48. साइबर अपीलीय अधिकरण की स्थापना - (1) केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा एक या एक से अधिक अपीलीय अधिकरण स्थापित करेगा जो साइबर अपीलीय अधिकरण के नाम से जाने जा सकेंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार अधिसूचना में उपधारा (1) के अधीन वे मामले और स्थान विनिर्दिष्ट करेगी जिसमें साइबर अपीलीय अधिकरण अपनी अधिकारिता का प्रयोग करेगा ।
49. साइबर अपीलीय अधिकरण के घटक
(जिसे एतस्मिनपश्चात् साइबर अपीलीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी के रूप में निर्दिष्ट साइबर अपीलीय अधिकरण केन्द्रीय सरकार की अधिसूचना द्वारा नियुक्त एक व्यक्ति किया जायेगा) द्वारा गठित किया जायेगा ।
50. साइबर अपीलीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी नियुक्त किये जाने की अर्हतायें-
कोई भी व्यक्ति साइबर अपीलीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी नियुक्त किये जाने के लिए अर्ह नहीं होगा जब कि वह-
(क) उच्च न्यायालय का न्यायाधीश न हो अथवा उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने की क्षमता न रखता हो अथवा;
(ख) वह भारतीय विधिक सेवा का सदस्य न हो अथवा उसने कम से कम तीन वर्षों तक उस सेवा की श्रेणी का पद धारण न किया हो ।
51. पद का नियम - साइबर अपीलीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी अपने पद धारण करने की तिथि से पाँच वर्ष तक की अवधि तक के लिए या पैंसठ वर्ष की आयु तक 'इनमें से जो भी पूर्वतर हो पद धारण करेगा ।
52. पीठासीन अधिकारी का वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें- साइबर अपीलीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के वेतन भत्ते, पेंशन, ग्रेच्युटी और सेवा निवृत्ति के अन्य लाभों सहित सेवा की अन्य निबन्धन और शर्तें ऐसी होंगी जैसा कि विहित किया जा सकेगा ।
परन्तु यह कि पीठासीन अधिकारी के पद धारण करने के पश्चात् उसके वेतन भत्तों और सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तों में कोई भी परिवर्तन उसके हानि के लिए नहीं किया जायेगा ।
53. रिक्तियों की पूर्ति - यदि अस्थायी अनुपस्थिति के सिवाय साइबर अपीलीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के कार्यकाल में कोई पद रिक्त होता है तब केन्द्रीय सरकार ऐसी रिक्ति की पूर्ति इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार अन्य व्यक्ति की नियुक्ति करके करेगी और साइबर अपीलीय अधिकरण के समक्ष कार्यवाही उसी स्तर पर चलती रहेगी जिस पर यह रिक्ति भरी जाती है ।
54. पद त्याग और हटाया जाना - (1) साइबर अपीलीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी अपने हस्तलेख में लिखित और केन्द्रीय सरकार को सम्बोधित सूचना द्वारा अपने पद का त्याग कर सकेगा।
परन्तु यह कि कथित पीठासीन अधिकारी जब तक कि वह केन्द्रीय सरकार द्वारा शीघ्र पद छोड़ने के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाता इस सूचना की प्राप्ति के तीन माह की समाप्ति अथवा अपने कार्यालय में अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति अथवा अपने सेवा अवधि की समाप्ति जो भी पूर्व हो पद धारण करेगा ।
(2) साइबर अपीलीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी अपने पद से केन्द्रीय सरकार द्वारा दुराचरण, अक्षमता के आधार पर दिये गये आदेश और इनके बारे में उच्चतम न्यायालय के जज जिसमें कि पीठासीन अधिकारी सम्पृक्त है के द्वारा जाँच किये जाने के और इन आरोपों के बारे में उसे सुनवाई का अवसर दिये जाने के सिवाय अपने पद से हटाया नहीं जायेगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार, पूर्वोक्त पीठासीन अधिकारी के दुराचरण अथवा अक्षमता के अन्वेषण पर प्रक्रिया विनियमित कर सकता है ।
55. अपीलीय अधिकरण के गठन के आदेशों का अंतिम होना और कार्यवाही के आधार पर इनका अमान्य न होना
साइबर अपीलीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया कोई भी आदेश किसी तरह प्रश्नगत न किया जायेगा और न ही अपीलीय अधिकरण के समक्ष का कोई भी कार्य और कार्यवाही साइबर अपीलीय अधिकरण के संविधान में दोष के आधार पर प्रश्नगत किया जा सकेगा ।
56. साइबर अपीलीय अधिकरण के कर्मचारी (1) केन्द्रीय सरकार साइबर अपीलीय अधिकरण के लिए ऐसे अधिकारी और कर्मचारियों को उपबन्धित करेगी जैसा वह उचित समझती है।
(2) साइबर अपीलीय अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारियों को अपने कर्त्तव्यों से पीठासीन अधिकारी के साधारण प्रबन्ध के अधीन उन्मोचित किया जायेगा ।
(3) साइबर अपीलीय अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें ऐसी होंगी जैसा कि केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जा सकेगा।
57. साइबर अपीलीय अधिकरण में अपील - (1) उपधारा (2) में उपबन्धित के सिवाय कोई व्यक्ति जो कि कन्ट्रोलर अथवा इस अधिनियम के अधीन न्याय निर्णयन करने वाले किसी अधिकारी के आदेश से व्यथित है मामले के सम्बन्ध में अधिकारिता रखने वाले - साइबर अपीलीय अधिकरण में अपील कर सकेगा।
(2) साइबर अपीलीय अधिकरण में न्याय निर्णयन करने वाले किसी अधिकारी के आदेश के विरुद्ध कोई अपील पक्षकारों की सहमति के बिना न की जायेगी ।
(3) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील कन्ट्रोलर अथवा न्याय निर्णयन करने वाले अधिकारी के आदेश की प्रति व्यथित पक्षकार द्वारा प्राप्त किये जाने की तिथि पैंतालीस दिन के भीतर की जायेगी और यह अपील ऐसे रूप में और ऐसी फीस के साथ की जायेगी जैसा कि विहित किया जा सकेगा।
परन्तु यह कि साइबर अपीलीय अधिकरण कथित पैंतालीस दिन की समाप्ति पर भी कोई अपील ग्रहण कर सकेगा यदि वह इस बात से संतुष्ट है कि इस अपील के समय के भीतर न किये जाने का पर्याप्त कारण था ।
(4) उपधारा (1) के अधीन किसी अपील की प्राप्ति पर साइबर अपीलीय अधिकरण अपील के बारे में पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिये जाने के पश्चात् आदेश जिसके विरुद्ध अपील की गयी है को पुष्ट सुधार और अपास्त करते हुए ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा वह उचित समझता है ।
(5) साइबर अपीलीय अधिकरण अपने द्वारा किये प्रत्येक आदेश की प्रति अपील के पक्षकारों और संपृक्त कन्ट्रोलर और न्याय निर्णयन करने वाले अधिकारी को भेजेगा।
(6) उपधारा (1) के अधीन साइबर अपीलीय अधिकरण के समक्ष की गयी प्रत्येक अपील जहाँ तक सम्भव हो सके शीघ्र निपटायी जायेगी और इस अपील की प्राप्ति के छः माह के भीतर निपटाने का प्रयत्न किया जायेगा ।
58. साइबर अपीलीय अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियाँ-
(1) साइबर अपीलीय अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5 ) में अभिलिखित प्रक्रिया द्वारा बाध्य नहीं होगा लेकिन प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों और इस
अधिनियम के उपबन्धों और अन्य नियमों द्वारा मार्गदर्शित किया जायेगा, साइबर अपीलीय अधिकरण अपनी प्रक्रिया और अपने बैठने के स्थान को विनियमित करने की शक्ति रखेगा।
(2) साइबर अपीलीय अधिकरण इस अधिनियम के अधीन अपने कर्त्तव्यों के उन्मोचन के लिए ऐसी शक्ति रखेगा जैसा कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 ( 1908 का 5) में वादों के विचारण और निम्न मामलों के सम्बन्ध में होती है—-
(क) समन और किसी व्यक्ति की उपस्थिति और शपथ पर उसकी परीक्षा करने;
(ख) दस्तावेजों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की खोज और उनके पेश किये जाने की अपेक्षा करने;
(ग) शपथ पर साक्ष्य प्राप्त करने
(घ) गवाहों और दस्तावेजों की परीक्षा करने के लिए कमीशन जारी करने
(ङ) अपने विनिश्चय. का पुनर्विलोकन करने;
(च) व्यतिक्रम अथवा एक पक्षीय विनिश्चय पर किसी आवेदन को खारिज करने;
(छ) कोई अन्य मामले जिसे विहित किया जा सकेगा ।
(3) साइबर अपीलीय अधिकरण के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही धारा 193, 228 के अर्थों में और भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45 ) की धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जायेगी और साइबर अपीलीय अधिकरण धारा 195 और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय XXVI के प्रयोजन के लिए सिविल न्यायालय समझा जायेगा ।
59. विधिक प्रतिनिधि के अधिकार-अपीलार्थी व्यक्तिगत रूप से अथवा एक से अधिक विधिक अभ्यासियों अथवा अपने अधिकारियों के माध्यम में साइबर अपीलीय अधिकरण के समक्ष उपस्थित हो सकेंगे ।
60. परिसीमा - परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के उपलब्ध जहाँ तक हो सके साइबर अपीलीय अधिकरण के समक्ष की गयी प्रत्येक अपील को लागू होंगे।
61. दीवानी न्यायालयों की अधिकारिता का न होना कोई भी न्यायालय किसी मामले जिसके सम्बन्ध में वाद या कार्यवाही के लिए इस अधिनियम के अधीन न्याय निर्णयन करने वाले अधिकारी की नियुक्ति की गयी है अथवा जिनके लिए इस अधिनियम के अधीन साइबर अपीलीय अधिकरण का गठन या सशक्त किया गया है को ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी और किसी भी न्यायालय या प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन दी गयी शक्ति के अनुक्रम या किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में त्यादेश नहीं दिया जायेगा ।
62. उच्च न्यायालय में अपील- कोई भी व्यक्ति जो कि साइबर अपीलीय अधिकरण के विनिश्चय या आदेश से व्यथित है साइबर अपीलीय अधिकरण के विनिश्चय या आदेश की संसूचना की प्राप्ति के साठ दिन के भीतर विधि या तथ्य के प्रश्नों के बारे में उच्च न्यायालय में अपील कर सकेगा।
परन्तु यह कि यदि उच्च न्यायालय संतुष्ट है कि अपीलार्थी पर्याप्त कारणों से क समय के भीतर अपील करने से वर्जित कर दिया गया था तो अग्रिम समय जो साठ दिन की अवधि से अधिक नहीं होगा अपील करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
63. उल्लंघनों का सम्मिश्रण - (1) इस (अधिनियम) के अधीन कोई उल्लंघन न्यायनिर्णयन की कार्यवाही संस्थित किये जाने के पूर्व या पश्चात् कन्ट्रोलर या उसके द्वारा इसके लिए प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी या न्याय निर्णय करने वाले अधिकारी द्वारा ऐसी शर्तों जो कन्ट्रोलर, या किसी अन्य अधिकारी या न्याय निर्णय करने वाले अधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी पर शमन किया जा सकेगा ।
परन्तु यह कि ऐसा योग किसी भी दशा में शासति की कम रकम जो कि इस अधिनियम के उल्लंघन के लिए अधिरोपित की जा सकती है से अधिक नहीं होगा ।
(2) उपधारा (1) की कोई भी बात उस व्यक्ति को लागू नहीं होगी जिसने कि वैसा या उसी के समान उल्लंघन पहला उल्लंघन जिसका कि सुलह किया जा चुका था कि किये जाने की तीन वर्ष के भीतर करता है ।
स्पष्टीकरण - इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए कोई दूसरा या पश्चात्वर्ती उल्लंघन जो कि पूर्व में सुलह किये गये उल्लंघन के किये जाने के तीन वर्ष पश्चात् किया जाता पहला उल्लंघन समझा जायेगा ।
(3) जहाँ उपधारा (1) के अधीन किसी उल्लंघन का सुलह किया जाता है तो इस प्रकार सुलह किये उल्लंघन के दोष के लिए व्यक्ति के विरुद्ध कोई कार्यवाही या अग्रिम कार्यवाही जैसी भी दशा हो नहीं की जायेगी।
64. शास्ति का प्रत्युद्धकरण - इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित शास्ति यदि उसका भुगतान नहीं किया गया है भू-राजस्व के बकाये के रूप में प्रत्युद्धरित की जायेगी और लाइसेन्स अथवा डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जैसी भी दशा हो तब तक निलम्बित रहता है जब तक ऐसी शास्ति का भुगतान नहीं कर दिया जाता है।
अपराध
65. कम्प्यूटर स्त्रोत दस्तावेज के साथ हस्तक्षेप - जो कोई जानबूझकर या साशय कम्प्यूटर, कम्प्यूटर प्रोग्राम, कम्प्यूटर सिस्टम, कम्प्यूटर नेटवर्क के लिए प्रयुक्त कम्प्यूटर स्त्रोत कोड़ को छिपायेगा, नष्ट करेगा या परिवर्तित करेगा या छिपाने, नष्ट करने या परिवर्तित करने के लिए कोई कार्य करेगा, जबकि ऐसे कम्प्यूटर स्त्रोत को विधि द्वारा समय पर व्यवस्थित बनाये रखना अपेक्षित है वह ऐसे कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक हो सकेगी अथवा जुर्माना जो दो लाख रुपये तक हो सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा ।
स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजनों के लिए "कम्प्यूटर स्त्रोत कोड" का अर्थ प्रोग्राम की लिस्टिंग, कम्प्यूटर, कमाण्ड, डिजाइन और ले आउट और कम्प्यूटर स्त्रोत के प्रोग्राम विश्लेषण में से किसी एक से है।
66. कम्प्यूटर सिस्टम को काटना - जो कोई साशय अथवा यह जानकर कि वह लोक या किसी व्यक्ति को सदोष नुकसान या क्षति करेगा कम्प्यूटर स्त्रोत में स्थित किसी सूचना को नष्ट करता है या, निरसित करता है अथवा परिवर्तित करता है अथवा इसके मूल्य या उपयोगिता को कम करता है या किसी साधन से क्षतिग्रस्त करता है वह हाकिंग करता है ।
(2) जो कोई हाकिंग करता है तीन वर्ष के कारावास अथवा जुर्माना जो दो लाख रुपये से अधिक नहीं होगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा ।
67. सूचना जो कि तकनीकी रूप में नहीं है को प्रकाशित करना जो कोई तकनीकी स्वरूप के किसी पदार्थ जो कि कामुक (लासिवियस ) अथवा | कामुकता के हित के लिए ध्यान आकृष्ट करता है अथवा यदि इसका प्रभाव ऐसा है जो कि है को प्रकाशित, पारेषित करता है, पढ़ता है, देखता है या अन्तर्विष्ट पदार्थ को सुनता है अथवा सभी सुसंगत परिस्थिति में सम्मान इन्हें साकार रूप देता है तो प्रथम दोषसिद्धि पर कारावास जो पाँच वर्ष तक का हो सकेगा रहने वाले व्यक्तियों की नैतिकता को बिगाड़ने वाला दण्डित किया जायेगा और द्वितीय अथवा पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास जो दस वर्ष तक विस्तारित हो सकेगा और जुर्माना जो दो लाख रुपये तक विस्तारित हो सकेगा से दण्ड किया जायेगा।
68. कन्ट्रोलर की निर्देश देने की शक्ति- (1) कन्ट्रोलर आदेश द्वारा प्रमाणन प्राधिकारी अथवा प्राधिकारी के किसी कर्मचारी को आदेश में विनिर्दिष्ट ऐसी कार्यवाहियों पर कार्यवाही करने अथवा रोकने के लिए निदेश दे सकेगा यदि इस अधिनियम के उपबन्धों, नियमों और इसमें बनाये गये विनियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक हो ।
(2) कोई व्यक्ति जो उपधारा (1) के अधीन दिये गये आदेश के पालन करने में असफल रहता है किसी अपराध का दोषी होगा और ऐसे कारावास जो कि तीन वर्ष से अधिक नहीं होगा अथवा जुर्माना जो कि दो लाख रुपये तक हो सकेगा दोनों से दण्डित किया जायेगा ।
69. सूचना की सुविधा को विस्तारित करने के लिए कन्ट्रोलर द्वारा उपभोक्ता को निदेश - (1) यदि कन्ट्रोलर संतुष्ट है कि भारत की संप्रभुता और सत्यनिष्ठा के हित के लिए, राज्य की सुरक्षा के लिए, या विदेशी राज्यों से मैत्री के लिए या लोक व्यवस्था या संज्ञेय अपराधों के किये जाने के प्रोत्साहन के निवारण के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक अथवा समीचीन है तो अभिलिखित किये जाने वाले कारणों से सरकार के अभिकरण को किसी कम्प्यूटर स्त्रोत के माध्यम से किसी सूचना को पारेषिति करने से अवरुद्ध करने का निदेश दे सकेगा।
(2) उपभोक्ता अथवा कम्प्यूटर स्त्रोत का भारसधिक कोई व्यक्ति जब उपधारा (1) के अधीन निदेशित किसी अभिकरण द्वारा बुलाया जाता है तो वह सूचना की बुराईयों को दूर करने में उसे सभी सुविधायें और तकनीकी सहायतायें दी जायेंगी ।
(3) उपभोक्ता पर कोई व्यक्ति जो उपधारा (2) में निर्दिष्ट अभिकरण की सहायता करने में असफल रहता है वह कारावास जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जा सकेगा।
70. संरक्षित व्यवस्था - (1) समुचित सरकार, सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा यह घोषित कर सकेगी कि कोई कम्प्यूटर, कम्प्यूटर व्यवस्था अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क संरक्षित व्यवस्था हो सकेगी।
(2) समुचित सरकार अपने लिखित आदेश में उस व्यक्ति को जो कि उपधारा (1) में अधिसूचित संरक्षित व्यवस्था तक पहुँचने के लिए प्राधिकृत है, प्राधिकृत कर सकेगी।
(3) कोई व्यक्ति जो कि इस अधिनियम के उल्लंघन में संरक्षित व्यवस्था तक पहुँचेगा या पहुँचने का प्रयत्न करेगा वह कारावास जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा ।
71. दुर्व्यपदेशन के लिए शास्ति - जो कोई कन्ट्रोलर अथवा प्रमाणन प्राधिकारी से लाइसेंस अथवा डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र अथवा जैसी भी दशा को प्राप्त करने के लिए दुर्व्यपदेशन करेगा अथवा किसी तथ्य को छिपायेगा तो कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा जुर्माना जो एक लाख रुपये तक हो सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा ।
72. गोपनीयता और एकान्तता के भंग के लिए शास्ति - इस अधिनियम अथव समय-समय पर प्रवृत्त अन्य विधाओं में अन्यथा उपबंधित के सिवाय कोई व्यक्ति जो कि इस अधिनियम में, नियमों अथवा उसमें बनाये गये विनियमों द्वारा दी गयी शक्ति के अनुक्रम में किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, पुस्तिका, रजिस्टर, सूचना, दस्तावेज अथवा अन्य तात्विक, चीजों, को, ऐसे किसी इलेक्ट्रॉनिक्स रिकार्ड, पुस्तिका, रजिस्टर, सूचना, दस्तावेज अथवा अन्य तात्विक, चीजों को संपृक्त व्यक्ति की सहमति के बिना किसी अन्य व्यक्ति से प्रकट करता है तो वह कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा जुर्माना एक लाख रुपये तक हो सकेगा या दोनों से दण्डनीय होगा ।
73. डिजिटल सिग्नेचर सर्टीफिकेट में कुछ गलत विशिष्टियों को प्रकाशित करने के लिए शास्ति-
कोई भी व्यक्ति डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र प्रकाशित नहीं करेगा अथवा इस ज्ञान से कि-
(क) प्रमाणन प्राधिकारी ने प्रमाण पत्र में यह सूचीबद्ध किया है कि इसे जारी नहीं किया गया है।
(ख) प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध उपभोक्ता ने इसे प्राप्त नहीं किया है अथवा ;
(ग) प्रमाण पत्र प्रतिसंहृत अथवा निलम्बित किया गया है। किसी व्यक्ति को उपलब्ध नहीं करायेगा जब तक ऐसा प्रकाशन पूर्व में प्रतिसंहृत अथवा निलम्बित डिजिटल प्रमाण पत्र के सत्यापन के प्रयोजन से नहीं किया जाता है।
(2) कोई व्यक्ति जो कि उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन करता है तो कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा जुर्माना जो एक लाख रुपये तक का . हो. सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा ।
74. कपट करने के प्रयोजन से प्रकाशन जो कोई जानबूझ कर कपट पूर्ण और विधिपूर्ण प्रयोजन के लिए डिजिटल प्रमाण पत्र को प्रकाशित करता है वह कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा जुर्माना जो एक लाख रुपये तक हो सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
75. भारत बाहर किये अपराधों अथवा उल्लंघन के लिए अधिनियम का लागू होना - (1) उपधारा (2) के उपबन्धों को लिए इस अधिनियम के उपबन्ध किसी व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर किये गये अपराध अथवा उल्लंघन के लिए उसकी राष्ट्रीयता के बारे में विचार किये बिना लागू होंगे।
(2) उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए यह अधिनियम किसी व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर किये गये अपराधों अथवा उल्लंघन के लिए लागू होगा यदि ऐसा कार्य या आचरण भारत में स्थित कम्प्यूटर, कम्प्यूटर व्यवस्था अथवा कम्प्यूटर नेटवर्क के लिए अपराध या उल्लंघन गठित करता है ।
76. अधिहरण (जब्ती) — कोई कम्प्यूटर, कम्प्यूटर व्यवस्था, फ्लोपीज, कम्पैक्ट डिस्क, टेप ड्राइब्स या इनसे सम्बन्धित अन्य उपसाधक जिसके सम्बन्ध में इस अधिनियम के कोई उपबन्ध नियम, आदेश अथवा इनमें बनाये गये विनियमों का उल्लंघन होता है उन्हें अधिहृत किया जायेगा ।
परन्तु यह कि जहाँ अधिहरण निर्णीत करने वाले न्यायालय की संतुष्टि के लिए यह स्थापित किया जाता है कि व्यक्ति जिसके कब्जे पर शक्ति में या नियंत्रण में ऐसा कम्प्यूटर, कम्प्यूटर व्यवस्था फ्लोपिज, कम्पैक्ट डिस्क, टैप ड्राइब्स अथवा इनसे सम्बन्धित उपसाधक पाये गये हैं इस अधिनियम के उपबन्धों, नियमों अथवा इनके अधीन बनाये गये विनियमों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार नहीं है न्यायालय ऐसे कम्प्यूटर व्यवस्था फ्लोपीज, कम्पैक्ट • डिस्क, टैप ड्राइब्स अथवा इनसे सम्बन्धित अन्य उपसाधक के अधिहरण के लिए आदेश करने के बजाये इस अधिनियम के उपबन्धों, नियमों, इनके अधीन बनाये गये विनियमों के उल्लंघन के लिए उस व्यक्ति के विरुद्ध इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत ऐसा आदेश कर सकेगा जैसा वह उचित समझता है।
77. शास्तियाँ और अधिहरण का अन्य दण्ड़ों में हस्तक्षेप न करना-इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित शास्ति और अधिहरण तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन प्रभावी व्यक्ति पर अन्य दण्ड के अधिरोपित किये जाने में अवरोधक नहीं होंगे।
78. अपराधों के अन्वेषण की शास्ति - दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 (1974 का 2) में अन्तर्विष्ट अन्य उपबन्धों के होते हुए भी उपपुलिस अधीक्षक से अनिम्न पंक्ति का पुलिस अधिकारी इस अधिनियम के अधीन अपराधों का अन्वेषण करेगा ।
नेटवर्क सेवा उपलब्ध कराने वाले का कुछ मामलों में जिम्मेदार न होना
79. नेटवर्क सेवा उपलब्ध कराने वालों का कुछ मामलों में जिम्मेदार न होना— सन्देहों दूर 'करने के लिए एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि नेटवर्क सेवा के रूप में सेवा उपलब्ध कराने वाला कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन नियमों अथवा उनके अधीन बनाये गये विनियमों के अधीन किसी तृतीय पक्ष सूचना (थर्ड पार्टी इन्फारमेशन) अथवा उसके द्वारा उपलब्ध कराये गये आँकड़े के लिए जिम्मेदार नहीं होगा यदि वह साबित करता है कि अपराध या उल्लंघन उसके ज्ञान के बिना किया गया अथवा उसके द्वारा ऐसे अपराध अथवा उल्लंघन को रोकने के लिए सम्यक् परिश्रम किया गया ।
स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजनों के लिए- (क) “नेटवर्क सेवा प्रोवाइडर" से आशय किसी मध्यस्थ से है ।
(ख) “थर्ड पार्टी इन्फारमेशन" से आशय किसी ऐसी सूचना से है जो कि नेटवर्क सेवा उपलब्ध कराने वाले मध्यस्थ द्वारा अपनी क्षमता के अधीन दी गयी हो ।
विविध
80. खोज आदि के लिए प्रवेश के लिए पुलिस अधिकारी और अन्य अधिकारियों की शक्ति-
(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए कोई भी पुलिस अधिकारी जो कि पुलिस उप अधीक्षक से अनिम्न पंक्ति का न हो अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत केन्द्र सरकार या राज्य सरकार का कोई अधिकारी किसी लोक स्थान में प्रवेश कर सकेगा और वहाँ पाये गये किसी व्यक्ति जिसके बारे में युक्तियुक्त रूप यह सन्देह है कि उसने इस अधिनियम के अधीन अपराध किया है, कर रहा, करने वाला है को वारन्ट के बिना गिरफ्तार कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजन के लिए अभिव्यक्ति "लोक स्थान" लोक सुविधा, किसी होटल, किसी दुकान या लोक के द्वारा प्रयुक्त किये जाने वाले या लोक के लिए सुगम अन्य स्थानों को सम्मिलित करता
(2) जहाँ. उपधारा (1) के अधीन कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी से भिन्न अधिकारी द्वारा गिरफ्तार किया जाता है तो वहाँ ऐसा अधिकारी विलम्ब के बिना इस मामले के बारे में अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जायेगा या भेजेगा अथवा उप के भारसाधक अधिकारी के समक्ष ले जायेगा ।
(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबन्ध इस भारत के उपबन्धों के विषय होंगे और जहाँ तक हो सके इस धारा के अधीन किये गये प्रवेश, अथवा गिरफ्तारी के सम्बन्ध में लागू होंगे।
81. अधिनियम का अभिभावी प्रभाव - इस अधिनियम के उपबन्ध समय-समय पर प्रवृत्त विधि के अन्य उपबन्धों के असंगत होने पर भी प्रभावी होंगे।
1 (81-क इलेक्ट्रॉनिक चेक और ट्रन्केटेड चेक को अधिनियम का लागू होना)
(1) इस अधिनियम का उपबन्ध, तत्समय प्रभावी, इलेक्ट्रॉनिक चेक और ट्रन्केटेड' चेक के सम्बन्ध में, केन्द्र सरकार द्वारा, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के परामर्श से, सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा, इलेक्ट्रॉनिक चेक और ट्रन्केटेड चेक में ऐसे सुधारों और संशोधनों के अध्यधीन जैसे कि परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 ( 1881 का 26) के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक हो सकता है, को लागू होगा।
(2) केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनायी गयी प्रत्येक अधिसूचना, . इसके बनने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद के दोनों सदनों के सामने रखा जायेगा जबकि यह तीस दिन की अवधि के लिए एक या दो या दो से अधिक क्रमवर्ती सत्रों को मिलाकर हो, और यदि, कथित सूत्रों की समाप्ति के पूर्व दोनों सदन अधिसूचना में किसी सुधार के लिए सहमत हैं अथवा इस बात के लिए सहमत हैं कि अधिसूचना नहीं बनाये जाने चाहिए तो अधिसूचना ऐसे सुधार के रूप में प्रभावी होंगे अथवा प्रभावी नहीं होगी, यथास्थिति, किन्तु कि ऐसा कोई सुधार अथवा बातिली इस अधिनियम के पूर्व में की गयी किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किया जायेगा ।
स्पष्टीकरण – इस अधिनियम के उद्देश्यों के लिए अभिव्यक्तियाँ "इलेक्ट्रॉनिक चेक” और "ट्रन्केटेड चेक" का अर्थ परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 ( 1881 का 26) की धारा 6 के समनुदेशित होगा।
82. कन्ट्रोलर, उप कन्ट्रोलर और सहायक कन्ट्रोलर लोक सेवक होंगे- पीठासीन अधिकारी, और अन्य अधिकारी और साइबर अपीलीय अधिकरण के कर्मचारी, कन्ट्रोलर, उप कन्ट्रोलर और सहायक कन्ट्रोलर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 21 के अर्थों में लोक सेवक समझे जायेंगे ।
83. निदेश देने की शक्ति केन्द्रीय सरकार किसी राज्य सरकार को इस अधिनियम किन्हीं उपबन्धों, नियमों, विनियमों अथवा उनके अधीन किये गये किसी आदेश के राज्य में निष्पादित करने का निदेश कर सकेगी।
84. सद्भावपूर्वक किये गये कार्यों के लिए संरक्षा - केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, कन्ट्रोलर या उसके लिए कार्य करने वाले किसी अन्य व्यक्ति, पीठासीन अधिकारी, न्याय निर्णयन करने वाले अधिकारी और साइबर अपीलीय अधिकरण के कर्मचारी जिन्होंने कोई बात जिसे उन्होंने सद्भावपूर्वक अथवा इस अधिनियम के किसी उपबन्ध, नियम विनियम या उसके अधीन किये गये किसी आदेश के अनुक्रम में किया है के लिए उनके विरुद्ध वाद अभियोजन अथवा कोई विधिक कार्यवाही नहीं किया जायेगा ।
85. कम्पनी द्वारा अपराध - (1) जहाँ कोई व्यक्ति इस अधिनियम, नियम, या इनके अधीन किये गये आदेशों या निर्देशों का उल्लंघन करता है और वह व्यक्ति कम्पनी है,
प्रत्येक व्यक्ति जो जब उल्लंघन किया गया भारसाधक था या कम्पनी के कारबार कम्पनी के प्रति जिम्मेदार था इस उल्लंघन के लिए जिम्मेदार होगा और उसके विरुद्ध की वा लिए भी जिम्मेदार होगा और तद्नुसार वह दण्डित भी किया जायेगा।
परन्तु यह कि इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई भी बात दण्ड के लिए जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध प्रयुक्त नहीं की जायेगी यदि वह साबित कर देता है कि ऐसा उल्लंघन उसके ज्ञान के बिना हुआ अथवा ऐसे उल्लंघन को रोकने के लिए सभी सम्यक परिश्रम उसके द्वारा किया गया।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी जहाँ इस अधिनियम के उपबन्धों, या किसी नियम, या इनके अधीन किये गये किसी निदेश या आदेश का उल्लंघन किसी कम्पनी द्वारा किया जाता है और यह साबित किया जाता है कि ऐसा उल्लंघन कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य किसी अधिकारी की सहमति अथवा सुविधा या उसके द्वारा की गयी किसी उपेक्षा के कारण हुआ तो ऐसा, निदेशक, प्रबन्धक सचिव अथवा अन्य कोई भी अधिकारी ऐसे उल्लंघन का दोषी समझा जायेगा तथा अपने विरुद्ध की गयी कार्यवाही के लिए जिम्मेदार होगा और वह तद्नुसार दण्डित किया जायेगा ।
स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए-
(i) कम्पनी से आशय निगमित निकाय से है और इसमें फर्म अथवा लोगों का अन्य संघ भी सम्मिलित है ।
(ii) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक से आशय फर्म के भागीदार से है ।
86. कठिनाइयों का दूर किया जाना - (1) यदि इस के उपबन्धों को प्रभावी बनाने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार सरकारी गजट में आदेश प्रकाशित कर ऐसे उपबन्ध बना सकती है जो इस अधिनियम के उपबन्ध से असंगत न हो और कठिनाइयों को दूर करने के लिए ये आवश्यक और समीचीन प्रतीत होते हों-
परन्तु यह कि इस धारा के अधीन कोई भी आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ के दो वर्ष पश्चात् नहीं किया जायेगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश शीघ्रातिशीघ्र अभिलिखित किया जायेगा और संसद के समक्ष रखा जायेगा ।
87. केन्द्रीय सरकार को नियम बनाने की शक्ति - ( 1 ) केन्द्रीय सरकार, सरकारी गजट और इलेक्ट्रॉनिक गजट में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के पालन के लिए नियम बना सकेगी।
(क) तरीका जिसमें कोई सूचना और मामले धारा 5 के अधीन डिजिटल हस्ताक्षर के साधनों द्वारा प्रमाणित हो सकेंगे।
(ख) इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप जिसमें अनुदान अथवा भुगतान का जारी किया जाना अथवा फाइल किया जाना धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन प्रभावी होगा ।
(ग) तरीका और आकार जिसमें इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड फाइल अथवा जारी किया जा सकेगा और धारा 6 की उपधारा (2) के अधीन भुगतान का तरीका ।
(घ) डिजिटल हस्ताक्षर के टाइप से सम्बन्धित मामले, ढंग आकार जिसमें धारा 10 के अधीन ये चिपकाये जा सकेंगे ।
(ङ) धारा के अधीन इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड डिजिटल हस्ताक्षर की सुरक्षा के प्रयोजन के लिए सुरक्षित प्रक्रिया;
(च) धारा 17 के अधीन कन्ट्रोलर, डिप्टी कन्ट्रोलर, सहायक कन्ट्रोलर की सेवा की अर्हतायें, अनुभव. निबन्धन और शर्तें;
(छ) धारा की उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन कन्ट्रोलर द्वारा संप्रेक्षित किये जाने वाले अन्य मापदण्ड;
(ज) अपेक्षायें जिसे धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन कोई आवेदक अवश्य पूरा करेगा;
(झ) धारा 21 की उपधारा (3) के खण्ड (क) के प्रदान की गयी अनुज्ञप्ति की वैधता की अवधि
(ञ) स्वरूप जिसमें धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति का आवेदन किया जा सकेगा।
(ट) धारा 22 की उपधारा (2) के खण्ड (ग) के अधीन भुगतान की जाने वाली फीस की रकम ।
(ठ) धारा 22 की उपधारा (2) के खण्ड (घ) की अनुज्ञप्ति के लिए दिये जाने वाले आवेदन साथ दिये जाने वाले अन्य दस्तावेज;
(ड) अनुज्ञप्ति के नवीनीकरण के लिए स्वरूप और शुल्क और धारा 23 के अधीन उसके लिए देय शुल्क;
(ढ़) धारा 35 की उपधारा (2) के अधीन डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र के जारी किये जाने के लिए सम्पर्क फार्म;
(ण) धारा 35 की उपधारा (2) के अधीन डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र के जारी किये जाने के लिए प्रमाणीकरण प्राधिकारी को भुगतान किया जाने वाला शुल्क;
(त) तरीका जिसके द्वारा न्यायनिर्णयन करने वाला अधिकारी धारा 46 की उपधारा. (1) 1. के अधीन जाँच करेगा;
(थ) धारा 46 की उपधारा (2) के अधीन न्यायनिर्णयन करने वाले अधिकारी द्वारा रखी जाने वाली अर्हतायें और अनुभव,
(द) धारा 52 के अधीन पीठासीन अधिकारी के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें और निबन्धन;
(ध) धारा 54 की उपधारा (3) के अधीन पीठासीन अधिकारी की असमर्थता अथवा अभद्रता की जाँच के लिए प्रक्रिया;
(न) धारा 56 की उपधारा (3) के अधीन अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों को दिये जाने वाले वेतन भत्ते, सेवा की अन्य शर्तें;
(प) धारा 57 की उपधारा (3) के अधीन अपील किये जाने के लिए फार्म और उसके लिए फीस;
(फ) सिविल न्यायालयों की अन्य शक्तियाँ जिन्हें धारा 58 की उपधारा (2) के खण्ड (छ) के अधीन विहित किया जाना अपेक्षित है ।
(ब) अन्य मामले जो अपेक्षित हैं और विहित किये जा सकेंगे।
(3) केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 1 के उपधारा (4) के खण्ड (च) के अधीन जारी की गयी प्रत्येक अधिसूचना और इसके द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम अभिलिखित किया जायेगा और ऐसा किये जाने के पश्चात् शीघ्रातिशीघ्र इसे संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष तब रखा जायेगा जब ये तीस दिन अवधि के लिए सत्र में हों एक सत्र में या आने वाले दो से अधिक में समाविष्ट हों के समक्ष रखा जायेगा और यदि सत्र की समाप्ति के तुरन्त पश्चात् यदि सदन अधिसूचना या नियम में सुधार के लिए सहमत हैं अथवा दोनों सदन इस बात के लिए सहमत हैं कि ऐसी अधिसूचना या नियम नहीं बनाये जाने चाहिए तो अधिसूचना और नियम ऐसे सुधार के रूप में स्थिति के अनुसार प्रभावी अथवा अप्रभावी होंगे, किन्तु यदि ऐसे कोई सुधार अथवा बातिलीकरण पूर्व की किसी चीज की वैधता प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किये जायेंगे ।
88. सलाहकारी समिति का संविधान - ( 1 ) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रारम्भ के शीघ्रातिशीघ्र एक कमेटी गठित करेगी जिसे साइबर रेगुलेशन सलाहकारी समिति कहा जायेगा ।
(2) साइबर रेगूलेशन सलाहकारी समिति एक अध्यक्ष और ऐसे पदीय और अपदीय सदस्यों द्वारा गठित की जायेगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उचित समझे जाने वाले मामलों में विशेष ज्ञान रखते हों ।
(3) साइबर रेगुलशन सलाहकारी समिति-
(क) केन्द्रीय सरकार को या तो किन्हीं नियमों के सम्बन्ध में था इस अधिनियम से सम्बन्धित किसी अन्य प्रयोजन के लिए सलाह देगी; तथा
(ख) कन्ट्रोलर को इस अधिनियम के अधीन विनियमों को बनाने के लिए भी सलाह देगी ।
(4) ऐसी समिति के अपदीय सदस्यों को ऐसे यात्रा भत्ते और भत्ते दिये जायेंगे जो केन्द्रीय सरकार निश्चित करे ।
89. कन्ट्रोलर की विनियम बनाने की शक्ति-
(1) साइबर विनियम सलाहकारी समिति की सलाह और केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से सरकार गजट में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम से सुसंगत विनियम और उनके अधीन नियम इस अधिनियम के लागू होने के लिए बना सकेगी।
(2) विशिष्ट और पूर्वगामी शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियमन निम्न मामलों के सम्बन्ध में बनाये जा सकेंगे-
(क) धारा 18 के खण्ड 1 [(ढ)) के अधीन प्रत्येक प्रमाणन प्राधिकारी के डिस्क्लोजर रिकार्ड में अन्तर्विष्ट डेटाबेस के व्यवस्थापन के सम्बन्ध में;
(ख) शर्तें और प्रतिबन्ध जिसके लिए कन्ट्रोलर धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन किसी विदेशी प्रमाणन प्राधिकारी के लिए मान्यता प्रदान कर सकेंगे;
(ग) शर्तें और निबन्धन जिन पर धारा 21 की उपधारा (3) के खण्ड (ग) के अधीन अनुज्ञप्ति प्रदान की जा सकेगी;
(घ) धारा 30 के खण्ड (घ) के अधीन प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा संप्रेक्षित किये जाने वाले अन्य मापदण्ड;
(ङ) ढंग जिन पर प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा 34 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट मामलों को प्रकट करेगा;
(च) कथन की विशिष्टियाँ जो धारा 35 की उपधारा (3) के अधीन किसी आवेदन के साथ होंगी;
(छ) ढंग जिसके द्वारा उपभोक्ता धारा 42 की उपधारा (2) के अधीन व्यक्तिगत समझौतों को प्रमाणन प्राधिकारी को संसूचित करेगा।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम अभिलिखित किया जायेगा और इसके बनाये जाने के यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जायेगा जब यह तीस दिन की अवधि के लिए एक या दो या दो से अधिक सत्रों को मिलाकर हों, और यदि कथित सत्रों की समाप्ति के पूर्व दोनों सदन विनियम में किसी सुधार के लिए सहमत हैं अथवा इस बात के लिए सहमत हैं कि रेगुलेशन नहीं बनाये जाने चाहिए तो विनियम ऐसे सुधार के रूप में प्रभावी होंगे अथवा अप्रभावी होंगे, किन्तु यदि ऐसा सुधार या बातिली इस अधिनियम के पूर्व में की गयी किसी बात के प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किया जायेगा ।
90. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति-
(1) राज्य सरकार, सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के लागू होने के नियम बना सकेगी।
(2) पूर्वगामी शक्तियों पर सामान्यतः प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्न सभी या किसी मामले के लिए उपबन्धित किये जा सकेंगे ।
(क) इलेक्ट्रॉनिक फार्म जिनमें फाइलिंग, जारी करना, रसीद का दिया जाना अथवा भुगतान धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन प्रभावी होगा ।
(ख) धारा 6 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट मामले;
(ग) मामले जो राज्य सरकार के द्वारा उपबन्धित नियमों द्वारा अपेक्षित है ।
(3) इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाये गये प्रत्येक नियम अभिलिखित किये जायेंगे और यथाशीघ्र राज्य विधान मण्डल जो दो सदनों या एक सदन से बना हो के समक्ष रखे जायेंगे।
91. भारतीय दण्ड संहिता 1860 में संशोधन - भारतीय दण्ड संहिता इस अधिनियम की प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट ढंग से संशोधित की जायेंगी ।
92. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में संशोधन-
भारत साक्ष्य अधिनियम इस अधिनियम की द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट ढंग से संशोधित किया जायेगा ।
93. बैंकर्स पुस्तिका साक्ष्य अधिनियम, 1891 में संशोधन
बैंकर्स पुस्तिका साक्ष्य अधिनियम, 1891 में इस अधिनियम की तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट ढंग से संशोधित किया जायेगा ।
94. रिजर्व बैंक आफ इण्डिया अधिनियम, 1934 में संशोधन
रिजर्व बैंक आफ इण्डिया अधिनियम, 1934 में इस अधिनियम की चतुर्थ अनुसूची में विनिर्दिष्ट ढंग से संशोधन किया जायेगा ।
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