प्रश्न - उन परिस्थितियों का वर्णन कीजिये जिनमें दुष्कृति के लिये दायित्व समाप्त हो जाता है।
State the circumstances in which
the liability for tort is discharged.
उत्तर
- अपकृत्य विधि में क्षतिपूर्ति की कार्यवाही करने का अधिकार कुछ अवस्थाओं में उत्पन्न
होने के बाद समाप्त हो जाता है। अपकृत्य का दायित्व निम्नलिखित 7 परिस्थितियों में
स्वतः समाप्त हो जाता है-
1.
पक्षों की मृत्यु द्वारा (By the death of the partics) सामान्य विधि के नियमानुसार
- यदि किसी व्यक्ति या उसकी सम्पत्ति को क्षति पहुंची है और तत्पश्चात् क्षतिकर्त्ता
या क्षतिप्रस्त व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो अपकृत्य का दायित्व समाप्त हो जाता
है। व्यक्ति की मृत्यु के साथ मुकदमा चलाने का निजी अधिकार खत्म हो जाता था (Actio
personalis moritur cum persona) । यदि वादी या प्रतिवादी की मुकदमें के दौरान मृत्यु
हो जाती थी तो मृतक के उत्तराधिकारियों को मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं था। इसी प्रकार
यदि प्रतिवकी मृत्यु हो जाती थी तो वादी को मृतक के उत्तराधिकारियों के खिलाफ मुकदमा
चलाने का अधिकार नहीं होता था।
2.
अधिकार त्याग द्वारा (By Waiver) जब वादी के विरुद्ध प्रतिवादी द्वारा कोई ऐसा कार्य
किया जाता है जो अपकृत्य और संविदा-भंग दोनों होता है और वादी अपना दावा केवल संविदा
भंग के आधार पर चलाता है तो वह बाद में अपकृत्य के लिए क्षतिपूर्ति का वाद नहीं चला
सकता। ऐसे मामलों में यह अनुमान लागाया जायेगा कि उसने अपनी कार्यवाहियों के अन्य अधिकारों
का त्याग कर दिया है। किन्तु यदि वादी चाहे तो वह सभी कार्यवाहियों को वैकल्पिक ढंग
से एक ही वाद में कर सकता है। वह यह कह सकता है कि यदि वह संविदा-भंग में क्षतिपूर्ति
नहीं पाता तो उसे अपकृत्य के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति दिलाई जाये।
अधिकार
त्याग या तो स्पष्ट हो सकता है या उपलक्षित। जब वह व्यक्ति जो क्षतिपूर्ति प्राप्त
करने का अधिकारी होता है, स्पष्ट रूप से अपने क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के अधिकार को
छोड़ देता है, तब यह स्पष्ट होता है। ऐसी अवस्था में यह मोचन (Release) के समान होता
है। जब क्षतिग्रस्त व्यक्ति द्वारा कोई ऐसा कार्य किया जाता है जो उस उपचार प्राप्ति
के विपरीत हो जिसे पाने का वह अधिकारी है तब अधिकार त्याग उपलक्षित (Implied) होता
है किन्तु मान हानि या आक्रमण आदि कुछ मामलों में अधिकार-त्याग लागू नहीं होता।
3.
समझौता और सन्तोष (By Accord and Satisfaction ) यदि दायित्व के बारे मे वादी और प्रतिवादी
कोई ऐसा समझौता करते हैं जिसके अनुसार प्रतिवादी व्यक्तिगत रूप से वादी को क्षतिपूर्ति
देकर सन्तुष्ट कर देता है तो वादी का पुनः क्षतिपूर्ति के लिए बाद चलाने का अधिकार
समाप्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में किसी अपकृत्य के दायित्व को निभाने के लिये समझौता
होने के बाद भविष्य में उसी अपकृत्यपूर्ण कार्य के लिये वाद दायर नहीं किया जा सकता।
4.
मोचन (Release) अपकृत्य के मामले में क्षतिग्रस्त व्यक्ति को यह स्वतन्त्रता है कि
वह क्षतिकर्ता को मुआवजा के दायित्व से मुक्त कर दे। सामान्य विधि के अनुसार
"समझौता एवं सन्तोष" और 'मोचन' में मुख्य अन्तर यह है कि मोचन प्रायः एक
विलेख के रूप में होता है और मुद्रांकित होता है और इसमें प्रतिफल की आवश्यकता नहीं
होती। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 6.3 के अनुसार मुक्ति के लिए प्रतिफल का होना
जरूरी नहीं है। यह तो पीड़ित पक्ष की इच्छा पर होता है कि वह चाहे तो मुआवजे को छोड़े
या न छोड़े। परन्तु यदि मोचन भूल कपट या अधिकार के ज्ञान के अभाव में प्राप्त किया
गया है तो ऐसा मोचन बाध्यकारी नहीं होता।
5.
मौन सहमति (Acquiescence) जब कोई क्षतिपस्त व्यक्ति जानबूझकर क्षतिकर्त्ता के खिलाफ
बहुत समय तक वाद दायर नहीं करता तो यह अनुमान लगाया जाता है कि उसने वाद दायर करने
का विचार छोड़ दिया है। किन्तु कार्यवाही करने में देरी हो जाना मात्र महत्वपूर्ण नहीं
है बल्कि कार्यवाही करने के अधिकार को समाप्त करने के लिए सीधी स्वीकृति होनी जरूरी
है। अमुक मामले में वादी ने मौन स्वीकृति द्वारा क्षतिकर्त्ता के खिलाफ वाद चलाने का
अधिकार छोड़ दिया है या नहीं, इसका निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों
पर विचार करके ही किया जाता है। कभी-कभी देरी किसी खास कारण से भी हो सकती है। ऐसी
अवस्था में वाद दायर करने का अधिकार मौन सहमति द्वारा समाप्त नहीं होता।
6.
पूर्व निर्णय ( By Judgement Recovered) दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 11 - के अनुसार,
आड-न्याय के सिद्धान्त के आधार पर जब किसी व्यक्ति के खिलाफ एक बार एक वाद दायर किया
गया है और निर्णय हो गया है तो दोबारा उसी वाद कारण के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा
सकता। दूसरे शब्दों में नियम यह है कि एक ही वादै कारण पर प्रतिवादी या उसके उत्तराधिकारियों
पर दूसरा मुकदमा नहीं चलाया जायेगा। परन्तु यदि एक ही कार्य से दो पृथक-पृथक वाद कारणों
का जन्म होता है तो एक बाद कारण पर निर्णीत वाद दूसरे बाद - कारण पर आधारित वाद दायर
करने में रुकावट उत्पन्न नहीं करता।
7.
अवधि सीमा के परिनियम द्वारा (By Statute of Limitation) अन्य दीवानी दायित्वों के
समान अपकृत्यपूर्ण दायित्वों में भी कार्यवाहियों के दायर करने का समय निर्धारित होता
है। कानून द्वारा निर्धारित अवधि के अन्तर्गत ही अपकृत्य के लिये कार्यवाही करनी चाहिये
अन्यथा वाद दायर करने का अधिकार समाप्त हो जाता है। भारतीय अवधि सीमा अधिनियम 1963
द्वारा भारत में भिन्न प्रकार के अपकृत्यों के लिये वाद दायर करने की अवधि निश्चित की गई है। उदाहरणार्थ- किसी अतिचारी को अपनी भूमि से निकालने के
लिये वादी को 12 वर्ष की अवधि पूर्ण होने से पहले कार्यवाही करनी चाहिये। किन्तु यदि
वादी भू-स्वामी ऐसा 12 वर्ष की निर्धारित अवधि में नहीं करता तो उसका बाद अवधि बाधित
होने के कारण न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया जायेगा और उसे प्रतिवादी के खिलाफ कोई
अनुतोष (Relief) प्राप्त नहीं होगा।
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