गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की प्रस्तावना का महत्व

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की प्रस्तावना का महत्व (Importance of the Preamble of Consumer Protection Act, 1986) बताइये।

 

उत्तर - लखनऊ डवलपमेन्ट अथोरिटी बनाम एम० के० गुप्ता (1994) ISCC 243 में जस्टिस आर० एम० सहाय ने कहा कि अधिनियम की प्रस्तावना जो विधायी आशय निश्चित करने में उपयोगी सहायता दे सकती है, से आरम्भ किया जाए तो अधिनियम उपभोक्ताओं के हितों को श्रेष्ठकर संरक्षण प्रदान करने के लिए अधिनियमित किया गया है। "संरक्षण" शब्द का प्रयोग अधिनियम रचयिताओं का आशय समझने की कुन्जी है। विभिन्न परिभाषाएं एवं उपबंध इस उद्देश्य को प्राप्त करने का बड़े विस्तार से प्रयास करते हैं। इस निर्धारित धारणा को छोड़े बिना कि प्रस्तावना किसी उपबंध के अन्यथा साधारण अर्थ को नियंत्रित नहीं कर सकती, उनका अर्थ इसी उद्देश्य के प्रकाश में निकाला जाना चाहिए।

 

इस अभिप्राय का अनुसरण करते हुए उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया है कि सरकारी निकाय, विधि के अन्तर्गत उन लोगों की सेवाओं में अपर्याप्तता के लिए जो उनकी सेवाएँ प्रतिफल के लिए क्रय करते हैं, दायी निर्धारित किए जायेंगे और प्रभारी अधिकारी यदि वे सेवाओं के उपभोक्ताओं को कोई क्लेश कारित करते हैं तो व्यक्तिगत रूप से दायी निर्धारित किए जाएंगे।

 

7. सेवाओं का अवक्रेता (Hirer of Services) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

 

उत्तर:- सेवाओं का अवक्रेता ( Hirer of Services) - उपभोक्ता की दूसरी कोटि सेवाओं के उपभोक्ता की है। परिभाषा कहती है कि "उपभोक्ता" शब्द उस व्यक्ति को सम्मिलित करता है जो प्रतिफल के लिए कोई सेवाएँ शुल्क पर लेता है।

राष्ट्रीय आयोग ने बाई फोर्ड बनाम एस० एस० श्रीवास्तव (1993) 2 C.P.R. 83 N.C. में यह निर्धारित किया कि संविदा का वह भाग जिसका सम्बन्ध निःशुल्क पुरस्कार है, बिना प्रतिफल का है अतः ऐसे पुरस्कार का विजेता उपभोक्ता नहीं था सेवा की परिभाषा धारा 2 के खण्ड (ब) में इस प्रकार की गई है कि हर प्रकार की सेवा जो संभावी उपभोक्ता को उपलब्ध करायी जाती है और जिसमें बैंकिंग, वित्तीयपोषण, बीमा परिवहन, प्रसंस्करण, विद्युत् या दूसरी ऊर्जा की अपूर्ति, बोडिंग या आवास या दोनों भवन निर्माण, मनोरंजन आमोद या समाचार या अन्य सूचनाएँ जुटाने से सम्बन्धित सुविधाएँ उपलब्ध कराना सम्मिलित है। "अवक्रय" शब्द का अर्थ होता है किसी वस्तु का या किसी व्यक्ति की सेवाओं का भुगतान के बदले में अस्थायी रूप से प्राप्त करना, किसी निश्चित रकम के बदले में अस्थाई रूप से लेना, किसी मूल्य पर सेवाओं का प्राप्त करना, प्रतिकरण पर अस्थायी उपभोग के लिए अनुदान देना।

 

8. उपभोक्ता न्यायालयों के गठन का वर्णन कीजिये।

उत्तर- उपभोक्ता न्यायालयों का गठन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 10 के अधीन सबसे पहले तथा छोटा न्यायालय जिला उपभोक्ता फोरम है जैसा इसके नाम से प्रकट है इसका गठन प्रत्येक जिले के लिये किया गया है। इसका क्षेत्राधिकार सम्बन्धित जिले की सीमाओं तक ही सीमित है। कुछ जिलों में एक से अधिक जिला फोरमों के गठन की व्यवस्था है। जिला फोरम में तीन संख्यकीय न्यायिक पदाधिकारियों की एक बेंच का गठन किया गया है। फोरम का अध्यक्ष कार्यरत या सेवानिवृत्त जिला जज होता है। इसमें अध्यक्ष के अतिरिक्त एक पुरुष सदस्य तथा महिला सदस्य भी होते हैं। निर्णय बैंच के बहुमत से होते हैं। निर्णय पर तथा प्रत्येक न्यायिक आदेश पर बैंच कम से कम दो सदस्यों की सहमति होनी आवश्यक है।

 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की भावना को दृष्टिगत रखते हुये जिला फोरम पुरुष सदस्य की नियुक्ति के लिये स्नातक तक की शिक्षा ट्रेड या व्यापार में प्रसिद्धि की अपेक्षा की गयी है तथा महिला सदस्य से सामाजिक कार्यकर्ता होने की अपेक्षा की गयी है महिला सदस्य का भी स्नातक तक शिक्षित होना आवश्यक है। सदस्यों के लिये कम से कम 35 वर्ष की आयु तथा स्नातक की डिग्री धारक होना अनिवार्य कर दिया गया है। जिला फोरम के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति सम्बन्धित राज्य के राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष, राज्य सरकार के खाद्य तथा रसद सचिव तथा राज्य सरकार प्रमुख न्याय सचिव (एल० आर०) से गठित समिति की सिफारिश पर पांच वर्ष के लिये राज्यपाल द्वारा की जाती है बशर्ते कि ऐसे अध्यक्ष तथा सदस्यों की आयु 65 वर्ष से अधिक नहीं हो जाती है। नये संशोधन में सदस्यों की पुनः नियुक्ति की व्यवस्था है।

 

उपभोक्ता न्यायालय के क्षेत्राधिकार (Juridiction of the Distict Forum) – जिला फोरम की स्थानीय क्षेत्राधिकारिता के सम्बन्ध में सुसंगत उपबन्ध उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 11 (2) के खण्ड 'क' 'ख' तथा 'ग' में दिये गये हैं। इन उपबन्धों का सार यह है कि एक उपभोक्ता किसी जिला फोरम में निम्न स्थितियों में अपना वाद दाखिल कर सकता है-

 

(क) (1) जहाँ विरोधी पक्षकार अपनी स्वेच्छा से (क) निवास करता है, या (ख) कारोबार करता है, या (ग) शाखा कार्यालय रखता है, या (घ) अभिलाभ के लिये स्वयं काम करता है (वर्कस फोर गेन)

अथवा

(2) जहाँ विरोधी पक्षकार ऐसे अधिक हैं वहाँ विरोधी पक्षकारों में से हर विरोधी पक्षकार स्वेच्छा से |

 

(क) निवास करता है, या (ख) कारोबार करता है, या (ग) शाखा कार्यालय रखता है, या (घ) लाभ के लिये स्वयं काम करता है उपरोक्त शर्तों में से केवल एक शर्त ही उपभोक्ता को जिला फोरम में क्षेत्राधिकारिता दिलाने के लिये काफी है। यदि कोई विरोधी पक्षकार किसी जिला फोरम की स्थानीय अधिकारिता के अधीन निवास करता है तब शेष शर्तों का विद्यमान रहता आवश्यक नहीं है। यही कारण है कि हर शर्त के बाद शब्द 'या' का प्रयोग किया गया है अथवा (3) जहाँ वाद - कारण पूर्णतः या अंशतः उत्पन्न होता हो।

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