रविवार, 2 जुलाई 2023

कम्प्यूटर प्रणाली : एक परिचय (Computer System : An Introduction)

कम्प्यूटर प्रणाली : एक परिचय
(Computer System : An Introduction)

कम्प्यूटर एक प्रणाली (System) है, प्रणाली से आशय विधियों एवं तकनीकों के एक ऐसे समूह से है जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति में संलग्न होता है । कम्प्यूटर प्रणाली के मुख्यतः निम्न दो भाग होते हैं-

1. हार्डवेयर (Hardware)

2. सॉफ्टवेयर (Software)

हार्डवेयर (Hardware) - कम्प्यूटर के विभिन्न भौतिक अंग जिन्हें हम देख सकते हैं, एवं छू सकते हैं, हार्डवेयर कहलाते है। इस प्रकार कम्प्यूटर प्रणाली में उपयोग किये जाने वाले सभी भौतिक उपकरण सामूहिक रूप से हार्डवेयर कहलाते है। इसके अन्तर्गत समस्त आगम एवं निर्गम इकाईयाँ भण्डारण इकाईयाँ, केन्द्रीय संसाधन इकाइयाँ आदि शामिल हैं ।

हार्डवेयर में निम्न कम्प्यूटर उपकरणों को शामिल किया जाता है

(1) आगम उपकरण ( Input Devices)

(2) सीपीयू (CPU)

(3) निर्गम उपकरण (Output Devices)

(4) द्वितीयक मेमोरी उपकरण (Auxiliary Memory Devices) 

(5) अन्य उपकरण (Other Peripherals)

कम्प्यूटर प्रणाली के तीन प्रमुख भाग होते हैं— 1. आगम (Input) 2. केन्द्रीय संसाधन इकाई (CPU) 3. निर्गम (Output ) । केन्द्रीय संसाधन इकाई (CPU) कम्प्यूटर हार्डवेयर का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग होता है। CPU को कम्प्यूटर का दिमाग (Brain) भी कहा जाता है। सीपीयू ही वह महत्वपूर्ण इकाई है जिसके आधार पर कम्प्यूटर सिस्टम की प्रभावशीलता मापी जाती है। यह इकाई इनपुट इकाइयों से निर्देश प्राप्त कर उन्हें संसाधित (Process) करती है तथा उन्हें आउटपुट इकाइयों को उपलब्ध कराती है ।

(ii) कम्प्यूटर - एक सूचना संसाधनल प्रणाली

(Computer-An Information Processing System)

कम्प्यूटर एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो डाटा को संसाधित (Process) कर उन्हें सूचनाओं में बदलता है ।

Data - Process - Information

डाटा (Data) – डाटा, डेटम शब्द का बहुवचन है । यद्यपि डाटा शब्द एकवचन एवं बहुवचन दोनों के रूप प्रयुक्त होता है, डाटा को किसी भी तथ्य अवलोकन या मान्यता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यह तथ्यात्मक वितरण होता है जिसका निर्णय, परिचर्चा, गणना आदि हेतु उपयोग किया जा सकता है। डाटा संख्या, अक्षर या प्रतीकों के रूप में हो सकता है।

व्यवसायिक कार्यों हेतु निर्णयन के लिए सूचनाओं ( Information) की आवश्यकता होती है। सूचनाओं की उपलब्धता पर ही निर्णयन की प्रभावशीलता निर्भर करती है। डाटा को संसाधित कर सूचनाएँ बनाई जाती है ।

सूचनाएँ (Information ) - सूचनाओं से आशय वर्गीकृत या संगठित डाटा से है. उपयोगकर्त्ता या प्रबन्धकों के लिए सूचनाओं का ही महत्त्व होता है। सूचना डाटा का संसाधित रूप होती है। प्रबन्धकों के लिए डाटा नहीं सूचनाएँ महत्वपूर्ण होती है। सूचनाओं की उपलब्धता की मात्रा एवं किस्म इस पर निर्भर करती है कि इनका संसाधन किस प्रकार किया गया है ।

प्रोसेसिंग (Processing) - सूचनाओं हेतु डाटा को संसाधित (Process) करना होता है। संसाधन से आशय डाटा को पुर्नव्यवस्थित या पुर्नसंगठित (reorganise ) प्रकार से किया जा सकता है-

(1) मानव द्वारा (Manually) 

(2) मशीन द्वारा (Mechanically)

(3) इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों द्वारा (Electronically)

कम्प्यूटर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है। इसके द्वारा डाटा को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से संसाधित कर सूचनाएँ उत्पन्न की जाती है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों द्वारा सूचना उत्पन्न करना शीघ्र व विश्वसनीय होता है। इस प्रकार कम्प्यूटर एक ऐसा उपकरण है। जो डाटा - को संसाधित कर सूचना उत्पन्न करता है।

'कम्प्यूटर के उद्भव से पूर्व डाटा का संसाधन मानव या मशीनों द्वारा किया जाता था। यह प्रक्रिया धीमी एवं त्रुटिपूर्ण थी, इस कारण व्यावसायिक कार्यों हेतु प्रबन्धकों को समय पर सूचनाएँ उपलब्ध नहीं हो पाती थी । पर्याप्त सूचनाओं के अभाव से प्रबन्धक समयोचित निर्णय नहीं ले पाते थे । 

कम्प्यूटर के उद्भव ने डाटा प्रोसेसिंग क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है। इसी कारण वर्तमान समय को सूचना युग ( Information Age) या ज्ञान अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) की संज्ञा दी जा रही है ।

सूचनाओं के अथाह समुद्र ने जहाँ सूचनाओं की अनुपलब्धता को बीते युग की बात साबित किया है वहीं प्रबन्धकों के सामने यह चुनौती भी दी है कि वे उचित सूचनाओं पर ध्यान केन्द्रित करें। इस प्रकार कम्प्यूटर क्रान्ति ने सूचनाओं की अनुपलब्धता की जगह सूचनाओं के चयन (Selection of Information) की चुनौती प्रबन्धकों के सामने उत्पन्न की है

(iii) डाटा प्रोसेसिंग के चरण

(Steps of data processing) डाटा प्रोसेसिंग हेतु निम्न प्रक्रियाएँ सम्पन्न करनी होती हैं-

1. रिकार्ड करना (Recording ) – रिकॉडिंग से आशय डाटा को स्थायी रूप से संचित करने से है। सभी व्यावसायिक क्रियाओं को रिकॉर्ड करना आवश्यक होता है, तभी उन्हें सूचनाओं के रूप में बदला जा सकता है। मेन्युअल विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित क्लर्क पुस्तकों में प्रविष्टि करता है जबकि इलेक्ट्रॉनिक विधि के अर्न्तगत की-बोर्ड की सहायता से डाटा प्रविष्ट किये जाते है ।

2. वर्गीकरण (Classification ) – इस चरण के अन्तर्गत डाटा को विभिन्न समूहों में वर्गीकृत किया जाता है। इसके अन्तर्गत डाटा की कई श्रेणियाँ एवं उप-श्रेणियाँ तैयार की जाती है। वर्गीकरण का आधार डाटा प्रोसेसिंग की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित किया जाता है । वर्गीकरण का आधार विभाग या क्रियाएँ भी हो सकती हैं जैसे क्रय विक्रय, भुगतान आदि ।

3. क्रमबद्धता (Sorting) – इसके अन्तर्गत डाटा को बढ़ते हुए (Ascending ) या घटते हुए (Descending) क्रम में व्यवस्थित किया जाता है। ऐसी क्रमबद्धता संख्या या अक्षरों के आधार पर हो सकती है।

4. गणना (Calculating ) – इस चरण के अन्तर्गत डाटा में जोड़, बाकी, गुणा आदि कर वांछित परिणाम प्राप्त किये जाते हैं । यह प्रोसेसिंग प्रक्रिया का प्रमुख चरण है। 

5. संक्षिप्तिकरण (Summarising ) – इस स्तर पर गणना से प्राप्त परिणामों में से मुख्य परिणामों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इस स्तर पर अन्तरवर्ती (Intermediate) परिणामों को हटा दिया जाता है । 

6. प्रस्तुतीकरण (Reporting) – इस चरण में संक्षिप्तीकरण की प्रक्रिया द्वारा प्राप्त - डाटा को प्रबन्ध द्वारा चाहे गये स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता है। रिपोर्ट में ग्राफ एवं चित्रों का उपयोग कर उसे आकर्षक बनाया जा सकता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि कम्प्यूटर द्वारा डाटा को प्रोसेस कर सूचनाओं में परिवर्तित किया जाता है। व्यवसायिक संगठनों के बढ़ते आकार को देखते हुए मेन्युअल एवं मैकेनिकल डाटा प्रोसेसिंग उपयुक्त नहीं है। इसलिए कम्प्यूटर ने सूचना प्राप्ति प्रक्रिया का क्रान्तिकारी रूप से कायापलट कर दिया है। डाटा प्रोसेसिंग जो दिन एवं महीनों का कार्य होता था • मिनट एवं सेकण्ड्स का हो गया है। कम्प्यूटरों में सूचनाएँ उत्पन्न करने की अथाह क्षमता होती है जिसे प्रबन्धक अपनी आवश्यकतानुसार उपयोग कर सकते हैं।

कम्प्यूटर का उद्भव 
Origin of computer. 

(Computer : An Introduction)
कम्प्यूटर : एक परिचय

कम्प्यूटर 20 वीं सदी की एक अद्भुत मशीन है। 1982 में टाइम मेग्जीन द्वारा इसे (Man of the year) की उपाधि दी गई। प्रारम्भिक काल में कम्प्यूटर्स का उपयोग केवल वैज्ञानिक एवं अन्तरिक्ष सम्बन्धी कार्यों में किया जाता था। 1960 के दशक से कम्प्यूटर्स का व्यवसाय के क्षेत्र में काफी महत्त्व बढ़ गया है। वर्तमान में जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है। जिसमें कम्प्यूटर्स का उपयोग नहीं किया जा रहा हो । शिक्षा, विज्ञान चिकित्सा विज्ञान, रक्षा, •अनुसंधान, आर्चितेक्चर आदि क्षेत्रों में कम्प्यूटर्स का उपयोग किया जा रहा है।

कम्प्यूटर का उद्भव ( Origin of Computer)

गणन उपकरण (Counting Device)
जेकडिस लूम (Jacquard's Loom) 
डिफेरेन्सियल इन्जिन (Differential Engine)
केलकुलेटर (Calculator) 
पंच कार्ड (Punch Card) 
एनलॉग कम्प्यूटर (Analog Computer)
डिजिटल कम्प्यूटर (Digital Computer)

I. गणन उपकरण (Counting Devices) 

(i) एबेकस (Abacus) - यह सबसे पहले तैयार किया गया उपकरण था, जिसका उपयोग अंकगणित में गणना हेतु किया जाता था। इसके अन्तर्गत तारों पर चलित बस (गोलियाँ) लगी होती है, जिन्हें एक तरफ से खिसका कर गणना की जाती है। इसका आविष्कार चीन के एक वैज्ञानिक द्वारा किया गया था। वर्तमान एबेकस में बीड्स (गोलियों) की काफी संख्या होती है जो आयताकार आकार की आकृति में स्थित तारों पर लगी होती है। वर्तमान में एबेकस का उपयोग बच्चों को अंकगणित के सिद्धान्त समझाने के लिए किया जाता है । 

(ii) लिखित मेन्यूअल (Written Manual) - अरबी शब्द 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 एवं 0 गणन कार्य हेतु सबसे उपयुक्त नम्बर है। 1614 में जोन नेपियर की logarithm की टेबल ने बड़ी संख्या के गणन कार्यों को काफी आसान कर दिया । इस विधि को नेपियर बन्स (Napier's Bones) कहा जाता था । इन नेपियर बोनस ने गणन कार्य को काफी सरल कर दिया। राबर्ट बिसाकर द्वारा विकसित स्लाइड रुल (Slide rule) को एनलॉग कम्प्यूटर का पूर्ववर्ती कहा जा सकता है । 

(iii) मेकेनिकल केलकुलेटर (Mechanical Calculator) – 1642 में ब्लेज पास्कल ने केलकुलेटिंग मशीन का आविष्कार किया। यह मशीन संख्याओं के आठ कॉलम को जोड़ सकती थी । 1673 में गोटफ्रीड विल्हेम वोन लिबनिट्ज (Gottfried Wilhelm Von Leibnitz) ने पास्कल की गणन मशीन बनाई जो जोड़, बाकी, गुणा, भाग कर सकती थी। 1820 में चार्ल्स जेवियर थामस ने कुलकुलेटर का निर्माण किया जिसे वर्तमान कम्प्यूटर का पूर्वगामी कहा जा सकता है । 

II. जैकार्डस लूम (Jacquard's Loom) - 1801 में जोसफ एम जैकार्ड ने वीविंग लूम में विभिन्न डिजायनों हेतु भिन्न-भिन्न छेद वाले विभिन्न कार्डों का उपयोग किया । इसी सिद्धान्त के आधार पर बाद में सूचना को संग्रहित करने के लिए पंचकार्डस का उपयोग हुआ। इनमें मशीनी अंगुलियों (Mechanical Fingers) का उपयोग किया गया था। . III. बैबेज डिफरेन्सियल इंजिन (Babbage's Differential Engine) 1812 में एक अंग्रेज गणितज्ञ चार्ल्स बैबेज ने यह पाया कि जैकार्डस लूम के सिद्धान्तों का उपयोग संख्यात्मक गणनाओं हेतु किया जा सकता है। बैबेज के अनुसार यदि गणन से पूर्व गणन कदमों को स्टोर कर लिया जाये तो गणन कार्य मशीन द्वारा बिना किसी सहायता के किया जा सकता है। बैबेज ने डाटा प्रोसेसिंग हेतु 'स्टार्ड प्रोग्राम' की विचारधारा को जन्म दिया, जो केलकुलेटर को कम्प्यूटर से अलग करती है। सर्वप्रथम चार्ल्स बैबेज ने ही कम्प्यूटर के आविष्कार के लिए महत्वपूर्ण परिकल्पना की थी। इसलिए चार्ल्स बैबेज को कम्प्यूटर का जन्मदाता माना जाता है। बैबेज डिफरेन्सियल इंजिन में इनपुट-आऊटपुट उपकरण, गणितीय यूनिट एवं मेमोरी यूनिट थे । यही भाग वर्तमान कम्प्यूटर में होते है । 1842 में बैबेज ने एनालिटीकल इंजिन (Analytical Engine) बनाया जो प्रति मिनट 60 जोड़ कर सकता था।

IV. केलकुलेटर (Calculator)

1872 में फ्रेक बाल्डविन ने केलकुलेटर का आविष्कार किया। इसी के आधार पर जे० आर० मोनरु (J. R. Monroo) द्वारा रोटरी की बोर्ड केलकुलेटर का आविष्कार किया गया। ये मशीनें स्वचालित नहीं थी क्योंकि डाटा इनपुट एवं मशीनों के परिचालन हेतु मानवीय प्रयास आवश्यक थे

V. पंच कार्ड (Punch Card)

अमेरिका में डॉ. हर्मन होलेरिथ (Herman Hollerith) ने 1890 में विद्युत चालित प्रथम कार्ड मशीन का उपयोग किया। डॉ० जेम्स पावर्स द्वारा 1908 में समान्तर पंचिंग मशीन का आविष्कार किया गया। डॉ० जेम्स द्वारा सोर्टिंग मशीन एवं टेवुलेटर्स का भी विकास, जिसका 1910 में अमेरिका की जनसंख्या की गणना में उपयोग किया गया। पंच कार्डस का उपयोग 1960 तक काफी हुआ ।

VI. एनलॉग कम्प्यूटर (Analog Computer)

1942 में MIT के वेनेवर बुश ने एक ऐसी मैकेनिकल प्रणाली की खोज की जो गणितीय क्रियायें कर सकती थी। इसमें संख्याओं की अपेक्षा निरन्तर गति का उपयोग किया जाता था। इसलिए इसे एनलॉग कम्प्यूटर कहा जाता है। 1950 में इलेक्ट्रॉनिक एनलॉग कम्प्यूटरर्स का उपयोग शुरू हुआ। 1950 से 1965 तक एनलॉग कम्प्यूटर्स का केमिकल प्लांट्स एयरक्राफ्ट उद्योग में काफी उपयोग हुआ। एनलॉग कम्प्यूटर्स की सबसे बड़ी कमी यह थी कि ये केवल डिफरेन्सियल इक्वेशन को ही हल कर सकते थे ।

एनलॉग कम्प्यूटर के उपयोग-

केमिकल प्लाण्ट्स

पेट्रोलियम रिफाइनरीज एयरक्राफ्ट उद्योग

इलैक्ट्रिक पावर प्लान्ट

इलेक्ट्रॉनिक घड़ियाँ, थर्मामीटर, स्पीडोमीटर, वोल्टेज मीटर आदि एनलॉग कम्प्यूटर के उदाहरण हैं। ये ताप, दबाव एवं विद्युत प्रवाह को मापने हेतु उपयोगी होते हैं।

VII. डिजीटल कम्प्यूटर (Digital Computer) - 1937 में हारवर्ड विश्वविद्यालय के होवर्ड एकन (Howard Aiken) ने IBM के सहयोग से पूर्णतः स्वचालित गणन मशीन की रचना की। यह मशीन पंच कार्ड तकनीक पर आधारित थी । यह मशीन बहुत बड़े आकार (50 फीट लम्बी एवं 8 फीट ऊँची) की एवं जटिल संरचना (300 इलेक्ट्रिकल स्विच ) युक्त थी । यह मशीन पाँच गणितीय कार्य सम्पन्न कर सकती थी— जोड़, गुणा, बाकी, भाग एवं टेबल सन्दर्भ । यह मशीन दो संख्याओं का जोड़ करने में 0-3 सैकण्ड व गुणा करने में 4.5 सैकण्ड लेती थी ।

डिजीटल कम्प्यूटर के उपयोग- 
डिजीटल कम्प्यूटर उन डाटा पर कार्य करते हैं जो बाइनरी डिजीट्स (0 या 1) के रूप में होते है । 
डिजीटल कम्प्यूटर गणितीय क्रियाओं के साथ-2 तार्किक क्रियाएँ भी करता है । 
डिजीटल कम्प्यूटर का उपयोग मुख्य रूप से गणितीय, सांख्यिकी, ऑपरेशन रिसर्च, इंजिनियरिंग, लेखा कार्य आदि में किया जाता है। 
डिजिटल कम्प्यूटर में डाटा एवं निर्देश को एक साथ इनपुट किया जाता है।

VIII. हाइब्रिड कम्प्यूटर (Hybrid Computer) - 'हाइब्रिड' शब्द से आशय मिश्रण से है अर्थात् ऐसा कम्प्यूटर जो एनालॉग एवं डिजीटल कम्प्यूटर के मिश्रण से बना हुआ हो उसे हाईब्रिड कम्प्यूटर कहते है। हाईब्रिड कम्प्यूटर में एनलॉग व डिजीटल दोनों प्रकार के कम्प्यूटरों की विशेषताएँ होती हैं । हाईब्रिड • कम्प्यूटर में डाटा को एनलॉग से डिजीटल व डिजीटल से एनलॉग में परिवर्तित किया जा सकता है। हाइब्रिड कम्प्यूटर गणन कार्य के साथ-साथ मापन का कार्य भी कर सकते हैं। ये कम्प्यूटर तापमान, गति, विद्युत वितरण कम्पनियों द्वारा सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इनके माध्यम से रोगों के तापमान, रक्तचाप, दिल की धड़कन आदि का डिजीटल आउटपुट प्राप्त किया जा सकता है। ये कम्प्यूटर महँगे होते हैं ।

कम्प्यूटर का विकास क्रम
(Evolution of Computers)

3000 BC - एबेकस (ABACUS) 

1600 - अरबी गणित (Arabic Math)

1614 - जॉन नेपियर की लॉक तेबलस (Logarithm by John Napier)

1822 - चार्ल्स बैबेज का डिफरेन्शियल इंजिन (Differential Engine by Charles Babbage)

1850 - जार्ज बूले द्वारा बुलियन लॉजिक का विकास (Development of Boolean Logic by George Boole) 

1872 - फ्रेंक बाल्डविन द्वारा केलकुलेटर का आविष्कार A(Invention of Calculator by Frank Boldwin) 

1890 - हर्मन होलेरिथ द्वारा पंच कार्ड का विकास (Development of Punch Card by Herman Hollerith)

1942 - वेनेवर बुश द्वारा एनलॉग कम्प्यूटर का विकास (Development of Analog Computer by Venever Bush)

1950 - टूरिंग द्वारा आटोमेटिक कम्प्यूटिंग इंजिन का विकास जो प्रथम डिजिटल कम्प्यूटर था ( Development of first digital computer by Turing ) 

1975 - एडवर्ड राबर्ट द्वारा माइक्रोकम्प्यूटर की रचना (Design of micro Computer by Edward Roberts)

1976 - CRAY-I सुपर कम्प्यूटर का विकास. (Development of CRAY-I Super Computer)

1977 -:एप्पल माइक्रोकम्प्यूटर का विकास (Development of Apple Micro Computer)

1980 -;IBM द्वारा घरेलू उपयोग हेतु पर्सनल कम्प्यूटर्स का निर्माण (Production of personal computers by IBM)

कम्प्यूटर की विभिन्न पीढ़ियां 
Various generations of computer. 

कम्प्यूटर पीढ़ियाँ

(Generations of Computer)

उपरोक्त विवरणों से स्पष्ट है कि अबेकस से शुरू हुई कम्प्यूटर की विकास यात्रा कई चरणों से गुजरते हुए वर्तमान डिजीटल कम्प्यूटर तक पहुँची। 1946 में विकसित ENIAC (Electronic Numerical Integrator and Calculator) को प्रथम इलैक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर कहा जा सकता है। इसके बाद EDVAC; EDSAC आदि कम्प्यूटर्स Vaccum Tube पर आधारित आये। इसके बाद ट्रांजिस्टर, इंटिग्रेटेड, सर्किट, LSI, VISI सर्किट पर आधारित 'कम्प्यूटर्स विकसित होते गये। समय के साथ-साथ कम्प्यूटर की प्रोसेसिंग एवं संग्रहण क्षमता में वृद्धि होती गई तथा आकार एवं कीमतों में कमी होती गई। 1950 तक कम्प्यूटर्स का उपयोग सेना, इंजीनियरिंग एवं विज्ञान के क्षेत्रों में तक ही सीमित था । 1950 के बाद इसका व्यवसायिक क्षेत्रों में उपयोग होना शुरू हुआ तथा 1995 के बाद तो इसका उपयोग घरेलू कार्यों तक में होने लगा है। कम्प्यूटर के इसी विकास-क्रम को निम्नलिखित पाँच पीढ़ियों के अन्तर्गत वार्णित किया गया है- 

1. प्रथम पीढ़ी (First Generation 1947-1959) 1946 में जे० पी० एकर्ट (J. P. Eckert ) एवं जाँन मुचली (John Mauchly) कम्प्यूटर द्वारा प्रथम इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर ENIAC (Electronic Numerical Integrator and Calculator ) का आविष्कार पेनिसिलवेनिया विश्वविद्यालय की मूर स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में किया गया। इसमें 18000 वैक्यूम ट्यूब्स (Vacuum Tubes) का उपयोग किया गया था। यह दो संख्याओं को 200 माइक्रोसैकण्ड्स में जोड़ता था । तथा 2000 माइक्रोसैकण्ड्स में गुणा करता था । यह लगभग 150 वर्गमीटर क्षेत्र घेरता था ।

1945 में वॉन न्यूमैन (Von Newmen) ने 'स्टोर्ड प्रोग्राम कम्प्यूटर (Stored Program Computer) का विकास किया। इसमें डाटा के साथ निर्देश भी स्टोर होते थे जिससे स्वचालित क्रियायें हो सकें। इसे EDVAC (Electronic Discrete Variable Automatic Computer) कहा जाता है। इसमें सर्वप्रथम बाइनरी गणित का उपयोग हुआ। इसी विचारधारा के आधार पर ब्रिटेन के केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के मोरिस विकल्प (Mauris Wilkes) EDSAC (Electronic Delay Storage Automatic Calculator) विकास किया। इसमें जोड़ 1500 माइक्रोसैकण्ड्स में व गुणा 4000 माइक्रोसैकण्ड्स में होता था। 1950 में रेमिंगटन रैंड कम्पनी द्वारा UNIVAC-1 का विकास किया गया। इसमें वैक्यूम ट्यूब्स का उपयोग होने के कारण विद्युत खर्च काफी होता था व ट्यूब्स में उपयोग होने वाले फिलामेंट की आयु काफी कम होती थी। इसमें कार्यक्रम मशीन भाषा (0-1) में लिखे जाते थे ।

मुख्य विशेषताएँ - प्रथम पीढ़ी के कम्प्यूटर्स की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं- 

1. अत्यधिक खर्चीली प्रणाली

2. अधिक विशाल आकार

3. धीमी गति

4. मुख्य स्विचिंग डिवाइस वेक्यूम ट्यूब

5. संग्रहण डिवाइस — मैग्नेटिक ड्रम 

6. प्रोग्रामिंग भाषाएँ - मशीन भाषा व एसेम्बली भाषा

II. द्वितीय पीढ़ी (Second Generation 1959-1965) 1947 में अमेरिका की बेल लेबोरेट्री में कार्यरत जोन बारडीन (John Bardeen), वाल्टर ब्रेटेन (Walter Brattain) एवं विलियम शॉकले (William Shockley) द्वारा ट्रांजिस्टर का विकास किया गया। वैक्यूम ट्यूब्स में फिलामेंट का उपयोग होता था जिसका जीवनकाल काफी छोटा होता था जबकि ट्रांजिस्टर में जरमेनियम सेमीकण्डक्टर (Germanium Semi Conductor) का उपयोग होता है जो कि काफी कम स्थान व विद्युत शक्ति का उपयोग करते है । इन कम्प्यूटर्स में प्रिंटेड सर्किट्स का उपयोग किया गया। ICT 1300 व IBM 1401 इन कम्प्यूटरों में लगभग 10,000 ट्रांजिस्टर्स का उपयोग होता था ।

इसी काल में डाटा स्टोरेज हेतु मेग्नेटिक कोर का आविष्कार हुआ। मेग्नेटिक कोर फेराइट की बनी हुई छोटी-छोटी रिंग्स होती है जो चुम्बकीकृत (Magnetised) होती हैं । मेग्नेटिक डिस्क का आविष्कार भी इसी चरण में हुआ । इस प्रकार इस युग के कम्प्यूटर अधिक शीघ्र परिणाम देने वाले तथा प्रथम चरण के कम्प्यूटरों की अपेक्षा अधिक मेमोरी क्षमता वाले थे। इसी चरण में उच्चस्तरीय भाषाओं जैसे FORTRAN, COBOL, ALGOL आदि का विकास हुआ। इस चरण में व्यवसाय एवं उद्योग के क्षेत्र में कम्प्यूटरों के उपयोग में काफी वृद्धि हुई । IBM 605 इसका उदाहरण है।. मुख्य विशेषताएँ - द्वितीय पीढ़ी के कम्प्यूटर्स की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

1. छोटा आकार

2. शीघ्र गणन कार्य

3. अधिक वाणिज्यिक उपयोग

4. मुख्य स्विचिंग डिवाइस ट्रांजिस्टर

5. संग्रहण डिवाइस-मैग्नेटिक कोर मेमोरी, मेग्नेटिक टेप एवं मेग्नेटिक डिस्क 

6. प्रोग्रामिंग भाषाएँ - उच्चस्तरीय भाषाएँ जैसे—BASIC, COBOL एवं FORTRAN आदि ।

III. तृतीय पीढ़ी (Third Generation 1965-1975) इस चरण में इंटीग्रेटेड सर्किट्स (Integrated Circuits) (IC) का आविष्कार हुआ। इसमें एक ही चिप पर हजारों की संख्या में ट्रांजिस्टर रजिस्टर, कैपेसिटर्स को स्थित - किया जा सकता है। इससे कम्प्यूटर का आकार काफी छोटा हो गया तथा सर्किट्स की स्विचिंग गति काफी बढ़ गई जिससे शक्तिशाली सी० पी० यू० (C.P.U. ) का निर्माण होने लगा जो कि प्रति सैकण्ड 10 लाख निर्देशों का पालन कर सकते है। इससे नेनो सैकण्ड्स (Nano-Seconds) जो कि माइक्रोसैकण्डस का एक हजारवां भाग है में कार्य होने लगा । IBM-360, ICL-1900 जैसे प्रमुख कम्प्यूटर इस चरण में विकसित हुए । कम्प्यूटर का आकार छोटा होने के कारण इसकी पोर्टेबिलिटी बढ़ गई। 

इसी चरण में विभिन्न प्रकार के इनपुट-आउटपुट उपकरणों का विकास हुआ।

Optical Scanners, MICR, Graph plotters आदि का विकास इसी चरण में हुआ। कम्प्यूटर्स का उपयोग नवीन क्षेत्रों जैसे उत्पाद किस्म, ग्राहक सेवा, वायुगान आरक्षण आदि में होने लगा। इस चरण में उच्चस्तरीय भाषाओं में और सुधार हुआ। इसी चरण में प्रथम मिनी कम्प्यूटर का आविर्भाव हुआ ।

मुख्य विशेषताएँ-तृतीय पीढ़ी के कम्प्यूटर्स की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—

1. काफी छोटा आकार

2. रख-रखाव खर्च में कमी

3. वाणिज्यिक उत्पादन प्रारम्भ

4. मुख्य स्विचिंग डिवाइस- इन्टीग्रेटेड सर्किट 

5. संग्रहण डिवाइस — उच्चस्तरीय मैग्नेटिक कोर

6. प्रोग्रामिंग भाषाएँ - PL/ 1, COBOL 68 एवं FORTRAN IV आदि ।

IV. चतुर्थ पीढ़ी (Fourth Generation 1976-1990) इस चरण में कम्प्यूटर्स में माइक्रो-प्रोसेसर चिप्स का उपयोग होने लगा। ऐसा लार्ज स्केल इंटीग्रेशन (LSI) चिप्स के उद्गम से संभव हुआ । वर्तमान में LSI चिप्स कम्प्यूटर्स के दिमाग के रूप में कार्य करती है। इससे काफी छोटे एवं शक्तिशाली कम्प्यूटर्स का विकास संभव हुआ एवं कम्प्यूटर की लागतों में काफी कमी हुई है। डिस्क मेमोरी की क्षमता मेगाबाइट्स की जगह गीगा बाइट्स (GB) में आने लगी है। फ्लापी डिस्क ने स्टोरेज को काफी सस्ता बना दिया तथा कम्प्यूटर नेटवर्क का विकास हुआ। कम्प्यूटर्स का उपयोग चिकित्सा, इंजीनियरिंग डिजाइन आदि क्षेत्रों में काफी अधिकता से होने लगा है। ADA, Pascal, C आदि प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास इसी चरण हुआ ।

मुख्य विशेषताएँ - चतुर्थ पीढ़ी के कम्प्यूटर्स की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं- 

1. अत्यधिक छोटा आकार

2. आसान पोर्टेबिलिटी 

3. अत्यधिक सस्ते उपकरण

4. तीव्र प्रोसेसिंग

5. मुख्य स्विचिंग डिवाइस - LSI सर्किट

6. संग्रहण डिवाइस - सेमीकण्डक्टर मेमोरी 

7. प्रोग्रामिंग भाषाएँ— उच्चस्तरीय भाषाओं जैसे -C, Pascal, ADA आदि का उपयोग

8. एयर कंडीशनिंग की आवश्यकता नहीं। v. पंचम पीढ़ी (Fifth Generation 1990 onwards )

वर्तमान में वैज्ञानिकों का प्रयास कम्प्यूटर में कुछ मात्रा तक कृत्रिम बुद्धि डालना है जिससे कम्प्यूटर केवल मानवीय निर्देशों पर ही निर्भर नहीं रहे। इस चरण में क्रमगत ढाँचे (Serial Structure) की अपेक्षा समानान्तर ढाँचे (Parallel Structure) पर अधिक बल दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य कम्प्यूटर के उपयोग को डाटा प्रोसेसिंग से नोलेज प्रोसेसिंग (Knowledge Processing) की तरफ ले जाना है। जापान में विकसित Pralog Language कम्प्यूटर को मानवीय भाषा समझने की ओर अग्रसर कर रही है। अमेरिका में माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन इस दिशा में काफी कार्य कर रहा है 

मुख्य विशेषताएँ- पंचम पीढ़ी के कम्प्यूटर्स की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. 32 बिट एवं 64-बिट प्रोसेसरों का उपयोग

2. नेटवर्किंग का उपयोग 

3. अत्यधिक तीव्र प्रोसेसिंग

4. मुय स्विचिंग डिवाइस - VLSI सर्किट

5. संग्रहण डिवाइस - ऑप्टिकल मेमोरी

6. प्रोग्रामिंग भाषाएँ - अप्रक्रियागत भाषाओं, जैसे- Java, C++ आदि का

विकास ।

 कम्प्यूटरों का वर्गीकरण
Classification of Computers.

कम्प्यूटरों का वर्गीकरण

(Classification of Computers)

उद्देश्य के आधार पर -
सामान्य
विशेष

कार्य प्रणाली के आधार पर -
एनलॉग
डिजटिल
हाईब्रिड

क्षमता के आधार पर -
माइको कम्प्यूटर, वर्कस्टेशन, मिनी कम्प्यूटर, मेनफ्रेम कम्प्यूटर, सुपर कम्प्यूटर. 

उद्देश्य के आधार पर ( On the basis of objects)

1. सामान्य कम्प्यूटर (Ordinary Computer) – इनका उपयोग सामान्य व्यक्तियों द्वारा भिन्न उद्देश्यों हेतु किया जाता है। इनमें अत्यधिक मात्रा में डाटा का स्टोरेज संभव है । अधिकांश व्यावसायिक संगठनों द्वारा सामान्य कम्प्यूटरों का उपयोग किया जाता है। बैंकिंग कार्यों, पे-रोल, बीमा कार्यों आदि में इनका उपयोग किया जाता है। सामान्य कम्प्यूटर विविध प्रकार के सामान्य कार्य करने की क्षमता वाले होते हैं। इन कम्प्यूटर्स में प्रयुक्त सी० पी० यू० (CPU) की क्षमता सीमित होती है। इन कम्प्यूटर्स में दिये जाने वाले निर्देशों को इनपुट इकाईयों (Input devices) से पढ़ा जाता है।

2. विशेष कम्प्यूटर (Special Computer) – इनका उपयोग विशिष्ट कार्यों हेतु किया जाता है। इनमें किसी विशेष कार्य को करने हेतु विशेष प्रोग्राम संग्रहित होते हैं । जैसे CAM-Computer Aided Manufacturing, CAD - Computer Aided Design आदि हेतु विशेष कम्प्यूटरों की आवश्यकता होती है। कम्प्यूटर गेम्स, एयरक्राफ्ट,.. कंट्रोल, ग्राफिक कंट्रोल आदि में विशेष कम्प्यूटरों का उपयोग होता है। इनके अन्तर्गत विशिष्ट कार्य हेतु आवश्यक निर्देश (Programmes) कम्प्यूटर की मेमोरी में स्थायी रूप से संग्रहित रहते हैं, इसलिए इनकी रचना उस विशिष्ट कार्य के अनुरूप की जाती है जिसके लिए इन्हें तैयार किया गया है। आजकल इनका उपयोग अन्तरिक्ष विज्ञान, फिल्म सम्पादन, चिकित्सा आदि में अधिक किया जा रहा है।

II. कार्यप्रणाली के आधार पर (On the basis of Working)

1. एनलॉग कम्प्यूटर (Analog Computer) – इन कम्प्यूटरों में संख्याएँ भौतिक माप में प्रस्तुत की जाती है। जैसे किसी वस्तु की लम्बाई, रँगल, किसी इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में पास होने वाले करंट आदि को भौतिक मापन द्वारा प्रस्तुत किया जाता है । ये कम्प्यूटर सभी आँकड़े मापन के आधार पर व्यक्त करते हैं । मापन का आधार जितना सही होगा डाटा प्रस्तुतीकरण उतना ही सही होगा। ये विशिष्ट उद्देश्य वाले कम्प्यूटर होते है जो मुख्य रूप से विज्ञान के क्षेत्र में प्रयुक्त होते हैं। ये कम्प्यूटर सतत् प्रकृति की सूचनाओं को आगे बढ़ाते हैं। इलेक्ट्रिक पॉवर प्लाण्ट, केमिकल प्लाण्ट्स, पेट्रोलियम रिफाइनरीज आदि उद्योगों में एनलॉग कम्प्यूटर्स का काफी उपयोग किया जाता है। एनलॉग कम्प्यूटर के अन्य उदाहरण निम्न हैं-

वोल्टेज मीटर (Voltage meter)

थर्मामीटर (Thermometer)

घड़ियाँ (Watches) 

स्पीडोमीटर (Speedometer)

बिजली के मोटर (Electricity meter) 

2. डिजीटल कम्प्यूटर (Digital Computer) – इन कम्प्यूटरों द्वारा डाटा संख्याओं कमे रूप में व्यक्त किये जाते हैं। विभिन्न संख्याओं एवं स्थितियों की सहायता से ये 'कम्प्यूटर डाटा का सही रूप में प्रस्तुतीकरण करते है। वर्तमान में सभी कम्प्यूटर डिजीटल पद्धति पर ही कार्य करते है । ये कम्प्यूटर डाटा को अंकों (Numbers) के रूप में लेकर उनकी गणना करते है। गणन कार्य के अतिरिक्त ये कम्प्यूटर तार्किक क्रियाएँ भी करते हैं जैसे दो अंकों की तुलना (Comparison) करना। इनके अन्तर्गत अंकों (Numbers), अक्षरों (Alphabets) एवं विशेष चिन्हों (Special Symbols) को या (बाइनरी) में प्रयुक्त किया जाता है। ये डाटा (Data) को खण्डित सिग्नलस (Discrete Signals) के रूप में पहचानते हैं जो 1 (On) या O (off) के रूप में व्यक्त होते हैं। आजकल हम सामान्य कार्यों में डिजीटल कम्प्यूटर्स का ही उपयोग करते है ।

3. हाईब्रिड कम्प्यूटर (Hybrid Computer) – हाईब्रिड कम्प्यूटर में एनलॉग एवं डिजीटल दोनों प्रकार के कम्प्यूटरों की विशेषताएँ होती है । ये एनलॉग कम्प्यूटर की (Speed) एवं डिजीटल कम्प्यूटर की सटीकता (Accuracy) उपयोगों हेतु प्रयोग किया जात है। बड़ी निर्माण प्रक्रियाओं में हाईब्रिड कम्प्यूटर्स का उपयोग किया जाता है । ये कम्प्यूटर एनलॉग डाटा को डिजीटल में परिवर्तित कर उसकी प्रोसेसिंग कर सकते हैं। ये कम्प्यूटर्स तापमान, गति, विद्युत प्रवाह आदि पर कार्य करते हुए संख्याओं की गणना का कार्य भी कर सकते हैं। इनका उपयोग उन विशेष कार्यों में किया जाता है जहाँ डाटा का इनपुट तो मापन (measurement) के आधार पर हो तथा आउटपुट संख्याओं ( digits) में देना हो । चिकित्सा कार्यों में जैसे रक्त दबाव (blood pressure) को माप कर उसका आउटपुट संख्याओं में व्यक्त कर दिया जाता है। इन कम्प्यूटर्स का उपयोग निर्माण नियोजन में सफलतापूर्वक किया जाता है ।

III. क्षमता के आधार पर (On the basis of Capacity) 

1. माइक्रो कम्प्यूटर (Micro Computer ) – यह छोटे आकार के कम्प्यूटर होते है। इन्हें पर्सनल कम्प्यूटर या डेस्कटॉप कम्प्यूटर भी कहते है । इसका आविष्कार अमेरिका में इन्टेल कार्पोरेशन के टेड हॉफ (Ted Haff) ने किया। इनमें माइक्रोप्रोसेसर का उपयोग होता है । इनका उपयोग सामान्य एवं विशेष दोनों ही प्रकार के उद्देश्य हेतु होता है । इनका अत्यधिक उपयोग पर्सनल कम्प्यूटर के रूप में होता है। इनमें 16-32 बिट माइक्रोप्रोसेसर लगे होते हैं तथा इनकी मेमोरी खमता 20 GB तक होती है। इन कम्प्यूटर्स पर सभी उच्चस्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाएँ (High Level Programming Languages) काम (High) है। इन कम्प्यूटर्स पर वर्ड प्रोसेसिंग, डेटाबेस मैनेजमेंट एवं स्प्रेडशीट आदि प्रोग्राम प्रयोग किये जा सकते है । पहला माइक्रोकम्प्यूटर 1981 में IBM कम्पनी ने बनाया जिसे पर्सनल कम्प्यूटर (IBM PC) नाम दिया गया। इसके बाद कई कम्पनियों ने माइक्रोकम्प्यूटर्स बनाये जैसे एप्पल (Apple) कम्पनी ने Macintosh नाम से माइक्रो कम्प्यूटर बनाया। इन कम्प्यूटर्स में एक ही सी० पी० यू० (CPU) लगा होता है जिसे माइक्रो-प्रोसेसर (Microprocessor) कहते हैं। इस प्रकार ऐसे कम्प्यूटर्स जिनमें माइक्रोप्रोसेसर लगा हुआ हो उन्हें माइक्रोकम्प्यूटर कहते हैं। निजी उपयोग में आने के कारण इन्हें व्यक्तिगत कम्प्यूटर (PC) कहा जाता है । सामान्यतया ये कम्प्यूटर एक समय में एक व्यक्ति द्वारा कार्य करने हेतु बनाये जाते है । इन कम्प्यूटर्स के लोकप्रिय होने का कारण यह है कि इनकी टेक्नोलॉजी में काफी तेज गति से विकास हुआ है। इनकी संग्रहण खमता एवं प्रोसेसिंग गति में जहाँ तेज गति से सुधार हुआ है वहीं इनके मूल्यों में निरन्तर गिरावट आती जा रही है । इनके साथ उपयोग किये जाने वाले उपकरणों (Peripheral devices) की किस्म में भी काफी सुधार हुआ है। इस प्रकार इनका उपयोग एक ओर जहाँ घरेलू एवं मनोरंजन कार्यों हेतु किया जा रहा है वही दूसरी ओर विभिन्न व्यावसायिक कार्यों हेतु भी इनका उपयोग निपुणता के साथ किया जा रहा है । आजकल निम्न प्रकार के माइक्रोकम्प्यूटर्स विभिन्न कार्यों हेतु बाजार में उपलब्ध हैं-.

डेस्कटॉप कम्प्यूटर्स (Desktop Computers) 

लेपटॉप/नोटबुक कम्प्यूटर्स (Laptop / Notebook Computers)

नेटवर्क कम्प्यूटर्स (Network Computers)

पॉम कम्प्यूटर्स (Palm top / Handheld Computers)

डेस्कटॉप कम्प्यूटर (Desktop Computer)

ये कम्प्यूटर 'डेस्क के ऊपर स्थायी रूप से रखे जाने वाले होते है। इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से नहीं लाया ले जाया सकता। प्रारम्भिक डेस्कटॉप की सिस्टम यूनिट ( System unit) लेटी (Horizontal) हुई स्थिति में ऊपर रखी जाती थी, डेसक जबकि वर्तमान में इसे खड़ी स्थिति (Vertical) में टेबल पर रखा जाता है। खड़ी स्थिति (Vertical) वाले कम्प्यूटर्स को टॉवर मॉडल (Tower Model) कहते हैं। इस मॉडल में उपकरणों (Devices) हेतु सिस्टम यूनिट में अधिक स्थान उपलब्ध रहता है। इसी कारण • आजकल मॉडम, कार्डस एवं एडप्टर्स का इस सिस्टम यूनिट में स्थापित करना आसान हो गया है ।

लेपटॉप/नोटबुक कम्प्यूटर्स 
(Laptop / Notebook Computers) 

ये मोबाइल कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं। ये बैटरी चलित (Battery Operated) होने से इनका कहीं भी उपयोग किया जा सकता । नोटबुक कम्प्यूटर्स लेपटॉप कम्प्यूटर्स से भी आकार में छोटे होते हैं। इन कम्प्यूटर्स में भी माइक्रोप्रोसेसर का उपयोग होता है।

नेटवर्क कम्प्यूटर्स 
(Network Computers)

कम्प्यूटर से कम क्षमता वाले होते हैं। इनमें कम संग्रहण क्षमता एवं कम प्रोसेसिंग गति होती है। ये नेटवर्क द्वारा नेटवर्क सर्वर से जुड़े होते है तथा प्रोसेसिंग कार्य नेटवर्क सर्वर के माध्यम से ही करते है। वेब टी० वी० (Web T.V.) घरेलू नेटवर्क कम्प्यूटर का अच्छा उदाहरण है । इनमें फ्लॉपी ड्राइव (Floppy drive) एवं सी० डी० ड्राइव (C.D. Drive) उपयोग नहीं होता। इनमें सॉफ्टवेयर का उपयोग केवल सर्वर ही होता है । इन कम्प्यूटर्स में रखा हुआ डाटा अधिक सुरक्षित रहता है। क्योंकि फ्लॉपी ड्राइव एवं सी० डी० ड्राइव न होने से इनसे डाटा की कापी नहीं की जा सकती है।

पॉम कम्प्यूटर्स 
(Palm/Handheld Computers) 

ये काफी छोटे आकार के कम्प्यूटर्स होते है जिन्हें उपयोगकर्ता अपने हाथ में रख सकता है। पर्सनल डिजिटल एसिसटेंट (PDA), सेलुलर फोन आदि पॉम कम्प्यूटर्स के उदाहरण है। इनकी आकृति अत्यधिक, छोटे नोटबुक कम्प्यूटर की तरह होती है। इनमें बहुत छोटे की-पैड एवं स्क्रीन का उपयोग होता है। इनकी प्रोसेसिंग क्षमता नोटबुक कम्प्यूटर्स से कम होती है। इन्हें बड़े कम्प्यूटर्स के साथ जोड़कर डाटा का आदान-प्रदान किया जा सकता है। पीडीए (PDA) के अन्तर्गत एक इलेक्ट्रॉनिक पेन का उपयोग होता है जिसकी सहायता से स्क्रीन पर लिखा जाता है। कई पीडीए (PDA) में माइक्रोफोन एवं स्पीकर्स लगे होते है। 

इन्टरनेट, ई-मेल, फैक्स आदि की सुविधा होती है। इन्हें पेन आधारित कम्प्यूटर भी कहते है। वर्तमान में सेलुलर फोन के अन्तर्गत भी ई-मेल एवं फैक्स की सुविधा देकर इनका कम्प्यूटर्स के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। इनके द्वारा वेब को भी एक्सेस किया जा सकता है। माइक्रो- सॉफ्ट ने WINDOWS-CE आपरेटिंग सिस्टम इन कम्प्यूटर्स के लिए विकसित किया है।

एक माइक्रोकम्प्यूटर के साथ निम्न उपकरणों का उपयोग होता हैं--

की बोर्ड (Key board)

मॉनीटर (Monitor) 

प्रिंटर (Printer)

डिस्क ड्राइव (Disk Drive )

वर्तमान में सिंगलचिप माइक्रोप्रोसेसर से माइक्रोकम्प्यूटर्स की लागत व आकार में काफी कमी आई है।

मुख्य विशेषताएँ-

कम कीमत

छोटा आकार

एक समय पर एक ही व्यक्ति द्वारा कार्य कम संग्रहण क्षमता

2. वर्क स्टेशन (Work Station)

ये पर्सनल कम्प्यूटर एवं मिनी कम्प्यूटर्स के बीच की श्रेणी के कम्प्यूटर है। ये ऐसे विशिष्ट पर्सनल कम्प्यूटर होते है जिनकी प्रोसेसिंग क्षमता मिनी कम्प्यूटर की तरह होती है। ये सिंगल यूजर सिस्टम (Single User System) होते है। इनका उपयोग पेशेवर व्यक्तियों जैसे ग्राफिक कलाकार, वैज्ञानिक, इंजीनियर आदि करते है। इनमें ग्राफिक सुविधाएँ होती हैं तथा इस हेतु अच्छी किस्म के मॉनीटर्स (High Resolution Monitors) का उपयोग होता है।

वर्तमान में माइक्रोकम्प्यूटर्स एवं वर्क-स्टेशन के बीच का अन्तर कम होता जा रहा है। उच्च क्षमता वाले पर्सनल कम्प्यूटर्स (High End PC) वर्कस्टेशन का स्थान लेते जा रहे हैं।

3. मिनी कम्प्यूटर (Mini Computer)

मिनी कम्प्यूटर माइक्रोकम्प्यूटर की तुलना में अधिक गति से कार्य करते हैं। इनका उपयोग एक साथ कई उपयोगकर्त्ताओं द्वारा किया जा सकता है। इनकी डिस्क स्टोरेज क्षमता 20 GB तक होती है। इनका CPU 100 MIPS (10 करोड़ की गति ) से कार्य कर सकता • है। IBM 6000, CDC हैं। इनमें UNIX ऑपरेटिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ-

अधिक संग्रहणं क्षमता 
अधिक प्रोसेसिंग गति
एक ही समय में एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा कार्य 
लघु एवं मध्यम संस्थाओं द्वारा उपयोग योग्य

ये कम्प्यूटर्स मेनफ्रेम कम्प्यूटर्स से कम क्षमता वाले होते हैं। प्रथम मिनी कम्प्यूटर 1960 में विकसित किया गया था। इनका विकास मुख्यतः व्यावसायिक कार्यों हेतु किया गया। इनका उपयोग लेखांकन, वर्ड प्रोसेसिंग, डेटाबेस मेनेजमेंट, केड (CAD) आदि हेतु . किया जाता है। ये माइक्रोकम्प्यूटर की तुलना में बढ़े आकार के, अधिक कार्य क्षमता वाले तथा अधिक गति व संग्रहण क्षमता वाले होते हैं। इनके साथ कई माइक्रोकम्प्यूटर जोड़कर इन्हें मल्टीयूजर (Multi user) बनाया जा सकता है। इन कम्प्यूटरों में एक से अधिक सी० पी० यू० का उपयोग किया जा सकता है। डिजाइनिंग, एनीमेशन एवं वीडियो सम्पादन कार्य में इनका उपयोग सिंगल यूजर (Single user) सिस्टम के रूप में किया जाता है। 

4. मेनफ्रेम कम्प्यूटर (Main Frame Computer)

ये कम्प्यूटर काफी शक्तिशाली होते है तथा इनकी गणना गति मिनी एवं माइक्रो कम्प्यूटर की तुलना में काफी अधिक होती है। इनकी स्टोरेज क्षमता भी काफी अधिक होती है तथा इनके साथ विभिन्न प्रकार के इनपुट-आउटपुट उपकरणों (Devices) का उपयोग किया जा सकता है। इनकी हार्डडिस्क की स्टोरेज क्षमता 20 GB से अधिक होती है तथा प्रोसेसिंग स्पीड 500 MIPS (Million Instructions Per Second) होती है।

इनका उपयोग वहाँ उपयुक्त रहता है जहाँ बहुत बड़ी संख्या में डाटा संग्रहीत किये जाने होते है तथा जटिल गणनाएँ करनी होती हैं। इन कम्प्यूटरों का टाइम शेयरिंग पद्धति से एक साथ 100 व्यक्ति उपयोग कर सकते है। इसलिए इन कम्प्यूटर्स की सहायता से जटिल गणितीय एवं इंजीनियरिंग गणनाएँ की जा सकती हैं। इनका उपयोग शोध संगठनों, वृहत उद्योगों, बैंकों, सरकारी संगठनों में काफी किया जाता है। IBM 4300, IBM 9000 श्रृंखला DEC 10000, IBM ES-2 मेनफ्रेम कम्प्यूटर्स के उदाहरण हैं।

इनका उपयोग नेटवर्किंग के अन्तर्गत सर्वर के रूप में किया जाता है । सर्वर (Server) दो प्रकार के होते हैं— उच्च क्षमता वाले सर्वर में कई माइक्रोप्रोसेसर का उपयोग किया जाता है, वर्ड वाइड वेब (www) में इनका उपयोग विशिष्ट सर्वर्स (Specialised Servers) के रूप में किया जाता है । ये उच्च गति से व्यापक रेन्ज (range) की इनपुट - आउटपुट इकाइयों को सहायता (support) करते हैं। मेनफ्रेम कम्प्यूटर्स का उपयोग बहुत सारे टर्मिनल्स को इसके साथ जोड़कर कई उपयोगकर्ताओं को एक साथ काम लिया जा सकता है। वृहत मेनफ्रेम कम्प्यूटर हजारों टर्मिनल्स की इनपुट-आउटपुट आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं। IBM S/390 मेनफ्रेम कम्प्यूटर 50000 उपयोगकर्ताओं (Users) को एक साथ संतुष्ट कर सकता है तथा 1.60 अरब निर्देश प्रति सैकण्ड की गति से निर्देशों को क्रियान्वित कर सकता है। बीमा कम्पनियाँ एवं बैंक इनका उपयोग निम्न कार्यों हेतु करती हैं-

(1) बिलों को भेजना, 
(2) भुगतानों का ब्यौरा,
(3) कर का ब्यौरा ।

रेलवे एवं एयरलाइन कम्पनियाँ इनका उपयोग आरक्षण हेतु करती हैं। 
मुख्य विशेषताएँ-

बड़ी मात्रा में डाटा प्रोसेसिंग 
अधिक संग्रहण क्षमता एवं प्रोसेसिंग गति
एक ही समय में कई उपयोगकर्त्ताओं द्वारा कार्य 
अत्यधिक मँहगे
बड़ी संस्थाओं द्वारा उपयोग

5. सुपर कम्प्यूटर ( Super Computer)

इन कम्प्यूटर्स का उपयोग ऐसी जटिल समस्याओं के समाधान हेतु किया जाता है जिनके लिए बहुत बड़ी संख्या में गणन क्रियाएँ आवश्यक होती है। एक सुपर कम्प्यूटर में कई सी० पी० यू० होते हैं जो शीघ्र गणन कार्य हेतु समानान्तर (Parallel) रूप से कार्य • करते है । इन कम्प्यूटर्स का उपयोग वायुयान संरचना, मौसम भविष्यवाणी, समुद्री विज्ञान, आणविक एवं परमाणविक संरचना अध्ययन एवं प्लाज्मा भौतिकी में विशेष रूप से किया जाता है।

ये 1 Trillion instructions per second की गति से कार्य कर सकते है तथा इनकी हार्ड डिस्क की संग्रहण क्षमता (Storage Capacity) 100 GB से अधिक है। इ कम्प्यूटर्स की गणन गति को तीव्र करने हेतु इनमें पाइपलाइनिंग (Pipelining) तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिसके अन्तर्गत मुख्य कार्य को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर उनकी संगणना समानान्तर रूप से सम्पन्न की जाती है। पैरेलल प्रोसेसिंग (Parallel Processing) तकनीक भी इनकी प्रोसेसिंग क्षमता को बढ़ाने के लिए उपयोग की जाने वाली एक तकनीक है। वर्तमान में अमेरिका के क्रे कारपोरेशन (Cray Corporation) तथा जापान के नेक (NEC) द्वारा सुपर कम्प्यूटर्स का निर्माण किया जा रहा है। भारत में CDAC एवं WIPRO द्वारा इनका निर्माण किया जा रहा है। CDAC पूना द्वारा PARAM सुपर कम्प्यूटर का विकास किया गया है। CRAY 3, SX - 3R, HITAC S-300 नवीनतम उपलब्धि सुपर कम्प्यूटर हैं।

मानव जीन (Human genome) एवं डी० एन० ए० की संरचना का अध्ययन करने में सुपर कम्प्यूटर्स का ही उपयोग किया जा रहा है। अत्यधिक उच्च क्षमता वाले सुपर कम्प्यूटर करोड़ों रु० मूल्य के होते है तथा बहुत अधिक मात्रा में बिजली का उपयोग करते है। काफी मँहगे होने के कारण इनका उपयोग सीमित मात्रा में ही हो रहा है। भारत में C-Dot द्वारा चिप-152 तथा भाभा परमाणु अनुसंधान संस्थान (BARC) द्वारा अनुपम (Anupam) नामक सुपर कम्प्यूटर का उपयोग किया जा रहा है।

मुख्य विशेषताएँ- 
अत्यधिक संग्रहण क्षमता 
सर्वाधिक प्रोसेसिंग गति

एक ही कम्प्यूटर में कई प्रोसेसरों का उपयोग 
उच्च कोटि की शुद्धता वाली गणनाओं में उपयोग 
एक ही समय में अनेक व्यक्तियों द्वारा कार्य

कम्प्यूटर प्रणाली के आवश्यक तत्व
(Essential Elements of Computer System)

कम्प्यूटर एक प्रणाली (System) है। प्रणाली से आशय एक निश्चित आउटपुट प्राप्त करने हेतु विभिन्न अर्न्तसम्बन्धित तत्त्वों के समूह से है। कम्प्यूटर तत्त्वों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

1. हार्डवेयर (Hardware) 2. सॉफ्टवेयर (Software)

हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर (Hardware and Software)

हार्डवेयर (Hardware)

कम्प्यूटर सिस्टम में उपयोग किये जाने वाले विभिन्न भौतिक उपकरण सामूहिक रूप से हार्डवेयर कहलाते है। इसके अन्तर्गत समस्त आगम एवं निर्गम इकाईयाँ, भण्डारण इकाईयाँ, केन्द्रीय संसाधन ईकाईयाँ आदि शामिल हैं। हार्डवेयर में निम्न कम्प्यूटर उपकरणों को शामिल किया जाता है-

(1) आगम उपकरण ( Input Devices)
(2) सीपीयू० (CPU) 
(3) निर्गम उपकरण (Output Devices)
(4) द्वितीयक मेमोरी उपकरण (Auxiliary Memory Devices)
(5) अन्य उपकरण (Other Peripherals) 

कम्प्यूटर एक स्वचालित इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो गणितीय (Arithmetic) एवं तार्किक (Logical) क्रियाएँ सम्पन्न करता है।

इस कार्य में सहायता करने वाले सभी भौतिक उपकरण कम्प्यूटर हार्डवेयर में शामिल किये जाते हैं। केन्द्रीय संसाधन इकाई (CPU) कम्प्यूटर हार्डवेयर का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है। इंटीग्रेटेड सर्किट (IC), हार्ड डिस्क, फ्लॉपी डिस्क, सीआरटी (CRT), की-बोर्ड, प्रिंटर आदि सभी हार्डवेयर के उदाहरण हैं। कम्प्यूटर हार्डवेयर वह ढाँचा उपलब्ध कराता है। जिसकी सहायता से कम्प्यूटर प्रोग्राम संचालित किये जाते हैं। 

सॉफ्टवेयर (Software)

सॉफ्टवेयर से आशय ऐसे प्रोग्रामों से है जिन्हें हम अपने कम्प्यूटर पर चला सकते हैं। सॉफ्टवेयर ही हार्डवेयर को क्रियाशील बनाता है। सॉफ्टवेयर ही हार्डवेयर को क्रियाशील बनाता है । सॉफ्टवेयर में पूर्व निर्धारित निर्देश शामिल होते है जो कम्प्यूटर हार्डवेयर घटकों पर नियंत्रण एवं उनके बीच तालमेल का काम करते है । सॉफ्टवेयर के निर्देशानुसार ही कम्प्यूटर सिस्टम कार्य करता है। सॉफ्टवेयर, प्रोग्राम (Program) एवं एप्लीकेशन (Application) शब्दों का प्रयोग सामान्यतः एक ही अर्थ में किया जाता हैं ।

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