गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

1. संयुक्त क्षतिकर्त्ता 2. अंगभंग 3. विदेशी दुष्कृति 4. मानसिक आघात 5. मिथ्या बन्दीकरण 6. राजकाज 7. धोखा . 8. वक्रोक्ति , 9. क्षति की दूरस्थता 10. षडयन्त्र

निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिये-

Write short notes on the following-

 1. संयुक्त क्षतिकर्त्ता (Joint Tortfeasers), 2. अंगभंग (Mayhem), 3. विदेशी दुष्कृति (Foreign Tort). 4. मानसिक आघात (Mental or Nervous Shock), 5. मिथ्या बन्दीकरण (False Imprisonment), 6. राजकाज (Act of State), 7. धोखा (Deceit). ४. वक्रोक्ति (Innuendo), 9. क्षति की दूरस्थता (Remoteness of Damage) तथा 10. षडयन्त्र (Conspiracy) |

 

उत्तर- 1. संयुक्त क्षतिकर्त्ता (Joint Tortfeasors) - जो व्यक्ति एक साथ मिलकर एक ही उद्देश्य के लिये संयुक्त कार्यवाही द्वारा किसी व्यक्ति के विरुद्ध अपकृत्य करते हैं तो वे संयुक्त क्षतिकर्त्ता कहलाते हैं। इसके विपरीत यदि दो व्यक्ति सामान्य उद्देश्य रखते हुए एक व्यक्ति के प्रति अलग-अलग अपकृत्य करते हैं और उसे अलग-अलग क्षति पहुंचाते हैं तो उन्हें संयुक्त क्षतिकर्त्ता नहीं कहा जा सकता। उदाहरणार्थ- कोरक, 1924 नामक वाद में दो जहाज आपस में टकरा गये और उनमें से एक ने वादी के जहाज को टक्कर मारी जिससे वादी का जहाज समुद्र में डूब गया। निर्णय हुआ कि प्रतिवादीगण संयुक्त श्रुतिकर्ता नहीं है, क्योंकि वादी के जहाज की क्षति दोनों के स्वतन्त्र अपकृत्य से हुई थी। अतः दोनों स्वतन्त्र रूप से उत्तरदायी थे।

 

संयुक्त दायित्व की उत्पत्ति - यह निम्न दशाओं में उत्पन्न होती है-

 

(i) एजेन्सी (Agency) - जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को ऐसे कार्य करने के लिये रखता के जो अपकृत्य होते हैं तो कानून दोनों को संयुक्त रूप से उत्तरदायी ठहराता है जैसे प्रमुख और अभिकर्त्ता (Principal and Agent ) |

 

(ii) स्थानापन्न दायित्व (Vicarious Liability) - जब एक व्यक्ति ऐसा अपकृत्य करता है जिसका दायित्व दूसरे व्यक्ति पर होता है तब क्षतिकर्त्ता तथा अन्य व्यक्ति दोनों ही संयुक्त रूप से उत्तरदायी होते हैं जैसे: स्वामी और सेवक के सम्बन्धों से उत्पन्न दायित्व ।

 

(iii) संयुक्त कार्य (Joint Action) - जब दो या अधिक व्यक्ति संयुक्त रूप में कोई अपकृत्य करते हैं तो वे सभी जिम्मेदार होते हैं।

दायित्व की प्रकृति (Nature of Liability) संयुक्त क्षतिकर्ता का दायित्व अलग- अलग (Separate) और संयुक्त (Joint) दोनों प्रकार का होता है। उनके खिलाफ प्राप्त की गई डिक्री किसी भी एक व्यक्ति से वसूल की जा सकती है।

 

वर्तमान विधि (Present Law) -  इंगलैंड की 'सामान्य विधि' में पहले यह नियम था कि एक संयुक्त क्षतिकर्त्ता के विरुद्ध प्राप्त किया गया फैसला अन्य सभी क्षतिकर्ताओं को दायित्व से मुक्त कर देता है, भले ही वादी पूरी हानि प्राप्त न कर सका हो। लेकिन विधि सुधार अधिनियम, 1935 की धारा 6 के अनुसार, अब एक फैसला एक बार संयुक्त क्षतिकर्ताओं के विरुद्ध प्राप्त होने पर भी किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा मुकदमा चलाने में कोई रुकावट नहीं डालता। भारत में इस नियम को अनुचित माना गया है। भारत में संयुक्त रूप से प्राप्त की गई डिक्री किसी एक क्षतिकर्त्ता से भी वसूल की जा सकती है। किन्तु किसी एक क्षतिकर्ता को छूट देने का यह परिणाम होता है शेष क्षतिकर्ता मुक्त हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण दावे का आधार अविभाज्य होना है।

 

2. अंगभंग (Mayhem) - किसी व्यक्ति को पहुंची समस्त व्यक्तिगत चोटों में, जिनमें मृत्यु नहीं होती, अंग-भंग सबसे गम्भीर आघात माना जाता है। ऐसी क्षति जिससे कोई व्यक्ति अपनी ज्ञानेन्द्रियों या कर्मेन्द्रियों से वंचित हो जाता है अंग-भंग कहलाती है। अंग-भंग अपराध एवं अपकृत्य दोनों है। अंग-भंग का बाद तभी चलाया जा सकता है, जब व्यक्ति के किसी क्रियाशील अंग को भंग कर दिया गया हो। यदि क्रियाशीच अंग का भंग नहीं हुआ है तो अंग-भंग का वाद नहीं चलाया जा सकता बल्कि केवल मारपीट (Battery) का चलाया जाता है।

 

अंग-भंग की कसौटी (Test of Mayhem) – कोई अपकृत्य अंग भंग है या नहीं इसकी कसौटी यह है कि क्या व्यक्ति के शरीर को ऐसा आघात लगा है जिससे उसके लड़ने या आत्मरक्षा करने की सामर्थ्य में कमी आ गई है ? यदि वास्तव में शरीर के ऐसे अंग को भग किया गया है। जिससे व्यक्ति लड़ने में असमर्थ हो जाता है तो वहाँ अंग-भंग का मामला बनता है जैसे पाँव, टाँग, हाथ, उंगली, दाँत या आँखें आदि का कटना, अंग-भंग का संकेत करता है। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति के नाक और कान काट लिये जाते हैं तो चूंकि यह व्यक्ति कुरूप तो बनाता है, किन्तु लड़ने के अयोग्य नहीं बनाता अतः ऐसे मामलों में अंग-भंग का वाद न चलकर प्रहार (मारपीट) का ही चलता है।

 

3. विदेशी दुष्कृति (Foreign Tort ) - अपने देश के बाहर किसी अन्य देश के लिये किये गये अपकृत्य विदेशी अपकृत्य कहलाते हैं। अंग्रेजी कानून के अनुसार इंगलैंड के बाहर किसी अन्य देश में की गई दुष्कृति के लिये अपकृत्य करने वाले के खिलाफ इंगलैंड के न्यायालयों में क्षतिपूर्ति के लिये वाद दायर किया जा सकता है बशर्ते कि प्रतिवादी इंगलैंड के न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आता हो। विदेशी अपकृत्य दो प्रकार के होते हैं-

 

1. जहाँ प्रतिवादी का कार्य विदेशी विधि के अनुसार, न्यायोचित नहीं है, परन्तु इंगलैंड की विधि के अनुसार यह अपकृत्य नहीं है तो उसके खिलाफ अपकृत्य का दावा इंगलैंड के न्यायालय में नही हो सकता—इनके अन्तर्गत इंगलैंड के कानून के अनुसार, इंगलैंड के बाहर किसी भूखण्ड को क्षति पहुँचाने पर इंगलैंड में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, भले ही क्षतिकर्त्ता इंगलैंड का निवासी या नागरिक ही क्यों न हो। भारत में भी भारत के बाहर किसी भू-खण्ड का अनाधिकार कब्जा करने पर वाद नहीं चलाया जा सकता। परन्तु अन्य प्रकार के अपकृत्य करने पर मुकदमा चलाया जा सकता है।

 

2. व्यक्तिगत अपकृत्य (Personal Torts) - व्यक्तिगत अपकृत्य से तात्पर्य किसी विदेशी व्यक्ति या चल सम्पत्ति को हानि पहुँचाने से है। इंगलैंड के कानून के अनुसार जब किसी चल सम्पत्ति या व्यक्ति के प्रति अपकृत्य किया जाता है तो उसके लिये अपकृत्य करने वाले के खिलाफ इंग्लैंड के न्यायालय में मुकदमा चल सकता है भले ही कार्य विदेश में हुआ हो।

 

विदेशी अपकृत्य के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की आवश्यक शर्ते - इंगलैंड के बाहर, दिये गये अपकृत्य के लिये इंगलैंड में तभी मुकदमा चलाया जा सकेगा जबकि निम्नलिखित शर्ते पूरी हो-

 

1. जिस स्थान पर अपकृत्य हुआ हो वह वहाँ की स्थानीय विधि के विपरीत हो-यदि प्रतिवादी का कार्य विदेशी विधि के अनुसार, न्यायोचित है किन्तु आँग्ल विधि के अनुसार अपकृत्य है, तो उसके विरुद्ध अपकृत्य का दावा इंगलैंड के न्यायालयों में नहीं चलाया जा सकता । फिलिप्स व० आयर, 1870 (6. Q. B. 1.) में जमाइका के भूतपूर्व गर्वनर के खिलाफ आक्रमण और मिथ्यावन्दीकरण का मुकदमा चलाया गया। गवर्नर ने यह तर्क पेश किया कि यह गिरफ्तारी देश में विद्रोहियों का दमन करने के लिये की गई थी और जमाइका के विधान मण्डल ने बाद में गवर्नर के कार्य को वैध घोषित कर दिया था। निर्णय हुआ कि गवर्नर का कार्य जमाइका के कानून के अनुसार न्यायोचित था। अतः इस आधार पर इंगलैंड के न्यायालय में दावा दायर नहीं किया जो सकता था कि ऐसा कार्य अपकृत्यपूर्ण है।

 

2. जहा प्रतिवादी का कार्य विदेशी विधि के अनुसार न्यायोचित नहीं है, किन्तु अंग्रेजी विधि के •अनुसार अपकृत्य नहीं है तो उसके विरुद्ध अपकृत्य का दावा इंगलैंड के न्यायालय में नहीं चलाया जा सकता ।

 

3. जहाँ प्रतिवादी का कार्य विदेशी विधि के अनुसार न्यायोचित नहीं है, किन्तु अंग्रेजी कानून अनुसार अपकृत्यपूर्ण है तो इंगलैंड के न्यायालय में उस कार्य के खिलाफ वाद दायर किया जा के सकता है।

 

उक्त सभी नियम भारत में भी लागू होत है। सामान्यतः विदेशी अपकृत्य निम्न प्रकार के होते हैं-

 

(i) खुले समुद्र पर किये गये अपकृत्य ।

(ii) वायुयान पर किये गये अपकृत्य ।

(iii) अन्तरिक्ष में किये गये अपकृत्य ।

 

4. मानसिक आघात (Mental or Nervous Shock) - मानसिक आघात से तात्पर्य उस आघात से है, जिसके कारण किसी मनुष्य की बौद्धिक एवं नैतिक भावना को चोट पहुँचे तथा जिससे शरीर एवं मस्तिष्क के ढांचे में प्रतिक्रिया उत्पन्न हो ऐसा व्यक्ति मानसिक सदमे के लिये क्षतिपूर्ति का वाद दायर कर सकता है। प्राचीन विधि के अनुसार केवल मानसिक आघात या मामूली चोट अभियोज्य नहीं होती थी जब तक कि कोई भी मानसिक सदमा या दुःख शारीरिक क्षति अथवा पीड़ा का कारण न बने। किन्तु वर्तमान विधि में मानसिक आघात से प्राप्त हानि के लिये मुकदमा चलाने के अधिकार को पूर्णतः मान्यता मिल चुकी है भले ही ऐसा आघात प्रतिवादी के कार्यों को देखने या सुनने मात्र से ही पहुँचा हो।

 

उदाहरणार्थ-

(i) डूप्ले व केमल लेयर्ड एण्ड कं०, 1950 में प्रतिवादी की असावधानी से क्रेन की रस्सी टूट गई, जिससे क्रेन का सारा भार जलयान के होल्ड में गिर पड़ा, जहाँ बहुत से मजदूर काम कर रहे थे। वादी क्रेन का ड्राइवर था और वह स्वयं सुरक्षित स्थान पर था तो भी मजदूरों को संकट की अवस्था में देखकर वह घबरा गया और मानसिक आघात का शिकार बन गया। निर्णय हुआ कि वादी को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार है।

 

(ii) विलकिन्सन व० डाउन्टन, 18972K. B. 57 में प्रतिवादी ने वादिनी से मजाक करते हुए कहा कि उसका पति एक गम्भीर दुर्घटना का शिकार हो गया है और उसकी टांग टूट गई हैं और वह अस्पताल में पड़ा हुआ है। इस सूचना को सुनकर वादिनी को मानसिक सदमा पहुँचा जिससे वह बीमार पड़ गई और उसके बाल सफेद हो गये। कुछ समय तक उसका जीवन भी संकट में पड़ गया। वादिनी के पति को उसकी बीमारी पर काफी धन खर्च करना पड़ा। जस्टिस राइट ने निर्णय दिया कि चूंकि प्रतिवादी के कार्य से वादिनी को क्षति पहुँची है इसलिये वह क्षतिपूर्ति के लिये दायी है भले ही प्रतिवादी का इरादा ऐसी क्षति पहुँचाने का न था।

 

5. मिश्या बन्दीकरण (False Imprisonment) किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बिना किसी औचित्य के पूर्ण अवरोध लगाना मिथ्या कारावास कहलाता है। मिथ्या बन्दीकरण के रूप में किया गया अवरोध शारीरिक हो सकता है या अधिकार प्रदर्शन द्वारा किया जा सकता है। परन्तु व्यक्ति की स्वतन्त्रता में पूरी बाधा होनी चाहिये अर्थात् यदि किसी व्यक्ति को एक विशेष दिशा में जाने से रोक दिया जाता है जिधर जाने का उसे अधिकार था तथा अन्य सभी दिशाओं में जाने दिया जाता है तो उसे बन्दीकरण नहीं कहा जा सकता। मिथ्या बन्दीकरण एक अपकृत्य है और इसके लिये क्षतिपूर्ति की दीवानी कार्यवाही की जा सकती है। साथ ही यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 3400 के अन्तर्गत एक अपराध भी है जिसके लिये फौजदारी न्यायालय में कार्यवाही करके अपराधी को दण्डित कराया जा सकता है। विभिन्न विद्वानों ने मिथ्या बन्दीकरण को निम्न प्रकार परिभाषित किया है-

 

1. रतनलाल के अनुसार, "मिथ्या कारावास या बन्दीकरण किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वतन्त्रता पर बिना किसी कानूनी औचित्य के पूर्ण अवरोध लगाना है, भले ही वह कितने थोड़े समय के लिये क्यों न हो।"

 

2. प्रो0 विनफील्ड के अनुसार, "किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वतन्त्रता पर बिना किसी कानूनी औचित्य के पूर्ण अवरोध लगाना मिथ्या बन्दीकरण कहलाता है भले ही वह कितने ही थोड़े समय के लिये क्यों न हो।"

 

मिथ्या बन्दीकरण के आवश्यक तत्व — मिथ्या बन्दीकरण के अपकृत्य को सिद्ध करने के लिये वादी को निम्नलिखित दो बातें सिद्ध करना आवश्यक है- 1. वादी की स्वतन्त्रता पर पूर्ण अवरोध लगाया गया था,

 

2. यह अवरोध बिना किसी कानूनी औचित्य के लगाया गया था।

 

1. पूर्ण अवरोध- व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर पूर्ण अवरोध लगाने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को चारों ओर से चारदीवारी के अन्दर इस प्रकार घेर लिया जाये कि वह बाहर न जा सके। अतः यदि वादी को केवल किसी खास दिशा में जाने से रोक दिया जाता है और अन्य दिशाओं में जाने के लिये स्वतन्त्र छोड़ दिया जाता है तो इसे मिथ्या बन्दीकरण नहीं कहेंगे। उदाहरणार्थ-यई व० जीन्स, 1845 में एक पुल का भाग फुटपाथ के रूप में इस्तेमाल होता था और नौका दौड़ देखने के लिये सीट के रूप में था। वादी ने वहीं से गुजरने का प्रयास किया। प्रतिवादी ने उसे नीचे खींच लिया, फिर भी वह घेरे पर चढ़ गया। दो पुलिस सिपाहियों ने उसे जाने से रोका और कहा कि वह पुल के दूसरी ओर से जा सकता है। वादी ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया तो उसे वहीं पर आधा घन्टे के लिये रोके रखा। मिथ्या बन्दीकरण के बाद लाने जाने पर निर्णय हुआ कि वादी को एक ओर जाने से रोकना मिथ्या बन्दीकरण नहीं था। मिथ्या बन्दीकरण के लिये यह आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति को जेल या बन्दीगृह में वास्तविक रूप से बन्दी बनाया जाये। आवश्यकता केवल यह है कि व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर पूर्ण रुकावट होनी चाहिये भले ही वह जेल में बन्द किया गया हो या मकान में या होटल में या खुले मैदान में या सार्वजनिक मार्ग पर हो । उदाहरणार्थ-

 

शैलजानन्द पाण्डे व सुरेशचन्द्र गुप्ता A. I.R. 1969 Pat. 194 में वादी कोयले की खान का स्वामी था जो धनबाद में रहता था। प्रतिवादी धनबाद का एक मजिस्ट्रेट था जिसने वादी को 13/12/60 को साढ़े दस बजे हाजिर होने के लिये कहा तथा यह निर्देश दिया कि वह प्राथी, मोहरी मजही के प्रार्थना-पत्र पर जवाब लगाये। उसी दिन वादी किसी दीवानी कार्य के सम्बन्ध में धनबाद कचहरी में आया और बार कौंसिल की लाइब्रेरी के पास खड़ा था तभी दूसरा प्रतिवादी, जो उपकमिश्नर धनबाद के कार्यालय में क्लर्क था करीब 4-15 बजे अदालत से सिपाही के साथ वहाँ आया और वहाँ वादी से मजिस्ट्रेट के कमरे में हाजिर होने को कहा। वादी उनकी अदालत में गया। जहाँ वादी को हिरासत में रखा जबकि उसके खिलाफ न तो कोई सम्मन जारी किया गया था और न वारन्ट ही निर्णय हुआ कि प्रतिवादीगण मिथ्या कारावास के दोषी हैं। |

 

2. अवरोध बिना किसी कानूनी औचित्य के लगाया गया था—मिथ्या बन्दीकरण के लिये आवश्यक है कि रुकावट बिना किसी कानूनी औचित्य के होनी चाहिये। यदि वादी को किसी कानून को भंग करने पर गिरफ्तार किया गया है तो यह मिथ्या बन्दीकरण नहीं होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वेच्छपूर्वक अपनी सहमति से अपनी स्वतन्त्रता पर रुकावट स्वीकार करता है तो यह मिथ्या बन्दीकरण नहीं होगा। उदाहरणार्थ- हर्ड व बीयर डेस स्टील और कोल कं०, 1915 में प्रतिवादी की खान में कुछ मजदूरों ने कार्य की हड़ताल करके शीघ्र बाहर आने की माँग की। प्रतिवादी ने उसकी माँग नहीं मानी और मजदूरों को बाध्य होकर कुछ समय के लिये ख़ान में ही रहना पड़ा। निर्णय हुआ कि प्रतिवादी मिथ्या बन्दीकरण के लिये दायी नहीं है क्योंकि उसमें केवल संविदा-भंग हुआ था अपकृत्य नहीं किया गया था।

 

6. राजकाज (Act of State) -  पोलक के अनुसार, "राज-कार्य" राजाओं या विदेशी स्वतन्त्र राज्यों के शासकों द्वारा किये या अपनाये गये ऐसे कार्य हैं, जिन्हें वे अपनी राजनैतिक सार्वभौम सत्ता की शक्ति के अन्तर्गत करते हैं। सर जेम्स स्टीफन के अनुसार राज्य के कार्य से हमारा तात्पर्य उस कार्य से है जो 1. एक विदेशी के विरुद्ध किया गया हो 2. राजा के सेवक द्वारा किया गया हो. 3. राज्य की नीति के आधार पर राजा की पूर्व स्वीकृति या पुष्टिकरण द्वारा किया गया हो तथा 4. जो किसी प्रकार न्यायोचित (Justified) नहीं होता किन्तु राज्य की नीति के अन्तर्गत होने के कारण देश का कोई न्यायालय इसका संज्ञान (Cognizance) नहीं ले सकता। अतः यह एक अवैध तथा अन्यायपूर्ण (Lnjust) कार्य है जिसको केवल राज्य की नीति के अन्तर्गत ही सिद्ध किया जा सकता है। अपकृत्य में इसके लिये कोई उपचार प्राप्त नहीं है। इसके उदाहरणों में राज्य द्वारा-1. युद्ध एवं शान्ति की घोषणा करना, 2. किसी विदेशी राज्य का अपहरण करना आदि कार्य आते हैं। बनन व० डेनमान में एक जलपोत के सेनापति डेनमान ने स्थानीय सरकार से सन्धि की तथा इसके अन्तर्गत वादी के गुलामों को कैद कर लिया गया और उसके बागों में आग लगा दी गई। निर्णय हुआ कि गुलामों का मालिक हानिपूर्ति का बाद दायर नहीं कर सकता क्योंकि डेनमान के कार्यों को राज्य द्वारा पुष्टीकृत (Ratify) कर दिया गया था।" भारत में भी उक्त सिद्धान्त लागू होता है किन्तु इसके निम्न अपवाद हैं-

 

1. भारतीय नागरिकों के विरुद्ध राज- कार्य का बचाव नहीं लिया जा सकता। (अमीर खान Vs यूनियन ऑफ इण्डिया A. I.R. 1870)

 

2. यदि कार्य किसी भारतीय कानून के अन्तर्गत प्राप्त अधिकारों के प्रयोग में किया गया है तो राज-काज का बचाव नहीं लिया जा सकता।

 

3. यदि कोई भारतीय नागरिक अपने नागरिक अधिकारों के भंग होने पर किसी राज्याधिकारी के खिलाफ कार्यवाही करता है तो यह नियम लागू न होगा (मदन गोपाल कोबरा Vs. यूनियन ऑफ इण्डिया) ।

 

 

7. धोखा (Deceit) प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह दूसरे व्यक्ति से गलत या - असत्य बात कह कर उसे क्षति न पहुँचाये। इस कर्तव्य के उल्लंघन को धोखा या कपट (प्रवंचना) कहते हैं। धोखे से तात्पर्य ऐसे मिथ्या व्यपदेशन (False Representation) से है जिसके आधार पर अन्य व्यक्ति विश्वास करके कोई कार्य करता है तो उसे क्षति होती है। दूसरे शब्दों में जब एक व्यक्ति तथ्य की वास्तविकता को जानते हुये दूसरे के सामने गलत तथ्य पेश करता है। या ऐसे कथन करता है जिनके सत्य या असत्य होने की वह परवाह नहीं करता और इस इरादे से करता है कि जिसके फलस्वरूप उसे क्षति पहुंचे, तो इसे कपट या धोखा कहा जाता है। इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति मिथ्या निरूपण करता है और दूसरा व्यक्ति उसे सत्य मानकर उस पर आचरण करके क्षतिग्रस्त होता है तो क्षतिग्रस्त व्यक्ति को मिथ्या निरूपण करने वाले के खिलाफ दावा दायर करके क्षति प्राप्त करने का अधिकार है। उदाहरणार्थ- पैस्ली व फ्रीमैन, 1789 T. R. 51 में वादी चिनियल का व्यापारी था और उसके भारी स्टाक को बेचना चाहता था। प्रतिवादी ने कहा कि वह ऐसे व्यक्ति को जानता है जो चिनियल खरीद लेगा। वादी ने पूछा कि क्या वह संभ्रान्त व्यक्ति है। प्रतिवादी ने कहा कि वह एक संभ्रान्त व्यक्ति है। इस विषय पर वादी ने अपने माल के 16 बोरे 3000 पाउन्ड में उधार दे दिये। बाद में खरीदार दिवालिया हो गया। वादी ने प्रतिवादी के खिलाफ गलत सूचना देने तथा गलत विश्वास दिलाने के लिये मुकदमा चलाया। निर्णय हुआ कि प्रतिवादी गलत सूचना के लिये उत्तरदायी है। धोखा या कपट के आवश्यक तत्व (Essentials of Deceit or Fraud ) कपट के दावे में क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिये वादी को निम्नलिखित बातें सिद्ध करना आवश्यक है-

 

(i) यह कि व्यपदेशन वास्तव में असत्य था

(ii) यह कि प्रतिवादी को यह ज्ञान था कि उसका कथन असत्य है या उसने कथन करते समय उसके सत्य या असत्य होने की परवाह नहीं की:

(iii) यह कि प्रतिवादी ने कथन या व्यपदेशन इस उद्देश्य से किया था कि वादी उस पर विश्वास करके कार्य करे।

(iv) यह कि वादी ने कथन पर विश्वास करके कार्य किया और फलस्वरूप हानि उठाई।

 

कपट के अपकृत्य के लिये दोषी व्यक्ति का हेतु (Motive) सारहीन होता है धोखा देने या क्षति पहुँचाने का आशय न होते हुये भी प्रतिवादी कपट का दोषी हो सकता है।

 

8. वक्रोक्ति - सामण्ड के अनुसार कथन दो प्रकार के होते हैं- (i) प्रथम दृष्टय मानहानिजनक (Defamatory) तथा (i) प्रथम दृष्टया निर्दोष (Innocent)।

पहले प्रकार के कथन मानहानिजनक होते हैं तथा स्वतः अभियोज्य (Actionable per se) होते हैं जब तक कि वह कथन किसी अपवाद की श्रेणी में हो न आ जाये, जैसे अ, ब से कहता है कि स चोर है। यदि स वास्तव में सिद्ध चोर नहीं है। तो यह प्रथम दृष्टया मानहानि जनक है। इसके विपरीत दूसरे प्रकार के कथन प्रथम दृष्टया निर्दोष मालूम होते हैं किन्तु उनका अर्थ परिस्थितियों के सन्दर्भ में मानहानिजनक बन जाता है। ऐसे कथन को 'वक्रोक्ति या व्यंगात्मक कथन ( Innuendo) कहा जाता है, जैसे अ, ब के बारे में स से कहता है कि 'व वैसा ही है जैसा उसका पिता'। यदि पिता चोर हो तो इन शब्दों का अर्थ यह होगा कि व भी चोर है। यदि 'व' सिद्ध चोर नहीं है तो यह कथन मानहानिजनक होगा भले ही ऊपर से देखने में कथन निर्दोष मालूम होता है। इसी प्रकार जहाँ 'अ' 'ब' के बारे में यह कथन करता है कि "ब' एक साधु है' और यदि उसका संकेत यह है कि 'ब' साधुओं के एक ऐसे ग्रुप का सदस्य है जो तश्करी करते हैं तो कथन निर्दोष होते हुए भी मानहानिजनक है।

 

9. क्षति की दूरस्थता (Remoteness of Damage) इस सिद्धान्त का आधार सूत्र, "कानून में किसी घटना के तात्कालिक कारणों पर विचार किया जाता है, दूर के कारणों पर नहीं (In jure non remota causa sed proxima spectator)" है। दूसरे शब्दों में, "कानून किसी अनुचित कार्य से उत्पन्न होने वाली सभी बातों का लेखा नहीं रख सकता है। यह कुछ पश्चातवर्ती घटनाओं को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर मानता है, क्योंकि कानून के लिये कारणों के कारण या परिणामों के परिणाम का अनन्त रूप से विचार करते चलना सम्भव नहीं है।" अतः जहाँ प्रतिवादी के कार्य और उनके परिणाम में कार्य कारण का सीधा (Direct ) सम्बन्ध न हो वहीं क्षति दूरवर्ती (Remote) मानी जाती है। किसी मामले में क्षति दूरदस्थ है या नहीं, यह निश्चित करने के लिये कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं है। इस बात पर विचार करने हेतु कि कोई क्षति प्रतिवादी के कार्य का प्रत्यक्ष एवं स्वाभाविक परिणाम है या नहीं हमें प्रत्येक बाद के तथ्यों एवं परिस्थितियों पर ध्यान देना चाहिये। रतनलाल के अनुसार निम्नलिखित दशाओं में क्षति हमेशा हो दूरवर्ती होती है-

 

1. जहाँ प्रतिवादी का कार्य वादी की क्षति का सीधा कारण न हो-यदि प्रतिवादी के कार्य और वादी को हुई क्षति में कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है तो वादी प्रतिवादी से क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी नहीं होता। उदाहरणार्थ- काव० जी० डब्लू0 रेलवे कं०, 1893 में वादी का कहना था कि जब वह प्रतिवादी की रेल द्वारा यात्रा कर रहा था तो उसे लूट लिया गया। वादी ने कर्मचारियों से गाड़ी रोकने को कहा किन्तु उन्होंने इन्कार कर दिया। यदि ट्रेन रोक दी जाती तो वह लूटी हुई सम्पत्ति को पुनः प्राप्त कर सकता था। निर्णय हुआ कि सम्पत्ति की हानि के लिये रेलवे कम्पनी उत्तरदायी नहीं है, क्योंकि क्षति तीसरे व्यक्ति द्वारा पहुंचाई गई होने के कारण दूरवर्ती थी।

 

2. जहाँ क्षति विशेष कर अपने ही कार्य का परिणाम हो-जहाँ क्षति स्वयं वादी की गलती के कारण हुई हो वहाँ वादी प्रतिवादी को दोषी नहीं ठहरा सकता। अतः अंशदायी असावधानी के कारण मामलों में वादी क्षतिपूर्ति प्राप्त नहीं कर सकता उदाहरणार्थ-बाम्बे, बड़ौदा एण्ड सेन्ट्रल रेलवे कं० ब० द्वारकानाथ, 1935 में प्रतिवादी की लाइन पर गर्मियों के दिनों में 2 फुट ऊँची सूखी घास उगी थी। वादी का खेत भी रेलवे लाइन के पास ही था जिसमें 6 फुट ऊँची सूखी घास खड़ी थी। एक दिन इन्जन से एक कोयला निकलकर रेलवे लाइन पर गिर पड़ा। फलस्वरूप घास में आग लग गई जो वादी के खेत तक पहुँच गई और सारा खेत जलकर नष्ट हो गया। निर्णय हुआ कि वादी भी कम असावधान न था क्योंकि उसे मालूम था कि लाइन पर घास खड़ी है और इन्जन के कोयले गिरते हैं अतः उसने लाइन के किनारे की अपनी सूखी घास को न काटकर स्वयं भी गलती की है और इस कारण उसको हुई क्षति दूरवर्ती है।

 

3. जहां तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से प्रतिवादी के कार्य और उससे वादी को हुई क्षति के बीच कार्य-कारण का सम्बन्ध टूट जाता है-जहाँ तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप द्वारा प्रतिवादी के कार्य और वादी को हुई श्वति के बीच कार्य-कारण का सम्बन्ध टूट जाता है वहीं क्षति दूरस्थ मानी जाती है। उदाहरणार्थ- हेडवेल व राइट 1907 में वादी अपनी साइकिल पर सवार होकर सड़क पर जा रहा था। फुटपाथ पर प्रतिवादी की कुछ मुर्गियाँ थीं जब वादी मुर्गियों के पास से गुजरा तो एक कुत्ते ने मुर्गियों पर झपट्टा मारा जिससे एक मुर्गी स्पोक में आ गई और साइकिल का सन्तुलन बिगड़ गया और वादी गिरकर घायल हो गया। निर्णय हुआ कि वादी मुर्गियों के स्वामी से क्षतिपूर्ति प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के कारण प्रतिवादी के कार्य और वादी को हुई क्षति का सम्बन्ध टूट गया था यह सिद्धान्त "Human activity intervent कहलाता है।

 

4. जहाँ कार्य-कारण की श्रृंखला में किसी ऐसे व्यक्ति का हस्तक्षेप होता है जो मामले को न्यायिक रूप से निपटाने के लिये कर्त्तव्यवद्ध हो जहाँ किसी न्यायिक अधिकारी के हस्तक्षेप द्वारा प्रतिवादी के कार्य एवं वादी को हुई क्षति का प्रत्यक्ष सम्बन्ध समाप्त हो जाता है वहाँ भी क्षति दूरस्थ होती है। उदाहरणार्थ- हारनेट व बोण्ड 1925 में एक सिपाही ने एक व्यक्ति को गलती से गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। मजिस्ट्रेट ने उस व्यक्ति को जेल भेज दिया। तत्पश्चात् वह व्यक्ति निर्दोष पाया गया और उसे बरी कर दिया गया। ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति सिपाही के विरुद्ध क्षतिपूर्ति की कार्यवाही नहीं कर सकता, क्योंकि उसके अपकृत्य और वादी को हुई हानि के सम्बन्ध को मजिस्ट्रेट ने तोड़ दिया।

 

दूरस्थता की कसौटी (Test of Remoteness) दूरस्थता के सम्बन्ध में न्यायालयों ने - समय-समय पर निम्नलिखित नियम अपनाये हैं -

 

1. सन् 1850 तक न्यायालयों ने एक पुरानी कहावत, "प्रथम अपकृत्य करने वाला व्यक्ति उससे उत्पन्न समस्त परिणामों के लिये उत्तरदायी होता है" के आधार पर निर्णय दिये। उदाहरणार्थ-स्कोट व० शेफेर्ड 1773 में प्रतिवादी ने भीड़ भरे बाजार में एक छुर छुरी फेंकी जो अ की दुकान पर गिरी, अ ने अपनी दुकान को बचाने के लिये उसे बाजार में फेंक दिया जो एक दूसरी दुकान पर गिरी, दूसरी दुकान के मालिक ने भी उसे बाजार में फेंक दिया जो वादी के मुंह पर गिरी। फलस्वरूप वादी का मुंह जल गया और आँख फूट गई निर्णय हुआ कि प्रतिवादी 1 दायी है।

 

2. सन् 18510 के बाद न्यायालयों ने दो सिद्धान्तों के आधार पर निर्णय दिये-

(अ) युक्तिसंगत पूर्वानुमान का नियम (ब) प्रत्यक्ष परिणाम का सिद्धान्त।

 

(अ) युक्तिसंगत पूर्वानुमान का नियम (Test of Reasonable Foresight) ग्रीनलैंड व० पेपलिन, 1850 के इस नियम को प्रतिपादित करते हुये मुख्य न्यायाधीश पोलक ने कहा, "प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि वह अपने कार्यों से उत्पन्न सभी दुष्परिणामों के बारे में अनुमान लगा लेगा और उनको बचाने हेतु उचित उपाय करेगा। लेकिन वह उन परिणामों के लिये उत्तरदायी न होगा जिनको कोई विवेकशील व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था या जिनका अनुमान नहीं लगाया जा सकता था।"

 

(ब) प्रत्यक्ष परिणाम का नियम (Test of Direct Consequence ) री-पोलेमिस, 1921 3 Q. B. 560 में कुविन्स बैच ने "पूर्वानुमान" के नियम को अस्वीकार कर दिया तथा प्रत्यक्ष परिणाम के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने अपकृत्य से उत्पन्न उन सभी क्षतियों के लिये दायी होगा जो उनके कार्य के प्रत्यक्ष परिणाम हैं, भले ही उनके बारे में वह पूर्व अनुमान कर सकता था या नहीं। प्रस्तुत बाद में प्रतिवादी ने वादी के जहाज को पैट्रोल ढोने के लिये किराये पर लिया। यात्रा के दौरान पैट्रोल की कुछ टीनों से पैट्रोल निकलने लगा तथा जहाज के कमरे में पैट्रोल की भाप भर गई। प्रतिवादी के नौकरों की असावधानी से एक लकड़ी का तख्ता उस कमरे में गिर पड़ा जिससे चिंगारी पैदा हुई और आग लग गई। फलस्वरूप सम्पूर्ण जहाज जल गया। निर्णय हुआ कि वादी क्षतिपूर्ति का अधिकारी है क्योंकि क्षतिपूर्ति प्रतिवादी के नौकरों के असावधानीपूर्ण कार्य का सीधा एवं प्रत्यक्ष परिणाम थी तथा यह विचार करना कि क्षति का पूर्वानुमान किया जा सकता था असंगत है।

 

लिस्वोचक डेंजर व एडिसन 1933 A. C. 449 में वादी का जहाज प्रतिवादी की असावधानी के कारण डूब गया था जिसके कारण वादी अपनी संविदा को निश्चित काल में पूरा न कर सका। चूंकि वादी के पास जहाज खरीदने हेतु धन नहीं था अतः उसे ऊँचे किराये पर जहाज लेकर संविदा को पूरा करना पड़ा जिसके कारण उसे हानि उठानी पड़ी। न्यायालय ने वादी को नये जहाज के मूल्य के बराबर रकम तथा बीच में काम बन्द होने के कारण उठाई गई क्षति दिलाई। किन्तु जो धन उसे नया जहाज न खरीद पाने के कारण खर्च करना पड़ा, उसे दूरवर्ती माना ।

 

वर्तमान विधि - युक्तियुक्त पूर्वानुमान का नियम (Test of Reasonable Foresight) - 1961 में 'प्रत्यक्ष परिणाम के नियम' को 'दि बैगन माउण्ड 1961, A. C. 388 में प्रीवी कौंसिल ने अस्वीकार करके पुनः पूर्वानुमान के नियम को अपनाया। प्रस्तुत बाद में प्रतिवादी "बैगन माउण्ड " नामक एक जलपोत का स्वामी था जिसको उसने सिडनी बन्दरगाह पर बाँध दिया था। उसके नौकरों की असावधानी के कारण जलपोत के बाहर तेल बहकर समुद्र तल पर फैल गया तथा वहाँ से वादी के तट पर फैल गया जहाँ "कोरिमल" नामक दूसरे जलपोत में वैल्डिंग का काम चल रहा था। वादी के मैनेजर ने पूछा कि क्या तेल प्रज्जवलनशील (Inflamable) है या नहीं तो मालूम हुआ कि तेल प्रज्वलनशील नहीं है। इस विश्वास पर वैल्डिंग का काम पुनः जारी करा दिया गया। दो दिन बाद आग लग गई और घाट को भारी क्षति पहुँची। री पोलिमस के निर्णय के आधार पर निम्न न्यायालय ने प्रतिवादी को क्षतिपूर्ति हेतु दोषी ठहराया। किन्तु अपील में त्रीवी कौंसिल ने उक्त निणय को उलटते हुये कहा कि यदि किसी क्षति का पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता तो प्रतिवादी की असावधानी का सीधा परिणाम होने के बावजूद भी वादी क्षतिपूर्ति नहीं पा सकता।

 

10. षड्यन्त्र (Conspiracy) षड़यन्त्र में दो या अधिक व्यक्तियों की एक योजना होती - है जिसके द्वारा वे कोई अवैध कार्य करते हैं अथवा अवैध साधनों से वैध कार्य करते हैं इस प्रकार के कार्यों के फलस्वरूप उनके विरुद्ध अथवा उनमें से किसी एक के विरुद्ध दावा लाया जा सकता है षड्यन्त्र मात्र ही दीवानी न्यायालय में अनुयोज्य नहीं है। इसके लिये विशेष हानि सिद्ध करनी चाहिये। कार्यवाही का आधार हानि होती है न कि स्वयं षड्यन्त्र इस प्रकार के कार्यों के पीछे व्यक्तियों का एक संगठन होता है और जहाँ संगठन है वहाँ उसके लिये एक समान उद्देश्य की उपस्थिति आवश्यक हैं। इस प्रकार अवैध अथवा विद्वेषपूर्ण संगठन ही इस दुष्कृति का मूल आधार है। यदि कई व्यक्ति अपने भिन्न उद्देश्य की सिद्धि के लिये एक साथ कोई एक ही कार्य करते हैं तो उसे षडयन्त्र नहीं माना जायेगा । व्यापारिक प्रतियोगिताओं से किसी न किसी व्यक्ति को हानि पहुँचती ही है किन्तु यदि इसका उद्देश्य वैध सीमाओं के अन्तर्गत स्वयं को लाभ पहुँचाना है तो षड्यन्त्र नहीं है। मुगलस्टीमशिप कम्पनी के बाद में यही सिद्धान्त निर्धारित किया गया।

 

किसी वैध उद्देश्य की प्राप्ति के लिये कई व्यक्तियों का संगठन षड्यन्त्र की सीमा में नहीं आता चाहे उससे किसी अन्य पक्ष को हानि पहुँची हो किन्तु जहाँ दूसरे को हानि पहुँचाना ही द्वेषपूर्ण उद्देश्य है, अवैध कार्य माना जायेगा। स्वयं का हित न करके दूसरे के अहित करने की सम्मिलित योजना षड्यन्त्र है अतः अनुयोज्य है। कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो किसी एक व्यक्ति द्वारा किए जाने पर निर्दोष दिखाई पड़ते हैं किन्तु समूह द्वारा वह भयंकर रूप धारण कर लेते हैं। वारूद का एक कण हानिकारक नहीं होता परन्तु बड़ी मात्रा में मिलकर वही विस्फोटक बन जाता है। आज के उद्योग-प्रधान युग में मालिकों एवं मजदूरों के अनेक संगठन हैं। इनके बीच अनेक विवाद उत्पन्न होते हैं जिनके लिए विभिन्न व्यापारिक कानून बने हुए हैं। हड़ताल आदि अनेक कार्य इन्हीं के द्वारा अनुशासित होते हैं।।

 

षड्यन्त्र के सम्बन्ध में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भोलानाथ शंकर दत्त बनाम लक्ष्मी नारायण, 1930, 53 All 316, 332 में निम्नलिखित सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं-

 

1. प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्र रूप से व्यापार करने एवं व्यापार की विधि को अपने ढंग से संचालित करने का अधिकार है, चाहे इससे दूसरे के व्यापार को हानि पहुंचती हो। 2. यदि कोई व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह अवैध रूप से संविदा-भंग कराते हैं तो उनके विरुद्ध हानि पहुँचने की दशा में दावा लाया जा सकता है। 3. दावे का आधार केवल दुर्भावना नहीं हो सकती। कोई वैध कार्य इसीलिए अवैध नहीं हो जाता कि वह अप्रत्यक्ष रूप से दुर्भावना से भी प्रेरित था 4. चाहे किसी कार्य प्रणाली का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति का अपना व्यापारिक हित साधन हो फिर भी वह अवैध कार्य द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के जीविकोपार्जन की प्रणाली में बाधा नहीं डाल सकता। अवैध कार्य का अर्थ है, ऐसा कार्य जो स्वयं में अवैध हो अथवा कोई वैध कार्य जो षड्यन्त्र के कारण अवैध रूप से धारण कर लेता हो। 5. किसी दूसरे के कार्य में हानि पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया अवैध हस्तक्षेप अनुयोज्य है, यदि कथित हस्तक्षेप से वादी को हानि पहुँची है। किन्हीं दशाओं में अवैध तरीके द्वारा हानि पहुंचने के उद्देश्य से किया गया वैध हस्तक्षेप भी अनुयोज्य हो जाता है।

 

 

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