प्रश्न - अपकृत्य विधि के अन्तर्गत कौन दावा नहीं कर सकता तथा किस पर दावा नहीं किया जा सकता ? वर्णन कीजिये।
Who can not sue and who cannot
be sued under the Law of torts? Discuss.
Or
दुष्कृति
विधि के अन्तर्गत कौन व्यक्ति ऐसे हैं जो स्वय मुकदमा चलाने तथा दूसरों के द्वारा अपने
विरुद्ध वाद चलाये जाने के लिये अक्षम हैं। संक्षेप में वर्णन कीजिये।
Explain briefly the persons who are under the disability to sue and to be sued under the law of torts.
उत्तर- पोलाक के अनुसार, "किसी भी दीवानी क्षति के मामले में उत्तरदायी ठहराये जाने के लिये व्यक्तिगत अधिकारों की कोई सीमा निर्धारित नहीं है।" किन्तु इस सामान्य नियम के निम्नलिखित अपवाद हैं- (अ) कौन दावा नहीं कर सकता, (ब) किस पर दावा नहीं किया जा सकता।
(अ)
कौन दावा नहीं कर सकता ? (Who can not sue ? -) निम्नलिखित व्यक्ति अपनी अयोग्यता के
आधार पर क्षतिपूर्ति का दावा करने में असमर्थ हैं-
1.
दण्डित अपराधी (Convicts) - एक व्यक्ति अपने कारावास की अवधि में अपनी सम्पत्ति के
प्रति किये गये क्षतिपूर्ण कृत्य के लिये दावा नहीं कर सकता। किन्तु यदि क्षतिपूर्ण
कृत्य उसकी सम्पत्ति के खिलाफ न होकर उस व्यक्ति के खिलाफ है तो वह दावा करने का अधिकारी
है। इंगलैण्ड में अब यह अयोग्यता क्रिमिनल जस्टिस एक्ट 1948 द्वारा समाप्त कर दी गई
है।
भारत
में भारतीय दण्ड संहिता (I.P.C.) की धारा 126, 127 व 169 के सिवाय, दण्डित अपराधी अपने
शरीर व सम्पत्ति दोनों के लिये हानिपूर्ति का वाद चला सकता है।
2.
विदेशी शत्रु (Alien Enemy) वह व्यक्ति जो शत्रु राष्ट्र का निवासी या नागरिक है, विदेशी
शत्रु कहलाता है। सामान्य नियमानुसार विदेशी शत्रु अंग्रेजी कानून के अन्तर्गत अपकृत्य
के लिये वाद नहीं चला सकता, किन्तु यदि वह उचित रूप से अनुमति प्राप्त कर लेता है तो
बाद चलाने का अधिकारी है।
भारत
में धारा 83 C.P.C. के अन्तर्गत विदेशी शत्रु केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त
करने के बाद मुकदमा चलाने का अधिकारी है।
3.
विवाहित स्त्री या पति और पत्नी (Married Women or Husband and Wife) - विवाहित स्त्री
(Married Women) - इंगलैण्ड की सामान्य विधि के अनुसार 1882 के पूर्व विवाहित स्त्री
किसी अन्य व्यक्ति पर वाद चलाने की अधिकारी नहीं थी जब तक कि उसका पति उसके साथ सहवादी
न बने। विवाहित स्त्री सम्पत्ति अधिनियर 1882 द्वारा अब यह अयोग्यता समाप्त कर दी गई
है। अब वह अपकृत्य के मामले में सभी प्रत्पर से मुकदमा चला सकती है और उसके ऊपर मुकदमा
चलाया जा सकता है, किन्तु अभी भी उसका दायित्व उसकी निजी सम्पत्ति तक सीमित था। इस
प्रतिबन्ध को भी विधि सुधार एक्ट, 1935 के द्वारा खत्म कर दिया गया है और अब विवाहित और अविवाहित स्त्री दोनों सामान्य स्तर
पर हैं।
पति
व पत्नी (Actions between Spouse) सामान्य विधि के अनुसार पति और पत्न एक दूसरे के
खिलाफ क्षतिपूर्ति का वाद नहीं चला सकते थे। इस नियम का एक अपवाद यह था कि पत्नी अपनी
निजी सम्पत्ति की सुरक्षा हेतु अपने पनि के खिलाफ वाद दायर कर सकती थी मानो वह अविवाहित
हो किन्तु पति को पत्नी के विरुद्ध ऐसा कोई अधिकार न था अतः यह कहावत बन गई थी कि इंग्लैण्ड
में, "एक पति अपनी पत्नी की टांग तोड़कर कानूनी दायित्व से बच सकता है परन्तु
घड़ी तोड़कर नहीं बच सकता।" (A husband may with civil impunity break his
wife's leg but not her watch.) ।
4.
निगम (Corporation) निगम एक कानूनी व्यक्ति है जिसके कर्तव्य और अधिकार उन व्यक्तियों
के व्यक्तिगत कर्तव्यों व अधिकारों से भिन्न होते हैं जिनसे मिलकर निगम बनना है अपकृत्य
कानून के अन्तर्गत निगम व्यक्तिगत श्रात जैसे आक्रमण (Assault) या व्यक्ति अपमानकारी
लेख (Libel) के लिये मुकदमा नहीं चला सकता, क्योंकि ऐसे कार्य केवल मनुष्यों द्वारा
ही किये जा सकते हैं, किन्तु मानहानिकारक लेख जिसमें निगम की सम्पत्ति या व्यवसाय को
हानि पहुंची हो, के लिये वाद चला सकता है।
निगम
अपना कार्य अभिकर्ताओं के द्वारा करता है। अतः यदि निगम के किसी कर्मचारी या एजेन्ट
ने अपने नियोजन के क्रम में कोई क्षतिकृत्य कार्य किया है तो उसके लिये निगम स्थानापन्न
दायित्व के आधार पर स्वयं जिम्मेदार होगा बशर्ते कि कार्य निगम के अधिकार क्षेत्र के
अन्तर्गत हो। इस सम्बन्ध में पोल्टन व० लन्दन साउथ वेस्ट रेलवे कम्पनी, 1868 का वाद
महत्वपूर्ण है।
अहमदाबाद
नगरपालिका व पनुभाई, 1935 में यह निर्णय दिया गया कि निगम के ऊपर द्वेषपूर्ण अभियोजन
का वाद चलाया जा सकता है।
5.
गर्भ स्थित शिशु (Child in Womb ) अपने जन्म के बाद शिशु उस हानि के लिये - हानिपूर्ति
का दावा दायर नहीं कर सकता जो उसको उस समय पहुँची हो, जबकि वह अपनी माता के गर्भ में
था। इंगलैंड और भारत में इस विषय पर न्यायालय का कोई निर्णय नहीं है। इस समस्या का
निर्णय सर्वप्रथम आयरलैंड के वाकर व प्रेट नार्दन रेलवे कम्पनी ऑफ आयरलैंड 1890 नामक
बाद में हुआ था। इसमें एक गर्भवती स्त्री प्रतिवादी रेलवे कं० की गाड़ी में यात्रा
कर रही थी। रेल दुर्घटना के कारण वह घायल हो गयी। फलस्वरूप एक बदशक्ल लड़का पैदा हुआ।
शिशु द्वारा लाये गये हानि पूर्ति के बाद में लार्ड कैनी ने निर्णय दिया कि रेलवे कम्पनी
उत्तरदायी नहीं है, क्योंकि 1. जो बच्चा अभी पैदा नहीं हुआ वह कानूनी दृष्टि में व्यक्ति
नहीं है तथा 2. उसकी उपस्थिति का प्रतिवादी को ज्ञान नहीं था किन्तु अब फैटल ऐक्सीडेंट
ऐक्ट के अन्तर्गत माँ के गर्भ में रहने वाला बच्चा भी क्षतिपूर्ति का वाद चला सकता
है।
6.
दिवालिया (Insolvent) दिवालिया व्यक्ति सम्पत्ति के प्रति किये गये क्षतिपूर्ण कृत्य
के लिये क्षतिकर्ता पर क्षतिपूर्ति का वाद नहीं चला सकता क्योंकि अंग्रेजी कानून के
अनुसार दिवालिया घोषित किये जाने पर उसको समस्त सम्पत्ति न्यासी तथा भारतीय कानून के
अनुसार राजकीय हस्तांतिकी (Official Assignee) में निहित हो जाती है। उसकी सम्पत्ति
को हुई क्षति के लिये कर्जदारों के हित को ध्यान में रखते हुए न्यासी या राजकीय हस्तांतिकी
ही कार्यवाही कर सकता है। किन्तु यदि दिवालिया व्यक्ति को कोई व्यक्तिगत क्षति जैसे,
आक्रमण, मानहानि आदि पहुँचाई जाती है, तो वह स्वयं कार्यवाही करने का अधिकारी होगा।
यदि उसके शरीर व सम्पत्ति दोनों को संयुक्त रूप से क्षति पहुंचाई गई हो तो दिवालिया
शारीरिक क्षति के लिये और न्यासी (Trustee) सम्पत्ति की क्षति के लिये अलग- अलग या
संयुक्त रूप से वाद चला सकते हैं।
7.
विदेशी राज्य (Foreign State) भारत सरकार से धारा 84 C.P.C. के अन्तर्गत बिना पूर्व
अनुमति लिये कोई भी विदेशी राज्य भारतीय न्यायालय में अपकृत्य के लिये मुकदमा नहीं
चला सकता।
(ब)
किस पर दावा नहीं किया जा सकता ? (Who cannot be sued ?)- अपकृत्य विधि में निम्नलिखित
व्यक्तियों पर वाद नहीं चलाया जा सकता-
1.
सम्राट या सत्ताधारी (King or Sovereign) अंग्रेजी संवैधानिक विधि के अनुसार राजा कोई
गलती नही करता" (King can do no wrong)। इस सूत्र का अर्थ यह है कि सम्राट को
किसी अपकृत्य या अपराधिक कृत्य के लिये दायी नहीं ठहराया जा सकता। "स्वामी अपने
सेवक के कार्यों के लिये उत्तरदायी होता है।" वाला सिद्धान्त सम्राट पर लागू नहीं
होता । इसका कारण यह है कि प्रायः राज्याध्यक्ष मन्त्रिमण्डल (Cabinet) की सलाह पर
कार्य करता है। और जो भी आज्ञायें या आदेश दिये जाते हैं उन पर केवल सरकार के प्रतीक
(Symbol) के रूप मैं उसका नाम होता है।
भारतीय
संविधान के अनुच्छेद 361 के अनुसार भारत का राष्ट्रपति, राज्यपाल या राज्य प्रमुख अपने
पद की शक्तियों के प्रयोग व कर्त्तव्यों के पालन के लिये या अपने द्वारा किये गये किसी
कार्य के लिये किसी न्यायालय में उत्तरदायी न होगा लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है
कि भारतीय सरकार भी अपने दायित्व से मुक्त है। अनुच्छेद 300 के अनुसार भारत संघ
(Union) या किसी राज्य (State) पर उसके नाम से वाद दायर किया जा सकेगा और उसके द्वारा
अन्य व्यक्तियों पर वाद दायर किया जा सकेगा। सरकार अपने कर्मचारी द्वारा किये गये अपकृत्य
के लिये उत्तरदायी ठहराई जा सकती है। स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम विद्यावती A. I. R.
1962 में विद्यावती को उसके पति की सरकारी गाड़ी के ड्राइवर की असावधानी के कारण हुई
दुर्घटना के फलस्वरूप मृत्यु होने पर क्षतिपूर्ति दिलवाई गई।
2.
राजदूत (Ambassador) इंगलैंड तथा भारत में सम्राट की भाँति राजदूतों पर वाद नहीं चलाया
जा सकेगा। भारतीय विधि ने धारा 86 C.P.C. के अनुसार राजदूत एवं कूटनीतिक राजनीतिक एजेन्टों
(Diplomatic Agents) के खिलाफ मुकदमें केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति से ही चलाये
जा सकते हैं।
3.
राजकीय कर्मचारी (Pablic Officials) यदि कोई कर्मचारी किसी सरकारी अधिकार के प्रयोग
में अनुचित कृत्य करता है तो उसके लिये स्थानापन्न दायित्व के आधार पर सरकार पर ही
मुकदमा चलाया जायेगा कर्मचारी पर नहीं यह सिद्धान्त गैर कानूनी कार्यों के लिये लागू
नहीं होता।
4.
शिशु (Infants) - सामान्यतया नाबालिगों पर अपकृत्य के अन्तर्गत मुकदमा नहीं चलाया जा
सकता। लेकिन फिर भी नाबालिग अपने द्वारा किये गये अपकृत्यों के लिये उसी प्रकार दायी
होता है जैसे कि एक बालिग एक शिशु आक्रमण, प्रहार, अपमानकारी वचन, कुकृत्य के लिये
फुसलाना, अनाधिकार प्रवेश, बाधा आदि के लिए उत्तरदायी होता है किन्तु जहाँ किसी अपकृत्य
को आरोपित करने के लिये किसी मानसिक तत्व का होना आवश्यक है वहाँ नाबालिग के लिये उसके
मस्तिष्क की अपरिपक्वता (Immaturity) एक अच्छा बचाव होता है।
•
संविदा-भंग को अपकृत्य में नहीं बदला जा सकता जैनिंग्स ब० रन्डाल, 1799 में एक नाबालिग
ने एक घोड़ी सवारी करने के लिये किराये पर ली और उसे अत्याधिक सवारी (Overriding) करके
मार डाला। निर्णय हुआ कि नाबालिग उत्तरदायी नहीं है क्योंकि क्षति संविदा-भंग से सम्बन्ध
रखती है।
अपकृत्य
को संविदा-भंग में नहीं बदला जा सकता - बर्नाड ब० हैगिस, 1936 में एक नाबालिग ने वादी
से घोड़ी सवारी करने के लिए किराये पर ली। संविदा में यह उल्लेख था कि घोड़ी छलांग
नहीं लगाती। उसने घोड़ी अपने मित्र को छलांग लगाने को दी जो फलस्वरूप मर गई। निर्णय
हुआ कि नाबालिग अपकृत्य के लिये उत्तरदायी है, क्योंकि उसका कार्य संविदा से स्वतन्त्र
(Independent) था।
5.
पागल व्यक्ति (Lunatic) अपकृत्य के मामले में नाबालिग की तरह पागलपन भी अच्छा बचाव
नहीं है। इसका बचाव केवल उन्हीं मामलों में मिलता है जहाँ व्यक्ति अपने पागलपन के कारण
नीयत ज्ञान और द्वेष आदि व्यवस्थाओं से अनभिज्ञ होता है। कानूनी सिद्धान्त के अनुसार
व्यक्ति केवल उन्हीं कार्यों के परिणाम के लिये उत्तरदायी होता है, जिन्हें उसने पूर्ण
चेतना अवस्था में किया हो। जिस व्यक्ति में अपने मन को नियन्त्रित करने की स्वाभाविक
क्षमता नहीं है, उसे अपने कार्यों के प्रति दायी ठहराना उचित नहीं है।
लेकिन
पूर्ण दायित्व के वादों, जैसे- आक्रमण, अनाधिकार, मानहानि आदि में पागलपन कोई बचाव
नहीं होता। इस प्रकार शराबी (Drunken Man) भी शराब के नशे का बचाव नहीं ले सकता किन्तु
यदि उसे शराब किसी अन्य व्यक्ति ने उसकी इच्छा के खिलाफ पिलाई है तो ऐसी अवस्था में
यदि वह कोई अपकृत्य करता है तो वह नशे का बचाव ले सकता है। इसी प्रकार एक व्यक्ति मृगी
के दौरे या तेज बुखार की दशा का बचाव पेश कर सकता है।
6.
श्रमिक संघ (Trade Union) श्रमिक संघ अधिनियम 1926 के अन्तर्गत यह रजिस्टर्ड या अनरजिस्टर्ड
किसी भी प्रकार का हो सकता है। यदि संघ रजिस्टर्ड है तो इसके रजिस्टर्ड नाम पर मुकदमा
चलाया जा सकता है। यदि रजिस्टर्ड नहीं है तो संघ के एक या अधिक सदस्यों पर सभी सदस्यों
के प्रतिनिधि के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें