गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार की नियम बनान की शक्तियों का उल्लेख कीजिये।

केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार की नियम बनान की शक्तियों का उल्लेख कीजिये।

Mention the Rule making powers' of the Central Government and the State Governments.

 

उत्तर- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 30 एवं 31 में केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार की "नियम" बनाने की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। ऐसे नियम इस अधिनियम के उपबंधों को लागू करने के लिए बनाये जा सकते हैं। केन्द्रीय सरकार अधिनियम के निम्नलिखित उपबंधों को लागू करने के लिए नियम बना सकती है

 

(i) धारा 2 की उपधारा (1) का खण्ड (क)

(ii) धारा 4 की उपधारा (2) का खण्ड (ख)

(iii) धारा 5 की उपधारा (2)

(iv) चारा 13 की उपधारा (4) का खण्ड (vi) तथा

(v) धारा 19,

(vi) धारा 20 की उपधारा (2) और (vii) धारा 22

 

इसी प्रकार, राज्य सरकार अधिनियम के निम्नलिखित उपबंधों को लागू करने के लिए नियम बना सकती है

 

(i) धारा 7 की उपधारा (2) व (4),

(ii) धारा 10 की उपधारा (3),

(iii) धारा 12 की उपधारा (2),

(iv) धारा 13 की उपधारा (1) का खण्ड (ग) (v) धारा 14 की उपधारा (3)

(vi) धारा 15, और

(vii) धारा 16 की उपधारा (2)

 

ऐसे नियम की अधिसूचना (Notification) द्वारा बनाये जायेंगे तथा इन्हें केन्द्रीय सरकार की दशा में संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष एवं राज्य सरकार की दशा में राज्य के विधान मण्डल के समक्ष रखा जायेगा।

 

नियमों का संसद के समक्ष रखा जाना (Laying of the Rules before the Parliament) - धारा 31 (1) के अनुसार इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा - बनाये गये प्रत्यक नियम इसके बनाये जाने के बाद, यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन, जब वह सत्र में हो, के समक्ष तीस दिनों की पूर्ण अवधि के लिए जो एक सत्र में या दो में या अधिक उत्तरवर्ती सत्रों को शामिल कर सकेगा, रखा जाएगा, और यदि उक्त सत्र या आनुक्रमिक सत्रों के तत्काल -बाद सत्र के पूर्व दोनों सदन नियम में किसी परिवर्तन को करने के लिए सहमत होते हैं, या दोनों सदन सहमत होते हैं कि नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, तो इसके बाद नियम का ऐसे परिवर्तित रूप में लागू होगा, या प्रवर्तन नहीं होगा, जैसा कि मामला हो, परन्तु ऐसा कोई उपान्तरण या निस्प्रभाव उस अधिनियम के अधीन पूर्व में किये गए किसी चीज की वैधता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा।

 

इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, इसके बनाये जाने के बाद, यथाशीघ्र विधान मण्डल के समक्ष रखा जाएगा।

 

धारा 31 के उपबन्ध केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों पर यह दायित्व आरोपित करते हैं। कि यदि वे कोई नियम बनाती हैं तो प्रस्तावित नियम को संसद् या विधान मण्डल के दोनों सदनों के पटल पर रखें। यह आवश्यक नहीं है कि सदन उसे उसी रूप में पास ही कर दे। उसमें सदस्यों के विचार-विमर्श और बहस के दौरान आये हुए सुझावों को ध्यान में रखकर नियमों में परिवर्तन भी किया जा सकता है। यदि उपान्तरण (Modification) होता है तो उपान्तरित रूप में ही नियम लागू किये जायेंगे।

 

दूसरी बात नियम के अस्वीकार किये जाने के बारे में विचारणीय होती है। जब केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियम क्रमशः संसद और विधानमण्डल के दोनों सदनों के पटल पर सत्र के दौरान रखे जाते हैं तो ऐसा भी हो सकता है कि अधिसंख्यक सदस्य उसके पक्ष में न हों। जब बहुमत नियम के लागू किए जाने के सम्बन्ध में नहीं हैं तो उसे निरस्त अर्थात् अस्वीकृत माना जाएगा। ऐसी स्थिति बनने पर निर्मित नियम उक्त सरकारों द्वारा लागू नहीं किये जाएँगे

 

निष्कर्ष (Conclusion) निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि प्रस्तावित नियम के पारित होने या न होने, लागू किये जाने या प्रवर्तन में न आ सकने की बात संसद अथवा विधान मण्डल द्वारा स्वीकृत या अस्वीकृत किये जाने पर निर्भर करती है।

 

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