प्रश्न - उन बचावों, जो कि सामान्यतः अपकृत्य विधि में सर्वत्र लागू होते हैं, की गणना कीजिये।
Enumerate
those defences which apply generally throughout the law of torts.
Or
"अनेक
परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिनमें कोई कृत्य अवैधानिक नहीं होता लेकिन वैसी परिस्थिति न होने पर यह अवैधानिक होता है।" उपर्युक्त कशन के प्रकाश में
दुष्कृति के सामान्य अपवादों की विवेचना कीजिये।
"There are various
conditions which when present will prevent an act from being wrongful which in
their absence would be a wrong." Discuss the general exceptions to the
liability in Torts in the light of the above statement.
उत्तर-
सर फ्रेडरिक पोलक के मतानुसार, "कुछ विशेषाधिकारों के नियम हैं जो दायित्व के
नियमों को नियन्त्रित करते हैं" (There are certain rules of immunity which
limit the rules of the liability)। दूसरे शब्दों में अनेक परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं
जिनमें कोई कार्य अवैधानिक नहीं होता लेकिन वैसी परिस्थिति न होने पर वह अवैधानिक होता
है।" यह कथन दुष्कृति के सामान्य अपवादों के सन्दर्भ में उचित प्रतीत होता है।
दुष्कृति के कुछ सामान्य अपवाद हैं जो मुख्य रूप से लोकनीति (Public Policy) पर आधारित
हैं जिनमें कुछ विशेष परिस्थितियों में किया गया कार्य दोषमुक्त होता है भले ही उससे
पीड़ित पक्ष को हानि पहुँचती । अतः अपकृत्यपूर्ण दायित्व के सामान्य अपवाद (General
Exceptions) निम्नलिखित
1.
देवी कृत्य (Act of God) सामण्ड के अनुसार, "ईश्वरीय नृत्य के अन्तर्गत वे घटना
आती हैं जिन्हें मनुष्य युक्तियुक्त सावधानी बरतकर भी नहीं रोक सकता है। ऐसी घटनायें
प्राकृतिक क्रियाओं का परिणाम होती हैं जिनका मनुष्य की क्रियाओं से कोई सम्बन्ध नहीं
होता।" दूसरे शब्दों में देवी कृत्य जैसे बाढ़, भूकम्प, ओलों व वर्षा आदि का आना
प्राकृतिक कार्यों का परिणाम हैं, जिनके घटने की मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता और
न ही उन्हें रोक सकता। ऐसे कार्यों के फलस्वरूप हानि होने पर किसी के विरुद्ध अपकृत्य
का दायित्व उत्पन्न नहीं होता। निकोलस ब० मार्सलैण्ड (1875) में प्रतिवादी की भूमि
पर कुछ कृत्रिम झीलें बन गई थी जिनमें पानी किसी ऊपर के स्रोत से आता था। एक वर्ष स्काटलैंड
में असाधारण वर्षा हुई जिसके कारण झील के किनारे टूट गये और तेज जलधारा से वादी की
4 पुलियाँ वह गई। क्षतिपूर्ति के बाद में निर्णय हुआ कि वादी उत्तरदायी नहीं है क्योंकि
उक्त घटना एक दैवी घटना थी जिसकी पूर्व धारणा प्रतिवादी नहीं कर सकता था।
2.
अवश्यम्भावी दुर्घटना (Inevitable Accident) पोलक के अनुसार, "अवश्यम्भावी दुर्घटना
वह घटना होती है जिसे साधारण बुद्धि का व्यक्ति उन परिस्थितियों में आवश्यक सावधानी
या सतर्कता बरतने के बावजूद भी नहीं रोक सकता था जिनमें वह घटित होती है।" अतः
यदि कोई व्यक्ति किसी कानूनी कार्य को करते समय पूर्ण सावधानी बरतता है और उसके बावजूद
भी ऐसी घटना घट जाती है जिसे रोका नहीं जा सकता और किसी अन्य व्यक्ति को हानि पहुँचती
है। तो ऐसी हानि के लिये हानिपूर्ति का दावा नहीं लाया जा सकता। स्टेनले ब० पावल,
1891 में वादी व प्रतिवादी शिकार करने के लिये एक जंगल में गये। प्रतिवादी ने एक चिड़िया पर गोली चलाई गोली का एक छर्रा अभाग्यवश
पेड़ के तने से टकराकर वादी को लगा जिससे वह घायल हो गया। निर्णय हुआ कि वादी को हुई
क्षति अवश्यम्भावी घटना का परिणाम थी। अतः प्रतिवादी क्षतिपूर्ति के लिये दायी नहीं
है।
3.
सहमति से किये गये कार्य (Volenti-non-fit-injuria) "जान-बूझकर आपत्ति लेना"
या "सम्मत कार्य से दुष्कृति नहीं होती" नामक सूत्र का अर्थ है कि जहाँ व्यक्ति
स्वेच्छा से हानि उठाता है, वहाँ कानूनी क्षति नहीं होती। सामण्ड के अनुसार, यदि किसी
व्यक्ति ने स्वेच्छा से अपने अधिकार को त्याग दिया है तो वह फिर उस अधिकार का लाभ नहीं
उठा सकता। अपकृत्य के बचाव का यह महत्वपूर्ण सूत्र है। उदाहरणार्थ - यदि कोई व्यक्ति
किसी दूसरे व्यक्ति को अपने घर पर आने के लिये आमन्त्रित करता है या उसे सावधानी से
अपने शरीर पर ऑपरेशन करने की अनुमति देता है तो वह बाद में उन कार्यों के लिये उस व्यक्ति
के खिलाफ अतिचार या मारपीट का दावा नहीं कर सकता।
सिद्धान्त
के प्रयोग के दो रूप- (i) यह सिद्धान्त ऐसे कार्यों में लागू होता है जो जान बूझकर
सहमति के साथ किये जाते हैं, जैसे मुक्केबाजी, ऑरपेशन या खेलकूद आदि में शारीरिक कष्ट
उठाना।
(ii)
यह सिद्धान्त ऐसे कार्यों में लागू होता है, जहाँ हानि अनुसांगिक रूप (Incidental)
में होती है। उदाहरणार्थ- जहाँ दर्शक स्वेच्छा से इस ज्ञान के साथ खेल-कूद, हाकी, फुटबाल
आदि के मैदान में आते हैं, वहाँ उन्हें चोट भी लग सकती है तो ऐसी हानि को सहन करने
के लिये उनकी उपलक्षित सहमति होती है। सहमति के अभाव में ऐसे कार्य गैरकानूनी माने
जाते हैं।
सिद्धान्त
के लागू होने की शर्तें इस सिद्धान्त के लागू होने के लिये निम्नलिखित तीन शर्तें पूरी होनी चाहियें-
(i)
सहमति स्वेच्छा से दी जानी चाहिये (Consent must be freely given) सहमति किसी दबाव
या प्रभाव अथवा गलत प्रतिनिधित्व द्वारा प्राप्त न की गई हो। किसी भी व्यक्ति द्वारा
दी गई सहमति को स्वेच्छा से दी गई सहमति तब तक नहीं कही जा सकती जब तक कि वह इस 'दशा
में न हो कि वह 'खतरे वाला' और 'खतरा रहित' काम में स्वतन्त्र रूप से चुनाव न कर सके।
(ii)
कार्य तथा कार्य प्रणाली वैध होनी चाहिये (Act and Method of doing the act must
be legal) जिस कार्य को करने के लिये सहमति दी जाती है उसे करने का ढंग वैधानिक - होना
चाहिये अन्यथा सिद्धान्त लागू नहीं होगा। उदाहरणार्थ, यदि दो व्यक्ति तेज धार वाली
नंगी तलवारों से लड़ते हैं तो ऐसे मामले में घायल व्यक्ति की सहमति का कोई मूल्य नहीं
है और चोट पहुचाने वाला पीड़ित पक्ष की क्षतिपूर्ति के लिये दायी होगा क्योंकि नंगी
तलवार से लड़ना अवैधानिक है।
(iii)
यह सिद्धान्त सहमति पर आधारित है, ज्ञान पर नहीं (This principle is based on
consent not on knowledge ) खतरे का ज्ञान होना खतरा उठाने के लिये सहमति से भिन्न
है। यह बात डेन व० हैमिल्टन (1939) से पूर्णतः स्पष्ट होती है। प्रस्तुत बाद में एक
महिला एक ऐसी कार में सवार होती है जिसका चालक शराब पिये हुये है। नशे के कारण चालक
की असावधानी से दुर्घटना हो जाती है और महिला घायल हो जाती है। अतः निर्णय हुआ कि वादिनी
क्षतिपूर्ति की अधिकारिणी है। यद्यपि वह ज्ञानती थी कि शराब के नशे में खतरा हो सकता
है, किन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उसने प्रतिवादी को असावधानी से उत्पन्न
खतरे के लिये भी सहमति दी थी।
सिद्धान्त
के अपवाद (Exception to the Rule ) - "जान-बूझकर आपत्ति लेना" नामक सूत्र
अपकृत्यपूर्ण दायित्व का एक सामान्य अपवाद है। किन्तु यह बचाव निम्नलिखित मामलों में
लागू नहीं होता-
(i)
असावधानी के मामले (Negligence Cases) जान कर आपत्ति मोल लेने का बचाव वहाँ लागू नहीं
होता जहाँ प्रतिवादी ने असावधानीपूर्वक कार्य करके वादी को क्षति पहुँचाई हो। उदाहरणार्थ-डेन
ब० हैमिल्टन, 1939 1. K. B. 509 में यह स्पष्ट किया गया है कि खतरे का ज्ञान होने से
खतरा उठाने की सहमति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता (Knowledge of the risk is
not the same thing as consent to run the risk )। प्रस्तुत बाद में श्रीमती डेन ने
यह जानते हुये कि प्रतिवादी ड्राईवर शराब पिये हुये है और दुर्घटना की सम्भावना है
फिर भी उसकी कार में जाने का निश्चय किया। ड्राइवर की असावधानी के कारण कार दुर्घटनाग्रस्त
हो गई। वादिनी द्वारा क्षतिपूर्ति के दावे में प्रतिवादी द्वारा यह जवाब दिया गया कि
वादिनी ने जान-बूझकर आपत्ति मोल ली थी। निर्णय हुआ कि यद्यपि कार में सवार होने से
पहले वादिनी यह जानती थी कि शराब के नशे में खतरा हो सकता है किन्तु उससे यह निष्कर्ष
नहीं निकलता कि उसने प्रतिवादी को असावधानी से उत्पन्न खतरे के लिये सहमति दी थी। अतः
वादिनी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने की हकदार है।
(ii)
प्राणरक्षा के मामले (Rescue Cases) यह सिद्धानत वहाँ लागू नहीं होता जहा किसी व्यक्ति
के प्राणों की रक्षा का मामला होता है। उदाहरणार्थ- हेन्स ब० हारवुड (1935) में प्रतिवादी
के नौकर ने घोड़ा गाड़ी सार्वजनिक मार्ग पर अकेला छोड़ दिया। किसी बच्चे ने घोड़ों
पर पत्थर फेंके। फलस्वरूप घोड़े चौंक पड़े और बिना चालक के गाड़ी लेकर भागने लगे। वादी
जो एक सिपाही था, ने यह देखकर सोचा कि यदि घोड़ों को नहीं रोका गया तो वह सड़क पर चलने
वाले स्त्री और बच्चों को कुचल देंगे। वादी ने खुद को खतरे में डालकर गाड़ी को रोक
दिया किन्तु वह स्वयं बुरी तरह घायल हो गया। वादी द्वारा चलाये गये क्षतिपूर्ति के
बाद में प्रतिवादी ने कहा कि वादी ने स्वयं को जान-बूझकर खतरे में डाला है। निर्णय
हुआ कि जहाँ किसी के प्राणों की रक्षा का मामला हो वहाँ यह सिद्धान्त लागू न होगा अतः
वादी को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार होगा।
(iii)
संविधिक कार्यों के मामले (Cases of Statutory Dutics) – यह सिद्धान्त वहाँ लागू नहीं
होता जहाँ किसी व्यक्ति की क्षतिपूर्ति करना प्रतिवादी का कानूनी दायित्व होता है।
उदाहरणार्थ- वर्कमैन कम्पनसेशन एकट के अन्तर्गत नियोजक का यह कर्तव्य है कि वह अपनी
सेवा के दौरान नौकर को हुई क्षति की पूर्ति करे भले ही वादी ने ऐसी क्षति को उठाने
के लिये पहले से सहमति दे रखी हो।
(iv)
अवैधानिक कार्यों के मामले (Cases of Unlawful Acts) वादी द्वारा वैधानिक कार्यों को
गैरकानूनी तरीकों से करने के लिये दी गई सहमति कार्यों को वैधानिक नहीं बना देती अतः
ऐसे कार्यों के फलस्वरूप वादी द्वारा उठाई गई हानि के लिये भी प्रतिवादी उत्तरदायी
होगा। उदाहरणार्थ- मुक्केबाजी के खेल में दस्तानों का प्रयोग न करना या द्वन्द्व युद्ध
में तेज धार वाली तलवार का प्रयोग करना आदि से यदि वादी को कोई क्षति पहुँचती है तो
उसके लिये प्रतिवादी उक्त सिद्धान्त का बचाव नहीं ले सकता।
क्या
खतरे के ज्ञान से यह समझा जायेगा कि सहमति है ?
(Does
knowledge of risk imply consent ? )
नहीं
खतरे के ज्ञान मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वादी ने खतरा उठाने की
सहमति भी प्रदान कर दी है। उक्त डेन ब० हेमिल्टन (1939) में यह बात पूर्णतः स्पष्ट
हो चुकी है।
4.
सामान्य अधिकारों का प्रयोग (Exercise of common rights) हानि बिना क्षति (Damnum
Sine Injuria) - इस सूत्र के अनुसार जब किसी अन्य - व्यक्ति के कार्य से हानि तो पहुँची
हो, किन्तु वादी के किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन न हुआ हो तो उसे हानिपूर्ति प्राप्त
करने का अधिकार नहीं होगा। केवल धन या सम्पत्ति की हानि अभियोज्य (Actionable) नहीं
होती। अपकृत्य विधि में अनुचित कृत्य वे कार्य हैं जिनके द्वारा वादी के कानूनी अधिकारों
का उल्लंघन होता है। दूसरे शब्दों के इस सिद्धान्त को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं
कि "कानूनी अधिकार के उल्लंघन के बिना हुई हानि अभियोज्य नहीं होती" भले
ही उससे वादी को कितनी भी बड़ी आर्थिक हानि क्यों न उठानी पड़े। इस सिद्धान्त की पुष्टि
निम्नलिखित वादों से की जा सकती है- -
(अ)
ग्लूसेस्टर ग्रामर स्कूल केस, 1410 (Gluseestor Grammer School Case, 1410) में बच्चों की एक पुरानी पाठशाला के अधिकांश बच्चे नई पाठशाला
में दाखिल हो गये फलस्वरूप पुरानी पाठशाला को भारी आर्थिक हानि हुई। निर्णय हुआ कि
स्वस्थ व्यापारिक प्रतियोगिता द्वारा विपक्षी को भले ही भारी हानि क्यों न उठानी पड़ी
हो परन्तु वह वाद योजित करके क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का हकदार नहीं है, क्योंकि प्रतिवादी
को स्कूल खोलने का सामान्य अधिकार प्राप्त था।
(ब)
चैसमोर वo रिचार्ड (Chesmore Vs Richard, 1859) में वादी एक जलधारा के पानी का प्रयोग अपने मिल के लिये 60 वर्षों से कर रहा था। प्रतिवादी
ने अपनी भूमि पर एक गहरा कुआँ खुदवाया जिससे वादी के मिल को पानी मिलना बन्द हो गया।
निर्णय हुआ कि वादी हानिपूर्ति पाने का अधिकारी नहीं है, क्योंकि प्रतिवादी को अपनी
भूमि पर कुआँ खोदने का सामान्य अधिकार था।
3.
कानूनी उपाय (Legal Remedy) अनुचित कार्य ऐसा होना चाहिये जिससे क्षति प्राप्त करने
का कानूनी उपाय प्राप्त हो जाये कानूनी उपाय को 'जहाँ अधिकार वहाँ उपाय' (Ubi jus
ibi remedium) नामक सूत्र की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि..
जहाँ अधिकार है, वहाँ उसके साथ ही उसके भंग होने की दशा में उसके लिये उपाय भी है।
वास्तव में अधिकार तभी स्थिर रह सकता है जब उसे उपभोग करने की सुविधा हो और उसके भंग
होने की अवस्था में दोषी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही की जा सके। अतः प्रत्येक अपकार
(Wrong) के लिये कानूनी उपाय है। उक्त सूत्र का प्रतिपादन चीफ जस्टिस होल्ट ने एशबी
व हाइट 1703 में यह कहते हुये किया था कि प्रत्येक कानूनी अधिकार के उल्लंघन मात्र
से हानि होती है भले ही उससे किसी को एक पैसे का भी नुकसान न हुआ हो। दूसरे शब्दों
में यदि किसी व्यक्ति का कोई कानूनी अधिकार है तो उसके भंग होने की अवस्था में यह भी
आवश्यक है कि उसके पास उसे लागू कराने का उपाय भी होना चाहिये। यदि कोई ऐसा अधिकार
है, जिसे भंग होने पर न्यायाल द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता, तो यह एक अर्थहीन औपचारिकता
होगी, अतः जहाँ अधिकार है, वहाँ
उपाय भी उपलब्ध होता है। स्मरणीय है कि दुष्कृति का सम्बन्ध केवल कानूनी चूकों
(Legal Wrongs) से है, नैतिक भूलों (Moral Wrongs) से नहीं। इस बात को अच्छी प्रकार
समझने के लिये "अनैतिक कार्य से कार्यवाही का आधार उत्पन्न नहीं होता।"
(Ex trupi causa non oritur actio) नामक सूत्र को जानना आवश्यक है। अर्थात् कोई कार्य
चाहे कितना भी बुरा या अनैतिक क्यों न हो यदि उससे किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं
होता तो उसके लिये दावा दायर नहीं किया जा सकता। उदाहरणार्थ-
(i)
यदि एक चोर किसी मकान में चोरी करने के लिये कूदते समय भूमि पर पड़े हुये काँटेदार
तारों में उलझकर घायल हो जाता है तो वह मकान मालिक के खिलाफ क्षतिपूर्ति का दावा दायर
नहीं कर सकता, क्योंकि चोरी कानूनी न होकर एक अनैतिक कार्य है।
(ii)
हीगर्ट व शाइन, 1978 में एक महिला जो अपने मित्र के साथ सम्भोग किया करती थी, को पेशाब
की बीमारी लग गई। उसके मित्र ने उससे इस बीमारी को छिपा रखा था। महिला ने क्षतिपूर्ति
के लिये वाद दायर किया। निर्णय हुआ कि अनैतिक कार्य से कार्यवाही का आधार उत्पन्न नहीं
होता। अतः महिला क्षतिपूर्ति की हकदार नहीं है।
अपकृत्य
में मुख्य उपचार यद्यपि अनिर्धारित क्षतिपूर्ति (Unliquidated Damages) का दावा लाना
है, किन्तु विशिष्ट मामलों में न्यायालय व्यादेश (Injunction), सम्पत्ति को विशिष्ट
रूप से वापस करने तथा स्वामित्व की घोषणा करने आदि का आदेश भी जारी कर सकता है।
5.
आवश्यकता के कार्य (Work of Necessity ) अपकृत्य विधि के अन्तर्गत अपकृत्यपूर्ण दायित्व
का एक सामान्य अपवाद आवश्यकता का कार्य अथवा सार्वजनिक हित में किया गया कार्य है।
दूसरे शब्दों में सार्वजनिक हित के लिए किये गये कार्यों से हुई क्षति के लिए दावा
नहीं किया जा सकता। यह बचाव "जनहित ही सर्वोच्च कानून है" (Salus populi
superma lex) नामक लेटिन सूत्र पर आधारित है। "अधिक से अधिक को अधिकतम लाभ
" की नीति ही इस सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य है। यह माना जाता है कि सार्वजनिक
हित में किये गये कार्य के लिये प्रत्येक सदस्य की उपलक्षित (Implied) सहमति होती है।
आवश्यकता पड़ने पर व्यक्तिगत हित को जनहित के पक्ष में त्याग दिया जाता है। अतः अधिकतम
हानि को टालने के लिये किये गये कार्यों से हुई न्यूनतम श्रति अनुयोज्य
(Actionable) नहीं होती भले ही वह हानि पहुँचाने के उद्देश्य से ही क्यों न की गई हो।
उदाहरणार्थ-यदि किसी व्यक्ति के मकान में लगी आग को बुझाते समय पड़ौसी के मकान में
कुछ पानी गिर जाता है और उसका कुछ सामान नष्ट हो जाता है तो इस अपकृत्य के लिये आग
बुझाने वाले व्यक्ति पर क्षतिपूर्ति का वाद दायर नहीं किया जा सकता क्योंकि आग बुझाने
वाला व्यक्ति यदि पहले अपने पड़ौसी से अनुमति लेता तो आग बढ़ जाती। अतः जब किसी कार्य
को किये जाने की तात्कालिक आवश्यकता हो तो ऐसे कार्य को यदि युक्तियुक्त एवं समुचित
रूप से किया गया है तो वह न्यायोचित होगा। निम्नलिखित कार्य आवश्यकता में किये गये
कार्यों के उदाहरण हैं-
(i)
कोप ब० शार्पे (1912) 1. K. B. 496 में निर्णय दिया गया कि मकान में आग लगने पर पानी फेंकना या मकान को गिरा देना जिससे आग और आगे न बढ़े तथा
आस-पास के घर जलने से बच जायें, न्यायसंगत कार्य है।
(ii)
मोसेज केस (1609) 12. Report 63 में कहा गया कि जहाज को डूबने से बचाने हेतु उस पर
लदे हुए समान को समुद्र में फेंकना जिससे जहाज हल्का हो जाये और समुद्र में डूबने से
बच जाये, एक न्यायोचित कार्य है।
(iii)
कोहयूरिट ब० हेस्टी (1966) में निर्णय हुआ कि जहाज के कप्तान द्वारा जहाज पर नष्ट होने
वाले माल को बेचना न्यायसंगत कार्य है।
(iv)
लेह व ग्लेडस्टोन (1909) 26 T. L. R. 139 में निर्णय दिया गया कि जेल में भूख हड़ताल
पर बैठे कैदी की जान बचाने हेतु जबरदस्ती करके भोजन कराना, न्यायसंगत कार्य है।
(v)
डूबते हुये व्यक्ति को पानी से बाहर खीचना तथा बेहोश व्यक्ति की जान बचाने हेतु सर्जन
द्वारा ऑपरेशन करवाने के लिये बाध्य करना ।
6.
कम हानि वाले कार्य (Trifle Acts) अपकृत्य पूर्ण दायित्व का एक सामान्य अपवाद यह है
कि "कानून छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं देता।" यह कहावत लेटिन सूत्र
De minimus non curat lex अर्थात् Minimum is not curable by law पर आधारित है जिसका
तात्पर्य यह है कि कानून कम हानि वाले अपकृत्यों के लिये क्षतिपूर्ति की व्यवस्था नहीं
करता। इस सूत्र का आधार यह है कि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति तुच्छ या हल्की हानि के
लिये शिकायत नहीं करता। वास्तव में सामान्य जीवन में हम एक दूसरे से इतने बन्धे हुए
हैं कि एक व्यक्ति के कार्य से दूसरे को हानि पहुँचाई जाती रहती है और यदि यह हानि
ऐसी है जिसकी शिकायत कोई बुद्धिमान व्यक्ति उन परिस्थितियों में यदि हानि को उठाता
तो शिकायत नहीं करता तो ऐसी हानि के लिये कानून क्षतिपूर्ति नहीं करायेगा उदाहरणार्थ
एक व्यक्ति जब किसी धूल भरी सड़क से अपनी गाड़ी ले जा रहा होता है तो पैदल चलने वाले
व्यक्तियों पर धूल पड़ना स्वाभाविक होता है ऐसी हानि के लिये कोई हानिपूर्ति नहीं कराई
जा सकती। इसी प्रकार जब भीड़ में एक व्यक्ति दूसरे के कन्धे को छूता है या उसके पैर
पर पैर रख देता है तो उसके लिये कोई समझदार व्यक्ति कानून का सहारा नहीं लेगा तथा ऐसे
कार्यों को हम अपकृत्य नहीं मानते। अतः हम यह कह सकते हैं कि, "कानून छोटी-छोटी
बातों पर ध्यान नहीं देता।" इस सिद्धान्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 95 में
भी मान्यता दी गई है।
अपवाद
(Exceptions) किन्तु यह नियम वहाँ लागू नहीं होता जहाँ किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार
का उल्लंघन होता है भले ही उससे उसे एक पैसे की भी हानि न होती हो। उदाहरणार्थ- अ व
के तालाब में मछली पकड़ने के उद्देश्य से जाल डाल देता है किन्तु जाल में एक भी मछली
नहीं फँसी निर्णय हुआ कि 'व' को हानि हुई क्योंकि यदि अ. को ब, द्वारा जाल 1 डालने
से न रोका गया तो 'अ', 'ब' के विरुद्ध मछली पकड़ने का अधिकार प्राप्त कर लेगा। इसी
प्रकार, जहाँ 'अ' 'ब' के खाली खेत में बिना उसकी अनुमति के चलता है वहाँ यद्यपि 'अ'
द्वारा 'ब' को हानि नहीं होती किन्तु यदि 'अ' को खेत में आने-जाने से न रोका गया तो
'अ' 'ब' के खेत पर रास्ते का अधिकार अर्जित कर लेगा।
7.
आत्म-रक्षा (Self Defence) - प्रत्येक व्यक्ति को अपने खिलाफ अवैध बल प्रयोग से अपनी
रक्षा करने हेतु युक्तियुक्त बल प्रयोग करने का अधिकार है। किन्तु शर्त यह है कि आत्म-रक्षा
में प्रयोग किया गया बल क्षति के अनुपात से अधिक नहीं होना चाहिये अन्यथा बल प्रयोग
अयुक्तियुक्त माना जायेगा।
8.
न्यायिक कार्य (Judicial Acts) – अपने न्याय सम्बन्धी कर्तव्यों का पालन करने में या
उसके लिये प्रयुक्त शब्दों के लिये या अपने अधिकार के प्रयोग के लिये किसी न्यायाधीश
के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती भले हो ऐसे कार्य द्वेषपूर्ण हों और ईमानदारी
से न किये गये हों। यह न्यायिक विशेषाधिकार सार्वजनिक नीति के सिद्धान्त पर आधारित
हैं। भारत में भी जुडिशियल ऑफिसर्स प्रोटेक्टशन एक्ट 1850 न्यायाधीशों को इस प्रकार
का संरक्षण प्रदान करता है।
9.
न्यायिक कल्प कार्य (Quasi-judicial Acts) वर्तमान युग में विभिन्न स्वशासी संस्थायें
(Autonomous Body) जैसे, विश्वविद्यालय, क्लब और सोसाइटियाँ आदि हैं जो अपना प्रशासन
चलाने के लिये उपविधि (Bye Law) का निर्माण तथा वादों का न्यायिक ढंग से निर्णय करती
हैं। ये संस्थायें ऐसे अधिकार विधायिका से प्राप्त करती हैं। इस न्यायिक प्राधिकार
को न्यायिक कल्प अधिकार कहा जाता है। इस प्रकार के न्यायिक कल्प कार्य करने वाले व्यक्ति
श्री होते हैं। यदि ऐसे व्यक्ति, संस्था या निकाय प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों का
पालन करते हुए कार्य करते हैं तो वे दीवानी दायितव से मुकत रहते हैं। प्राकृतिक न्याय
का एक महत्वपूर्ण नियम यह है कि किसी कर्मचारी या सदस्य को किसी संस्था या निकाय के
पद से तभी हटाया जा सकता है यदि (i) कार्यवाही सद्भावनापूर्वक की गई है। (ii) दोषी
को अपराध के बारे में पर्याप्त सूचना दी गई है तथा (iii) उसे अपने बचाव में कुछ कहने
के लिये अवसर दिया गया है। यदि इन सभी शर्तों का उचित पालन किया गया है तो न्यायालय
ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, भले ही निर्णय गलत प्रतीत होता हो।
10.
कार्यकारिणी के कार्य (Executive Acts) जब कोई अधिकारी किसी लोक अधिकारी की आज्ञा का
पालन करने में कोई अपकृत्य करता है तो उसके खिलाफ क्षतिपूर्ति की कार्यवाही नहीं की
जा सकती क्योंकि यदि लोक अधिकारी को ऐसा अधिकार न हो तो शासन का कार्य ही असम्भव हो
जायेगा। लेकिन यदि सरकारी अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाता है तो वह गैर-कानूनी
कार्य के लिये उत्तरदायी ठहराया जायेगा। इस प्रकार सरकारी कर्मचारी द्वारा किसी अपराधी
को गिरफ्तार करने पर उसके खिलाफ अपकृत्य में कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी। किसी घोषित
अपराधी को पकड़ने में प्राइवेट व्यक्ति भी मदद कर सकते हैं और उनके खिलाफ भी अभियुक्त
को अपकृत्य के लिये दावा दायर करने का हक नहीं होगा।
11.
पैतृक एवं पैतृक कल्प अधिकार (Parental & Quasi-parental Authority) जब कोई माता-पिता
अपने पुत्र को शिक्षा देता है या उसके व्यवहार को सही रास्ते पर लाने के लिये शक्ति
का प्रयोग करता है या कोई शिक्षक विद्यार्थी को शिक्षा देने या प्रशिक्षण में बल प्रयोग
करता है या कोई संरक्षक किसी पागल को ठीक से रखने के लिये शक्ति का प्रयोग करता है
तो ऐसे कार्यों से उत्पन्न हुये अपकृत्यों के लिये मुकदमा चलाने का कारण नहीं बनता
कि कार्य युक्तियुक्त ढंग से तथा सही रूप में किये गये हो अर्थात शक्ति का प्रयोग सदभावनापूर्वक
तथा न्यायोचित ढंग से किया गया हो जिसका उद्देश्य बच्चे का कल्याण करना हो। रेक्स व०
निवपोर्ट, 1929 में यह निर्णय दिया गया कि स्कूल मास्टर का यह अधिकार स्कूल की सीमा
तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका विस्तार आने जाने के दौरान में भी बना रहता है। प्रस्तुत
केस में एक दिन एक लड़का स्कूल से आते समय सिगरेट पीता हुआ पकड़ा गया और स्कूल मास्टर
ने उसे दण्ड दिया। निर्णय हुआ कि पिता जब अपने बच्चे को स्कूल में पढ़ने भेजता है तो
स्कूल मास्टर को आवश्यकतानुसार उचित दण्ड देने का अधिकार देता है।
12.
अधिकृत कार्यों के करने से हुई स्वाभाविक क्षति (Damage incidental to authorised
acts) किसी अधिनियम के द्वारा प्राधिकृत कार्य को करने से यदि किसी व्यक्ति को कोई
हानि होती है तो उसके लिये क्षतिपूर्ति का दावा दायर नहीं किया जा सकता बशर्ते कि कार्य
उचित सावधानी एवं सतर्कता के साथ किया गया हो। वाधन व पफ्ट बेल रेलवे क०, 1870 में रेलवे कम्पनी को रेलगाड़ी चलाने का कानूनी अधिकार था। एक
दिन इन्जन में आग की चिनगारियों के निकलने से रेल के पास स्थित वादी को टाल में आग
लग गई जिससे उसको काफी क्षति पहुँची। निर्णय हुआ कि रेलवे कम्पनी दायी नहीं है क्योंकि
कम्पनी ने रेलगाड़ी चलाने में सतर्कता से काम लिया था तथा रेलगाड़ी अधिनियम के अन्तर्गत
चलाई गई थी।
13.
भूल से किये गये कार्य (Acts done by mistake) – सामान्यतया विधि से अनभिज्ञता क्षम्य
नहीं होती। भूल चाहे विधि की हो या तथ्य की अपकृत्य के दायित्व में बचाव नहीं होती।
परन्तु इस नियम का अपवाद यह है कि यदि भूल ऐसी हो जिसे उन परिस्थितियों में साधारण
बुद्धि वाला व्यक्ति भी वही करता तो वह क्षतिपूर्ति के लिये दायी नहीं होगा। इस प्रकार
द्वेषपूर्ण अभियोजन तथा धोखा देने आदि में भूल के आधार पर क्षतिपूर्ति की कार्यवाही
नहीं की जाती ।
14.
राजकाज (Act of State) पोलक के अनुसार, "राज-कार्य" राजाओं या विदेशी स्वतन्त्र
राज्यों के शासकों द्वारा किये या अपनाये गये ऐसे कार्य हैं, जिन्हें वे अपनी राजनैतिक
सार्वभौम सत्ता की शक्ति के अन्तर्गत करते हैं। सर जेम्स स्टीफन के अनुसार राज्य के
कार्य से हमारा तात्पर्य उस कार्य से है जो 1. एक विदेशी के विरुद्ध किया गया हो
2. राजा के सेवक द्वारा किया गया हो. 3. राज्य की नीति के आधार पर राजा की पूर्व स्वीकृति
या पुष्टिकरण द्वारा किया गया हो तथा 4. जो किसी प्रकार न्यायोचित (Justified) नहीं
होता किन्तु राज्य की नीति के अन्तर्गत होने के कारण देश का कोई न्यायालय इसका संज्ञान
(Cognizance) नहीं ले सकता। अतः यह एक अवैध तथा अन्यायपूर्ण (Lnjust) कार्य है जिसको
केवल राज्य की नीति के अन्तर्गत ही सिद्ध किया जा सकता है। अपकृत्य में इसके लिये कोई
उपचार प्राप्त नहीं है। इसके उदाहरणों में राज्य द्वारा-1. युद्ध एवं शान्ति की घोषणा
करना, 2. किसी विदेशी राज्य का अपहरण करना आदि कार्य आते हैं। बनन व० डेनमान में एक
जलपोत के सेनापति डेनमान ने स्थानीय सरकार से सन्धि की तथा इसके अन्तर्गत वादी के गुलामों
को कैद कर लिया गया और उसके बागों में आग लगा दी गई। निर्णय हुआ कि गुलामों का मालिक
हानिपूर्ति का बाद दायर नहीं कर सकता क्योंकि डेनमान के कार्यों को राज्य द्वारा पुष्टीकृत
(Ratify) कर दिया गया था।" भारत में भी उक्त सिद्धान्त लागू होता है किन्तु इसके
निम्न अपवाद हैं-
1.
भारतीय नागरिकों के विरुद्ध राज- कार्य का बचाव नहीं लिया जा सकता। (अमीर खान Vs यूनियन
ऑफ इण्डिया A. I.R. 1870)
2.
यदि कार्य किसी भारतीय कानून के अन्तर्गत प्राप्त अधिकारों के प्रयोग में किया गया
है तो राज-काज का बचाव नहीं लिया जा सकता।
3.
यदि कोई भारतीय नागरिक अपने नागरिक अधिकारों के भंग होने पर किसी राज्याधिकारी के खिलाफ
कार्यवाही करता है तो यह नियम लागू न होगा (मदन गोपाल कोबरा Vs. यूनियन ऑफ इण्डिया)
।
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