बुधवार, 14 जून 2023

भारतीय न्याय-व्यवस्था में लोक अदालतों की भूमिका। निबन्ध

निबन्ध लेखन
भारतीय न्याय-व्यवस्था में लोक अदालतों की भूमिका।

भारतीय न्याय व्यवस्था में लोक अदालतों की भूमिका (Role of Lok Adalats in Indian Judical System) – यह एक महत्वपूर्ण और पुरानी कहावत है कि "विलम्ब से मिला न्याय नहीं के बराबर होता है। (Delay Demal Justice) अर्थात् विलम्ब न्याय को विफल कर देता है। न्याय वही है जो समय पर मिले। वर्तमान में स्थिति विपरीत है। न्याय में बहुत विलम्ब होने लगा है और न्याय मिल पाना अधिक खर्चीला भी हो गया है। ऐसी स्थिति में न्याय के प्रति आम व्यक्ति की आस्था कमजोर होने लगती है।

सस्ता, शीघ्र और सुलभ न्याय वादकारियों को उपलब्ध कराये जाने की दिशा में अनेक सार्थक प्रयास किये गये हैं। न्यायालयों ने भी विलम्ब से मिल रहे न्याय के प्रति चिन्ता जताते हुए शीघ्र और सुलभ न्याय मिले, इसके लिए लोक अदालतों का आयोजन देश के सभी न्यायालयों का फैसला पक्षकारों में आपसी सुलह व समझौते के आधार पर किया जाता है। इससे न सिर्फ न्यायालयों में मुकदमों का बोझ कम होता है बल्कि पक्षकारों के मध्य सम्बन्धो में भी मधुरता आती है। 

लोक अदालतों की विशेषताएँ (Characteristics of Lok Adalats) लोक अदालतों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है-

(1) इनमें मामलों का निपटारा पक्षकारों में आपसी समझौतों या राजीनामों के द्वारा किया जाता है।

(ii) इनमें पक्षकारों के बीच कटुता को दूर कर उनमें मधुर सम्बन्ध स्थापित किये जाने का प्रयास किया जाता है।

(iii) इनमें खर्च भी नाममात्र का होता है अर्थात इनमें मामलों के निपटारे में कोई खर्च नहीं होता।

(iv) मामलों का निपटारा शीघ्रता से हो जाता है। अनावश्यक विलम्ब नहीं होता।

(v) राजीनामे में न्यायिक अधिकारी, शिक्षक समाजसेवी आदि अपनी भूमिका निभाते हैं।

इस प्रकार लोक अदालत सस्ते सुलभ और शीघ्र न्याय का एक सशक्त मंच है। हमारे देश में यह व्यवस्था कोई नई नहीं है। "पंच परमेश्वर की न्याय-व्यवस्था इसी का रूप है। गाँवों में आज भी चौपाल पर न्याय की व्यवस्था प्रचलित है।

यह एक ऐसी न्यायिक प्रक्रिया है जिसमे न किसी पक्ष की जीत होती है और न किसी की हार। इसीलिए यह कहा जाता है कि लोक अदालत का सार न किसी की जीत न किसी की हार।" 

लोक अदालतों को विधिक स्वरूप प्रदान करने के लिए विधिक सेवा के उपबन्ध प्राधिकरण अधिनियम, 1987 पारित कर उसमें लोक अदालतो को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इस अधिनियम की धारा 19, 20, 21 और 22 लोक अदालतों से सम्बन्धित है

लोक अदालतों का आयोजन (Setting up of Lok Adalats) अधिनियम की धारा 19 में यह उपबंध किया गया है कि उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा' समिति राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण या तालुका विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा ऐसे स्थान और अन्तराल पर लोक अदालतों का आयोजन किया जा सकता है जहाँ वह ऐसा करना उचित समझे।

ऐसा लोक अदालतों में सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी तथा उतनी संख्या में ऐसे अन्य व्यक्ति होगे जो समय-समय पर सम्बन्धित समिति या प्राधिकरण द्वारा निर्धारित किये जाये। उनकी योग्यतायें और शर्तें भी समिति या प्राधिकरण द्वारा सुनिश्चित की जायेगी। लोक अदालतों में ऐसे व्यक्तिया को स्थान दिया जाता है जो विधि, न्याय, कला, साहित्य, संस्कृति साजसेवा सहकारिता आदि के क्षेत्र में विशिष्ट ज्ञान या अनुभव रखते हो। लोक अदालतों में महिलाओं को भी स्थान प्रदान किया जाता है।

लोक अदालतों का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction of Lok Adalais) इन लोक अदालतों को उन सभी मामलों को राजीनामों या समझौतो द्वारा निपटाने का अधिकार होता है जो किसी न्यायालय में विचाराधीन है या जो विवाद अभी तक न्यायालय में नहीं पहुँचे हैं। एक प्रकार से यह विचारण पूर्व समझौते की प्रक्रिया है। लेकिन लोक अदालतो द्वारा ऐसे आपराधिक मामलो का निपटारा नहीं किया जा सकता है जो किसी विधि के अधीन राजीनामा योग्य (Compoundable) नहीं है।

अब्दुल हसन बनाम दिल्ली विद्युत बोर्ड A.I.R. 1999 Delhi 88 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने लोक अदालतों के सम्बन्ध में निर्णय देते हुए कहा है कि विभिन्न न्यायालयों में बडी संख्या में मुकदमे विचाराधीन हैं। इनका निपटारा लोक अदालतो के माध्यम से किया जाये। इसके अलावा विभिन्न सरकारी विभागों में भी स्थायी लोक अदालते स्थापित की जानी चाहिये। न्यायालय ने कहा कि भारत के नागरिक और भारत सरकार तथा भारत सरकार और इसके कर्मचारियों के बीच होने वाले विवादों का निपटारा स्थायी लोक अदालतों के माध्यम से ही निपटाया जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा आवश्यक दिशा निर्देश जारी करते हुए दिल्ली विद्युत बोर्ड दिल्ली विकास प्राधिकरण दिल्ली नगर निगम महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड जनरल इश्योरेंस कारपोरेशन ऑफ इण्डिया तथा अन्य इकाइयों में इस तरह की स्थायी लोक अदालते लगाने और लम्बित मामलों को निपटाने को कहा है।

लोक अदालत द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया (Procedure Applied by Lok Adalat)—विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम की धारा 20 में यह उपबंधित किया गया है कि यदि कोई पक्षकार यह चाहे कि उसके मामले का निपटारा लोक अदालत के माध्यम से हो ऐसा पक्षकार उस न्यायालय में इस आशय का आवेदन कर सकेगा कि उसका मामला लोक अदालत में भेजा जाये।

जब न्यायालय को यह समाधान हो जाता है कि वह मामला लोक अदालत में निपटाये जाने योग्य है तो वह उसे लोक अदालत को भेजने का निर्देश दे सकेगा लेकिन मामले को लोक अदालत में भेजने का निर्देश देने से पूर्व विपक्ष को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाना आवश्यक होगा। 

यह समस्त प्रक्रिया पूर्ण हो जाने पर जब मामला लोक अदालत में आता है तब लोक अदालत में उस मामले की सुनवाई प्रारम्भ की जायेगी। दोनों पक्षकारों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर (Reasonghle Opportunity) प्रदान किया जायेगा तथा उनमें समझौता या राजीनामा कराने का प्रयास किया जायेगा ।

अधिनियम की धारा 20 (4) के अन्तर्गत मामलों का निपटारा करते समय लोक अदालत के सदस्य “न्याय, समता और शुद्ध अन्तकरण से कार्य करते हैं तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों का पालन करते हैं।

यदि इस प्रकार के प्रयास के बावजूद भी पक्षों के बीच राजीनामा या समझौता नहीं हो पाता है तो वह मामला पुन उस न्यायालय को भेज दिया जाता है जहाँ से वह प्राप्त हुआ था। वह न्यायालय उस मामले में पुन उसी स्तर से आगे कार्यवाही के लिए प्रयासरत होगा जिस स्तर में यह मामला लोक अदालत में भेजा गया था। यदि ऐसे मामले में पक्षों के बीच राजीनामा हो जाता है तो अधिनियम की धारा 21 के अन्तर्गत लोक अदालत का आदेश सिविल न्यायालय की डिक्री या अन्य सक्षम न्यायालय के आदेश का प्रभाव रखेगा और सभी पक्षकार उस आदेश या डिक्री से बाध्य होंगे।

लोक अदालत की शक्तियाँ (Powets of Lok Adalat ) अधिनियम की धारा 20 व 21 के उद्देष्य के लिए लोक अदालतों को सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के अन्तर्गत एक सिविल न्यायालय माना गया है और इन्हें निम्नलिखित के सम्बन्ध में सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्रदान की गई हैं-

(i) साक्षियों को समन करना और उनका शपथ पर परीक्षण करना। 

(ii) दस्तावेजों का प्रकटीकरण और प्रस्तुतीकरण

(iii) शपथपत्रों पर साक्ष्य का ग्रहण, 

(IV) लोक अभिलेख मँगवाया जाना, आदि।

स्मरणीय है कि लोक अदालतों की कार्यवाही को भारतीय दण्ड संहिता 1960 की धारा 193, धारा 219 और 228 के अन्तर्गत न्यायिक कार्यवाहियाँ माना गया है और लोक अदालतों को दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 195 और अध्याय 26 के अर्थ के अन्तर्गत "दीवानी न्यायालय" का दर्जा दिया गया है।

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