केन्द्रीय एवं राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषदों के गठन कार्य प्रणाली एवं उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालिये।
Explain
the Constitution Procedure of functioning and Aims and Objects of Central and
State Consumer Protection Councils.
उत्तर-
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों को सर्वोत्तम
संरक्षण प्रदान करना एवं उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए उपभोक्ता परिषदों एवं
अन्य प्राधिकरण की स्थापना करना है। इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अधिनियम की
धारा में एक केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना और गठन के बारे में प्रावधान
किया गया है।
केन्द्रीय
उपभोक्ता संरक्षण परिषद् का गठन (Constitution of Central Consumer Protection
Council)केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् की स्थापना और गठन का अधिकार केन्द्रीय
सरकार को है। केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा ऐसी परिषद् की स्थापना एवं गठन कर सकती
है। केन्द्रीय परिषद् का गठन निम्नलिखित सदस्यों से होगा—
(i)
केन्द्रीय सरकार के उपभोक्ता मामलों का भारसाधक मन्त्री (जो उसका अध्यक्ष होगा),
(ii)
उतने सरकारी या गैर सरकारी सदस्य, जितने निर्धारित (Prescribed ) किये जायें।
सदस्यों
के बारे में व्यवस्था उपभोक्ता संरक्षण नियम, 1987 के नियम 3 में की गई है। प्रथम बार
परिषद् में 150 सदस्यों को स्थान दिया गया है।
अधिवेशनों
की प्रक्रिया (Procedure for Meetings) अधिनियम की धारा 5 के अनुसार केन्द्रीय परिषद्
का वर्ष में कम से कम एक अधिवेशन आयोजित किया जाना आवश्यक होगा। अधिवेशन का स्थान,
समय व प्रकिया अध्यक्ष द्वारा सुनिश्चित की जायेगी। प्रक्रिया के बारे में प्रावधान
उपभोक्ता संरक्षण नियम 1987 के नियम 4 में किया गया है। बैठकों की अध्यक्षता अध्यक्ष
द्वारा और उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष द्वारा की जायेगी बैठकों के लिए कम से कम
दस दिन पूर्व की सूचना जारी की जानी आवश्यक होगी।
केन्द्रीय
परिषद् के उद्देश्य (Aims and Objects of Central Councils) – उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,
1986 का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षण प्रदान करना है। इसी संदर्भ
में उपभोक्ता संरक्षण परिषद् के कुछ उद्देश्य निश्चित किये गये हैं। धारा 6 के अनुसार
केन्द्रीय परिषद् का प्रमुख उद्देश्य उपभोक्ताओं के निम्नलिखित हितों और अधिकारों का
संरक्षण एवं सवर्द्धन करना है-
1.
सुरक्षा का अधिकार- ऐसे माल या सेवाओं के विपणन (Marketing) के विरुद्ध संरक्षण पाने
का अधिकार जो जीवन और सम्पत्ति के लिए हानिकारक हो ।
2.
सूचित किये जाने का अधिकार-माल या सेवाओं की क्वालिटी, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, मानक
और मूल्य के बारे में सूचित किये जाने का अधिकार जिससे कि अनुचित व्यापार-व्यवहारों
से उपभोक्ताओं को संरक्षित किया जा सके।
3.
चयन का अधिकार - जहाँ भी सम्भव हो वहाँ प्रतिस्पर्धा मूल्यों (Competitive Prices)
पर विभिन्न किस्मों के माल या सेवाओं तक पहुंच का आश्वासन दिये जाने या सुलभ कराये
जाने का अधिकार ।
4.
सुनवाई का अधिकार – सुने जाने और यह आश्वासन दिये जाने का अधिकार कि उपभोक्ताओं के
हितों पर समुचित मंचों पर उचित रूप से विचार किया जायेगा।
5.
प्रतितोष का अधिकार अनुचित व्यापार व्यवहार या प्रतिबंधित व्यापार प्रथा या उपभोक्ताओं
के अनुचित शोषण के विरुद्ध उपचार या क्षतिपूर्ति का अधिकार।
6.
शिक्षा का अधिकार—जानकार और जागरूक उपभोक्ता बने रहने के लिए ज्ञान तथा क्षमता प्राप्त
करने का अधिकार अर्थात् शिक्षा का अधिकार ।
राज्य
उपभोक्ता संरक्षण परिषद-उपभोक्ताओं के अधिकारों के संरक्षण और संवर्द्धन हेतु केन्द्र
की तरह राज्यों में भी राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की स्थापना और गठन का प्रावधान
किया गया है। अधिनियम की धारा 7 में ऐसी परिषदों के गठन का अधिकार राज्य सरकारों को
प्रदान किया गया है। राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा अपने राज्य के लिए एक राज्य उपभोक्ता
संरक्षण परिषद की स्थापना कर सकती है।
राज्य
उपभोक्ता संरक्षण परिषद् का गठन (Constitution of State Consumer Protection
Council) – राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद् का गठन एक अध्यक्ष एवं उतने सदस्यों से मिलकर
होगा जितने राज्य सरकार द्वारा निर्धारित किये जायें। परिषद् का अध्यक्ष राज्य सरकार
में उपभोक्ता मामलों का प्रभावी मन्त्री होगा।
कार्य
प्रणाली (Procedure of Functioning) - उपभोक्ता संरक्षण परिषद् की कार्य-प्रणाली राज्य
सरकार द्वारा सुनिश्चित की जायेगी। परिषद् की उतनी बैठकें बुलाई जा सकेंगी जितनी आवश्यक
हो, लेकिन वर्ष में कम से कम दो बैठकें बुलाया जाना आवश्यक होगा। बैठकों का समय व स्थान
अध्यश्व द्वारा तय किया जायेगा और वही बैठकों की अध्यक्षता भी करेगा।
राज्य
परिषद् के उद्देश्य (Objects of State Council) - उपभोक्ता के अधिकारों के संरक्षण
एवं संवर्द्धन की दिशा में राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद् के भी वे ही उद्देश्य हैं
जो धारा 6 में केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद के बताये गये हैं, अर्थात् उपभोक्ता
के निम्नलिखित अधिकारों का संरक्षण एवं संवर्द्धन करना है-
1.
सुरक्षा का अधिकार (Right to be Protected) प्रत्येक उपभोक्ता को ऐसे माल या सेवा जो
जीवन या सम्पत्ति के लिए हानिकारक है, के विपणन (Marketing) के खिलाफ संरक्षण का अधिकार
है।
2.
सूचित किये जाने का अधिकार (Right to be Imformed) - माल या सेवा जैसी भी स्थिति हो,
के गुण, परिणाम, अन्तःशक्ति (Potency), शुद्धता, मानक और मूल्य के बारे में सूचित किये
जाने का अधिकार ताकि अनुचित व्यापारिक व्यवहार के विरुद्ध उपभोक्ता को संरक्षित किया
जा सके।
3.
चयन का अधिकार (Right to Elect) - प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर सेवाओं और माल के विभिन्न
प्रकारों (Variety) तक पहुँच जहाँ तक सम्भव हो, को निश्चित किये जाने का अधिकार ताकि
माल और सेवाओं का उचित चुनाव हो सके।
4.
सुनवाई का अधिकार (Right to be Hoard) यह सुने जाने और सुनिश्चित किये जाने का अधिकार
कि उपभोक्ताओं के हितों का उचित फोरमों पर उचित विचारण किया जायेगा।
5.
प्रतितोष प्राप्त करने का अधिकार (Right to Seck Redressal) अनुचित - व्यापारिक व्यवहार
या अवरोधक व्यापारिक व्यवहार या उपभोक्ताओं के अनुचित शोषण के "विरुद्ध प्रतितोष
प्राप्त करने का अधिकार।
6.
उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार (Right to Consumer Education) एक जानकार - एवं जागरूक उपभोक्ता
बने रहने के लिए ज्ञान और क्षमता प्राप्त करने का अधिकार अर्थात् सम्बन्धित शिक्षा
का अधिकार।
प्रश्न 19 (अ) जिला फोरम
की संरचना एवं विभिन्न क्षेत्राधिकारों सम्बन्धी प्रावधानों का वर्णन कीजिये क्या इसे
किसी ऐसे मामले की सुनवाई का भी क्षेत्राधिकार है जो पहले से ही किसी दीवानी न्यायालय
में विचाराधीन है?
Explain the provisions relating
to the Constitution and different jurisdictions of District Forum. Is it
entitled to decide a dispute relating to a matter already pending before a
civil court?
उत्तर-
जिला फोरम की संरचना (Composition or the Constitution of District Forum) अधिनियम
की धारा 10 में जिला उपभोक्ता मंचों की स्थापना के बारे में प्रावधान किया गया है।
जिला उपभोक्ता मंचों का गठन एक अध्यक्ष एवं दो सदस्यों से मिलकर होता है। इन दो सदस्यों
में एक महिला सदस्या होती है।
योग्यतायें
(Qualifications) अध्यक्ष के रूप में ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जा सकता है, जो
(i)
जिला न्यायाधीश है या
(ii)
जिला न्यायाधीश रह चुका है, या
(iii)
जिला न्यायाधीश होने के योग्य है।
सदस्यों
के रूप में नियुक्ति के लिए ऐसे व्यक्ति पात्र होंगे, जो-
(1)
योग्य, सत्यनिष्ठा एवं प्रतिष्ठा वाले हों,
(ii)
अर्धशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक कार्य या प्रशासन का पर्याप्त ज्ञान एवं अनुभव रखते हों, या
(iii)
तत्सम्बन्धी कार्य करने की योग्यता रखते हों।
चयन
समिति द्वारा नियुक्ति (Appointment by Selection Committee) अध्यक्ष एवं सदस्यों की
नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा गठित एक चयन समिति द्वारा किया जायेगा, जिसके सदस्य निम्नलिखित
व्यक्ति होंगे-
(i)
राज्य आयोग का अध्यक्ष,
(ii)
राज्य के विधि विभाग का सचिव एवं
(iii)
राज्य के उपभोक्ता मामलों का प्रभारी मन्त्री ।
कार्यकाल
(Term of Office) - जिला मंचों के सदस्यों का कार्यकाल पाँच वर्ष की अवधि का या 65
वर्ष तक की आयु प्राप्त कर लेने तक जो भी इनमें से पूर्वतर हो, होगा एक बार सदस्य रह
चुका व्यक्ति पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा।
त्यागपत्र
(Resignation) - कोई भी सदस्य कभी भी लिखित में राज्य सरकार को अपना त्यागपत्र दे सकेगा।
ऐसी दशा में राज्य सरकार द्वारा उसके स्थान पर किसी योग्यता प्राप्त व्यक्ति को सदस्य
के रूप में नामनिर्दिष्ट किया जा सकेगा।
स्मरणीय
है कि यदि जिला मंच के किसी सदस्य द्वारा अपने स्वास्थ्य के आधार पर एक जिले से दूसरे
जिले में सदस्य नियुक्त किये जाने का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया जाता है तो उसे
त्यागपत्र मानकर उस सदस्य को हटाया नहीं जा सकता : श्रीमती रत्ना कुशनूर व स्टेट ऑफ
कर्नाटक, AIR 1994 कर्नाटक 94.
जिला
फोरम के अधिकार-क्षेत्र (Jurisdiction of District Forum) - जिला फोरम को 1. आर्थिक,
2. विषय-वस्तु सम्बन्धी और 3. प्रादेशिक क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं।
1.
आर्थिक क्षेत्राधिकार-धारा 11 के अनुसार, जिला फोरम ऐसे मामलों का विचारण करने की अधिकारिता
रखते हैं जहां माल या सेवा और दावाकृत प्रतिकर यदि कोई हो, की राशि या मूल्य पाँच लाख
रुपये से कम है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि पाँच लाख रुपये तक के मूल्यांकन
वाले विवादों की सुनवाई करने का जिला मंचों को अधिकार है। स्मरणीय है कि पहले यह राशि
एक लाख रुपये थी, सन् 1993 के उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम द्वारा इसे बढ़ाकर
पांच लाख किया गया है। यह अधिकारिता आर्थिक है।
2.
विषय-वस्तु (Subject-matter) सम्बन्धी क्षेत्राधिकार- इसके अनुसार जिला फोरम निम्नांकित
मामलों की सुनवाई कर सकते हैं-
(i)
जहाँ किसी वस्तु की अधिक कीमत वसूल कर ली गई हो भारत ट्रेक्टर्स, मुजफ्फरपुर ब० रामचन्द्र
पाण्डे, प्रथम अपील संख्या सन् 1989 राष्ट्रीय आयोग 15.5.1989.
(ii)
जहाँ बीमा कम्पनी युक्तियुक्त समय में दावों का निपटारा करने में असफल रही हो उम्मेदीलाल
अग्रवाल व युनाइटेड इण्डिया एश्योरेन्स कं. लि०, प्रथम अपील संख्या 3 सन् 1989 राष्ट्रीय
आयोग 28.7.1989,
(iii)
ऑटोरिक्शा चालकों को मीटर चालू रखने तथा मीटर के अनुसार ही किराया वसूल करने से सम्बन्धित
मामले रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिसर, जयपुर ब० नरेन्द्र सिंह वैद, अपील संख्या 14 सन्
1990 राजस्थान आयोग, 23.3.1990,
(iv)
जहाँ यह प्रश्न तय करना हो कि कोई व्यक्ति उपभोक्ता है या नहीं और उपभोक्ता मंचों को
उसे सुनने की अधिकारिता है या नहीं ए० वी० जार्ज कुट्टी ब० स्टेट ऑफ केरल A.I.R.
1994 केरल 19 आदि ।
3.
जिला फोरम का प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction of District
Forum) - धारा 11 (2) में यह बताया गया है कि कोई परिवाद कहाँ प्रस्तुत किया जा सकता
है ? इसके अनुसार कोई भी परिवाद ऐसे किसी जिला फोरम के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता
है, जिसकी स्थानीय अधिकारिता में-
(i)
विरोधी पक्षकार स्वेच्छापूर्वक निवास करता है, या
(ii)
कारवार चलाता है. या
(iii)
उसका शाखा कार्यालय है, या
(iv)
व्यक्तिगत रूप से लाभ के लिए कार्य करता है, या
(v)
पूर्णतः या भागत: वाद हेतुक (Cause of action) पैदा होता है।
डायनावोक्स
इलेक्ट्रॉनिक्स प्रा०लि०, नई दिल्ली ब० बी० जे० एस० रामपुरिया जैन कॉलेज, बीकानेर,
अपील संख्या 4 सन् 1989 राजस्थान आयोग 5.5.1989 के मामले में आयोग ने यह माना है कि
जहाँ वस्तुओं का प्रदाय (Supply) किया गया हो, वहाँ भागतः वाद हेतुक पैदा होता है।
सिविल
न्यायालयों में विचाराधीन मामलों की सुनवाई का क्षेत्राधिकार ऐसे कई मामलों में यह
प्रश्न तय किया जा चुका है कि उपभोक्ता मंच ऐसे मामलों की सुनवाई कर सकते हैं या नहीं
जो सिविल न्यायालयों में विचाराधीन हैं। सभी मामलों में यह निर्धारित किया गया है कि
उपभोक्ता मंच ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं कर सकते जो पहले से ही किसी सिविल न्यायालय
में विचाराधीन हैं। इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण वाद हैं—(क) अध्यक्ष राजस्थान आवासन
मण्डल ब० श्याललाल सोमानी, उदयपुर, अपील संख्या 62 सन् 1989 राजस्थान आयोग,
18.12.1989, (ख) मै० डीस पिस्टन्स प्रा० लि० ब० स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, मूल याचिका
संख्या 18 सन् 1989 राष्ट्रीय आयोग 17.10.1989, (ग) मै० महेश बुक डिपो व नगर परिषद्
अजमेर, R.L.T. 1992 पृष्ठ 134
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