रविवार, 25 जून 2023

साइबर अपराधों से किस प्रकार निपटा जा सकता है?

साइबर अपराधों से किस प्रकार निपटा जा सकता है ?

हमारे देश में जिस प्रकार संचार सुविधाओं के विकास के लिए नीतियों को बहुत अधिक उदार बनाया जा रहा है उससे इंटरनेट की उपलब्धता का और भी तेजी से विकास होने की सम्भावना है। इंटरनेट के इस तेजी से उपयोग के बढ़ने के साथ सायबर अपराधों के भी बढ़ने की सम्भावना है। अब इस माध्यम की सुरक्षा और इसके साथ होने वाले अपराधों से निपटने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं किया गया है। इसका प्रमाण आए दिन में प्रमुख संगठनों की कम्प्यूटर व्यवस्था होने वाली छेड़छाड़ की घटनाओं से आसानी से लगाया जा सकता है। दूसरी ओर अपराध की इस नवीनतम विधा से निपटने के लिए पुलिस और सुरक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर है इसका पता इसी बात से चला है कि दक्षिण दिल्ली के कर्नल जसबीर बाजवा को अपने इंटरनेट के घण्टे चुरा लेने और पासवर्ड बेच देने के अपराध को दर्ज कराने में कई महीने लग गए। स्थापना पुलिस में तैनात कर्मचारियों ने उन्हें यह कहकर वापस कर दिया कि यह कोई अपराध ही नहीं है । सैनिक अधकारी के रूप में प्रशिक्षित कर्नल बाजवा ने करीब सात महीने तक खुद ही मामले की जाँच की और पुलिस उपायुक्त स्तर के अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली में सायबर अपराध का पहला मामला दर्ज किया गया। इस मामले में उसी इंजीनियर के खिलाफ केस दर्ज किया गया जिसने कि इंटरनेट कनेक्शन लगाया और पासवर्ड डाला था। यह मामला अभी भी अदालत विचाराधीन बना हुआ है ।

देश में इंटनरेट के माध्यम से होने वाले कारोबार को कानूनी रूप देने और इसके साथ होने वाले अपराधों से निपटने के लिए कानूनी व्यवस्था करने के लिए संसद के दोनों सदनों ने व्यापक चर्चा के बाद सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 को 17 मई 2000 को अपनी मंजूरी दी। राष्ट्रपति ने नौ जून 2000 को इस विधेयक को कानूनी रूप देने के लिए इस पर अपने हस्ताक्षर किए। यह कानून लागू तो हो गया परन्तु यह कानून साइबर क्राइम के अनेक प्रकारों को अभी अपनी परिधि में लाने के लिए पर्याप्त नहीं है। तेजी से बदलती परिस्थिति में इस आई० टी० एक्ट को और कड़ा बनाए जाने की जरूरत है। 

यूनाइटेड नेशन्स कमीशन आन इंटरनेशनल ला ने 1996 में इलेक्ट्रॉनिक कामर्स के बारे में एक मॉडल लॉ स्वीकार किया था । संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 30 जनवरी 97 को एक प्रस्ताव पारित करके सदस्य राष्ट्रों से आग्रह किया कि इस तरह का कानून बनाने या इस मॉडल ला के अनुरूप अपने कानूनों में फेरबदल करने पर विचार करें। इस आदर्श कानून में दस्तावेजी सबूत के अनुरूप ही इलेक्ट्रॉनिक माध्मों द्वारा किए गए आदान-प्रदान को कानूनी मान्यता देने की व्यवस्था की गई थी। 

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के पारित हो जाने के बाद इसके नियमों और उपनियमों को लागू करने और उसके तहत प्रस्तावित व्यवस्थाओं को कार्य रूप देने की प्रक्रिया शुरू हो गई।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम द्वारा की गई व्यापक व्यवस्थाओं का मुख्य उद्देश्य ई-कॉमर्स यानी इंटरनेट के माध्यम से व्यापार और कारोबार को मान्यता और बढ़ावा देना है। विधेयक में ऐसी व्यवस्था करने का कारण यह बताया गया है कि संचार की नई प्रणालियों और डिजिटल प्रौद्योगिकी ने हमारे रहन-सहन के तरीके में व्यापक परिवर्तन ला दिया है। जिस प्रकार से लोग व्यापार करते रहे हैं उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हैं। अब व्यापार जगत और उपभोक्ता अपने काम-काज के लिए परम्परागत कागजी दस्तावेज रखने की बजाय कम्प्यूटर से दस्तावेज बनाने, उनका आदान-प्रदान करने, सूचनाओं का भण्डारण करने के लिए कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक तरीके से ये सब कार्य करने के अनेक लाभ हैं। यह साधन सस्ता है, सूचनाओं को रखने लाने-ले जाने, आदान-प्रदान करने में बहुत तेज है। भारत में लोगों इस साधर के उपयोग के लाभों का पता है लेकिन कानून व्यवस्थाओं के नहीं होने के कारण वे इसका पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे थे। इसलिए इस व्यवस्था को कानूनी रूप देने के लिए यह कानून बनाने का फैसला किया गया। इन्फारमेशन टेक्नोलॉजी कानून बनाने के साथ केवल कागजी दस्तावेज को ही स्वीकार करने वाले अन्य कानून जैसे इंडियन पेनल कोड, इंडियन एवीडेंस एक्ट, रिजर्व बैंक आफ इण्डिया एक्ट, बैंक्स बुक्स एवीडेंस एक्ट सहित अन्य सम्बन्द्ध कानूनों भी डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज को मान्यता देने के लिए उनमें भी परिवर्तन कर दिया गया है। इस कानून में किए गए प्रावधानों से सरकारी कामकाज को भी, इंटरनेट के माध्यम से किए जाने के लिए ई-गवर्नेस को भी मान्यता देने की व्यवस्था की गई है। इस व्यवस्था के विधिवत लागू हो जाने से आम आदमी को बहुत- लाभ हुआ हैं क्योंकि उसे अपने सामान्य कामकाज के सिलसिले में बार-बार सरकारी कार्यालयों में आने-जाने की आवश्यकता कम से कम रह गयी है !

कुल 15 भागों में विभक्त इन्फारमेशन टेक्नोलॉजी कानून, 2000 में इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड को एथान्टीकेड यानी प्रामाणिकता देने के लिए डिजिटल सिग्नेचर को मान्यता देने के प्रावधान किए गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेस के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड को मान्यता देने अलावा इस कानून में ऐसी भी व्यवस्था की गई है कि कोई रिकार्ड किसने कब मांगा, उसकी रसीद भेजने और पाने के बारे में ब्यौरे भी उपलब्ध कराए जा सकेंगे।

डिजिटल सिग्नेचर को प्रमाणित करने के लिए सर्टिफाइंग एथार्टी के गठन, उसके, कामकाज के तरीके और प्रक्रिया के बारे में भी इस कानून के विस्तृत व्यवस्था की गई है। यह कानून उपयोगकर्ता यानी सब्सक्राइबर के कर्त्तव्यों, कम्प्यूटर या कम्प्यूटर सिस्टम को नुकसान पहुँचाने की स्थिति में जुर्माना ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए पंचाट व्यवस्था यानी | एडजुडीकेशन की भी व्यवस्था करता है ।

सूचना प्रौद्योगिकी कानून में साइबर अपराधों का व्यापक ब्यौरा दिया गया है। इन | कानूनों का उल्लंघन करने वालों को सजा और जुर्माना या दोनों करने की व्यवस्था इस कानून की गई है। इस कानून के तहत नेटवर्क सर्विस प्रोवाइडर्स को भी जिम्मेदार ठहराने वाले प्रावधान भी किए गए हैं।

इन्फारमेशन टेक्नोलॉजी कानून में साइबर क्राइम के बारे में किए गए प्रावधानों की समीक्षा से पता चलता है कि कम्प्यूटर या कम्प्यूटर प्रणाली के साथ छेड़छाड़ या तोड़फोड़, जिसे कम्प्यूटर की दुनिया की प्रचलित भाषा में हैंकिंग-क्रेकिंग कहा जाता है जैसा अपराध करने वालों को तीन साल तक की सजा या दो लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों किए जा सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक फार्म में अश्लील सामग्री के प्रसारण करने वालों को पहले ही अपराध में दो साल तक की सजा और 25 हजार रुपए तक का जुर्माना देने का प्रावधान किया गया है। दुबारा या बार-बार इस तरह का अपराध करने वाले को पाँच साल तक की सजा और पचास हजार रुपये से भी अधिक का जुर्माना करने की भी इस कानून में व्यवस्था की गई है। इस कानून में सरकार को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह किसी भी कम्प्यूटर या कम्प्यूटर प्रणाली को संरक्षित घोषित कर सकती । इस प्रकार से संरक्षित घोषित की गई कम्प्यूटर प्रणाली में अनाधिकृत रूप से प्रवेश या छेड़छाड़ करने वाले या करने की कोशिश करने वाले को दस साल तक की कैद और जुर्माना किए जाने की व्यवस्था की गई है। यदि कोई व्यक्ति कम्प्यूटर प्रणाली में उपलब्ध सूचनाओं को अनधिकृत रूप से किसी अन्य व्यक्ति को देता हैं तो ऐसे व्यक्ति को दो साल तक की कैद और एक लाख रुपए तक का जुर्माना किए जाने की भी इस कानून में व्यवस्था की गई है।

इस कानून कि तहत ऐसी भी व्यवस्था की गई है कि देश से बाहर बैठे किसी भी व्यक्ति द्वारा इस कानून के प्रावधानों के खिलाफ काम करने वाले व्यक्ति के खिलाफ भी कानूनी कारवाई की जा सकेगी। सरकार को इस कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों के कम्प्यूटर और साज-समान को भी जब्त करने का अधिकार होगा ।

कानून ने साइबर अपराधों को करने वाले की क्षमताओं को ध्यान में रखकर इस • प्रकार के मामलों की जाँच का काम डिप्टी सुपरिन्टेंडेंट आफ पुलिस (पुलिस उपाधीक्षक) या उसके ऊपर के अधिकारियों को ही सौंपने की व्यवस्था की गई है। इन अधिकारियों को बिना वारंट के जाँच के लिए साइबर कैफे या ऐसी ही अन्य जगहों पर प्रवेश करने और कानून का उल्लंघन होने की आशंका में गिरफ्तारी करने का भी अधिकार दिया गया है। इस कानून के तहत ऐसी भी व्यवस्थाएँ की गई हैं यदि कोई कम्पनी इस कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करती है तो कम्पनी और उसमें काम करने वाले कर्मचारी इस उल्लंघन के दोषी माने जाएँगे ।

इस कानून की धारा 79 के तहत पुलिस उप अधीक्षक या इससे उच्च पद का अधिकारी पर्याप्त संदेह होने पर किसी भी सार्वजनिक स्थल में प्रवेश कर सकता है और तलाशी ले सकता है। साथ ही, बिना वारन्ट के आरोपी को गिरफ्तार भी कर सकता है, लेकिन उसे तुरन्त ही सक्षम मजिस्ट्रेट या इलाके के थाने इंचार्ज के सम्मुख प्रस्तुत करना होगा ।

वर्ष 2006 में आईटी ऐक्ट में संशोधन किए गए। यह 2006 संशोधन आईटी एक्ट 2000 की धारा 43 में किया गया। इसके तहत कम्प्यूटर हैंकिंग में संलिप्त होने पर दो वर्ष का कारावास या पांच लाख रुपये का आर्थिक दण्ड या दोनों दिए जा सकते हैं। इसके अलावा ई- रिकॉर्ड फ्रॉड की बढ़ती घटनाओं के कारण इसके प्रावधानों को और कठोर कर दिया गया।

केन्द्र सरकार सूचना तकनीक अधिनियम, 2000 में परिवर्तन करने जा रही है। 20 नवम्बर 2000 को इस एक्ट में किए जाने वाले 2008 संशोधनों को कैबिनेट ने अपनी मंजूरी दे दी है। इसके बाद इस अधिनियम के तहत किए गए अपराध संज्ञेय जमानत योग्य माने जायेंगे। इस कानून में प्रस्तावित संशोधन के बाद साइबर आतंकवाद से जुड़े अपराध, महत्वपूर्ण सूचनाओं से सम्बन्धित ढांचे की सुरक्षा पहचान चुराने की समस्या आदि भी साइबर कानून के दायरे में आ जायेंगे।

इनफारमेशन टेक्नोलॉजी कानून के उन प्रावधानों को लागू किए जाने से निश्चय ही ई-कामर्स और ई-गवर्नेस का एक नया दौर, इस देश में शुरू हुआ है। दूरसंचार संसाधनों के तेजी से विकास के साथ-साथ देश में इंटरनेट के तेजी से आगे बढ़ने की आशा है लेकिन उसके साथ ही इस अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के दुरूपयोग के कारण साइबर अपराधों के बढ़ने की सम्भावना से इन्कार, नहीं किया जा सकता। इस परिस्थिति से निपटने के लिए तकनीकी, कानूनी और प्रशासनिक सभी तरह के कदम उठाने की आवश्यकता होगी ? कानून बनाना तो इस दिशा में पहला कदम ही कहा जा सकता है। तेजी से बदलती प्रौद्योगिकी की इस दुनिया में यह कानून बनने के साथ ही पुराना पड़ता जाएगा इसलिए समयानुसार इसे अपडेट (अध्यावधिक) किया जाना जरूरी है। साइबर अपराधों की गति और भौगोलिक सीमाओं के परे होने के कारण इन्हें रोकने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक कदमों को तेजी से उठाना होगा। अभी तक अनुभव यही रहा है कि कम्प्यूटर प्रणालियों का संचालन करन वाली कम्पनियाँ अपनी व्यवस्थाओं और नेटवर्क की सुरक्षा पर उतना ध्यान नहीं दे रही हैं जितनी की आवश्यकता है। ये कम्पनियाँ सुरक्षा के बजाय प्रचार-प्रसार और पहुँच को उच्च प्राथमिकता दे रही है। यह सच है कि इस प्रकार की कम्पनियों को टेक्नोलोजी पर बहुत अधिक निवेश करना पड़ता है ? इसलिए अभी तक सीमित पहुँच के दायरे को बढ़ाने को प्रणाली की सुरक्षा पर व्यय की तुलना में पर्याप्त महत्व नहीं मिल पा रहा है। कम्पनियों को यह मानना होगा कि प्रचार और पहुँच को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचना लाभ के लिए आवश्यक है। लेकिन प्रणाली की सुरक्षा व्यवस्था को विकसित करने के लिए अनुसंधान और विकास तथा उसको लागू करने पर होने वाला खर्च भी प्रणाली की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। आज भी भारत में इंटरनेट के उपयोग करने वालों का एक बहुत मामूली वर्ग खरीद फरोख्त और भुगतान ऑन लाइन करने में विश्वास करता है, और यदि इंटरनेट पर धोखाधड़ी और जालसाजी की घटनाएँ बढ़ती हैं तो इस प्रौद्योगिकी का उपयोग की सम्भावनाएँ बढ़ने के बजाय कम होने लगेगी। अभी तो आवश्यकता इस बात की है कि भारत के सतर्क उपभोक्ताओं की सोच बदले और वे ऑन लाइन खरीद फरोख्त और भुगतान करने के लिए प्रेरित हो इसलिए नेटवर्क की सुरक्षा व्यवस्था पर होने वाले खर्च को उचित महत्व दिया जाए। इसके साथ ही पुलिस और जाँच एजेंसियों को प्रशिक्षित करके इस योग्य बनाया जाए. कि वे साइबर क्राइम की जाँच कर सकें। आरोपियों को अदालत कि समक्ष पेश कर सकें। अभी तक पुलिस और अन्य जाँच एजेंसियों की जिस प्रकार छवि आम लोगों में है उससे उनके मन में यह विश्वास ही पाना एक मुश्किल काम है कि वे साइबर अपराधियों जैसे तकनीकी रूप से दक्ष अपराधियों से निपट पाने में सक्षम है। पुलिस में कम्प्यूटर 'टेक्नोलॉजी में दक्ष विशेषज्ञ अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षित करके इन अपराधियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षित करके इन अपराधियों से निपट पाने के योग्य बनाना होगा। पुलिस एजेंसियों को इस प्रकार के अपराधियों से निपट कर ऐसी छवि प्रस्तुत करनी होगी कि दे 21वीं शताब्दी के अपराधियों से निपट पाने में सक्षम हैं। अभी तक अपराधों के बारे में पुलिस सर्वोच्च स्तर पर कुछ गिनेचुने अधिकारियों को छोड़कर कम्प्यूटर के बारे में लगभग निरक्षरता की स्थिति है। इसे तेजी से दूर करना होगा। पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के पास बड़ी संख्या में पुलिसजनों की प्रशिक्षित करने के लिए न तो पर्याप्त आर्थिक संसाधन हैं और न ही मानव शक्ति। इस कार्य में पुलिस व्यवस्था की मदद के लिए निजी क्षेत्र आगे आना होगा। इस कार्य में निजी क्षेत्र और पुलिस संगठनों को भागीदारी की भावना काम करना होगा लेकिन इस बात से भी सतर्क रहना होगा कि कहीं भागीदार व्यवस्था की खामियाँ का लाभ उठाने की कोशिश नहीं कर पाएँ ।

हमारे देश की न्यायिक प्रक्रिया इस प्रकार की है जिसमें न्याय मिलने में बहुत देरी होती है। साइबर अपराधी प्रौद्योगिकी की तीव्रता और विश्वव्यापी पहुँच के कारण इस दे का बहुत फायद उठा पाने की स्थिति में हैं। कानून की प्रक्रिया का फायदा उठाकर ऐसे अपराधी दुनिया में कहीं भी कभी भी गायब हो सकते हैं। इसलिए हमें न्यायिक प्रक्रिया को मामलों की जड़ तक पहुँचने और फसला करने में होने वाली देरी को समाप्त करना होगा ।.. कानून में माना जाता है कि जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड लेकिन साइबर अपराध के मामलों में तो मामूली में तो मामूली देरी भी ऐसा कर सकती है कि सांप निकल जाए और `व्यवस्था लकीर पीटती रह जाए। इस स्थिति से निपटने के लिए न्यायिक प्रक्रिया के प्रावधानों में परिवर्तन लाया जाना जरूरी है। साइबर अपराधों से निपटने के लिए ई-अदालतों का गठन किया जा सकता है जिनमें कम्प्यूटर अपराध के विशेषज्ञों की मदद ली जा सकती है। इन अपराधों के प्रति न्यायिक अधिकारियों और वकीलों भी अधिक संवेदनशील बनाया जाना जरूरी होगी। सरकारी वकील भी इस प्रकार से प्रशिक्षित किए जाने होंगे कि वे कानून के साथ-साथ कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी अच्छी तरह परिचित हो जिससे कि पीड़ित पक्ष (वादीष) की ओर से इन अपराधों के बारे में अच्छी तरह से पैरवी कर सकें।

साइबर अपराधों की एक मुख्य विशेषता यह हैं कि इनके लिए किसी देश की सीमा .में घुसकर काम करना जरूरी नहीं है। यह अपराध दुनिया के किसी कोने में कहीं भी बैठकर कभी भी किए जा सकते हैं। इन अपराधों को करने के लिए वास्तव में बैठना भी अब जरूरी नहीं रह गया है। मोबाइल फोन की मार्फत कहीं से भी चलते फिरते कभी भी ये अपराध किए जा सकते हैं । इन अपराधों को करने के लिए समय, भूगोल या किसी भी तरह की कोई सीमा नहीं है । इसलिए इन अपराधों से निपटना और भी जटिल है। इन अपराधों को होने से रोकने और हो जाने पर अपराधियों से निपटने के लिए विश्व स्तर पर सभी देशों के बीच व्यापक तालमेल सामंजस्य और सहयोग बहुत ही आवश्यक है। इसके बिना तो साइबर अपराधियों को पकड़ पाना लगभग असम्भव ही है, क्योंकि साइबर अपराध की कोई सीमा नहीं होती। इन अपराधों से निपटने के लिए विश्वव्यापी पहुँच रखने वाली पुलिस व्यवस्था की आवश्यकता होगी जो भाषा, रंग, जाति, धर्म, कानूनी और अन्य व्यवस्थाओं के ऊपर उठकर परस्पर विश्वास और सहयोग की भावना से काम करें।

साइबर क्राइम को नियन्त्रित करने के लिए एक कंटिन्जेन्सी प्लान (आकस्मिक योजना) भी तैयार करनी होगी। यह एक प्रकार का आपदा प्रबन्धन प्लान होगा जिसमें निम्न कार्यों का समावेश किया जाना जरूरी है-

1. साइबर क्राइम रोकने वाली एक सशकत प्रणाली को स्थापित करना जो कि उपयोगकर्ता को इस अपराध को करने वालों के बारे में त्वरित सूचना दे सके । 

2. इस तरह की आकस्मिक संकट प्रबन्धन में माहिर सुयोग्य व्यक्तियों के एक समूह की स्थापना करना ।

3. उपरोक्त आपदा प्रबन्धन टीम (समूह) को सभी सम्भव तरीकों / प्रोग्राम के कमजोरतम बिन्दुओं (Vulnerable points) के बारे में प्रशिक्षित करना । 

4. उपरोक्त संकट प्रबन्धन कम्प्यूटर प्रणाली में समय-समय पर परिवर्तन करते रहना एवं प्रणाली की उपयोगिता को आकस्मिक निरीक्षण के द्वारा परखते रहना ।

5. यदि किसी अवांछित व्यक्ति/ व्यक्तियों ने उपयोगकर्ता के कम्प्यूटर प्रणाली में सेंध लगा दी है, तो उसकी चैकिंग या निरीक्षण के दौरान पाई गई अपनी प्रणाली की समस्त कर्मियों अथवा अन्य महत्वपूर्ण सूचनाओं को उस कम्प्यूटर पर नहीं रखना जिस पर साइबर अपराधी का आक्रमण हो चुका हो ।

विश्व स्तर पर इस सहयोग के लिए अन्तर्राष्ट्रीय पुलिस यानी इंटरपोल को बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। संयुक्त राष्ट्रसंघ को भी एक अन्तर्राष्ट्रीय साइबर नियमावली बनानी होगी जो दुनिया के समस्त देशों पर लागू होती हो । सीमाओं में बंधे पुलिस बलों का आन लाइन रियल टाइम सहयोग सुनिश्चित किया जाना जरूरी होगा जिससे कि भौगोलिक सीमाओं से परे सहयोग की भावना से काम करना सम्भव हो सके। साइबर अपराधों के बारे में तत्काल विश्वव्यापी सूचनाओं का आदान-प्रदान आवश्यक होगा। सम्भावित अपराधों के बारे में गुप्त जानकारी के आदान-प्रदान को उच्च प्राथमिकता दी जानी होगी। क्षेत्रीय या देश विशेष के हितों की तुलना में विश्वव्यापी कुप्रभावों को महत्व देकर इन अपराधों से निपटने की भावना का विकास करना होगा। 178 सदस्य देशों के पुलिस संगठनों के बीच साइबर अपराधों से निपटने में इंटरपोल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इंटरपोल के विशेषज्ञों ने 1990 से सदस्य देशों के बीच तालमेल स्थापित करने, अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने, जानकारियों का नियमित आदान-प्रदान करने के लिए चैनल सुनिश्चित करने के लिए बैठकों, गोष्ठियों और पुस्तिकाओं का प्रकाशन आदि करता रहा है। सायबर अपराध से निपटने के लिए सरकारी, गैर सरकारी, तकनीक और अन्य विशेषज्ञ संगठनों के बीच व्यापक तालमेल आवश्यक है। हमेशा से परम्परा यह रही है कि अपराधी आगे भाग रहा होता है और पुलिस उसके पीछे होती है। यह माना जाता है कि कानून के हाथ बहुत लम्बे हैं और वह अपराधी तक अंततः पहुँच जाते हैं लेकिन साइबर अपराधों के मामले में उसे भागने की गति बहुत तेज है और पीछा करने वाले को न केवल उसके अनुरूप अपनी गति तेज करनी होगी बल्कि उसके अपराध करने से पहले ही रोकना होगा वरना हम लकीर के फकीर ही बने रहेंगे और अपराधी हमारे सारे तंत्र चुनौती देता हुआ अपराधों की झड़ी लगा देगा ।

सरकार के पास हैं अधिकार

दरअसल, विशेषज्ञ लोग इंटरनेट को आग के बाद इन्सान की सबसे बड़ी खोज मान हैं। इंटरनेट ने लोगों के सोचने, काम करने और कारोबार करने के तौर-तरीकों को बदलकर रख दिया है। दुनिया सिकुड़कर सिर्फ एक कम्प्यूटर में समा गई है। साथ ही इंटरनेट ने एक बड़ी चुनौती भी खड़ी कर दी। यह चुनौती है इसके सही इस्तेमाल की। इतना ही नहीं, अब इससे लोगों की निजता की सुरक्षा का भी विकट सवाल खड़ा हो गया है। इसीलिए आईटी कानूनों की जरूरत महसूस हुई। इस कानून के तहत कम्प्यूटर सिस्टम व कम्प्यूटर नेटवर्क के मामले में सरकार को तमाम तरह के अधिकार प्रदान किए गए। इसके तहत सरकार का दूरसंचार विभाग किसी भी साइट को, चाहे वह घरेलू हो या फिर विदेशी, जब चाहे बंद कर सकता है। तथ्य यह है कि सरकार ने कई बार अपने इस अधिकार का इस्तेमाल किया भी है।

गूगल सर्च इंजन समेत तमाम वेबसाइटों की मंशा पर सरकार के साथ-साथ आईटी विशेषज्ञों की भी नजर है। वे इसे राष्ट्र को सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा तो मानते हैं, लेकिन यह भी स्वीकारते हैं कि इससे निपटने की व्यवस्था है ।

इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स एसोसिएशन ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष राजेश छरिया के मुताबिक, आईटी एक्ट के साथ आईपीसी के अन्य कानूनों को भी मिला दें, तो इंटरनेट के जरिये आने-जाने वाली सामग्री पर सरकार का पूरी तरह अधिकार हो जाता है। सरकार ने शिकायत आने पर कई बार अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कई साइटों पर प्रतिबंध लगाया है। हालांकि कई मामलों में आपत्तिजनक सामग्री हटा लिए जाने के बाद साइट की दोबारा से खोलने की इजाजत भी दे दी गई। यह अलग बात है कि इसके बावजूद शिकायतों का सिलसिला बंद नहीं हुआ। महात्मा गांधी और दूरा राजनीतिक शख्सीयतों को इंटरनेट पर निशाना बनाने की सूचनाएँ आईटी हैं गूगल अर्थ पर समूची दुनिया की तस्वीरें दिखाई जा रही हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आईटी ऐक्ट बेकार हो गया है। हाँ, यह सरकार को तय करना है कि वह कब किस वेबसाइट के खिलाफ कारवाई करती है ।

'साइबर क्राइम' की विवेचना 

अदृश्य अपराधी का पता लगाना एक कठिन जटिल और दुरूह कार्य है क्योंकि साइबर क्राइम का अपराधी अदृश्य ही होता है। सूचना तंत्र का प्रवाह आज इतना अधिक है कि इसके रूक जाने से किसी व्यक्ति संस्था, संस्थान या देश को बहुत बड़ी क्षति हो सकी है। सूचना तंत्र विकास का संजाल है। इसका व्यापक फैलाव किसी भी व्यक्ति, संस्था, संस्थान, प्रदेश या देश की वह आधारभूत ढांचा प्रदान करता है जिसे आधर बनाकर कोई भी व्यक्ति, संस्था, संस्थान, औद्योगिकी तंत्र या देश अपनी विशेषता, उपलब्ध उत्पाद की जानकारी, गुणवत्ता तथा भविष्य की योजना को दूसरों तक पहुँचाता है अर्थात् अपने विकास की रूपरेखा दूसरों के समाक्ष प्रस्तुत करता है और बदले में उसको व्यक्तिगत या संस्थागत या राष्ट्रव्यापी लाभ प्राप्त होता है और इसी आधार पर व्यक्ति, संस्था या देश आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक प्रगति के पथ पर आरूढ़ होते हैं । अतः कोई भी साइबर अपराधी सबसे पहले इसी आधारभूत ढांचे पर प्रहार करता है। अतः ऐसे साइबर क्रिमिनल के विरूद्ध विवेचना करना और साक्ष्य संकलित करना एक कठिन कार्य है। साइबर क्राइम की विवेचना के लिए उठाए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण कदम निम्नवत हैं-

(A) जाँच टीम का गठन-किसी भी अपराध की तीव्रता, उससे होने वाले नुकसान आगे होने वाली क्षति को रोकने के लिए सर्वप्रथम एक टीम का गठन करना चाहिए। प्रथम दृष्टया जिस तरह का अपराध नजर आ रहा है, उसके विशेषज्ञ, कम्प्यूटर प्रणाली एवं आँकड़ा रख रखाव अधिकारी, विभिन्न प्रणालियों में सामंजस्य बैठाने वाले अधिकारी एवं संकट प्रबन्धन टीम के सदस्यों को मिलाकर इस प्रकार की टीम का गठन किया जा सकता है । टीम के गठन में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति को निश्चित कार्य दे (टास्क) दिया जाय। उन समस्त सदस्यों में सामंजस्य के लिए नियमित अंतराल पर संवाद हो, जाँच के प्रत्येक पहलू का रिकार्ड रखा जाय और जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़े एवं उसमें नई पेचीदरिगया सामने आए, तदनुसार उस विषय के विशेषज्ञ से आवश्यक सलाह दी जाइए ।

(B) जाँच की दिशा - प्रारम्भिक प्रक्षेणों और टास्क टीम के आपसी वार्तालाप से निष्कर्ष निकालते हुए जाँच की एक दिशा निश्चित कर जाए। इसके पश्चात् उसी दिशा में समग्र रूप से बढ़ा जाये । 

(C) अभिलेखों का संकलन- इसके पश्चात् रिकार्ड (अभिलेखों) के संकलन की कार्यवाही की जा सकती है जिसमें कि कम्प्यूटर प्रणाली पर उपलब्ध समस्त अभिलेखों, इनमें से सेंध लगाए हुए अभिलेख, प्रणाली की लॉग इन फाइल उस संस्था एवं उसके कर्मचारियों के संबंध में जानकारी से शुरु होते हुए अगर अपराधी कार्यवाही के दौरान ही पहचाना जा चुका है, तो उसकी वैयक्तिक जानकारी यथा— उसकी कम्प्यूटर निपुणता, उसके द्वारा प्रयुक्त उपकरण, उसका मतव्य एवं उसकी टेलीफोन (दूरभाष) रिकार्ड आदि को संकलित कर लिया जाय तथा फिर उसकी समीक्षा कर ली जाय ।

(D) अपराधी की निगरानी - साइबर क्राइम के बारे में सूचना देने वालों एवं उनसे प्राप्त समस्त जानकारियों का गहनता से अध्ययन करके तार्किक परिणाम निकालने चाहिए जो कि जाँच को पूर्णता की ओर ले जाए। आरोपी की भौतिक एवं इलेक्ट्रॉनिक निगरानी करने वाले उपकरणों से लगातार निगरानी करनी चाहिए, ताकि इनके द्वारा दर्ज सूचनाओं की जाँच की जा सके और उसे साक्ष्य के रूप में लिया जा सके और उसे इस अवस्था में आरोपी को पकड़ने उसे दण्डित करने में प्रयुक्त किया जा सके।

(E) अपराधी का तलाशी आदेश न्यायालय से प्राप्त करना - जब जाँच से यह सिद्ध हो जाय कि फलां व्यक्ति ने अपराध किया है तथा उसके विरुद्ध आरोप सिद्ध करने के लिए - उसकी तलाशी, जरुरी है तब न्यायालय को तलाशी लेने का पूर्ण कारण दर्शित करते हुए. प्रार्थना पत्र देकर आदेश प्राप्त करके अपराधी के विरुद्ध कार्यवाही करनी चाहिए। न्यायालय को दिए जाने वाले प्रार्थना पत्र में निम्न बातें समाविष्ट होनी चाहिए-

1. यह कि प्रथम दृष्टया अपराध हुआ है।

2. यह कि प्रथम दृष्टया अपराध उस व्यक्ति ने किया है। 

3. यह कि प्रथम दृष्टया अपराध से संबंधित / चुराई गई सूचना, आरोपी के पास है / हो सकती है।

4. यह कि अपराध से संबंधित सूचना / चुराई गई सूचना प्राप्त करने के लिए आरोपी का अभिलेखीय निरीक्षण करना आवश्यक है।

प्रयास यह होना चाहिए कि तलाशी आरोपी की लिखित सहमति से हो, यदि आरोपी सहमति नहीं देता है तो दो निष्पख गवाहों के समक्ष तलाशी लेनी चाहिए तथा उसकी फर्द तलाशी भी तैयार करनी चाहिए। यदि संभव हो सके तो ऐसी तलाशी की विडियो रिकार्डिंग भी करा ली जाय ताकि बाद में आरोपी द्वारा न्यायालय में तलाशी की कार्यवाही ।

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