प्रश्न - योगदायी उपेक्षा और उसके 'अन्तिम अवसर के नियम' से क्या तात्पर्य है ? डेविस ब० मान केस का हवाला दीजिये। What is meant by Contributory Negligence and its Last Opportunity Rule? Refer to Davis Vs Mann Case.
Or
अंशदायी
असावधानी के सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिये। उअंशदायी उपेक्षा दुष्कृति के उत्तरदायित्व को कहाँ तक समाप्त करती है ?
Explain the doctrine of
Contributory Negligence. How far is contributory negligence a factor in
extinguishing tortious liability?
उत्तर-अंशदायी
असावधानी का सिद्धान्त (Doctrine of Contributory Negligence)- अंशदायी असावधानी का
अर्थ ऐसी असावधानी से है जिसमें वादी ने भी कुछ योगदान किया हो अर्थात् यदि वादी द्वारा
सामान्य सुरक्षा बुद्धिमत्ता, एवं दक्षता का प्रयोग किया जाता तो प्रतिवादी के असावधानीपूर्ण
कार्य से हुई हानि से बचत हो जाती। इंगलैंड की सामान्य विधि के अनुसार यदि वादी का
थोड़ा सा भी दोष होता था तो वह प्रतिवादी की असावधानी से स्वयं को होने वाली हानि प्राप्त
नहीं कर सकता था अर्थात् असावधानी के मामले में प्रतिवादी का कार्य इस आधार पर क्षमायोग्य
था कि वादी भी अंशदायी (योगदायी) उपेक्षा का दोषी है।
1.
अण्डरहिल के अनुसार, "वादी को आंशिक असावधानी का दोषी तब माना जाता है। जबकि उसने
अपनी लापरवाही द्वारा स्वयं को इस प्रकार क्षति पहुंचाई है कि यदि वह सावधानी से कार्य
करता तो उसको प्रतिवादी द्वारा की गई असावधानी के फलस्वरूप क्षति न पहुंचती।"
2.
रतनलाल के अनुसार, "आंशिक असावधानी से उस असावधानी का बोध होता है जिससे वादी
किसी अन्य व्यक्ति द्वारा की गई असावधानी के द्वारा होने वाले परिणाम को घटित होने
से न रोके यद्यपि ऐसा करने का उसे पूर्ण अवसर था।"
अंशदायी
असावधानी के सिद्धान्त का आधार यह सिद्धान्त वास्तव में लेटिन सूत्र - In jure non
remola causa sed proxima spectator" पर आधारित है जिसका अर्थ है, कि कानून निकट
के कारणों पर ध्यान देता है दूर के कारणों पर नहीं।" दूसरे शब्दों में वादी तभी
क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता है जबकि उसको हुई हानि प्रतिवादी के कार्यों का सीधा परिणाम
हो अन्यथा क्षति दूरस्थ (Remote) मानी जायेगी। लार्ड हैल्सवरी के अनुसार, अंशदायी असावधानी
का सिद्धान्त “In pari detiato patior ast codi fendantis" के सूत्र पर आधारित
है जिसका तात्पर्य है, "जहाँ दो व्यक्ति समान रूप से दोषी हों वहाँ कोई एक दूसरे
पक्ष को दोषी नहीं ठहरा सकता।"
वास्तव
में आंशिक असावधानी का सिद्धान्त इस बात पर आधारित है कि क्या वादी प्रतिवादी की असावधानी
से उत्पन्न परिणाम को टाल सकता था ? कानून प्रत्येक व्यक्ति से यह आशा करता है कि वह
अपनी सुरक्षा के लिये सर्वप्रथम ऐसी युक्तिसंगत सावधानी बरते जैसी कि वह अन्य व्यक्ति
से आशा करता है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह क्षतिपूर्ति प्राप्त नहीं कर सकता।
अंशदायी
असावधानी का सिद्धान्त (Doctrine of Contributory Negligence ) जस्टिस विलेस के अनुसार,
"अंशदायी सिद्धान्त के आधार पर क्षतिपूर्ति के दायित्व का निर्धारण निम्नलिखित
तीन नियमों पर आधारित है-- 1. जहाँ वादी और प्रतिवादी दोनों ही समान रूप से दोषी हैं
वहाँ वादी प्रतिवादी के खिलाफ क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नहीं होता- यदि किसी मामले
में वादी और प्रतिवादी दोनों ही बराबर-बराबर दोषी हैं तो वहाँ वादी प्रतिवादी से क्षतिपूर्ति
नहीं मांग सकता। उदाहरणार्थ- बोम्बे बड़ौदा सेन्ट्रल रेलवे कं० व० द्वारकानाथ A. I.
R. 1935, All में प्रतिवादी रेलवे कंo की रेल की पटरी की सीमा के बीच 2 फुट ऊँची सूखी
घास खड़ी थी। वादी के खेत में भी फुट ऊँची सूखी घास खड़ी थी और खेत रेल की सीमा से
लगा हुआ था। एक दिन इन्जन की चिनगारी से रेल की घास में आग लग गई जो वादी के खेत की
घास में भी लग गई। निर्णय हुआ कि वादी व प्रतिवादी दोनों ही बराबर-बराबर के दोषी हैं
और वादी क्षतिपूर्ति प्राप्त नहीं कर सकता था क्योंकि वादी यह जानता था कि रेल के इन्जन
से चिंगारी प्रायः निकलती हैं, जो सूखी घास में लगकर उसके अपने खेत तक पहुँच सकती हैं।
अतः उसे अपने खेतों की सूखी घास को कम से कम रेल की सीमा के पास से काट लेना चाहिये
था।
2.
जहाँ क्षति का निकटतम, निश्चित और अधिकतम कारण वादी की स्वयं की असावधानी हो वहाँ वह
क्षति पाने का अधिकारी नहीं होता-यदि वादी को हुई क्षति का अधिकतम एवं निकटतम कारण
स्वयं उसी की असावधानी है तो वह प्रतिवादी को असावधानी के बावजूद भी हानिपूर्ति प्राप्त
नहीं कर सकता। उदाहरणार्थ-अटरफील्ड व फोरेस्टर, 1809 में प्रतिवादी ने अनुचित रूप से
एक बाँस लगाकर सार्वजनिक रास्ते को रोक दिया था। वादी अपने घोड़े पर बड़ी तेजी से चला
आ रहा था। उस समय इतना प्रकाश था कि रुकावट को 100 गज की दूरी से देखा जा सकता था फिर
भी वादी बॉस से टकरा गया और बुरी तरह घायल हो गया निर्णय हुआ कि वादी क्षतिपूर्ति प्राप्त
नहीं कर सकता था क्योंकि वादी यदि साधारण सावधानी और सतर्कता बरतता तो वह प्रतिवादी
की असावधानी से उत्पन्न होने वाली दुर्घटना को टाल सकता था।
3.
वादी अपनी असावधानी के बावजूद भी प्रतिवादी से क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता है बशर्त
कि उसकी असावधानी को दूर करने का अवसर प्रतिवादी को प्राप्त हो-यदि किसी मामले में
सर्वप्रथम वादी की असावधानी हो और उसके बाद प्रतिवादी को अवसर हो कि वह वादी को होने
वाली क्षति को बचा सकता है तो उसे बचाना चाहिये अन्यथा वह दोषी होगा। डेविस ब० मान,
1842 में वादी ने अपने गधे की अगली टाँगे बांधकर उसे 8 फीट चौड़ी एक तंग सड़क पर छोड़
दिया। प्रतिवादी का नौकर भारी सामान से भरी एक घोड़ागाड़ी बड़ी तेजी से उस सड़क पर
ले जा रहा था जिससे गधा कुचला गया और उसकी मृत्यु हो गई। प्रतिवादी ने वादी द्वारा
लाये गये वाद में अंशदायी असावधानी का बचाव लिया। निर्णय हुआ कि वादी की असावधानी से
बचने का अन्तिम अवसर प्रतिवादी को प्राप्त था तथा प्रतिवादी यदि थोड़ी सावधानी बरतता
तो वह घोड़ागाड़ी रोककर दुर्घटना को बचा सकता था। अतः प्रतिवादी उत्तरदायी है। इस नियम
को 'अन्तिम अवसर का सिद्धान्त' कहते हैं। यह सिद्धान्त सर्वप्रथम डेविस व० मान
1842 में ही प्रतिपादित किया गया था। इस सिद्धान्त से पूर्व यदि वादी की स्वयं की थोड़ी
सी भी असावधानी होती थी तो वह अपने स्वयं के दोष के कारण प्रतिवादी से कुछ भी क्षतिपूर्ति
प्राप्त नहीं कर सकता था।
वर्तमान
विधि-किन्तु अब विधि सुधार अधिनियम, 1945 के अनुसार, वादी का दावा पूर्णतः अस्वीकृत
नहीं होगा बल्कि वादी और प्रतिवादी की अनुपातिक असावधानी को ध्यान में रखते हुये उचित
मात्रा में कम कर दिया जायेगा।
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