कठोर या पूर्ण दायित्व के सिद्धान्त को पूरी तरह समझाइये।
Discuss fully the Rule of
Absolute or Strict Liability.
or
राइलैण्ड्स
बनाम फ्लेचर में प्रतिपादित सिद्धान्त की व्याख्या कीजिये क्या इस सिद्धान्त के कोई
अपवाद हैं?
Explain
the rule laid down in Rylands Vs. Fletcher. Are there any exceptions to this rule? Discuss.
उत्तर-
कठोर या पूर्ण दायित्व का नियम (Rule of Strict Liability) असावधानी के दायित्व के
सम्बन्ध में सामान्य नियम यह है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा सावधानी व सतर्कता बरतने
पर भी उसके कार्य से वादी को हानि पहुंचती है, तो वह हानि के लिये तब तक उत्तरदायी
नहीं माना जाता जब तक कि यह सिद्ध न हो जाये कि उसने जानबूझकर ( Knowingly ) उस व्यक्ति
को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से ऐसा किया है। इस नियम के कुछ अपवाद हैं। असावधानी
के सन्दर्भ में कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति अपने कार्यों द्वारा होने वाली क्षति
के लिये प्रत्येक स्थिति में दायी माना जायेगा भले ही क्षति उसकी असावधानी के कारण
न भी हुई हो और चाहे उसने वह कार्य क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से न भी किया हो। ऐसे
कार्य को हम कठोर या पूर्णदायित्व (Absolute Liability) कहते हैं। पूर्ण दायित्व का
अपकृत्य पूर्ण कर्त्तव्य के उल्लंघन से उत्पन्न होता है। लेविस के मतानुसार, पूर्ण
दायित्व वाले अपकृत्य निम्नलिखित है-
1.
अपनी भूमि पर खतरनाक (Dangerons) वस्तुओं के लाने से सम्बन्धित दायित्व अर्थात् रेलेण्ड
बनाम फ्लेचर का नियम
2.
खतरनाक पशुओं के लिये दायित्व ।
3.
खतरनाक निर्माणों एवं स्थानों के लिये दायित्व |
4.
खतरनाक वस्तुओं के लिये दायित्व ।
रेलैण्ड
बनाम फ्लेचर का नियम (Rule of Rylands Vs. Fletcher) - प्रस्तुत वाद में हाउस ऑफ लाईस
ने 1886 में यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि यदि कोई व्यक्ति अपने ही उद्देश्य के
लिये अपनी ही भूमि पर कोई ऐसी वस्तु लाता है या रखता है, जो वहाँ से पलायन
(Escape) करने पर शरारत कर सकती है वह दूसरों को होने वाली क्षति के लिये प्रथम दृष्टया (Prima Fucic) उत्तरदायी होगा, चाहे उसे रखने में उसने कोई भी असावधानी
न बरती हो।
वाद
के तथ्य ( Facts of the Case) प्रतिवादों ने अपनी भूमि पर एक जलाशय बनवाने के लिये
कुछ स्वतन्त्र ठेकेदारों को नियोजित किया। जलाशय की खुदाई के समय ठेकेदारों को कुछ
पुरानी सुरंगे प्रतिवादी को भूमि पर दिखाई पड़ीं वे सुरंगे मिट्टी से बन्द हुई दिखाई
देती थीं। अतः ठेकेदारों ने उन्हें फिर से बन्द नहीं किया। वास्तव में इन सुरंगों का
सम्बन्ध वादी की खानों से था जब जलाशय में पानी भरा गया तो पानी सुरंगों में से बहकर
वादी की खानों में भर गया। वादी ने प्रतिवादी के खिलाफ हानिपूर्ति का दावा किया हाउस
ऑफ लाईस ने यह निर्णय दिया कि वादी हानिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी है। लार्ड ब्लैकबर्न
ने निर्णय देते हुये कहा कि-
"कानून
का सही नियम यह है कि जो व्यक्ति अपने उद्देश्य के लिये अपनी भूमि पर कोई ऐसी वस्तु
लाता है या एकत्र (Collect) करता है या रखता (Keep) है, जो यदि उसके कब्जे से छूट जाये
तो वह अन्य व्यक्तियों को हानि पहुँचा सकती है, तो वह वस्तु को अपने उत्तरदायित्व पर
रखता है और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो प्रथम दृष्टया वही उस समस्त हानि के लिये उत्तरदायी
होगा जो उस वस्तु के पलायन का स्वाभाविक परिणाम होती है।
विधि
के प्रतिपादित सिद्धान्त (Principles of Law Laid Down)-
1.
यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि पर कोई ऐसी वस्तु लाता है, इकट्ठा करता है और रखता है जो
यदि छूट जाये तो शरारत कर सकती है तो उसे वह अपने जोखिम पर रखनी चाहिये। यदि वह ऐसा
नहीं करता तो वह प्रथम दृष्टया ऐसी सभी क्षति के लिये दायी होता है जो वस्तु के पलायन
का स्वाभाविक परिणाम हो।
2.
ऐसी वस्तु के पलायन से पड़ौसी को क्षति से बचाने का पूर्ण दायित्व (Absolute
Liability) प्रतिवादी का है जिससे बचने के लिये उसे यह दिखाना आवश्यक है कि (i) पलायन
स्वयं वादी की गलती के कारण हुआ था या (ii) सम्भवतः दैवी कार्य या दैवी प्रकोप के कारण
हुआ था।
पूर्ण
दायित्व की आवश्यक शर्ते (Essentials of Aboslute Liability) - पूर्ण दायित्व को लागू
करने की निम्नलिखित दो आवश्यक शर्तें हैं-
(अ)
वस्तु का पलायन (Escape of the thing) - प्रतिवादी की भूमि से वस्तु का पलायन होना
आवश्यक 1 पलायन से तात्पर्य वस्तु का उस स्थान या भूमि से निकलना है जो उसके नियन्त्रण
के बाहर हो।
(ब)
भूमि का अप्राकृतिक प्रयोग (Unnatural use of the Land) किसी भी व्यक्ति द्वारा अपनी
भूमि का प्रयोग सार्वजनिक हित को दृष्टि में रखते हुये कानूनी ढंग से किया जाना चाहिये
अन्यथा प्रयोग अप्राकृतिक माना जायेगा।
सिद्धान्त
के अपवाद (Exceptions to the rule) - यह नियम निम्नलिखित अवस्थाओं में लागू नहीं होता-
1.
भूमि पर प्राकृतिक रूप में रहने वाली वस्तुओं से हुई क्षति - यदि वस्तुयें प्राकृतिक
रूप से किसी की भूमि पर हैं या पैदा हो जाती हैं, भले ही वे खतरनाक हों तो उनके पलायन
से हुई क्षति के लिये पूर्ण दायित्व नहीं होता। उदाहरणार्थ- एक किसान के खेत में प्राकृतिक
रूप से गोखरू उत्पन्न होते हैं जो हवा में उड़कर पड़ौसी की भूमि पर पहुँच जाते हैं।
इसके लिये क्षतिपूर्ति की कार्यवाही नहीं की जा सकती।
2.
दैवी कृत्य (Act of God) - सामण्ड के अनुसार, "ईश्वरीय नृत्य के अन्तर्गत वे घटना
आती हैं जिन्हें मनुष्य युक्तियुक्त सावधानी बरतकर भी नहीं रोक सकता है। ऐसी घटनायें
प्राकृतिक क्रियाओं का परिणाम होती हैं जिनका मनुष्य की क्रियाओं से कोई सम्बन्ध नहीं
होता।" दूसरे शब्दों में देवी कृत्य जैसे बाढ़, भूकम्प, ओलों व वर्षा आदि का आना
प्राकृतिक कार्यों का परिणाम हैं, जिनके घटने की मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता और
न ही उन्हें रोक सकता। ऐसे कार्यों के फलस्वरूप हानि होने पर किसी के विरुद्ध अपकृत्य
का दायित्व उत्पन्न नहीं होता। निकोलस ब० मार्सलैण्ड (1875) में प्रतिवादी की भूमि
पर कुछ कृत्रिम झीलें बन गई थी जिनमें पानी किसी ऊपर के स्रोत से आता था। एक वर्ष स्काटलैंड
में असाधारण वर्षा हुई जिसके कारण झील के किनारे टूट गये और तेज जलधारा से वादी की
4 पुलियाँ वह गई। क्षतिपूर्ति के बाद में निर्णय हुआ कि वादी उत्तरदायी नहीं है क्योंकि
उक्त घटना एक दैवी घटना थी जिसकी पूर्व धारणा प्रतिवादी नहीं कर सकता था।
3.
अजनबी के कार्य (Acts of Stranger ) यदि क्षति किसी अजनवी व्यक्ति के कार्य का परिणाम
है तो यह नियम लागू नहीं होता। वोक्स व जुए 1879 में प्रतिवादी एक तालाब का मालिक था।
तालाब से अधिक पानी निकलने के लिये एक नाली बनी थी। एक अजनबी ने उस नाली को रोक दिया
जिसके फलस्वरूप पानी वह निकला और वादी को क्षति पहुँची। निर्णय हुआ कि प्रतिवादी अन्य
अतिचारी (Trespasser) के कार्य के लिये दायी नहीं है।
4.
सामान्य हित के कार्य (Acts of Common Benefit) यदि खतरनाक वस्तु प्रतिवादी की भूमि
पर वादी व प्रतिवादी दोनों के सामान्य लाभ के लिये लाई गई है तो ऐसी वस्तु के पलायन
से हुई हानि के लिये प्रतिवादी उत्तरदायी नहीं होगा, बशर्ते कि प्रतिवादी की ओर से
असावधानी न बरती गई हो। उदाहरणार्थ- कारटेल टेलर, 1871 में वादी एक मकान के नीचे के
भाग में तथा प्रतिवादी उसी मकान के ऊपर के भाग में रहता था। छत से पानी एक पाइप
"द्वारा नीचे आकर टैंक में जमा होता था और वहाँ से एक दूसरे पाइप के द्वारा नाली
से बाहर निकल जाता था। कुछ चूहों ने टैंक में छेद कर दिया जिससे पानी टपकने लगा और
वादी के सामान को क्षति पहुँची। निर्णय हुआ कि वादी प्रतिवादी से क्षति प्राप्त नहीं
कर सकता क्योंकि दोनों ही आपसी सहमति से मकान में रह रहे थे और साथ ही प्रतिवादी का
चूहों पर कोई नियन्त्रण भी न था।
5.
वादी की सहमति (Consent of the Plaintiff) यदि वादी खतरे की वस्तुओं को प्रतिवादी की
भूमि पर रखे जाने के लिये सहमत था तो ऐसी वस्तु के छूट जाने से हुई क्षति के लिये प्रतिवादी
उत्तरदायी नहीं होगा।
6.
वादी की गलती (Default of the Plaintiff) यदि वादी को हानि स्वयं उसकी गलती के कारण
हुई है तो वह उसके लिये प्रतिवादी को दोषी नहीं ठहरा सकता। उदाहरणार्थ- पोटिंग ब० क्सिनन,
1894 में वादी के घोड़े ने प्रतिवादी की दीवार के पास लगी कुछ विषैली पत्तियों को खा
लिया और मर गया। निर्णय हुआ कि वादी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है क्योंकि
क्षति स्वयं उसके घोड़े के अतिचार (Trespass) के कारण हुई थी और पत्तियों का पलायन
भी नहीं हुआ था।
7.
कानूनी प्राधिकार (Statutary Authority)- यदि किसी कार्य के करने से जो कानून द्वारा
अधिकृत है कोई क्षति हो जाती है तो उसके लिये पूर्ण दायित्व उत्पन्न नहीं होता बशर्ते
कि कार्य के सम्पादन में असावधानी न बरती गई हो। उदाहरणार्थ- ग्रीन व वाटरवर्क्स कं०
1894 में पार्लियामेंट द्वारा प्राधिकृत एक कम्पनी द्वारा लगाया गया सड़क का मेनहोल
फट गया जिससे वादी के अहाते में पानी भर गया। निर्णय हुआ कि कम्पनी दायी नहीं है।
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