रविवार, 2 जुलाई 2023

कम्प्यूटर सिस्टम की संरचना(Architecture of a Computer System)

कम्प्यूटर सिस्टम की संरचना
(Architecture of a Computer System)

कम्प्यूटर शब्द की उत्पत्ति अंग्रेजी के 'कम्प्यूटर' (Computer) शब्द से हुई जिसका अर्थ 'गणना करना' होता है। कम्प्यूटर का आविष्कार मूलतः तेज गति से एवं शुद्धता के साथ गणना कार्य करने के लिए हुआ ।

प्रारम्भिक काल से ही मनुष्य गणना हेतु विभिन्न तकनीकों एवं उपकरणों का उपयोग करता आ रहा है। ‘'Abacus' गणन यंत्र इसका एक उदाहरण है जो आज भी छोटे बच्चों को गिनती सिखाने हेतु उपयोग में लाया जाता है। वर्तमान में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जैसे वैज्ञानिक, शैक्षणिक, मौसम भविष्यवाणी, यातायात, डिजायन, छपाई आरक्षण, बैंक लेनदेन सम्बन्धी विवरण एवं अनेक दिन-प्रतिदिन के कार्यों में कम्प्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है। आज हर महीने मिलने वाला बिजली एवं पानी का बिल, विश्वविद्यालयों की अंकतालिकाएँ, रेलवे आरक्षण, अखबारों का मुद्रण, चुनावों में मतदान एवं मतगणना हेतु इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, शोरूम के क्रय बिल आदि छोटे-छोटे दैनिक कार्यों में कम्प्यूटर का उपयोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि भले ही प्रारम्भ में कम्प्यूटर का उपयोग जटिल गणनात्मक कार्यों हेतु हुआ था किन्तु वर्तमान में इसका उपयोग जीवन के हर कार्य क्षेत्र में होने लगा है, चाहे वह गणितीय हो अथवा अगणितीय । अतः कम्प्यूटर को सिर्फ एक गणना करने वाला उपकरण कहना इसकी क्षमता को बहुत कम करके आंकना है, क्योंकि दिन-प्रतिदिन इसका अगणितीय कार्यों में भी उपयोग बढ़ता जा रहा है।

कम्प्यूटर एक ऐसी मशीन है जो सूचनाओं को ग्रहण एवं भंडारित करता है तथा निर्देशों के अनुसार इन सूचनाओं का विश्लेषण कर निष्कर्ष प्रस्तुत करता है ।

कम्प्यूटर बनाम केलकुलेटर

कम्प्यूटर अंकों एवं अक्षरों दोनों के आधार पर कार्य करता है, जबकि केलकुलेटर सिर्फ अंकों के आधार पर कार्य करता है।

कम्प्यूटर सूचनाएँ भण्डारित कर सकता है जबकि केलकुलेटर नहीं ।

कम्प्यूटर का उपयोग गणन एवं अगणन दोनों कार्यों हेतु होता है जबकि केलकुलेटर का उपयोग केवल गणन कार्य हेतु होता है ।


(ii) कम्प्यूटर की मूल संरचना
(Basic Structure of Computer) 

कम्प्यूटर एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो सूचनाएँ एवं निर्देश ग्रहण करता है

उन्हें संग्रहित करता है एवं निर्देशों का पालन करते हुए उन सूचनाओं को विश्लेषित कर परिणाम प्रस्तुत करता है । इस कार्य को कम्प्यूटर के निम्न प्रमुख हिस्सों की सहायता से पूरा किया जाता है-

1. इनपुट यूनिट
2. केन्द्रीय संगणना इकाई
3. आउटपुट यूनिट

1. इनपुट यूनिट (Input Unit)

इस इकाई के माध्यम से कम्प्यूटर को सूचनाएँ एवं निर्देश प्रेषित किये जाते हैं । Key Board प्रमुख आगत इकाई (Input Unit) है। माउस, स्कैनर एवं डिजीटल कैमरा आदि अन्य इकाईयाँ भी इनमें शामिल होती हैं ।

2. केन्द्रीय संगणना इकाई (Central Processing Unit)

सीपीयू ही वह महत्वपूर्ण इकाई जिसके आधार पर कम्प्यूटर सिस्टम की प्रभावशीलता मापी जाती है। यह इकाई इनपुट इकाइयों से निर्देश प्राप्त कर उन्हें संसाधित (Process) करती है तथा उन्हें आउटपुट इकाईयों को उपलब्ध कराती है। इनपुट इकाईयों द्वारा निर्देश प्रोग्राम्स के माध्यम से दिये जाते हैं। सीपीयू के तीन भाग होते हैं-

(i) नियन्त्रण इकाई (Control Unit) 
(ii) गणितीय एवं तार्किक इकाई (Arithmetic and Logical Unit (ALU)]
(iii) मुख्य मेमोरी (Main Memory)

सीपीयू के ये भाग बस (Bus ) द्वारा जुड़े होते है। बस एक इलैक्ट्रॉनिक हाइवे हैं जो सीपीयू के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ता है ।

(i) नियन्त्रण इकाई (Control Unit) - यह इकाई कम्प्यूटर सिस्टम की गतिविधियों को निर्देशित करती है तथा उनमें समन्वय स्थापित करती है । यह इकाई कम्प्यूटर की मुख्य मेमोरी, ALU एवं अन्य इनपुट-आउटपुट इकाईयों के मध्य इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल की गतिविधियों को तय करती हैं। इस इकाई के निर्देशों के अनुसार ही ALU कार्य करती है।

(ii) गणितीय एवं तार्किक इकाई (Arithmetic and Logical Unit (ALU)- यह इकाई गणितीय कार्य जैसे जोड़, बाकी, गुणा, भाग तथा तार्किक कार्य जैसे दो संख्याओं की तुलना करना, डाटा सोर्टिंग का कार्य करना, डाटा के एक रूप को दूसरे रूप में बदलना, डाटाको अस्थाई रूप से संग्रहित करना आदि कार्य करती है। ALU ही डाटा प्रोसेसिंग की गति तय करती है, जिसके आधार पर कम्प्यूटर की क्षमता मापी जाती है। वर्तमान में कम्प्यूटर की स्पीड को नेनो सैकण्ड्स एवं पीको सैकण्ड्स में मापा जाता है जो कि एक सैकण्ड का क्रमशः एक अरबवां (Billionth) व एक खरबवां (Trillionth) हिस्सा है।

(iii) मुख्य मेमोरी / रजिस्टर (Main Memory / Registers ) - यह CPU के अन्दर एक अस्थायी मैमोरी स्थान है । इस इकाई में सूचनाओं का संग्रहण किया जाता है। कम्प्यूटर की इनपुट द्वारा प्रेषित सूचनाएँ एवं निर्देश सर्वप्रथम Memory Unit में संग्रहित होते हैं। 

ALU से प्रक्रिया के दौरान प्राप्त परिणाम एवं प्रक्रिया के पश्चात प्राप्त परिणाम भी Output Unit में जाने से पूर्व Memory Unit है । मेमोरी दो प्रकार की होती है। 

(i) RAM (Random Access Memory) - यह अस्थायी प्रकृति की होती है। 

(ii) ROM (Read only Memory) - यह स्थायी प्रकृति की होती है। इसकी सूचनाएँ केवल पढ़ी जा सकती है, इसमें सूचनाएँ लिखी नहीं जा सकती हैं।

रजिस्टर एक प्रकार के RAM (Random Access Memory) बिंट्स का छोटा समूह होते हैं। इनमें वे डाटा संग्रहित होते है जो ALU या FPU (Floating-Point Processing Unit) द्वारा संसाधित (Process) किये जाते है। प्रारम्भिक कम्प्यूटर्स 16 - बिट सीपीयू रजिस्टर वाले होते थे जिन पर केवल DOS एवं Window $ 3 x पेंटियम, MMX एवं बाद वाले पेंटियम प्रोसेसर में 1-28-बिट रजिस्टर होते है जिनसे ALU एक ही निर्देश के आधार पर मल्टीपल 32-बिट नम्बर के आधार पर कार्य कर सकती है। इस तकनीक को SIMD (Single Instruction Multiple Data) करते हैं । 

मदरबोर्ड (Motherboard)

मदरबोर्ड कम्प्यूटर सिस्टम का प्रमुख अंग है। इसे कम्प्यूटर सिस्टम की रीढ़ की हड्डी भी कहा जाता है। इसे सिस्टम बोर्ड भी कहते है तथा इसे कॉमन कम्यूनिकेशन चैनल के नाम से भी जानते है । यह हरे या भूरे फाइबर ग्लास की एक प्लेट होती है। इस प्लेट पर डाटा संचरण हेतु कई सर्किट लगे हुए होते हैं। मदरबोर्ड ही वह उपकरण है जिस पर प्रोसेसर (Processor) एवं रेम (RAM) चिप स्थापित किये जाते हैं।

मदरबोर्ड ही प्रोसेसर को अन्य उपकरणों जैसे मेमोरी, की-बोर्ड, डिस्प्ले यूनिट आदि से जोड़ता है। मदरबोर्ड के बिना कम्प्यूटर का सीपीयू एक निष्क्रिय उपकरण हो जायेगा। मदरबोर्ड एक हार्डवेयर उपकरण किन्तु इसमें तीन छोटे किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रोग्राम – 'पोस्ट' (Power on Self Test) 'बी आई ओ एस ' (Basic Input-output Services) तथा 'सैट-अप' (Set-up) में XT एवं AT मदरबोर्ड उपलब्ध होते थे ।

वर्तमान में काफी विकसित ATX एवं माइक्रो ATX मदरबोर्ड उपलब्ध हैं। इण्टेल प्रोसेसर के साथ उपयोग किये जाने वाले मदरबोर्ड, Cyrix एवं AMD प्रोसेसर के साथ उपयोग किये जाने वाले मदरबोर्ड में सीपीयू RAM, नॉर्थब्रिज, साउथब्रिज चिप्स एवं इनपुट-आउटपुट स्लॉट प्रमुख हैं। मदरबोर्ड के Expansion Slots से Expansion Cards जोड़ा जाता है। Expansion Cards को Adapter भी कहते है | Expansion Cards कई उद्देश्या हेतु उपयोग किये जाते है, जैसे मॉनीटर को नियन्त्रित करने के लिए, माउस को नियन्त्रित करने के लिए आदि । 

माइक्रोप्रोसेसर (Microprocessor)

माइक्रोप्रोसेसर एक माइक्रोचिप (अतिसूक्ष्म चिप ) पर बनाया गया कम्प्यूटर प्रोसेसर होता है। ऐसा CPU जो केवल एक LSI (Large Scale Integration) या VLSI (Very Large Scale Integration) पर बना हो, माइक्रोप्रोसेसर कहलाता है। यह कम्प्यूटर टैक्नोलॉजी का नवीनतम विकसित रूप है। ऐसा डिजीटल कम्प्यूटर जिसकी CPU में एक माइक्रोप्रोसेसर हो माइक्रोकम्प्यूटर कहलाता है। इसके अन्तर्गत ट्रांजिस्टर, रजिस्टर, कैपेसिटर, . लॉजिक गेट्ज आदि का समावेश होता है।

पहला माइक्रोप्रोसेसर Intel - 4004 इंटेल कम्पनी द्वारा बनाया गया था। वर्तमान में विभिन्न गति एवं गणन क्षमता वाले भाइक्रोप्रोसेसर उपलब्ध है। माइक्रोप्रोसेसर की कार्यक्षमता का आकलन उसके द्वारा एक सैकण्ड में कितने बिट डाटा का प्रोसेस किया जाता है, इसके आधार पर होता है। पूर्व में माइक्रोप्रोसेसर में सिर्फ एक गणितीय एवं तार्किक इकाई (ALU) होती थी जबकि वर्तमान में एक माइक्रोप्रोसेसर में कई गणितीय एवं तार्किक इकाईयाँ (ALU) होती हैं।

माइक्रोप्रोसेसर की संरचना (Structure of Microprocessor) (i) ALU - यह इकाई सभी गणितीय एवं तार्किक क्रियाएँ सम्पन्न करती है। इसके परिणाम या तो मुख्य मेमोरी में भण्डारित होते है या आउटपुट उपकरणों को भेजे जाते है। यह इकाई प्रोसेसर का हृदय होती है। यही इकाई वास्तविक रूप से गणितीय क्रियाएँ जैसे जोड़, गुणा, बाकी आदि सम्पन्न करती है। प्रोसेसर में दो ALU होती हैं। एक ALU पूर्ण संख्याओं ( Integers) से सम्बन्धित गणितीय कार्य करती है तथा दूसरी इकाई दशमलव संख्याओं (Floating Point Numbers) से सम्बन्धित गणितीय कार्य करती है। यह इकाई मेमोरी से रजिस्टर में डाटा मँगाती है एवं रजिस्टर से मेमोरी में डाटा भेजती है। प्रत्येक ALU एक समय में 32-बिट (32-Bits) डाटा को डिकोड (Decode) करती है।

(ii) रजिस्टर (Register ) - रजिस्टर में उन डाटा को स्टोर किया जाता है । जिन पर प्रोसेसर द्वारा क्रिया की जानी है। यह प्रोसेसर के अन्दर RAM बिट्स का ऐसा समूह होता है जहाँ पर उन डाटा को अस्थायी रूप से रखा जाता है जिन पर ALU द्वारा गणितीय या तार्किक क्रियाएँ की जानी है। रजिस्टर्स का आकार ही यह तय करता है कि प्रोसेसर किस प्रकार के डाटा एवं निर्देशों के अनुसार कार्य कर सकता है। पर्सनल कम्प्यूटर्स (PC) के प्रारम्भिक मॉडलों में 16-बिट CPU, रजिस्टर्स का उपयोग किया जाता था । इन पर केवल DOS एवं Windows 3. X कार्यक्रम ही संचालित किये जा सकते थे। 80386 पहला माइक्रोप्रोसेसर था जिसमें 32-बिट रजिस्टर्स की व्यवस्था की गई । SIMD (Single Instruction Multiple Data) तकनीक पर आधारित कम्प्यूटर एक साथ कई 32 बिट संख्याओं के समूह पर कार्य कर सकता है। इन्टेल के इटेनियम (Itanium) प्रोसेसर में 64-बिट रजिस्टर की व्यवस्था की गई है।

(iii) कंट्रोल यूनिट (Control Unit) - यह कम्प्यूटर सिस्टम में समय एवं नियन्त्रण सम्बंधी कार्य करती है। यह इकाई विभिन्न इकाईयों के मध्य डाटा स्थानान्तरण एवं प्र की आंतरिक क्रियाओं को नियन्त्रित करती है।

(iv) आन्तरिक बस (Internal Bus) - माइक्रोप्रोसेसर के अन्दर बहुत सी होती है जिनके द्वारा प्रोसेसर सूचना भेजता या ग्रहण करता है । इन पिनों को सामूहिक रूप से बस कहते है | बस यानि 'इलेक्ट्रॉनिक रास्ता' । डाटा बस (Data Bus ) डाटा का संचरण CPU तक करती है। जितनी बड़ी डाटा बस होगी उतनी ही तेजी से डाटा का संचरण होगा। माइक्रोप्रोसेसर की कार्य-क्षमता डाटा बस एवं एड्रेस बस (Address Bus) की संख्या पर निर्भर करती है । इन्टेल कम्पनी द्वारा 16-बिट, 32-बिट, 64-बिट एवं 128-बिट तक के प्रोसेसर बनाये गये हैं ।

कार्यविधि - कम्प्यूटर की कंट्रोल इकाई माइक्रोप्रोसेसर को दो कार्यों के लिए प्रेरित करती है-

(1) निर्देश पढ़ना, (2) निर्देशों को क्रियान्वित करना । माइक्रोप्रोसेसर द्वारा तीन तरह के डाटा प्रोसेस किये जाते है-

(1) निर्देश (Instruction), (2) एड्रेस (Address), (3) आपरेण्ड (Operand) । 

सर्वप्रथम माइक्रोप्रोसेसर द्वारा एड्रेस बस के माध्यम से मेमोरी का वह एड्रेस बताया जाता है जहाँ निर्देशों का पालन होने जा रहा है। डाटा बस उस पथ को तय करती है कि वास्तविक डाटा कहाँ से कहाँ ले जाना है। कंट्रोल बस इन कार्यों का नियन्त्रण करती है ।

3. आउटपुट यूनिट (Output Unit) इस इकाई का कार्य इनपुट यूनिट के विपरीत होता है। यह इकाई CPU द्वारा दिये गये परिणामों को उपयोगकर्ता तक पहुँचाती है। इसके प्रमुख उदाहरण कम्प्यूटर मॉनीटर एवं प्रिंटर है।

कम्प्यूटर प्रणाली के विभिन्न आगम-निर्गम उपकरण
Various Input-Output devices of Computer System

मुख्य आगमन उपकरण
(Main Input Devices)

यह स्पष्ट किया जा चुका है कि कम्प्यूटर निर्देशों के अनुसार ही कार्य करता कम्प्यूटर के आगम उपकरण के माध्यम से कम्प्यूटर को सूचना व निर्देश प्रेषित किये जाते है। प्रमुख आगम उपकरण निम्न हैं-- है।

1. की बोर्ड (Key Board)
2. माउस (Mouse )
3. पंच कार्ड (Punch Card)
4. स्केनर (Scanner)
5. अक्षर वाचक (Character Reader ) 
6. डिजटिल कैमरा (Digital Camera )

1. की बोर्ड (Key Board)

यह टाइपराइटर जैसा उपकरण होता है। इसका उपयोग कम्प्यूटर में सूचनाएँ प्रेषित करने हेतु किया जाता है। की-बोर्ड पर टाइप किया हुआ संदेश कम्प्यूटर की मेमोरी में चला जाता है। इसका उपयोग काफी सरल है। यह केबल के माध्यम से कम्प्यूटर के माध्यम से जुड़ा होता है । इस पर अक्षर एवं संख्याओं के अलावा अन्य निर्देशों हेतु भी बटन होते हैं, जिनके अलग-अलग कार्य होते हैं।

स्टेण्डर्ड की-बोर्ड ले आउट (Standard Keyboard Layout) वर्तमान में सर्वाधिक प्रचालित की-बोर्ड में 101 कीज (Keys) होती है, जो चार समूहों में विभाजित होती है। प्रथम दो समूह अल्फा-न्यूमेरिक की (Alpha numeric key) तथा न्यूमेरिक की ( Numeric key) में पैड का उपयोग कम्प्यूटर में टेक्सट एवं संख्याएँ भेजने हेतु किया जाता है। ये अल्फान्यूमेरिक की टाइपराइटर 'की' के अनुरूप व्यवस्थित होती है, इस व्यवस्था को 'QWERTY' भी कहते है, क्योंकि एक स्टैण्डर्ड की-बोर्ड की पहली पंक्ति इन्हीं Q, W, E, R, T एवं Y अक्षरों को प्रदर्शित करती है। न्यूमेरिक की-पैड में संख्याएँ एवं गणितीय आपरेटर्स शामिल होते है। न्यूमेरिक की पेड, की-बोर्ड के दाहिनी तरफ स्थित होता है। इसके अतिरिक्त की-बोर्ड में फंक्शन कीज (Function keys ) होते है जो की-बोर्ड में सबसे ऊपर की ओर एक पंक्ति में होती है। इन फंक्शन कीज पर F1 से लेकर F12 तक का उल्लेख होता है। फंक्शन कीज की सहायता से कम्प्यूटर को कमाण्ड देकर लम्बी टाइप करने से बचा जा सकता है। इनका उपयोग कम्प्यूटर प्रोग्राम पर निर्भर करता है । की-बोर्ड का एक अन्य भाग कर्सर मूवमैंट कीज का होता है, जिसकी सहायता से स्क्रीन पर कर्सर की स्थिति परिवर्तित की जा सकती है। की-बोर्ड की 'कीज' (keys) को निम्न प्रकार भी वर्गीकृत किया जा सकता है-

1. नम्बर 'कीज' (Number keys ) – जैसे 0 से लेकर 9 संख्याओं वाली सभी 'कीज' । 

2. एल्फाबेड 'कीज' (Alphabet Keys ) - जैसे A से Z तक के अक्षर वाली सभी 'कीज' ।

3. फंक्शन 'कीज' (Function keys ) - जैसे F1 से लेकर F12 वाली सभी 'कीज' ।

4. सम्पादन 'कीज' (Editing keys )- जैसे Page up, Page Down, Delete, End, Insert, Tab आदि 'कीज' ।

5. कन्ट्रोल ‘कीज' (Control key) - जैसे Enter, Shift, Esc, Caps Lock, Alt आदि 'कीज' । 

6. संकेत 'कीज' (Symbol keys ) – इनका चिन्ह प्रिंट करने हेतु होता है, जैसे — ?, %, @, $ आदि 'कीज' । 

की-बोर्ड की कार्य प्रणाली - की बोर्ड की कार्य प्रणाली में की-बोर्ड कन्ट्रोलर, की-बोर्ड, बफर तथा स्केन कोड का उपयोग होता है। की-बोड 'की' (key) को उपयोगकर्त्ता द्वारा दबाने (Press) पर की— (Key) बोर्ड कन्ट्रोलर की-बोर्ड मेमोरी में (जिसे की-बोर्ड बफर (Buffer) कहते है) उस की (key) का कोड भेजता है । इस कोड को स्केन-कोड कहते हैं। की-बोर्ड उस कोड को कम्प्यूटर में भेजता है। स्केन कोड को परिवर्तित भी किया जा सकता है।

वर्तमान में इंटरनेट व मल्टीमीडिया के उपयोग हेतु इन्टरनेट की-बोर्ड व मल्टीमीडिया की-बोर्ड भी लोकप्रिय हो रहे है। इनके उपयोग से कई कार्य सीधे उनसे सम्बन्धी 'की' (key) को प्रेस कर सम्पन्न किये जा सकते हैं ।

2. माउस (Mouse)

यह एक छोटा सा उपकरण होता है जिसका आकार चूहे जैसा होने के कारण इसे माउस कहा जाता है। वर्तमान में यह सर्वाधिक उपयोगी इनपुट उपकरणों में से एक है। इसके उपयोग से कम्प्यूटर में निर्देशों का प्रेषक काफी आसान हो गया है। माउस को माउस पैड पर इधर-उधर सरकाया जाता है, जिससे कम्प्यूटर स्क्रीन पर कर्सर को नियन्त्रित किया जाता है । माउस की सहायता से क्लिक, डबल क्लिक तथा ड्रेगिंग का कार्य किया जाता है । माउस को जिस दिशा में मूव कराया जाता है, स्क्रीन कर्सर उसी दिशा में स्क्रीन पर मूत्र करता है । माउस बटन को एक बार दबाने (Press) को क्लिक कहा जाता है। डबल क्लिक से आशय स्क्रीन पर किसी पाइन्ट पर कर्सर ले जाकर माउस बटन को दो बार दबाने (Press) से है। ड्रेगिंग हेतु माउस के बटन को दबाये रखकर माउस को मूव कराया जाता है।

माउस के नीचे की तरफ एक बॉल होती है जो माउस को इधर-उधर मूव कराने पर घूमती है। इस बॉल के दोनों तरफ दो पहिए होते हैं, जो बॉल के अनुसार घूमते है । सेन्सर इनके घूमने की गति को नोट कर कम्प्यूटर को सन्देश भेजते है। ऑप्टिकल माउस में बॉल नहीं होती, बल्कि फोटो डिटेक्टर लगे होते हैं, जो माउस के लम्बवत् व समानान्तर मूवमेंट को सेन्स करते है तथा इसकी सूचना कम्प्यूटर को भेजते हैं। माउस कम्प्यूटर बस से जुड़े होते हैं। सीरियल माउस सीरियल पोर्ट से जुड़ा होता है। वर्तमान में कार्डलेस माउस भी प्रचलन में आ गये हैं।

3. पंच कार्ड (Punch Card)

यह प्राचीनतम उपकरण । पंच कार्ड एक समय काफी उपयोग में आने वाला उपकरण था। कम्प्यूटर में प्रयुक्त पंचकार्ड, हर्मन होलेरिथ द्वारा सन् 1899 में प्रतिपादित विचार पर आधारित है। इस कार्ड में 80 कॉलम (Column) व 12 पंक्तियाँ (Row) होती है। एक कॉलम में एक अक्षर का कोड पंच किया जा सकता है। इस तरह कुल 80 अक्षर पंच किये जा सकते है । अक्षर पंच करने हेतु एक विशेष मशीन का उपयोग किया जाता है। इस मशीन में एक की बोर्ड (Key Board) होता है, जिसमें टाइपिंग मशीन की तरह हर अक्षर के लिए एक 'की' बनी होती है। उस 'की' को दबाते ही उस अक्षर का कोड मशीन द्वारा कार्ड में पंच हो जाता है।

प्रत्येक पंच कार्ड में लिखी सूचना को पढ़ने के लिए कम्प्यूटर द्वारा कार्ड रीडर की • सहायता ली जाती है। कार्ड रीडर के एक सिरे पर प्रकाश स्त्रोत (Light Source) एवं दूसरे सिरे पर फोटो सेंसर लगा होता है जिनके मध्य पंच कार्ड को रखा जाता है। पंच कार्ड के छिद्रों से गुजरकर प्रकाश फोटो सेंसर तक पहुँचता है जिसे कार्ड रीडर संकेतों के रूप में ग्रहण कर कम्प्यूटर तक पहुँचा देता है। फोटो सेंसर प्रकाश कोड को बाइनरी कोड में बदलता है। वर्तमान में 300 से 6000 कार्ड प्रति मिनट तक पढ़ने वाले रीडर उपलब्ध हैं। CPU की तुलना में बहुत धीमा होने के कारण इसका उपयोग काफी कम हो गया है।

4. स्कैनर (Scanner)

इसे कम्प्यूटर की आँख (Eye) भी कहा जाता है। इसके माध्यम से किसी भी लेख अथवा तस्वीर को कम्प्यूटर में सीधा संग्रहित किया जा सकता है। इसकी कार्यप्रणाली फोटोस्टेट मशीन की तरह होती है। इसके द्वारा लेख अथवा तस्वीर डिजीटल रूप में संग्रहित हो जाती है जिसे Edit का परिवर्तित भी किया जा सकता है। वर्तमान में इसका उपयोग काफी बढ़ गया है। स्कैनर द्वारा संग्रहित सामग्री को उद्देश्य के अनुरूप परिवर्तित किया जा सकता है।

5. अक्षर वाचक (Character Readers ) • ये उपकरण हाथ से लिखे हुए अक्षर एवं छपे हुए अक्षरों को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं। ये उपलब्ध अभिलेखों से अक्षर ग्रहण कर उन्हें कम्प्यूटर द्वारा ग्रहण किये जा सकने वाले कोड में परिवर्तित करते है, जिससे कम्प्यूटर उन्हें संश्लेषित कर सके। अक्षर वाचक उपकरण निम्न चार तकनीकों पर आधारित होते हैं-

(i) चुम्बकीय स्याही अक्षर पहचानक (Magnetic Inc Character Recognition-MICR ) - इसके माध्यम से एक विशेष स्याही जिसमें चुम्बकीय कण होते हैं, में लिखे गये अक्षरों को पहचाना जाता है। MICR का हैंड इन चुंजकीय स्याही में लिखे गये अक्षरों की पहचान एवं सत्यापित कर कम्प्यूटर की मेमोरी में भेजता है । इसकी सहायता से लगभग 30 दस्तावेज प्रति सैकण्ड पहचाने जा सकते है । इस उपकरण का सर्वाधिक उपयोग बैंक द्वारा चैक या ड्राफ्ट पर उल्लेखित ग्राहक खाता संख्या, ब्रांच कोड चैक/ड्राफ्ट नम्बर को सत्यापित करने हेतु किया जाता है

(ii) ऑप्टिकल चिन्ह वाचक (Optical Mark Reader - OMR) – इसके - माध्यम से विशेष रंग के पैन या पेन्सिल की सहायता से बनाये गये विशेष चिन्हों को पहचाना एवं पढ़ा जाता है। इसका प्रयोग मुख्यतः किसी परीक्षा में प्राप्तांक ज्ञात करने के लिए किया जाता है, इसकी सहायता से Objective टाइप उत्तर पुस्तिका के प्राप्तांक ज्ञात किये जाते हैं।

(iii) ऑप्टीकल अक्षर वाचक (Optical Character Reader - OCR ) - यह एक ऐसा स्कैनर है जो परिदृश्य को पढ़कर उसे कम्प्यूटर की मेमोरी में जमा करता है। इसके माध्यम से किसी भी हस्तलिखित मुद्रित कागज या दृश्य को स्कैन किया जा सकता है। स्कैन करने के बाद उसे बाइनरी कोड (0, 1) में परिवर्तित कर कम्प्यूटर को Input के ABCDEFGHIJKLMNOPQRSTUVWXYZ
0123456789 

रूप में दे देते है। कोई भी अक्षर छोटे-छोटे बिन्दुओं से मिलकर बना होता है, जिसे स्कैनर पढ़ता है और 0 एवं 1 (बाइनरी कोड) में बदलता है। इसे Bit Map कहते है। आकृति का प्रत्येक बिन्दु Pixel Map कहलाता है।

(iv) बार कोडिंग (Bar Coding) - क्रमबद्ध रूप से पतली- मोटी, खड़ी लाइनों (Bars) एवं खाली स्थान के माध्यम से सूचना अंकित करने को बार- कोडिंग कहते है । इन खड़ी लाइनों (Bars) को जब कम्प्यूटर से जुड़े लाइट पेन के सामने से गुजारने पर यह • सूचना स्वतः ही सम्बद्ध कम्प्यूटर को प्रेषित हो जाती है। हर देश में अपने प्रमाणित बार कोड्स प्रचलित हैं । अमेरिका में प्रचलित यूनिवर्सल प्रोडक्ट कोड (Universal Product Code-UPC) सबसे उपयोग में आने वाला बार कोड है। यह 10 अक्षरों का बार कोड है, जिसका उपयोग प्रायः सभी उपभोक्ता वस्तुओं में होता है। पुस्तकों के सम्बन्ध में ISBN बार कोड का उपयोग होता है ।

6. डिजीटल कैमरा (Digital Camera)

डिजीटल कैमरे की सहायता से तस्वीर लेकर उसे डिजीटल डाटा में बदल दिया जाता है। डिजीटल कैमरे की कार्यपद्धति परम्परागत कैमरे की तरह ही होती है किन्तु इसमें फिल्म का उपयोग नहीं होता। डिजीटल कैमरा में CCD (Charge Coupled Device) इलेक्ट्रॉनिक चिप का उपयोग होता है।

लेन्स के द्वारा जब प्रकाश गति करता है। तो CCD प्रकाश तरंगों को विद्युत तरंगों में बदल देता है। CCD बहुत छोटे फोटो ट्रॉन्जिस्टर्स का ग्रिड के रूप में जमाव होता है। ट्रॉन्जिस्टर्स तस्वीर में Pixel बनाते हैं। तस्वीर में जितने अधिक Pixel होंगे तस्वीर उतनी ही साफ होगी।

घरेलू उपयोग हेतु लगभग 8 लाख Pixel Resolution वाला कैमरा उपयोगी होता है, जबकि पेशेवर उपयोग हेतु मेगापिक्लेस (Megapixel) कैमरा उपयोगी होता है जिसमें 10 लाख से ऊपर Pixel होते है। डिजीटल कैमरा के माध्यम से तेज गति से अच्छी क्वालिटी की तस्वीरें ली जा सकती है, किन्तु यह परम्परागत कैमरे से मँहगा होता है ।

मुख्य निर्गम उपकरण
(Main Output Devices)

ये वे उपकरण है जिनकी सहायता से कम्प्यूटर उपयोगकर्ता को परिणाम उपलबध कराता है

प्रमुख निर्गम उपकरण निम्न हैं- 
(1) कम्प्यूटर मॉनीटर (VDU)
(2) प्रिन्टर ( Printer)

A. लाइन प्रिन्टर (Line Printer) 
(i) ड्रम प्रिन्टर (Drum Printer)
(ii) चैन प्रिन्टर (Chain Printer)

B. सीरियल प्रिन्टर

(i) डॉट मैट्रिक्स प्रिन्टर 
(ii) लेटर क्वालिटी प्रिन्टर
(a) डेजी व्हील प्रिन्टर
(b) इंकजेट प्रिन्टर 
(c) लेजर/ पेज प्रिन्टर (Laser / Page Printer)
D. प्लॉटर (Plotter )

(3) कम्प्यूटर आउटपुट (Plotter) माइक्रोफिल्म (Computer Output Microfilm) 
( 4 ) ग्राफिक्स डिस्प्ले यूनिट (Graphic Display Unit)

1. कम्प्यूटर मॉनीटर (Video Display Unit - VDU)

यह एक टी० वी० के समान उपकरण होता है जिसके स्क्रीन के अन्दर एक CRT (Cathode Ray Tube) लगी होती है जो सूचना स्क्रीन पर दर्शाती है। यह सूचनाओं के इनपुट को भी स्क्रीन पर प्रदर्शित करती है। मॉनीटर की दो प्रकार की तकनीकें वर्तमान में उपलब्ध है।

(1) सी० आर० टी० (Cathode Ray Tube) तकनीक (2) एफ० पी० डी० (Flat Panel Display) तकनीक

1. सी० आर० टी० (CRT) तकनीक - सन् 1897 में एक जर्मन वैज्ञानिक फैडीनेंड ब्राऊन ने केथोड़ रे ट्यूब (CRT) का निर्माण किया था, तभी से इसका मॉनीटर के रूप में उपयोग किया जा रहा है। सी० आर० टी० के मुख्य दो भाग है पहला नैक एवं दूसरा बेस । बेस की आन्तरिक सतह पर विशेष आकृति में फोस्फर ( Phosphur) की बिंदियों का लेप चढ़ा होता है। ये फोस्फर की बिंदियाँ लाल, एवं नीले रंग के समूहों में होती है। इन बिंदियों को पिक्सेल (Pixel) कहा जाता है। एक इलेक्ट्रॉनिक गन द्वारा (जो कि काँच की नली के भीतर होती है) इलेक्ट्रॉनों की धारा प्रवाहित की जाती है। इस धारा के सम्पर्क में आने से ये पिक्सल प्रकाश उत्पन्न करते हैं। विशेष चुंबक जिसे डिफ्लैक्शन बॉक्स कह है, इलेक्ट्रॉन की धारा को नियन्त्रित करते है। इलेक्ट्रॉनिक गन फोस्फर की परत पर ऊपर से नीचे आते हुए बायें से दायीं ओर चलती है। इसे रास्टर स्कैन कहते हैं । पिक्सलों का रंग इलेक्ट्रॉनों के प्रहार की शक्ति पर निर्भर करता है। मॉनीटर पर दृश्य निर्माण में अति तीव्र गति की स्कैनिंग की आवश्यकता होती है। प्रत्येक पिक्सल को वीडियो कार्ड से प्राप्त संकेतों के आधार पर प्रकाशित किया जाता है। 

पिक्चर ट्यूब के निर्माण की शैडो मास्क, ग्रिल एवं स्लाटेड मास्क तकनीकें उपयोग में लाई जाती हैं। शैडो मास्क के अन्तर्गत लाल, हरा एवं नीला (RGB) बिन्दु आपस में त्रिकोण बनाते हुए स्थित (RGB) बिन्दु आपस में त्रिकोण बनाते हुए स्थित होते हैं। एपर्चर ग्रिल की खोज सोनी कार्पोरेशन द्वारा की गई थी, इसे Trintron ट्यूब कहते हैं। स्लाटेड मास्क की खोज NEC द्वारा की गई थी, यह उपरोक्त दोनों का मिश्रण है । 

2. एफ० पी० डी० (Flat Panel Display) तकनीक - इस तकनीक की दो प्रणालियाँ हैं ।

(अ) एल० सी० डी० स्क्रीन (LCD Screen) 
(ब) प्लाज्मा डिस्प्ले (Plasma Display)

(अ) एल० सी० डी० स्क्रीन (LCD Screen) – इसके अन्तर्गत दो परतों के बीच लिक्विड क्रिस्टलों को भर दिया जाता है। ये क्रिस्टल सामान्यतया पारदर्शी होते हैं किन्तु जब विद्युत प्रवाहित किया जाता है तो ये अपारदर्शी हो जाते है। ये स्क्रीन भी दो तरह के होते हैं-

DSTN (Dual Scan Twister Nematic)
TFT (Thin Film Transistor)

DSTN में क्रिस्टल की प्रतिक्रिया धीमी होती है। इसलिए यह नये संकेतों को तुरन्त ग्रहण नहीं कर पाती, इसे Passive Matrix भी कहते है ।

TFT जिसे एक्टिव मैट्रिक्स स्क्रीन भी कहते है TFT के ट्रांजिस्टर्स की स्विचिंग क्षमता अति तीव्र होती है अतः तस्वीर स्पष्ट एवं स्थिर होती है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक पिक्सल के साथ चार ट्रांजिस्टर लगे होते हैं ।

(ब) प्लाज्मा डिस्प्ले (Plasma Display) - यह मॉनीटर की नवीनतम तकनीक है। इसमें X तथा Y तत्त्वों का एक जाल प्रयोग किया जाता है जो प्रत्येक पिक्सल को एड्रेस कर सकती है। प्रत्येक पिक्सल में Xenon गैस बहुत ही कम दबाव पर भरी होती है। जब इन पिक्सलों पर उच्च विद्युत ऊर्जा प्रयोग की जाती है तो यह अल्ट्रा वायलेट प्रकाश उत्सर्जित करते है । इससे लाल, हरा एवं नीला फोस्फर का लेप उत्प्रेरित होता है। इसमें प्रत्येक पिक्सल एक फ्लोरोसेट बल्ब की तरह कार्य करता है। इस प्रणाली की सबसे बड़ी कमजोरी पिक्सल का आकार है। अभी तक कोई भी निर्माता 0.3mm से छोटे आकार के पिक्सल का निर्माण नहीं कर पाया है। अतः इस तकनीक का उपयोग 25 इंच से 70 इंच की विशाल डिस्प्ले इकाईयों में ही किया जा सकता है। प्लाज्मा एवं गैस प्लाज्मा तकनीकें काफी महँगी है परन्तु अच्छी किस्म की तस्वीरें प्रदान करती हैं।

प्रारम्भ में फ्लेट पैनल मॉनीटर्स का उपयोग पोर्टेबल कम्प्यूटर्स के लिए किया जाता था किन्तु अब इनका उपयोग डेस्क टॉप कम्प्यूटर्स के साथ काफी होने लगा है। ये मॉनीटर सी० आर० टी० की तुलना में कम स्थान घेरते है तथा कम विद्युत (Power) का उपयोग करते है। LCD मॉनीटर रेडियेशन नहीं छोड़ते हैं ।

मॉनीटर का चुनाव करते समय निम्न घटकों पर ध्यान देना आवश्यक है--

1. आकार ( Size)
2. रिजोल्यूशन (Resolution)

1. आकार (Size) - टेलीविजन की तरह मॉनीटर का आकार भी इंचों में मापा जाता है। यह माप एक कोने से दूसरे कोने तक की ( Diagonally ) ली जाती है। आजकल 15, 17, 19 एवं 21 इंच के मॉनीटर बाजार में उपलब्ध है।

2. रिजोल्यूशन (Resolution) - मॉनीटर के रिजोल्यूशन को पिक्सल (Pixel) की संख्या से मापा जाता है। 1600 x 1200 पिक्सल रिजोल्यूशन से आशय 1600 आयताकार (Horizontally) रूप में व 1200 पिक्सल लम्बवत (Vertically) कन्ट्रोलर (Video Controller) द्वारा निर्यात किया जाता है।

2. प्रिन्टर (Printer)

स्थायी आउटपुट प्राप्त करने हेतु प्रिन्टर का सर्वाधिक उपयोग होता है। वर्तमान में

कई प्रकार के प्रिन्टर उपलब्ध है, जिन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-
प्रिन्टर
लाइन प्रिन्टर -
ड्रम प्रिंटर
चैन प्रिंटर

सीरियल प्रिंटर -
डॉट मैट्रिक्स
लेटर क्वालिटी -
डेजी व्हील
इंकजेट

लेजर प्रिंटर

प्लॉटर

(A) लाइन प्रिंटर (Line Printer)

ऐसे प्रिन्टर जो एक साथ पूरी लाइन प्रिंट करते है लाइन प्रिंटर कहलाते है। इनकी प्रिंटिंग गति काफी तीव्र होती है। ये 300 से 2500 लाइन प्रति मिनट की गति से प्रिंट कर सकते है। ऐसे स्थानों पर जहाँ आउटपुट की मात्रा काफी अधिक होती है वहाँ इनका उपयोग किया जाता है। बिजली एवं टेलीफोन के बिल, परीक्षा की अंकतालिकाओं की प्रिंटिंग एवं बड़े व्यापारिक गृहों एवं संस्थाओं हेतु ये काफी उपयोगी होते हैं। वर्तमान में अंग्रेजी भाषा के 48, 64 एवं 96 अक्षर समूह के प्रिंटर उपलब्ध है । इनमें मुद्रण प्रिंटर हैड की यांत्रिक गति से नियंत्रित होता है। लाइन प्रिंटर दो प्रकार के होते हैं-

(i) ड्रम प्रिंटर (Drum Printer) (ii) चैन प्रिंटर (Chain Printer)

(i) ड्रम प्रिंटर (Drum Printer) – इस प्रिंटर में एक ठोस बेलनाकार ड्रम की सत पर छप सकने वाले अक्षर समूह उभरे (Embossed) हुए रहते हैं, जिनकी सहायता से प्रिंटिंग होती है। लाइन के प्रत्येक प्रिंट स्थान (Bond) पर सभी संभव अक्षर उभरे हुए होते हैं। यह ड्रम तीव्र गति से घूमता है तथा ड्रम की सतह के सामने प्रिंटर हैमर (हथौड़े) लगे होते हैं। ड्रम एवं प्रिंट हैमर के मध्य कार्बन रिबन लगा होता है। कागज जब ड्रम व प्रिंट हैमर के मध्य से गुजरता है तो हैमर के ड्रम पर प्रहार से वांछित अक्षर कागज पर छप जाते हैं।. छपाई हेतु कम्प्यूटर की मैमोरी से प्रिंटर की बफ़र मेमोरी को निर्देश जाता है। पूरी का एकत्रित होने पर ड्रम क्रियाशील हो जाता है तथा एक साथ एक लाईन प्रिन्ट कर देता है। ड्रम एवं हैमर में पूरा तालमेल होना आवश्यक है अन्यथा त्रुटिपूर्ण प्रिंटिंग आने लगती है। इस प्रिंटर में अक्षर आकृति (Fonts) निश्चित होती है, जिसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। ये प्रिंटर काफी महँगे होते हैं।

(ii) चैन प्रिंटर (Chain Printer ) - चैने प्रिन्टर में अक्षर एक स्टील की चैन पर उभरे हुए होते हैं। यह चैन तेजी से घूमती है तथा काब्रन रिबन पर प्रिंट हैमर की चोट से कागज पर अक्षर प्रिंट होते हैं। इसकी कार्य प्रणाली लगभग ड्रम प्रिंटर की तरह होती है । केवल ड्रम के स्थान पर चैन पर अक्षर होते हैं। इसमें चैन (Bond) तीव्रता से प्रिंट की गति तेज करने हेतु इसमें चेन पर अक्षर समूह को कई बार दोहराया जाता है इसलिए घूमती है। सही प्रिंट स्थिति पर इच्छित अक्षर की प्रिंट हेतु चैन का पूरा घूमना आवश्यक नहीं है । प्रति लाइन 132 अक्षरों हेतु 132 हैमर आवश्यक होते हैं, हैमर कार्बन रिबन पर प्रहार करता कार्बन रिबन चैन, पेपर एवं हैमर के मध्य स्थित होता है। इसमें भी चैन एवं हैमर की गति में तालमेल होना आवश्यक है। ड्रम की अपेक्षा इसमें अक्षर समतल (Horizontal) रूप में घूमते है जिससे उसी प्रिंटर से अलग-अलग Font वाली प्रिंटिंग प्राप्त की जा सकती है। ये 400 से 2500 अक्षर प्रति मिनट प्रिंट कर सकते हैं। इनका उपयोग भी उन कार्यालयों में अधिक होता है जिनमें अत्यधिक प्रिंटिंग आउटपुट की आवश्यकता होती हैं ।

(B) सीरियल प्रिंटर ( Serial Printer)

टाइपराइटर की भाँति ये प्रिंटर एक अक्षर प्रिंट करते है। इसमें प्रिंट हैड की सहायता से प्रिंटिंग होती है जो एक लाइन के रूप में एक-एक अक्षर प्रिंट करते जाते है। ये तुलनात्मक रूप से धीमी गति से प्रिंट करते हैं।

(i) डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर (Dot Matrix Printer)

सीरियल प्रिंटर्स में डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर सबसे अधिक लोकप्रिय । इस प्रकार के प्रिंटरों के प्रिंट हैड में 9 x 7 पिनों के मैट्रिक्स दिये होते. है जिनकी सहायता से अक्षर बनते है । इसमें कम्प्यूटर की मेमोरी से एक बार में एक अक्षर भेजा जाता है जिसे प्रिंटर प्रिंट करता है। प्रिंटर अपना मेमोरी में सुरक्षित प्रत्येक अक्षर के प्रतिरूप के आधार पर हैड में उपस्थित पिनों का चयन उस विशेष अक्षर हेतु कर लेता है । पिन एवं कागज के मध्य एक कार्बन लगा होता है। उन पिनों के पेपर से टकराने पर वह अक्षर छप जाता है। वर्तमान में 24 पिनों वाले प्रिंटर भी उपलब्ध जो अधिक कुशल हैं। पिनों की संख्या अधिक होने पर प्रिंटिंग उतनी ही आकर्षक होती है। ये 80 अक्षर प्रति सैकण्ड से 1500 अक्षर प्रति सैकण्ड की गति से प्रिंट करने में सक्षम होते है। ये किसी भी भाषा में प्रिंट कर सकते हैं। इनमें अक्षरों के निश्चित आकार (Font ) नहीं होते। इनकी सहायता से हिन्दी की देवनाकरी लिपि में प्रिंट करना भी सरल है। इसकी सहायता से ग्राफ एवं चार्ट भी आसानी से बनाये जा सकते है। प्रिंट करते समय इनका समय इनका प्रिंट दांये से बांये एवं बायें से दायें अर्थात् दोनों तरफ से प्रिंट कर सकता है जिससे इसकी प्रिंट गति तीव्र होती है। इनका प्रयोग सर्वाधिक होता है तथा इनकी प्रिंटिंग लागत काफी कम आती है।

(ii) लेटर क्वालिटी प्रिंटर (Letter Quality Printer)

इन प्रिंटर्स की प्रिंटिंग क्वालिटी डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर की तुलना में काफी आकर्षक होती है। डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर में डॉट्स के माध्यम से अक्षरों की आकृति बनती है जबकि इनमें क्रमबद्ध रेखाओं के माध्यम से अक्षरों की आकृति बनती है। लेटर क्वालिटी प्रिंटर निम्न दो प्रकार के होते हैं-

(a) डेजी व्हील प्रिंटर (Daisy Wheel Printer) - ये प्रिन्टर पुरानी टाइपराइटर शैली पर आधारित होते हैं। इसमें डेजी व्हील जो कि प्लास्टिक या धातु का बना होता है. की सहायता से प्रिंट होता है। इस व्हील में सामान्यतया 96 तूलिकाएँ (Petals) होती हैं। जिनके सिरों पर टाइपराइटर की भाँति अक्षर उभरे हुए होते हैं। ये व्हील एक स्टैण्ड पर स्थित होता है जो इसे दांये से बांये एवं बांये से दांये घुमाता है। जब इच्छित अक्षर व्हील के . घूमने पर सही स्थिति में आ जाता है तो हैमर क्रियाशील होकर व्हील पर प्रहार करता है। तथा इच्छित अक्षर कार्बन की सहायता से पेपर पर प्रिंट हो जाता है। इसमें डेजी व्हील को बदल कर विभिन्न अक्षरों एवं डिजाइनों में प्रिंट किया जा सकता है। इसमें ग्राफिक्स की प्रिंटिंग सम्भव नहीं है । ये 10 से 50 अक्षर प्रति सैकण्ड की गति से प्रिंट कर सकते हैं।

(b) इंकजेट प्रिंटर (Inkjet Printer) - ये प्रिंटर नई तकनीकी पर आधारित है। इस प्रिंटर के प्रिंट हैड में बहुत बारीक छिद्रों वाले नोजल लगे होते हैं। जिनसे एक विशेष प्रकार की स्याही (जिसमें आयरन की मात्रा अधिक होती है) पंप कर बाहर - फैंकी जाती है, जिससे इच्छित अक्षर व आकृति का निर्माण होता है । स्याही की बूँदे सही नोजल से गिरे इसके लिए • इलेक्ट्रॉनिक पद्धति का उपयोग होता है। नोजल से वाष्पीकृत होकर चुम्बीकृत स्याही बाहर निकलती है। परावर्तक प्लेट्स के माध्यम से यह स्याही अपनी निर्धारित स्थिति पर पहुँच कर अक्षर आकृति का निर्माण करती है। एक अच्छी क्षमता वाले इंक जैट प्रिंटर में 7 MM की ऊँचाई वाले लगभग 50 नोजल्स (Nozzles) लगे होते हैं जो कि प्रति इंच 600 डाट्स तक छाप सकता है। वर्तमान में एक से अधिक प्रिंटिंग हैड वाले प्रिंटर उपलब्ध है जिनकी सहायता से विभिन्न रंगों में आकर्षक प्रिंटिंग की जा सकती है। यह प्रति सैकण्ड 120 अक्षर प्रिंटर कर सकते है। इनकी प्रिंटिंग लागत तुलनात्मक रूप से अधिक होती है। इनके द्वारा एक बार में एक ही प्रति प्रिंट की जा सकती है। 

(C) लेजर प्रिंटर (Laser Printer)

यह वर्तमान के सबसे अधिक विकसित प्रिंटर हैं। ये एक पेज एक साथ प्रिंट करते हैं अतः इन्हें पेज प्रिंटर भी कहा जाता है। लाईन एवं सीरियल प्रिंटर में प्रिंट हैड एवं रिबन का उपयोग होने के कारण इनकी गति धीमी होती थी । शोध एवं अनुसंधान के बाद 'फोटोकॉपी तकनीक वाले लेजर प्रिंटर का विकास हुआ। इन प्रिंटर्स में एक फोटो सेन्सिटिव ड्रम होता है जो सिलिकान से बना होता है। इस ड्रम पर सेलेनियम की परत होती है जो प्रकाश के प्रति अतिसंवेदनशील होती है। इस ड्रम पर अक्षरों के प्रतिबिम्ब की लेजर किरणें डाली जाती है, जिस स्थान पर लेजर किरणें पड़ती है वह स्थान चार्ज रहित (खाली) हो जाता है। यह ड्रम घूमता हुआ टोनर (इंक पाउडर) के सम्पर्क में आता है तो टोनर खाली स्थान पर चिपक जाता है। जब यह ड्रम कागज के सम्पर्क में आता है तो टोकनर उसी रूप में कागज पर चिपक जाता है। इस कागज को प्रिंटर द्वारा थोड़ा गर्म किया जाता है जिससे टोनर स्थायी रूप से चिपक जाता है। यह अक्षर एवं ग्राफिक्स दोनों ही प्रकार के प्रिंट के लिए उपयोगी होता है। डेस्क टॉप प्रिंटिंग (DTP) हेतु आवश्यक निगेटिव फिल्म इनकी सहायता से ही तैयार होती है। इसकी प्रिंटिंग किसी भी आकृति (Font) में तैयार हो सकती है । इन्हें नॉन-इम्पेक्ट (Non-impact ) प्रिंटर भी कहते हैं । सामान्य लेजर प्रिंटर 4 से 8 पेज प्रति मिनट प्रिंट करते हैं। यद्यपि 100 पेज़ प्रति मिनट प्रिंट करने वाले लेजर प्रिंटर भी उपलब्ध हैं किन्तु वे काफी मँहगे हैं।

(D) प्लॉटर (Plotter)

इनका उपयोग अच्छी चित्रकारी एवं ग्राफिक्स को प्रिंट करने हेतु होता है। इनसे ग्राफ, चित्र, प्रिंट, चार्ट आदि सरलता से तैयार किये जा सकते है। इनसे रंगीन प्रिंट भी प्राप्त किये जा सकते है। प्लॉटर दो प्रकार के होते हैं-

(i) ड्रम प्लॉटर
(ii) फ्लेट बेड प्लॉटर

3. कम्प्यूटर आउटपुट माइक्रोफिल्म (Computer Output Microfilm) इसका उपयोग अत्यधिक डाटा को संक्षिप्त रूप में स्टोर करने में होता है । इसमें कम्प्यूटर आउटपुट को माइक्रोस्कोपिक फिल्म के रूप में रिकार्ड किया जाता है। सूचना रिकार्ड एक शीट या माइक्रोफिल्म के रोल पर रखा जाता है। 4 " × 6" इंच की शीट माइक्रोफिश कहलाती है। एक माइक्रोफिश में 270 पेज की सूचनाएँ रिकार्ड की जा सकती हैं। इस तकनीक में परम्परागत प्रिंटर्स की तुलना में डाटा को 48 गुना छोटा कर उनकी फिल्म बनाई जाती है जिससे एक माइक्रोफिश एक प्रिंटेड पेज का लगभग 300 गुना सूचना रिकार्ड कर सकती है ।

इस तकनीक में एक माइक्रोफिल्म रिकार्डर का उपयोग होता है जो सीपीयू या मैग्नेटिक टेप से सूचना ग्रहण करता है। यह रिकार्डर इन सूचनाओं को एक मॉनीटर (CRT) पर प्रदर्शित करता है। इस प्रदर्शित सूचना को एक कैमरा तीव्र गति से पिक्चर के रूप में रिकॉर्ड कर लेता है। इस फिल्म को प्रढ़ने हेतु माइक्रोफिल्म रीडर का उपयोग किया जाता है जो इन सूचनाओं को पढ़कर प्रदर्शित करता है। प्रिंटर से जुड़े होने पर वांछित सूचनाएँ पेपर पर प्रिंट हो जाती है। माइक्रोफिल्म रीडर "बैक प्रोजेक्सन' सिद्धान्त के आधार पर कार्य करता है । यह प्रणाली उन संगठनों हेतु काफी उपयोगी है, जहाँ अधिक मात्रा में सूचनाएँ अधिक लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की आवश्यकता होती है। यह प्रणाली विश्वविद्यालयों में आज तक विभिन्न परीक्षाओं में बैठे परीक्षार्थियों का रिकॉर्ड बनाने में काफी उपयोगी सिद्ध हो सकती है। वर्तमान में इस प्रणाली का उपयोग बैंक, बीमा कम्पनियाँ आदि संस्थाएँ अपने रिकार्डस रखने हेतु करता हैं।

इस प्रणाली में रिकार्ड करने की गति सामान्य लाइन प्रिंटर की अपेक्षा 30 गुना अधिक होती है। हजारों पृष्ठों में रखी जा सकने वाली सूचना माइक्रोफिल्म में परिवर्तित कर एक छोटे से स्थान पर रखी जा सकती है। इसकी रिकार्ड करने की तुलनात्मक लागत भी कम आती है। इसके अंतर्गत ड्राइंग्स, दृश्य एवं सभी प्रकार के अक्षर रिकार्ड किये जा सकते । इस प्रणाली में प्रारम्भिक निवेश अधिक होता है इसलिए इसकी उपयोगिता केवल वृहत् सूचनाओं के रिकार्ड हेतु ही है ।

4. ग्राफिक डिस्प्ले यूनिट (Graphic Display Unit) - ये मॉनीटर अल्फान्यूमेरिक अक्षरों के साथ-साथ ग्राफ्स एवं डायग्राम्स को भी प्रदर्शित कर सकते है। इसके माध्यम से डिजाइन्स में संशोधन भी किया जा सकता है। इसमें विभिन्न रंगों के उपयोग द्वारा डिजाइन को विभिन्न रंगों में प्रभावी ढंग से प्रदर्शित किया जा सकता है। इस तकनीक का उपयोग वर्तमान में कार, जहाज, भवन, हाइवे आदि की डिजाइन में किया जाता है। विभिन्न प्रकार की सूचनाएँ ग्राफ्स के माध्यम से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत की जा सकती है, जिससे प्रबन्धकीय निर्णयों में सहायता मिलती है।

4. कम्प्यूटर कम्प्यूटर मेमोरी (Computer Memory) मेमोरी में सूचनाएँ एवं कार्यक्रम संग्रहित किये जाते है । कम्प्यूटर मेमोरी कम्प्यूटर का अत्यन्त महत्वपूर्ण हिस्सा है । वे सभी सूचनाएँ जो इनपुट हेतु आवश्यक होती है तथा आवश्यक निर्देशों के बाद प्राप्त मध्यवर्ती एवं अन्तिम परिणाम आउटपुट यूनिट में जाने से पूर्व मेमोरी सीपीयू से जुड़ी रहती है। मेमोरी अनेकों सैल्स (Cells) से मिलकर बनी होती है। प्रत्येक सेल में एक 'बिट' (0 या 1) स्टोर करने की क्षमता होती है। सैल फ्लिप-फ्लाप (Flip-Flop ) के रूप में '1' तथा 'ऑफ' के रूप में 'O' संग्रहित करते हैं ।

मेमोरी दो प्रकार की होती हैं- 

I. प्राथमिक मेमोरी (Primary Memory)
II. द्वितीयक मेमोरी (Secondary Memory)

I. प्राथमिक मेमोरी (Primary Memory)

यह कम्प्यूटर के सीपीयू (CPU) का एक आवश्यक भाग है। इसे आन्तरिक मेमोरी भी कहते है । कम्प्यूटर की क्षमता को आँकने में इस आन्तरिक मेमोरी की संग्रहण क्षमता का बहुत महत्त्व होता है । इस मेमोरी से किसी भी सूचना को किसी भी स्थान से प्राप्त किया जा सकता है।

यह मेमोरी मुख्यतः दो प्रकार की होती है—

रैम (RAM)

रोम (ROM)
प्रोम (PROM)
इप्रोम (EPROM)

(i) रेण्डम एक्सेस मेमोरी [RAM (Random Access Memory)] - यदि सूचना को किसी भी पत्ते पर भण्डारित किया जा सकता हो, एवं किसी भी पते से सीधा पढ़ा जा सकता हो तो इसे RAM कहते है । यह कम्प्यूटर का प्रयोग करते समय सबसे अधिक काम में लाई जाने वाली मेमोरी है। कम्प्यूटर के बन्द किये जाने पर इस मेमोरी में संग्रहित सूचनाएँ अपने-आप नष्ट हो जाती हैं इसलिए इस मेमोरी को अस्थायी मेमोरी कहा जाता है। । कम्प्यूटर में इनपुट की जाने वाली सूचना सर्वप्रथम इसी मेमोरी में संग्रहित होती है। 

(ii) रीड ऑनली मेमोरी [ROM (Read Only Memory)] - इस मेमोरी में सूचनाएँ स्थायी रूप से संग्रहित होती है। कम्प्यूटर निर्माण के समय ही इसमें सूचनाएँ संग्रहित कर दी जाती है, जिन्हें उपयोगकर्ता सिर्फ पढ़ सकता है, परिवर्तन नहीं कर सकता। इसमें ऐसी सूचनाएँ संग्रहित होती हैं जो कम्प्यूटर के परिचालन हेतु आवश्यक होती हैं। ये मेमोरी इलेक्ट्रॉनिक सर्किट्स के रूप में होती है। कम्प्यूटर परिचालन हेतु विशेष प्रोग्राम जिन्हें माइक्रोप्रोगाम्स कहते है, इसमें संग्रहित होते हैं। 

प्रोम (PROM

वर्तमान में ऐसे रोम चिप उपलब्ध हैं जिन पर उपयोगकर्त्ता आवश्यक विशेष प्रोग्राम अंकित कर सकता है। इसे प्रोम (Programmable Read only Memory) कहते हैं । एक बार प्रोग्राम अंकित करने पर वह स्थायी प्रकृति का (ROM) बन जाता है तथा उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता। है

इप्रोम (EPROM

चूँकि प्रोम (PROM) में संग्रहित सूचना परिवर्तित नहीं की जा सकती इसलिए उपयोगकर्ता अपनी इच्छा से प्रोग्राम में परिवर्तन नहीं कर सकता। इसी कमी को दूर करने हेतु वर्तमान में इप्रोम (EPROM) चिप उपलबध जिन पर संग्रहित सूचना को अल्ट्रा-वाइलेट लाइट (Ultra - Violet Light) द्वारा हटाया जा सकता है। इसमें मेमोरी स्थान रिक्त हो जाता है जिस पर उपयोगकर्ता अपनी इच्छा के अनुसार पुनः प्रोग्राम अंकित कर सकता है । पुनः ये सूचनाएँ स्थायी प्रकृति की बन जाती है। शोध एवं अनुसंधान कार्यों में इस प्रकार की मेमोरी का अत्यधिक उपयोग होता है।

RAM एवं ROM के मध्य अन्तर

RAM

1. यह मेमोरी अस्थाई (Volatile) होती है।
2. कम्प्यूटर के बन्द होने पर इसमें लिखी सूचनाएँ खत्म हो जाती हैं।
3. इस मेमोरी को लिखने एवं पढ़ने (Read / Write) दोनों कार्यों में काम लिया जाता है।
4. इसका उपयोग उपयोगकर्ता द्वारा अपने प्रोग्राम बनाने में किया जाता है ।

ROM
1. यह मेमोरी स्थाई होती है ।
2. कम्प्यूटर के बन्द होने पर भी इसमें लिखी सूचनाएँ यथावत बनी रहती हैं। 
3. इस मेमोरी में लिखी गई सूचनाओं को केवल पढ़ा जा सकता है।
4. इसमें कम्प्यूटर में परिचालन हेतु आवश्यक प्रोग्राम कम्प्यूटर के निर्माण के समय ही संग्रहित कर दिये जाते है।

II. द्वितीयक मेमोरी (Secondary Memory)

प्राथमिक मेमोरी के अतिरिक्त कम्प्यूटर में एक और प्रकार की मेमोरी काम में लाई। जाती है, जिसे द्वितीयक या सहायक मेमोरी कहते है । इस मेमोरी में डाटा अत्यधिक मात्रा में दीर्घावधि तक संग्रहित किया जा सकता है। प्राथमिक मेमोरी की संरचना सेमीकण्डक्टर (अर्ध-चालित) पर आधारित होती है जो कि अत्यधिक लागत वाले होते है । यद्यपि सेमीकण्डक्टर आधारित मेमोरी (प्राथमिक मेमोरी) अत्यधिक तीव्र गति से कार्य करती है किन्तु अत्यधिक लागत के कारण इसका उपयोग एक सीमा तक ही किया जा सकता है। मँहगी होने के कारण प्राथमिक मेमोरी की प्रति बिट (Bit) संग्रहण लागत अधिक आती है। सैकण्ड मेमोरी कम लागत में अत्यधिक सूचनाओं का संग्रहण एवं संरक्षण कर सकती है। वर्तमान में कम्प्यूटरों के बहुउपयोग को देखते हुए जिसमें प्रोग्राम हेतु बड़ी संख्या में सूचनाओं के संग्रहण की आवश्यकता हो केवल प्राथमिक मेमोरी के संग्रहण के आधार पर कार्य नहीं हो सकता । 

द्वितीयक मेमोरी गति में अपेक्षाकृत धीमी होती है, किन्तु भण्डारण क्षमता काफी अधिक होने के कारण वर्तमान में कम्प्यूटर उपयोग में इसकी उपयोगिता बढ़ गई है। प्राथमिक मेमोरी प्रोसेसर द्वारा सीधे उपयोग में ली जाती है, जबकि द्वितीयक मेमोरी का उपयोग प्रोसेसर द्वारा सीधे नहीं किया जाता । द्वितीयक मेमोरी की वांछित सूचनाएँ प्रोसेस के समय पहले मुख्य मेमोरी में हस्तान्तरित होती है, जिन्हें प्रोसेसर द्वारा उपयोग किया जाता है। मैग्नेटिक टेप, मैग्नेटिक डिस्क, फ्लॉपी डिस्क, सी० डी० आदि मुख्य द्वितीयक मेमोरी उपकरण हैं।

द्वितीयक मेमोरी उपकरण (Secondary Memory Devices)

(A) मैग्नेटिक संग्रहण उपकरण
(Magnetic Storage Devices) 

1. मैग्नेटिक टेप (Magnetic Tape ) - यह एक ऐसा द्वितीयक मेमोरी उपकरण है, जिसमें सूचनाएँ क्रमबद्ध (Serial) रूप से प्राप्त की जा सकती है। यह ऑडियो टेप की भाँति होती है। यह इंच चौड़ी प्लास्टिक रिबन के रूप में होती है, जिसकी ऊपरी सतह 2 पर आयरन-ऑक्साइड (Iron - Oxide) की परत चढ़ी होती है, जिसे चुम्बीकृत कर सूचनाएँ रिकॉर्ड की जाती हैं। इसे एक कैसेट के रूप में लपेटा जाता है। साधारण ऑडियो टेप की भाँति इस पर बार-बार लिखा एवं मिटाया जा सकता है। ये टेप ट्रेक्स एवं लम्बवत रूप से फ्रेम्स में बँटी होती हैं। 8 ट्रेक्स एक बाईट (Byte) डाटा रिकार्ड करने व 9 वां ट्रेक एरर कण्ट्रोल (Byte) या पेरिटी बिट होता है, जिसका उपयोग डाटा लिखने एवं पढ़ने के समय प्रत्येक फ्रेम में हुई गलती को ढूँढ़ने के काम में लिया जाता है। वर्तमान में विभिन्न प्रकार की लम्बाइयों वाले (50 फीट से लेकर 2400 फीट तक) टेप्स उपलब्ध हैं।

टेप में रिकार्ड की गई सूचनाओं के घनत्व को बिट प्रति इंच (Bit Per Inch ) के रूप में मापा जाता है। जो उपकरण टेप से पढ़ने या लिखने के काम आते हैं उन्हें मैग्नेटिक टेप ड्राइव कहते हैं। टेप एक रोड-राइट हैड (Read Write Head) हैड (Coil) होती है जिसमें क़रण्ट प्रेरित होने के आधार पर डाटा पढ़ा जाता है।

मैग्नेटिक टेप के लाभ (Advantages of Magnetic Tape)

1. सूचनाओं का अत्यधिक संग्रहण
2. अत्यधिक डाटा घनत्व
3. निम्न लागत
4. उपयोग में सरलता 
5. पुनः उपयोग सम्भव

मैग्नेटिक टेप से हानियाँ (Disadvantages of Magnetic Tape)

1. केवल क्रमबद्ध रूप से ही सूचनाएँ पढ़ी जा सकती हैं। 
2. वातावरण का प्रभाव - धूल आदि से अत्यधिक भय ।

2. मैग्नेटिक डिस्क (Magnetic Disc) - इसे हार्ड डिस्क भी कहते है । यह रेण्डम एक्सेस मेमोरी होती है अर्थात् किसी भी क्रम में सूचनाएँ आवश्यकता के अनुसार प्राप्त की जा सकती है। यह डिस्क ग्रामोफोन डिस्क की तरह होती है । यह डिस्क सिलिका (Silica) प्लेट की होती है, जिसके दोनों ओर चुम्बकीय पदार्थों का लेप रहता है । डाटा को काफी तीव्र गति से इनपुट / आउटपुट करने हेतु यह सबसे अधिक प्रयोग में लाई जाती है। मैग्नेटिक डिस्क एक से अधिक संख्या में एक के ऊपर एक स्पेंडल के सहारे लगाई जाती है इसे डिस्क पैक कहते हैं 1 डिस्क पैक की सबसे ऊपर की डिस्क की ऊपरी परत व सबसे नीचे वाली डिस्क के नीचे की परत को छोड़कर शेष सभी डिस्कों के दोनों ओर सूचनाओं का संग्रह किया जाता है । डिस्क पैक को डिस्क ड्राइव में लगा दिया जाता है। डिस्क ड्राइव में एक मोटर लगी होती है जो डिस्क पैक को अपनी धुरी पर 3600 चक्र प्रति मिनट (RPM) या अधिक गति से घुमाती है । डिस्क पैक की प्रत्येक सतह के ऊपर Read / Write हैड लगा होता है जो डाटा लिखने पढ़ने का कार्य करता है । डिस्क सैक्टर में बंटी होती है तथा हर सैक्टर का Address होता है। Sector Address के माध्यम से किसी भी क्षेत्र में सूचना लिखी / पढ़ी जा सकती है।

डिस्क की सतह के साथ लगे Read / Write हैड दो प्रकार के होते हैं- 

(i) चलित (Moving), (ii) स्थिर (Fixed )। चलित हैड सुविधानुसार डिस्क पर आगे पीछे हो सकता है जबकि स्थिर हैड में प्रत्येक ट्रेक के ऊपर एक स्थिर हैड लगा होता है। अतः यह अधिक तीव्र गति से डाटा पढ़-लिख सकता है किन्तु यह अधिक खर्चीला होता है तथा इसकी क्षमता कम होती है।

डिस्क की संग्रहण क्षमता की गणना करने हेतु हमें सतह, ट्रैक्स की संख्या, सेक्टर की संख्या तथा प्रत्येक सेक्टर की संग्रहण क्षमता को ध्यान में रखना होता है। 

कुल संग्रहण क्षमता = सतह की संख्या × ट्रेक्स की संख्या × सेक्टर की संख्या x प्रत्येक सेक्टर की संग्रहण क्षमता

जैसे डिस्क पैक में 12 डिस्क प्लेट हैं तथा प्रत्येक सतह पर 200 ट्रेक्स व प्रत्येक ट्रेक पर सेक्टर की संख्या 64 तथा प्रत्येक सेक्टर की संग्रहण क्षमता 512 Bytes Per Sector हो तो कुल संग्रहण क्षमता होगी-
= 12 × 200 × 64 × 512 = 144179200 Bytes 
= 137.5 MB

यही मैग्नेटिक डिस्क जब सी० पी० यू० बॉक्स के अन्दर लगी होती है तो इसे हार्ड डिस्क कहते हैं। वर्तमान में काफी अधिक भण्डारण क्षमता वाली हार्ड डिस्क का उपयोग होने लगा है। एक पर्सनल कम्प्यूटर में लगभग 10 से 20 GB ( Giga Bytes) की ग्रहण क्षमता वाली हार्ड डिस्क का उपयोग होने लगा है। 

मैग्नेटिक टेप व मैग्नेटिक डिस्क के मध्य निम्न अन्तर हैं-

Access
इसमें सूचना क्रमबद्ध रूप (Sequential Access) से ही पढ़ी जा सकती है।

Access Time
इसमें डाटा प्राप्त करने में तुलनात्मक रूप में अधिक समय लगता 1

Rebustness
इसमें धूल / आद्रता आदि का प्रभाव आसानी से हो जाता है।

Cost
यह सस्ती होती है ।


Portability
इसकी Portability आसान होती है।

हार्ड/ मैग्नेटिक डिस्क

Access
यह Random Access होती है। अर्थात् सूचना कहीं से भी पढ़ी जा सकती है।

Access Time
इसमें डाटा प्राप्त करने में तुलनात्मक रूप में कम समय लगता है।

Rebustness
इसमें धूल / आद्रता का प्रभाव कम होता है क्योंकि ये डिस्क पैक में ढकी रहती है।

Cost
यह मँहगी होती है।

Portability
इसकी Portability कम होती है। क्योंकि ये कम्प्यूटर से जुड़ी रहती है।

3. फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk)

मैग्नेटिक डिस्क काफी मँहगी होने के कारण केवल मध्यम एवं बड़े कम्प्यूटरों के लिए ही उपयोगी है। फ्लॉपी डिस्क तुलनात्मक रूप से काफी सस्ती होती है, जिससे इसका उपयोग मिनी कम्प्यूटरों में अत्यधिक होने लगा है। यह लोचशील प्लास्टिक का गोल Sheet होती है जिस पर मैग्नेटिक ऑक्साइड (Magnetic Oxide ) का घोल चढ़ा होता है । ये विभिन्न आकारों में 3.5”,5.25' व 8' में उपलब्ध होती है। वर्तमान में 3.5" की फ्लॉपी ही अधिक उपयोग में आ रही है जिसकी भण्डारण क्षमता 1.44 MB है। ये चोकोर प्लास्टिक के खोल या कार्ड बोर्ड जैकेट में आती है जिसे Cartridge कहते है। इस जैकेट से इसकी चुम्बकीय सतह सुरक्षित रहती है। यह भी मैग्नेटिक डिस्क की भाँति ट्रेक्स एवं सैक्टर्स में बँटी होती है। जैकेट में एक लाइनर लगा होता है जो इसके धूल कणों आदि को दूर करता है | फ्लॉपी डिस्क जैकेट सहित डिस्क ड्राइव में लगायी जाती है तथा सूचना को पढ़ना व लिखना Aperture के माध्यम से होता है जो डिस्क जैकेट में होता है।

(B) ऑप्टिकल संग्रहण उपकरण (Optical Storage Devices)

1. CD-ROM (Compact Disk Read Only Memory ) - यह ऑप्टिकल रीड ऑनली मेमोरी होती है। CD-ROM रेसिन (Resin) से बनी होती है जिन पर सामान्यतया एल्यूमिनियम की परत चढ़ी होती है। CD-ROM डिस्क का उपयोग मल्टीमीडिया, कम्प्यूटर गेम्स आदि में किया जाता है। CD-ROM गोलाकार डिस्क होती है, जिन पर केवल रीड ऑनली मेमोरी होती है । 

CD-ROM परिवर्तनीय गति पर घूमती है जिस पर बने पिट्स (Pits ) को लेकर बीम की सहायता से पढ़ा जाता है। CD-ROM में डाटा को संग्रहित करने हेतु ट्रेक्स का उपयोग किया जाता है। ये ट्रेक्स सैक्टर्स में बँटे होते हैं। CD-ROM के ट्रेक्स फ्लॉपी या हार्ड डिस्क की तरह बन्द न होकर निरन्तरता लिए होते हैं जिनकी लम्बाई लगभग 5 कि० मी० होती है। इनमें 650 MB डाटा संग्रहित किये जा सकते है । उच्च क्षमता के लेजर बीम द्वारा इसकी सतह पर पिट (Pit) का निर्माण किया जाता है जो कि '1' को अभिव्यक्त करता है। डाटा पढ़ने हेतु कम क्षमता के लेजर बीम का उपयोग किया जाता है

CD-ROM के लाभ

अत्यधिक डाटा संग्रहण की सुविधा 
कम्प्यूटर से अलग करना सुविधाजनक
कॉपी करना मितव्ययी
डाटा की सुरक्षा
ऐतिहासिक डाटा संग्रहण हेतु सर्वाधिक उपयुक्त 

CD-ROM की हानियाँ

अधिक एक्सेस समय ( More Access Time)
डाटा को अपडेट (Update) करना कठिन 

2. DVD-ROM (Digital Versatile Disc) - इसका पूरा नाम Digital Video Disk है। DVD की CD-ROM से डाटा संग्रहण की क्षमता अधिक है । वर्तमान में सभी मूवीज DVD पर उपलब्ध होती हैं। DVD वीडियो टेप की तुलना में अधिक सस्ता एवं अधिक अच्छी क्वालिटी का है। DVD दिखने में CD की तरह ही दिखती है। किन्तु इसकी क्षमता अधिक होती है। वर्तमान में 4-7 GB, 8.5 GB, 20 GB की DVD संग्रहण क्षमता DVD उसकी सतहों (Layers) पर निर्भर करती है। DVD CD-ROM की तुलना में कई गुना अधिक डाटा संग्रहित कर सकती 1 DVD में CD-ROM की तुलना में कम वेव-लेन्थ (Wave Length) के लेजर बीम का उपयोग होता है।




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