बुधवार, 14 जून 2023

अपठित लेखन (PRECIS WRITING)

अपठित लेखन (PRECIS WRITING)

Write the Precis of the Following Passages-

अभ्यास 1

देश को स्वतन्त्र हुए पचास वर्ष हो चुके हैं। अर्थात् हम पाँच दशकों के काल खण्ड की अवधि को पूरा कर चुके हैं। भारत ही नहीं, किसी भी नव स्वतन्त्र एवं विकासशील देश के लिए प्रगति पथ पर अग्रसर होने हेतु अथवा अपनी राष्ट्रभाषा के उन्नयन, विकास एवं प्रसार हेतु यह अवधि कम तो नहीं है। आज जब हम आजादी के बाद पाँच दशकों का मूल्यांकन करने के लिए बीते वर्षों पर नजर डालते हैं, तो हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हमारा देश इस प्रगतिशील दुनिया में कुछ खास प्रगति नहीं कर सका। पचास वर्षो के लम्बे काल खण्ड की अवधि में हमने विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में काफी लम्बे-लम्बे रास्ते तय किये हैं और बड़ी से बड़ी ऊँचाइयों को छू लिया है, लेकिन राष्ट्रभाषा और संस्कृति के क्षेत्र में हम काफी पिछड़ गये हैं। जिसका परिणाम यह है कि हम आज भी अंग्रेजों की दासता की धरोहर अंग्रेजी भाषा को अपने देश से सम्पर्क बनाये हुए हैं।

1. शीर्षक लिखिये।

2. लेखांश लिखिये।

हल- 1. शीर्षक 'स्वतन्त्र भारत में हिन्दी' ।

2. अनेक विशेषताओं से सम्म्पन्न होने के बावजूद हमारे देश के राजनेता हिन्दी के विरोधी हैं, वे या तो जानबूझकर या राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित होकर स्वार्थवश अंग्रेजी भाषा से मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं।



अभ्यास 2

संसार में जितने भी व्यवसाय हैं उनमें सर्वाधिक स्वतन्त्र विधि व्यवसाय की यही स्वतन्त्रता वह आधारशिला है जिस पर चरण रखते हुए एक सभ्य राष्ट्र अग्रसर होता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक अधिवक्ता से यह भी आशा की जाती है कि उनमें इस प्रकार की क्षमता होनी चाहिए कि वह अन्याय एवं निरंकुशता से लोहा ले सके। ऐसा कहा जाता है कि वकील सर्वप्रथम तनाव तथा झगड़ा उत्पन्न करता है और फिर उसके निराकरण की व्यवस्था करता है, परन्तु यह कथन पूर्णरूप से सत्य नहीं है। यह भी कहा जाता है कि एक अधिवक्ता धन कमाने में वेश्या की तरह चतुर और बन्दर की तरह चालाक होता है। इस पेशे के सम्बन्ध में यदाकदा व्यक्तियों की ऐसी धारणाएँ भी व्यक्त हुई हैं कि यह पेशा ठगी और लम्पटता का पेशा है, परन्तु यदि ध्यान से देखा जाय तो यह तथ्य सम्मुख आता है कि उपरोक्त प्रकार की धारणाएँ उन्हीं व्यक्तियों द्वारा व्यक्त की गई है जो समाज में विधि के तथा अधिवक्ताओं के योगदान से परिचित नहीं हैं। एक अधिवक्ता समर्थ को संरक्षण प्रदान करता है तथा निर्बल को आतंक से बचाता है। निःसन्देह एक अधिवक्ता धन के लिए पेशा करता है। अतः पेशे से धन कमाता है और धन से परेशानियाँ। महात्मा गाँधी तक ने यह कहा है कि वकालत का पेशा झूठों का धन्धा है, परन्तु महात्मा गाँधी ने भी सदैव उचित कानून के प्रति अटूट आस्था व्यक्त की है।

1. शीर्षक लिखिये।

2. लेखांश लिखिये ।

हल- 1. शीर्षक 'विधि व्यवसाय' ।

2. एक अधिवक्ता न्यायालय के अन्दर तथा न्यायालय के बाहर विभिन्न प्रकार के मानवीय क्रिया-कलापों का केन्द्र होता है। यह एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमें ज्ञान के विधिक भाषा एवं विधिक लेखन सामान्य अंग्रेजी में निपुणता सहित साथ-साथ परिश्रम भी आवश्यक होता है। एक कुशल अधिवक्ता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह एक दृष्टा की तरह परिणामों की पूर्व कल्पना करने में सामर्थ्यवाद हो और प्रभावशाली ढंग से तथ्यों को प्रस्तुत कर सके।


अभ्यास 3

मूलतः विधि का कार्य न्याय का प्रतिष्ठापन करना है तथा सामाजिक स्वतन्त्रता को बनाये रखना। कुछ विद्वानों का मत है कि हम विधि और व्यवस्था के दास हैं जो स्वतन्त्रता प्रदान करती है। विधि बाध्यात्मक स्वरूप की होती है तथा विधि अनुसरण आचरण करना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर नहीं होती क्योंकि यदि वह विपरीत आचरण करेगा तो दण्डित किया जायेगा। "विधिक नियन्त्रण स्वतन्त्रता देते हैं।" एक विरोधाभासी कथन प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। जब तक न्यूनतम नियन्त्रण नहीं होंगे तब तक सभ्य समाज में अधिकतम स्वतन्त्रता भी नहीं हो सकती। विधि स्वतन्त्रता एवं मुक्ति प्रदायिनी संस्था है। विधि अवांछनीय शक्तियों को दाव कर वांछनीय शक्ति को उभारती है। ज्यों-ज्यों समाज जटिल होगा त्यों-त्यों विधि भी जटिल होती जायेगी। विधि का अस्तित्व विप्लव तथा जंगली प्रवृत्ति का विकल्प है।

यद्यपि सभ्य समाज के लिए विधि द्वारा प्रस्तावित अंकुश आवश्यक है फिर भी विधि के नियमों को प्रवर्तित एवं प्रतिपादित करना एक तकनीकी कार्य है जो दार्शनिक द्वारा पूरा होना चाहिए। विधियों की व्याख्या करते समय बिल्कुल विपरीत निष्कर्ष भी निकाले जा सकते हैं, यदि हम यह कल्पना करें कि विधि व्यवसाय की अनुपस्थिति में समाज में न्याय की वही व्यवस्था हो जायेगी जो राष्ट्र की हो जायेगी, यदि सेनाएँ समाप्त कर दी जायें। इस प्रकार जहाँ राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सेनाओं की आवश्यकता है, वहाँ विधि पर आधारित समाज के लिए विधि व्यवसाय तथा अधिवक्ताओं की आवश्यकता है ।

1. शीर्षक लिखिये।

2. लेखांश लिखिये।

हल-

1. शीर्षक 'विधि का योगदान'।

2. विधि व्यवसाय जीवन-यापन की पद्धति है। विधि का कार्य है कि सामाजिक हितों के संरक्षणार्थ व्यक्तिगत हितों पर अंकुश लगाये। विधि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। यदि विधि व्यवसाय को समाप्त कर दिया जाये तो परिवर्तन का माध्यम समाप्त हो जायेगा।

अभ्यास 4

कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जिनमें शारीरिक क्षति तो नहीं पहुँचती, परन्तु भावनाओं को ठेस अवश्य पहुंचती है, जिसमें कई प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। मानसिक आघात का प्रभाव शरीर पर स्पष्ट रूप से पड़ता है। मानसिक आघात से हमारा आशय उस आघात से है, जिसके कारण किसी मनुष्य को बौद्धिक एवं नैतिक भावना को चोट पहुँचती हो तथा जिससे शरीर तथा मस्तिष्क की बनावट तथा ढाँचे में प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। उदाहरण के लिए, 'अ' ने 'ब' से माँस भेजने की प्रार्थना की। 'अ' ने एक मरा हुआ चूहा माँस के स्थान पर वादी के पास भेज दिया। जिस समय वादी ने डिब्बा खोला तो उसको मानसिक आघात पहुँचा, जिसके कारण वह गम्भीर बीमारी का शिकार हो गया। इस प्रकार मानसिक आघात प्रतिवादी का ऐसा कृत्य है, जिसके द्वारा बादी की बौद्धिक तथा नैतिक भावना को चोट पहुँची है।

1. शीर्षक लिखिये।

2. लेखांश लिखिये ।

हल-

1. शीर्षक 'मानसिक आघात' ।

2. प्रत्येक क्रिया एक प्रतिक्रिया होती है। प्रत्येक कार्य के पीछे एक मानसिक चेतना की जागरूकता रहती है। मानसिक आघात की प्रतिक्रिया माँसपेशियों पर चोट पड़ने की अपेक्षा अधिक होती है।

अभ्यास 5

न्याय का आदर्श सिद्धान्त यह है कि जब किसी व्यक्ति को हानि हो या उसको पीड़ा पहुँचे तो उसको उपचार प्राप्त करने के लिए तुरन्त न्यायालय की शरण लेनी चाहिए। अनावश्यक विलम्ब से न्याय में बाधा पैदा होती है। अतः निरर्थक विलम्ब के आधार पर उच्च न्यायालय रिट जारी करने की प्रार्थना ठुकरा सकता है। इस सम्बन्ध में अनुच्छेद 226 में इस बात की स्पष्ट व्यवस्था है कि न्यायालय द्वारा अनुतोष उसी पक्ष को मिलना चाहिए जो उसके योग्य हो और उसने विलम्ब न किया हो। व्यर्थ का विलम्ब करने से साम्या का अधिकार तो समाप्त हो ही जाता है, न्यायिक प्रक्रिया में और अधिक काम बढ़ जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि किसी व्यक्ति को न्यायालय से उपचार माँगने में देरी हो जाय तो उसकी प्रार्थना निश्चित रूप से ही अस्वीकार कर दी जावेगी। यदि प्रार्थी के पास विलम्ब का उचित कारण हो और न्यायालय उस कारण सन्तुष्ट हो तो रिट जारी की जा सकती है।

1. शीर्षक लिखिये।

2. लेखांश लिखिये।

हल-

1. शीर्षक 'अति विलम्ब' ।

2. प्रार्थी को अपना अधिकार भंग होने के बाद तुरन्त विधि प्रयोग में लानी चाहिये। यदि प्रार्थी का समय अन्य कानूनी उपचार प्राप्त करने में लग गया हो तो वह विलम्ब नहीं माना जाता है।


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