(Cyber Crime and Indian Statute)
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (I. T. Act) 2000 के आगमन पूर्व साइबर क्राइम के अपराधों को भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत ही दर्ज किया जाता था ।
(1) साक्ष्यों से सम्बन्धित साइबर अपराधों को भा० द० वि० की धारा 193, 204 और 477 के अन्तर्गत दर्ज किया जाता है ।
(A) धारा 193 भा० द० वि० - मिथ्या साक्ष्य के लिए दण्ड- जो कोई साशय किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में मिथ्या साक्ष्य देगा या किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उपयोग में लाए जाने के प्रयोजन से, मिथ्या साक्ष्य गढ़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
और जो कोई किसी अन्य मामले में साशय मिथ्या साक्ष्य देगा या गंढ़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
स्पष्टीकरण 1 - सेना न्यायालय के समक्ष विचारण न्यायिक कार्यवाही है ।
स्पष्टीकरण 2 – न्यायालय के समक्ष कार्यवाही प्रारम्भ होने के पूर्व जो विधि द्वारा निर्दिष्ट अन्वेषण होता है, वह न्यायिक कार्यवाही का प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेषण किसी न्यायालय के सामने न भी हो ।
स्पष्टीकरण 3 – न्यायालय द्वारा विधि के अनुसार निर्दिष्ट और न्यायालय के प्राधिकार अधीन संचालित अन्वेषण न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेषण किसी न्यायालय के सामने न भी हो ।
(B) धारा 204 भा० द० वि० - साक्ष्य के रूप में किसी [ दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का पेश किया जाना निवारित करने के लिए उसको नष्ट करना - जो कोई किसी ऐसे [दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख] को छिपाएगा या नष्ट करेगा जिसे किसी न्यायालय में या ऐसी कार्यवाही में, जो किसी लोक सेवक के समक्ष उसकी वैसी हैसियत में विधिपूर्वक की गई है, साक्ष्य के रूप में पेश करने के लिए उसे विधिपूर्वक विवश किया जा सके, या पूर्वोक्त न्यायालय या लोक सेवक के समक्ष के रूप में पेश किए जाने या उपयोग में लाएं जाने से निवारित करने के आशय से, या उस प्रयोजन के लिए उस [ दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख] को पेश करने को उसे विधिपूर्वक समनित या अपेक्षित किए जाने के पश्चात् ऐसी सम्पूर्ण दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को, या उसके किसी भाग को मिटाएगा या ऐसा बनाएगा, जो पढ़ा न जा सके, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक ही हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
(C) धारा 477 भा० द० वि० - विल, दत्तक ग्रहण, प्राधिकार-पत्र या मूल्यवान प्रतिभूति को कपटपूर्वक रद्द नष्ट आदि करना - जो कोई कपटपूर्वक या बेईमानी से, या लोक या किसी व्यक्ति को नुकसान या क्षति कारित करने के आशय से, किसी ऐसी दस्तावेज को, जो विल या पुत्र के दत्तकग्रहण करने का प्राधिकार-पत्र या कोई मूल्यवान प्रतिभूति हो, या होना तत्पर्वित हो, रद्द नष्ट रया विरूपित करेगा या रद्द, नष्ट या विरूपित करने का प्रयत्न करेगा, या छिपाएगा या छिपाने का प्रयत्न करेगा या ऐसी दस्तावेज के विषय में रिष्टि करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
(2) धोखाधड़ी से सम्बन्धित साइबर अपराधों को भा० द० वि० की धारा 463, 465, 466, 471, 474, 776 और 477-ए के अन्तर्गत दर्ज किया जाता है ।
[A] धारा 463 भा० द० वि० - कूट रचना - [ जो कोई किसी मिथ्या दस्तावेज या मिथ्या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख अथवा दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के किसी भाग को इस आशय से रचता है। कि लोक को या किसी व्यक्ति को नुकसान या क्षति कारित की जाए या किसी दावे या हक का समर्थन किया जाए, या यह कारित किया जाए कि कोई व्यक्ति संपत्ति अलग करे या कोई अभिव्यक्त याविवक्षीत संविदा करे या इस आशय से रचना है कि कपट करे, या कपट किया जा सके, वह कूट रचना करता है ।
[B] धारा 465 भा० द० वि० कूटरचना के लिए दण्ड - जो कोई कूटरचनाकरेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
[C] धारा 466 भा० द० वि० - न्यायालय के अभिलेख की लोक रजिस्टर आदि की कूट रचना - [ जो कोई ऐसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की] जिसका कि किसी न्यायालय का या न्यायालय में अभिलेख या कार्यवाही होना, या जन्म, बप्तिस्मा विवाह या अन्त्येष्टि का रजिस्टर, या लोक सेवक द्वारा लोक सेवक के नाते रखा गया रजिस्टर होना तात्पर्वित हो, अथवा किसी प्रमाणपत्र की या ऐसी दस्तावेज की जिसके बारे में यह तात्पर्यिक हो कि वह किसी लोक सेवक द्वारा उसकी पदीय हैसियत में रची गई है, या जो किसी वाद को संस्थित करने या वाद में प्रतिरक्षा करने का, उसमें कोई कार्यवाही करने का, या दावा सस्वीकृत कर लेने का, प्राधिकार हो या कोई मुख्तारनामा हो, कूटरचना करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा ।
[स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए “रजिस्टर" में कोई सूची आँकड़ा या किसी प्रविष्टि का अभिलेख शामिल है, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखा गया है, जैसे कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (द) में परिभाषित है।
(D) घरा 471 भा० द० वि० कूटरचित दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख] असली के रूप में अयोग में लाना - जो कोई किसी ऐसी | दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख] को, जिसकी बारे में वह यह जानता या विश्वास करने का कारण रखता हो, कि वह कूटरचित दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख है। है, कपटपूर्वक या बेईमानी से असली के रूप में उपयोग में लाएगा, वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने ऐसी दस्तावेज या. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख] की कूटरचना की हो ।
(E) धारा 474 भा० द० वि० - धारा 466 या 467 में वर्णित दस्तावेज को, उसे कूटरचित जानते हुए और उसे असली के रूप में उपयोग में लाने का आशय रखते हुए कब्जे में रखना - [जो कोई किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को, उसे कूटरचित जानते हुए और यह आशय रखते हुए कि वह कपटपूर्वक या बेईमानी स असली के रूप में उपयोग में लाई जाएगी, अपने कब्जे में रखेगा, यदि वह दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का इस संहिता का धारा 466 मतें वर्णित भांति को हो तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
(F) धारा 476 भा० द० वि०-धरा 467 में वति दस्तावेजों भिन्न दस्तावेजों के अधिप्रमाणीकरण के लिए उपयोग में लाई जाने वाली अभिलक्षण या चिन्ह की कूटकृति बनाना या कूटकृत चिन्हयुक्त पदार्थ को कब्जे में रखना - जो कोई किसी पदार्थ के ऊपर, या उसके उपादान में, किसी ऐसी अभिलक्षण या चिन्ह की, जिसे इस संहिता की धारा 467 में वर्णित दस्तावेजों से भिन्न (किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख) के अभिप्रमाणीकरण के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाता हो, कूटकृति यह आशय रखते हुए नाएगा कि वह ऐसी अभिलक्षण या ऐसे चिन्ह को, ऐसे पदार्थ पर उस समय कूटरचित की जा रही या उसके पश्चात् कूटरचित की जाने वाली [किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख] को अभिप्रमाणीकृत काआभास प्रदान करने के प्रयोजन से उपयोग में लाया जाएगा या जो ऐसे आशय से कोई ऐसा पदार्थ अपने कब्जे में रखेगा जिस पर या जिसके उपादान में ऐसी | अभिलक्षण या ऐसे चिन्ह की कूटकृति बनाई गई हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
(F) धारा 476 भा० द० वि०-धारा 467 मे वर्णित दस्तावेजों से भिन्न दस्तावेजों के अधिप्रमाणीकरण के लिए उपयोग में लाई जाने वाली अभिलक्षण या चिन्ह की कूटकृति बनाना या कूटकृत चिन्हयुक्त पदार्थ को कब्जे में रखना - जो कोई किसी पदार्थ के ऊपर, या उसके उपादान में, किसी ऐसी अभिलक्षणा या चिन्ह की, जिसे इस संहिता की धारा 467 में वर्णित दस्तावेजों से भिन्न (किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख) के अभिप्रमाणीकरण के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाता हो, कूटकृति यह आशय रखते हुए बनाएगा कि वह ऐसी अभिलक्षण या ऐसे चिन्ह की कूटकृति बनाई गई हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुम्राने से भी दण्डनीय होगा ।
(G) धारा 477-ए भा० द० वि० लेखा का मिथ्याकरण - जो कोई, लिपिक, आफिसर या सेवक होते हुए, या लिपिक, ऑफिसर या सेवक के नाते नियोजित होते या कार्य हुए, किसी [पुस्तक, इलेक्ट्रानिक अभिलेख, कागज, लेख | मूल्यवान प्रतिभूति या लेखा को, जो उसके नियोजक का हो या उसके नियोजक के कब्जे में हो, या जिसे उर । नियोजक के लिए या उसकी ओर से प्राप्त किया जो जानबूझकर और कपट करने के आशय से नष्ट, परिवर्तित, विकृत या मिथ्याकृत करेगा अथवा किसी ऐसी [ पुस्तक, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख कागज, लेख, मूल्यवान प्रतिभूति या लेखा में जानबूझकर और कपट करने के आशय से कोई मिथ्या प्रविष्टि करेगा या करने के लिए दुष्प्रेरण करेगा, या उसमें से या उसमें किसी तात्विक विशिष्ट का लोप या परिवर्तन करेगा या करने का दुष्प्रेरण करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ]
स्पष्टीकरण - इस धारा के अधीन किसी आरोप में, किसी विशिष्ट व्यक्ति का, जिससे कपट करना आशयित था, नाम बताए बिना या किसी विशिष्ट धनराशि का जिसके विषय में कपट किया जाना आशयित था या किसी विशिष्ट दिन का, जिस दिन अपराध किया गया था, विनिर्देश किए बिना, कपट करने के साधारण आशय का अभिकथन पर्याप्त होगा।
[3] आपराधिक न्यास भंग के साइबर मामले भा० द० वि० की धारा 405, 406, 408, 409 के तहत दर्ज किए जाते हैं।
(A) धारा 405 भा० द० वि० - आपराधिक न्यासभंग - जो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अख्त्यार किसी प्रकार अपने को न्यस्त किए जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेता है या जिस प्रकार ऐसा न्यास निर्वहन किया जाना है, उसकी विहित करने वाली विधि के किसी निर्देश का, या ऐसे न्यास के निर्वहन के बारे में उसके द्वारा की गई किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वैध संविदा का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझ कर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह "आपराधिक न्यासभंग " 'करता है।
स्पष्टीकरण 1 - जो व्यक्ति, [किसी स्थापन का नियोजक होते हुए, चाहे वह स्थापन कर्मचारी भविष्य-निधि और प्रकीर्ण उपबन्ध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) की धारा 17 अधीन छूट प्राप्त है या नहीं। तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा स्थापित भविष्य निधि या कुटुम्ब पेंशन निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी-अभिदाय की कटौती कर्मचारी को संदेय. मजदूरी में से करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसके द्वारा इस प्रकार कटौती किए गए अभिदाय की रकम उसे न्यस्त कर दी गई है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय का संदाय करने में, उक्त विधि का अतिक्रमण करके व्यतिक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निर्देश का अतिक्रमण करके उकत अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है।
स्पष्टीकरण 2 - जो व्यक्ति, नियोजक होते हुए, कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा धारित और शासित कर्मचारी राजय बीमा निगम निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से कर्मचारी-अभिदाय की कटोती करता है, उसके बारे में यह समझ जाएगा कि उसे अभिदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, जिसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय के संदाय करने में, उक्त अधिनियम का अतिक्रमण करके, व्यतिक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया जाता है।
(B) धारा 406 भा० द० वि० - आपराधिक न्यासभंग के लिए दण्ड- जो कोई आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि 'तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
(C) धारा 408 भा० द० वि० - लिपिक या सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग - जो कोई लिपिक या सेवक होते हुए, या लिपिक या सेवक के रूप में नियोजित होते हुए, इस नाते किसी प्रकार सम्पत्ति, या सम्पत्ति पर कोई भी अख्त्यार अपने में न्य और हुए, उस सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
(D) धारा 409 भा० द० वि० - लोक सेवक द्वारा या बैंकर, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंग -जो कोई लोक सेवक के नाते अथवा बैंकर, व्यापारी, फेक्टर, दलाल, अटार्नी या अभिकर्ता के रूप में अपने कारोबार के अनुक्रम में किसी प्रकार सम्पत्ति, या सम्पत्ति पर कोई भी अख्त्यार अपने को न्यस्त होते हुए उस सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
[4] कम्प्यूटर से छेड़छाड़ के साइबर अपराध भा० द० वि० की धारा 479 के तहत दर्ज किए जाते है -
(A) धारा 489 भा० द० वि०-क्षति कारित करने के आशय से सम्पत्ति-चिन्ह का बिगाड़ना - जो कोई किसी सम्पत्ति-चिन्ह को, यह आशय रखते हुए, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह तद्वारा किसी व्यक्ति को क्षति करे, किसी सम्पत्ति-चिन्ह को अपसारित करेगा, नष्ट करेगा, विरूपित करेगा या उसमें कुछ जोड़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
[5] मुद्रा / स्टैम्प्स के साइबर मामले भा० द० वि० की धारा 482, 483, 483, 488, 489, 489 सी के तहत दर्ज किए जाते हैं।
(A) धारा 482 भा० द० वि० - मिथ्या सम्पत्ति-चिन्ह का उपयोग करने के लिए दण्ड- जो कोई किसी मिथ्या सम्पत्ति-चिन्ह का उपयोग करेगा, जब तक कि यह साबित न कर दे कि उसने कपट करने के आशय के बिना कार्य किया है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
(B) धारा 483 भा० द० वि० अन्य व्यक्ति द्वारा उपयोग में लाए गए सम्पत्ति - चिन्ह का कूटकरण - जो कोई किसी सम्पत्ति चिन्ह का, जो किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उपयोग में लाया जाता हो, कूटकरण करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
(C) धारा 484 भा० द० वि० लोक सेवक द्वारा उपयोग में लाए गए चिन्ह का कूटकरण - जो कोई किसी सम्पत्ति चिन्ह का, जो लोक सेवक द्वारा उपयोग में लाया जाता हो, या किसी ऐसे चिन्ह का, जो लोक सेवक द्वारा उपयोग में लाया जाता हो, या किसी ऐसे चिन्ह का, जो लोक सेवक द्वारा यह द्योतन करने के लिए उपयोग में लाया जाता हो, कि कोई सम्पत्ति किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा या किसी विशिष्ट समय या स्थान पर विनिर्मित की गई है, या यह कि वह सम्पत्ति किसी विशिष्ट क्वालिटी की है या किसी ऐसे चिन्ह को उसे कूटकृत जानते हुए असली रूप में उपयोग में लाएगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास , जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
(D) धारा 488 भा० द० वि०-किसी ऐसे मिथ्या चिन्ह को उपयोग में लाने के लि दण्ड–जो कोई अन्तिम पूर्वगामी धारा द्वारा प्रतिषिद्ध किसी प्रकार से किसी ऐसे मिथ्या चिन्ह का उपयोग करेगा, जब तक कि वह यह साबित न कर दे कि उसने वह कार्य कपट के आशय के बिना किया है वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने उस धारा के विरूद्ध अपराध किया हो।
(E) धारा 489 भा० द०वि० क्षति कारित करने के आशय से सम्पत्ति चिन्ह को बिगाड़ना - जो कोई किसी सम्पत्ति चिन्ह को, यह आशय रखते हुए, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह तद्द्द्वारा किसी व्यक्ति को क्षति करे, किसी सम्पत्ति-चिन्ह को अपसारित करेगा, नष्ट करेगा, विरूपित करेगा या उसमें कुछ जोड़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के व से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
(F) धारा 489 सी, भा० द० वि० कूटरचित या कूटकृत करेंसी नोटों या बैंक नोटों को कब्जे में रखना- जो कोई किसी कूटरचित या कूटकृत करेंसी नोट या बैंक नोट को यह जानते हुए विश्वास करने का कारण रखते हुए कि वह कूटरचित या कूटकृत है और यह आशय रखते हुए कि उसे असली के रूप में उपयोग में लाए या वह असली के रूप में उपयोग में लाई जा सके, अपने कब्जे में रखेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
भारत में अपराध पुस्तिका - 2006 के अनुसार साइबर क्राइम के मामलों में वर्ष 2003 411, वर्ष 2004 में 279 तथा वर्ष 2005 में 302 मामले भा० द० वि० ( I.P.C.) 2005 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किए गए हैं। वर्ष 2004 एवं 2005 में आई० पी० सी० • में दर्ज साइबर क्राइम के सर्वाधिक मामले गुजरात राज्य दर्ज किए गए। साइबर क्राइम के मामलों को आई० टी० एक्ट की बजाय आई० पी० सी० के तहत दर्ज करने का मुख्य कारण आई० टी० एक्ट की जानकारी का अभाव होना है। आई० पी० सी० के तहत अभियोग दर्ज करने में कोई गलती नहीं है लेकिन आई० टी० एक्ट की धारायें ज्यादा सुसंगत हैं ।
सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम, 2000 (I.T. Act. 2000) के लागू होने वे साथ ही भारतीय दण्ड विधान, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की निम्न धाराओं में संशोधन किया गया है, जिसका विवरण विस्तार से दिया जा रहा है-
भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में संशोधन
1. धारा 29 के पश्चात् निम्न धारायें अन्तः स्थापित की जायेंगी-
29 (अ) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड - शब्द इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड सूचना तकनीकी अधिनियम, 2000 की धारा के उपधारा (1) के खण्ड (न) में समनुदेशित अर्थों में होगा।
2. धारा 167 में शब्द “सेसे लोक सेकवक” से किसी दस्तावेज का तैयार किया जाना या भाषान्तरण उस दस्तावेज का बनाया जाना तथा भाषान्तरण आरोपित होगा शब्द “ऐसा लोक सेवक किसी दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का बनाया जाना अथवा उस अभिलेख अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का भाषान्तरण आरोपित है।"
3. धारा में शब्द न्यायालय में किसी दस्तावेज का पेश किए 172 जाने के लिए शब्द न्यायालय में किसी दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड का पेश किया जाना प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
4. धारा 173 में शब्द न्यायालय में किसी दस्तावेज का पेश करने के लिए शब्द न्यायालय में किसी दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के पेश करने से है ।
5. धारा 175 में शब्द दस्तावेज के लिए सभी स्थानों पर शब्द दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
6. धारा 192 में शब्द “किसी पुस्तिका अथवा रिकार्ड में मिथ्या प्रविष्टि करना अथवा मिथ्या कथन अन्तर्विष्ट करने वाले दस्तावेज का बनाने के लिए शब्द किसी पुस्तिका अभिलेख अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड में मिथ्या प्रविष्टि करना अथवा मिथ्या कथन अन्तर्विष्ट करने वाले किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड को बनाना प्रतिस्थापित किया जायेगा । ”
7. धारा 204 में शब्द “ दस्तावेज" के लिए सभी स्थानों पर जहाँ " दस्तावेज” अथवा “इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड” प्रतिस्थापित किया जायेगा।
8. धारा 463 में शब्द "जो कोई मिथ्या दस्तावेज को या उसके किसी भाग को नुकसान पर क्षति करने के आशय से बनाता है" के लिए शब्द “जो कोई मिथ्या दस्तावेज अथवा मिथ्या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड अथवा दस्तावेज के या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के किसी भाग को क्षति नुकसान कारित करने के आशय से बनाता है” प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
9. धारा 464 में-
(क) उस अंश के लिए जो कि निम्न शब्दों से प्रारम्भ होते हैं " उस व्यक्ति के बारे में यह कहा जाता है कि वह व्यक्ति मिथ्या दस्तावेज रचता है” और निम्न शब्दों से समाप्त होता है “प्रवंचना के कारण जो उससे की गयी जनता नहीं है, कि उस दस्तावेज का सार क्या" है अथवा बदलाव की प्रवृत्ति क्या है ? के स्थान पर निम्नलिखित को प्रतिस्थापित किया जायेगा-
उस व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि वह व्यक्ति मिथ्या दस्तावेज अथवा मिथ्या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड बनाता है-
पहला - जो बेईमानी से या कपटपूर्वक-
(क) दस्तावेज अथवा दस्तावेज के किसी भाग को रचित, हस्ताक्षरित, मुद्रांकित अथवा निष्पादित करता है।
(ख) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के किसी भाग को बनाता या पारेषित करता है ।
(ग) किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड पर अंगूठे के हस्ताक्षर करता है।
(घ) दस्तावेज या अंगूठे के हस्ताक्षर की प्रमाणिकता के लिए दस्तावेज का द्योतन करने वाला कोई चिन्ह लगाता है।
कि यह विश्वास किया जायेगा कि ऐसे दस्तावेज या दस्तावेज का भाग, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की रचना, हस्ताक्षर, मुद्राकरण या निष्पादन पारेषण ऐसे व्यक्ति द्वारा या ऐसे व्यक्ति- के प्राधिकार द्वारा किया गया था जिसके द्वारा या जिसके प्राधिकार के द्वारा उसकी रचना हस्ताक्षरण मुद्राकरण या निष्पादन होने की बात वह जानता था ।
दूसरा- जो किसी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के किसी तात्विक भाग में परिवर्तन उसके द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा चाहे ऐसा व्यक्ति परिवर्तन के समय जीवि हो या नहीं उस दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के रचित निष्पादित किये जाने के पश्चात् उसे रद्द करने के द्वारा या अन्यथा विधिपूर्वक प्राधिकार के बिना बेईमानी या कपटपूर्वक करता है, अथवा
तीसरा- जो किसी व्यक्ति द्वारा जानते हुए कि ऐसा व्यक्ति किसी दस्तावेज अथवा किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की विषय वस्तु को परिवर्तन के रूप को चित्तविकृति या मत्तता की हालत में होने के कारण जान नहीं सकता या उस प्रवचन के कारण जो उससे की गयी है जानता नहीं उस दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड का बेईमानी से या कपटपूर्वक हस्ताक्षरित, मुद्रांकित, निष्पादित या परिवर्तित किया जाना कारित करता है।
(ब) स्पष्टीकरण 2 के पश्चात् निम्न स्पष्टीकरण अतः स्थापित किये जायेंगे । स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए अभिव्यक्ति " अंगूठे का निशान लगाना, सूचना तकनीक अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (घ) के अर्थों में समनुदेशित होगा । "
10. धारा 466 में-
(क) शब्द "जो कोई किसी दस्तावेज की कूट रचना" के स्थान पर शब्द "जो कोई किसी दस्तावेज या किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की कूटरचना", प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
(ख) अन्त में निम्न स्पष्टीकरण अन्तःस्थापित किये जायेंगे ।
स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए " रजिस्टर" किसी सूची, विषय वस्तु अथवा सूचना तकनीक अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा की (1) के खण्ड (द) के रूप में परिभाषित इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में वर्णित प्रविष्टियों को सम्मिलित करता है ।
11. धारा 468 में - शब्द “ दस्तावेज" की कूट रचना के स्थान शब्द “ दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड” की कूट रचना प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
12. धारा 469 में - शब्द "इस आशय से दस्तावेज" की कूट रचना के स्थान पर शब्द “इस आशय से दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड" की कूट रचना प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
13. धारा 470 में - शब्द “ दस्तावेज” सभी स्थानों पर जहाँ भी यह प्रयुक्त हुआ है के स्थान पर शब्द “ दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड" प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
14. धारा 471 में - शब्द “ दस्तावेज” जहाँ भी प्रयुक्त है के स्थान पर शब्द “ दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड” प्रतिस्थापित किया जायेगा।
15. धारा 474 में - शब्द "जो कोई किसी दस्तावेज को अपने कब्जे में रखता है" होने वाले भाग और शब्द “यदि दस्तावेज इस संहिता की धारा 466 में वर्णित शुरू सविस्तारों में से एक है” से समाप्त होने वाले भाग के लिए निम्न शब्द-
“जो कोई किसी दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड को उसे कूट रचित यह जानते हुए और आशय रखते हुए कि यह कपटपूर्वक या बेईमानी से असली के रूप में उपयोग में लायी जायेगी अपने कब्जे में रखेगा यदि वह दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड इस संहिता की धारा 466 में वर्णित प्रकारों में से एक है" प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
16. धारा 467 में - शब्द "किसी दस्तावेज” के लिए शब्द "कोई दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड" प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
17. धारा 477 - अ में - शब्दों "पुस्तिका कागज, लिखित " सभी स्थानों जहाँ भी वे प्रयुक्त हो के लिए शब्द “पुस्तिका, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड कागज, लिखित", को प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में संशोधन
1. धारा 3 में-
(क) साक्ष्य की परिभाषा में शब्दों "न्यायालय के निरीक्षण के लिए सभी दस्तावेजों का पेश किया जाना” के लिए शब्द “न्यायालय के निरीक्षण के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड सहित सभी दस्तावेजों का पेश किया जाना" प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
(ख) “भारत” की परिभाषा के वाद निम्न को अन्तः स्थापित किया जायेगा-
अभिव्यक्तियों “प्रमाणन प्राधिकारी” अंगूठे के हस्ताक्षर का प्रमाणपत्र, इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, सूचना, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की सुरक्षा अंगूठे के हस्ताक्षर की सुरक्षा - और उपभोक्ता, को सूचना तकनीकी अधिनियमत, 2000 में समनुदेशित अर्थों में रखा जायेगा ।
2. धारा 17 में- शब्दों "मौखिक अथवा दस्तावेजी" के लिए शब्दों, “मौखिक, दस्तावेजी अथवा इलेक्ट्रॉनिक फार्म” को प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
3. धारा 22 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी—
22-अ इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की अन्तर्वस्तुओं की मौखिक स्वीकृतियाँ सुसंगत हो-इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की अन्तर्वस्तुओं की मौखिक स्वीकृतियाँ तब तक सुसंगत नहीं होती है जब तक कि पेश किये गये इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की असलियत प्रश्नगत न हों।
4. धारा 34 में - शब्दों “खाता पुस्तिका में की प्रविष्टियाँ" के लिए शब्दों "इलेक्ट्रॉनिक फार्म में की अन्तर्विष्टियों के सहित खाता पुस्तिका की प्रविष्टियों” को प्रतिस्थापित किया जायेगा।
5. धारा 35 में— शब्द " अभिलेख" के लिए सभी स्थानों पर जहाँ यह प्रयुक्त है के
लिए “अभिलेख या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख” प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
6. धारा 39 के पश्चात् निम्न धारा प्रतिस्थापित की जायेगी-
3. कौन साक्ष्य दिया जायेगा जब वार्तालाप दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख पुस्तिका अथवा पत्रों की आवली अथवा कागजातों का स्वरूप कथन के रूप में हो -
जब किसी कथन जिसका साक्ष्य दिया जाता है। कथन अथवा वार्तालाप का विस्तृत रूप हो अथवा अलग-थलग दस्तावेज का भाग हो अथवा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के भाग में अन्तर्विष्ट है अथवा,' पत्रों या कागजातों की आवली का भाग हो तब इस प्रकार दिया गया साक्ष्य कथन, वार्तालाप दस्तावेज इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, पुस्तिका अथवा पत्रों की आवली अथवा कागजात जिन्हें न्यायालय उस विशिष्ट मामले की प्रकृति और कथन का प्रभाव और परिस्थितियाँ जिनमें ये किये गये को समझने के लिए आवश्यक समझता है में कि गये कथन से अधिक नहीं है ।
7. धारा 47 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी -
47 - अ. डिजिटल हस्ताक्षर के बारे में राय कब सुसंगत हैं— जब न्यायालय किसी व्यक्ति के डिजिटल हस्ताक्षर के बारे में राय बनाना चाहता है डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र जारी करने वाले प्रमाणन प्राधिकारी की रायें सुसंगत तथ्य हैं ।
8. धारा 59 में - शब्दों " दस्तावेजों की अन्तर्वस्तयें" के लिए शब्दों " दस्तावेजों या • इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड की अर्न्तवस्तुओं" को प्रतिस्थापित किया जायेगा ।
9. धारा 65 के पश्चात् निम्न को अन्तः स्थापित किया जायेगा -
65- अ. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख से सम्बन्धित साक्ष्य के लिए विशेष उपबन्ध- • इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तुयें धारा 65-ब, के उपबन्धों के अनुसार साबित की जा सकेगी।
65-ब. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की ग्राह्यता - (1) इस अधिनियम में अर्न्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में अर्न्तविष्ट कोई सूचना जोकि कागज पर मुद्रित, अभिलिखित है, आप्टिकल की प्रतियाँ अथवा ( एतस्मिन्पश्चात् कम्प्यूटर आउटपुट के रूप में निर्दिष्ट) कम्प्यूटर द्वारा पेश मैग्नेटिक मीडिया हो भी दस्तावेज समझे जायेंगे यदि इस धारा अन्तर्विष्ट शर्तें सूचना के सम्बन्ध में सन्तोषजनक और कम्प्यूटर प्रश्नगत हैं तो ये अतिरिक्त सबूत या मूल के पेश किये बिना ही मूल की अन्तर्वस्तु अथवा उसमें कथित जिनका प्रत्यक्ष साक्ष्य ग्राह्य होगा किसी कार्यवाही में ग्राह्य होंगे।
(2) कम्प्यूटर आउअपुट के सम्बन्ध में उपधारा (1) में निर्दिष्ट शर्तें निम्नलिखित होगी-
(क) उस अवधि के दौरान जब कम्प्यूटर नियमित रूप से उपयोग में लाया गया था कम्प्यूटर द्वारा सूचना अन्तर्विष्ट करने वाला पेश किया गया कम्प्यूटर आउटपुट रखा जायेगा अथवा उस अवधि के दौरान कम्प्यूटर के उपयोग पर विधिपूर्ण प्राधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा नियमित रूप से की गयी कार्यवाहियों के प्रयोजन के लिए सूचना की प्रक्रिया होगी।
(ख) कथित अवधि के दौरान सूचना के वर्ग को इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में अथवाकथित कार्यवाहियों के सामान्य अनुक्रम में कम्प्यूटर द्वारा नियमित रूप से अर्न्तविष्ट की गयी सूचना के रूप में अन्तर्विष्ट होती है ।
(ग) कथित अवधि जिसके दौरान कम्प्यूटर उचित तरीके से संचालित किया गया था के तात्विक भाग अथवा यदि ऐसा नहीं है तो तब किसी अवधि के सम्बन्ध में जब यह उचित तरीके से संचालित नहीं किया गया था अथवा उस अवधि के किसी भाग में संक्रिया से परे था इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड अथवा अर्न्तवस्तु की शुद्धता के रूप में प्रभावी नहीं था ।
(घ) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड में अन्तर्विष्ट सूचना पुनः पेश की जाती है अथवा कथित कार्यवाहियों के सामान्य अनुक्रम में कम्प्यूटर में फीड ऐसी सूचना का स्वरूप होती है।
(3) जहाँ किसी अवधि में संचयन की कार्यवाही अथवा किसी कार्यवाही के प्रयोजन के लिए दी गयी सूचना उपधारा के खण्ड (क) में अर्न्तविष्ट नियमित कार्यवाहियाँ कम्प्यूटर द्वारा नियमित रूप से पालन की गयी थी चाहे-
(क) उस सम्पूर्ण अवधि में कम्प्यूटर के संचालन के संयोग द्वारा, अथवा
(ख) उस सम्पूर्ण अवधि में विभिन्न कम्प्यूटरों के संचालन के क्रम में, अथवा
(ग) उस अवधि में कम्प्यूटर के विभिन्न संयोगों, अथवा
(घ) उस अवधि के दौरान पश्चातवर्ती संक्रिया अन्तर्विष्ट करने वाले किसी ढंग जो कि एक या अधिक कम्प्यूटरों के क्रम अथवा एक या अधिक कम्प्यूटरों के संयोग के क्रम में हों,
उस अवधि के दौरान प्रयुक्त सभी कम्प्यूटर इस धारा के प्रयोजन के लिए एकल कम्प्यूटर गठित करने वाले के रूप व्यवहत किये जायेंगे और इस धारा के सन्दर्भ में कम्प्यूटरों को तदनुसार व्याख्या की जायेगी।
(4) किसी कार्यवाही में जहाँ इस धारा के आधार पर साक्ष्य में किसी कथन का दिया जाना इच्छित है निम्न चीजों को करने वाला कोई प्रमाण पत्र-
(क) कथन को अन्तर्विष्ट करने वाला इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और जिसमें यह पेश किया गया था उसे वर्णित करने वाले ढंग के प्रमाणन,
(ख) इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड के पेश किये जाने में अर्न्तग्रस्त मुक्ति की ऐसी विशिष्टियाँ देगा जो यह दर्शित करने के प्रयोजन के लिए कि इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड कम्प्यूटर द्वारा पेश
किया गया के लिए पर्याप्त हो सकेंगी,
(ग) किसी मामले जिनकी शर्तें उपधारा (2) में वर्णित होंगी और सुसंगत युक्ति की संक्रिया के सम्बन्ध में युक्तियुक्त पदीय स्थित धारणा करने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यिक होंगी अथवा सुसंगत कार्यवाहियाँ (जो कि समुचित) होंगी प्रमाणपत्र में कथित मामले के सम्बन्ध में साक्ष्य होंगी और इस उपधारा के प्रयोजन के लिए इसे करने वाले. व्यक्ति द्वारा मामले के कथन के लिए अच्छे ज्ञान और विश्वास के लिए पर्याप्त होगा ।
(5) इस धारा के प्रयोजन के लिए- (क) सूचना कम्प्यूटर को दिये जाने के पश्चात् ली जायेगी यदि यह उचित स्वरूप में दी गयी और चाहे यह प्रत्यक्ष रूप से (मानव हस्तक्षेप के सहित या रहित) उचित उपस्कर द्वारा दी गयी है,
(ख) किसी पदीय कार्यवाहियों के अनुक्रम में यदि सूचना कम्प्यूटर द्वारा की उन कार्यवाहियों के अनुक्रम में भण्डारित या धारित करने में प्रयोजन से दी जाती है और उन कार्यवाहियों से भिन्न क्रियाशील की जाती है तो यदि वह सूचना कम्प्यूटर को सम्यक् रूप में आपूर्ति की गयी है तो वह उन कार्यवाहयों के अनुक्रम में आपूर्ति की गयी समझी जायेगी,
(ग) कम्प्यूटर आउटपुट कम्प्यूटर द्वारा किया जायेगा चाहे यह इसके द्वारा प्रत्यक्ष अथवा (मानव हस्तक्षेप के सहित या रहित) समुचित उपस्कर द्वारा दी गयी हो ।
स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए सूचना से सम्बन्धित कोई निर्देश इस निर्देश के सम्बन्धित अन्य सूचना से क्रियाशील होगी।
67-अ. डिजिटल हस्ताक्षर का सबूत - सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर के सिवाय यदि किसी उपभोक्ता का डिजिटल हस्ताक्षर इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख पर किया जाता है तो तथ्य यह है कि ऐसा डिजिटल हस्ताक्षर उपभोक्ता का डिजिटल हस्ताक्षर आवश्यक रूप से साबित किया जायेगा ।
11. धारा 73 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी-
73-अ. डिजिटल हस्ताक्षर के सत्यापन का सबूत- यह अभिनिश्चित करने के क्रम में कि डिजिटल हस्ताक्षर उस व्यक्ति के हैं जिसके द्वारा किया जाना तात्पर्यिक है तो न्यायालय निर्देश कर सकेगी कि
(क) वह व्यक्ति अथवा कन्ट्रोलर अथवा प्रमाणन प्राधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर पेश कर,
(ख) कोई अन्य व्यक्ति डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र में सूचीबद्ध लोक कुंजी के लिए आवेदन करेगा और उस व्यक्ति द्वारा तात्पर्यित डिजिटल हस्ताक्षर को सत्यापित करेगा ।
स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए कन्ट्रोलर से आशय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त कन्ट्रोलर से है ।
12. धारा 81 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी -
81 - अ. इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में गजट के बारे में उपधारणा – न्यायालय हर ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा जिसका शासकीय गजट या इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड जिसका किसी व्यक्ति द्वारा किसी विधि के निदेश में रखा जाना तात्पति है यदि ऐसा इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड विधि द्वारा आपेक्षित पश्चातवर्ती स्वरूप में रखा जाता है और उचित अभिरक्षा से पेश किया जाता है ।
13. धारा 85 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी-
85-अ. इलेक्ट्रॉनिक करारों के बारे में उपधारणा - न्यायालय उपधारित कर सकेगा कि प्रत्येक इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख पक्षकारों को डिजिटल हस्ताक्षर अन्तर्विष्ट करने वाले कर के रूप में तात्पयित है जो पक्षकारों के हस्ताक्षर किये जाने के द्वारा किया गया था ।
85-ब. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों और डिजिटल हस्ताक्षरों के बारे में उपधारणा- (1) सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में अर्न्तग्रस्त किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में जब तक प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता न्यायालय उपधारित करेगा कि सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख विशिष्ट समय बिन्दु जो कि सुरक्षित स्तर से सम्बन्धित है तक परिवर्तित नहीं किया जा सकता हैं।
(2) डिजिटल हस्ताक्षर अर्न्तग्रस्त करने वाली किसी कार्यवाही में जब तक प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता न्यायालय उपधारित करेगी कि – (क) उपभोक्ता द्वारा सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के साबित करने और हस्ताक्षर करने के प्रयोजन से किया जाता।
(ख) सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख और सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर के सिवाय इस धारा की कोई भी बात इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख अथवा डिजिटल हस्ताक्षर की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता से सम्बन्धित नहीं है ।
85-स. डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र के बारे में उपधारणा - जब तक कि प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता न्यायालय यह उपधारित करेगा कि उपभोक्ता की सूचना के रूप में विनिर्दिष्ट सूचना जो कि सत्यापित नहीं है के सिवाय डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र में सूचीबद्ध सूचना सही है यदि प्रमाण पत्र उपभोक्ता द्वारा स्वीकार किया गया था ।
14. धारा 88 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी-
88 - अ. इलेक्ट्रॉनिक सन्देश के रूप में उपधारणा - न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि उत्पादक द्वारा इलेक्ट्रॉनिक मेल सखेयर के माध्यम से सम्बोधिती जिसे सन्देश पारेषण के लिए उसके कम्प्यूटर में फीड़ सन्देश के समवर्ती सम्बोधिती होना तात्पयित है इलेक्ट्रॉनिक सन्देश द्वारा भेजा गया था लेकिन न्यायालय उस व्यक्ति के बारे में जिसे ऐसा सन्देश भेजा गया था कोई उपधारणा नहीं करेगा।
स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजन के लिए अभिव्यक्ति " सम्बोधिती" और " उत्पादक" सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की उपधारा (1) के खण्ड (i) और (za) में 2000 समनुदेशन के सम्बन्ध में समान अर्थ रखते हैं।
15. धारा 90 के पश्चात् निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी-
90 - अ. पाँच वर्ष पुराने दस्तावेज के रूप में उपधारणा - जहाँ कोई इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख पाँच वर्ष पुराने दस्तावेज के रूप में साबित और तात्पर्यिक है, और किसी की अभिरक्षा से पेश किया जाता है, जिसे न्यायालय विशिष्ट मामले में उचित विचारित करता है तो न्यायालय उपधारित कर सकेगा कि डिजिटल हस्ताक्षर जो किसी विशिष्ट को डिजिटल . हस्ताक्षर के रूप में तात्पर्यित है वह उसके या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किया गया था।
स्पष्टीकरण - इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख उचित अभिरक्षा में कहा जाता है यदि वे ऐसे. स्थान और ऐसे व्यक्ति जिसके वे हैं कि देख-रेख में है। लेकिन कोई अभिरक्षा अनुचित नहीं है यदि इसकी उत्पत्ति वैध साबित है अथवा मामले की विशिष्ट परिस्थितियों में ऐसी उत्पत्ति सम्भाव्य है।
यह स्पष्टीकरण धारा 81-क को भी लागू होता है।
16. धारा 131 के लिए निम्न धारा अन्तः स्थापित की जायेगी-
131- उन दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों का पेश किया जाना जिन्हें कोई दूसरा व्यक्ति जिन पर उसका कब्जा है पेश करने से इंकार कर सकता था-कोई भी व्यक्ति अपने कब्ज़े ऐसे दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को पेश करने के लिए जिनको पेश करने से कोई अन्य व्यक्ति यदि ये उसके कब्जे में होती इंकार करने का हकदार होता विवश नहीं किया जायेगा जब तक कि ऐसा अंतिम वर्णित व्यक्ति उनके पेश करने की सम्मति नहीं देता।
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