रविवार, 25 जून 2023

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 
(Indian Information Technology Act, 2000)

भारत में इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को रोजमर्रा की जिन्दगी में वैधता प्रदान करने तथा साइबर अपराधों से निपटने के लिए वर्ष 2000 में सूचना तकनीकी अधिनियम 2000 के नाम से एक नया कानून बनाया गया है। भारत इस प्रकार का कानून बनाने वाला एशिया में सिंगापुर के बाद दूसरा राष्ट्र बन गया है। इस एक्ट की प्रमुख प्रचलित धाराएँ निम्न हैं-

1. आई० टी० एक्ट की धारा-65 के तहत सोर्स कोड के मामले दर्ज होते हैं । 

2. आई० टी० एक्ट की धारा-66 के तहत हैकिंग सम्बन्धी अपराध दर्ज होते हैं।

3. आई० टी० एक्ट की धारा-67 के तहत पोर्नाग्राफी मैटिरियल सम्बन्धी अपराध दर्ज होते हैं ।

धारा-65 कम्प्यूटर स्त्रोत दस्तावेज के साथ अन्तर्गत छेड़छाड़ करना - इस धारा के. कोई भी व्यक्ति जानबूझकर या साशय कम्प्यूटर, कम्प्यूटर प्रोग्राम, कम्प्यूटर सिस्टम, कम्प्यूटर नेटवर्क के लिए प्रयुक्त कम्प्यूटर स्त्रोत कोड को छिपायेगा, नष्ट करेगा या परिवर्तित करेगा या छिपाने, नष्ट करने या परिवर्तित करने के लिए कोई कार्य करेगा, जबकि ऐसे कम्प्यूटर स्त्रोत को विधि द्वारा समय पर व्यवस्थित बनाए रखना अपेक्षित है, इस धारा के अन्तर्गत वह साइबर अपराधी होगा। इस धारा के तहत अपराधी को तीन वर्ष तक की कैद अथवा 2 लाख रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान है ।

धारा - 66 हैंकिंग- इस धारा के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति साशय अथवा यह जानकार कि वह जनता या किसी व्यक्ति को सदोष नुकसार या क्षति करेगा कम्प्यूटर स्त्रोत में स्थित किसी सूचना को नष्ट करता है, हटाता है अथवा परिवर्तित करता है अथवा इसके मूल्य या उपयोगिता को नष्ट करता है या किसी साधन से क्षतिग्रस्त करता है वह हैकिंग का अपराधी है। इस धारा के अन्तर्गत हैकिंग करने वाले को 3 वर्ष तक के कारावास या जुर्माना जो 2 लाख रुपये तक हो समता है अथवा दोनों सजा का प्रावधान है ।

धारा-67. अश्लील सूचनाओं का प्रकाशन एवं विस्तारण - इस धारा के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो तकनीकी स्वरूप वाली कोई भी वस्तु जो कि कामुकता के हित के लिए ध्यान आकृष्ट करता है अथवा यदि इसका प्रभाव ऐसा है जो कि सभी सुसंगत परिस्थिति में बिगाड़ने वाला है को प्रकाशित, प्रसारित करता है, पढ़ता है, देखता है या सुनता 1. अथवा इन्हें साकार रूप देता है, तो वह इस धारा के अन्तर्गत प्रथम प्रयास के अपराध पर 5 वर्ष तक की कैद अथवा 1 लाख रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनो सजा का प्रावधान है। ऐसा अपराध पुनः करने पर 10 साल का कारावास और 5 लाख जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान भी किया गया है ।

धारा-72. इस धारा के तहत जब कोई व्यक्ति किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, पत्राचार, सूचनाओं, प्रपत्रों को गैर-कानूनी / अनाधिकृत ढंग से पढ़ेगा / संचारित करेगा अथवा अन्य किसी भी ऐसी गतिविधियों में संलग्न होगा तो उसे 2 वर्ष तक की सजा अथवा एक लाख रुपये जुर्माना या दोनों भी हो सकते हैं ।

धारा-74. इस धारा के तहत गैर कानूनी कार्यों के लिए किसी व्यक्ति के डिजिटल हस्ताक्षर अन्य व्यक्तियों को उपलब्ध को करवाना दण्डनीय साइबर अपराध है। इसके लिए साइबर अपराधी को 2 वर्ष तक के कारावास या 1 लाख रूपये जुर्माना अथवा दोनों प्रकार के दण्ड निर्धारित हैं।

धारा- 75. भारत से बाहर किये अपराधों अथवा उल्लंघन के लिए अधिनियम का लागू होना- इस धारा के अनुसार यह अधिनियम विदेशों में रहने वाले उन व्यक्तियों पर भी लागू होगा जिन्होंने भारत में कम्प्यूटर, कम्प्यूटर सिस्टम और नेटवर्क को क्षति पहुँचायी है । 

धारा- 78. अपराधों के अन्वेषण की शक्ति - इस धारा के अन्तर्गत साइबर अपराध की विवेचना की जिम्मेदारी पुलिस उपाधीक्षक या उससे ऊपर के अधिकारी को दी गयी है। 

धारा- 80. खोज आदि के लिए प्रवेश के लिए पुलिस अधिकारी और अन्य अधिकारियों की शक्ति - दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए कोई भी पुलिस अधिकारी जो कि पुलिस अधीक्षक से नीचे के स्तर का अधिकारी हो अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत केन्द्र सरकार या राज्य सरकार का कोई अधिकारी . किसी सार्वजनिक स्थान में प्रवेश कर सकेगा और वहाँ पाए गए किसी व्यक्ति जिसके बारे में युक्ति युक्त रूप यह संदेह है कि उसने इस अधिनियम के अधीन अपराध किया है, कर रहा है, करने वाला है, को वारन्ट के बिना गिरफ्तार कर सकेगा ।

भारत के आईटी एक्ट 2000 के अन्तर्गत प्रमुख अपराध, धाराएँ एवं दण्ड

धारा 65, कम्प्यूटर के सोर्स डाक्यूमेंट के साथ छेड़छाड़। 
तीन वर्ष तक की कैद या 2 लाख रुपये जुर्माना या कैद और जुर्माना दोनों

धारा 66, हैकिंग, 
पाँच वर्ष तक की कैद एवं 1 लाख रुपये का जुर्माना या कैद और जुर्माना दोनों

धारा 67, अश्लील साहित्य का प्रकाशन एवं इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से वितरण।
पाँच वर्ष तक की कैद एवं 1 लाख रुपये तक जुर्माना, द्वितीय प्रयास में इसमें 10 वर्ष की सजा एवं 2 लाख रुपये तक जुर्माना कैद या दोनों

धारा 72, विश्वसनीयता एवं निजता उल्लंघन, २ वर्ष तक की सजा या 1 लाख रुपये तक जुर्माना या दोनों

धारा 74, डिजिटल हस्ताक्षरों सम्बन्धी जालसाजी, 
2 वर्ष तक की सजा या 1 लाख रुपये तक जुर्माना

निष्प्रभावी वर्तमान साइबर कानून

साइबर अपराधों के रूप में हमारे समाज को एक ऐसे खतरे का सामना करना पड़ रहा है, जिससे निपटने के लिए न तो पर्याप्त कानून हैं, न तफ्तीश की उचित तकनीक और लागू करने वाले प्रशिक्षित लोग। दिल्ली के छात्रों का मामला तो संयोग से प्रकाश में आ गया। उनकी अश्लील हरकतों को यदि वेबसाइट पर खरीद-फरोख्त के लिए नहीं रखा गया होता, तो शायद ही यह मामला सबके सामने आ पाता। अपराधियों को इसमें गोपनीयता का सुरक्षा कवच स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, जिसे भेदना अत्यन्त कठिन होता है। वे न केवल अश्लील सूचनाओं का संगठित व्यापार कर रहे हैं, बल्कि धड़ल्ले से दूसरों बैंक खातों के रुपये भी उड़ा रहे हैं और इस तरह के दूसरे अन्य अपराध कर रहे हैं, जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को रोजमर्रा की जिन्दगी में वैधता देने तथा साइबर अपराधों से निबटने के लिए वर्ष 2000 में सूचना तकनीक कानून (इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000) के नाम से एक नया कानून बनाया गया। यह मुख्यतः ई-कॉमर्स के इधर-उधर घूमता है।

सूचना तकनीक एक्ट 2000 की धारा 67 में उपबन्धित किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति अश्लील सामग्री को इलेक्ट्रॉनिक संदेशों के माध्यम से प्रकाशित करता या भेजता है या ऐसा करने की अनुमति देता है तो पहली बार दोषी पाये जाने पर 5 वर्ष की कैद एवं लाख रुपए जुर्माना या दोनों, पुनः दूसरी बार 01 दोषी पाए जाने पर दस साल तक के कारावास और दो लाख रुपये तक के अर्थदण्ड से दण्डित किया जा सकेगा। चूँकि इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रकाशन के मामले में कई बार उसके मालिक को सभी दृश्यों की व्यक्तिगत जानकारी करना असम्भव सा हो जाता है इसलिए सूचना तकनीक एक्ट की धारा 79 में विशेष उपबन्ध किया गया है। उसमें कहा गया है कि यदि किसी नेटवर्क का संचालक यह साबित कर देता है कि उसके नेटवर्क पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रसारित की गई सामग्री की विषय वस्तु के बारे में उसे जानकारी नहीं थी या उसने उसे रोकने के लिए उचित एहतियात बरता था तो उसे अपराधी नहीं माना जाएगा।

सूचना तकनीक की धारा 79 को उपबन्धित करने के पीछे एक व्यावहारिक कारण है। सूचना तकनीक के इस युग में व्यवसायिक वेबसाइट रखने वाले लोगों के लिए कई बार यह व्यवहारिक नहीं होता कि वे उन सभी सूचनाओं के बारे में जानकारी रख सकें जो उनकी वेबसाइट के माध्यम से अन्य लोगों तक प्रसारित होती रहती है। एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी व्यक्ति की सहमति के बगैर उसकी फिल्म बनाने का अधिकार है ? सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के साथ इस तरह के उपकरण आम आदमी की पहुँच के अन्दर आते जा रहे हैं और तब उनके दुरूपयोग की सम्भावना और बढ़ जाती है । सभ्य समाज में हर व्यक्ति को अपनी प्राइवेसी को सुरक्षित रखने का अधिकार है। कुछ समय पहले सुरक्षा एजेन्सियों ने कुछ महत्वपूर्ण लोगों की फोन पर हुई बातचीत को उनकी अनुमति के बगैर टेप किया था। इसे अदालत में चुनौती दी गयी। 'पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज' बनाम भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 22 के अन्तर्गत उपलब्ध एकांतता के अधिकार का उल्लंघन माना और निर्देश दिया कि यदि राष्ट्र की सुरक्षा या कानून व्यवस्था के हित में ऐसा करना जरूरी तो वह सचित स्तर के अधिकारी की पूर्व अनुमति से ही किया जा सकता है। कुछ कानूनों में इस अधिकार के दुरूपयोग को रोकने का पुख्ता इंतजाम हैं। एक यह कि ऐसा केवल तभी किया जा सकता है जब उन्हें टेप करना राष्ट्रहित में जरूरी हो। दूसरा यह कि इस अधिकार का उपयोग करने से पहले नियत प्राधिकारी की अनुमति जरूरी है तथा तीसरा यह कि इस तरह की सूचनाओं को रखने वाला व्यक्ति उन्हें सार्वजनिक नहीं करेगा और यदि वह ऐसा करता है तो उसे सूचना तकनीक एक्ट 2000 की धारा 72 के अन्तर्गत दो साल तक के कारावास या एक लाख रुपये के अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा। यह आश्चर्यजनक है कि सरकारी एजेन्सियों द्वारा प्राप्त इस तरह की गोपनीय इलेक्ट्रॉनिक सूचनाओं के दुरूपयोग को रोकने के लिए कानून में पर्याप्त व्यवस्था की गयी है, लेकिन आम आदमी द्वारा किए जाने वाले इस तरह के कृत्यों को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया हैं ।

कानून का उल्लंघन करने वाला विश्व के जिस भी कोने में हो, उसे सूचना तकनीक एक्ट, 2000 के तहत दोषी माने जाने का प्रावधान किया गया। इसमें जुड़े दीवानी मुकदमों को सामान्य न्यायालयों से बाहर करके उनके निपटारे के लिए अलग एजेन्सी का गठन किया गया। उन्हें मुआवजे के अलावा एक करोड़ रुपये तक के अर्थदण्ड देने का अधिकार दिया गया । तफ्तीश की जिम्मेदारी पुलिस उपाधीक्षक या उससे बड़े अधिकारी को दी गई। दण्ड प्रक्रिया संहिता से अलग हटकर पुलिस अधिकारियों को बगैर वारन्ट तलाशी लेने का अधिकार दिया गया। इन सकारात्मक प्रयासों के बावजूद ऐसा बहुत कुछ है, जो छूट गया है। एक्ट में साइबर अपराधों के लिए सजाएँ भी निर्धारित की गयी है लेकिन विशेषज्ञता के अभाव में अभी तक ऐसे बड़े मामले पकड़े नहीं गए हैं, जिससे अपराधियों पर अंकुश लग सके सजा होना तो दीगर बात रही ।

इस कानून में साइबर स्क्वैटिंग, साइबर मानहानि तथा नेटशॉपिंग में क्रेडिट कार्ड के दुरूपयोग साइबर आतंकवाद को रोकने के लिए पर्याप्त उपबन्ध नहीं है। साइबर स्क्वैटिंग का तात्पर्य ऐसी गतिविधि से है जिसमें किसी स्थापित कम्पनी के नाम को चुरा या अपना लिया जाता है। अभी तक इस तरह के मामलों को ट्रेड ऐंड मर्केंडाइज एक्ट, 1958 और ट्रेड मार्क्स एक्ट 1999 के तहत की दर्ज किया जाता है, जो 1999 बदली हुई परिस्थिति में कम प्रभावी है।

वर्ष 1999 में (Yahoo Inc ) ( याहू इंक) बनाम अवकाश अरोरा के मामले में प्रतिवादी इंटरनेट सम्बन्धी सेवाओं के लिए स्थापित नाम (याहू इंडिया कॉम) को प्रयोग करने का प्रयास कर रहे थे । इस मामले में स्थापित (Yahooindia.com) (याहू इंडिया कॉम) के मालिक ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि प्रतिवादी ने धोखे से उनकी वेबसाइट से मिलता जुटता नाम रख लिया है। प्रतिवादियों ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि इंडियन टेडमार्क अधिनियम के 'उपबन्ध इंटरनेट पर 'डोमेन नाम' के प्रयोग पर लागू नहीं होते है। दिल्ली हाईकोर्ट के द्वारा मामले की सुनवाई की गई। हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों के तर्कों को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि याहू एक शब्दकोश का शब्द है परन्तु अब यह शब्द उत्कर्ष को प्राप्त कर • चुका । इस निर्णय के उपरान्त भी आईटी एक्ट 2000 में इस प्रकार के साइबर क्राइम से निपटने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी है । 

क्रेडिट कार्डों के माध्यम से धोखाधड़ी की घटनाएँ दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं । अपराधी डाटाबेस में संकलित सूचनाओं में प्रवेश करके उन्हें चुराकर उसका दुरूपयोग कर लेते हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल करके टैक्स चोरी, धनशोधन और एक खाते से दू खाते में धन का गैरकानूनी हस्तांतरण हो रहा है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से जाने वाली मानहानि का प्रचलन हालांकि अभी शुरूआती दौर में है, किन्तु इससे अपूरणीय क्षति हो सकती है ।

इस कानून में अदालतों के क्षेत्राधिकार के मामले में भी कुछ व्यावहारिक दिक्कतें हैं। इसकी धारा 75 के अनुसार, विश्व के किसी कोने में बैठा ऐसा व्यक्ति जो भारत कोई क्षति कारित करता है या आईटी एक्ट का उल्लंघन करता है, तो वह इस कानून अन्तर्गत दोषी माना जाएगा। इससे जुड़ा हुआ सवाल यह है कि क्या हम दूसरे देश किसी अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकते हैं। कभी-कभार होने वाले प्रत्यर्पण के मुकदमों में अभियुक्त को भारत लाना जहाँ इतना कठिन होता है, वहाँ लाखों की तादात में अपराध करने वाले लोगों को प्रत्यार्पित करना क्या सम्भव होगा ? इसी तरह की समस्या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से किए जाने वाले करारों में भी आएगी इसलिए कानून इस कमी को दूर करना
भी जरूरी है। 

आईटी एक्ट की दो बड़ी ख़ामियाँ हैं। एक तो यह विशेष तकनीक एसीमेट्रिक क्रिप्टों सिस्टम व हैश फंक्शन को ही मान्यता देता है। जबकि किसी भी कानून को किसी विशेष तकनीक पर आधारित नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, इस कानून के डोमेन नाम, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, पेंटेंट आदि का जिक्र नहीं है और इसके उल्लंघन की स्थिति में की जाने वाली कारवाई पर स्पष्टता नहीं है। इसके अलावा इसमें इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के मुद्दे को शामिल नहीं किया गया है।

यह सही है कि आईटी कानून सही समय पर लगाया गया और भारत ने इस मामले में अपनी स्थिति समय रहते मजबूत कर ली। यह भी सही है कि इस कानून के जरिए सा अपराध पर रोक लगाने को लेकर सरकार को तमाम तरह के अधिकार दिए गए। लेकिन इसमें व्यक्तिगत गोपनीयता, बौद्धिक सम्पदा अधिकार और इलेक्ट्रॉनिक भुगतान को लेकर स्पष्टता का अभाव है। इसके अलावा आईटी एक्ट की भाषा इस तरह की है कि यह केवल भारत में नहीं बल्कि देश से बाहर किए गए किसी अपराध पर भी लागू हो सकता है। लेकिन इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख एक्ट में नहीं है। ऐसे में, जाहिर है, एक्ट में संशोधन की आवश्यकता है। इसके अलावा रोजाना प्रकाश में आ रहे नए-नए साइबर अपराधों को देखते हुए भविष्य के लिहाज से अभी से तैयारियों की जरूरत है।

इसके अलावा कुछ ऐसे अपराध भी हैं, जिनका जिक्र साइबर कानूनों में तो नहीं | किया गया है, लेकिन ये अपराध की श्रेणी में आते हैं । इन्टरनेट पर चोरी करने के जुर्म भारतीय दण्ड संहिता की धारा 415 से 420 में सजा का प्रावधान है। वहीं इन्टरनेट पर किसी को दनाम करने पर आईपीसी की धारा 499 के तहत दंडित करने की व्यवस्था है ।

साइबर अपराधों में इंटरनेट घण्टों की चोरी करने के मामले भी प्रकाश में आने लगे हैं । । सूचना तकनीक कानून में इससे निपटने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं और जानकारियों से जुड़े जोखिम भी बढ़ते जा रहे हैं । जैसे, स्वास्थ्य | सलाह देने वाले नीम हकीम । वर्ष 2000 में केवल अमेरिका में लगभग साढ़े तीन लाख साइबर नीम हकीमों को मदद ली गई थी। कैंसर, मधुमेह और हृदय रोगों के अचूक इला का दावा करने वाली लाखों वेबसाइटों की मौजूदगी से जनस्वास्थ्य की अपूरणीय क्षति हो रही है। कानूनी कमियों दूर करने के अलावा मौजूदा कानून के उपबन्धों को लागू करने की इच्छा शक्ति के विकास की भी आवश्यकता है। डिजिटल हस्ताक्षर जैसी प्रणालियों को लागू करने के लिए जरूरी ढांचा भी तैयार नहीं किया जा सका है। पुलिस में भी ऐसे प्रशिक्षित लोगों की बेहद कमी है, जो कानून की बारीकियों को समझकर मुकदमें दर्ज कर सें और उनकी तफ्तीश कर सकें । अदालतों के पीठासीन अधिकारियों की स्थित भी इ बहुत बलग नहीं है । उन्हें भी प्रतिक्षित करने तथा समाज को इस दिशा में जागरूक करने की जरूरत है।

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