गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

स्थानापन्न (प्रतिनिहित) दायित्व से आप क्या समझते हैं ? क्या ऐसा दायित्व न्यायसंगत है ? किस सीमा तक एक स्वामी अपने नौकर के कृत्य के लिये उत्तरदायी होता है ?

 प्रश्न - स्थानापन्न (प्रतिनिहित) दायित्व से आप क्या समझते हैं ? क्या ऐसा दायित्व न्यायसंगत है ? किस सीमा तक एक स्वामी अपने नौकर के कृत्य के लिये उत्तरदायी होता है ?

What do you understand by the doctrine of Vicarious liability? Is such liability justified? How far a master is liable for the torts committed by his servant ?

 Or किन परिस्थितियों में तथा किसी आधार पर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों द्वारा किये गये कृत्यों के लिये वाद योजित कर सकता है तथा उस पर वाद योजित किया जा सकता है ?

 In what classes of cases and on what grounds may one person sue and be sued for a tort committed to and by another?


उत्तर-स्थानापन्न दायित्व (Vicarious Liability)- सामण्ड के अनुसार, "साधारण नियम यह है कि एक व्यक्ति अपने द्वारा किये गये कार्यों के लिये स्वयं ही उत्तरदायी होता है, लेकिन कुछ अपवाद ऐसे हैं जिनमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के कार्यों के लिये उत्तरदायी ठहराया जाता है, चाहे वह स्वयं कितना ही निर्दोष क्यों न हो। इस सिद्धान्त को हम स्थानापन्न या परदोष दायित्व का सिद्धान्त कहते हैं। स्थानापन्न दायित्व का जन्म (i) अनुसमर्धन (ii) अभिप्रेरण तथा (iii) विशेष सम्बन्ध के कारण होता है। विशेष सम्बनध के कारण उत्पन्न दायित्व का मुख्य उदाहरण हमें स्वामी और सेवक, प्रमुख व अभिकर्ता, स्वामी तथा स्वतन्त्र ठेकेदार कम्पनी व उसके निर्देशक, फर्म व उसके साझीदार, संरक्षक व प्रतिपाल्य (Ward) तथा पति और पत्नी के सम्बन्ध में मिलता है। "

 

क्या ऐसा दायित्व न्यायसंगत है ? (Is such liability justified ?) प्रतिनिहित दायित्व के सिद्धान्त की न्यायोचितता के विषय में दो दृष्टिकोण हैं-

 

1. प्राचीन दृष्टिकोण (Old View ) परदोष दायित्व का प्राचीन दृष्टिकोण निम्नलिखित दो सूत्रों (Maxims) पर आधारित है-

 

(अ) क्यू फेसिट पर ऐलियम परसी (Qui facit per alium perse) इस सूत्र का तात्पर्य यह है कि, "जो दूसरे व्यक्ति के माध्यम से कार्य करता है वह कानून की दृष्टि में खुद ही कर्ता समझा जाता है।" एक स्वामी अपने नौकर द्वारा किये गये अपकृत्यों के लिये इसी सिद्धान्त के आधार पर उत्तरदायी ठहराया जाता है। इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति अपना कार्य अन्य व्यक्ति से कराता है, वह दूसरे व्यक्ति को यह स्वतन्त्रता देता है कि वह परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेकर कार्य करे। फलस्वरूप ऐसे व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य के लिये कार्य कराने वाला ही उत्तरदायी होता है।

 

(ब) रेस्पोन्डिट सुपीरियर (Respondeat Superior) – इस सूत्र का तात्पर्य यह है कि मुख्य या प्रधान व्यक्ति को ही उत्तरदायी ठहराया जाये (Let the superior be liable)। इस नियम के अनुसार कानून के अन्तर्गत स्वामी को अपने सेवक द्वारा सेवा काल में किये गये अपकृत्यों के लिये इसलिये दायी ठहराया जाता है क्योंकि आर्थिक दृष्टि से स्वामी ही दायित्व को वहन करने में समर्थ होता है। उदाहरण के लिये यदि एक ड्राइवर असावधानीपूर्वक बस चलाते समय दुर्घटना कर देता है जिसके फलस्वरूप सड़क पर जाते हुए एक पैदल व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। मृतक के उत्तराधिकारी यदि केवल ड्राइवर के खिलाफ क्षतिपूर्ति का वाद दायर करके डिक्री प्राप्त कर ले तो भी डिक्री की रकम उस ड्राइवर से वसूल नहीं की जा सकेगी क्योंकि उसे इतना वेतन नहीं मिलता कि वह अपने खिलाफ पारित डिक्री का भुगतान कर सके अतः उसके मालिक को क्षतिपूर्ति के लिये दायी बनाया जाता है क्योंकि वह धनी व्यक्ति होता है।

 

2. आधुनिक दृष्टिकोण (Modern View ) लार्ड पियर्स के शब्दों में स्थानापन्न दायित्व का सिद्धान्त किसी बहुत स्पष्ट तर्कयुक्त या कानूनी सिद्धान्त से नहीं निकला बल्कि सामाजिक सुविधा (Social Convenience) तथा न्याय पर आधारित है। मालिक नौकर को सामान्यतः अपने लाभ के लिये रखता है और इस स्थिति में रहता है कि वह क्षतिपूर्ति कर सके। अतः नौकर द्वारा अपने सेवा काल में की गई सभी क्षतियों के लिये उसके मालिक को उत्तरदायी ठहराना उचित होगा।

 

नौकर के कृत्य के लिये स्वामी का तीसरे व्यक्ति के प्रति दायित्व (Liability of master for the torts of servant towards third person) सेवक द्वारा किये गये अपकृत्य के लिये स्वामी उत्तरदायी होता है बशर्ते कि सेवक अपकृत्य अपने स्वामी की सेवा काल के दौरान करता है। सामण्ड के अनुसार सेवक द्वारा किया गया अनुचित कार्य स्वामी की सेवा काल के दौरान (During the course of his master's service) किया हुआ माना जायेगा यदि-

 

1. अनुचित कार्य करने के लिये स्वामी ने सेवक को प्राधिकृत किया है, या 2. सेवक ने उचित और प्राधिकृत कार्य को अनुचित तरीके से किया है। सर फ्रेडरिक पोलक के अनुसार निम्नलिखित परिस्थितियों में हमेशा ही एक स्वामी अपने सेवक के अपकृत्यों के लिये उत्तरदायी होता है-

 

1. सेवक की असावधानी (Negligence of Servant ) स्वामी का यह कर्त्तव्य है कि उसका सेवक सावधानीपूर्वक कार्य करे और यदि वह उसे असावधानीपूर्वक करता है तो स्वामी उसके लिये उत्तरदायी होगा। उदारहणार्थ- सेन्चुरी इन्स्योरेन्स कं० लि० ब० नार्दन आयरलैंड ट्रॉसपोर्ट बोर्ड, 1952 में सेवक अपने स्वामी की पैट्रोल होने वाली गाडी का ड्राइवर था। जब वादी की भूमिगत पैट्रोल टंकी में मोटर से पैट्रोल डाला जा रहा था तो उसी समय ड्राइवर ने सिगरेट पीने के लिये दियासलाई जलाई फलस्वरूप वहाँ आग लग गई और वादी की सम्पत्ति जल गई। निर्णय हुआ की स्वामी उत्तरदायी है, क्योंकि सेवक का असावधानीपूर्ण कार्य स्वामी की सेवा काल के दौरान किया गया था।

 

2. सेवक की भूल (Mistake of Servant ) - स्वामी के कार्य को करते हुये यदि सेवक साधारण अवस्था में कोई भूल करता है तो उसके लिये स्वामी उत्तरदायी होता है उदाहरणार्थ- पोलेण्ड ब० पार एण्ड सन्स, 1924 में प्रतिवादी के कुली को भूल से यह सन्देह हो गया था कि कुछ लड़के उसके स्वामी के डिब्बे से चीनी चुरा रहे हैं उसने सम्पत्ति की रक्षा हेतु उनमें से एक लड़के को मुक्का मार दिया जिससे वह रेल के डिब्बे से कुचला गया। निर्णय हुआ कि स्वामी दायी है।

 

3. सेवक की एच्छिक गलती (Wilful Wrong of Servant ) यदि सेवक ने गलती इच्छापूर्वक की है किन्तु वह गलती स्वामी की ओर से कार्य करने में तथा स्वामी की सेवा करने के भाव से हुई हो तो उसके लिये स्वामी ही दायी होगा भले ही उसने नौकर को अमुक कार्य करने के लिये मना कर दिया हो। उदाहरणार्थ-लिम्पस व लन्दन जनरल ओमनीबस कं०, 1852 में प्रतिवादी बस कंo ने अपने ड्राइवर को यह स्पष्ट आदेश दिया था कि वह किसी दूसरी बस के साथ होड़ न करे और अन्य बसों को गुजरने के लिये पास दे दिया करे। किन्तु ड्राइवर ने जान बूझकर सड़क के पार अपनी बस चलाई। फलस्वरूप वादी की बस का सन्तुलन बिगड़ गया और क्षति पहुंची। निर्णय हुआ कि प्रतिवादी कम्पनी अपने नौकर के अपकृत्य के लिये उत्तरदायी है और विशेष रूप से जबकि यह स्वाभी की सेवा करने के भाव से दूसरी बस से पहले पहुँचने के इरादे से जा रहा था।

 

4. सेवक के कपटपूर्ण कार्य ( Fraudulent Act of Servant) - यदि सेवक अमुक कार्य को ईमानदारी पूर्वक करने के लिये नियुक्त है, किन्तु वह उसे 'कपटपूर्वक' करता है, भले ही यह कपट उसने अपने लाभ के लिये किया हो तो स्वामी उसके लिये दायी होगा उदाहरणार्थ-ल्याड व० ग्रेस स्मिथ एण्ड कं०, 1911 में वादिनी ल्याड जिसके पास एक मकान और हजार पौड़ की धनराशि थी, वकीलों की एक फर्म के पास विनियोजन (Investment) के बारे में सलाह लेने गई। फर्म के प्रबन्धक क्लर्क ने उसे सलाह दी कि वह मकान को बेच दे और बन्धक में लगी हुई रकम को वापस ले ले । वादिनी ने प्रबन्धक को इसके लिये अधिकार-पत्र दे दिये। किन्तु प्रबन्धक ने मकान को चोरी से अपने नाम से बेच दिया और धनराशि लेकर भाग गया। निर्णय हुआ कि मालिक सेवक के कपटपूर्ण कार्यों के लिये उत्तरदायी है।

 

5. सेवक के अपराधिक कार्य (Criminal Acts of Servant ) कुछ कार्य अपराध एवं अपकृत्य दोनों ही की श्रेणी में आते हैं। ऐसे मामलों में उनका केवल अपकृत्य अंश दीवानी न्यायालयों में अनुयोज्य होता है। उस अवस्था में सेवक के अपराध के लिये स्वामी ही दायी होता है। उदाहरणार्थ - ऑक्सब्रिज सोसायटी व पिवर्क्स, 1939 में एक वकील के मैनेजर ने जालसाजी (Forgery) की तथा वादी के झूठे बन्धक-पत्र (Mortgage deed) पर 500 पौंड की रकम उधार ले ली। निर्णय हुआ कि सेवक के इस कार्य के लिये स्वामी उत्तरदायी है।

 

6. जहाँ गलती प्राधिकृत कार्य का स्वाभाविक परिणाम हो (Where wrong is the natural consequence of the authorised act ) जहाँ स्वामी का आदेश पालन करते समय साधारण स्थिति में सेवक से गलती हो जाती है, तो उसके लिये स्वामी ही उत्तरदायी होगा। उदाहरणार्थ- ग्रेगरी व० पाइपर 1829 1. K. B. 217 में वादी और प्रतिवादी में रास्ते के अधिकार के बारे में झगड़ा हो गया था। प्रतिवादी ने अपने नौकर को रास्ते में कूड़ा इस प्रकार डालने को कहा कि रास्ता तो बन्द हो जाये किन्तु प्रतिवादी की दीवार न छुये। कुछ समय बाद कूड़ा इतना जमा हो गया कि वादी की दीवार तक पहुँच गया। निर्णय हुआ कि प्रतिवादी स्वामी अपने नौकर द्वारा किये गये अतिचार के लिये दायी है।

 

सर फ्रेडरिक पोलक द्वारा दिये गये उक्त वर्गीकरण को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ईश्वर चन्द्र सन्तरा o सतीश चन्द्र गिरी, 1902 में मान्यता प्रदान कर दी है। अतः हम कह सकते हैं कि उक्त परिस्थितियों में हमेशा ही एक मालिक अपने नौकर द्वारा किये गये अपकृत्यपूर्ण कार्यों के लिये उत्तरदायी होगा।

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