अपकृत्य की कार्यवाही में उपलब्ध विभिन्न उपचारों का वर्णन कीजिये।
Discuss the various remedies available in an action for tort.
उत्तर- सामण्ड के अनुसार, अपकृत्य की कार्यवाही में वादी को दो प्रकार के उपाय उपलब्ध हैं- (अ) न्यायिक उपाय और (ब) न्यायेत्तर उपाय. अपकृत्य में प्राप्त विभिन्न उपायों को निम्नलिखित सारणी द्वारा प्रकट किया जा सकता है-
उपाय
(अ)
न्यायिक
(ब)
न्यायेत्तर
(1)
क्षतिपूर्ति - (i) तिरष्कारात्मक (ii) नाममात्र (iii) वास्तविक (iv) उदाहरणात्मक
(2)
व्यादेश - (i) अस्थायी (ii) स्थायी (iii) निषेधात्मक (iv) आज्ञापक
(4)
सम्पत्ति की पुनः प्राप्ति - (i) आत्मरक्षा (ii) भूमि पर पुन: प्रवेश (iii) अतिचारी
का निष्कासन (iv) सम्पत्ति का पुनर्ग्रहण (v) बाधा का उपशमन (vi) अभिहरण क्षतिकर्त्ता
(अ)
न्यायिक उपचार (Judicial Remedies) न्यायिक उपचार वे उपचार हैं जो कि अपकृत्य की परिभाषा
से ही प्रकट हैं कि अपकृत्य एक दीवानी क्षति है जिसका मुख्य उपाय क्षतिपूर्ति के लिये
वाद दायर करना है। अपकृत्य विधि का मुख्य उद्देश्य यह है कि क्षतिग्रस्त व्यक्ति को
नुकसान का मुआवजा दिलाकर उसी स्थिति में पहुँचाया जाये जिससे वह नुकसान के ठीक पहले
था ताकि उसे आर्थिक सन्तोष मिल जाये। अपकृत्य के मामलों में क्षतिपूर्ति सदैव अनिर्धारित
होती है, भले ही दावा किसी अनिश्चित रकम के लिये किया गया हो।
क्षतिपूर्ति
छः प्रकार की होती है- 1. अवमानात्मक क्षतिपूर्ति 2. नाममात्र की क्षतिपूर्ति 3. वास्तविक
क्षतिपूर्ति 4. प्रत्याशित या चालू क्षतिपूर्ति, 5. उदाहरणात्मक या दण्डात्मक क्षतिपूर्ति
(6.) सामान्य और विशेष क्षतिपूर्ति. सामान्य क्षतिपूर्ति प्रतिवादी के कार्यों का स्वाभाविक
परिणाम होती है जिसकी कल्पना कानून द्वारा स्वतः ही की जाती है। विशेष क्षति वह क्षति
होती है जो किसी ! व्यक्ति को विशेष रूप से पहुँची हो जिसमें उसकी व्यक्तिगत परिस्थितियाँ
अन्तर्निहित होती है। विशेष क्षति तब तक कानून द्वारा मान्य नहीं होती जब तक कि वह
न्यायालय के सामने वादी द्वारा सिद्ध न कर दी जाये। उदाहरणार्थ-यदि वादी ने मिथ्या
बन्दीकरण के कारण हुई चोट के लिये चिकित्सा में खर्च किया या वकील को फीस दी है या
कुछ दिन तक दुकान बन्द रहने के कारण हानि सहन की है तो उसे बन्दीकरण से यह विशेष क्षति
पहुँची है जो बात स्पष्ट रूप से कही जानी चाहिये अन्यथा उसे मुआवजा प्राप्त नहीं होगा।
2.
व्यादेश (Injunction ) - व्यादेश या निषेधाज्ञा न्यायालय के विवेक पर आधारित उपचार
है, इसे अधिकार के रूप में प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह चार प्रकार का होता है-
(i)
अस्थायी (Temporary) अस्थाई व्यादेश किसी वाद के आरम्भ या बीच में एक निश्चित समय के
लिये दिया जाता है अर्थात् जब तक मुकदमे की सुनवाई गुण-दोष के आधार पर अन्तिम रूप से
न हो जाये।
(ii)
स्थायी व्यादेश (Permanent Injunction) स्थायी व्यादेश मुकदमे की अन्तिम रूप से सुनवाई
होने के बाद किया जाता है। इसके द्वारा न्यायालय प्रतिवादी को किसी कार्य को करने से
स्थायी रूप से रोक देता है।
(iii)
प्रतिषेधात्मक व्यादेश (Prohibitory In anction) जब न्यायालय प्रतिवादी को किसी कार्य
को करने या दोहराने से मना करता है तो उसे प्रतिषेधात्मक व्यादेश कहते हैं।
(iv)
आज्ञापालक व्यादेश (Mandatory Injuciton) - आज्ञापालक व्यादेश द्वारा न्यायालय प्रतिवादी
को किसी कानूनी कार्य को करने की आज्ञा देता है।
3.
सम्पत्ति की पुनः प्राप्ति (Re-caption of Goods) अपकृत्य का तीसरा न्यायिक उपचार सम्पत्ति
को पुनः प्राप्त करना है। जब कोई व्यक्ति अचल या चल सम्पत्ति से गैर कानूनी ढंग से
बेदखल कर दिया जाता है तो उसे अपनी चल या अचल सम्पत्ति को प्राप्त करने का अधिकार है।
यह अधिकार भारत में विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 9 व 10 में वर्णित है।
उक्त
वर्णित उपायों के अलावा अपकृत्य के दो कानूनी उपचार और हैं-
(i)
स्वामित्व की घोषणा (Declaration of Title) - जब प्रतिवादी के कार्य से वादी की चल
या अचल सम्पत्ति को वास्तविक क्षति तो नहीं होती किन्तु होने का मात्र भय होता है तो
वह अपनी चल या अचल सम्पत्ति के स्वामित्व की घोषणा के लिये न्यायालय में वाद दायर कर
सकता है
(ii)
परमादेश (Mandamus) जब कोई सरकारी अधिकारी अपने किसी कानूनी कर्तव्य को भंग करके वादी
को क्षति पहुंचाता है तो वह उसके खिलाफ परमादेश की कार्यवाही कर सकता है। न्यायालय
ऐसे पदाधिकारी को परमादेश जारी करके उसे कानूनी कर्त्तव्य पूरा करने के लिये बाध्य
कर सकता है।
(ब)
न्यायेत्तर उपचार (Extra-judicial remedies) न्यायातिरिक्त (न्यायेत्तर उपाय वे उपाय
हैं जो पीड़ित व्यक्ति द्वारा आत्म-रक्षा के सिद्धान्त के आधार पर स्वयं अपनाये जाते
हैं। इन उपायों का प्रयोग पीड़ित व्यक्ति न्यायालय की सहायता के बिना स्वयं कर सकता
है। इन उपायों को कानूनी मान्यता प्राप्त है। इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से छः उपाय शामिल
हैं-
(i)
आत्म-रक्षा (Self Defence) प्रत्येक व्यक्ति को अपने खिलाफ अवैध बल प्रयोग से अपनी
रक्षा करने हेतु युक्तियुक्त बल प्रयोग करने का अधिकार है। किन्तु शर्त यह है कि आत्म-रक्षा
में प्रयोग किया गया बल क्षति के अनुपात से अधिक नहीं होना चाहिये अन्यथा बल प्रयोग
अयुक्तियुक्त माना जायेगा।
(ii)
भूमि पर पुनः प्रवेश (Re-entry on Land) यदि किसी व्यक्ति को उसकी भूमि मकान या दुकान
आदि से गैरगानूनी ढंग से बेदखल कर दिया गया है तो वह व्यक्ति पुनः अपनी भूमि पर कब्जा
करने का अधिकारी है। इसके लिये वह आवश्यक बल प्रयोग भी कर सकता है। किन्तु शर्त यह
है कि ऐसा शान्तिपूर्वक तरीके से ही किया जाना चाहिये हिंसात्मक रूप से नहीं।
(iii)
अतिचारी का निष्कासन (Expulsion of Trespasser) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भूमि से अनाधिकार
प्रवेश करने वालों को बाहर निकालने का अधिकार है। इस कार्य में वह आवश्यक बल प्रयोग
कर सकता है। किन्तु शर्त यह है कि बल का प्रयोग परिस्थितियों के अनुसार युक्तियुक्त
तथा सीमा के अन्तर्गत ही होना चाहिये। बल प्रयोग करने से पहले अतिचारी को भूमि से हटने
के लिये कहना चाहिये तथा उसे हटने का मौका भी देना चाहिये। इस अधिकार का प्रयोग अतिचारी
के भूमि पर प्रवेश के पहले या बाद, दोनों ही अवस्थाओं में किया जा सकता है.
(iv)
सम्पत्ति का पुनर्ग्रहण (Re-caption of Goods) - यदि किसी व्यक्ति की सम्पत्ति को किसी
अन्य व्यक्ति ने अवैधानिक तरीके से छीन लिया है या जब्त कर लिया है तो वह शान्तिपूवर्तक
तरीके से उचित बल प्रयोग द्वारा अपने कब्जे की रक्षा कर सकता है या अपनी सम्पत्ति को
वापस ले सकता है। इस प्रकार यदि सम्पत्ति को पुनः प्राप्त करने में कोई क्षति होती
है तो वह उसके लिये उत्तरदायी नहीं होगा।
(v)
बाधा का उपशमन (Abatement of Nuisance) यदि किसी व्यक्ति की भूमि पर किसी प्रकार की
बाधा उत्पन्न हो जाती है तो भूमि के स्वामी को उस बांधा को खत्म करने का अधिकार है।
उदाहरणार्थ- एक भूमि का स्वामी अपनी भूमि पर अपने पड़ोसी की लटकती हुई डालियों को काट
सकता है। वह उन जड़ों को भी काट सकता है जो उसकी भूमि में पहुँच गई हैं। वह ऐसा करने
के लिये अपने पड़ोसी की भूमि पर प्रवेश कर सकता है किन्तु शर्त यह है कि उसे पहले इस
आशय की सूचना पड़ौसी को देनी होगी।
(vi)
अभिहरण क्षतिकर्त्ता (Distress Damage Feasant) यदि किसी व्यक्ति की भूमि पर किसी अन्य
व्यक्ति की वस्तुयें या पशु अनाधिकृत रूप से चले आते हैं तथा हानि पहुँचाते हैं तो
भूमि के स्वामी को उन वस्तुओं या पशुओं को उस समय तक रोके रहने का अधिकार है जब तक
की पशुओं का स्वामी उसकी हानि की पूर्ति न कर दे। किन्तु उसे पशुओं के बेचने का हक
नहीं है। भारत में पशुओं को रोकने सम्बन्धी मामले पशु अतिचार अधिनियम, 1871
(Cattle Trespass Act, 1871) के अन्तर्गत आते हैं।
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