प्रश्न - अपकृत्यपूर्ण दायित्व के आधार के सम्बन्ध में परस्पर दो विरोधी सिद्धान्त कौन से है ? प्रत्येक का समालोचनात्मक वर्णन कीजिये तथा बताइये कि दोनों में से कौन सा अधिक सही है।
What are the two rival theories regarding the foundation of tortious liability? Critically examine each of them. State which of the two is more correct?
उत्तर-
अपकृत्यपूर्ण दायित्व का आधार (Foundation of Tortious Liability) - अपकृत्यपूर्ण दायित्वों के आधार के बारे में विधि-वेत्ताओं
में काफी मतभेद है। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित परस्पर दो विरोधी सिद्धान्त है-
1.
प्रथम सिद्धान्त के अनुसार अपकृत्य की एक निश्चित संख्या है जिसके बाहर अपकृत्यपूर्ण
दायित्व उत्पन्न ही नहीं होता है। दूसरे शब्दों में क्या यह अपकृत्यों की विधि है?
(is it law of Torts?)
2.
दूसरे सिद्धान्त के अनुसार किसी व्यक्ति को पहुंचाए गये सभी क्षतिकारक कृत्य अपकृत्य
होते हैं जब तक कि इसके लिए विधि द्वारा मान्य कोई औचित्य न हो। दूसरे शब्दों में,
क्या यह अपकृत्य का कानून है ? (Is it law
of Tort ? )
1.
प्रथम सिद्धान्त-प्रथम सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक सर जान सामंड तथा डा० जेन्कस हैं।
सामंड के अनुसार, इंग्लैंड मे कोई अपकृत्य विधि नहीं थी वहाँ "केवल एक अपकृत्यों
की विधि थी, " अर्थात् कुछ निर्धारित कार्यों और लोपों (Omissions) के विरुद्ध
ही निश्चित परिस्थितयों में वादी प्रतिवादी के विरुद्ध मुकदमा चला सकता था। अपकृत्य
के कुछ निश्चित एवं मान्य शीर्षकों में से किसी एक के अन्तर्गत ही वादी प्रतिवादी के
विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कर सकता था यदि वादी अपना मुकदमा किसी निश्चित विधि शीर्षक
के अन्तर्गत नहीं चला सकता था, तो इससे यह समझा जाता था कि वादी के पास प्रतिवादी के
विरुद्ध कोई कानूनी शिकायत नहीं है। सामण्ड के मतानुसार "जिस प्रकार दण्ड विधि
ऐसे नियमों का एक समूह है जो निर्धारित अपराधों की स्थापना करती है उसी प्रकार अपकृत्य
विधि भी निर्धारित क्षतिपूर्ण कार्यों को स्थापित करने वाले नियमों का एक समूह है।
न तो पहले में, और न ही दूसरे में दायित्व का कोई सामान्य सिद्धान्त है।" इनमें
से किसी में भी दायित्व का कोई सामान्य सिद्धान्त नहीं है। यदि मैने कोई अपराध किया
है या अपकृत्यपूर्ण कार्य किया है तो यह सिद्ध करने का भार कि मुझे किस अपराध या अपकृत्य
के लिये दंडित किया जाना चाहिये मेरे विपक्षी के ऊपर है कि वह अपने मामले को विधि-मान्य
एवं निश्चित शीर्षकों के अन्तर्गत स्थापित करे। यदि वह ऐसा करने में असमर्थ है तो यह
समझा जाएगा कि मेरे विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने का उसके पास कोई कानूनी आधार नहीं
है। प्रोफेसर विनफील्ड सामण्ड के इस सिद्धान्त को "पीजियन होल का सिद्धान्त"
कहते हैं।
"The Law of Torts consists
of a neat set of pigeon holes each. containing a labelled tort. If the
defendant's wrong will not fit in any of there pigeon holes he has Committed no
tort". Prof. Win Field
इस
मतभेद के कारण ही सामण्ड ने अपनी पुस्तक का नाम 'ला आफ टार्ट्स' (Law of Torts) रक्खा
है और विनफील्ड ने अपनी पुस्तक का नाम 'ला आफ टार्ट' (Law of Tort) रक्खा है।
सामण्ड
अपने सिद्धान्त के समर्थन में "बिना क्षति के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन
" (Damnum Sine Injuria) के मामले उदाहरण स्वरूप पेश करते हैं। उनके अनुसार सभी
प्रकार के अनुचित कार्य अपकृत्य नहीं हैं जब तक कि ऐसे कार्यों से वादी के कानूनी अधिकारों
का उल्लंघन नहीं होता।
2.
दूसरा सिद्धान्त—दूसरे सिद्धान्त के समर्थक प्रो० विनफील्ड हैं। विनफील्ड के अनुसार
प्रत्येक अनुचित कार्य जिससे किसी व्यक्ति को क्षति पहुँचती हो अपकृत्य है जब तक कि
उसके लिए कोई कानूनी औचित्य न हो। इस सिद्धान्त के अनुसार यदि मैं अपने पडोसी को क्षति
पहुँचाता हूँ तो वह मेरे विरुद्ध अपकृत्य का मुकदमा चला सकता है, भले ही मेरे अनुचित
कार्य का कोई विशेष नाम जैसे आक्रमण (Assault), मार-पीट (Battery), धोखा (Deceit) अपमान-वचन
(Slander) आदि हो या न हो, और मुझे उसके लिये उत्तरदायी होना चाहिए बशर्ते कि मैं अपने
कार्य के पक्ष में कोई कानूनी औचित्य पेश नहीं कर पाता हूँ लाई मेन्सफील्ड, लार्ड कॉमडेन
(Comden) तथा सर फ्रेड्रिक पोलक ने भी विनफील्ड के सिद्धान्त का समर्थन किया है। लाई
कापडेन ने कहा है कि ' अपकृत्य असंख्य हैं, न सीमित हैं न निश्चित है, "Torts
are various, not limited or codificd".
प्रो०
विनफील्ड अपने सिद्धान्त के समर्थन में निम्नलिखित तर्क पेश करते हैं:-
1.
अपकृत्य का विकसित रूप इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अपकृत्य 'रिट आफ 'ट्रेसपास'
की संख्या में वृद्धि हुई है। प्रारम्भ में वादी 'स्टि आफ ट्रेसपास' (Writ of
Trespass) के आधार पर ही मुकदमें चला सकता था। इसके पश्चात् 'रिट अपान दि केस'
(Writ upon the case) का विकास हुआ। विकास का यह क्रम अभी भी जारी है। उदाहरणार्थ,
द्वेष पूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) आज उसी रूप में नहीं है जैसा कि प्रारम्भ
में था। धोखा (Deceit) प्रारम्भ में एक संकुचित अर्थ में था और आज के अर्थ में इसे
अपकृत्य नहीं कह सकते थे। किन्तु संविदा विधि से अलग होने के बाद यह एक स्वतंत्र अपकृत्य
बन गया है। 19 वीं शताब्दी में अनेक नये अपकृत्यों का जन्म हुआ है असावधानी
(Negligence) 1 1820-1830 में एक स्वतन्त्र अपकृत्य के रूप में हमारे सामने आया। पूर्ण
दायित्व के सिद्धान्त (The Rule of Strict Liability) की स्थापना सन् 1868 में रेलेण्डस्
बनाम फ्लैचर में हुई। 1964 में 'धमकी' को एक स्वतन्त्र अपकृत्य के रूप में स्वीकार
किया गया। सन् 1963 में हाउस आफ लाईस ने असावधानीपूर्ण कथन से हुई आर्थिक
(Monetary) क्षति को एक अपकृत्य के रूप में मान्यता दी है। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट
हो जाता है कि अपकृत्य विधि का निरन्तर विकास तथा विस्तार हो रहा है और यह विचार
"कि इसे किसी संकुचित दायरे में सीमित किया जा सकता है अमान्य है। "
(At any rate it is clear from
these and other instances that the law of torts is steadily expanding and that
the idea of its being cribbed, cabined and confined, in a set of pigeon holes
is untenable.)--Prof. Winfield.
2.
न्यायालयों के नियमों से भी इस सिद्धान्त की पुष्टि होती है। न्यायालयों ने नये अपकृत्यों
को सृजित कर इसके क्षेत्र को पहले से अधिक विस्तृत कर दिया है। न्यायाधिपित श्री होस्ट
ने ऐशवी बनाम व्हाइट 1703 में कहा है, "यदि लोग अपकृत्यों की संख्या बढ़ायेंगे
तो नुकसानी की कार्यवाही की संख्या भी बढ़ेगी क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति जिसे क्षति
होती है उसे उसके लिए प्रतिकर अवश्य मिलना चाहिए" - "If men will
multiply injuries actions must be mulitiplied
too, for every man who is injured ought to have recompense."
समालोचना
(Criticism) दोनों सिद्धान्तों में आशिक सत्यता है। दोनों सिद्धान्तों के भी अनेक हैं।
डॉ० ग्लेनविल विलियम्स ने दोनों सिद्धान्तों के मतभेद को संक्षेप में निम्नलिखित शब्दों
में व्यक्त किया है-पहला सिद्धान्त कहता है कि दायिल के नियम विस्तृत हैं और दूसरा
सिद्धान्त कहता है कि दायित्व की अनुपरिस्थिति के नियम भी विस्तृत हैं; लेकिन किसी
सिद्धान्त में कोई सामान्य नियम नहीं दिखाई देता है। किसी भी नये मामले के न्यायालय
में आने पर इन दो परस्पर विरोधी नियमों के आधार पर न्यायालयों को किसी सामान्य सिद्धान्त
आधार पर निर्णय देना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में क्यों न हम इस विवाद को यह कहकर
हल कर लें कि जहाँ दायित्व के निर्माण के भी कुछ सामान्य नियम हैं वहाँ दायित्वों की
अनुपस्थिति के भी कुछ सामान्य नियम हैं। इस विवदास्पद क्षेत्र के बीच जो न्यायालय के
कार्यक्षेत्र में आता है, यदि किसी नये मामले में निर्णय वादी के पक्ष में हो तो ऐसा
इसलिए नहीं कि दायित्वों का कोई सामान्य सिद्धान्त है बल्कि ऐसा इसलिये है कि न्यायालय
मामले में वर्तमान दायित्वों के नियमों को लागू करना उचित नहीं समझता है।
सामण्ड
की पुस्तक के पन्द्रहवें संस्करण के सम्पादक श्री हेस्टन महोदय (Heuston) का यह कहना
है कि सामण्ड के सिद्धान्त के आलोचकगणों ने सामण्ड को गलत समझा है। उनके कथनानुसार
सामण्ड का कभी यह मत नहीं रहा कि अपकृत्य विधि विकासशील विधि नहीं है। उनका यह मत कि
इस विधि में हुए परिवर्तन किसी सामान्य सिद्धान्त पर आधारित नहीं हैं वस्तुतः यह सत्य
भी है क्योंकि जिन मतों के आधार पर अपकृत्यपूर्ण दायित्व निर्धारित किये गये हैं वे
अनेक और भिन्न हैं। डॉ० ग्लैनविल विलियम भी उक्त मत से सहमत हैं। उनके अनुसार यह कहना
कि विधि को पीजियन होल (Pigeon Holes) में एकत्र किया जा सकता है, का तात्पर्य यह नहीं
है कि पीजियन होल में अपकृत्यों की कमी है या उनमें और अपकृत्य जोड़े नहीं जा सकते हैं।
निष्कर्ष
(Conclusion) उपर्युक्त समालोचना से यह स्पष्ट है कि प्रो० विनफील्ड का सिद्धान्त अधिक
उचित एवं व्यावहारिक है। यदि हम यह मानते हैं कि अपकृत्य विधि का विकास हुआ है तो हम
इस सिद्धान्त की सत्यता को मानने से इन्कार नहीं कर सकते हैं कि अपकृत्य का विकास हो
रहा है। यह भी सच है कि जैसे-जैसे विधि में विकास होता जा रहा है, हम अपकृत्य के दायित्व
के सामान्य सिद्धान्त की ओर बढ़ते जा रहे हैं। 1
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