प्रश्न - निम्नलिखित सूत्रों में से किन्हीं दो की विवेचना कीजिये-
Explain any two of the following
maxims-
1. व्यक्ति की मृत्यु के साथ उसका मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है।
("Actio personalis moritur
cum persona") |
2.
जानबूझकर आपति लेना
(Volenti
non fit injuria) |
उत्तर
- 1. व्यक्ति की मृत्यु के साथ उसका मुकदमा चलाने का अधिकार समाप्त हो जाता है।
("Actio personalis moritur cum persona" ) - "सामान्य विधि" के
अनुसार यदि किसी व्यक्ति या उसकी सम्पत्ति को कोई एक ऐसी हानि पहुंचाई गई है जिसके
लिये वह क्षतिपूर्ति की माँग का अधिकारी है तो ऐसी हानि के लिये दावा करने का अधिकार
उस व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है, जिसने हानि पहुंचाई है या जिसको
हानि पहुँची हो। दूसरे शब्दों में व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही उसका मुकदमा चलाने का
अधिकार भी समाप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ-यदि अने व के साथ मारपीट की है तो ब को अ
के खिलाफ क्षतिपूर्ति की कार्यवाही 'ब' के जीवनकाल में ही लानी चाहिये । यदि क्षतिपूर्ति
की कार्यवाही के दौरान 'अ' या 'ब' अर्थात् वादी या प्रतिवादी की मृत्यु हो जाती है
तो कार्यवाहीं भी समाप्त हो जायेगी। किन्तु यह नियम अत्यन्त ही अन्यायपूर्ण
(Unjust ) था अतः न्यायालय द्वारा इसके निम्नलिखित अपवाद स्वीकार किये गये-
1.
सामान्य कानून के अन्तर्गत (1) संविदा-भंग तथा (ii) सम्पत्ति को अनुचित ढंग से प्रयोग
करने के मामलों में मृतक के उत्तराधिकारियों को वाद दायर करने का अधिकार था।
(ब)
कुछ अधिनियमों जैसे- (1) फेटल एक्सीडेन्ट एक्ट 1846 (ii) अधिनियम तीन, 1930 (iii) दीवानी
प्रक्रिया संहिता 1833 (iv) नियोजक दायित्व अधिनियम, 1938 (v) दी कैरिपेज बाई एयर एक्ट,
1961 तथा (vi) कोलमाइन एक्ट 1957 के अन्तर्गत मृतक की सम्पत्ति का निष्पादक
(Executor) या उत्तराधिकारी विभिन्न आधारों पर वाद दायर करने का अधिकारी था।
वर्तमान
स्थिति यह है कि विधि सुधार अधिनियम 1934 (Law Reform Act, 1934) द्वारा इस नियम को
लगभग समाप्त कर दिया गया है और अब यह कहावत केवल 1. मान हानि, 2. शील भंग 3. दभ्पत्ति
में से किसी एक को अलग रहने के लिये फुसलाने तथा 4. व्याभिचार (Adultury) जैसे व्यक्तिगत
मामलों में ही लागू होती है।
भारतीय
विधि में भी इंगलैंड की भाँति इस नियम के इतने अपवाद हो गये हैं जिनके कारण अब यह उक्त
4 अपकृत्यों को छोड़कर प्रायः समाप्त हो गया है।
2.
"जानबूझकर आपत्ति लेना (सहमति से किये गये कार्य) (Volenti non fit M
Injuria) - "जान-बूझकर आपत्ति लेना" या "सम्मत कार्य से दुष्कृति नहीं
होती" नामक सूत्र का अर्थ है कि जहाँ व्यक्ति स्वेच्छा से हानि उठाता है, वहाँ
कानूनी क्षति नहीं होती। सामण्ड के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने स्वेच्छा से अपने अधिकार
को त्याग दिया है तो वह फिर उस अधिकार का लाभ नहीं उठा सकता। अपकृत्य के बचाव का यह
महत्वपूर्ण सूत्र है। उदाहरणार्थ - यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को अपने घर
पर आने के लिये आमन्त्रित करता है या उसे सावधानी से अपने शरीर पर ऑपरेशन करने की अनुमति
देता है तो वह बाद में उन कार्यों के लिये उस व्यक्ति के खिलाफ अतिचार या मारपीट का
दावा नहीं कर सकता।
सिद्धान्त
के प्रयोग के दो रूप- (i) यह सिद्धान्त ऐसे कार्यों में लागू होता है जो जान बूझकर
सहमति के साथ किये जाते हैं, जैसे मुक्केबाजी, ऑरपेशन या खेलकूद आदि में शारीरिक कष्ट
उठाना।
(ii)
यह सिद्धान्त ऐसे कार्यों में लागू होता है, जहाँ हानि अनुसांगिक रूप (Incidental)
में होती है। उदाहरणार्थ- जहाँ दर्शक स्वेच्छा से इस ज्ञान के साथ खेल-कूद, हाकी, फुटबाल
आदि के मैदान में आते हैं, वहाँ उन्हें चोट भी लग सकती है तो ऐसी हानि को सहन करने
के लिये उनकी उपलक्षित सहमति होती है। सहमति के अभाव में ऐसे कार्य गैरकानूनी माने
जाते हैं।
सिद्धान्त
के लागू होने की शर्तें इस सिद्धान्त के लागू होने के लिये निम्नलिखित तीन शर्तें पूरी होनी चाहियें-
(i)
सहमति स्वेच्छा से दी जानी चाहिये (Consent must be freely given) सहमति किसी दबाव
या प्रभाव अथवा गलत प्रतिनिधित्व द्वारा प्राप्त न की गई हो। किसी भी व्यक्ति द्वारा
दी गई सहमति को स्वेच्छा से दी गई सहमति तब तक नहीं कही जा सकती जब तक कि वह इस 'दशा
में न हो कि वह 'खतरे वाला' और 'खतरा रहित' काम में स्वतन्त्र रूप से चुनाव न कर सके।
(ii)
कार्य तथा कार्य प्रणाली वैध होनी चाहिये (Act and Method of doing the act must
be legal) जिस कार्य को करने के लिये सहमति दी जाती है उसे करने का ढंग वैधानिक - होना
चाहिये अन्यथा सिद्धान्त लागू नहीं होगा। उदाहरणार्थ, यदि दो व्यक्ति तेज धार वाली
नंगी तलवारों से लड़ते हैं तो ऐसे मामले में घायल व्यक्ति की सहमति का कोई मूल्य नहीं
है और चोट पहुचाने वाला पीड़ित पक्ष की क्षतिपूर्ति के लिये दायी होगा क्योंकि नंगी
तलवार से लड़ना अवैधानिक है।
(iii)
यह सिद्धान्त सहमति पर आधारित है, ज्ञान पर नहीं (This principle is based on
consent not on knowledge ) खतरे का ज्ञान होना खतरा उठाने के लिये सहमति से भिन्न
है। यह बात डेन व० हैमिल्टन (1939) से पूर्णतः स्पष्ट होती है। प्रस्तुत बाद में एक
महिला एक ऐसी कार में सवार होती है जिसका चालक शराब पिये हुये है। नशे के कारण चालक
की असावधानी से दुर्घटना हो जाती है और महिला घायल हो जाती है। अतः निर्णय हुआ कि वादिनी
क्षतिपूर्ति की अधिकारिणी है। यद्यपि वह ज्ञानती थी कि शराब के नशे में खतरा हो सकता
है, किन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उसने प्रतिवादी को असावधानी से उत्पन्न
खतरे के लिये भी सहमति दी थी।
सिद्धान्त
के अपवाद (Exception to the Rule ) - "जान-बूझकर आपत्ति लेना" नामक सूत्र
अपकृत्यपूर्ण दायित्व का एक सामान्य अपवाद है। किन्तु यह बचाव निम्नलिखित मामलों में
लागू नहीं होता-
(i)
असावधानी के मामले (Negligence Cases) जान कर आपत्ति मोल लेने का बचाव वहाँ लागू नहीं
होता जहाँ प्रतिवादी ने असावधानीपूर्वक कार्य करके वादी को क्षति पहुँचाई हो। उदाहरणार्थ-डेन
ब० हैमिल्टन, 1939 1. K. B. 509 में यह स्पष्ट किया गया है कि खतरे का ज्ञान होने से
खतरा उठाने की सहमति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता (Knowledge of the risk is
not the same thing as consent to run the risk )। प्रस्तुत बाद में श्रीमती डेन ने
यह जानते हुये कि प्रतिवादी ड्राईवर शराब पिये हुये है और दुर्घटना की सम्भावना है
फिर भी उसकी कार में जाने का निश्चय किया। ड्राइवर की असावधानी के कारण कार दुर्घटनाग्रस्त
हो गई। वादिनी द्वारा क्षतिपूर्ति के दावे में प्रतिवादी द्वारा यह जवाब दिया गया कि
वादिनी ने जान-बूझकर आपत्ति मोल ली थी। निर्णय हुआ कि यद्यपि कार में सवार होने से
पहले वादिनी यह जानती थी कि शराब के नशे में खतरा हो सकता है किन्तु उससे यह निष्कर्ष
नहीं निकलता कि उसने प्रतिवादी को असावधानी से उत्पन्न खतरे के लिये सहमति दी थी। अतः
वादिनी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने की हकदार है।
(ii)
प्राणरक्षा के मामले (Rescue Cases) यह सिद्धानत वहाँ लागू नहीं होता जहा किसी व्यक्ति
के प्राणों की रक्षा का मामला होता है। उदाहरणार्थ- हेन्स ब० हारवुड (1935) में प्रतिवादी
के नौकर ने घोड़ा गाड़ी सार्वजनिक मार्ग पर अकेला छोड़ दिया। किसी बच्चे ने घोड़ों
पर पत्थर फेंके। फलस्वरूप घोड़े चौंक पड़े और बिना चालक के गाड़ी लेकर भागने लगे। वादी
जो एक सिपाही था, ने यह देखकर सोचा कि यदि घोड़ों को नहीं रोका गया तो वह सड़क पर चलने
वाले स्त्री और बच्चों को कुचल देंगे। वादी ने खुद को खतरे में डालकर गाड़ी को रोक
दिया किन्तु वह स्वयं बुरी तरह घायल हो गया। वादी द्वारा चलाये गये क्षतिपूर्ति के
बाद में प्रतिवादी ने कहा कि वादी ने स्वयं को जान-बूझकर खतरे में डाला है। निर्णय
हुआ कि जहाँ किसी के प्राणों की रक्षा का मामला हो वहाँ यह सिद्धान्त लागू न होगा अतः
वादी को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार होगा।
(iii)
संविधिक कार्यों के मामले (Cases of Statutory Dutics) – यह सिद्धान्त वहाँ लागू नहीं
होता जहाँ किसी व्यक्ति की क्षतिपूर्ति करना प्रतिवादी का कानूनी दायित्व होता है।
उदाहरणार्थ- वर्कमैन कम्पनसेशन एकट के अन्तर्गत नियोजक का यह कर्तव्य है कि वह अपनी
सेवा के दौरान नौकर को हुई क्षति की पूर्ति करे भले ही वादी ने ऐसी क्षति को उठाने
के लिये पहले से सहमति दे रखी हो।
(iv)
अवैधानिक कार्यों के मामले (Cases of Unlawful Acts) वादी द्वारा वैधानिक कार्यों को
गैरकानूनी तरीकों से करने के लिये दी गई सहमति कार्यों को वैधानिक नहीं बना देती अतः
ऐसे कार्यों के फलस्वरूप वादी द्वारा उठाई गई हानि के लिये भी प्रतिवादी उत्तरदायी
होगा। उदाहरणार्थ- मुक्केबाजी के खेल में दस्तानों का प्रयोग न करना या द्वन्द्व युद्ध
में तेज धार वाली तलवार का प्रयोग करना आदि से यदि वादी को कोई क्षति पहुँचती है तो
उसके लिये प्रतिवादी उक्त सिद्धान्त का बचाव नहीं ले सकता।
क्या
खतरे के ज्ञान से यह समझा जायेगा कि सहमति है ?
(Does
knowledge of risk imply consent ? )
नहीं
खतरे के ज्ञान मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वादी ने खतरा उठाने की
सहमति भी प्रदान कर दी है। उक्त डेन ब० हेमिल्टन (1939) में यह बात पूर्णतः स्पष्ट
हो चुकी है।
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