्पष्ट अधिनियमिति को उसमें वर्णित उदाहरणों के आधार पर विस्तृत या सीमित अर्थ नहीं दिया जा सकता। उदाहरणार्थ-
(i) शम्भू नाथ बनाम अजमेर राज्य AIR 1965 S.C. 104 में सबूत के भार की चर्चा करते हुए उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 धारा 101 का अपवाद है एवं धारा 101 अपने उदाहरण (क) के साथ मिलकर आपराधिक विधिशास्त्र का मूल नियम कि किसी मामले को साबित करना अभियोजन का उत्तरदायित्व है, पर जोर देता है। धारा 106 का उदाहरण (ख) भारतीय रेल अधिनियम, 1890 की धाराओं 112 व 113 पर लागू होता है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि उदाहरण जिस धारा को स्पष्ट करता है उसकी सम्पूर्ण मात्रा को खत्म नहीं करता और न ही उसके क्षेत्र को विस्तृत या सीमित करता।
(ii) महेश चन्द्र शर्मा बनाम राजकुमारी शर्मा A.1. R. 1996 S.C. 869 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दृष्टान्त धारा का ही भाग है और यह धारा के सिद्धान्तों को सुस्पष्ट करने में सहायक होता है।
10. अपवाद एवं व्यावृत्ति खण्ड (Exceptions and Saving Clauses ) - आमतौर से किसी संविधि में अपवाद ऐसी विषय-वस्तु को अधिनियमिति के क्षेत्र से परे रखने के लिए शामिल किया जाता है जो, यदि ऐसा न किया जाता तो, अधिनियमित के क्षेत्र में ही होता। अपवाद इस बात की पुष्टि करता है कि जो विषय अपवाद के रूप में अलग नहीं किये गए हैं वे प्रमुख उपबन्ध में शामिल हैं। प्रमुख उपबन्ध व अपवाद में आपस में असंगति या विरोध के समय उपबन्ध को ही महत्वपूर्ण मानना चाहिये यद्यपि अपवादस्वरूप कुछ ऐसे निर्णय भी वर्तमान हैं जिनमें अपवाद को विधायिका का अंतिम आशय मानकर उसे ही अधिक महत्व दिया गया है।
व्यावृत्ति खंड साधारणतः किसी कानून के निरसन व पुनः अधिनियमन की दशा में शामिल किये जाते हैं। इसके द्वारा निरसित कानून के अंतर्गत स्थापित अधिकारों में कोई विघ्न नहीं डाला जाता है और न हीं नये अधिकार दिये जाते हैं। सामान्यतः व्यावृत्ति खंड को निरसन करने वाले कानून में शामिल किया जाता है। कानून के प्रमुख भाग और व्यावृत्ति खंड में विरोध होने पर व्यावृत्ति खंड को अस्वीकार किया जाना चाहिये।
11. स्पष्टीकरण (Explanations) - उपबन्धों के अर्थों को सुस्पष्ट करने के उद्देश्य से तथा शंका व संदिग्धता (Ambiguity) को दूर करने के आशय से स्पष्टीकरण शामिल किए जाते हैं। स्पष्टीकरण उपबन्धों के अर्थ को विस्तारित नहीं करता वरन् केवल उसके सच्चे वास्तविक अर्थ को समझने में सहयोग देता है। उदाहरणार्थ-
(i) बंगाल इम्यूनिटी कम्पनी बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1955 S.C. 661 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्पष्टीकरण जिस धारा के साथ शामिल किया जाता है उसका ही भाग है और उपबन्ध के वास्तविक अर्थ को जानने के लिए सम्पूर्ण धारा जिसमें स्पष्टीकरण भी शामिल है, को सम्पूर्ण रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए। एक विधिक कल्पना जिस उद्देश्य के लिए गढ़ी गई है वहीं तक सीमित है और उस सीमा के बाहर लागू नहीं की जानी चाहिये। इस मामले में स्पष्टीकरण का प्रकट उद्देश्य अनु० 286 (1) के उपखंड (क) के बाह्य विक्रय को स्पष्ट करना है। खंड 1(1) में दिये गये स्पष्टीकरण को खंड (2) में एक अपवाद के रूप में या उसके परन्तुक के रूप में या खंड (2) के क्षेत्र की सीमित करने के रूप में लागू नहीं किया जा सकता। अतः केवल उन अवस्थाओं को छोड़कर जिनमें संसद विधि द्वारा अन्यथा न पारित करे, कोई राज्य विधान मण्डल विक्रय या क्रय पर कोई कर न तो आरोपित कर सकती है और न ही कर अधिरोपण का अनुमोदन कर सकती है, यदि यह विक्रय या क्रय अन्तर्राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान हुआ हो और भले ही वह स्पष्टीकरण के अन्तर्गत हो या नहीं।
(ii) एस० सुन्दरम् बनाम ह्वी० आर० पट्टाभिरमण AIR. 1985 SC 582 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अब यह निश्चित है कि किसी कानूनी उपबन्ध में जोड़ा गया स्पष्टीकरण किसी प्रकार से अधिष्ठायी उपबन्ध नहीं है, परन्तु जैसा कि इस शब्द के स्पष्ट अर्थ से ही प्रकट है, यह केवल कानूनी उपबन्ध में उपस्थित किसी प्रकार की असंदिग्धता को स्पष्ट करने या सुलझाने के लिए जोड़ा जाता है। किसी कानूनी उपबन्ध में स्पष्टीकरण का निम्नलिखित पाँच उद्देश्य हैं-
(i) स्वयं अधिनियम के अर्थ तथा आशय को स्पष्ट करना;
(ii) जहाँ कहीं मुख्य अधिनियमिति में शंका या संदिग्धता हो उसे इस प्रकार से स्पष्ट करना कि वह अधिनियम के मुख्य उद्देश्य के समनुरूप हो;
(iii) अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य को और अधिक अर्थपूर्ण एवं उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए एक अतिरिक्त स्तम्भ प्रदान करना;
(iv) स्पष्टीकरण किसी प्रकार से अधिनियमिति या उसके किसी भाग में न हो हस्तक्षेप कर सकता है और न ही उसे परिवर्तित कर सकता है, परन्तु जहाँ कोई रिक्त स्थान छोड़ दिया गया हो जो स्पष्टीकरण के उद्देश्य से सुसंगत हो, तो रिष्टि को दबाने और अधिनियम के उद्देश्य को बढ़ाने के लिए यह न्यायालय को, अधिनियमिति के वास्तविक अर्थ एवं आशय को प्राप्त करने के आशय से. उचित निर्वचन में सहायता दे सकता है; तथा
(v). कानून द्वारा प्रदत्त किसी अधिकार को यह छीन नहीं सकता और न ही अधिनियम के निर्वाचन में रोड़ा अटका कर उसके संचालन को नष्ट कर सकता।
12. अनुसूची (Schedules) – अनुसूची सामान्यतः उस अधिनियम के अन्तर्गत और अधिकारों का किस प्रकार निपटारा किया जाय या अधिनियम के द्वारा प्रदान की गई शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जाय, बतलाती है। कभी-कभी अनुसूची में एक तालिका के रूप में कुछ विषय भी वर्णित किये जाते हैं जिनका आशय उपयुक्त या अधिनियम को अधिक कारगर बनाना होता है। भारतीय संविधान एक ऐसा ही उदाहरण है। अनुसूची कानून का भाग होती है और किसी धारा का निर्वचन करते समय न्यायालय अनुसूची से सहयोग ले सकता है। इसी प्रकार अधिनियम की सच्ची आत्मा को समझने के लिए अनुसूची का निर्वचन करते समय धाराओं से भी सहयोग लिया जा सकता है। उदाहरणार्थ- मै० एफाली फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1989 S.C. 2227 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी अधिनियम की अनुसूची एवं मुख्य धारा में विरोध होने पर मुख्य धारा ही प्रबल रहती है और अनुसूची को अमान्य घोषित किया जाता है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि आयुर्वेदिक औषधि "अश्वगंधारिष्ट" जिसमें आत्म उत्पन्न मद्य (एलकोहॉल) रहता है परन्तु जिसे सामान्य मदिरा (मादक पेय) के रूप में नहीं पिया जा सकता, उत्पाद शुल्क से मुक्त होगा।
13. विराम चिन्ह (Punctuations) - स्मरणीय है कि प्राचीन काल में कानून बिना विरामादि-विधानों के पारित किये जाते थे और इसलिये यह स्वाभाविक ही था कि न्यायालय इस ओर ध्यान नहीं देते थे। परन्तु आधुनिक युग में विरामादि विधानों में प्रयोग होते हैं। अतः जब कोई विषय न्यायालय के निर्वचन के लिए आता है तो न्यायालय उस उपबन्ध को पहले उसी आकार में देखता है जिस आकार में विरामादि-विधानों सहित वह अस्तित्व में है और यदि न्यायालय समझता है कि उसके विरामादि-विधानों सहित अर्थ में कोई निरर्थकता या संदिग्धता नहीं है तो वह उसे उसी प्रकार निर्वचित कर देता है। परन्तु विरामादि-विधानों सहित निर्वचन करते समय कोई निरर्थकता या संदिग्धता का बोध होता हो तो न्यायालय पूरे उपबन्ध को बिना विरामादि-विधानों के पढ़ेगा और यदि उससे स्पष्ट हो तो विरामादि-विधानों को कोई महत्व दिये बगैर इस प्रकार व्याख्या कर देगा। उदाहरणार्थ-
(i) ए० के० गोपालन बनाम मद्रास राज्य ए० आई० एस० 1950 एस० सी० 27 में संविधान अनु० 22 (7) में अल्पविराम के महत्व को समझाते हुए उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के न्यायमूर्ति कानिया ने स्पष्ट किया कि उपखंड के प्रथम भाग में शब्द "किन" व "किस" का दो बार प्रयोग एवं प्रत्येक बार के बाद अल्पविराम यह दर्शाता है कि संविधान निर्माता इनका प्रयोग संयुक्त रूप में न कर विभाजन के रूप में करना चाहते थे। इस व्याख्या को बाद में स्वयं उच्चतम . न्यायालय के वृहत् बेंच द्वारा शम्भू नाथ सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य ए० आई० आर० 1973 एस० सी० 1425. में इस आधार पर पलट दिया गया कि अनुच्छेद के संदर्भ में ऐसा उचित नहीं था।
(ii) अश्विनी कुमार बनाम अरविन्द बोस ए० आई० आर० 1952 एस० सी० 369. में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि विरामादि-विधानों को "नियन्त्रण करने वाले तत्व" नहीं माना जा सकता और इसलिये वे विधान के स्पष्ट अर्थ को नियन्त्रित नहीं कर सकते।
14. सामान्य उपशीर्षक (General Sub-Heading) – जहाँ किसी अधिनियम की किसी धारा में प्रयुक्त भाषा स्पष्ट है, वहाँ उस सामान्य शीर्षक का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिसके अन्तर्गत वह धारा वर्णित है। उपशीर्षकों का उस भाषा पर प्रभाव नहीं कहा जा सकता जिसका उपयोग उस धारा में किया गया है। किसी एक संविधि की विभिन्न धाराओं के उपशीर्षकों को किसी अन्य विशिष्ट उपशीर्षक से उत्पन्न होने वाली संदिग्ध अभिव्यक्ति को स्पष्ट करने के उपयोग में लाया जा सकता है। वे उप शीर्षक अधिनियम में प्रयुक्त शब्दों के स्पष्ट अर्थ को नियंत्रित नहीं कर सकते भले ही कुछ ऐसे प्रसंगों में प्रस्तावना में दिखाई गई दिशा के अनुरूप उन उपशीर्षकों से सहायता ली जा सकती हो जबकि किसी धारा का अर्थ उस दृष्टि से संदिग्ध हो ।
आधुनिक संविधियों में प्रत्येक धारा पर दिया गया उपशीर्षक उस धारा के लिए प्रस्तावनास्वरूप माना जाता है। वे संविधि के स्पष्ट शब्दों को नियंत्रित नहीं कर सकते, किन्तु संदिग्ध शब्दों को वे स्पष्ट कर सकते हैं। यदि उस धारा के किन्हीं शब्दों की व्याख्या में कोई सन्देह दिखाई पड़ता है, तो निश्चय ही उपशीर्षक से न्यायालयों को इस बात से सहायता मिलती है कि उस सन्देह को दूर कर सके। मिका ब० चरनसिंह 1959 आल० एल० जे० 557.
15. संयुक्तात्मक और वियुक्तात्मक शब्द (Conjunctive and Disjunctive Words) - न्यायालय द्वारा यह निष्कर्ष दिया गया है कि ऐसी परिस्थितियाँ हो सकती हैं जबकि किसी संविधि में प्रयुक्त संयुक्तात्मक शब्द 'और' का अर्थ वियुक्तात्मक शब्द 'अथवा' के रूप में या 'अथवा' का 'और' के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। किन्तु आपराधिक या दाण्डिक विधायन में संयुक्तात्मक शब्दों को वियुक्तात्मक रूप में या वियुक्तात्मक शब्दों को संयुक्तात्मक के रूप में कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, विशेष रूप से उस समय जब कि ऐसा अर्थ ग्रहण करने से अपराध की मात्रा में और भी वृद्धि हो रही हो। (राज्य बनाम वाल्टर्स, 97 एन० सी० 489) I
न्यायालय को यह मानना पड़ेगा कि विधायिका ने जिस अभिव्यक्ति के लिए जिस विशिष्ट शब्द का चयन किया है, वह उद्देश्यपूर्ण है और वही अर्थ ग्रहण भी किया जाना चाहिये जो विधायिका द्वारा निर्धारित है। जब तक कि व्याख्या में कोई शब्द अभीप्सित अर्थ के अतिरिक्त कोई अन्य अर्थ न देने लगे, तब तक व्याकरणमूल अर्थ को ही स्वीकार किया जाना चाहिये । इसीलिये 'और' के स्थान पर 'अथवा' या 'अथवा' के स्थान पर 'और' का अर्थ तभी स्वीकार किया जाना चाहिये जब व्याख्या सम्बन्धी कोई स्पष्ट भ्रान्ति दिखाई पड़ रही हो, और ऐसा करने से विधायिका के आशय की रक्षा करते हुये संविधि का तर्कसंगत अर्थ निकल रहा हो।
'अथवा' शब्द को 'और' के रूप में कदापि नहीं पढ़ा जा सकता। यदि प्रयुक्त छोटे शब्द स्पष्ट और असंदिग्ध हैं तो अनिवार्य रूप से उनका साधारण अर्थ ही ग्राह्य होगा। केवल यह तथ्य कि एक संविधि के परिणाम अनुचित हो जायेंगे, न्यायालय को इस बात के लिए हकदार नहीं बना देता कि वह उसे प्रभावी बनाने से इन्कार कर दे। यदि एक अधिनियम में किसी शब्द की दो भिन्न-भिन्न व्याख्यायें की गयी हैं, तो वहाँ न्यायालय उस व्याख्या को ग्रहण करेगा जो उचित, युक्तयुक्त और व्यावहारिक हो, में यह उसके मुकाबले में जो इन गुणों से युक्त नहीं है।
16. लिंग (Gender) - प्रायः यह देखा गया है कि संविधियों में केवल पुल्लिंग बोधक शब्दों का ही प्रयोग किया जाता है परन्तु व्याख्या में यह स्त्री-पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है। अर्थात अधिनियम के उद्देश्यों के लिए He के स्थान पर She पढ़ा जा सकता है।
17. शब्दों का अर्थ (Meaning of Words) - ऐसे शब्द, जिनका अर्थ कई प्रकार का हो, वही अर्थ स्वीकार करना चाहिये जो धारा की सामान्य भाषा के अनुरूप हो। कई शब्द जब एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, और भिन्न-भिन्न अर्थ परिभाषित नहीं हैं तो यह अनुमान कर लेना होगा कि इन भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियों का एक ही अर्थ आशयित है। किन्तु व्याख्या करने में इसे सार्वदेशिक नियम नहीं कह सकते। इससे केवल विधायिका के आशय का संकेत मिलता है जिससे न्यायालय इस बात की कल्पना करता है कि विधानांग ने एक ही प्रकार के कुछ शब्दों को एक साथ एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया है।
क्रेइज के मतानुसार शब्दों और अभिव्यक्तियों की व्याख्या के लिये दो नियम हैं—पहला नियम यह है कि सामान्य परिनियम के लिए प्रथम दृष्टया उपधारित किया जायेगा कि वे अपने प्रसिद्ध भावों में शब्दों को प्रयुक्त करते हैं। दूसरे शब्दों में शब्दों, जो किसी विशिष्ट विज्ञान या कला में लागू नहीं किया जाता है, का अर्थान्वयन किया जाता है जैसे कि वे सामान्य भाषा में समझे जाते हैं। भाषा के स्पष्ट और प्रसिद्ध अर्थ का अनुसरण किया जाना चाहिये। (टाटा इन्जीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव कं० लि० जमशेदपुर बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, ए० आई० आर० 1969 पटना 23)।
दूसरा नियम परिनियम की वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा से सम्बन्धित है। यदि परिनियम विशेष व्यापार, कारबार या संव्यवहार के निर्देश के सम्बन्ध में हो, तब उसमें प्रयुक्त शब्द, जिससे प्रत्येक व्यक्ति उस व्यापार, कारबार या संव्यवहार के सम्बन्ध में परिचित हैं, और उसका विशिष्ट अर्थ होना समझता है, तो उन शब्दों का उस विशिष्ट अर्थ के अनुसार अर्थान्वयन किया जाना चाहिये जो साधारण या प्रसिद्ध अर्थ से भिन्न होता है (टाटा इन्जीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव कं०, जमशेदपुर बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, ए० आई० आर० 1989 पटना 23)।
18. सम्मिलित होना (Include) - सामान्यतः 'सम्मिलित होना' शब्द व्याख्या के उपखण्डों में प्रयोग किया जाता है जिससे शब्द तथा उप-वाक्य जो संविधि में प्रयुक्त हुए हैं और जब वे प्रयोग किय गये हैं तो उनका अर्थ शामिल होने से हैं। ऐसा केवल उनके प्राकृतिक अर्थ से नहीं अपितु वे सभी चीजें भी जब व्याख्या के उप-खण्ड यह घोषणा करते हों, कि वे इसमें शामिल होंगे। (अहमेदुल्ला बनाम हफीजद्दीन अहमद, ए० आइ० आर० (1973) गौहाटी, 56) ।
19. सक्षमकारी और अक्षमकारी संविधियाँ (Enabling and Disabling Statutes) - सक्षमकारी संविधियाँ सामान्य विधि की सम्भावनाओं को वहाँ तक विस्तारित करती हैं जहाँ तक वे अत्यधिक सीमित या प्रतिबन्धित हैं। अक्षमकारी संविधियाँ इसका ठीक विपरीत प्रभाव डालती हैं। वे सामान्य विधि को सीमित और संकुचित करने का काम करती हैं। कोई संविधि जब विधि के किसी ऐसे उपबन्ध को वैध कर देती है, जो अन्यथा रूप में अवैध हो जाता है, तो उसे सक्षमकारी संविधि कहते हैं।
20. खण्डनात्मक वाक्यखण्ड (Non Obstante Clause) कभी-कभी किसी धारा में लिखा होता है, ‘इस अधिनियम की अन्य बातों के होते हुये भी ' [ Notwithstanding anything contained in this Act, or any law for the time being in force] यह वाक्य खण्ड अधिनियम के अन्य वाक्यों के ऊपर अधिभावी और सशक्त होता है। यदि इस वाक्य खण्ड और मुख्य उपबन्ध के बीच कोई ऐसी असंगति उत्पन्न हो गई है, जिसका समाधान नहीं हो सकता तो पहला प्रयत्न दोनों के सौजन्य का अर्थ ग्रहण करना होगा, और यदि यह सौजन्य न स्थापित हो सके तो न्यायालय अधिनियम के उपबन्ध को प्रधानता देगा।
इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा भारत अधिराज्य बनाम बम्बई ए० इरानी, 1955 एस० सी० आर० 206. में कहा गया है कि, 'यद्यपि साधारणतया किसी धारा के मुख्य उपबन्ध और खण्डनात्मक वाक्यखण्ड में बहुत ही निकट सामीप्य होना चाहिये, फिर भी यह सदैव आवश्यक नहीं है कि व्यवहार्य उपबन्ध और खण्डनात्मक वाक्यांश में समरूपता बनी ही रहे और यह कि उसका प्रभाव अधिनियम के स्पष्ट उपबन्ध का खण्डन ही मान लिया जाय। यदि अधिनियम की भाषा स्पष्ट है और उसके शब्द ऐसे हैं कि उनका एक स्पष्ट और व्याकरणमूलक अर्थ निकल जाता है तो खण्डनात्मक वाक्यखण्ड उस स्पष्ट उपबन्ध के क्षेत्र-विस्तार को अल्पीकृत या खण्डित नहीं कर सकता। ऐसी स्थितियों में खण्डनात्मक वाक्य खण्डों का तात्पर्य केवल इतना ही होना चाहिये कि उपबन्ध की सामान्य स्थिति के स्पष्टीकरण के लिये इसका प्रयोग हुआ है और यह कि विधानांग ने उसका प्रयोग अधिनियम सम्बन्धी सतर्कता के नाते किया है, अधिनियम के प्रभाव को अस्वीकृत करने या विस्तार-क्षीण करने के लिए नहीं।'
निर्वचन के बाह्य सहायक उपकरण
निर्वचन के बाह्य सहायक उपकरण (External Aids to Interpretation) – जब संविधि के किसी भाग की भाषा आन्तरिक सहायक उपकरणों की सहायता लेने के बावजूद भी स्पष्ट नहीं होती तो वहाँ व्याख्या संरचना में बाहरी सहायक उपकरणों की सहायता ली जा सकती है। यह बाहरी सहायता कानून के शरीर से परे हैं जैसे शब्द-कोश, पाठ्य-पुस्तकें, कानून का वैधानिक इतिहास आदि। इसीलिए इनको निर्वचन के बाह्य सहयोगी कहा जाता है। इनमें से प्रत्येक का विवरण निम्न प्रकार है-
1. शब्द-कोष (Dictionaries) – किसी कानून में प्रयोग किए गए शब्दों का निर्वचन उनके साधारण अर्थ के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए। चूँकि शब्दकोश किसी शब्द के कई अर्थों को स्पष्ट करता है इसीलिए सामान्यतः उन अर्थों की जानकारी के लिए शब्दकोश सहायक है। अतः किसी शब्द के साधारण अर्थ को जानने के लिए न्यायालय शब्दकोश का सहयोग ले सकता है। परन्तु ऐसा करने के लिए न्यायालय को बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि कानून के विशिष्ट सन्दर्भ में उन अर्थों में से कोई अर्थ वास्तव में उचित ही हो। इसीलिए कई बार न्यायालय बहुत से अर्थों में से कोई अर्थ ठीक मानकर चुन लेता है, और कई बार कानून के सन्दर्भ को देखते हुए न्यायालय अर्थों को अस्वीकार भी कर देता है। प्रत्येक परिस्थिति में न्यायालय को विशिष्ट कानून के उद्देश्य, ध्येय और सन्दर्भ का ध्यान रखना पड़ता है। उदाहरणार्थ-
(i) आलमगीर बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1956 S.C. 436 में अपीलार्थी पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 के अन्तर्गत अपराध करने का आरोप था। इस धारा के अनुसार "जो कोई किसी स्त्री को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, जिसका अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है, या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष के पास से, या किसी ऐसे व्यक्ति के पास से जो उस पुरुष की ओर से उसकी देखरेख करता है, इस आशय से ले जाएगा, या फुसलाकर ले जाएगा कि वह किसी व्यक्ति के साथ नाजायज संभोग करे या इस आशय से ऐसी किसी स्त्री को छिपाएगा या “निरुद्ध करेगा", वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जाएगा।” अपीलार्थी का एक तर्क यह भी था कि चूँकि वह स्त्री अपने पति को छोड़कर उसके साथ स्वेच्छा से रह रही थी अतः यह कहना अनुचित है कि उसने उस स्त्री को "निरुद्ध” किया और इस कारण वह उत्तरदायी नहीं है। इस तर्क को अस्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि "निरुद्ध" का शब्दकोश में अर्थ किसी को उसकी इच्छा के विरुद्ध रोक कर रखना है परन्तु प्रस्तुत सन्दर्भ में यह अर्थ उचित नहीं है। यह उपबन्ध पति के अधिकार को संरक्षित रखने के उद्देश्य से इस प्रकार बनाया गया है कि कोई भी पति को उसकी पत्नी के साहचर्य से अलग न रखे और इसलिए ऐसा करने में पत्नी की इच्छा भी पति के अधिकार को कम नहीं कर सकती।
(ii) रामावतार बनाम सहायक विक्रय कर अधिकारी A.I.R. 1961 S.C. 1325 में प्रश्न यह था कि क्या "पान" एक "वेजीटेब्ल" होने के कारण उसके विक्रय पर विक्रय कर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि बिहार विक्रय कर अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत "वेजीटेब्ल" के विक्रय पर विक्रय कर से छूट प्रदान की गई है। अपीलार्थी का तर्क यह था कि "वेजीटेब्ल" शब्द का शब्द-कोश अर्थ ही उचित अर्थ है जिसके अनुसार पौधों के भागों से सम्बन्धित, समाविष्ट हुई, बनी हुई, प्राप्त की गई या पाई गई वस्तु 'वेजीटेब्ल' है और चूँकि "पान" इस परिभाषा के अन्तर्गत है आता है अतः वह भी "बेजीटेब्ल" है और इस कारण विक्रय से परे है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि शब्दकोश अर्थ इस दृष्टान्त में उचित अर्थ नहीं हो सकता क्योंकि विधायिका का आशय 1947 के अधिनियम के सन्दर्भ में यह नहीं है। "पान" शब्द को जिस अर्थ में सामान्य व्यक्ति समझता है उसी अर्थ में इसे विधायिका ने प्रयुक्त किया है। अतः पान के विक्रय पर विक्रय कर आरोपित किया जाना उचित है।
(iii) कर्मचारी राज्य बीमा निगम बनाम टाटा इलेक्ट्रिक एण्ड लोकोमोटिव कम्पनी A.I.R. 1976 SC 66 में प्रश्न यह था कि क्या उत्तरदाता कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अंतर्गत कम्पनी के “शिक्षार्थियों" (अप्रेन्टिसेज) को धन का अंशदान देने के लिए बाध्य है। “शिक्षार्थी” शब्द के शब्द-कोश अर्थ से यह स्पष्ट है कि शिक्षार्जन का प्रमुख उद्देश्य आपस में तय की गयी शर्तों के अन्तर्गत कम्पनी के द्वारा प्रशिक्षण देना है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि यद्यपि शिक्षार्थी को कम्पनी द्वारा कुछ धन दिया जाता है तथापि ऐसा करने से वह कम्पनी का कर्मचारी नहीं बन जाता। उसकी स्थिति सदा ही एक सीखने वाले व्यक्ति के रूप में बनी रहती है। अतः कम्पनी उसे अंशदान के रूप में धन देने को बाध्य नहीं है।
2. पाठ्य पुस्तकें (Text Books) – किसी कानून के वास्तविक अर्थ को जानने के लिये न्यायालय पाठ्य पुस्तकों का सहयोग ले सकता है परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उनमें दी गई राय न्यायालय की राय भी हो। पाठ्य पुस्तकों में दी गई राय को न्यायालय द्वारा स्वीकार किए जाने के तथा अस्वीकार किए जाने के, दोनों प्रकार के ही, उदाहरण उपलब्ध हैं। मनु, याज्ञवल्क्य, विज्ञानेश्वर, जीमूतवाहन तथा कौटिल्य आदि को न्यायालय के द्वारा अनेक बार उद्धृत किया गया है तथा उनके विचारों को मान्यता दी गई है। मुल्ला की पुस्तक भी इसी प्रकार सहायक सिद्ध होती रही है।
केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य AIR. 1973 S.C. 146 में पर्याप्त संख्या में पाठ्य-पुस्तकों में वर्णित विचार न्यायालय के सामने पेश किये गए। परन्तु उच्चतम न्यायालय के कई न्यायाधीशों ने विचार व्यक्त किये हैं कि इनमें वर्णित विचारों व प्रतिकूल विचारों की अधिक संख्या को देखते हुए यही उचित है कि उनको अधिक महत्व न देकर कानून के संदर्भ को सदा ध्यान में रखकर ही निर्वचन किया जाये। यही कुशल नीति है ।
3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background) - किसी संविधि के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए न्यायालय को विधि और विधान के इतिहास से तथा अन्य ऐतिहासिक तथ्यों, जो न्यायालय के विचार में आवश्यक हों के सहयोग लेने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। न्यायालय इस पर भी सोच विचार कर सकता है कि किसी अधिनियम की विधि को लागू करने या उसमें कोई परिवर्तन न करने के लिए पारित किया गया। परन्तु न्यायालय को इस बारे में सावधान रहना चाहिये कि वह स्वयं को विधायिका के क्षेत्र से दूर रखे और कहीं ऐसी व्याख्या न करे जो उस कानून की परिभाषा से प्राप्त न हो पर न्यायालय सोच ले कि कदाचित् विधायिका का आशय यही रहा होगा। उदारहणार्थ-
(i) हरिप्रसाद बनाम दिविकर A.I.R. 1957 S.C. 121 में उच्चतम न्यायालय ने 'छंटनी' शब्द का अर्थ चालू उद्योग में बेशी कर्मचारी-गण जैसा पूर्व में विकसित किया गया था और जिसे विधायिका ने भी औद्योगिक विवाद (संशोधन तथा विविध) अधिनियम, 1956 पारित करके मान लिया था, स्वीकार कर लिया। इस प्रकार न्यायालय ने भी यह स्वीकार कर लिया कि पूर्व विधि की व्याख्या हेतु कानून पारित किया जाता है।
(ii) एक्सप्रेस-न्यूजपेपर्स लिमिटेड बनाम भारत संघ AIR 1958 SC 578 में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कहा कि विधान का इतिहास तथा इसी प्रकार के अन्य बाह्य स्रोतों को न्यायालय संदिग्धता समाप्त करने के उद्देश्य से देख सकता है।
(iii) पश्चिम बंगाल राज्य बनाम नृपेन्थ नाथ AIR 1966 5.C. 447 में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि किसी कानून का वास्तविक अर्थ जानने के लिए न्यायालय विधि की पूर्व अवस्था से परामर्श लेने के लिए स्वतन्त्र है।
4. विधायी इतिहास (Legislative History) - प्राचीन काल में किसी कानून का वास्तविक सन्दर्भ जानने के लिए कभी-कभी न्यायालय उस कानून के विधायी इतिहास को भी देखता था । परन्तु आधुनिक बहुमत विचारधारा कदाचित् यही है कि विधायी इतिहास को निर्वचन के बाह्य सहयोगी के रूप में नहीं लिया जा सकता। अतः सदनों के मंच पर किए गए विचार-विमर्श, प्रवर समिति (Select committees) की रिपोर्ट तथा उद्देश्यों व कारणों के कथन व्याख्या के बाह्य सहयोगी के रूप में अग्राह्य हैं। इस नियम का आधार कदाचित यही है कि विधायकों के मस्तिष्क में जो कुछ था उसे उनके द्वारा स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया जा चुका है तथा विधायक अपने व्यक्तिगत विचारों से न्यायालय को प्रभावित नहीं कर सकते। उदाहरणार्थ-
(i) ए० के गोपालन बनाम केरल राज्य A.I.R. 1950 S.C. 27 में उच्चतम न्यायाल ने एक भाषण को निर्वचन के सहयोगी के रूप में अमान्य घोषित करते हुए कहा कि किसी विधेयक के विचार-विमर्श के दौरान दिए गए भाषण से अधिक से अधिक भाषण देने वाले विधायक के व्यक्तिनिष्ठ आशय का संकेत मात्र मिलता है परन्तु इससे उस बिल को पारित करने वाले बहुमत के पृष्ठ में लगी मानसिक प्रक्रिया का कोई ज्ञान नहीं होता और न ही यह मान लेना युक्तियुक्त है कि उन सभी विधायकों के मस्तिष्क में मेल या संगति थी।
(ii) केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य A.I.R. 1973 S.C. 144 में मुख्य न्यायाधीश सीकरी ने कहा कि किसी संविधि पर विचार-विमर्श के दौरान विधायिका के सदस्यों द्वारा दिये गए भाषणों को उस कानून के किसी उपबन्ध की व्याख्या में सहयोगी के पक्ष में नहीं लिया जा सकता । उन्होंने उन प्रसिद्ध पंक्तियों को अनुमोदन के साथ उत्कधित किया कि वे जिन्होंने कुछ नहीं कहा कदाचित् एक दूसरे से भिन्न मत रखते हों। दूसरी ओर, न्यायाधीश शेलद, ग्रोवर, 'जगमोहन रेड्डी, पालेकर तथा मैथ्यू का विचार था कि संविधान सभा में दिये गये भाषण संविधान की व्याख्या के सन्दर्भ में संविधान निर्माताओं के वास्तविक आशय को जानने के लिये सदा देखे जा सकते हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह विचार केवल संविधान के निर्वचन तक ही सीमित है तथा अन्य कानूनों पर लागू नहीं होते।
(iii) के० पी० वर्गीज बनाम आयकर अधिकारी A.I.R. 1981 S.C. 1922 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह सच है कि कानूनी उपबन्धों की व्याख्या में किसी विधेयक के सदन के मंच पर हुए विचार- विर्मश के दौरान विधायकों के द्वारा दिए गए भाषणों व बयानों को ग्राह्य नहीं किया जा सकता। परन्तु बिल के संचालक के भाषण को निश्चित रूप से विधान द्वारा किस प्रकार की रिष्टि को समाप्त करने के लिये तथा विधान को अधिनियमित करने के पृष्ठ में उद्देश्य व ध्येय को जानने के लिये ध्यान में रखा जा सकता है। यह न केवल पश्चिमी देशों में बल्कि भारत में भी आधुनिक विधिशास्त्रियों के विचारों की प्रवृत्ति के अनुरूप है कि कानून का निर्वचन वस्तुतः उसका अर्थ जानने का प्रयास होने के कारण उन सभी से सहयोग लिया जा सकता है जो नीति स्वरूप सहयोग के लिए आवश्यक हों। अतः आयकर अधिनियम, 1961 में संशोधन के रूप में प्रस्तावित धारा 52 (2) के समय वित्त मन्त्री का भाषण बहुत सुसंगत है।
(iv) मिथिलेश कुमारी बनाम प्रेम बिहारी खरे AIR. 1989 SC 1447 में बेनामी संव्यवहार (प्रतिषेघ) अधिनियम, 1988 के कुछ उपबन्धों के निर्वचन का प्रश्न था। वादी ने इस घोषणा के लिए एक वाद दाखिल किया कि वह वादग्रस्त मकान का वास्तविक स्वामी था तथा वह संव्यवहार बेनामी था। विचारण न्यायालय द्वारा वाद पर डिक्री पारित कर दी गई जिसकी पुष्टि अपीलीय न्यायालय ने भी कर दी। उच्चतम न्यायालय में अपील के लंबन के दौरान बेनामी संव्यवहार (प्रतिषेध) अधिनियम, 1988 अस्तित्व में आ गया। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि इस परवर्ती घटना को ध्यान में रखा जाना चाहिये और चूँकि इस अधिनियम का प्रवर्तन भूतलक्षी है अतः इस वाद पर डिक्री पारित नहीं की जा सकती। न्यायालय ने बल देकर कहा कि जहाँ कोई विशिष्ट अधिनियमिति या संशोधन भारत के विधि कमीशन की सलाह पर किया गया हो तो कमीशन की उस रिपोर्ट को न्यायालय देख सकता है। इस रिपोर्ट को कितना महत्व दिया जाये यह उस मामले के तथ्य एवं परिस्थितियों पर निर्भर करता है। परन्तु न्यायालय अधिनियम की स्पष्ट एवं असंदिग्ध भाषा को प्रभावी बनाने के लिए बाध्य है। कमीशन की रिपोर्ट पर व्याख्या के बाह्य सहयोगी के रूप में विचार किया जा सकता है।
5. प्रशासकीय हस्तान्तरण-लेखन तथा वाणिज्यिक प्रथा-यद्यपि प्रशासकीय प्रथा को साधारणतः निर्वचन के सहयोगी के रूप में नहीं माना जाता तो भी कभी-कभी न्यायालय ने इसे महत्व दिया है । दूसरी ओर न्यायालय ने प्रसिद्ध हस्तान्तरण लेखकों की प्रथाओं को पर्याप्त सम्मान दिया है। वाणिज्यिक प्रथा को निर्वचन के महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में भी उचित मान्यता प्रदान की गई है। उदाहणार्थ-
(i) राज्य बनाम सज्जन सिंह A.I.R. 1953 पेप्सू 146 में पूप्सू उच्च न्यायालय ने इस आधार पर प्रशासकीय प्रथा को मानने से इन्कार कर दिया कि यदि इस प्रकार की प्रथा मूल रूप से गलत हो तो यह ध्यान देने योग्य नहीं है चाहे वह प्रथा बहुत समय से चली आ रही हो। इस आधार पर न्यायालय ने निर्णय दिया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 497 के अन्तर्गत अग्रिम जमानत स्वीकार नहीं की जा सकती ।
(ii) राज्य बनाम छदामी लाल AIR 1957 All. 639 में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की : धारा 208 का निर्वचन करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी विधि एवं प्रशासकीय प्रथा में विरोध होने पर विधि को ही मान्यता दी जायेगी।
6. पूर्ववर्ती विधान (Previous Legislation) - जहाँ एक ही विषय से सम्बन्धित विधियों का संहिताकरण किया गया है, या तत्सम्बन्धित न्यायिक दृष्टांतों और विधियों को एक अधिनियम का रूप प्रदान कर दिया गया है वहाँ व्याख्या-संरचना का नियम यह है कि संविधियों की प्रकट भाषा का ही अवलोकन किया जाय और उसके आधार पर ही अधिकारों की प्रस्थापना की जाय । न्यायालय का यह कार्य नहीं है कि एक संहिताबद्ध विधि की व्याख्या करने के प्रकरणों में उससे पूर्ववर्ती अनेक निर्णयों का सहारा न लिया जाय।
ऐसे प्रकरण भिन्न हो सकते हैं जहाँ न्यायालयों को इस बात को मानने का आधार हो कि संहिताकरण में पूर्ववर्ती विधि को परिवर्तित करने का आशय नहीं रहा है और यदि कोई सन्देह की स्थिति उत्पन्न होती है तो निष्कर्ष अपनाया जा सकता है कि विधानांग का आशय था कि प्रवर्तित विधि ज्यों की त्यों बनी रहे। ऐसे प्रसंगों में उत्तरवर्ती विधि में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ को जानने के लिये पूर्ववर्ती विधि के इतिहास को देखा जा सकता है।
गुलाबचन्द बनाम बुदी लाल A.I.R. 1955 मध्य भारत 15 में यह निष्कर्ष दिया गया था कि किसी संविधि की व्याख्या संरचना में सामान्य नियम यह है कि प्रयुक्त शब्दों का व्याकरणमूलक यह और साधारण अर्थ प्रतिष्ठित किया जाय। ऐसी संविधियों में, जिनमें कि विधि का संहिताकरण किया गया है, और भी आवश्यक है। किन्तु जहाँ केवल पूर्ववर्ती विधि के संशोधन का उद्देश्य रहा हो, और यह देखना हो कि यह प्रभाव में पूर्वलक्षी है, या नहीं, तो विधि की पूर्ववर्ती स्थिति का अवलोकन करना आवश्यक हो सकता है।
7. पूर्ववर्ती निर्णय (Previous Decision ) - ऐंग्लो- अमेरिकी वैध व्यवस्था का यह एक आधारभूत सिद्धान्त है कि पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टान्त पर अधिक बल दिया जाय। किन्तु केवल निर्णयांधार (Ratio Decidendi) को ही विधि का बल प्रदान किया जा सकता है।
न्यायाधीश जेम्स का अवलोकन है कि 'यदि संसद् के किसी अधिनियम में ठीक उसी भाषा का प्रयोग किया गया है जिसका कि उसी विषय पर पूर्ववर्ती अधिनियम में प्रयोग है, और उसी प्रयोजन से पारित किया गया है तो व्याख्या संरचना का सुरक्षित और सुविदित नियम यह है कि विधानांग ने उन्हीं शब्दों को जान-बूझकर प्रयोग किया है जिन पर पूर्ववर्ती सुविदित निर्णय भी उपलब्ध हैं, तो विधानांग ने उन शब्दों को उसी अर्थ में प्रयुक्त किया है जिसे पूर्ववर्ती निर्णयों ने निर्धारित कर रखा है।'
जहाँ किसी संविधि की भाषा संदिग्ध है, तो उसके निवारण के लिए सादृश्यमूलक भाषा के निराकरण हेतु दिये गये निर्णयों का सहारा लिया जा सकता है, किन्तु संविधि के विषय, उद्देश्य, और प्रयोजन में साम्य का होना नितान्त आवश्यक है।
किन्तु यदि भाषा स्पष्ट है और उसमें किसी संदिग्धता के लिये कोई स्थान नहीं है तो वहाँ न्यायालय की विधि की त्रुटियों को संशोधित नहीं करना चाहिये, या विधानांग के आशय के प्रतिकूल किये गये निर्णयों से विधान का प्रयोजन ही विफल हो जाएगा।
8. बाह्य उपकरणों का साक्ष्य (Evidence of Extrinsic Aids) – किसी अस्पष्ट या संदिग्ध विधान की व्याख्या करने में जो उपकरण सहायक हो सकते हैं वे सार्वजनिक सरकारी प्रलेख हैं, या राज्य-पत्र, या वैध लेखकों की कृतियाँ, शब्दकोष और विषय से सम्बन्धित सरकारी पदाधिकारियों की सम्मतियाँ हैं ।
न्यायालय की राय है कि, 'जब कभी किसी विधि-न्यायालय में यह प्रश्न उठता है कि संविधि का अस्तित्व है या नहीं, या यह कि किस समय किसी संविधि को प्रभावकारी रूप मिला था, या यह कि किसी संविधि के संक्षिप्त उपबन्ध क्या थे, तो उन न्यायाधीशों को, जिन्हें कि इस बात का निर्णय करना रहता है, यह अधिकार है कि वे ऐसे किसी भी साधन का सहारा ले सकते हैं, जिनसे कि न्यायिक बुद्धि को इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर मिल सकता है।
9. साम्य विषय-वस्तु अनुरूपी संविधियाँ (Statutes in 'Pari Materia') - ऐसी भी संविधियाँ उपलब्ध हो सकती हैं जो उसी विषय-वस्तु से सम्बन्धित हो जो व्याख्या के लिये विचारधीन हैं। उनका सम्बन्ध उन्हीं मनुष्यों या वस्तुओं से भी हो सकता है। प्रत्येक शब्द वाक्यांश और वाक्य का अर्थ सामान्यतः वही लेना है जो अधिनियम के प्रयोजन के अनुकूल हो । सन्देह नहीं कि संविधि की सम्पूर्ण भाषा को विधानांग का आशय निर्धारित करने में अत्यधिक महत्वपूर्ण • सहायक उपकरण के रूप में माना जा सकता है, किन्तु विषय-वस्तु से मिलते-जुलते अन्य बाह्य उपकरण के प्रकरण में मान्य हैं। ये बाह्य उपकरण सन्दर्भ के क्षेत्र को विस्तारित कर देते हैं क्योंकि उसी संविधि के अन्य उपबन्ध ही उसमें आकर नहीं जुड़ते, अपितु उसकी प्रस्तावना, विधि की वर्तमान स्थिति, उसी विषय वस्तु पर अन्य संविधियाँ और वह रिष्टि जिसे संविधि दूर करने के लिये आशयित है, आदि सभी जुड़ जाते हैं।
10. मौखिक या लिपिक भूलें (Verbal or Clerical Errors) – यदि कोई मौखिक या लेख्य भूल हो गई है तो विधानांग के आशय को प्रभावकारी बनाने के लिये उसे सुधारा जा सकता है ।
'यदि केवल लेख्य भूल है तो न्यायालय को यह अधिकार है कि वह उसे सुधार दे, भले ही विधान-सभा के किसी ऐसे अधिनियम में, जब वह लिखित हुआ था कोई स्पष्ट प्रयुक्तता आ गई हो । किन्तु यदि भूल स्पष्ट और प्रकट है तो उसे न्यायालय द्वारा स्वयं सुधारा जा सकता है। इस शक्ति में कोई संदेह नहीं है, किन्तु उसका प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब भूल इतनी स्पष्ट और प्रकट है कि अधिनियम का निरीक्षण करने पर, सभी सन्देहों से परे, ऐसा प्रतीत हो कि उस सुधार से संविधि में जो अयुक्तता आ गई है, वह दूर हो जाएगी और विधानांग का आशय स्पष्ट हो जायेगा, तभी इस शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।'
11. सामान्य वाक्य खंडों के अधिनियम के उपबन्ध (Provisions in the General Clauses Act) - लिंग और वचन (Gender and Number) – 1897 के सामान्य वाक्यखण्डों के अधिनियम की धारा 13 में उपबन्धित है कि केन्द्र के सभी अधिनियमों और विनियमों में जब तक अन्यथा रूप में विशिष्टता किसी अधिनियम या विनियम में उपबन्धित न हो,
(i) पुरुषवाचक शब्दों का अर्थ स्त्री-लिंग के शब्दों का भी बोध देगा, और (ii) एकवचन शब्द का प्रयोग बहुवचन या बहुवचन का प्रयोग एकवचन के रूप में भी माना जायेगा।
जबकि विधानांग के आशय को स्पष्टतः प्रभावकारी बनाने के लिए आवश्यक हो गया है, एकवचन में प्रयुक्त शब्दों का बहुवचन या इसका प्रतिलोम प्रयोग किया जा सकता है।
'व्यक्ति' (Person) शब्द का तात्पर्य स्त्री-पुरुष दोनों से है। अभिव्यक्तियों के अर्थ (Meaning of Expressions) - कुछ शब्दों या अभिव्यक्तियों को स्पष्ट करने के आशय से कुछ शब्द जैसे 'तात्पर्य है कि' (Means) का प्रयोग होता है, तो कुछ भी को इससे प्रकट होता है कि ठोस परिभाषा कठोर और संयुक्त है, और उस परिभाषा में जो निर्धारित कर दिया गया है उससे भिन्न उसका कोई अन्य अर्थ नहीं लिया जा सकता।
'परिलक्षित है' (Denotes) शब्द से प्रकट होता है कि विधानांग ने उस शब्द का कोई अत्यधिक कठोर अर्थ प्रतिपादित नहीं करना चाहा है, अपितु केवल संकेत देना चाहा है कि शब्द का अर्थ हो सकता है।
'ऐसा उचित प्रतीत होता है कि' (Deemed to be) का केवल संभाव्य अर्थ इतना है कि यथार्थ में कोई ऐसी चीज नहीं है, किन्तु अधिनियम निर्धारित करता है कि ऐसा व्यवहार किया जाय कि वह उचित प्रतीत होने लगे।
'सम्मिलित है' (Includes) या 'सम्मिलित माना जायेगा' (shall be deemed to be included) शब्दों का प्रयोग बहुधा संविधि में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ-विस्तार के लिये होता है। ऐसे शब्दों का जब प्रयोग किया जाता है तब यह समझना चाहिये कि उस शब्द को केवल उसके स्वाभाविक अर्थ तक सीमित नहीं रहना है, अपितु उन वस्तुओं को भी उसमें शामिल कर लिया जायेगा जिसे संविधि में सम्मिलित कर लेने का आशय व्यक्त किया गया है।
इसी प्रकार से [आई एल० आर० (1961) मध्य प्रदेश, 67] में 'सम्मिलित है, (includes) और एस० एम० जेम्स बनाम डा० अब्दुल खैर [ ए० आई० आर० 1961 पटना 242] में 'सम्मिलित करते हुये' (Including) शब्दों की व्याख्या की गई है। इन दोनों वादों में शब्द के सामान्य अर्थ के साथ ही वस्तु जोड़ लेने की परिपाटी का समर्थन किया गया है जिसे लेना संविधि में आशयित है
नियुक्ति प्रदान करने की शक्ति (Power to Appoint) - सामान्य उपखण्ड अधिनियम 1897(General Clauses Act) में यह भी उपबन्धित किया गया है कि जहाँ किसी केन्द्रीय अधिनियम या विनियम द्वारा कोई नियुक्ति प्रदान करने की शक्ति दी गई है, वहाँ, जब तक अन्यथा रूप आशय प्रतीत न होता हो, जिसे प्राधिकारी में नियुक्ति करने की शक्ति है, अपने द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति को, या उस शक्ति के प्रयोग के अधीन किसी अन्य माध्यम द्वारा नियुक्त व्यक्ति को निलम्बित या बरखास्त करने की भी शक्ति है ।
12. स्थानीय अधिनियम-स्मरणीय है कि किसी अधिनियम की व्याख्या के मामले में जो किसी राज्य में लागू है, उच्चतम न्यायालय सामान्यतः उस राज्य के उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को बहुत महत्व देती है विशेष रूप से जबकि उस उच्च न्यायालय ने उस पर पूर्णतः विचार कर लिया है क्योंकि वह न्यायालय पर्याप्त रूप से वहां के विभिन्न स्थानीय अधिनियमों से परिचित हैं। ऐसी राय उच्चतम न्यायालय ने गुजरात राज्य बनाम जिना भाई रनछोड़ जी दर्जी, ए० आई० आर० (1972) एस० सी, 999 में दी है।
हितप्रद अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं?
प्रश्न 7. हितप्रद अर्थान्वयन से आप क्या समझते हैं? मार्गदर्शक निर्णयों की सहायता से समझाइये।
What do you mean by Beneficial Construction? Explain with the help of leading cases.
उत्तर- जब किसी संविधि में प्रयोग किये गए शब्दों का प्राकृतिक अर्थ स्पष्ट रूप से कुछ अवस्थाओं को छोड़ देता है तो शब्दों को खींचतान कर उन अवस्थाओं को उसमें शामिल नहीं किया जा सकता । परन्तु यदि शब्दों के प्राकृतिक अर्थ उस कानून के उद्देश्यों को प्राप्त न कर सकें तो उनको विस्तृत अर्थ दिया जा सकता है बशर्ते कि यदि वे शब्द यह विस्तृत अर्थ लेने के योग्य हों। यदि किसी विधान जिसका साधारण उद्देश्य किसी विशिष्ट कोटि के व्यक्तियों को लाभ पहुँचाना है, में कोई उपबन्ध अस्पष्ट है जिससे उसके दो अर्थ निकलते हों जिनमें से एक उस हित की रक्षा करेगा और दूसरा उसे नष्ट करेगा तो वह अर्थ जो हित की रक्षा करे ही ठीक अर्थ है। छोड़ी गई अवस्थाओं की पूर्ति न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती। परन्तु जहाँ न्यायालय को एक विस्तृत अर्थ, जो उसकी राय में विधायिका के उद्देश्य को अधिक अच्छी प्रकार पूर्ण करता है तथा.. एक सीमित अर्थ जो उसे अधिक अच्छी प्रकार नहीं या बिल्कुल पूर्ण नहीं करता है इन दोनों में से चुनना हो, तो न्यायालय पहले अर्थ को ही चुनेगा। वास्तव में हितप्रद अर्थान्वयन एक नियम होने की बजाय एक प्रवृति है । उदाहरणार्थ-
(i) कानाइलाल बनाम परमनिधि A.I.R. 1957 SC 907 में उत्तरदाता ने अपीलाथी, जो एक ठेका किरायेदार था, के विरुद्ध बेदखली की डिक्री निष्पादित करना चाहा। अपीलार्थी का तर्क था कि कलकत्ता ठेका किरायेदारी अधिनियम, 1949 (जिसे पश्चिम बंगाल अधिनियम, 1953, द्वारा संधोधित किया गया) की धारा 5 (1) के अन्तर्गत निष्पादन की कार्यवाही सिविल न्यायालय द्वारा नहीं बल्कि केवल नियन्त्रक द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है और चूँकि यह एक हितप्रद विधान है अतः न्यायालय का कर्त्तव्य है कि अधिनियम का निर्वचन इस प्रकार न करें जिससे ठेका किरायेदार के हितों की हानि हो। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जब तात्विक शब्दों का अर्थान्वयन दो प्रकार से हो सकता हो जिनमें से एक कानून के उद्देश्य के विरुद्ध हो जबकि दूसरा उद्देश्य को पूर्ण करे तो दूसरा अर्थ ही ठीक है। परन्तु यदि प्रयुक्त शब्दों का एक ही अर्थ निकलता हो तो वही विधायिका का आशय माना जाना चाहिये। यह निर्णीत किया गया कि उपबन्ध उन स्थितियों पर लागू नहीं होता जिनमें पूर्व में ही भू-स्वामी ने बेदखली की डिक्री प्राप्त कर ली हो।
(ii) मनोहर लाल बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1961 SC 418 में पंजाब व्यापार कर्मचारी अधिनियम, 1949 की संवैधनिकता का प्रश्न था। इस धारा के अनुसार वे सभी दुकानें और स्थापनाएँ जिन पर अधिनियम लागू होता है, सप्ताह में एक दिन बन्द रहेंगी। अपीलार्थी का तर्क था कि यह संविधान के अनु० 19 (1) (छ) के प्रतिकूल है। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह उस अनुच्छेद के प्रतिकूल नहीं है क्योंकि यह कर्मचारी के स्वास्थ्य तथा दक्षता का ध्यान रखती है और इसलिए दुकानदार के मूलभूत अधिकारों पर युक्तियुक्त पाबन्दी है यदि व्यापार में दुकानदार तथा उसके परिवार के सदस्य ही सम्मिलित हों तो भी यही सिद्धान्त रहेगा। समान आधारों पर कर्मचारीयों के कार्यों की अवधि एवं दुकानों तथा स्थापनाओं के खुलने तथा बन्द होने का निश्चित समय भी अनु० 19 (1) (छः) के अन्तर्गत व्यापार और वाणिज्य के मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं है और इसलिए असंवैधानिकता नहीं है। रामधन दास बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1961 एस० सी० 1559
(ii) जीवा भाई बनाम छगन A.I.R. 1961 SC 1491 में बम्बई किरायेदारी तथा कृषि भूमि अधिनियम, 1948 की धारा 34 में 1952 के संशोधित अधिनियम द्वारा एक नई उप धारा 2(क) जोड़ दी गई। अधिनियम की धारा 34 (1) के साथ पढ़कर नई उपधारा 2 (क) की व्याख्या का प्रश्न न्यायालय के समक्ष आया। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यद्यपि नये उपबन्ध द्वारा भू-स्वामी के निहित अधिकार में बाधा नहीं डाली गई है परन्तु यह निहित अधिकार भू-स्वामी में तब तक उत्पन्न नहीं होते जब तक नोटिस की अवधि समाप्त न हो गई हो। अतः संशोधी अधिनियम द्वारा नोटिसों पर बेदखली के सभी वाद जिनकी अवधि समाप्त होने से पूर्व संशोधी अधिनियम प्रभावी हुआ, प्रभावित होंगे। उच्चतम न्यायालय ने ऐसा निर्णीत करते हुए स्पष्ट किया कि संशोधी अधिनियम किरायेदारों के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने का हितप्रद विधान होने के कारण धारा 34 (2क) के अर्थ की संदिग्धता को किरायेदारों के पक्ष में ही दूर किया जाना उचित है।
(iii) यू० उनिचोयी बनाम केरल राज्य A.I.R. 1962 SC 12 में प्रश्न यह था कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 जिसके अन्तर्गत राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी उद्योग में न्यूनतम मजदूरी निर्धारित कर सकती है, संविधान के अनु० 19 (1) (छ) के प्रतिकूल है क्योंकि अधिनियम में न्यूनतम मजदूरी न ही परिभाषित की गई है और न ही नियोक्ता की मजदूरी देने की क्षमता को ध्यान में रखा गया है। अधिनियम को संविधान के अनुकूल बताते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अधिनियम एक हितप्रद विधान होने के कारण कर्मचारी के पक्ष में ही निर्वचित किया जाएगा। एक अविकसित देश में जहाँ बेकारी एक बहुत बड़ी समस्या हो यह असम्भावित नहीं है कि लोग लगभग भुखमरी के वेतन पर भी कार्य करने को राजी हो जाएँगे, पर ऐसा होने देना उचित नहीं है।
(iv) एस० के० वर्मा बनाम औद्योगिक अधिकरण-सहित उद्योग न्यायालय A. I.R. 1981 SC 422 में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि कल्याण कानूनों को आवश्यक रुप में विस्तृत अर्थ दिया जाना चाहिए। जहाँ किसी विधान को कुछ प्रकार की रिष्टियों से मुक्ति दिलाने के लिए पारित किया गया हो तो न्यायालय को व्युत्पत्ति विषयक भ्रमण करके अतिक्रमण नहीं करना चाहिये। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 जैसा 1964 के अधिनियम 36 के द्वारा संशोधित किया गया है, की धारा 25 (ख) (2) में यह कहीं पर नहीं कहा गया है कि कर्मचारी पूर्ण बारह माह की अवधि तक नियोक्ता के नियोजन में सेवा के लिए रहा हो। सच तो यह है कि उसे नियोजन में रहना आवश्यक नहीं है। इस उपबन्ध का स्पष्ट अर्थ यही है कि वह कर्मचारी जिसने बारह माह की अवधि में वास्तव में कम से कम दो सौ चालीस दिन काम किया हो एक वर्ष की अवधि के लिए निरन्तर सेवा में मान लिया जायेगा।
(v) शीला बारसे बनाम भारत संघ A.I.R. 1986 SC 1773 जो एक लोक हित याचिका थी में समाजसेवी याची अपीलार्थी ने याचिका दाखिल कर विभिन्न जेलों में बन्द सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों को रिहा कर देने की प्रार्थना की। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनु० 39 (च) के अनुसार राज्य अपनी नीति का विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से बालकों को स्वतन्त्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएँ दी जाएं और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए। भारत में नागालैण्ड राज्य को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में बाल . अधिनियम हैं। यह भी सत्य है कि इनमें से कुछ अधिनियम, 1976 में संविधान में संशोधन के · द्वारा 'खण्ड (च) को अनु० 39 में जोड़े जाने के पूर्व से ही हैं। यद्यपि इन अधिनियमों का निर्माण हो चुका है पर कुछ राज्यों में इन्हें अभी भी, अस्तित्व में नहीं लाया गया है। यह विधान एक संवैधानिक दायित्व को पूर्ण करने के लिए है और यह एक हितप्रद विधान है। इनके अभी तक लागू न किए जाने का कोई औचित्य नहीं है। किस कानून को कब से लागू किया जाए यह देखना साधारणतः राज्य सरकार का काम है पर आधुनिक सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय यह उचित समझता है कि प्रत्येक राज्य इन बाल अधिनियमों को तुरन्त प्रभाव से लागू करे तथा उनमें वर्णित उपबन्धों के आधार पर प्रशासन चलाए।
(vi) ऑल इण्डिया रिपोर्टर कर्मचारी संघ बनाम ऑल इण्डिया रिपोर्टर लिमिटेड A.I.R. 1988 SC 1325 एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसमें उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा शर्ते) और विविध प्रावधान अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत विधि रिपोर्ट समाचार पत्र हैं और इसलिए विधि रिपोर्ट के उत्पादन अथवा प्रकाशन में कार्यरत कर्मचारी पालेकर अधिनिर्णय के लाभ प्राप्ति के अधिकारी हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विधि रिपोर्टों में न्यायिक निर्णय वर्णित होते हैं जो लोक महत्व के हैं। विधि रिपोर्टों की विषय-वस्तु भी उनके ग्राहकों एवं पाठकों के लिए समाचार है क्योंकि अन्य विवरणों के साथ-साथ उनमें विशिष्ट विषयों पर देश में प्रचलित विधि की नवीनतम अवस्था की सूचना है। विधि रिपोर्टों में प्रकाशित न्यायिक निर्णय प्रकाशन के कुछ समय पश्चात् सम्भवतः समाचार का रूप खो चुके हों और पुस्तकें बन चुकी हों, परन्तु जब वे ग्राहकों एवं पाठकों को प्राप्त होती हैं तो उनकी प्रकृति समाचार की कृति के रूप में ही है। 1955 का अधिनियम एक हितप्रद विधान है जिसको पारित करने का उद्देश्य समाचार उद्यमों में कार्यरत कर्मचारियों की सेवा शर्तों में सुधार करना है और इसलिए उस समय भी जब इस अधिनियम के उपबन्धों के अर्थान्वयन में दो विचार हों तो जिससे उद्देश्य की पूर्ति होती हो, वही स्वीकार्य है
(vii) श्रीमती शशिगुप्ता बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम AIR 1995 SC 1367 में यह निर्धारित किया गया कि भारतीय जीवन बीमा अधिनियम, 1956 के उपबन्धों का निर्वचन पालिसी धारक के हित में किया जाना चाहिये।
प्रश्न संविधान की व्याख्या सम्बन्धी निम्नलिखित सूत्रों पर टिप्पणी लिखिये। Write short notes on the Doctrines relating to interpretation of Constitution.
उत्तर-1. सार तत्व का सिद्धान्त (Doctrine of Pith and Substance) – यह देखने के लिए कि क्या कोई विशेष विधि उस विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार में है जिसने इनको पारित किया है, न्यायालय को यह विचार करना चाहिये कि विधायन की सच्ची विषय-वस्तु "सार तत्व या वास्तविक प्रकृति और स्वरूप" क्या है और क्या ऐसी विषय-वस्तु उस विधान मण्डल से सम्बन्धित विधायी सूची में दिये गये शीर्षकों में निहित है। वास्तव में विधायन की सच्ची विषय-वस्तु को तय करने के लिये विधान-मण्डल द्वारा इसको दिया गया नाम निर्णायक नहीं है। यदि किसी विधि का 'तत्व एवं सार' किसी विशेष विधान-मण्डल के विधान क्षेत्र में पड़ता है। जिसके द्वारा वह निर्मित की गई है, तो ऐसी विधि की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती भले ही वह अनुसागिक रूप से किसी अन्य विधान-मण्डल के विधायन क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत किसी शीर्षक पर पड़ती है। इसे 'तत्व एवं सार' का सिद्धान्त कहते हैं। दूसरे शब्दों में जब एक विधान-मण्डल द्वारा निर्मित विधि दूसरे विधान-मण्डल के क्षेत्र में अतिक्रमण करती है तो यह जानने के लिये कि वह विधि उस विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आती है या नहीं, जिसने उसे निर्मित किया है, न्यायालय सार एवं तत्व का सिद्धान्त लागू करता है। उदाहरणार्थ-
(i) ए० एम० कृष्ण बनाम मद्रास राज्य AIR. 1975 S.C. 297 में कहा गया है कि जब किसी अधिनियम का कोई प्रावधान आनुषांषिक रूप में (Incidentally) दूसरे विधान-मण्डल के विधान विषयों पर अतिक्रमण करता है तो शाब्दिक व्याख्या के आधार पर ऐसा प्रावधान अवैध होगा। किन्तु यदि विधान सारवान रूप से या विधान का वास्तविक उद्देश्य ऐसे विषय से सम्बन्धित है जिस पर वह विधान मण्डल कानून बनाने में सक्षम है, तो उसे वैध घोषित किया जायेगा; भले ही वह दूसरे विधान मण्डल के क्षेत्राधिकार में आने वाले विषय पर अनुषागिक रूप से अतिक्रमण करता हो । उस विधान की वास्तविक प्रकृति और स्वरूप का पता लगाने के लिये पूरे अधिनियम पर विचार किया जायेगा और उसके उद्देश्य, विस्तार और उसके प्रावधान के प्रभाव की जाँच की जायेगी।
(ii) बम्बई राज्य बनाम बाल तारा A.I.R. 1951 S.C. 368 में बम्बई विधान मण्डल ने बम्बई मद्य निषेध अधिनियम पारित किया जिसके द्वारा राज्य में मादक द्रव्यों को खरीदने और रखने की मनाही कर दी गई थी। इस अधिनियम की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती गई थी कि वह संघ-सूची में वर्णित विषय "मादक द्रव्यों के आयात-निर्यात" का अतिक्रमण करता है क्योंकि मादक द्रव्यों के क्रय-विक्रय और उपयोग को रोकने से उसके आयात-निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय देते हुए कहा कि चूँकि अधिनियम का मुख्य उद्देश्य राज्य सूची के विषय से सम्बन्धित था, संघ-सूची के विषय से नहीं इसलिये अधिनियम पूर्णत: संवैधानिक है ।
(iii) प्रफुल्ल कुमार बनाम बैंक ऑफ खुलना AIR. 1947 P.C. 64 में प्रिवी कौंसिल ने 'सार-तत्व' के सिद्धान्त को लागू किया। प्रस्तुत मामले में बंगाल विधान मण्डल द्वारा ऋण का व्यापार नियन्त्रण करने के लिये बंगाल मनीलेण्डर्स ऐक्ट, 1940 पारित किया। इस अधिनियम द्वारा बंगाल प्रान्त में ऋण पर ब्याज दर की सीमा निश्चित कर दी ताकि ऋणदाता संविदा करके भी ऋणी से अधिक ब्याज न वसूल कर सकें। वादी ऋणदाताओं ने विवादित अधिनियम को इस आधार पर चुनौती दी कि यह बंगाल विधान मण्डल की विधायन-शक्ति से बाहर है, क्योंकि यह संघ सूची में वर्णित प्रविष्टि "बचत पत्र" का अतिक्रमण करती है, जिस पर केवल केन्द्र को ही कानून बनाने का अधिकार है। प्रिवी कौंसिल ने निर्णय देते हुए कहा कि विवादित अधिनियम बंगाल विधान मण्डल की विधायी शक्ति के अधीन है; क्योंकि उसका सार तत्व या प्रमुख उद्देश्य सूची के विषय ऋण और ऋणदाता से सम्बन्ध रखता है, भले ही यह अनुषांगिक रूप में संघ-सूची के विषय 'वचन-पत्र' का अतिक्रमण करता है। अतः यह अधिनियम संवैधानिक है।
2. रंगीय (आभासी या छम्) विधायन का सिद्धान्त (Doctrine of Colourable Legislation) - संघ और राज्य विधान मण्डल दोनों संविधान से अपनी विधायी शक्ति प्राप्त करते हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में विधि-निर्माण के लिए स्वतन्त्र हैं। छद्म विधायन का सिद्धान्त उन अवस्थाओं में लागू होता है जिनमें व्यवस्थापिका अपनी विधायी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपनी विधायी शक्ति सीमा से बाहर कार्य करती है। इस प्रकार का अतिक्रमण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी प्रकार का हो सकता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि यद्यपि विधायिका किसी कानून को बनाने में ऊपरी तौर से अपनी शक्तियों के भीतर कार्य करती है तथापि सारतः या वास्तव में वह संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करती है। ऐसे परोक्ष विधायन को ही छदम् या रंगनीय विधायन कहते हैं। ऐसे मामलों में अधिनियम का सार महत्वपूर्ण होता है उसका बाह्य रूप या आकृति (Form) नहीं। यदि किसी विधान की विषय-वस्तु सारतः उस विधान मण्डल की शक्ति के बाहर है तो उसका बाह्य रूप उसे न्यायालय द्वारा अमान्य घोषित करने से नहीं बचा सकेगा। अतः विधान मण्डल कोई अप्रत्यक्ष या परोक्ष तरीका अपनाकर संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता (के० सी० जी० नारायण देव ब० उड़ीसा राज्य A.I.R. 1953 S.C. 375)
जस्टिस श्रीकृष्ण अय्यर के अनुसार, "छद्भ्यता (Colourability) से तात्पर्य अक्षमता (Incompetemcy) से है। कोई वस्तु छद्मय तब होती है जब वह जिस रूप में प्रकट की जाती है वास्तव में उस रूप में नहीं होती। "
कामेश्वर सिंह ब० बिहार राज्य A. I.R.1952 S.C. 255 में बिहार लैन्ड्स रिफोर्म्स एक्ट 1950 की वैधता को चुनौती दी गई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने छम् विधायन सिद्धान्त के आधार पर अवैध घोषित कर दिया क्योंकि इसमें मुआवजे के निर्धारण के लिये वास्तव में कोई आधार निर्धारित नहीं किया गया था, यद्यपि ऊपरी तौर से ऐसा करने का प्रयास किया गया था। वास्तव में अधिनियम में दी गई व्यवस्था के फलस्वरूप जमीदारों को कोई मुआवजा नहीं मिलता था।
3. राज्य क्षेत्रीय सम्बन्ध का सिद्धान्त (Doctrine of Territorial Nexus) – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 245 (1) के अनुसार इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संसद भारत के सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकेगी और किसी राज्य का विधान-मंडल सम्पूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकेगा। अनुच्छेद 245 (2) में यह वर्णित है कि संसद द्वारा बनाई गई कोई विधि इस आधार पर अवैध नहीं समझी जाएगी कि उसका राज्यक्षेत्रातीत लागू होगा। अतः संविधान राज्यक्षेत्रातीत विधि बनाने की शक्ति केवल संसद को प्रदान करता है राज्य विधान-मंडल को नहीं, और इसलिए राज्य विधान-मंडल के द्वारा अधिनियमित किसी भी विधि पर आक्षेप किया जा सकता है जब तक कि वह राज्यक्षेत्रीय सम्बन्ध के आधार पर संरक्षित न हो। यदि किसी राज्य विधि का उस विधि की विषय-वस्तु के साथ पर्याप्त सम्बन्ध है तो वह राज्य विधि वैध है चाहे उसका राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन हो। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि राज्य विधान-मंडल की राज्यक्षेत्रातीत विधि बनाने की अधिकारिता है, चाहे उस विधि की विषय-वस्तु उस राज्य की क्षेत्रीय सीमा के भीतर अवस्थित न हो, बशर्ते कि इन दोनों के बीच पर्याप्त सम्बन्ध विद्यमान हो। भारत में राज्य क्षेत्रीय सम्बन्ध का सिद्धान्त कर आरोपण के मामलों में सर्वाधिक लागू होता है। उदाहरणार्थ-
(i) मुम्बई राज्य बनाम आर० एस० डी० चमर बागवाला A.I.R. 1957 SC 689 में एक समाचार पत्र जिसका मुद्रण और प्रकाशन बंगलौर से होता था, मुम्बई राज्य में भी पर्याप्त प्रचलित था। इस समाचार पत्र के द्वारा उत्तरदाता पुरस्कार प्रतियोगिताओं का संचालन किया करता था जिसके लिए मुम्बई राज्य में स्थित अभिकर्ताओं और आगारों के द्वारा लोगों से प्रवेश-पत्र और फीस ली जाती थी जिसे बंगलौर भेजा जाता था। मुम्बई विधान-मंडल ने 1952 के अधिनियम को अधिनियमित कर उसके अन्तर्गत पुरस्कार प्रतियोगिताओं के व्यवसाय पर कर लगा दिया। उत्तरदाता ने यह तर्क दिया कि इस कर का भुगतान करने के लिए वह बाध्य नहीं था क्योंकि यह अधिनियम राज्यक्षेत्रातीत होने के कारण अवैध था। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि जब किसी अधिनियम की वैधता का प्रश्न उठाया जाता है तो न्यायालय के द्वारा प्रथम योग्य कार्य यह है कि वह यह परीक्षण करे कि वह विधि जिस विधायिका ने बनाई थी उसे वह विधि बनाने का अधिकार था क्योंकि अपनी विधायी शक्तियों के अन्तर्गत एक राज्य विधान-मंडल को स्वयं के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति है, और राज्यक्षेत्रीय सम्बन्ध के अभाव में ऐसी कोई विधि नहीं बना सकता जिसका प्रभाव राज्य से परे पड़े। राज्यक्षेत्रीय सम्बन्ध की पर्याप्तता के लिए न्यायालय ने दो बातों पर जोर दिया— (i) सम्बन्ध वास्तविक होना चाहिए, भ्रांतिपूर्ण नहीं, और (ii) आरोपित किया जाने वाला दायित्व उस सम्बन्ध के संगत होना चाहिए। यह निर्धारित किया गया कि वे सारे कार्य जो उस प्रतियोगिता से साधारणतः आशा किए जाने योग्य राज्य में किए जाते थे, और पर्याप्त राज्यक्षेत्रीय सम्बन्ध होने के कारण मुम्बई विधान-मंडल उत्तरदाता, जो राज्य के बाहर रहता था, पर कर लगाने के लिए सक्षम था।
(ii) टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी बनाम बिहार राज्य AIR 1998 SC 452 में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राज्य क्षेत्रीय सम्बन्ध का सिद्धान्त कर आरोपित नहीं करता, पर जब भी किसी विधायिका द्वारा पारित किसी विधि के अन्तर्गत कर आरोपित किया जाता है, तो किसी विशिष्ट मामले में इसे किन परिस्थितियों में लागू किया जाएगा यह केवल उसी का संकेत देती है। कराधायक राज्य में माल का उत्पादन या निर्माण, इस सिद्धान्त के लागू होने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यह स्पष्ट है क्योंकि किसी माल के विक्रय में सम्पत्ति माल में हस्तांतरित होती है। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय ने राज्य क्षेत्रीय सम्बन्ध के सिद्धान्त को विक्रय कर के मामलों पर भी लागू कर दिया।
(iii) बिहार राज्य बनाम चारूशीला दास A.I.R. 1959 SC 1002 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी राज्य जहां भी धर्मार्थ प्रतिष्ठान स्थित है, उस राज्य के विधान-मंडल को विधि बनाने की शक्ति है, और यह शक्ति तब भी बनी रहती है जब उस प्रतिष्ठान की सम्पत्ति का बड़ा या छोटा भाग किसी अन्य राज्य में स्थित हो। इसका स्वाभाविक परिणाम यह है कि इस विधि को अधिनियमित करने वाला राज्य विधान-मंडल को न्यासियों और उनके सेवकों और अभिकर्त्ताओं, जो न्याय के प्रशासन के लिए उस राज्य में निवास करते हैं, के लिए भी विधि बनाने के लिए सक्षम हैं।
4. दखलकृत क्षेत्र का सिद्धान्त (Doctrine of Occupied Field) – दखलकृत क्षेत्र के सिद्धान्त का अर्थ यह है कि जब संघ या केन्द्रीय विधायिका किसी विशिष्ट विषय पर विधि बनाती है और इस प्रकार उस क्षेत्र पर दखल कर लेती है तो राज्य विधायिकाओं का उस क्षेत्र पर विधि निर्माण का कोई अधिकार नहीं रहता। फिर भी यदि राज्य विधायिका उस क्षेत्र पर कोई विधि बनाती है तो राज्य द्वारा अधिनियमित विधि उस सीमा तक असंवैधानिक होगी। भारत में क्रमशः संघ सूची और राज्य सूची के रूप में संघ विधायिका और राज्य विधायिका को विधि निर्माण की शक्ति है। इस विषय पर संविधान का अनुच्छेद 254 (1) यह स्पष्ट करता है कि यदि किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि का कोई उपबन्ध संसद द्वारा बनाई गई विधि के, जिसे अधिनियमित करने के लिए संसद सक्षम है, किसी उपबंध के या समवर्ती सूची में वर्णित किसी विषय के सम्बन्ध में विद्यमान विधि के किसी उपबंध के विरुद्ध है तो खंड (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, संसद द्वारा बनाई गई विधि, चाहे वह ऐसे राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि से पहले या उसके बाद में पारित की गई हो, यह विद्यमान विधि, अभिभावी होगी और उस राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि उस विरोध की मात्रा तक शून्य होगी।
अनुच्छेद 254 (2) के अनुसार जहाँ राज्य के विधान मंडल द्वारा समवर्ती सूची में वर्णित किसी विषय के सम्बन्ध में बनाई गई विधि में कोई ऐसा उपबंध शामिल है जो संसद द्वारा पहले बनाई गई विधि के या उस विषय के सम्बन्ध में किसी विद्यमान विधि के उपबंधों के विरुद्ध है तो ऐसे राज्य के विधान मंडल द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया है और उस पर उसकी अनुमति मिल गई है तो वह विधि उस राज्य में अभिभावी होगी- परन्तु इस खंड की कोई बात संसद को उसी विषय के सम्बन्ध में कोई विधि जिसके अन्तर्गत ऐसी विधि है, जो राज्य के विधान-मंडल द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि का परिवर्द्धन, संशोधन, परिवर्तन या निरसन करती है, किसी भी समय अधिनियमित करने से वर्जित नहीं करेगी।
5. भविष्यलक्षी प्रत्यादेश (Doctrine of Prospective Overruling) - आई० सी० गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य A.I.R. 1967 SC 1643 में उच्चतम न्यायालय ने भविष्यलक्षी प्रत्यादेश का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। न्यायालय का विचार था कि संसद को मूल अधिकारों में संशोधन का कोई अधिकार नहीं है। मुख्य न्यायमूर्ति सुब्बाराव ने यह प्रश्न किए कि जब संसद् एकमत होते हुए भी अपनी साधारण विधायी प्रक्रिया के अन्तर्गत एक विधेयक अधिनियमित कर मूल अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकती, तो वह केवल दो-तिहाई बहुमत से किसी मूल अधिकार को कैसे निराकृत कर सकती है, और जब संविधान के कम महत्वपूर्ण अनुच्छेदों के संशोधन को संघ के राज्यों के बहुमत का अनुसमर्थन आवश्यक है, तो इस आवश्यकता को बगैर पूरा किए हुए एक मूल अधिकार को कैसे संशोधित किया जा सकता है। विद्वान न्यायाधीश का विचार था कि अनुच्छेद 368 ने संविधान के संशोधन की केवल प्रक्रिया प्रतिपादित की है, और संशोधन की कोई शक्ति प्रदान नहीं की है, जिसे केवल संसद की अवशिष्ट शक्ति के भीतर अनुच्छेद 248 में प्रदान किया गया है। उनका यह भी मत था कि अनुच्छेद 13 (2) में 'विधि' शब्द का अर्थ साधारण विधि और संवैधानिक विधि दोनों से है, और इस कारण राज्य ऐसा कोई संविधानिक संशोधन नहीं कर सकता जो मूल अधिकारों को छीनता है या न्यून करता है क्योंकि 'विधि' शब्द में संशोधन भी शामिल है। अतः यह निर्धारित करते हुए कि संसद मूल अधिकारों में संशोधन करने के लिए सक्षम नहीं है, पांच न्यायाधीशों ने एक साथ यह घोषणा की कि यह सिद्धान्त केवल भविष्य में लागू होगा और इसका भूतलक्षी प्रभाव नहीं हो सकता। इस कारण ही इस सिद्धान्त का नाम 'भविष्यलक्षी प्रत्यादेश' रखा गया।
इस निर्णय का प्रभाव यह हुआ कि इस निर्णय के दिन तक मूल अधिकारों के सम्बन्ध में सभी संशोधन वैधानिक और प्रभावपूर्ण होंगे, और उसके पश्चात् मूल अधिकारों में संशोधन का कोई अधिकार संसद को नहीं होगा। विद्धान् न्यायाधीशों ने इस सिद्धान्त के लागू किए जाने पर तीन निर्बन्धन भी लगाए—पहला, कुछ समय के लिए भविष्यलक्षी प्रत्यादेश का सिद्धान्त केवल सांविधानिक विषयों पर ही लागू होगा; दूसरा, केवल मात्र उच्चतम न्यायालय ही, और अन्य कोई न्यायालय नहीं, इस सिद्धान्त को लागू कर सकने का अधिकारी होगा; और तीसरा, आरोपित किए जाने वाली भविष्यलक्षिता की परिधि क्या होगी यह विषय उच्चतम न्यायालय के विवेकाधिकार का है जिसको जो कारण या विषय उस न्यायालय के समक्ष है उसको न्याय के आधार पर ही तय किया जाएगा।
उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि भविष्यलक्षी प्रत्यादेश का सिद्धान्त विधि बनाने और नीति बनाने दोनों के ही सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय की भूमिका को मान्यता देता है। इस सिद्धान्त को लागू किए जाने की परिधि भी इस अर्थ में बहुत सीमित है कि इसे केवल सांविधानिक संशोधन के क्षेत्र में ही लागू किया गया है। इस सिद्धान्त में यह भी परिकल्पित है कि कोई उलट देने वाला निर्णय उलट दिए गए निर्णय के आधार पर किए गये मध्यवर्ती संव्यवहारों को प्रभावित नहीं करेगा और भविष्य के विषयों पर ही लागू होगा। दूसरे शब्दों में, कोई विधि जिसे अवैध घोषित किया गया तो भूत में किए गए संव्यवहारों और निहित अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकेगी, और केवल भविष्य में होने वाले अर्थात् न्यायिक अमान्यता के बाद के संव्यवहारों और अधिकारों के सम्बन्ध में ही लागू हो सकेगी। जबकि भूतलक्षी प्रत्यादेश से कई बार कठोर परिणाम निकलने की सम्भावना है जब निहित अधिकारों पर बाधा पड़े या जब तात्कालिक नियमों के अन्तर्गत पूर्व में ही कार्यवाही कर ली गई हो, भविष्यलक्षी प्रत्यादेश इस प्रकार की कठिनाईयों को दूर करता है। भारत में भविष्यलक्षी सिद्धान्तों और विनिर्दिष्ट रूप से संविधान का पहला, और सत्रहवां संशोधन, उच्चतम न्यायालय ने शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ A.I.R. 1951 SC 458 और सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य A.I.R. 1965 SC 845 में उचित ठहराया था। दूसरा, 1950 से 1967 की अवधि में बहुत सारे विधानों को अधिनियमित किया गया जिससे भारत में भूमि सम्बन्धी क्रांति का दौर आया।
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