Define tort and explain its essential elements. Distinguish Tort from Breach of Contract and Crime. Is privity necessary to support an action in tort ?
Or
अपकृत्य दूसरे सिविल दोषों से किस प्रकार भिन्न है? क्या एक ही कार्य अपकृत्य, अपराध और संविदा-भंग हो सकता है ?
How is a tort different from other civil wrongs? Can the same act be a tort, crime and a breach of contract ?
Or "
अपकृत्यपूर्ण दायित्व कानून द्वारा पूर्वनिर्धारित किसी कर्त्तव्य-भंग से उत्पन्न होता है। यह कर्तव्य व्यापक रूप से व्यक्तियों के प्रति होता है तथा इसके भंग होने का उपाय अनिर्धारित हजनि की प्राप्ति के लिये लाये गये किसी वाद द्वारा किया जाता है।" विनफील्ड के इस कथन की व्याख्या कीजिये।
"Tortious liability arises from the breach of a duty primarily fixed by law. This duty is towards persons generally and its breach is redressable by an action for unliquidated damages." Explain this statement of Winfield.
Or
अपकृत्य एक किस्म की सिविल हानि या दुष्कृति है। इस परिभाषा का परीक्षण कीजिये और इसे विस्तृत बनाने के लिये इसमें अतिरिक्त लक्षणों को जोड़िये।
A tort is a species of civil injury or wrong. Examine this definition and add other features to make it comprehensive.
उत्तर- दुष्कृति का शाब्दिक अर्थ (Literal Meaning of Tort)- 'टार्ट' फ्रांसीसी भाषा का शब्द है और इसकी उत्पत्ति लेटिन भाषा के टार्टम (Tortum) शब्द से हुई है। 'टार्ट' अंग्रेजी भाषा के राँग (Wrong) तथा रोमन भाषा के डेलिक्ट (Delict) शब्द का समानार्थी है। अंग्रेजी भाषा में इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम नार्मन विधि-वेत्ताओं (Jurists) ने किया था। उनके मतानुसार 'टार्ट' एक ऐसा कार्य है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति को कानूनी क्षति (Legal Damage) पहुँचे तथा क्षतिकतां को ऐसी क्षति की पूर्ति करनी पड़े भले ही वह कार्य उसने जाने या अनजाने में किया हो। टार्ट का हिन्दी अनुवाद 'दुष्कृति' या ' अपकृत्य' है।
दुष्कृति की परिभाषा (Definition of Tort) - यद्यपि भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपकृत्य की भिन्न-भिन्न परिभाषायें दी हैं फिर भी वे तथ्य रूप में एक ही हैं। कुछ महत्वपूर्ण परिभाषायें निम्नलिखित हैं-
1. रतनलाल के अनुसार "दुष्कृति एक दीवानी अपकार (Civil Wrong) है जो संविदा से स्वतन्त्र (Independent) होता है तथा जिसका उपाय दीवानी न्यायालय में क्षतिपूर्ति (Damages) के दावे के रूप में किया जाता है।"
2. सामण्ड के अनुसार- अपकृत्य एक दीवानी अनुचित कार्य है जिसके लिये उचित उपाय क्षतिपूर्ति की कार्यवाही है, जो संविदा-भंग, न्यास-भंग अथवा किसी प्रकार के साम्यिक दायित्वों (Equitable Obligations) से भिन्न होता है।"
3. विनफील्ड के अनुसार- "अपकृत्यपूर्ण दायित्व कानून द्वारा पहले से ही नियत किसी कर्तव्य को भंग करने से उत्पन्न होता है। यह कर्त्तव्य व्यापक रूप से व्यक्तियों के प्रति होता है तथा इसके भंग होने का उपाय अनिर्धारित हर्जाने (Unliquidated Damages) की प्राप्ति के लिये लाये गये किसी वाद द्वारा किया जाता है।"
4. अण्डरहिल के अनुसार - अपकृत्य एक ऐसा कार्य या कार्यलोप है जो कानून द्वारा अनाधिकृत तथा संविदा से स्वतन्त्र है तथा जिसके द्वारा या तो किसी व्यक्ति के—
(i) पूर्ण अधिकार (Absolute Right) का उल्लंघन होता है, या
(ii) सीमित अधिकार (Qualified Right) का उल्लंघन होता है, जिससे हानि होती है,
या
(ii) लोक अधिकार (Public Right) का उल्लंघन होता जिससे उसे सामान्य जनता को अपेक्षा अधिक सारवान (Substantial) तथा विशेष हानि होती है तथा जिसके फलस्वरूप वह क्षतिकर्त्ता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिये मुकदमा चलाने का अधिकारी हो जाता है।
यद्यपि उक्त परिभाषाओं में से किसी भी परिभाषा में अपकृत्य के सभी तत्वों का समादेश नहीं है किन्तु फिर भी, अधिकतर विद्वान डॉ० विनफील्ड की परिभाषा को उचित मानते हैं। विनफील्ड के अनुसार, अपकृत्य के तीन मुख्य तत्व है-
1. अपकृत्यपूर्ण दायित्व कानून द्वारा पूर्व निश्चित कर्त्तव्य-भंग होने के कारण उत्पन्न होता (Tortious liability arises from the breach of a duty primarily fixed by law) कानून का यह आदेश है कि हम किसी व्यक्ति के (i) शरीर, (ii) सम्पत्ति और (iii) सम्मान को हानि न पहुँचायें और यदि हम बिना किसी कानूनी औचित्य के ऐसा करते हैं तो हम अपकृत्य के लिये उत्तरदायी होंगे और हमें उस व्यक्ति को हुई हानि की पूर्ति करनी पड़ेगी। इसके विपरीत एक सामाजिक या धार्मिक कर्त्तव्य के उल्लंघन के लिये लोग हमारी निन्दा ही कर सकते हैं किन्तु हमें क्षतिपूर्ति देने के लिये बाध्य नहीं कर सकते। अतः केवल कानून द्वारा पूर्व निर्धारित कर्तव्य के भंग के फलस्वरूप ही अपकृत्यपूर्ण दायित्व का जन्म होता है।
2. कानूनी कर्त्तव्य जनसाधारण के प्रति होता है (Legal duty is towards persons generally) - अपकृत्यपूर्ण दायित्व समाज के सभी व्यक्तियों के प्रति होते हैं। अतः जो भी कार्य लोकलक्षी अधिकारों (Right-in-Rem) के विरुद्ध होते हैं उनके सम्बन्ध में अपकृत्यपूर्ण दायित्व उत्पन्न हो जाता है। उदाहरणार्थ- सड़क पर चलते समय प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक सुरक्षा का अधिकार है और यह उन सभी व्यक्तियों के प्रति है जो सड़क पर चल रहे हैं।
3. कानूनी कर्तव्य के उल्लंघन के लिये अनिर्धारित क्षतिपूर्ति का वाद दायर किया जाता है
(A suit for unliquidated damages is filed for breach of legal duty)- प्रतिवादी के अनुचित कार्य से वादी को जो हानि होती है उसकी हानिपूर्ति के लिये वह प्रतिवादी के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा चलाकर हानिपूर्ति प्राप्त कर सकता है। क्षतिपूर्ति की रकम अनिर्धारित होती है। अपकृत्य से हुई हानि के लिये वादी को कितनी क्षतिपूर्ति मिलेगी इसका निर्धारण न्यायालय अपने विवेकानुसार प्रत्येक वाद के तथ्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर करेगा। यह रकम संविदा-भंग की तरह पक्षों द्वारा पूर्व निश्चित नहीं होती।
विनफील्ड की उक्त परिभाषा में कई कमियाँ हैं जिनके कारण परिभाषा सर्वांगीण नहीं कही जा सकती। प्रो० विनफील्ड ने स्वयं भी इसे माना है।
दुष्कृति के आवश्यक तत्व (Essential of Torts) उक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि अपकृत्य के निम्नलिखित आवश्यक तत्व हैं-
1. किसी व्यक्ति द्वारा अनुचित कार्य का किया जाना।
2. अनुचित कार्य से दूसरे व्यक्ति को कानूनी क्षति होना ।
3. क्षतिग्रस्त व्यक्ति को क्षतिपूर्ति का कानूनी उपाय प्राप्त होना।
1. अनुचित कार्य (Wrongful Act ) - अनुचित कार्य करने से तात्पर्य किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार के उल्लंघन से है भले ही ऐसा उल्लंघन किसी कार्य (Act) या अकार्य (Omission) द्वारा किया गया हो। साथ ही कार्य कानूनी दृष्टि से अनुचित होना चाहिये, सामाजिक या नैतिक दृष्टि से नहीं। यदि किसी कार्य से दूसरे व्यक्ति के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन होता है तो वह कार्य दोषपूर्ण अर्थात् अपकृत्य होगा भले ही वह कितना भी निर्दोष क्यों न दिखाई देता हो। उदाहरणार्थ- किसी व्यक्ति द्वारा अपनी ही भूमि पर इतनी ऊंची दीवार बनाना जिससे दूसरे व्यक्ति की रोशनी में रुकावट पड़ती हो अपकृत्य हो सकता है।
कानूनी अधिकार (Legal Rights) दो प्रकार के होते हैं-
(i) व्यक्तिगत अधिकार (Personal Right) - व्यक्तिगत अधिकार वे अधिकार होते हैं जो किसी व्यक्ति विशेष को प्राप्त होते हैं तथा जिनके उल्लंघन से सामान्यतया अपकृत्य का वाद चलाया जाता है। व्यक्तिगत अधिकार भी दो प्रकार के होते हैं- (अ) पूर्ण अधिकार (Absolute Right) तथा (ब) सीमित अधिकार (Qualified Right)। पूर्ण अधिकार वह अधिकार है जिसमें वादी को उसके कानूनी अधिकार के भंग मात्र से ही क्षतिपूर्ति के लिये दावा करने का अधिकार मिल जाता है, हानि सिद्ध करना आवश्यक नहीं है। वह स्वतः अभियोज्य (Actionable Per se) होता है, इस श्रेणी के अन्तर्गत सम्पत्ति, सम्मान, शारीरिक सुरक्षा और स्वतन्त्रता का अधिकार शामिल है। इसके विपरीत सीमित अधिकार वह है जिसमें पीड़ित व्यक्ति को वास्तविक हानि सिद्ध करना आवश्यक है, जैसे द्वेषपूर्ण अभियोजन, असावधानी और कपट (Fraud) के मामले में वादी को तभी सफलता मिलती है जब वह अधिकार भंग के फलस्वरूप उत्पन्न अभियोज्य हानि भी सिद्ध करे।
(ii) सार्वजनिक अधिकार (Public Right ) सार्वजनिक अधिकार वे अधिकार होते हैं। जो किसी व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के साथ समान रूप से प्राप्त होते हैं जैसे; राज्य मार्ग के प्रयोग का अधिकार सार्वजनिक अधिकार के भंग होने पर क्षतिपूर्ति के लिये तभी मुकदमा चलाया जा सकता है जब वादी को आम जनता के मुकाबले में विशेष क्षति (Special Damage) पहुंचे।
इसके विपरीत यदि कोई कार्य कानूनी दृष्टि से नहीं बल्कि केवल सामाजिक या नैतिक दृष्टि से अनुचित है तो वह अपकृत्य नहीं होता। उदाहरणार्थ-अ, जो एक भिखारी है जाड़े की रात में ब के घर जाता है और ब से खाने के लिये भोजन और ठहरने के लिये स्थान माँगता है किन्तु वह इन्कार कर देता है अ रात को उसके घर पर ही दम तोड़ देता है। यहाँ ब ने अ के प्रति कोई अपकृत्य नहीं किया क्योंकि अ का, भोजन आदि माँगना केवल नैतिक अधिकार (Moral Right) था न कि कानूनी ब ने जिस नैतिक अधिकार का उल्लंघन किया उसके लिये समाज केवल उसकी बुराई ही कर सकता है न कि क्षतिपूर्ति की कार्यवाही ।
2. कानूनी क्षति (Legal Damage) अपकृत्य की कार्यवाही के लिये यह आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को ऐसी हानि होनी चाहिये जो कानूनी दृष्टि से क्षति (Injury) हो। वादी के कानूनी अधिकार पर किये गये प्रत्येक आघात से कानूनी क्षति का जन्म होता है, यह समझने के लिये दो शब्दों (i) क्षति (Injury) तथा (ii) हानि (Damage) को समझना आवश्यक है। क्षति का अर्थ है किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन तथा हानि का अर्थ है किसी कानूनी अधिकार के उल्लंघन के फलस्वरूप हुआ नुकसान कुछ कार्य ऐसे भी होते हैं जिनमें वादी के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन अर्थात् क्षति (Injury) तो होती है किन्तु हानि (Damage) नहीं होती। इसके विपरीत कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिनमें वादी को हानि तो होती है किन्तु उनसे कानूनी अधिकार का उल्लंघन अर्थात् क्षति (Injury) नहीं होती। दुष्कृति की इस प्रकृति को दो लेटिन सूत्रों (i) क्षति बिना हानि तथा (ii) हानि बिना क्षति की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है-
(i) क्षति बिना हानि (Injuria Sine Damnum ) - हानि (Damnum) का अर्थ है, धन, सुख, स्वास्थ्य आदि किसी भी प्रकार की हानि क्षति (Injuria) का अर्थ है किसी व्यक्ति के सामान्य या व्यक्तिगत अधिकार में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप, भले ही यह जाने या अनजाने में किया गया हो। बिना (Sine) का अर्थ है वगैर, अर्थात क्षति बिना हानि का अर्थ है कानूनी अधिकार की अवहेलना के बैगर हानि।" इस सूत्र के अनुसार वह व्यक्ति जिसका कोई पूर्ण कानूनी अधिकार (Absolute Legal Right) भंग किया गया है, भले ही उसे इससे कोई रुपये-पैसे की हानि न पहुँची हो, फिर भी वह क्षतिपूर्ति के लिये वाद योजित कर सकता है। कानून व्यक्ति के कुछ मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन मात्र स्वतः अभियोज्य (Actionable Per se) मानता है। ऐसे वादों में वादी को केवल यह सिद्ध करना होता है कि उसके कानूनी अधिकार का उल्लंघन किया गया है और यह महत्वहीन है कि उसे कोई वास्तविक या आर्थिक हानि (Financial Loss) हुई है या नहीं। ऐसे स्वतः अभियोज्य क्षतिकृत्यों के उदाहरण अनाधिकार प्रवेश (Trepass), मानहानि (Defamation) शारीरिक सुरक्षा एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता आदि हैं। इस सिद्धान्त की पुष्टि निम्नलिखित वादों से होती है।-
(i) मारजट्टी ब० विलियम्स, 18303 B, & Ad. 415 में वादी का बैंक में काफी धन जमा था फिर भी प्रतिवादी बैंक ने उसका चैक अनादर (Dishonour) कर दिया। वादी ने प्रतिवादी के विरूद्ध क्षतिपूर्ति का दावा किया निर्णय हुआ कि वादी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी है। भले ही बैंक के अनादर से वादी को कोई वास्तविक हानि नहीं हुई।
(Ii) एशवी व व्हाईट 1703 (Ashby vs. White, 1703) में वादी को अपना मत देने का पूर्ण अधिकार था किन्तु निर्वाचन अधिकारी ने ईर्ष्यावश उसका मत स्वीकार करने से इन्कार कर दिया जिससे वह अपने इच्छित प्रत्याशी के पक्ष में मत न दे सका। यद्यपि उसका प्रत्याशी निर्वाचित हो गया था फिर भी न्यायालय ने निर्णय दिया कि उसको बाद लाने का अधिकार था। चीफ जस्टिस होल्ट ने कहा कि, "प्रत्येक कानूनी अधिकार के उल्लंघन से हानि होती है, भले ही उससे किसी को एक पैसे का भी नुकसान न हुआ हो।"
उक्त वादों के आधार पर भारतीय न्यायालयों ने विभिन्न वादों में वादी के व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन के लिये हानिपूर्ति का वाद दायर करने का अधिकार माना है, जैसे- (i) बाजार में माल तोलने और बेचने के विशिष्ट अधिकार में हस्तक्षेप (ii) किसी खास मौके पर गाँव के किसी विशेष सार्वजनिक रास्ते से धार्मिक जुलूस ले जाने को अधिकार (iii) किसी नहर से पानी लेने का अधिकार (iv) एक ही क्षेत्र में एक ही देवता के नाम से नये मन्दिर की स्थापना करके भेंट या बलि स्वीकार करने का अधिकार।
(ii) हानि बिना क्षति (Damnum Sine Injuria) - इस सूत्र के अनुसार जब किसी अन्य - व्यक्ति के कार्य से हानि तो पहुँची हो, किन्तु वादी के किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन न हुआ हो तो उसे हानिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा। केवल धन या सम्पत्ति की हानि अभियोज्य (Actionable) नहीं होती। अपकृत्य विधि में अनुचित कृत्य वे कार्य हैं जिनके द्वारा वादी के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन होता है। दूसरे शब्दों के इस सिद्धान्त को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि "कानूनी अधिकार के उल्लंघन के बिना हुई हानि अभियोज्य नहीं होती" भले ही उससे वादी को कितनी भी बड़ी आर्थिक हानि क्यों न उठानी पड़े। इस सिद्धान्त की पुष्टि निम्नलिखित वादों से की जा सकती है- -
(अ) ग्लूसेस्टर ग्रामर स्कूल केस, 1410 (Gluseestor Grammer School Case, 1410) में बच्चों की एक पुरानी पाठशाला के अधिकांश बच्चे नई पाठशाला में दाखिल हो गये फलस्वरूप पुरानी पाठशाला को भारी आर्थिक हानि हुई। निर्णय हुआ कि स्वस्थ व्यापारिक प्रतियोगिता द्वारा विपक्षी को भले ही भारी हानि क्यों न उठानी पड़ी हो परन्तु वह वाद योजित करके क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का हकदार नहीं है, क्योंकि प्रतिवादी को स्कूल खोलने का सामान्य अधिकार प्राप्त था।
(ब) चैसमोर वo रिचार्ड (Chesmore Vs Richard, 1859) में वादी एक जलधारा के पानी का प्रयोग अपने मिल के लिये 60 वर्षों से कर रहा था। प्रतिवादी ने अपनी भूमि पर एक गहरा कुआँ खुदवाया जिससे वादी के मिल को पानी मिलना बन्द हो गया। निर्णय हुआ कि वादी हानिपूर्ति पाने का अधिकारी नहीं है, क्योंकि प्रतिवादी को अपनी भूमि पर कुआँ खोदने का सामान्य अधिकार था।
3. कानूनी उपाय (Legal Remedy) अनुचित कार्य ऐसा होना चाहिये जिससे क्षति प्राप्त करने का कानूनी उपाय प्राप्त हो जाये कानूनी उपाय को 'जहाँ अधिकार वहाँ उपाय' (Ubi jus ibi remedium) नामक सूत्र की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि.. जहाँ अधिकार है, वहाँ उसके साथ ही उसके भंग होने की दशा में उसके लिये उपाय भी है। वास्तव में अधिकार तभी स्थिर रह सकता है जब उसे उपभोग करने की सुविधा हो और उसके भंग होने की अवस्था में दोषी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही की जा सके। अतः प्रत्येक अपकार (Wrong) के लिये कानूनी उपाय है। उक्त सूत्र का प्रतिपादन चीफ जस्टिस होल्ट ने एशबी व हाइट 1703 में यह कहते हुये किया था कि प्रत्येक कानूनी अधिकार के उल्लंघन मात्र से हानि होती है भले ही उससे किसी को एक पैसे का भी नुकसान न हुआ हो। दूसरे शब्दों में यदि किसी व्यक्ति का कोई कानूनी अधिकार है तो उसके भंग होने की अवस्था में यह भी आवश्यक है कि उसके पास उसे लागू कराने का उपाय भी होना चाहिये। यदि कोई ऐसा अधिकार है, जिसे भंग होने पर न्यायाल द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता, तो यह एक अर्थहीन औपचारिकता होगी, अतः जहाँ अधिकार है, वहाँ उपाय भी उपलब्ध होता है। स्मरणीय है कि दुष्कृति का सम्बन्ध केवल कानूनी चूकों (Legal Wrongs) से है, नैतिक भूलों (Moral Wrongs) से नहीं। इस बात को अच्छी प्रकार समझने के लिये "अनैतिक कार्य से कार्यवाही का आधार उत्पन्न नहीं होता।" (Ex trupi causa non oritur actio) नामक सूत्र को जानना आवश्यक है। अर्थात् कोई कार्य चाहे कितना भी बुरा या अनैतिक क्यों न हो यदि उससे किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं होता तो उसके लिये दावा दायर नहीं किया जा सकता। उदाहरणार्थ-
(i) यदि एक चोर किसी मकान में चोरी करने के लिये कूदते समय भूमि पर पड़े हुये काँटेदार तारों में उलझकर घायल हो जाता है तो वह मकान मालिक के खिलाफ क्षतिपूर्ति का दावा दायर नहीं कर सकता, क्योंकि चोरी कानूनी न होकर एक अनैतिक कार्य है।
(ii) हीगर्ट व शाइन, 1978 में एक महिला जो अपने मित्र के साथ सम्भोग किया करती थी, को पेशाब की बीमारी लग गई। उसके मित्र ने उससे इस बीमारी को छिपा रखा था। महिला ने क्षतिपूर्ति के लिये वाद दायर किया। निर्णय हुआ कि अनैतिक कार्य से कार्यवाही का आधार उत्पन्न नहीं होता। अतः महिला क्षतिपूर्ति की हकदार नहीं है।
अपकृत्य में मुख्य उपचार यद्यपि अनिर्धारित क्षतिपूर्ति (Unliquidated Damages) का दावा लाना है, किन्तु विशिष्ट मामलों में न्यायालय व्यादेश (Injunction), सम्पत्ति को विशिष्ट रूप से वापस करने तथा स्वामित्व की घोषणा करने आदि का आदेश भी जारी कर सकता है।
अपकृत्य और सिविल दोषों से किस प्रकार भिन्न है ? (How is a Tort different from other civil wrongs) - अपकृत्य अन्य सिविल दोषों अर्थात् संविदा-भंग, न्यास-भंग व संविदा-कल्प से निम्न बातों में भिन्न है-
(i) अपकृत्य और संविदा-भंग में अन्तर
अपकृत्य (Tort)
1 अपकृत्य में व्यक्ति उन कर्तव्यों को भंग करता है, जो प्रारम्भिक रूप में कानून (Law) द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। ऐसे कर्तव्य सामान्य रूप से व्यक्तियों के प्रति होते हैं— जैसे आक्रमण मारपीट या अपमान आदि न करने का कर्तव्य सर्वसाधारण (General Public) के प्रति होता है।
2. इससे लोकलक्षी अधिकार (Right-2. in-rem) का उल्लंघन होता है। यह सारे संसार के प्रति एक अनुचित कार्य होता है।
3. इसमें प्रायः क्षतिकर्त्ता के उस उद्देश्य (Motive) पर विचार किया जाता है, जिसके कारण प्रतिवादी वादी के अधिकारों का उल्लंघन करता है। यदि प्रतिवादी कोई दोषपूर्ण कार्य सदभाव या बाध्यता से करता है तो वह वादी के प्रति किसी अपकृत्य के लिये उत्तरदायी नहीं होगा ।
4. इसमें क्षतिपूर्ति हमेशा अनिर्धारित (Unliquidated) होती है, जिसका उद्देश्य प्राय: दण्डात्मक (Exemplary) होता है।
5. इसमें क्षतिपूर्ति की रकम का निर्धारण स्वयं न्यायालय द्वारा मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
6. इसमें पक्षों के बीच आपसी सहमति के आधार पर कोई पूर्व संविदा सम्बन्ध (Privity) नहीं होता ।
संविदा-भंग (Breach of Contract)
1. संविदा में व्यक्ति उन कर्तव्यों को भंग करता है जो स्वयं पक्षों (Parties) द्वारा नियत किये जाते हैं। ये कर्तव्य किसी विशेष व्यक्ति के प्रति होते हैं-जैसे किसी संविदा के अन्तर्गत कर्तव्य पालन केवल संविदा के एक विशेष पक्ष के प्रति हुआ करता है किसी अजनबी के प्रति नहीं।
2. इसमें व्यक्तिलक्षी अधिकार (Right-in-personam) का उल्लंघन होता । यह केवल किसी एक व्यक्ति विशेष के प्रति अनुचित कार्य होता है।
3. इसमें क्षतिकर्ता के उस उद्देश्य पर ध्यान नहीं दिया जाता जिसके कारण वह प्रतिवादी के अधिकारों का उल्लंघन करता है। अतः प्रतिवादी सदभाव या बाध्यता का बचाव नहीं ले सकता और उसे प्रत्येक स्थिति में वादी की क्षतिपूर्ति करनी होगी। अतः उद्देश्य महत्वहीन है ।
4. इसमें क्षतिपूर्ति प्रायः संविदा की शर्तों के अनुसार पूर्व-निर्धारित (Liquidated) होती है जिसका उद्देश्य प्रायः मुआवजा देना होता है। 5. इसमें क्षतिपूर्ति का निर्धारण संविदा के पक्षों द्वारा पारस्परिक सहमति से संविदा के समय ही निर्धारित कर लिया जाता है ।
6. इसमें पक्षों के बीच आपसी सहमति के आधार पर पूर्व संविदा सम्बन्ध होता है ।
(ii) अपकृत्य एवं संविदा-कल्प में अन्तर
अपकृत्य (Tort)
1. अपकृत्य में क्षतिपूर्ति का दावा ऐसी रकम के लिये किया जाता है जो वादी द्वारा प्रतिवादी को पहले से नहीं दी गई थी।
2. अपकृत्य में वादी का मुख्य उपाय क्षतिपूर्ति तथा सहायक उपाय आत्मरक्षा, निषेधाज्ञा आदि प्राप्त करना है।
3. इसमें प्रतिवादी का हानि न पहुँचाने का कानूनी कर्तव्य सभी व्यक्तियों के प्रति होता है ।
4. इसमें क्षतिपूर्ति की रकम अनिर्धारित होती है ।
संविदा-कल्प (Quasi-Contract)
1. संविदा कल्प में वादी द्वारा ऐसी रकम के लिये दावा किया जाता है जो वादी द्वारा प्रतिवादी को पहले ही दी गई थी या भविष्य में निश्चित सेवाओं के लिये दी जानी थी।
2. संविदा कल्प में क्षतिपूति प्राप्त करना ही एक मात्र उपाय है।
3. इसमें संविदा की तरह यह कर्त्तव्य केवल निश्चित व्यक्ति के प्रति होता है।
4. इसमें क्षतिपूर्ति की रकम निर्धारित (Liquidated) होती है।
(iii) अपकृत्य एवं न्यास-भंग में अन्तर
अपकृत्य (Tort)
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर अपकृत्य मूल रूप से सामान्य विधि (Common Law) का अंग है।
2. इसमें क्षतिपूर्ति का वांद कॉमन लॉ न्यायालय में चलाया जाता था।
3. इसमें क्षतिपूर्ति की रकम अनिर्धारित (Unliquidated) होती है।
4. इसमें पक्षों के बीच कोई पूर्व सम्बन्ध (Privity) नहीं होता है।
न्यास-भंग (Breach of Trust)
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर न्यास-भंग सम्पत्ति विधि (Property Law) का भाग है।
2. इसमें क्षतिपूर्ति का वाद चान्सलरी न्यायालय में ही चलाया जा सकता था ।
3. इसमें क्षतिपूर्ति की रकम संविदा की तरह पूर्व-निर्धारित होती है जिसका अनुमान न्यास-सम्पत्ति को हुई हानि से लगाया जाता है ।
4. इसमें कुछ सीमा तक पक्षों में पूर्व-सम्बन्ध होता है ।
अपकृत्य और अपराध में अन्तर
अपराध (Crime)
1. अपराध में कार्यवाही फौजदारी न्यायालयों में की जाती है
2. इसमें किसी व्यक्ति के लोकलक्षी सार्वजनिक अधिकार (Public Right) का उल्लंघन होता है। यह कृत्य सर्वसाधारण के प्रति अपराध होता है।
3. इसमें कार्यवाही राज्य द्वारा ही की जाती है। यद्यपि क्षतिग्रस्त पक्ष भी अपराधी के विरुद्ध है मुकदमा चला सकता है किन्तु यह कार्यवाही राज्य द्वारा ही की गई समझी जाती है।
4. अपराध का उद्देश्य अपराधी को दण्ड देकर अन्य सम्भावित अपराधियों को आतंकित करना! है ।
5. यह एक सार्वजनिक दोष है जिसके लिये दोषी व्यक्ति को राज्य द्वारा सजा दी जाती है
अपकृत्य (Tort)
1. अपकृत्य के मामले में कार्यवाही दीवानी न्यायालयों में की जाती है।
2. इसमें किसी व्यक्ति के लोकलक्षी व्यक्तिगत अधिकार (Personal Right) का उल्लंघन होता है । यह 'कृत्य व्यक्ति विशेष के प्रति होता है ।
3. इसमें केवल क्षतिग्रस्त पक्ष (Injured Party) द्वारा क्षतिपूर्ति (Damages) का मुकदमा चलाया जा सकता है, किसी अन्य व्यक्ति या राज्य के द्वारा नहीं ।
4. अपकृत्य का मुख्य उद्देश्य क्षतिग्रस्त पक्ष को हुई व्यक्तिगत हानि की पूर्ति करना है।
5. यह एक व्यक्तिगत दोष है जिसके लिये दोषी व्यक्ति द्वारा पीड़ित पक्ष की क्षतिपूर्ति की जाती है ।
क्या एक ही कृत्य अपकृत्य, अपराध एवं संविदा-भंगीकरण हो सकता है ?
(Can the same act be a fort, crime and breach of contract)?
वास्तव में अपकृत्य, अपराध और संविदा-भंग तीनों भिन्न प्रकार के कृत्य हैं फिर भी कभी-कभी ऐसे मामले उत्पन्न हो जाते हैं। जब एक ही कार्य से अपकृत्य, अपराध एवं संविदा-भंग तीनों का जन्म हो जाता है। उदाहरणार्थ - अ एक मोटर गाड़ी खरीदता है और अपने नगर की नगरपालिका से संविदा करता है कि वह नगर क्षेत्र में निर्धारित गति से तेज मोटर गाड़ी नहीं चलायेगा। उस राज्य की दण्ड संहिता में यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति असावधानीपूर्वक तेज गति से मोटर चलायेगा तो उसे दण्ड दिया जायेगा। अ, संविदा की शर्तों को भंग करते हुए असावधानीपूर्वक तेज गति से मोटर चलाता है जिसके कारण व धायल हो जाता है। अ के इस कृत्य के लिये उस पर अपकृत्य, अपराध और संविदा भंगीकरण तीनों का दायित्व उत्पन्न होता है व अपनी क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिये अ पर दीवानी न्यायालय में वाट चलायेगा राज्य सरकार अ पर फौजदारी न्यायालय में अपराध के लिए मुकदमा चलायेगी तथा नगरपालिका उस पर संविदा-भंगीकरण के लिये वाद चलायेगी।
क्या दुष्कृति की कार्यवाही में प्रिविटी आवश्यक है ?
(Is Privity necessary to support an action in tort ?)
नहीं। अपकृत्य की कार्यवाही के लिये पक्षों के पूर्व सम्बन्ध - (Privity) का होना बिल्कुल आवश्यक नहीं है। पीड़ित पक्ष वृथा क्षतिकर्त्ता में ऐसा कोई वैधानिक सम्बन्ध नहीं होता जैसा कि संविदा-भंग में पक्षों के बीच होता है। अपकृत्य में पीड़ित पक्ष को क्षति उसकी सहमति एवं इच्छा के खिलाफ पहुंचाई जाती है तथा पीड़ित पक्ष को यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं होता कि क्षति न पहुँचाने का क्षतिग्रस्त एवं क्षतिकर्त्ता में कोई करार था । अपकृत्य में क्षति संविदा से स्वतन्त्र पहुंचाई जाती है।
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