रविवार, 25 जून 2023

Prevention of Cyber Crimes

साइबर अपराधी की रोकथाम 
(Prevention of Cyber Crimes)

साइबर अपराधों से बच पाना कोई आसान नहीं है। जैसा कि सामान्य सिद्धान्त है। कि- “ इलाज से बचाव बेहतर है।" ठीक वही सिद्धान्त कम्प्यूटर अपराधी से बचने का भी है। जनता को साइर क्राइम के तरीकों और बचाव की जानकारी देने के लिए कम्प्यूटर विशेषज्ञों के एकदल का गठन करना चाहिए जो समय-समय पर संचार माध्यमों, गोष्ठियों तथा प्रशिक्षण के माध्यम से जानकारी देते रहे । सामान्य तौर पर साइबर अपराधों से बचने के लिए दो तरह से उपाय किए जा सकते हैं-

(1) अपराध घटित होने से पूर्व के उपाय- इसके तहत साइबर अपराध घटित होने के पूर्व ही बचाव के समस्त प्रकार के उपाय करना चाहिए। ये उपाय निम्नवत हो सकते हैं- 

(A) ई -ब्लास्टर नामक साफ्टवेयर, जो उपयोगकर्ता की सभी गतिविधियों को रिकार्ड करता है तथा ई-मेल रिपोर्ट भी भेजता है तथा पोर्नोग्राफी रोकने में सहायक है, का प्रयोग किया जाय ।

(B) विन गार्जियन नामक साफ्टवेयर, जो उपयोगकर्ता के कम्प्यूटर पर सभी प्रकार के आपरेशन्स का रिकार्ड रखता है, का प्रयोग किया जाय। इसकी मदद से माता-पिता अपने- बच्चों पर नियन्त्रण रखते हुए पोर्नोग्राफी आदि जैसी खराब साइटों से उन्हें सचेत कर सकते हैं।

(C) फैमिली कनेक्ट नामक साफ्टवेयर, जो अश्लील और अवांछित साइट्स को ब्लाक कर देता है । मूलतः फिल्टर का कार्य करता है तथा अनावश्यक और भट्टी वेबसाइट को डाउनलोड नहीं होने देता है, का प्रयोग किया जाय ।

(D) साइबर सैन्टीनियल नामक साफ्टवेयर का प्रयोग करना चाहिए। यह साफ्टवेयर उन साइटों को ब्लाक कर देता है, जिन्हें आप नहीं देखना चाहते हैं । इसके प्रयोग से चैट तथा ई-मेल को भी बन्द किया जा सकता है

(F) पासवर्ड सदैव शब्दों एवं संख्याओं के समुच्चय से ही बनाया जाना चाहिए तथा पासवर्ड में कम से कम 8 वर्णों या इससे अधिक का प्रयोग किया जाना चाहिए। एक उदाहरण पासवर्ड के लिए दिया जा रहा है-

पासवर्ड My date of birth 09 August को सकते हैं तथा इसे निम्न रूप में पासवर्ड बना सकते हैं—My dob 09 August | आप अपने स्कूटर या मोटरसाइकिल या म्बर को भी अपना पासवर्ड बना सकते हैं, जैसे—UP 78 AZ 4015। इस संख्याओं के समुच्चय से ही पासवर्ड बनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त पासवर्ड में जंक शब्दों का भी प्रयोग किया जा सकता है जैसे किसी भी शब्द के स्वर (vowel a, e, i, o, u) को कैपिटल लेटर्स में लिखकर पासवर्ड को एक नियत अवधि के पश्चात बदलते रहना चाहिए। पासवर्ड में कभी-कभी जानबूझ कर स्पेलिंग का परिवर्तन कर देने से पासवर्ड तोड़ना आसान नहीं होता है । जैसे—Colour को Kalour कर देना। इसके अलावा उपयोगकर्ता द्वारा अपना पासवर्ड याद रखने के लिए लॉक्ड फाइल में सुरक्षित रखना चाहिए, पासवर्ड को कभी भी इलेक्ट्रॉनिक फाइल में नहीं रखना चाहिए ताकि कोई अनधिकृत व्यक्ति पासवर्ड का पता न लगा सके। पासवर्ड को पूर्व रूप से सुरक्षित स्थान पर केवल संकेतों के रूप में सुरक्षित रखना चाहिए। न तो किसी को कभी अपना पासवर्ड बताना चाहिए और न ही किसी को कोई वितत जानकारी ई-मेल से देना चाहिए क्योंकि इंटरनेट पर ई-मेल द्वारा सूचना देते समय पासवर्ड को क्रैकर द्वारा तोड़ने की सम्भावना सदैव बनी रहती है। कम्प्यूटर पर कार्य समाप्त होते ही उसे पूर्ण रूप से बंद (Log off) कर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त अलग-अलग विषय से सम्बन्धित कार्य हेतु अलग-अलग पासवर्ड रखना चाहिए।

(F) क्रेडिट कार्ड सम्बन्धी कोई भी जानकारी कभी ई-मेल से नहीं दी जानी चाहिए। 

(G) कम्प्यूटर में एंटी वायरस साफ्टवेयर डाला जाना चाहितए, यह सबसे प्रमुख सुरक्षा उपाय है। एंटी वायरस साफ्टवेयर को समय-समय पर अपडेट कराते रहना चाहिए । सीडी, फ्लॉपी डिस्क को खोलने या कॉपी करने से पूर्व वायरस विरोधी प्रोग्राम के साथ वायरस को चेक कर लेना चाहिए वायरस से बचने के लिए किसी भी अनजान वेबसाइट को डाउनलोड नहीं करना चाहिए क्योंकि वह वेबसाइट वायरस संक्रमित हो सकती है। किसी भी डेटा को खोलने या डाउनलोड करने से पूर्व उसके स्कैन कर लेना चाहिए। सूक्ष्म वायरस को रोकने के लिए फाइल को आर टी एफ (RTF) या ए एस सी - 11 (ASC - 11) प्राम्प्ट पर बनाया जाय । पाइरेटेड साफ्टवेयर के प्रयोग से बचना चाहिए। अधिकांश वायरस ई-मेल के जरिए प्रवेश करते हैं, अतः ई-मेल वायरस से बचने के लिए इंटरनेट खोलने से पहले एंटी वायरस साफ्टवेयर को चालू कर दिया जाना चाहिए ।

(H) जंक मेल से बचने का प्रयास करना चाहिए। ई-मेल बॉक्स में आए ई-न्यूजलेटर को उपयोगकर्ता को नहीं खोलना चाहिए। उपयोगकर्ता द्वारा उस मेल को नहीं खोलना चाहिए जो आपकी रुचि के क्षेत्र बताने की ओर इंगित करती हैं। इस प्रकार की ई-मेल का जवाब | देने पर बल्क मेल की संख्या और अधिक हो सकती है। उपयोगकर्ता को अपनी व्यक्तिगत सूचनाएँ जैसे- खाता संख्या व पासवर्ड आदि को इंटरनेट पर नहीं बताना चाहिए। किसी भी वेबसाइट पर मांगी गयी ये सूचनाएँ सरलता से, अधिक धन प्राप्त करने की इच्छा से किसी तीसरे व्यक्ति या पार्टी को भी बेची जा सकती है। इंटरनेट उपयोगकर्ता को जंक मेल द्वारा विज्ञापित उत्पादों को खरीदने से भी जंक मेल को बढ़ावा मिलता है। उपयोगकर्ता द्वारा जंक | मेल का प्रत्युत्तर न दिया जाए क्योंकि इंटरनेट उपयोगकर्ता द्वारा जंक मेल का प्रत्युत्तर भेजने पर जंक मेल की संख्या और बढ़ती जाती है। इसलिए जंक मेल का सबसे प्रभावशाली तरीका जंक मेल का प्रत्युत्तर न भेजना है। ई-मेल बाक्स को आगे इस प्रकार की मेल को डीलीट करने से बचना चाहिए। ऐसा करने पर यह सुनिश्चित जाता है कि उत्तरदता का ई-मेल सक्रिय है। इंटरनेट उपयोगकर्ता को आवश्यकता पड़ने पर ही अपना ई-मेल पता भेजना चाहिए। इंटरनेट उपयोगकर्ता को व्यक्तिगत कार्यों, कार्यालय, न्यूजलेटर, ऑनलाइन शापिंग आदि विभिन्न उद्देश्यों के लिए भिन्न-भिन्न ई-मेल पतों को प्रयोग में लाना चाहिए। इंटरनेट पर किसी भी व्यक्तिगत सूचना और वित्तीय सूचना देनेसे बचना चाहिए। इस की सूचनाओं को दुरूपयोग होने की सम्भावना सदैव बनी रहती है। सुरक्षित सूची का प्रयोग करने से भी जंक मैल की समस्या को कम कर सकते हैं। सुरक्षित सूची में जानकार व्यक्तियों के , पते डालने से अनचाहे जंक मेल से बचा जा सकता है ।

(I) स्कैम और फिसिंग जैसे आक्रमणों से बचने के लिए उपयोगकर्ता को यदि संदेह हो रहा हो कि प्राप्त ई-मेल संदेहास्पद है तो वह मौलिक रूप से भेजे पते से उसकी प्रमाणिकता बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है। किसी भी अपरिचित ई-मेल संदेश के आधार पर अपनी व्यक्तिगत सूचनाओं जैसे बैंक खाता संख्या, क्रेडिट कार्ड सूचना या अन्य कोई भी सूचना किसी भी तीसरी पार्टी को न दे। इंटरनेट पर कोई भी सूचना भेजते समय वैबसाइट की सुरक्षा नीतियों की पूर्ण रूप से जाँच कर लें जिससे इन सूचनाओं के बाहर अपने से आने की सम्भावनाओं से बचा जा सके। ई-मेल में दिए गए यूआरएल (URL) को क्लिक करने से पूर्व यह सावधानीपूर्वक देख लें कि यूआरएल में वर्णित पता सही है या किसी नकली साइट का पता है ।

(J) साइबर स्टाकिंग की समस्या से बचने के लिए इंटरनेट उपयोग करने वाले को साइबर स्टाकर की उपेक्षा करनी चाहिए तथा उसके ई-मेल का उत्तर किसी भी रूप में न दिया जाय । यदि उपयोगकर्ता ई-मेल का उत्तर देगा तो ई-मेल भेजने वाले को उपयोगकर्ता के बारे में सभी जानकारी मिल जाएगी। साइबर स्टाकर की ई-मेल आई०डी० को ब्लाक कर दिया जाय ताकि कोई मैसेज आपके कम्प्यूटर पर न आ सके। यदि लगातार जंक मेल उपयोगकर्ता के ई-मेल बाक्स में आ रही है तो तत्काल इसकी सूचना इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर को देना चाहिए । ई-मेल को मिटाया नहीं जाना चाहिए तथा पुलिस को शिकायत करके इसे सबूत के रूप में पेश करना चाहिए। यदि उपयोगकर्ता को ई-मेल से शारीरिक हिंसा, शारीरिक नुकसान, हत्या की या किसी अन्य तरह की धमकी मिलती है तो उपयोगकर्ता को तुरन्त स्थानीय पुलिस के पास शिकायत करनी चाहिए। यदि इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर को बार-बार सूचना देने के बाद भी जंक मेल में कमी नहीं आती है तो या तो सर्विस प्रोवाइडर को बदल देना चाहिए या ई-मेल आई० डी० बदल देना चाहिए ।

(K) ऑनलाइन चैटिंग करते समय कम आयु के बच्चे या लड़कियाँ चालक लोगों द्वारा दी गयी गलत सूचनाओं के जाल में फसकर बहक जाते हैं और गलत कदम उठाने को तैयार हो जाते हैं। कई लड़कियाँ भी चैटिंग करके प्रेम पाश में बंध जाती हैं और दुर्घटनाओं का शिकार हो जाती हैं। कई लड़कियाँ ऑनलाइन चैटिंग करके गलत लोगों के जाल में फंस गयी तथा या तो विवाह करके फंस गयी या फिर गलत जगह बिक गयीं। ऑनलाइन चैटिंग करने वाले बच्चों के अभिभावकों को उन्हें यह समझना चाहिए कि चैटिंग के दौरान कोई धमकी भरा संदेश मिले तो उसे अवश्य ही उन्हें बताना चाहिए। बच्चों द्वारा देखी जाने वाली वेबसाइटों को अभिभावकों को समय-समय पर चेक करना चाहिए। माता-पिता को हमेशा बच्चों की इंटरनेट की गतिविधियों पर ध्यान रखना चाहिए जिससे कि बालक कोई अपराध न कर सके तथा न ही किसी अपराध का शिकार बन सके। बच्चों को अधिक समय तक इंटरनेट का प्रयोग नहीं करने देना चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों को समूह के रूप में चैटिंग करने का अवसर प्रदान न करें। सामूहिक आनलॉइन चैटिंग करते समय बच्चे यौन शोषण का शिकार भी हो जाते हैं। इस समय बाजार में ऐसे अनेकों साफ्टवेयर उपलब्ध हैं। जिनके द्वारा पता लगाया जा सकता है कि बच्चे कहीं अश्लील संवाद में लिप्त तो नहीं हैं। यदि बच्चों के साथ इस प्रकार की कोई समस्या हो तो उन्हें प्यार से समझाया जा सकता है या फिर ऐसी साइटों को बच्चों को बिना बताए ब्लाक कर दिया जाय। 

(L) क्रेडिट कार्ड का प्रयोग करते समय सदैव सावधानी चाहिए। ए टी एम पर क्रेडिट कार्ड का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखें कि ए टी एम कक्ष में आप अकेले हो। यह भी ध्यान दें कि कोई संदिग्ध व्यक्ति अनेक आस पास तो नहीं घूम रहा है। यदि एक एटीएम पर उपयोगकर्ता असहज महसूसकर रहा हो तो दूसरे ए टी एम पर चले जा चाहिए। ए टी एम कार्ड को सदैव ए टी एम कक्ष में ही निकालें तथा फिर अपने पास तुरन्त प्रयोग करके रख लें। ए टी एम कार्ड को धन निकालने के तुरन्त पश्चात् धन, कार्ड एवं रसीद को अपनी पॉकेट में भली-भांति रख लेना चाहिए। इसके पश्चात् कम्प्यूटर पर कैंसिल (Cancel) का बटन दबा दें। ए टी एम पर पिन संख्या दबाते समय इस प्रकार खड़े होना चाहिए, जिससे पीछे खड़े होने वाला व्यक्ति उसको न देख सके। आजकल साइबर अपराधियों द्वारा क्रेडिट कार्ड संख्या और पिन संख्या की चोरी करने हेतु ए टी एम पर ऐसा यंत्र (क्लोज सर्किट टीवी या वायरलेस कैमरा) स्थापित कर दिया जाता है जो प्रयोग होने वाले क्रेडिट कार्ड की संख्या एवं पिन संख्या की फोटो ले लेता है। साइबर अपराधी इस प्रकार के यंत्र को स्थापित करने के उपरान्त ए टी एम के बाहर सामान्यतया किसी कार में बैठ जाते हैं। क्रेडिट कार्ड धारक के निकलने के उपरान्त में अपराधी यंत्र से कार्ड संख्या एवं पिन संख्या - प्राप्त कर लेते हैं। उसके उपरान्त ये डुप्लीकेट कार्ड के सहारे उस कार्ड संख्या एवं पिन संख्या का दुरूपयोग कर धारक के खाते से धन निकाल लेते हैं। क्रेडिट कार्ड धारक को यदि किसी भी प्रकार का यंत्र, वायरलैस केमरा जैसी वस्तु एटीएम पर नजर आए तो धारक को वहाँ पर कार्ड का प्रयोग नहीं करना चाहिए अनयथा उसके दुरूपयोग की सम्भावना सकती है। धारक को इस प्रकार की घटना की सूचना तुरन्त सम्बन्धित बैंक तथा थाने को देनी चाहिए जिससे साइबर क्राइम की घटनाओं से बचा जा सके ।

भारत में दिल्ली का रहने वाला आरिफ आजिम नामक इंजीनियर एक अमेरिकी नागरिक के क्रेडिट कार्ड के दुरूपयोग के मामले में सजा पाने वाला पहला साइबर अपराधी था ।

(M) नेट पर अश्लीलता भी लगातार बढ़ती जा रही है। कम आयु के किशोर, | युवक अश्लील वेबसाइट को देखने का प्रयास करते रहते हैं। बच्चों को, किशोर वय लोगों को अश्लील साइटों से बचाने के लिए अभिभावकों को आधुनिक सॉफ्टवेयर खरीद कर ऐसी साइटों को ब्लाक कर देना चाहिए। साइबर जगत की बुराइयों से बच्चों को बचाने के लिए अभिभावकों को लुक-छिपकर बच्चों द्वारा चलायी जा रही साइट को देखना चाहिए तथा बच्चों से खुली चर्चा करके उनका मन जानने का प्रयास करना चाहिए। बच्चों की अनुपस्थिति में 'ब्राउजर' की हिस्ट्री चैक करते समय ऑप्शन से पिछले कुछ दिनों में कम्प्यूटर | में देखी गई वेबसाइट्स का पता लगा सकते हैं। बच्चों को किसी की निगरानी में ही साइबर कैफे में भेजा जाए। बच्चों से चैट के बारे में पूछे, उनके साइबर दोस्तों के बारे में भी चर्चा करें। जब बच्चे दूसरे अन्य बच्चों के साथ नेट देख रहे हो तो उनकी गतिविधियों पर जरूर ध्यान रखना चाहिए।

(N) ऑन लाइन खरीदारी करते समय नेट उपयोगकर्ता को यह ध्यान रखना चाहिए कि नेट पर जो वस्तु प्रदर्शित की जा रही है, वह वास्तव में वैसी है या नहीं, इस पर सन्तुष्ट होने के बाद ही खरीदारी का आर्डर करना चाहिए। इंटरनेट उपयोगकर्ता को खरीददारी करते समय स्वयं से सम्बन्धित कम से कम सूचना देनी चाहिए । उपयोगकर्ता द्वारा दी गई सूचना, रहचान चोरी व जंक भेल आदि के लिए प्रयोग में लायी जा सकती है। खरीद फरोख्त का भुगतान क्रेडिट कार्ड द्वारा किया जाना चाहिए। लेन-देन में किसी भी प्रकार के विवाद की स्थिति में खरीददार के पास भुगतान का रिकार्ड रहता है। जिसे वह आवश्यकतानुसार साक्ष्य " रूप में पेश कर सकता है। भुगतान कम से कम धन वाले क्रेडिट कार्ड से किया जाना चाहिए । यदि क्रेडिट कार्ड एक / कुछ प्रयोगों के बाद इस्तेमाल योग्य नहीं (Disposable) हो तो और भी अच्छा है। भुगतान कर लेने से पूर्व यह भी देख लेना चाहिए कि वैबसाइट 1 एसएसएल ( SSL) द्वारा सुरक्षित हो। लेन-देन के प्रमाण की एक प्रति चाहे वह बिल इत्यादि किसी भी रूप में हो, खरीददार को अपने पास सुरक्षित रखनी चाहिए जिससे आवश्यकता पड़ने पर उसका यथासम्भव प्रयोग किया जा सके।

(O) हैकिंग से बचने के लिए इंटरनेट उपयोगकर्ता को अपने सिस्टम पर फायरवॉल | साफ्टवेयर का प्रयोग करना चाहिए। यह फायरवाल तकनीक साफ्टवेयर तथा हाडूवेयर दोनों के बचाव के लिए उपयोगी है । यह तकनीक अनाधिकृत उपयोगकर्ता को प्राइवेट नेटवर्क का उपयोग करने से रोकता है। कोई भी मैसेज और ब्लॉक इंटरनेट तक पहुँचने और निकलने से पहले इससे होकर गुजरते हैं और अगर वे तय मापदण्डों को पूरा नहीं करते हैं तो यह उन्हें कम्प्यूटर तक पहुँचने ही नहीं देता है। यदि कोई साफ्टवेयर डाउन लोड करना हो तो उसे विश्वसनीय वैबसाइट से लोड किया जाय। यदि हैकिंग की शिकायत हो तो प्रार्थना पत्र में अपना आई पी एड्रेस, हैकिंग का दिनांक व समय लिखते हुए अपने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर को सूचना देनी चाहिए। यदि वह शिकायत में रूची न ले तो पुलिस को सूचना देनी चाहिए ।

(P) जब कोई डाटा किसी भी प्रकार से ऐनक्रिप्ट कर दिया जाता है जब उपयोगकर्ता को काफी सतर्कता बरतनी चाहिए । ऐनक्रिप्शन में डाटा को ऐल्गोरिथम (लघुगणक) के गणितीय सूत्र की सहायता से बिगड़े हुए रूप में सुरक्षित कर दिया जाता है। यह एक प्रकार का कूटलेखन है। इसे दो प्रकार से किया जाता है— सिमैट्रिक तथा असिमैट्रिक । कूट लेखन में एक सामान्य कोड द्वारा डाटा को एनक्रिप्ट या डिक्रिप्ट किया जाता है । इससे डाटा ई-मेल द्वारा भेजे जाने पर किसी और व्यक्ति द्वारा पढ़े जाने का खतरा नहीं रहता । किन्तु इसके लिए यह आवश्यक है कि डाटा कूट लेख के रूप में तैयार करने वाले और उस डाटा को । प्राप्त कर पढ़ने वाले दोनों ही व्यक्तियों के पास उस कोड की सामान्य जानकारी हो, इस कोड का सुरक्षित आदान-प्रदान तभी सम्भव है जब भेजने वाला तथा प्राप्त करने वाला परस्पर आमने-सामने मिलकर कोड के बारे में एक दूसरे को समझाए अन्यथा किसी और पद्धति से कोड बताए जाने पर किसी अन्य के द्वारा जानने की सम्भावना बनी रहेगी जैसे – डाक, फोन अथवा ई-मेल आदि ।

अतः इस समस्या से बचने के लिए असिमैट्रिक पद्धति काम में लायी जाती है। इसमें दो पासवर्ड का प्रयोग किया जाता है : पब्लिक की ओर प्राइवेट की । एक कूटलेखन . लेखन के काम आती है तो दूसरी सामान्यीकरण करने के काम आती है। ये दोनों पासवर्ड एक दूसरे से गणितीय रूप से जुड़ी होती है । कोई भी व्यक्ति पब्लिक 'की' के द्वारा प्राइवेट 'की' का पता नहीं कर सकता है।

(Q) डिजिटल सिग्नेचर साइबर सुरक्षा का एक विश्वसनीय तरीका है। यह सिग्नेचर दो प्रकार का होता है— (i) हैश आधारित तथा (ii) पब्लिक की पर आधारित ।

(i) हैश आधारित हैश आधारित डिजिटल सिग्नेचर में एक ही 'पासवर्ड की दो भागों के बीच होती है जिनमें से एक डाटा को कूट लेख में बदलने का कार्य करता है और दूसरा उसे सामान्यीकरण करने का। जैसा कि ऐनक्रिप्शन पद्धति में किया जाता है। दोनों पद्धतियों में यह अन्तर है कि इसमें हैश, हैश एल्गोरिथम गणितीय प्रणाली को काम में लाया में जाता है जिसे हैश वैल्यू कहा जाता है । इसी हैश वैल्यू को डिजिटल सिग्नेचर के रूप काम में लाया जाता है। इसके बाद यह डिजिटल सिग्नेचर बिना पास सीक्रेट की (वर्ड की) के मूल फाइल के साथ दोहराएगा। यदि उसके द्वारा प्राप्त किया गया हैश वैल्यू मूल फाइल के साथ भेजे गए हैश वैल्यू से मेल खाता है तो पाने वाला व्यक्ति मूल फाइल को सामान्यीकृत करके पढ़ सकेगा।

(ii) पब्लिक की पर आधारित - पब्लिक की पर आधारित डिजिटल सिग्नेचर में कूट लेखन के लिए एल्गोरिथम पद्धति अपनायी जाती है तथा हैश वैल्यू से डिजिटल सिग्नेचर बनाया जाता । (अब इस डिजिटल सिग्नेचर को बिगाड़ कर (ऐनक्रिप्ट करके) मूल फाइल . के साथ भेज दिया जाता है। फाइल को पाने वाले व्यक्ति भी हैश एल्गोरिथम द्वारा हैश वैल्यू से डिजिटल सिग्नेचर प्राप्त होता है और 'पब्लिक की' की सहायता से दोनों सिग्नेचरों का मिलान करता है। दोनों सिग्नेचर समान होने पर फाइल खोली और पढ़ी जा सकती है। इस प्रकार डिजिटल सिग्नेचर साइबर चोरों एवं सेंधमारों से बचने का एक सुरक्षित तरीका माना जा सकता है। इंटरनेट उपयोगकर्ता यदि डिजिटल सिग्नेचर का प्रयोग करता है तो काफी कुछ सीमा तक साइबर अपराध होने की सम्भावना से बचा जा सकता 

(R) मुम्बई की साइबर क्राइम सेल के तकनीकी विशेषज्ञों ने आपस में कई गोष्ठियाँ करके ऑनलाइन सुरक्षा लिए एक सूत्र दिया जिसे "फाइव पी” (5 पी) कहते हैं, ये फाइव P हैं-

(i) Precaution (सावधानी) 

(ii) Protection (सुरक्षा)

(iii) Prevention ( रोकथाम)

(iv) Preservation (परिरक्षण)

(v) Preservance (अध्यवसाय)

यदि इन उपरोक्त 5P को अपनाया जाय तो कम्प्यूटर क्राइम से कुछ हद तक बचा जा सकता है। मुम्बई पुलिस साइबर क्राइम सेल द्वारा कम्प्यूटर सुरक्षा सम्बन्धी कुछ सुझाव दिए गए हैं जिनको अपनाकर साइबर क्राइम का शिकार होने से बचा जा सकता है, ये सुझाव निम्न हैं-

1. चैट रूम में स्वयं से सम्बन्धित कोई भी सूचना देने से बचा जाए ।

2. कम्प्यूटर पर लैटेस्ट ऐंटी वायरस साफ्टवेर का प्रयोग किया जाए। 

3. इंटरनेट उपयोगकर्ता को व्यवसाय करते समय वैबसाइट्स की जाँच परख भली-भाँति कर लेनी चाहिए। क्रेडिट कार्ड सम्बन्धी सूचनाएँ केवल सुरक्षित साइट्स पर ही भेजी जाए।

4. कम्प्यूटर पर फायरवॉल साफ्टवेयर स्थापित किया जाय ।

5. यदि उपयोगकर्ता की अपनी कोई वेबसाइट्स हों तो निश्चित समय के पश्चात् उसको देखते रहना चाहिए । हैकर्स द्वारा कभी-कभी वैबसाइटों को हैक कर लिया जाता है या उनमें परिवर्तन भी कर दिया जाता है।

जैसे ही कोई साइबर क्राइम दृष्टिगोचर हो तो व्यग्र, अधीर अथवा व्यथित न होकर संयमित, तार्किक दृष्टिकोण अपनाते हुए इस घटना को केवल उन्हीं व्यक्तियों को बताना चाहिए अथवा सलाह लेनी चाहिए जिनसे इस बारे में बात करना आवश्यक एवं लाभदायक हो । जब तक हमें अवांछित प्रवेशी द्वारा की गई समस्त गड़बड़ की मात्रा एवं परिणामों का पता न चल जाए, तब तक उपयोगकर्ता को ये समस्त बातें उजागर भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे आक्रमणकारी (Interuder) का सतर्क हो जाने का खतरा होता है । प्रायः देखा गया है कि किसी कम्प्यूटर अपराधी के पकड़े जाने की सम्भावना अपराध करने । चलने के शुरूआती काल में ही सबसे ज्यादा होती है ।

सुरक्षा, सतर्कता और सजगती ही कम्प्यूटर अपराध ( साइबर क्राइम) से बचने का उपाय है। यदि उपरोक्त उपाय अपनाए साइबर अपराधों से बचाव हो सकता है। यदि • फिर भी आप साइबर क्रिमिनल का शिकार हो जाते हैं। तो स्थानीय पुलिस को सूचना दीजिए तथा आई० टी० एक्ट, 2000 के तहत अपना अभियोग अवश्य ही दर्ज कराइए।

(2) अपराध घटित होने के बाद के उपाय 

यदि आप साइबर क्राइम के शिकार हो गये है तो-

(i) सिस्टम को डिस्टर्ब न करें। अपने कम्प्यूटर को तुरन्त बन्द कर दें ।

(ii) तत्काल पुलिस को सूचना दें।

(iii) कम्प्यूटर विशेषज्ञ या इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से अवांछित प्रवेशी की पहचान सुनिश्चित कराइए ।

(iv) साइबर क्रिमिनल की पहचान कराकर उसके विरूद्ध आई० टी० एक्ट-2000 के तहत अभियोग दर्ज कराइए ।

(v) साक्ष्य संकलन में पुलिस को मदद कीजिए ।

साइबर क्राइम की रोकथाम में पुलिस की भूमिका

साइबर क्राइम में लगातार वृद्धि हो रही है, क्योंकि दिन-प्रतिदिन कम्प्यूटर और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में वृद्धि हो रही है। भारत अमेरिका, ब्रिटेन, चीन के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा इंटरनेट उपयोगकर्ता देश है। भारत में विश्व के 5.5% इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। एक इंटरनेट विशेषज्ञ निकोलस नीग्रोपोंट ने अपनी पुस्तक "बीइंग डिजिटल " में यह वर्णित किया है कि "भारत व चीन भविष्य में जनसंख्या में दुनिया की अगुआई तो करेंगे ही, इसके साथ ही साथ इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में भी आगे रहेंगे।” साइबर कानून के विशेषज्ञ पवन दुग्गल तथा प्रथामेश पोपट ने जहाँ आई० टी० एक्ट 2000 को पर्याप्त नहीं होना बताया है, वहीं इस अपराध के शमन में पुलिस की भूमिका शिथिल होना बताया है। भारतीय पुलिस में मात्र 2 प्रतिशत लोगों का ही कम्प्यूटर साक्षर होना साइबर क्राइम में पुलिस की शिथिलता का एक बड़ा कारण है। प्रशिक्षिण पुलिस कर्मियों का अभाव, आई० टी० एक्ट-2000 की जानकारी का अभाव, साइबर पुलिस स्टेशनों का अभाव आदि ऐसे कारण हैं। जिनकी वजह से पुलिस साइबर क्राइम रोकने में सफल नहीं हो पा रही है। साइबर क्राइम को रोकने में पुलिस की प्रभावी बनाने के लिए निम्न कदम उठाए जाने अपेक्षित हैं-

(A) पुलिस कर्मियों को कम्प्यूटर साक्षर बनाया जाय। उन्हें कम्प्यूटर हार्डवेयर एवं साफ्टवेयर तथा नेट की जानकारी दी जाए। इन प्रशिक्षित पुलिस कर्मियों की नियुक्ति के लिए कम से कम प्रत्येक रेंज स्तर पर एक साइबर पुलिस स्टेशन स्थापित किया जाय तथा वहाँ प्रशिक्षित पुलिस कर्मियों की नियुक्ति की जाय ताकि साइबर क्राइम की सूचना मिलने पर प्रशिक्षित पुलिस दस्ता तत्काल पहुँचकर कार्यवाही शुरू कर सके। इससे पीड़ितों को त्वरित न्याय मिल सकेगा ।

(B) पुलिस कर्मियों को आई० टी० एक्ट-2000 का पूर्ण ज्ञान कराया जाय। इसके अतिरिक्त जिसने भी प्रकार के साइबर क्राइम हो सकते हैं, उनके बारे में उन्हें जानकारी दी जाय तथा उन्हें यह भी बताया जाय कि कौन सा साइबर क्राइम किस धारा के तहत दर्ज होगा तथा उसकी विवेचना के लिए क्या-क्या साक्ष्य जुटाना आवश्यक होगा।

(C) पुलिस प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम में कम्प्यूटर शिक्षा को अनिवार्य रूप से जोड़ दिया जाय तथा प्रशिक्षण के दौरान ही पुलिस के कांस्टेबिल से लेकर पुलिस उपाधीक्षक रैंक तक के कर्मचारियों/अधिकारियों को प्रशिक्षित व्यक्तियों के विशेष दस्ते से प्रशिक्षण दिलवाया जाय। कम्प्यूटर क्राइम पर समय-समय पर सेमिनार, वर्कशाप तथा गोष्ठियाँ आयोजित की जाये। साइबर अपराध से जुड़ी छोटी से छोटी जानकारी पुलिसकर्मियों को दी जाय। कम्प्यूटर - क्राइम से जुड़ने वाले पुलिसकर्मियों को विशेष तकनीकी भत्ता प्रदान किया जाय ताकि वे रूचि से साइबर पुलिस स्टेशन में काम करें।

प्रत्येक थानों पर कम्प्यूटर की उपलब्धता सुनिश्चित करायी जाय तथा प्रशिक्षण कांस्टेबिल क्लर्क की नियुक्ति की जाय जो थाने के दिन-प्रतिदिन के कार्य कम्प्यूटर से सम्पादित करें। पुलिस की कार्य प्रणाली में कम्प्यूटर का लाभ दो प्रकार से उठाया जा सकता है। प्रथम कम्प्यूटर उपलब्ध होने पर सभी पुलिसकर्मी साक्षर बन सकेंगे जिससे वे साइबर अपराध के तरीकों तथा इन्हें रोकने के तरीकों की जानकारी भी प्राप्त कर सकेंगे। दूसरे कम्प्यूटर से अपराध सम्बन्धी समस्त आँकड़े एक ही स्थान पर सुरक्षित रखे जा सकेंगे, जिससे धन एवं मानव शक्ति की बचत हो सकेगी। कम्प्यूटर आपरेटर की नियुक्ति का लाभ थाने में अन्य पुलिसकर्मी भी उठा सकेंगे।

(E) एक नए साइबर पुलिस बल का गठन प्रत्येक प्रदेश में किया जाय तथा नए कम्प्यूटर जानकार लोगों की भर्ती की जाय तथा उन्हें फिर विशेषज्ञों से प्रशिक्षण दिलाकर साइबर पुलिस स्टेशनों में नियुक्त किया जाय । 

(F) आई० टी० एक्ट 2000 की जानकारी सभी आरक्षी स्तर तक के पुलिस कर्मियों को दी जानी चाहिए। प्रत्येक थाने को आई० टी० एक्ट-2000 की एक पुस्तिका दी जानी चाहिए ताकि थाने पर कम्प्युटर अपराधों का पंजीकरण इस एक्ट के तहत हो सके।

(G) साइबर क्राइम करने वाले अपराधियों की जानकारी के लिए पुलिस को कम्प्यूटर की जानकारी रखने वालों से सम्पर्क रखकर मुखबिर बनाना चाहिए ताकि कम्प्यूटर क्राइम करने वालों की जानकारी मिल सके। पुलिस के लोगों के द्वारा साइबर कैफे, कार्यालयों, स्कूल एवं कॉलेजों में इस प्रकार मुखबिर तैयार किये जाए जो साइबर क्राइम करने वाले व्यक्तियों की सूचना पुलिस तक पहुँचा सकें। साइबर क्राइम अधिकतर साइबर कैफों के माध्यम से, रात में कार्यालयों में कार्य करने वाले तथा स्कूल, कॉलेज जाने वाले लड़के, लड़कियों द्वारा किए जाते हैं। ये व्यक्ति सामान्यतया मध्यम वर्ग, उच्च-मध्य वर्ग तथा उच्च वर्ग के होते हैं। इसलिए मुखबिरों के माध्यम से पुलिस सरलता अपराधी को न केवल पकड़ सकती है बल्कि अपराध होने से पूर्व ही इनको रोक भी सकती है।

(H) पुलिस के लोगों को चाहिए कि प्रत्येक थाना स्तर पर साइबर कैफे की सूची तैयार करके रखें क्योंकि कम्प्यूटर तथा इंटरनेट से अपराधों को अंजाम देने के लिए साइबर कैफे का बहतायात से प्रयोग किया जाता है। साइबर कैफे से कभी राष्ट्रपति को कभी प्रधानमंत्री को तो कभी किसी अन्य वी० आई० पी० को ई-मेल से धमकी दी जाती है तो कभी आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट करने के लिए ई-मेल किया जाता है। साइबर कैफे में आने वाले उपयोगकर्ताओं का कैफे मालिकों द्वारा कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता है, जिससे साइबर अपराध घटित होने के बाद भी पते की जानकारी के अभाव आसानी से पकड़ नहीं आ पाता । अतः इस प्रकार के अपराधों पर नियन्त्रण रखने के लिए पुलिस के द्वारा शहर के सभी साइबर कैफे की सूची तैयार की जानी चाहिए ताकि ऐसे शरारती तत्वों की पहचान कर उनसे निपटा जा सके। पुलिस के द्वारा कैफे मालिकों को इस प्रकार के निर्देश दिए जाएँ कि वे संदेहास्पद उपयोगकर्ताओं पर नजर रखें तथा उनका वास्तविक पता रिकार्ड में जिससे आवश्यकता पड़ने पर पुलिस को सहयोग किया जा सके। साइबर कैफे के - संचालकों को सख्त हिदायत की जानी चाहिए कि बिना आइडेंटीटी कार्ड या अन्य किसी प्रकार की आई डी प्रूफ लिए किसी को साइबर कैफे में बैठकर इंटरनेट न संचालित करने दें। यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति कैफे में आए तो उसकी सूचना तत्काल पुलिस को देने के लिए साइबर कैफे के मालिकों को हिदायत करनी चाहिए तथा कैफे में आने वालों का एक रजिस्टर रखना अनिवार्य होना चाहिए।

पुलिस मामलों की खोजबीन में साइबर कैफे संचालकों की मदद ले सकती है। सामान्यतया साइबर कैफे संचालक कम्प्यूटर में विशेषज्ञ होते हैं। ऐसे में पुलिस केसों के दौरान इनकी मदद लेकर मामलों को खोल सकती है। पुलिस को साइबर कैफों के संचालकों . के साथ अपने सम्बन्ध बेहतर बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए। पुलिसकर्मी खाली समय में साइबर कैफों से नवीन जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं। पुलिस के साथ साइबर कैफे भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर सकते हैं ।

(I) जनसामान्य में कम्प्यूटर क्राइम्स और उससे बचने के उपायों का प्रचार-प्रसार किया जाय। कम्प्यूटर उपयोगकर्ताओं तथा पुलिस के बीच सम्बन्ध विकसित करने के लिए थाना स्तर पर गोष्ठी करके कम्प्यूटर उपयोगकर्ताओं का विश्वास अर्जित किया जाय जिससे कि उनमें साइबर अपराधियों के विरूद्ध लड़ने का जज्बा पैदा हो सके। आम नागरिकों को यह समझाया जाना आवश्यक है कि आज जो व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक के क्षेत्र में छोटे-छोटे अपराध कर रहा है वह कल देश की आर्थिक एवं सैन्य सुरक्षा को भी चोट पहुँचाने जैसा जघन्य अपराध कर सकता है और वह भी किसी एक छोटे से कमरे में बैठकर किसी डेस्कटॉप या लैपटॉप कम्प्यूटर के सहारे । अतः साइबर क्षेत्र में पुलिस की भूमिका के द्वारा इस बात की भी जागरूकता पैदा की जाए कि यदि किसी भी व्यक्ति के साथ साइबर क्राइम घटित होता है तो उसकी सूचना वह तुरन्त पुलिस को दे । जागरूकता के अभाव में बहुत से मामले पुलिस में दर्ज ही नहीं हो पाते हैं, इसलिए पुलिस को जनता को जागरूक कर सभी मामलों को दर्ज कराने तथा अपराधी को सजा दिलाने के लिए भी जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। 

(J) पुलिस कर्मियों को अंग्रेजी भाषा एवं कम्प्यूटर की अंग्रेजी की शब्दावली का ज्ञान करना आवश्यक है ताकि पुलिस कर्मी अंग्रेजी भाषा जानते हुए कम्प्यूटर सीखने व अपराधियों को पकड़ने में सक्षम हो सके।

साइबर अपराधी सामान्यताः आंग्ल भाषा में निपुण होते हैं इसलिए पुलिस को भी अपराधियों को पकड़ने के लिए आंग्ल भाषा का प्रयोग आना चाहिए। पुलिसकर्मियों को स्वयं भी अंग्रेजी भाषा सीखने का प्रयास करना चाहिए । 

(K) मीडिया द्वारा कई बार महत्वपूर्ण साइबर क्राइम के मामलों को प्रकाश में लाया जाता है इसलिए पुलिस को मीडिया द्वारा उठाए गए मामलों पर त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए ताकि मीडिया को तथा उसको सूचना देने वाले व्यक्ति के मन में यह विश्वास पैदा हो सके कि पुलिस को सूचना मिलते ही वह अवश्य ही कार्यवाही करेगी। 

(L) पुलिस के लोगों को साइबर क्राइम की सूचना मिलते ही त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए ताकि लोगों में यह विश्वास पैदा हो कि पुलिस साइबर क्राइम की सूचना पर उनकी • मदद करेगी तथा त्वरित कार्यवाही अपराध दर्ज करके करेगी।

नागरिकों के समक्ष ऐसे उदाहरण पेश किए जाएँ जिससे नागरिकों को यह विश्वास हो जाए कि यदि वे पुलिस के पास जाएँगे तो वह अपराधी को पकड़ कर उसको सजा दिला सकेंगे।

(M) पुलिस के लोगों को साइबर क्राइम करने वालों की आपराधिक मनोवृत्ति एवं प्रवृत्ति का समुचित ज्ञान होना चाहिए। पीड़ित व्यक्ति से सीधा सम्बन्ध नहीं होने के कारण साइबर अपराधी का पता लगाना कठिन कार्य है परन्तु प्रशिक्षित पुलिसकर्मी प्रयास करके साइबर अपराधी तक पहुँच सकता है। साइबर अपराधी अधिकतर किशोरवयं या युवक होते हैं अतः सही ढंग से जानकारी करने पर पुलिस उस अपराधी तक पहुँच सकती है। पुलस साइबर क्राइम का पता करने के लिए चाहे तो प्रोफेशनल्स की भी सहायता ले सकती है। यदि पुलिस थाने पर ऐसा कोई अभियोग दर्ज हो जिसमें कम्प्यूटर विशेषज्ञ की आवश्यकता हो तो पुलिस को ऐसे विशेषज्ञों की मदद लेने में परहेज नहीं करना चाहिए। लगातार कम्प्यूटर अपराधों पर कार्य करते रहने से पुलिस को अपराधी की मनोवृत्ति और प्रवृत्ति का ज्ञान हो | जाता है जिससे पुलिस को अपराध रोकने में मदद मिल सकती है।

(N) पुलिस के उच्चाधिकारियों को निचले स्तर के कर्मचारियों से साइबर क्राइम के सम्बन्ध में खुलकर विचार-विमर्श करना चाहिए तथा साइबर क्राइम की जानकारी होने पर | पुलिस कर्मी अपने उच्चाधिकारियों से सही मार्गदर्शन निः संकोच प्राप्त सकें ।

(O) पुलिसकर्मियों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए साइबर क्राइम की केस स्टडी से अवगत करना चाहिए कि किसी तरह के साइबर क्राइम को किस तरह के साइबर क्राइम को किस तरह से पता लगाया गया है और अपराधी को किसी तरह से पता लगाया गया है और अपराधी को किसी तरह से पकड़ कर सजा दिलायी गयी। दुनिया के अन्य देशों में साइबर अपराधियों की पकड़ के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के तरीकें अपनाए जाते हैं। इसलिए | पुलिस के लिए आज आवश्यकता है कि वह अन्य देशों के साइबर क्राइम केसों का अध्ययन उस मानसिकता का त्याग करना होगा जिसमें वे कुछ नया सीखने के लिए तत्पर दिखायी कर उनसे अपराध से निपटने के लिए नए-नए तरीके सीखे। पुलिस को इसके लिए अपनी नहीं देते हैं।

P) पुलिस को अन्य संगठन जैसे होमगार्ड, पी० आर० डी० तथा अन्य गैर सरकारी- संगठनों से भी साइबर क्रिमिनल का पता लगाने में मदद मिल सकती है, इसलिए ऐसे संगठनों से परस्पर तालमेल रखना अति आवश्यक है।

इन संगठनों का आम नागरिकों के साथ सीधा सम्बन्ध होता है जिससे आम नागरिक इनकी बातों पर सरलता से विश्वास कर लेता है। पुलिस इन गैर सरकारी संगठनों की सहायता से आम नागरिकों तक अपनी पहुँच बना सकता है तथा अपने पक्ष को बेहतर ढंग से आम जनता के समक्ष रख सकती है। पुलिस इन संगठनों के माध्यम से साइबर क्रिमिनल की मनोवृत्ति एवं प्रवृत्ति समझ सकती है तथा इन गैर सरकारी संगठनों के लोगों के मुखविर कि रूप में प्रयोग कर सकती है। ये गैर सरकारी संगठनों के व्यक्ति जनता के मध्य से आने के कारण अपना स्थान रखते हैं, जिससे ये जनता एवं पुलिस के मध्य कड़ी के रूप में भी कार्य कर सकते हैं तथा साइबर अपराधी तक पुलिस की पहुँच आसान बना सकते हैं।

(Q) पुलिस के लोगों को अपने थाना क्षेत्र में स्थित औद्योगिक कम्पनी के कर्मियों, अधिकारियों तथा प्रबन्धन के लोगों से सम्बन्ध रखना चाहिए ताकि कम्पनी से नाराज चल रहे विद्वेषी कर्मचारियों, जो कम्प्यूटर तथा नेट की जानकारी रखते हैं, का पता चल सके और यदि कम्पनी में कभी साइबर अपराध घटे तो उन कर्मचारियों की निगरानी की जा सके।

(R) स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के 18 वर्ष 25 वर्ष के मध्य की उम्र वाले छात्रों / युवकों से पुलिस के लोगों को सम्पर्क रखना चाहिए। इस उम्र के युवक-युवतियाँ ही साइबर अपराधों को सर्वाधिक अंजाम देते हैं। ये छात्र पुलिस के लोगों को साइबर क्रिमिनल की मनोवृत्ति तथा प्रवृत्ति के बारे में बता सकते हैं। कम्प्यूटर एवं इंटरनेट का अधिकाधिक प्रयोग करने के फलस्वरूप ये युवा छात्र साइबर अपराधियों की प्रवृत्तियों से भली-भांति परिचित होते हैं तथा ये भी कभी स्वयं भी साइबर क्राइम से पीड़ित हो सकते हैं । इसलिए ये छात्र जनता में जागरूकता लाने में भी पुलिस की मदद कर सकते हैं । कम्प्यूटर एवं इंटरनेट का अधिक प्रयोग करने के कारण ये छात्र साइबर क्राइम के गुणों तथा दुष्परिणामों से भी भली-भांति परिचित होते हैं जिससे ये जनता के बीच जाकर पुलिस के सहयोगी के रूप में कार्य कर सकते हैं ।

(S) जनता में 'साइबर क्राइम की जानकारी देने तथा उसके खतरे से आगाह करने के लिए वर्ष में कम से कम एक माह को साइबर क्राइम जागरूकता माह के रूप में मनाया जाना चाहिए ताकि प्रत्येक कम्प्यूटर उपयोगकर्ता साइबर क्राइम तथा उसके रोकने के लिए किए गए उपायों से भली भांति परिचित हो सके तथा लाभान्वित हो सके ।

(T) पुलिस द्वारा साइबर क्राइम की त्रिवेचना कर अपराधी को पकड़कर साक्ष्य सबूत के साथ आरोप पत्र न्यायालय प्रेषित किया जाता है लेकिन अगर न्यायालय में बैठा न्यायाधीश कम्प्यूटर और इन्टरनेट के बारे में तथा आई० टी० एक्ट के प्रावधानों का जानकार न हो तो वह सही न्याय नहीं कर पाएगा और अपराधी को उचित दण्ड नहीं मिल पाएगा। इसलिए न्यायाधीशों को भी कम्प्यूटर और इंटरनेट की जानकारी आवश्यक रूप से होनी चाहिए जिससे वे साइबर क्राइम से जुड़े मामलों को वे सही प्रकार से हल करते हुए उचित न्याय कर सकें। सूचना और प्रौद्योगिकी अधिनियम-2000 में साक्ष्य के रूप में इलेक्ट्रॉनिक सबूतो को मान्यता दे दी गई है जिससे गवाही के दौरान अब न्यायालय में इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पेश किया जा सकता है। इस प्रकार के सबूतों का सही प्रकार से विश्लेषण करने न्यायाधीशों को पूर्ण रूप से सक्षम होना चाहिए। इस हेतू न्यायाधीशों को कम्प्यूटर इंटरनेट की / पूर्ण जानकारी के साथ-साथ इससे जुड़े अपराधों की भी जानकारी होनी चाहिए।

साइबर क्राइम के मामलों में त्वरित निर्णय किया जाना चाहिए ताकि सजा पाने पर अन्य अपराध करने वालों के मन में डर समा जाए कि वे साइबर क्राइम न करें या साइबर क्राइम करने से परहेज करें।

(U) प्रत्येक कमिश्नरी स्तर पर साइबर लैब की जानी चाहिए ताकि पुलिस तथा प्रशासन एवं न्यायिक प्रक्रिया में लगे लोग स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण हो सकें । 

(v) प्रत्येक जिले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक / पुलिस अधीक्षक के अधीन साइबर अपराध शिकायत केन्द्र की स्थापना की जाय ताकि कोई भी साइबर क्राइम जिला स्तर पर शिकायत केन्द्र पर ही दर्ज हो सके। अमेरिका में प्रत्येक जिले में इंटरनेट फ्रॉड कमलेंट सेंटर (I.F.C.C) की स्थापना की गयी है जहाँ पर साइबर क्राइम दर्ज किया जाता है। भारत में इस प्रकार के इंटरनेट फ्रॉड कम्प्लेन्ट सेंटर स्थापित किए जाने की जरूरत है। साइबर क्राइम चूँकि ऑन लाइन होता है और पीड़ित अपराधी को प्रत्यक्ष देख नहीं रहा होता है और कभी-कभी अपराधी स्थानीय थाना क्षेत्र से बाहर का होता है अतः साइबर अपराधी केन्द्रीय स्तर यानि कि जिला मुख्यालय पर ही रिकार्ड किया जाना चाहिए ताकि जनता खुद को असहाय न महसूस करे ।

(W) हमारे देश में अमेरिका, चीन आदि अन्य देशों की तरह ही साइबर क्राइम के पीड़ित को 24 घण्टे के दौरान कभी भी ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सेवा उपलब्ध होनी चाहिए। इस प्रकार की शिकायत दर्ज कराने के लिए वेबसाइट पर जानकारी भी उपलब्ध होनी चाहिए तथा शिकायत फार्म भी वेबसाइट पर उपलब्ध होना चाहिए, जिससे पुलिस को आवश्यक सूचना फार्म के माध्यम से ऑनलाइन उपलब्ध हो सके ।

इस तरह का शिकायत केन्द्र स्थापित होने से ऑनलाइन शिकायतें दर्ज कराने में निश्चित रूप से वृद्धि होगी क्योंकि इस प्रकार शिकायत दर्ज कराने में पीड़ित व्यक्ति पुलिस के पास जाने से भी बच जाएगा तथा पोर्नाग्राफी जैसे मामलों में जहाँ पीड़ित सामाजिक दबाव के कारण अपनी रिपोर्ट दर्ज नहीं करा पाता है वहीं ऑनलाइन शिकायत दर्ज होने से दर्ज मामलों में भी वृद्धि होगी। ऑनलाइन शिकायत केन्द्र में प्रशिक्षित तथा विशेषज्ञों की नियुक्ति होने के कारण मामलों का खुलासा भी कम समय में हो सकेगा। ऑनलाइन शिकायत करने से पीड़ित व्यक्ति की पहचान भी छिपी रहती है जिससे पीड़ित व्यक्ति मानसिक तनाव से बचा रहता है।

(X) पुलिस को साइबर क्राइम रोकने के लिए साफ्टवेयर कम्पनियों से अनाधिकृत पहुँच और पोर्नोग्राफी को रोकने वाले साफ्टवेयर विकसित करने के लिए कहना चाहिए तथा ऐसा साफ्टवेयर प्रत्येक नेट उपयोगकर्ता को पुलिस के माध्यम से उचित दर पर उपलब्ध कराना चाहिए ताकि नेट उपयोगकर्ता इन समास्याओं से बच सके। अमेरिका, चीन आदि देशों ने अपने यहाँ ऐसे प्रोग्राम विकसित किए हैं जो अभिभावकों को कम्प्यूटर पर आने वाले प्रोग्रामों को देखने तथा उनको फिल्टर करने में सहायता करते हैं। भारत में भी ऐसे प्रोग्रामों को अपनाना होगा ।

(Y) देश में साइबर क्राइम प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना करनी होगी जहाँ सर्टिफिकेट, डिप्लोमा व डिग्री कोर्स चलाए जायं एवं वहाँ से कोर्स किए हुए लोगों को पुलिस व उसके अन्य सहयोगी संगठनों तथा न्यायालयों में नौकरी दी जाए ताकि कहीं भी साइबर क्राइम होने पर या न्यायालय में निर्णय देते समय इनकी मदद ली जा सके ।

(Z) पुलिस के लोगों के लिए सामान्य कम्प्यूटर शिक्षा अनिवार्य कर दी जाए ताकि सभी पुलिस कर्मी काम भी की कम्प्यूटर जानकारी रख सकें।

उपरोक्त सभी उपायों को अपनाने के अतिरिक्त कम्प्यूटर और इंटरनेट उपयोगकर्ता को "इलाज से बचाव बेहतर है" सिद्धान्त को अपनाना जरूरी है। अपना बचाव उन्हें स्वयं करना होगा और इस पर भी यदि वे कम्प्यूटर क्राइम के शिकार हो जाते हैं, तो उन्हें तुरन्त पुलिस की मदद लेनी चाहिए। आई० टी० एक्ट के तहत अभियोग दर्ज कराकर दोषी को दण्ड दिलाने में पुलिस की मदद पीड़ित को करनी चाहिए ताकि दण्डित होने से लोगों में भय समाएगा और वे साइबर क्राइम करने से।

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