गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

1. उपभोक्ता , 2. परिवाद , 3. सेवा , 4. कमी , 5. उपभोक्ता विवाद, 6. व्यापारी, 7. अनुचित व्यापार व्यवहार , 8. शास्तियाँ सम्बन्धी प्रावधान

निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये-

Write short notes on the following-

1. उपभोक्ता (Consumer), 2. परिवाद (Complaint), 3. सेवा (Service), 4. कमी (Deficiency), 5. उपभोक्ता विवाद (Consumer Dispute ) 6. व्यापारी (Trader). 7. अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice), 8. शास्तियाँ सम्बन्धी प्रावधान (Provisions Relating to Penalties) |

 

उत्तर- उपभोक्ता का अर्थ (Meaning of Consumer) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 2 (1) (घ) के अनुसार ऐसा प्रत्येक व्यक्ति उपभोक्ता है जो-

 

(i) प्रतिफल का भुगतान करके या उसके भुगतान का वचन देकर या उसका आंशिक भुगतान करके और आंशिक भुगतान का वचन देकर या किसी स्थगित (Dcffered) भुगतान की पद्धति के अधीन कोई माल खरीदता है,

(ii) क्रेता के अनुमोदन (Approval) से ऐसे माल को इस्तेमाल करता है,

(iii) प्रतिफल का भुगतान करके या उसके भुगतान का वचन देकर या उसका आंशिक भुगतान करके और आंशिक भुगतान का वचन देकर या किसी स्थगति भुगतान की पद्धति के अधीन किसी सेवा या किन्हीं सेवाओं को भाड़े पर लेता है, तथा

(iv) सेवाओं को भाड़े पर लेने वाले व्यक्ति के अनुमोदन से ऐसी सेवाओं का प्रयोग करता है।

 

उपभोक्ता की आवश्यक शर्ते (Essentials of Consumer) उपरोक्त परिभाषा के अनुसार "उपभोक्ता" के लिए निम्न शर्तों का पूरा होना आवश्यक है-

 

1. किसी माल अथवा वस्तु का खरीदा जाना,

2. किसी सेवा अथवा सेवाओं को भाड़े पर लिया जाना,

3. माल अथवा सेवाओं के बदले में प्रतिफल का भुगतान किया जाना,

4. क्रय या भाड़े पर वस्तुयें या सेवायें प्राप्त करने का प्रयोजन "व्यावसायिक" न होना।

 

स्मरणीय है कि वस्तुओं का क्रय या सेवाओं को भाड़े पर लेने का उद्देश्य व्यावसायिक " (Commercial) नहीं होना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति व्यावसायिक प्रयोजन के लिए वस्तुयें खरीदता है या सेवायें भाड़े पर लेता है तो उसे इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए उपभोक्ता नहीं माना जा सकता ।

 

यह तथ्य महत्व है कि वस्तुयें नगदी पर खरीदी जाती हैं या उधार पर। लेकिन प्रतिफल का होना आवश्यक है निःशुल्क वस्तुयें या सेवायें प्राप्त करने वाला व्यक्ति "उपभाक्ता" की परिभाषा में नहीं आता है।

 

स्वरोजगार के लिए वस्तुओं का खरीदा जाना (To Buy Goods for Self- employment) – जैसा कि उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि व्यावसायिक प्रयोजन के लिए वस्तुओं का क्रय करने वाला व्यक्ति उपभोक्ता नहीं होता. लेकिन इसका एक अपवाद है। यदि कोई व्यक्ति अपने स्वरोजगार के लिए कोई वस्तु क्रय करता है तो उसे उपभोक्ता माना जायेगा। उदाहरणार्थ- एक विकलांग या निर्धन व्यक्ति शासन से ऋण लेकर अपने रोजगार हेतु टाईप मशीन खरीदता है, तो उसे उपभोक्ता माना जायेगा। वास्तव में मूल अधिनियम में यह व्यवस्था नहीं थी। सन् 1993 के उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम द्वारा यह व्यवस्था स्थापित की गई है।

 

उपभोक्ता कौन है ? (Who are Consumers ?) धारा 2 (1) (घ) में परिभाषित उपभोक्ता शब्द व्यापक अर्थ में प्रयोग किया गया है। इसके अन्तर्गत न केवल व्यक्ति बल्कि व्यक्तियों का संगम (Association) भी शामिल माना जायेगा। इसमें प्राकृतिक और 'अप्राकृतिक दोनों प्रकार के व्यक्ति आते हैं। इस प्रकार 'उपभोक्ता' में निम्नलिखित शामिल हैं-

 

(i) प्रत्येक व्यक्ति,

(ii) व्यक्तियों का संगठन भले ही वह पंजीकरण अधिनियम 1860 के अन्तर्गत रजिस्टर्ड है या नहीं,

(iii) हिन्दू अविभक्त परिवार और

(iv) फर्म भले ही वह रजिस्टर्ड है या नहीं।

 

कौन उपभोक्ता नहीं हैं ? (Who are not Consumers ? ) धारा (1) (घ) के अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति उपभोक्ता नहीं होते-

 

(i) वह व्यक्ति जो माल या सेवा को पुनः बेचने के लिये खरीदता है-वह व्यक्ति जो माल को व्यापारिक उद्देश्य के लिए खरीदता है उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आयेगा सिनको टेक्सटाइल्स, जोधपुर ब० ग्रीव्ज़ काटन एण्ड कं० लि०, जयपुर, 1988 में राजस्थान राज्य आयोग ने इस सम्बन्ध में कहा है कि ऐसी दशा में सामान्य अर्थों में वे सारे कार्य जो व्यापार या वाणिज्य से जुड़े हैं तथा जिनका उद्देश्य लाभ प्राप्त करना होता है, 'व्यावसायिक उद्देश्य' माना जायेगा।

 

(ii) वह व्यक्ति जो माल मुफ्त या निःशुल्क सेवा प्राप्त करता है-राष्ट्रीय आयोग ने कन्ज्यूमर यूनिटी एण्ड ट्रस्ट सोसाइटी, जयपुर ब० राजस्थान राज्य (1991) 1.C.P.K. में यह निर्णय दिया है कि सरकारी अस्पतालों तथा उनके डाक्टरों से मरीजों द्वारा प्राप्त निःशुल्क सेवाओं को प्रतिफलार्थ सेवा तथा मरीजों को 'उपभोक्ता' की कोटी में नहीं माना जायेगा।

 

2. परिवाद (Complaint) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 2 (1) (ग) के अनुसार परिवाद से किसी परिवादी द्वारा लिखित में किये गये ऐसे किसी कथन से अभिप्राय है -

 

(i) कि किसी व्यापारी द्वारा अनुचित व्यापार या प्रतिबंधित व्यापार प्रथा का उपयोग किया गया है,

(ii) कि उसके द्वारा क्रय किया गया या क्रय करने के लिए सहमत माल में एक या एकाधिक त्रुटियाँ हैं,

(iii) कि उसके द्वारा भाड़े पर ली गई या उपयोगित या भाड़े पर लिये जाने या उपयोग किये जाने के लिए सहमत सेवाओं में किसी भी प्रकार की कोई कमी है,

(iv) कि व्यापारी ने परिवाद में वर्णित माल या वस्तुओं की उस कीमत से, जो उस समय लागू किसी विधि या उसके अधीन बनाये गये नियमों द्वारा निर्धारित की गई है या माल या वस्तुओं के पैकेज पर प्रदर्शित है, अधिक कीमत वसूल की है,

(v) कि जीवन व सुरक्षा की दृष्टि से जोखिमपूर्ण माल को उसके प्रभाव एवं उपयोग का तरीका प्रदर्शित किये बिना विक्रय के लिए प्रस्तावित किया गया है।

 

परिवाद के आवश्यक तत्त्व-परिवाद के महत्वपूर्ण तत्व हैं-

(i) परिवाद परिवादी द्वारा पेश किया जाता है,

(ii) परिवाद का लिखित में होना आवश्यक है,

(iii) परिवाद में वस्तु अथवा सेवा में किसी कमी, त्रुटि अथवा अधिक कीमत के बारे में दोषारोपण किया जाता है, एवं

(iv) परिवाद में इस अधिनियम के अन्तर्गत उचित अनुतोष की माँग की जाती है।

 

परिवाद का संधारण योग्य होना (When Complaint is Maintainable ? )- किसी परिवाद के संधारण योग्य होने के लिए मुख्य रूप से दो बातें आवश्यक हैं-

 

(i) परिवादी उपभोक्ता हो, एवं

(ii) उसने सेवायें या वस्तुयें प्रतिफलस्वरूप अवक्रय की हो सहायक अभियन्ता, राजस्थान राज्य विद्युत मण्डल केकड़ी क० श्रीमती पानी, अपील सं० 222 सन् 1990 राजस्थान आयोग, 11.3.1991 1

 

3. सेवा (Service) साधारण भाषा में एक व्यक्ति द्वारा दूसरे की सहायता, सेवा, काम या लाभ पहुँचाने के लिए की गई कार्यवाही को सेवा कहते हैं ठीक इसी भाव को अधिनियम में स्वीकार किया गया है। अधिनियम की धारा 2 (1) (ण) में सेवा की परिभाषा दी गई है। इस परिभाषा को हम तीन भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं-

 

(i) वर्णनात्मक परिभाषा (Descriptive Definition),

(ii) समेकित परिभाषा (Inclusionary Definition ) एवं

(iii) वर्जनीय परिभाषा (Exclusionary Definition)  

 

वर्णनात्मक परिभाषा के अनुसार "सेवा से किसी भी वर्णन की कोई सेवा से तात्पर्य है जो उसके प्रत्याशित प्रयोगकर्ताओं को उपलब्ध कराई जाती है।"

 

समेकित परिभाषा के अनुसार "इसके अन्तर्गत बैंककारी, चिट, वित्तपोषण, बीमा, परिवहन, प्रसंस्करण, विद्युत या अन्य ऊर्जा के प्रदाय बोर्ड या निवास या दोनों, गृहनिर्माण, मनोरंजन, आमोद-प्रमोद या समाचारों या अन्य जानकारी पहुँचाने के सम्बन्ध में सुविधाओं का प्रबन्ध भी है।"

 वर्जनीय परिभाषा के अनुसार - "इसमें निःशुल्क वा व्यक्तिगत सेवा संविदा के अधीन सेवा का किया जाना सम्मिलित नहीं है।'

 

इस प्रकार अधिनियम में शब्द "सेवा" को बहुत ही विस्तृत भाव में ग्रहण किया गया है। सेवा की परिभाषा के प्रारम्भिक शब्दों  "किसी भी वर्णन की कोई सेवा” से ही स्पष्ट है कि इसमें सभी प्रकार की सेवाओं को सम्मिलित किया गया है।

इस परिभाषा के अनुसार निम्नलिखित को सेवा माना गया है-

(i) टेलीफोन कनेक्शन: जनरल मैनेजर, टेलीकोम, जयपुर व नीलेश अग्रवाल, रिवीजन सं० 1 न् 1989 राजस्थान आयोग 17.3.1989.

 

(ii) बीमा सम्बन्धी सेवायें उम्मेदीलाल अग्रवाल व यूनाइटेड इण्डिया एश्योरेन्स कं., : प्रथम अपील संo 3 सन् 1989 राष्ट्रीय आयोग 28.7.1989,

 

(iii) रेलवे की सेवायें जनरल मैनेजर, साउथ ईस्टर्न रेलवे ब० आनन्द सिन्हा, प्रथम अपील सं० 3 सन् 1988 राष्ट्रीय आयोग 28.8.1989,

 

(iv) जीवन बीमा सम्बन्धी सेवाय श्रीमती उर्मिला गोयल व सीनियर डिविजनल खोर भारतीय जीवन बीमा निगम, परिवाद सं0 98 सन् 1989 राजस्थान आयोग 16.4.1990,

 

(v) आवासन मण्डल की सेवायें उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद् ऋ० गरिमा शुक्ला प्रथम अपील सं० 5 सन् 1989 राष्ट्रीय आयोग 27.8.1989

 

निःशुल्क एवं व्यक्तिगत सेवा संविदा के अधीन सेवायें इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए "निःशुल्क सेवाओं" एवं "व्यक्तिगत सेवा संविदा के अधीन सेवाओं" को "सेवा" की परिभाषा में सम्मिलित नहीं किया गया है। प्रतिफलस्वरूप प्राप्त की जाने वाली सेवाओं को ही इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए सेवा माना गया है हनुमान प्रसाद दरवान ब० डॉ० सी० एस० शर्मा, एस० एम० एम० हॉस्पीटल, जयपुर परिवाद सं0 3 सन् 1989 राजस्थान आयोग 20.6.1989

 

4. कमी (Deficiency) अधिनियम की धारा 2 (1) (ख) के अनुसार, "कमी से कार्य की क्वालिटी, प्रकृति और रीति में कोई दोष, अपूर्णता, कमी या ऐसी अपर्याप्तता से तात्पर्य है जो उस समय प्रचलित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन बनाये रखे जाने के लिए अपेक्षित है या जिसका ऐसे किसी सेवा के सम्बन्ध में किसी संविदा के अनुसरण में या अन्यथा किसी व्यक्ति द्वारा निष्पादित किये जाने का वचनबद्ध किया गया है।" इस प्रकार " कमी" (Deficiency) से अभिप्राय किसी कार्य के करने से ऐसी गुणवत्ता प्रकृति एवं रीति जो उस समय लागू किसी विधि के अधीन अथवा विधि के द्वारा अपेक्षित है अथवा जिसके किये जाने का किसी व्यक्ति द्वारा सेवाओं से सम्बन्धित किसी संविदा में या अन्यथा वचन दिया गया है, में किसी दोष, अपूर्णता, न्यूनता या अपर्याप्ता से है जहाँ सेवा सम्बन्धी किसी कार्य 1 को करने की गुणवत्ता, प्रकृति अथवा रीति अपेक्षित है वहाँ ऐसी अपेक्षा के अनुरूप ही उस कार्य को पूरा किया जाना चाहिये। यदि उसमें किसी प्रकार का दोष, अपूर्णता, न्यूनता या अपर्याप्ता पाई जाती है तो इसे इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए "कमी" माना जायेगा। उदाहरणार्थ-

 

(i) यदि कोई व्यक्ति वाहन किराये पर लेता है तो वाहन के स्वामी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसी सेवायें प्रदान करें जिससे किराये पर लेने वाले व्यक्ति का अर्थात् उपभोक्ता का प्रयोजन पूरा हो जाये। यदि वाहन उचित रूप से कार्य नहीं करता है या वांछित सेवायें प्रदान करने में असफल रहता है तो इसे कमी माना जायेगा। ऐसी कमी वाहन में किसी दोष के कारण भी हो सकती है सिनको टैक्सटाइल्स प्रा० लि० ब० इकोनोमिक ट्रांसपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन और अन्य (1991) सी० पी० जे० 401 |

 

(ii) बीमा कम्पनी यदि बीमा सम्बन्धी क्लेम को तय करने में किसी प्रकार की लापरवाही बरतती है या दोषपूर्ण कार्य करती है तो यह सेवा सम्बन्धी कमी है उम्मेदीलाल अग्रवाल ब० यूनाइटेड इण्डिया एश्योरेन्स क० (1991) 1 सी० पी० जे० 3

 

(iii) अभिवहन (Transit) में पारेषण (Consignment) का खो जाना सेवा में कमी है। मै० एवरपाक कूरियर्स इण्डिया लि० ब० वी० एस० सुरेश, 1993 आर० एल० टी० 8३

लेकिन हड़ताल के कारण टेलीफोन सेवाओं का ठप्प या अस्तव्यस्त रहना सेवा में कमी नहीं है क्योंकि इसमें सेवायें प्रदत्त करने वाले का कोई दोष नहीं है जनरल मैनेजर, टेलीकोम जयपुर ब० चन्द्र शेखर पाराशर, 1993 आर० एल० टी० 101

 

5. उपभोक्ता विवाद (Consumer Disputes) धाग 2 (1) (ड) के अनुसार "उपभोक्ता विवाद से तात्पर्य ऐसे किसी विवाद से है जिसमें जब वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया है, परिवाद में वर्णित अभिकथनों (दोषारोपण) से इन्कार करता है या उनका प्रतिवाद (बचाव करता है।" इस प्रकार दोषारोपण से इन्कार करना अथवा उसका बचाव करना ही विवाद है। यदि कोई व्यक्ति दोषारोपण को स्वीकार कर लेता है तो पक्षकरों के बीच कोई विवाद नहीं रह जाता। सामान्यतया विवाद से तात्पर्य झगड़ा, विरोध या खण्डन करने से हैं। उदाहरणार्थ---

 

(i) 'क' 'ख' नामक एक दुकानदार से एक टी० वी० खरीदता है और उसके बारे में एक वर्ष की गारन्टी पाता है। दो माह के अन्दर ही उस टी० वी० की पिक्चर ट्यूब खराब हो जाती है। क ख को उसकी मरम्मत करने या उसे बदलने के लिए कहता है। ख यदि उसकी मरम्मत कर देता है या उसे बदल देता है तो दोनों के बीच कोई विवाद नहीं रह जाता है। लेकिन ख यदि ऐसा करने से इन्कार कर देता है तो दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो जाता है। इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए यही 'उपभोक्ता विवाद है।

 

(ii) यदि कोई व्यक्ति उपभोक्ता से अधिक मूल्य वसूल करता है या माल का परिदान देर से करता है तो यह उपभोक्ता विवाद माना जायेगा. रवीन्द्र सिंह व मै० प्रेमनाथ मोटर्स प्रा० लि० 1991 सी० पी० आर 336 राज्य आयोग, शिमला।

 

6. व्यापारी (Trader) धारा 2(1) (थ) के अनुसार, शब्द 'व्यापारी' (Trader) से अभिप्राय ऐसे किसी व्यक्ति से है जो विक्रय के लिए माल का विक्रय या वितरण करता है और इसके अन्तर्गत उसका निर्माता भी शामिल है और जहाँ ऐसे माल का विक्रय या वितरण पैकेज के रूप में किया जाता है वहाँ इसके अन्तर्गत इसका पैकर भी शामिल है।

 

इस प्रकार शब्द " व्यापारी" में निम्नलिखित को सम्मिलित किया गया है—

(i) भाल का विक्रेता (Seller of Goods),

(ii) माल का वितरक (Distributer of Goods),

(iii) माल का निर्माता (Manufacturer of Goods),

(iv) माल का पैकर (Packer of Goods)।

 

शब्द "पैकेज" की परिभाषा इस अधिनियम में नहीं दी गई है। इसकी परिभाषा खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 की धारा 2 (10) में दी गई है, जो इस प्रकार है- "पैकेज से ऐसा बक्स, बोतल, संदूकची, टिन, बैरल, डिब्बा, पात्र, बोरी, थैला, रैपर या अन्य कोई चीज से तात्पर्य है जिसमें खाद्य पदार्थ रखा या पैक किया जाता है।"

 

7. अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practices) इसकी परिभाषा धारा 2 (1) (द) में दी गई है। इस परिभाषा में उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 द्वारा व्यापक संशोधन किये गये हैं। सन् 1993 के संशोधन के पूर्व इसकी परिभाषा में केवल यही कहा गया था कि इस अधिनियम के उद्देश्य के लिये 'अनुचित व्यापार व्यवहार' का अर्थ वही होगा जो एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार अधिनियम 1969 (The Monopolics and Restrictive Trade Practices Act, 1969) की धारा 36-क में दिया गया है। लेकिन अब 1993 के संशोधन द्वारा इस परिभाषा को व्यापक एवं स्पष्ट बना दिया गया है।

 

अब 'अनुचित व्यापार व्यवहार' से तात्पर्य है-किसी माल की बिक्री प्रयोग या आपूर्ति की बुद्धि के लिए या सेवाओं को प्रदान करने के लिए निम्नलिखित को शामिल करते हुए अपनाया गया कोई अनुचित तरीका या अनुचित धोखाधड़ी, नामतः-

 

1. मौखिक या लिखित रूप से या प्रकट अभिवेदन की प्रथा द्वारा--

(i) यह असत्य निरूपित करना कि कोई माल विशिष्ट मानक, गुण, स्तर, मिश्रण, संरचना या प्रतिमान का है।

 

(ii) यह असत्य निरूपण करना कि कोई सेवा विशिष्ट स्तर, गुण या कोटि की है।

 

(iii) यह निरूपित करना कि कोई पुनर्निर्मित, पुरानी, नवीकृत, पुनः अनुकूलित वस्तु नई है,

 

(iv) यह निरूपित करना कि कोई माल या सेवा किसी के द्वारा प्रायोजित, अनुमोदित या निर्मित है अथवा उसमें ऐसा विशिष्ट गुण, उपकरण या उसके कोई उपयोग या लाभ हैं, जबकि वे ऐसी वस्तु या सेवा में विद्यमान नहीं हैं।

 

(v) यह निरूपित करना कि विक्रेता या पूर्तिकर्ता को किसी व्यक्ति का प्रयोजन, अनुमोदन या सम्बद्धता प्राप्त है जबकि ऐसे विक्रेता या पूतिकर्त्ता को वह उपलब्ध नहीं है।

 

(vi) किसी वस्तु या सेवा की आवश्यकता या उसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में गलत या भ्रामक निरूपण करना।

 

(vii) किसी वस्तु या उत्पाद के बारे में जनता को ऐसी वारन्टी या गारन्टी देना कि वह वस्तु या उत्पाद विशेष निष्पादन क्षमता या टिकाऊ वाली है जबकि इस सम्बन्ध में उसकी उचित या पर्याप्त जाँच नहीं की गई है।

 

(viii) जनसाधारण को इस रूप का या यह आभास कराने वाला मिथ्या निरूपण करना कि कोई उत्पाद या वस्तु किसी वारन्टी या गारन्टी वाली है अथवा ऐसा वचन देना कि कोई वस्तु बदल दी जायेगी या संधारित की जायेगी या सुधारी जायेगी या कोई सेवा किसी विशेष परिणाम के प्राप्त होने तक जारी रखी जायेगी, जबकि ऐसी गारन्टी, वारन्टी या वचन सारवान् रूप में भ्रम पैदा करने वाली हो या उसको पूर्ण करने की कोई युक्तियुक्त संभावना न हो।

 

(ix) जनता को मूल्य के बारे में भ्रमित करना, जिस पर उत्पाद या मिलता-जुलता उत्पाद या वस्तुयें या सेवायें बेची गई हैं या साधारणतया बेची जाती हैं तथा इस उद्देश्य के लिए मूल्य के सम्बन्ध में अभिवेदन उस मूल्य में रखा समझा जायेगा जिस पर उत्पाद या वस्तुओं या सेवाओं को संगत बाजार में सामान्यतः विक्रेताओं द्वारा बेचा गया है या प्रदाय (Supply) किया गया है, जब तक कि स्पष्ट रूप से यह विहित (Prescribed) न हो कि किस-किस मूल्य पर उस व्यक्ति द्वारा उत्पाद की बिक्री की गई है या सेवाओं की आपूर्ति की गई है जिसके द्वारा या जिसकी ओर से अभिवेदन किया गया है।

 

(x) अन्य व्यक्तियों या व्यापारियों के माल या सेवाओं को हानि पहुँचाने के आशय से असत्य या भ्रमपूर्ण तथ्यों का निरूपण करना।

 

2. समाचारपत्र या अन्य किसी रूप में उन वस्तुओं या सेवाओं को विक्री या प्रदाय को सौदा मूल्य पर देने के लिए किसी विज्ञापन के प्रकाशन की स्वीकृति देता है जो सौदा मूल्य पर विक्रय या प्रदाय (Supply) करने के लिए तात्पर्वित नहीं है या उस अवधि के लिए या उस मात्रा में दिया जाना, जो उस बाजार में जिसमें व्यवसाय किया जाता है, के स्वरूप, व्यवसाय के स्वरूप आकार 'व विज्ञापन की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए तात्पयित नहीं है।

 

3. अनुमति देता है- (i) जनसाधारण को भेंट पुरस्कार या अन्य सामग्री देने का प्रस्ताव जबकि अभिप्राय ऐसे प्रदाय का नहीं है अथवा निःशुल्क प्रदान करने का प्रस्ताव जबकि वास्तव में सौदे के अन्तर्गत अंशतः या पूर्णतः उसके मूल्य की वसूली पहले ही कर ली जाती है, (ii) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी उत्पाद की बिक्री, उपयोग या आपूर्ति अथवा व्यवसाय हित की वृद्धि के लिए प्रतियोगिता, लॉटरी, देव या कौशल क्रीड़ा का संचालन।

 

4. उपभोक्ता द्वारा प्रयोग के लिए तात्पयित या प्रयोग के लिए संभावित वस्तुओं की बिक्री या प्रदाय की अनुमति यह जानकर या समझकर देता है कि निष्पादन, संगठन, अन्तर्वस्तु, डिजाइन, संरचना, परिसज्जा या पैकिंग के मामले में ये वस्तुयें सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित (Prescribed) स्तर की नहीं हैं।

 

5. माल या सेवा की लागत में वृद्धि के आशय से जमाखोरी करता है या वस्तुओं को विक्रय करने या विक्रय के लिए वस्तुओं को उपलब्ध कराने से इन्कार करता है।

इस प्रकार उपरोक्त सारे कार्य 'अनुचित व्यापार व्यवहार की परिधि में आते हैं।

इस सम्बन्ध में निम्नलिखित मामले महत्वपूर्ण हैं-

 

(क) उत्पादित वस्तु का निर्धारित मानक का न होना-नेशनल कंज्यूमर्स प्रोटेक्शन कमेटी ब० चीफ इलेक्ट्रिकल सुपरवाइजर, 1992 (1) सी० पी० जे० 398 गुजरात स्टेट कमीशन

 

(ख) स्कूटर की बुकिंग निरस्त करने के बाद भी बुकिंग राशि वापस न करना-लतीफ मोहम्मद ब० लोहिया मशीन्स लि० 1992 (2) सी० पी० आर० 572 गुजरात स्टेट कमीशन,

 

(ग) एक यात्रा के लिए दो बार किराया वसूल करना- कामर्शियल मैनेजर इण्डियन एयरलाइन्स ० एस० एन० मुखर्जी 1992 (2) सी० पी० आर 580 कलकत्ता स्टेट कमीशन

 

(घ) स्वर्ण आभूषणों पर स्वर्ण की मात्रा अंकित न करना-श्रीमती हनुमा व० मीना ज्वेलर्स 1992 (1) सी० पी० जे० 269 आन्ध्र प्रदेश स्टेट कमीशन।

 

स्मरणीय है कि अनुचित व्यापार व्यवहार की व्यवस्था सेवाओं पर भी लागू होती है। यह केवल वस्तुओं तक ही सीमित नहीं है, जैसा कि मुकेश जैन ब० वी० के० गुप्ता 1992 2 सी० पी० • जे० 439 में राष्ट्रीय आयोग द्वारा निर्धारित किया गया है।

 

8. शास्तियाँ सम्बन्धी प्रावधान (Provisions Relating to Penalties) - धारा 27 के अनुसार, यदि कोई व्यापरी, परिवादी या ऐसा व्यक्ति जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया है- (i) जिला फोरम, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के किसी आदेश का पालन करने में असफल रहता है, या (H) ऐसे आदेश के पालन का लोप करता है, तो उसे न्यूनतम एक माहं एवं अधिकतम तीन वर्ष तक की अवधि के कारावास तथा न्यूनतम दो हजार रुपये एवं अधिकतम दस हजार रुपये तक की राशि के जुर्माने से दण्डित किया जा सकेगा।

 

जहाँ तक न्यूनतम सजा के प्रावधान का प्रश्न है, विशेष परिस्थितियों में न्यूनतम सजा में कमी की जा सकती है। न्यूनतम सजा से कम सजा का आदेश पारित करना प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है--रेमण्ड सिंथेटिक्स लि० क० वावुलाल खेमका 1993 आर0 एल० टी० 57

 

जहाँ किसी मामले में प्रतिकर के भुगतान का आदेश किया जाता है, वहाँ यह भी आदेश दिया जा सकता है कि प्रतिकर का भुगतान करने में असफल रहने पर दोषी पक्ष को अर्थदण्ड अथवा कारावास की सजा से भी दण्डित किया जा सकता है-भूषण व रोकश अग्रवाल अपील संख्या 9 सन् 19920 हरियाणा राज्य आयोग, 22.10.1990

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