गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

मानहानि की परिभाषा दीजिये. अपलेख और अपवचन का क्या अर्थ है ? दोनों में अन्तर कीजिये।

 प्रश्न - मानहानि की परिभाषा दीजिये. अपलेख और अपवचन का क्या अर्थ है ? दोनों में अन्तर कीजिये। 

Define defamation. What is meant by Libel and Slander ? Distinguish between them.

Or

मानहानि के वाद में प्रतिवादी को कौन-कौन से बचाव उपलब्ध हैं ? इस कथन की व्याख्या कीजिये कि जितना अधिक सत्य कथन होगा उतना ही अधिक मानहानिजनक होगा।

What defences are available to the defendant in a suit for defamation? Explain the statement that the greater the truth the greater the libel.

 

उत्तर- मानहानि की परिभाषा ( Definition of Defamation ) विभिन्न विधिवेत्ताओं ने मानहानि को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है.

 

1. प्रो० विनफील्ड के अनुसार "जब किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में ऐसे कथन प्रकाशित किये जाते हैं जिससे वह व्यक्ति समाज के विवेकशील सदस्यों की दृष्टि में सामान्यतः गिर जाये, या जिसके कारण उससे लोग कतराने लगे तो ऐसे कथन को मान हानि कहा जाता है।'

 

2. डॉ० अण्डरहिल के अनुसार "मानहानि प्रतिष्ठा (Reputation) को कलंकित करने वाला ऐसा झूठा कथन है, जिसका प्रकाशन किया गया हो और इस कथन से वादी की प्रतिष्ठा को क्षति पहुँची हो तथा कथन को प्रकाशित करने का कोई कानूनी औचित्य न हो।"

 

3. सामण्ड के अनुसार - " मानहानि किसी अन्य व्यक्ति के बारे में बिना किसी कानूनी औचित्य (Legal Justification) के असत्य तथा मानहानिजनक कथन (Dafamatory Statement) का प्रकाशन होता है।"

 

उक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि जब किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में ऐसे कथन को शब्दों, लेखों, चित्रों या महत्वपूर्ण संकेतों (Signs) द्वारा प्रकाशित किया जाता है जिससे सम्बन्धित व्यक्ति के प्रति घृणा, उपहास (Ridicule) या अपमान का भाव पैदा हो जाता है तो ऐसे कथन या संकेत आदि को मानहानि कहा जाता है। उदाहरणार्थ- बालाराम ब० मुउसम्मपत लाल A. 1. R. 1975 में प्रतिवादी पर झूठे सौदे करने का इश्तिहार छपवाया। वादी ने प्रतिवादी तथा इश्तिहार के प्रकाशक के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का वाद दायर किया जिसमें यह कहा गया कि उस इश्तिहार से उसके व्यवसाय को नुकसान हुआ तथा वह लोगों की नजरों में गिर गया। निर्णय हुआ कि प्रतिवादी मानहानि के लिये उत्तरदायी है।

 

मानहानि के प्रकार (Kinds of Defamation) मानहानि दो प्रकार की होती है-

 

(i) अपलेख (Libel) तथा (ii) अपवचन (Slander) |

 

(i) अपलेख का अर्थ है लिखित मान हानि। इसके अन्तर्गत मान हानिकारक कथन का किसी स्थायी (Permanent) तथा दिखाई देने वाले रूप में प्रकाशन होता है, जैसे- लिखना, छापना, व्यंगचित्र, फोटो, सिनेमा फिल्म, कार्टून या पुतला आदि बनाना। अपलेख स्वतः अभियोज्य (Actionable Perse) होता है।

 

(ii) अपवचन का अर्थ है ऐसा कथन (Statement) जिससे किसी व्यक्ति का अपमान होता है। सामान्यतः अपवचन "मौखक शब्दों, संकेतों या अव्यक्त ध्वनियों द्वारा किया जाता है। अपवचन अस्थायी (Temporary) माध्यम से किया जाता है। अतः कहा जाता है कि अपवचन कानों (Ears) को सम्बोधित करता है और अपलेख नेत्रों (Eyes) को अपवचन सामान्यतः स्वतः अभियोज्य नहीं होता।

 

अपलेख और अपवचन में अन्तर (Difference between Libed and Slander) -

अपलेख (Libel)

 

1. अपलेख में स्थायी तथा लिखित रूप से मानहानि की जाती है, जिसको पढ़ा या देखा जा सकता है, जैसे लिखावट, व्यंग-चित्र, पेंटिंग्स, कार्टून, पुतला आदि ।

 

2. अपलेख आँखों को सम्बोधित करता है।

 

3. यह अपराध और अपकृत्य दोनों की श्रेणी में आता है। यदि अपलेख द्वारा बगावत, राजद्रोह या धर्म निन्दा होती है तो ये दण्डनीय अपराध माने जाते हैं ।

 

4. अपलेख प्रत्येक दशा में स्वतः अभियोज्य होता है अर्थात् इसके लिये वास्तविक क्षति को सिद्ध किया जाना आवश्यक नहीं होता ।

 

अपवचन (Slander)

 

1. अपवचन में अपमानजनक विषय अस्थायी रूप से प्रकाशित किया जाता है, जैसे मौखिक शब्द, हाव-भाव, संकेत आदि । ,

 

2. अपवचन कानों को सम्बोधित करता है ।

 

3. यह केवल दीवानी क्षति की श्रेणी में आता है। इसमें पीड़ित पक्ष अपनी क्षतिपूर्ति के लिये प्रतिवादी से हर्जाना प्राप्त कर सकता है, उसे दण्डित नहीं करा सकता ।

 

4. अपवचन कुछ अपवादित मामलों को छोड़कर, वास्तविक क्षति के सिद्ध किये बिना अभियोज्य (Actionable) नहीं होता ।

 

आवश्यक तत्व (Essential) मानहानि के बाद में वादी को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिये निम्नलिखित तत्वों को सिद्ध करना आवश्यक है-

1. कथन अपमानजनक होना चाहिये।

 

2. कथन का सम्बन्ध वादी से होना चाहिये।

 

3. कथन प्रकाशित होना चाहिये।

 

1. कथन अपमानजनक होना चाहिये (Statement must be defamatory) - मानहानि के मामले में क्षति प्राप्त करने हेतु वादी को सर्वप्रथम यह सिद्ध करना चाहिये कि प्रतिवादी का कथन अपमानजनक था कोई कथन वास्तव में अपमानजनक है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज के विवेकशील व्यक्ति उस कथन का क्या अर्थ लगाते हैं। यदि प्रतिवादी के कार्य से वादी के सम्मान को हानि होती है तो प्रतिवादी यह कहकर अपने को निर्दोष सिद्ध नहीं कर सकता कि वास्तव में उसका इरादा वादी की मानहानि करने का न था अर्थात् यदि प्रतिवादी किसी कथन का प्रकाशन असावधानीपूर्वक, भूल से या मजाक में करता है तो यह कोई बचाव न होगा। मारीसन ब० रिची एण्ड कं०, 1936 में प्रतिवादी ने एक झूठे कथन को सही मानते हुये यह प्रकाशित किया कि श्रीमती मारीसन के जुड़वाँ बच्चे पैदा हुये हैं। वास्तव में वादी की शादी को अभी दो महीने ही हुए थे। प्रतिवादीगण को इस तथ्य का ज्ञान नहीं था। निर्णय हुआ कि प्रतिवादीगण उत्तरदायी हैं क्योंकि उन्होंने कथन की सच्चाई की जाँच किये बिना ही असावधानीपूर्वक उक्त कथन का प्रकाशन किया था।

 

कथन के प्रकार - सामण्ड के अनुसार कथन दो प्रकार के होते हैं- (i) प्रथम दृष्टय मानहानिजनक (Defamatory) तथा (i) प्रथम दृष्टया निर्दोष (Innocent)।

 

पहले प्रकार के कथन मानहानिजनक होते हैं तथा स्वतः अभियोज्य (Actionable per se) होते हैं जब तक कि वह कथन किसी अपवाद की श्रेणी में हो न आ जाये, जैसे अ, ब से कहता है कि स चोर है। यदि स वास्तव में सिद्ध चोर नहीं है। तो यह प्रथम दृष्टया मानहानि जनक है। इसके विपरीत दूसरे प्रकार के कथन प्रथम दृष्टया निर्दोष मालूम होते हैं किन्तु उनका अर्थ परिस्थितियों के सन्दर्भ में मानहानिजनक बन जाता है। ऐसे कथन को 'वक्रोक्ति या व्यंगात्मक कथन ( Innuendo) कहा जाता है, जैसे अ, ब के बारे में स से कहता है कि 'व वैसा ही है जैसा उसका पिता'। यदि पिता चोर हो तो इन शब्दों का अर्थ यह होगा कि व भी चोर है। यदि 'व' सिद्ध चोर नहीं है तो यह कथन मानहानिजनक होगा भले ही ऊपर से देखने में कथन निर्दोष मालूम होता है। इसी प्रकार जहाँ 'अ' 'ब' के बारे में यह कथन करता है कि "ब' एक साधु है' और यदि उसका संकेत यह है कि 'ब' साधुओं के एक ऐसे ग्रुप का सदस्य है जो तश्करी करते हैं तो कथन निर्दोष होते हुए भी मानहानिजनक है।

 

2. कथन का सम्बन्ध वादी से होना चाहिये (Statement must refer to plaintiff) मानहानि के बाद में वादी को यह सिद्ध करना भी आवश्यक है कि प्रतिवादी के कथन का सम्बन्ध स्पष्ट या अस्पष्ट रूप से वादी से था, भले ही प्रतिवादी का ऐसा इरादा न हो। उदाहरणार्थ- ई० हल्टन एण्ड कं० ब० जोन्स, 1910 A. C. 20 में प्रतिवादी ने अपने समाचार पत्र में डिप्पी मोटर मेले के बारे में एक हास्य लेख प्रकाशित किया। आर्टिमस जोन्स नामक एक काल्पनिक व्यक्ति को पोखम चर्च का वार्डन बताते हुए उस पर यह आरोप लगाया कि फ्रांस की एक अध्यापिका के साथ उसके नाजायज सम्बन्ध थे। किन्तु दैवयोग से आर्टिमस जोन्स नाम का एक बैरिस्टर था जिसने न तो डिप्पि मेले में भाग लिया था और न ही वह चर्च का वार्डन था। एक पत्रकार ने बैरिस्टर से इस लेख के बारे में पूछताछ की। बैरिस्टर ने समाचार-पत्र के मालिक पर मानहानि का वाद दायर करते हुये कहा कि उसके मित्रों ने उस लेख को वादी के बारे में ही समझा था। हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने निर्णय दिया कि प्रतिवादी क्षतिपूर्ति के लिये उत्तरदायी है।

 

3. कथन प्रकाशित होना चाहिये (Statement must be published) – प्रकाशन से तात्पर्य है मानहानिजनक कथन से वादी के अलावा अन्य व्यक्तियों को अवगत कराना। अतःयदि प्रतिवादी एक मानहानिजनक कथन को बन्द लिफाफे में रखकर वादी को रजिस्ट्री कर देता है तो वह प्रकाशन नहीं कहलाता। ऐसे कथन से वादी के आत्म-सम्मान को क्षति हो सकती है। किन्तु उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नहीं। इस प्रकार यदि अ एक बन्द कमरे में ब को बुरा-भला कहता है जिसे कोई अन्य व्यक्ति नहीं सुन सकता तो वह प्रकाशन नहीं माना जायेगा।

 

मानहानि के प्रतिवाद (Defences of Defamation) - मानहानि के वाद में प्रतिवादी अपने बचाव में निम्नलिखित दलीलें पेश कर सकता है-

 

1. सत्य का औचित्य (Justification of Truth) यदि प्रतिवादी यह सिद्ध कर दे कि मानहानिजनक कथन सत्य था तो ऐसे कथन के प्रकाशन के लिये कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। चोर को चोर कहना कोई मानहानि नहीं है। यदि कथन सत्य है तो भले ही उसे प्रकाशित करने में प्रतिवादी का आचरण कितना ही दुर्भावनापूर्ण क्यों न रहा हो, फिर भी प्रतिवादी इस अपवाद का सहारा ले सकता है। साथ ही प्रतिवादी के लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह यह सिद्ध करे कि अपमानकारी विषय-वस्तु का प्रत्येक शब्द सत्य है, यदि कथन सारवान रूप से सही है तो भी वह दायित्व से मुक्त हो जायेगा। उदाहरणार्थ - एलेक्जेण्डर ब० एन० ई० रेलवे, 1865 में प्रतिवादी ने रेलवे स्टेशनों पर एक नोटिस प्रकाशित किया जिसमें वादी के बारे में यह कहा गया था कि उसे रेल पर बिना टिकट यात्रा के जुर्म में पौंड का दण्ड दिया गया और अदा न करने पर 3 सप्ताह की सजा भुगतने का आदेश दिया गया। वास्तव में दण्ड न चुकाने पर केवल 2 सप्ताह की सजा का ही आदेश था। निर्णय हुआ कि सत्य का प्रतिवाद सारतः सत्य है।

 

2. निष्पक्ष तथा न्यायोचित आलोचना (Fair and bonafied comment) – प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक हित के प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त करे बशर्ते कि आलोचना निष्पक्ष तथा सद्भावनापूर्ण हो। उचित आलोचना के लिये आवश्यक है कि प्रतिवादी दो बातें सिद्ध करें- (i) यह कि आलोचना सही तथ्यों पर आधारित तथा दुर्भावना रहित है, (ii) यह कि आलोचना सार्वजनिक हित, जैसे कला, शिक्षा, न्याय एवं प्रशासन आदि से सम्बन्धित है। किन्तु इस प्रकार की आलोचना-

1. किसी विषय के बारे में मत का प्रकाशन होना चाहिये तथ्य का नहीं।

2. न्यायोचित होनी चाहिये।

3. दुर्भावना रहित होनी चाहिये।

4. सार्वजनिक हित (Public Interest) में होनी चाहिये।

 

उदाहरणार्थ- -अ कहता है कि मुझे इस बात का आश्चर्य नहीं है कि व की पुस्तक मूर्खतापूर्ण और अशिष्टतापूर्ण है क्योंकि वह एक दुर्बल और लम्पट व्यक्ति है। अ इस अपवाद के अन्तर्गत नहीं है क्योंकि वह जो मत व के चरित्र के बारे में प्रकट करता है, ऐसा मत है जो ब की पुस्तक पर आधारित नहीं है। अतः अ न्यायोचित आलोचना का बचाव नहीं ले सकता। उसे अपने कथन की सत्यता प्रकाशित करनी पड़ेगी।

 

3. विशेषाधिकृत कथन (Frivileged Statements) विशेषाधिकार कथन या सन्देश (Communication) से तात्पर्य ऐसे कथन से है जो किसी विशेष अवसर पर दिया जाता है। कुछ अवसर ऐसे होते हैं जो कानून की दृष्टि में विशेष अवसर समझे जाते हैं और इन अवसरों पर भी किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में मानहानिजनक कथन के लिये कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है चाहे कथन कितना भी असत्य अतिश्योक्तिपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण (Malicious) क्यों न हो। वह विशेषाधिकार सार्वजनिक हित के सिद्धान्त पर आधारित है। यह दो प्रकार का होता है-

 

(अ) पूर्ण विशेषाधिकार तथा (ब) सीमित विशेषाधिकार ।

 

(अ) पूर्ण विशेषाधिकार (Absolute Privilege) - पूर्ण विशेषाधिकार निम्नलिखित मामलों में प्राप्त होता है-

 

1. संसदीय कार्यवाहियाँ (Parliamentary Proceedings) - संसद सदस्यों और विधायकों को सदन के अन्दर कुछ भी कहने का अधिकार है, भले ही उससे किसी व्यक्ति की कितनी ही हानि क्यों न हो। संविधान के अनुच्छेद 105 के अनुसार संसद भवन में संसद सदस्यों को भाषण देने और अपने विचारों को व्यक्त करने का पूर्ण अधिकार है। संसद में कहे गए कथन विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है, भले ही वे किसी के प्रति मान हानिकारक हो या द्वेषपूर्ण भाव से कहे गये हों। किन्तु यदि ऐसा कथन सदन की सीमा के बाहर कहा गया हो तो विशेष अधिकार का लाभ नहीं मिलेगा।

 

2. न्यायिक कार्यवाहियाँ (Judicial Proceedings) - किसी न्यायिक कार्यवाही के दौरान न्यायालय के सामने किसी जज, वकील, गवाह या मुकदमे के पक्ष द्वारा कहे गये कथन या लेख के विरुद्ध मानहानि की कार्यवाही नहीं की जा सकती, भले ही वह कथन किसी औचित्य के बिना दिया गया हो या द्वेषभाव या व्यक्तिगत बैर भाव के कारण दिया गया हो उन्मुक्ति का यह आधार लोकनीति है। उदाहरणार्थ-जगतमोहन नाथ राय देव व० कालीचन्द घोष T. L. R. Patna, 371 में एक वकील ने अपने पक्ष की ओर से बहस करते हुये विपक्षी को झूठा, मक्कार, और जालसाज कहा। वकील का यह कथन निराधार और द्वेषपूर्ण था। निर्णय हुआ कि चूंकि यह कथन न्यायिक कार्यवाही के दौरान कहा गया था अतः वकील के विरुद्ध दावा नहीं लाया जा सकता।

 

3. सेना तथा नौसेना सम्बन्धी कार्यवाहियाँ (Military and Naval Proceedings) सेना तथा नौसेना सम्बन्धी अधिकारों तथा कर्तव्यों के पालन में कहे गये। कथनों को भी विशेषाधिकार प्राप्त हैं।

 

4. राज्य की कार्यवाहियाँ (State Proceedings) राज्य के मामलों के सम्बन्धों में दी गई सूचनायें (Informations) जो एक अधिकारी द्वारा दूसरे को दी जाती है, सार्वजनिक नीति पर आधारित होती हैं। वे भी पूर्ण अधिकार के अन्तर्गत आती हैं, किन्तु यह आवश्यक है कि इस प्रकार के सन्देश या सूचनायें कर्मचारियों द्वारा अपने कर्त्तव्य पालन के दौरान दी गई हों।

 

(ब) सीमित विशेषाधिकार (Qualified Privileges) - सीमित विशेषाधिकार का अर्थ ऐसे विशेषाधिकार से है जिसके अन्तर्गत किन्हीं विशेष परिस्थितियों में कहे गये अपशब्दों के लिये अपशब्दों का कहने वाला तब तक उत्तरदायी नहीं होता जब तक कि वादी यह सिद्ध नहीं कर देता कि अपशब्द द्वेषभाव से प्रेरित होकर कहे गये थे। सीमित विशेषाधिकार का बचाव निम्नलिखित परिस्थितियों में प्राप्त होता है—

 

(i) कर्त्तव्य पालन में भेजे गये सन्देश (Communication made in performance (of duty) कर्तव्य पालन में भेजी गई सूचनायें सीमित विशेषाधिकार के अन्तर्गत आती हैं भले ही कर्त्तव्य कानूनी, नैतिक या सामाजिक किसी भी प्रकार का हो। उदाहरणार्थ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अपराध की जाँच के सम्बन्ध में रिपोर्ट भेजना, पिता द्वारा अपनी पुत्री को उसके भावी पति के बारे में सूचना देना, किसी मकान मालिक द्वारा मेहमान को अपने नौकर की चोरी की आदत के बारे में सावधान करना आदि।

 

(ii) किसी के हित की रक्षा हेतु कहे गये कथन (Statements made in protection of the interest of some person) किसी व्यक्ति के कानूनी हित की रक्षा के लिये कहे गये कथन जिनसे किसी अन्य व्यक्ति की मानहानि होती है, सीमित रूप से उन्मुक्त कहे जाते हैं। उदाहरणार्थ- एक स्वामी द्वारा अपने नौकर को उसके बुरे साथियों से सावधान करना तथा साझेदारों के पारस्परिक सन्देश इस विशेषाधिकार की श्रेणी में आते हैं।

 

5. निष्पक्ष तथा सही रिपोर्ट (Fair reports of proceedings) - न्यायिक, अर्ध-न्यायिक संसद तथा विधान सभाओं की कार्यवाहियों की यदि निष्पक्ष एवं सही रिपोर्ट प्रकाशित की जाये तो वह सीमित विशेषाधिकार की श्रेणी में आयेगी।

 

(i) न्यायिक कार्यवाहियों का प्रकाशन (Publication of Judicial Proceedings) - यदि न्यायिक कार्यवाहियों का उचित एवं सही विवरण का प्रकाशन किया जाता है तो वह सीमित विशेषाधिकार की श्रेणी में आता है किन्तु उसके साथ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की जानी चाहिये।

 

(ii) संसद और विधान सभाओं की कार्यवाहियों का प्रकाशन (Publication of proceedings of parliament and legislative assemblies) - संसद के दोनों सदनों और राज्य की विधान सभाओं में उठने वाले वाद-विवादों तथा अन्य कार्यवाहियों का प्रकाशन भी इस अधिकार के अन्तर्गत क्षमायोग्य है।

 

(iii) अर्ध-न्यायिक कार्यवाहियों का प्रकाशन (Publication of Quasi Judicial Proceedings) – स्थानीय संस्थाओं और न्याधिकरण (Tribunals) तथा अन्य संगठनों के... भाषण एवं कार्यवाहियों का प्रकाशन भी इस उन्मुक्ति के अन्तर्गत आता है।

 

4. क्षमायाचना (Apology) - मानहानि के मामले में क्षमायाचना करना एक अच्छा बचाव है। यह बचाव समाचार-पत्रों तथा अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित अपलेख (Libel) के मामले में प्राप्त होता है। प्रकाशक को आरम्भ में ही क्षमा माँग लेनी चाहिये। प्रतिवादी को मानहानि के मामले में यह सिद्ध करना चाहिये कि उसने अपने कार्य में कोई द्वेष (Malice) या असावधानी नहीं बरती।

 

जितना अधिक सत्य कथन होगा उतना ही अधिक वह मानहानिजनक होगा (The greater the truth the greater the lihel) - प्रस्तुत कथन का सार यह है कि मानहानि एक दीवानी एवं आपराधिक कृत्य है। सत्य का बचाव यद्यपि दीवानी की कार्यवाही में पूर्णत: मान्य है। परन्तु आपराधिक कार्यवाही में सत्य कथन कोई बचाव नहीं है क्योंकि सत्य कथन से कभी-कभी हिंसा भड़कने का भय रहता है अतः आपराधिक मामलों में जितना अधिक सत्य कहा जाता है उतना ही वह अपलेख (Libel) की श्रेणी में आता है और आपराधिक कार्यवाहियों में प्रतिवादी को सत्य के आधार पर क्षमा नहीं किया जा सकता।

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