कौन व्यक्ति उपभोक्ता (Consumer) नहीं है?
उत्तर-
स्मरणीय है कि, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अधीन किसी भी प्रकार का अनुतोष प्राप्त
करने के लिये परिवादी का उपभोक्ता होना पूर्व शर्त है। यह सही है कि इन अधिनियम में
'उपभोक्ता' शब्द की व्यापक भाव में व्याख्या की गयी है किन्तु इसी अधिनियम के अध्ययन
में दर्शित है कि निम्न व्यक्ति 'उपभोक्ता' की कोटि में नहीं आते हैं-
(क)
जब किसी वस्तु के खरीदार द्वारा वस्तु बेचने वाले को वस्तु डिलीवर करने के लिये किसी
प्रतिफल का भुगतान नहीं किया गया है।
(ख)
जब किसी सेवा को प्राप्त करने के लिये सेवा प्राप्ति करने वाले व्यक्ति ने सेवा करने
वाले व्यक्ति को कोई प्रतिफल नहीं दिया है या उससे प्राप्त नहीं किया है।
(ग)
जब किसी व्यक्ति ने किसी वस्तु की खरीद वाणिज्यक ( कॉमर्शियल) प्रयोजन के लिये की है
तब ऐसा खरीदार उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के उपबन्धों के प्रयोजन हेतु उपभोक्ता नहीं
होगा किन्तु यदि उक्त व्यक्ति ने कोई मशीन आदि अपनी जीविका को चलाने के लिये खरीदी
है। तब ऐसी खरीद 'वाणिज्यक प्रयोजन के लिये नहीं मानी जायेगी और ऐसी आजीविका चलाने
के लिये खरीदी वस्तु का खरीदार इस उपभोक्ता अधिनियम के अधीन 'उपभोक्ता' हो जायेगा।
उच्चतम
न्यायालय विभिन्न उच्च न्यायालयों, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग तथा विभिन्न
राज्य के उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोगों द्वारा निर्णित निर्णयों के आधार पर निम्न
व्यक्ति उपभोक्ता नहीं माने गये हैं-
1.
सरकारी सेवक, जब वह उपभोक्ता फोरम से अपने वेतन, भविष्य निधि, सामुहिक बीमा तथा ग्रेच्युटी
से सम्बन्धित मामलों के लिये अनुतोष मांगता है क्योंकि सरकार तथा उसके कर्मचारी में
सेवा भाड़े पर देने वाले व्यक्ति तथा प्रतिफल का मुकदमा करके सेवा भाड़े पर प्राप्त
करने वाले व्यक्ति के बीच स्थित उपभोक्ता का सम्बन्ध नहीं है। सरकार तथा उसके बीच स्वामी
तथा सेवक का सम्बन्ध है। उपभोक्ता तथा सेवा उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति का सम्बन्ध नहीं
है। इसके अतिरिक्त उपरोक्त वर्णित सरकारी व्यक्ति उक्त मदों में भुगतान पाने के लिये
सरकार को कोई प्रतिफल नहीं देते हैं, बल्कि उससे अपनी सेवायें देने के लिये वेतन के
रूप में प्रतिफल पाते हैं।
2.
सरकारी अस्पताल तथा मेडिकल कॉलिज में ईलाज कराने वाले रोगी क्योंकि सरकार उन्हें निःशुल्क
स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध कराती है। उच्चतम न्यायालयों ने अस्पताल आदि में नाम मात्र
की जाने वाली पंजीकरण धनराशि को प्रतिफल नहीं माना है।
3.
सरकारी अस्पताल तथा मेडीकल कॉलिज में निःशुल्क परिवार नियोजन का ऑपरेशन कराने वाली
महिला क्योंकि उससे उक्त ऑपरेशन के लिये कोई प्रतिफल नहीं लिया गया है बल्कि उसे तो
सरकार ने परिवार नियोजन का ऑपरेशन कराने हेतु प्रोत्साहन राशि और प्रदान है।
4.
नगरपालिका आदि में करदाता क्योंकि कर या टैक्स को उच्चतर न्यायालयों ने ऐसी कानूनी
धनराशि माना है जो हर नागरिक राज्य की ओर से प्रदान की जाने वाली सुविधाओं के लिये
आवश्यक कानूनी (स्टेटयुटरी) भुगतान है। यह भुगतान कानूनी कहलाता है। ऐसे भुगतान की
प्रतिफल मानकर कोई भी करदाता राज्य से किसी विशिष्ट सेवा की अपेक्षा नहीं कर सकता है।
यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि किसी सेवा को प्राप्त करने वाली फीस या प्रतिफल तथा
कर या टैक्स के रूप में दी जानेवाली धनराशि में अन्तर है।
5.
किसी प्राधिकरण में किसी पद के लिये आवेदन देने वाला आवेदक ।
6.
व्यक्तिगत सेवा संविदा के अधीन कार्यरत् व्यक्ति क्योंकि उसके तथाउसके स्वामी के बीच
सेवक तथा स्वामी नियोजक का सम्बन्ध है।
7.
हॉयर परचेज एग्रीमेन्ट के अधीन ऋण लेने वाले व्यक्ति।
8.
निर्माण परियोजना का ठेकेदार।
9.
वाणिज्यक ( कॉमर्शियल) प्रयोजन का खरीदार
10.
सोसायटी के सदस्य सहकारिता दाद के मामले में।
11
ऐसे व्यक्ति जिन्हें कोई व्यक्ति अपने नियोजन के लिये सेवा नियोजित करता है।
12.
न्यायालय शुल्क देने वाले वादकारी।
13.
किसी कम्पनी के परिवर्तनीय डिबेन्चर्स का चारक
37.
सम्पत्ति सम्बन्धी अपवचन (Slander of Goods) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर- सम्पत्ति सम्बन्धी अपवचन (Slander of Goods ) ऐसे मिथ्याकथन जो "किसी व्यक्ति की सम्पत्ति में दोष लगाकर विद्वेषपूर्ण आशय से प्रकाशित किये गये हों तथा इससे उस व्यक्ति को विशिष्ट क्षति पहुंची हो।" इसे ट्रेड लाइवेट भी कहा जाता है अर्थात् जिन मिच्या बचनों से किसी व्यक्ति की सम्पत्ति का अवमूल्यन हो जाता है तो उसे सम्पत्ति सम्बन्धी अपवचन माना जाता है। ऐसे बाद में वादी को यह सिद्ध करना होता है कि- (i) प्रतिवादी ने वादी के माल को दोषपूर्ण या घटिया किस्म का बतलाया है। प्रतिवादी द्वारा अपने माल को वादी की अपेक्षा अच्छा या ऊंचा बताना सम्पत्ति सम्बन्धी अपवचन नहीं होते हैं (ii) प्रतिवादी द्वारा वादी के माल को दोषपूर्ण अथवा घटिया किस्म का बताना मिथ्या है। (iii) प्रतिवादी के उक्त कथन का प्रकाशन हो गया था प्रकाशन मौखिक या लिखित कैसा भी हो सकता है। (iv) प्रतिवादी ने वादी के माल को घटिया द्वेषपूर्ण आशय से बताया था अर्थात् प्रतिवादी का आशय वादी को क्षति पहुँचाने का था। (v) प्रतिवादी के उक्त कृत्य से वादी को विशिष्ट क्षति पहुँची है।
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