गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

द्वेषपूर्ण अभियोजन से आप क्या समझते हैं। अपने पाठ्यक्रम में दिये हुये मार्गदर्शक निर्णय की मदद से पूरी तरह समझाइये।

 प्रश्न - (अ) द्वेषपूर्ण अभियोजन से आप क्या समझते हैं। अपने पाठ्यक्रम में दिये हुये मार्गदर्शक निर्णय की मदद से पूरी तरह समझाइये।

(a) What do you understand by rnalicious prosecution. Explain fully with the help of leading case provided in your course.

or

द्वेषपूर्ण अभियोजन से आप क्या समझाते हैं ? द्वेषपूर्ण अभियोजन को सिद्ध करने के लिए वादी को किन-किन बातों की आवश्यकता होती है ?

What do you understand by "Malicious Prosecution"? What are the elements which are necessary to be proved by the plaintiff in an action for malicious prosecution?

 

(ब) द्वेषपूर्ण अभियोजन और मिथ्या कारावास में अन्तर बताइये।

(b) Explain the distinction, if any, between malicious prosecution and false imprisonment.

 

उत्तर- द्वेषपूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) - रतन लाल के अनुसार, "द्वेषपूर्ण अभियोजन से तात्पर्य किसी व्यक्ति के विरुद्ध द्वेषपूर्ण भावना से प्रेरित होकर फौजदारी या दिवालिया सम्बन्धी निराधार व मिथ्या आरोप लगाकर असफल कार्यवाही करना है जिनका उद्देश्य न्याय प्राप्त करना न होकर, वादी को आर्थिक, प्रतिष्ठा या शारीरिक क्षति दिलाने का होता है।" बीना ब० दामोदर A. I. R. 1960 में कहा गया है कि, "द्वेषपूर्ण अभियोजन वह असफल कार्यवाहियों हैं जो किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ आरम्भ की जाती हैं, जिनके पीछे कोई न्यायोचित कारण नहीं होता और केवल द्वेष का भाव होता है। यह कहा जा सकता है कि इनके पीछे अस्पष्ट और अनुचित प्रेरणा होती है जो न्याय के लिये नहीं वरन् वादी की आर्थिक स्थिति या प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने के लिये की जाती है।"

 

जब किसी व्यक्ति के खिलाफ फौजदारी न्यायालय में द्वेषपूर्ण अभियोजन चलाया जाता है और पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण उसे उस आरोप से न्यायालय द्वारा बरी कर दिया जाता है। तो ऐसे व्यक्ति को यह अधिकार है कि यह अभियोक्ता के खिलाफ क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का वाद दीवानी न्यायालय में योजित करे, क्योंकि यद्यपि ऐसा व्यक्ति आरोपों से मुक्त हो जायेगा किन्तु उसके मान और धन की जो हानि होगी, उसके लिये कौन दायी होगा ? अतः ऐसे व्यक्ति को अभियोक्ता के खिलाफ क्षतिपूर्ति का वाद दायर करने का हक दिया गया है।

 

द्वेषपूर्ण अभियोजन के आवश्यक तत्व (Essentials of Malicious Prosecution ) बलभद्र सिंह बनाम बद्रीशाह A. I. R. 1926 P C. 43 में प्रिवी कौंसिल ने यह निर्णय दिया कि द्वेषपूर्ण अभियोजन से हुई हानि को प्राप्त करने के लिये वादी को निम्नलिखित तत्वों को सिद्ध करना आवश्यक है:-

 

1. यह कि वादी के विरुद्ध प्रतिवादी द्वारा अभियोग चलाया गया।

2. यह कि मुकदमे का अन्त वादी के पक्ष में हुआ क्योंकि वह स्वभावतः ही समाप्त होने योग्य था।

3. यह कि वादी पर प्रतिवादी के बिना किसी युक्तियुक्त तथा सम्भावित कारण के मुकदमा चलाया गया।

4. यह कि वादी पर प्रतिवादी ने द्वेषपूर्ण भावना से प्रेरित होकर मुकदमा चलाया।

5. यह कि अभियोग के फलस्वरूप वादी को क्षति पहुँची।

 

उक्त बाद में 20 सितम्बर को बद्रीशाह, हजारा किसान उसका पुत्र रघुनाथ और भरत एक अन्य किसान पुलिस स्टेशन गये रघुनाथ ने अपराध स्वीकार करते हुये कहा, "अपीलकर्त्ता ने उसे कुछ समय पहले 500 रु० देने का प्रस्ताव किया था यदि वह श्योबक्स को मार दे। उसने उस प्रस्ताव का स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। 17 सितम्बर को उसके पिता गाँव से बाहर गये हुये थे। अपीलकर्त्ता बच्चू ने कहा था कि यह अच्छा अवसर है, जब रात्री होने को हुई तब दोनों अपीलकर्ता उसके घर आये और तेजा नाई श्योबक्स को बुलाने गया, वे सब बैठ गये, तब बलभद्र श्योक्क्स पर टूट पड़ा, बलभद्र ने अपना हाथ श्योबक्स के मुँह पर रखा जबकि बच्चू ने उसे पकड़ लिया तेजा तथा रघुनाथ की सहायता से उसको मकान के अन्दर ले जाया गया। उसने और तेजा ने श्योबक्स के पैर पकड़े, बलभद्र उसको छाती पर बैठ गया तथा मुंह पर हाथ रख दिया, बच्चू ने चाकू से उसका गला काटा और वह मर गया। मकान में गड्ढा खोदा तथा उसकी लाश को दफना दिया गया।"

 

तेजा ने भी अपराध स्वीकार किया। तेजा तथा रघुनाथ ने अपराध की स्वीकृति पुलिस इन्सपैक्टर तथा मजिस्ट्रेट के सामने दोहरायी।

27 सितम्बर को मजिस्ट्रेट ने गवाहों का परीक्षण किया तथा दोनों अपीलकर्ताओं के वारन्ट जारी किये 30 दिसम्बर सन् 1919 का मजिस्ट्रेट ने परीक्षण के लिये सुना तथा दोनों अपीलकर्ता उन्मोचित कर दिये गये तथा तेजा व रघुनाथ के खिलाफ केस सेशन भेज दिया गया।

सेशन न्यायाधीश ने केस को सुना। रघुनाथ व तेजा अपने द्वारा किये गये अपराधों से मुकर गए और कहा कि ये बयान पुलिस के पीछे पड़ने व बद्रीनाथ के कहने से दिए गये थे। वे सब सत्र न्यायाधीश द्वारा उन्मोचित कर दिये गए।

वादी अपीलकर्ता ने द्वेषपूर्ण अभियोजन का वाद दायर किया जिसमें वादी का कथन था कि बद्रीशाह ने तेजा व रघुनाथ से झूठा अपराध स्वीकार करने का बयान दिलाया था अतः वही उसका अभियोक्ता था।

 

विचारण न्यायालय- विचारण न्यायालय ने वादी का दावा डिक्री कर दिया।

 

प्रथम अपील- प्रतिवादी ने विचारण न्यायालय के निर्णय एवं डिक्री के खिलाफ न्याय आयुक्त की अदालत में अपील दायर की कमिश्नर अवध ने प्रतिवादी की अपील मंजूर कर ली तथा विचारण न्यायालय का फैसला रद्द कर दिया।

 

प्रिवी कौंसिल - वादी ने प्रिवी कौंसिल के समक्ष न्याय आयुक्त के निर्णय के विरुद्ध अपील दायर की। प्रीवी कौंसिल का मत था कि न्याय आयुक्त ने कानून का पूर्ण रूप से गलत अर्थ लगाया। न्याय आयुक्त का यह फैसला था कि वादी यह साबित करने में असमर्थ रहा कि आरोप जिसके लिये उसका परीक्षण हुआ, निर्दोष था यह गलत है। न्याय आयुक्त को यह देखना था कि शिकायत की कार्यवाही वादी के पक्ष में समाप्त हुई यदि स्वभावतः ही वह समाप्त होने के योग्य थी।

 

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या बद्रीशाह ने अभियोजन की सारी कार्यवाही की खोजबीन की तथा चलवाई थी ? वास्तव में उत्तरदाता के द्वारा कार्यवाही नहीं चलाई थी भारतवर्ष में अभियोजन प्राइवेट नहीं है; यदि किसी देश में अभियोजन प्राइवेट नहीं है तो द्वेषपूर्ण अभियोजन का दावा किसी निजी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं चल सकता अपीलकर्ता की ओर से यह कहा गया कि अधिकारियों को इत्तला देना जो कि अभियोजन की कार्यवाही चलाते हैं. वह भी प्रेरणा में आते है।

 

तेजा तथा रघुनाथ ने अपराध को स्वीकार किया था। अपीलकर्त्ता यह साबित करने में असमर्थ रहे कि रघुनाथ और तेजा को बद्रीशाह ने सिखाया था और बद्रीशाह के द्वारा यह स्कीम तैयार की गयी थी।

 

द्वेषपूर्ण अभियोजन के दावे में वादी को यह साबित करना पड़ता है कि उसके ऊपर जो आरोप लगाया गया है वह उसके लिये अनभिज्ञ तथा निर्दोष था और वह बिल्कुल गलत व झूठा था। वादी को यह साबित करना जरूरी है कि "अभियोजन की कार्यवाही उसके पक्ष में समाप्त हुई यदि स्वभावतः ही वह समाप्त होने योग्य थी।" वादी उक्त तथ्य साबित करने में असमर्थ रहे, अतः वह अनुतोष पाने के अधिकारी नहीं हैं। अतः प्रीवी कॉसिल ने अपील खारिज कर दी।

 

1. प्रतिवादी द्वारा अभियोजन (Prosecution by defendant ) सर्वप्रथम वादी को यह सिद्ध करना होता है कि प्रतिवादी ने ही उसके खिलाफ किसी अपराध को करने का आरोप लगाते हुए किसी न्यायालय में मुकदमा दायर किया था। दूसरे शब्दों में वादी के खिलाफ दायर किये गये मुकदमे में प्रतिवादी ही अभियोक्ता था। अभियोक्ता कानून की दृष्टि में वह व्यक्ति होता है। जो अभियोग का क्रियात्मक रूप से संचालन करता है। लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि प्रतिवादी कार्यवाही में पक्ष ही हो। हजूरसिंह बनाम गंगासिंह A. I. R. 1976 में कहा गया कि निम्नलिखित अवस्थाओं में सूचना देने वाला व्यक्ति भी अभियोक्ता हो जाता है—

(i) यदि उसके द्वारा दी गई सूचना उसके ज्ञान में असत्य थी।

(ii) यदि उसने पुलिस को निर्दोष व्यक्ति को फंसाने के लिये प्रेरित किया था।

(iii) यदि उसने अपनी सूचना की पुष्टि में झूठे गवाहों को पेश किया था।

(iv) यदि उसने पुलिस को निर्दोष व्यक्ति को फंसाने के लिये प्रभावित किया था।

 

2. वादी के पक्ष में कार्यवाही का समापन (Termination of proceeding in favour of plaintiff)- वादी को यह सिद्ध करना आवश्यक है कि प्रतिवादी द्वारा लगाया गया आरोप झूठा था तथा उस आरोप के आधार पर आरम्भ हुई कार्यवाही उसके पक्ष में समाप्त हुई। ऐसे मामलों में गुण-दोष का विमोचन नहीं होता है। यदि मुकदमा क्रमहीन हो गया है या अभियुक्त बीच में ही मुक्त (Discharge) कर दिया गया था या किसी दोष के कारण सजा समाप्त कर दी गई थी या अभियोग का आदेश अपील में समाप्त हो गया था या वादी निर्दोष घोषित कर दिया गया था तो कार्यवाही का समापन वादी के पक्ष में समझा जायेगा।

 

3. युक्तियुक्त और सम्भावित कारण का अभाव (Absence of reasonable and probable cause) द्वेषपूर्ण अभियोजन के आधार पर वादी को मुकदमा चलाने के लिये यह - सिद्ध करना आवश्यक है कि प्रतिवादी ने उस पर जो वाद चलाया था, उसमें जो आरोप वादी पर लगाए गए थे, वे सर्वथा निराधार थे और इस बात का ज्ञान होते हुए भी उसने वादी पर बाद चलाया था। युक्तियुक्त एवं सम्भावित कारण का अर्थ है कि यदि अभियुक्त के अपराधी होने में कोई ऐसा विश्वास का कारण रहा हो तो उसकी विद्यमानता को प्रकट करे और ऐसी परिस्थितियों का आधार रहा हो जिसमें कोई विवेकशील व्यक्ति, यदि हो, तो सम्भवतः ऐसा ही करता।

 

4. द्वेषपूर्ण अभिप्राय (Malicious Intention ) - रामदेव ब० बिदरी चन्द्र तथा अन्य A. 1. R. 1959 में यह निर्णय दिया गया कि द्वेषपूर्ण अभियोजन के वाद में क्षतिपूर्ति के लिये द्वेषभावना का सिद्ध किया जाना आवश्यक है। जब किसी अभियोजन का उद्देश्य न्याय की स्थापना न होकर किसी अनुचित उद्देश्य की प्राप्ति के लिये होता है तो ऐसा अभियोजन द्वेषपूर्ण कहलाता है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को हानि पहुँचाने का होता है। लेकिन अभियोग केवल इस कारण द्वेषपूर्ण नहीं माना जाता कि वह क्रोध में आकर आरम्भ किया गया है। 'द्वेष' शब्द व्यापक अर्थ में प्रयोग किया जाता है, यह ईर्ष्या दुर्विचार तथा बदले की भावना के सन्दर्भ में ही प्रयोग नहीं होता। प्रो० विनफील्ड के अनुसार, "Malice exists unless the predominent wish of the accuser is to vindicate the law."

 

5. क्षति (Damage) अन्त में वादी को यह सिद्ध करना आवश्यक है कि प्रतिवादी ने उस पर जो द्वेषपूर्ण अभियोग चलाया था, उसके फलस्वरूप उसे क्षति पहुँची है। यह क्षति शरीर, सम्पत्ति या सम्मान आदि में से किसी भी प्रकार की हो सकती है। यह क्षति आवश्यक रूप से धन-सम्बन्धी हो, कोई जरूरी नहीं है।

 

(ब) द्वेषपूर्ण अभियोजन और मिथ्या कारावास में अन्तर

 

मिथ्या कारावास (False Imprisonment)

 

1. मिथ्या कारावास व्यक्ति की स्वतन्त्रता का अवैध रूप से अतिक्रमण करता है। इसमें व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया के बिना कारावास में डाल दिया जाता है।

 

2. इसमें गिरफ्तारी स्वयं या किसी प्रशासनिक (Administrative) अधिकारी द्वारा करायी जाती है।

 

3. इसमें प्रतिवादी को यह सिद्ध करना होता है। कि युक्तियुक्त या सम्भाव्य कारण विद्यमान था। दूसरे शब्दों में प्रमाणित करने का भार (Burden of Proof) प्रतिवादी पर होता है।

 

4. इसमें द्वेषपूर्ण भावना को सिद्ध करना आवश्यक नहीं है ।

 

5. इसमें क्षति (Damage) सिद्ध करना आवश्यक नहीं है।

 

6. यह एक प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अभियोज्य अपकृत्य है । कारण यह है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अपहरण बिना किसी कानूनी औचित्य के आरम्भ से ही अवैधानिक होता है । अतः व्यक्ति के बन्दी होते ही अपकृत्य पूर्ण हो जाता है।

 

द्वेषपूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution)

 

1. द्वेषपूर्ण अभियोजन में व्यक्ति की स्वतन्त्रता का कानूनी रूप से अतिक्रमण किया जाता है। इसमें न्यायिक प्रक्रिया के अन्तर्गत किन्तु द्वेषपूर्ण भाव से तथा युक्तियुक्त कारण के अभाव में व्यक्ति को जेल भिजवा दिया जाता है।

 

2. इसमें गिरफ्तारी न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) द्वारा करायी जाती है।

 

3. इसमें वादी को यह सिद्ध करना पड़ता है कि कानूनी प्रक्रिया को गतिमान करने के लिये प्रतिवादी के पास युक्तियुक्त आधार का अभाव था। दूसरे शब्दों में, प्रमाणित करने का भार वादी पर होता है।

 

4. इसमें द्वेषपूर्ण भावना को सिद्ध करना आवश्यक है ।

 

5. इसमें क्षति सिद्ध करना आवश्यक है।

 

6. यह एक स्वतः अभियोज्य अपकृत्य नहीं है। इसलिये इसमें वादी को क्षति सिद्ध करनी पड़ती है। इसके अलावा द्वेषपूर्ण अभियोज्य के अपकृत्य के लिये युक्तियुक्त एवं सम्भाव्य कारण का अभाव तथा प्रतिवादी की ओर से द्वेषभावना को भी सिद्ध करना पड़ता है।

 

उदाहरणार्थ- मिथ्या कारावास तथा द्वेषपूर्ण अभियोजन के अन्तर को लोक बनाम आस्टन, L. R. 1848 में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है कि "यदि वादी को बिना वारन्ट के गलत रूप से गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है और मजिस्ट्रेट उसको रिमान्ड के लिये जेल भेज देता है तो रिमान्ड से पहले के कार्य के लिये मिथ्या कारावास तथा रिमान्ड के बाद की कार्यवाही के लिये द्वेषपूर्ण अभियोजन का दावा किया जा सकता है।"

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