What do you mean by Refugees? Briefly explain the international converition on the status of Refugees.
उत्तर- शरणार्थियों का अर्थ (Meaning of Refugees) - शरणार्थियों से तात्पर्य उन व्यक्तियों से है जिन्होंने अपने उस मौलिक राज्य (Original State) को सताये जाने या सैन्य कार्यवाही से बचने के लिए छोड़ दिया हो जिसमे वे स्थायी रूप से निवास करते हो। शरणार्थियों की प्रास्थिति से सम्बन्धित सन् 1951 के अभिसमय में यह कहा गया है कि शरणार्थी वह व्यक्ति होता है जो अपने मूल देश से राजनैतिक या अन्य प्रकार के अत्याचारों के कारण भाग जाता है और देश के संरक्षण को प्राप्त करने में असमर्थ रहता है। इस प्रकार से अपनी राष्ट्रीयता कभी खो देता है। शरणार्थियों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य का प्रारम्भ सन् 1920 तक नहीं। हुआ था। शरणार्थियों की सहायता सर्वप्रथम वर्ष 1920 में नार्वे के डॉ० फ्रिक्षेफ नैनसेन के द्वारा की गयी थी। उनके परिश्रम से यह धारणा उत्पन्न होने लगी कि शरणार्थियों की सहायता के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय तंत्र बनाया जाये अतः राष्ट्र संघ शरणार्थियों के लिए उच्चायुक्त की स्थापना की गयी जिसमे नैनसेन को उच्चायुक्त के रूप में नियुक्त किया गया।
डॉ० नैनसेन ने राष्ट्रसंघ पासपोर्ट का उपाय सुझाया जो एक ऐसा दस्तावेज था जिससे धारक को ऐसा अधिकार प्रदान किया जायेगा जिससे वह राष्ट्रीय सीमाओं से स्वतन्त्रता से आ- जा सके। सन् 1930 में डॉ० नैनसेन की मृत्यु के बाद शरणार्थियों के संरक्षण का मामला नैनसेन अन्तर्राष्ट्रीय कार्यालय को सौप दिया गया। शरणार्थियों के सम्बन्ध में द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरण संयुक्त राष्ट्र अनुतोष एवं पुनर्वास प्रशासन था। इसकी स्थापना 9 नवम्बर, 1943 को 44 राज्यों के करार द्वारा हुई थी। आर्थिक और सामाजिक परिषद् द्वारा स्थापित शरणार्थियों की विशेष समिति ने फरवरी 16, 1946 को शरणार्थियों की सहायता के सन्दर्भ में एक नये अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के प्रारूप को परिषद् के समक्ष पेश किया। उसी प्रारूप के आधार पर महासभा ने अन्तर्राष्ट्रीय शरणार्थी संगठन का निर्माण किया। अन्तर्राष्ट्रीय शरणार्थी संगठन ने कम समय में ही एक करोड़ से अधिक शरणार्थियों को सम्पूर्ण विश्व में. नये घरों में स्थापित किया था। इसने लगभग 73000 व्यक्तियों को उनके भूतपूर्व घरो में फिर से स्थापित किया और 16,00,000 से अधिक व्यक्तियों को किसी अन्य प्रकार से सहायता प्रदान की थी।
महासभा ने 14 दिसम्बर, 1950 को संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त के पहले स्टेटयूट (Statute) को स्वीकार किया। फलस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) अस्तित्व में आया। इसकी अवधि तीन वर्ष की थी। शरणार्थियों के लिए वर्ष 1997 तक संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त ने एक करोड़ 20 लाख से अधिक ऐसे लोगों को संरक्षण और सहायता प्रदान की जो युद्ध या अन्य प्रकार के अत्याचारों से भाग गये थे। शरणार्थियो के लिए संयुक्त राष्ट्र उचायुक्त ने अफगानिस्तान, अंगोला, अजरबेजान, बोसनिया तथा हरजेगोविना, क्रोसिया, अल- सल्बाडोर, इथोपिया, जर्जिया तथा इराक में विस्थापित व्यक्तियों को सहायता की है।
शरणार्थियों की प्रास्थिति पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय (International Convention on the Status of Refugees ) - शरणार्थियों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय लिखत, शरणार्थियों की प्रास्थिति से सम्बन्धित 1951 का अभिसमय है जिसे बहुत सोच-विचार कर स्वीकार किया गया था। मानव अधिकार को सार्वभौमिक घोषणा और संयुक्त राष्ट्र ने इस सिद्धान्त को स्वीकार किया है कि मानव प्राणी बिना किसी भेदभाव के मौलिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रताओं का उपभोग करेंगे। अभिसमय 22 अप्रैल, 1954 को लागू किया गया जिसमें सन् 1998 के अभिसमय के 132 राज्य पक्षकार बन गये थे। शरणार्थियों की प्रास्थिति से सम्बन्धित सन् 1967 में एक नयाचार (Protocol) बनाया गया। शरणार्थियों की विधिक प्रास्थिति की परिभाषा उपर्युक्त अन्तर्राष्ट्रीय संधियों में दी गयी है। उनमें शरणार्थियों के अधिकारी एवं कर्तव्यों को बताया गया है और काम के अधिकार, शिक्षा का अधिकार, सार्वजनिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, यात्रा करने का अधिकार आदि शामिल किया गया है इसके साथ ही साथ शरणार्थियों के दिन-प्रतिदिन के जीवन के विभिन्न पहलुओ के लिए भी प्रावधान किये गये हैं। सन् 1951 के अभिसमय के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं-
1. शरणार्थियों की व्यक्तिगत प्रास्थिति (Personal Status of Refugees)- किसी शरणार्थी की व्यक्तिगत प्रास्थिति का निर्धारण उसके निवास करने वाले राज्य की विधि द्वारा किया जायेगा तथा किसी शरणार्थी तथा उसके आश्रितो द्वारा उसकी व्यक्तिगत प्रास्थिति के आधार पर प्राप्त अधिकारों का सम्मान विशेष रूप से विवाह से सम्बन्धित अधिकार संविदाकारी पक्षकारों द्वारा किया जायेगा।
2. शरणार्थियों से व्यवहार (Behaviour with the Refugees) - अभिसमय के अध्याय 4 में अनु० 20 से 33 तक के प्रावधान शरणार्थियों के "कल्याण" से सम्बन्धित हैं। शरणार्थियों के लिए यह अपेक्षित होता है कि राज्य पक्षकारों द्वारा उनके विभिन्न पहलुओं पर स्वयं के राष्ट्रिकों जैसा व्यवहार किया जायेगा। प्रत्येक संविदाकारी राज्य शरणार्थियों को अपना निवास स्थान चुनने और स्वतन्त्रतापूर्ण आवागमन के अधिकार को उसी प्रकार प्रदान करेगा जैसा कि सामान्यतया अपदेशियों को दिया जाता है। संविदाकारी राज्य शरणार्थियों पर ऐसे शुल्क या दर आदि का अधिरोपण नहीं करेंगे जो उसके राष्ट्रिकों से अधिक होंगे।
3. शरणार्थियों की अवैध प्रविष्टि (Illegal Entry of Refugees) - संविदाकारी राज्य उन शरणार्थियों पर दण्ड नहीं लगायेंगे जो किसी ऐसे राज्य क्षेत्र के प्राधिकार के बिना ही 'उस राज्यक्षेत्र में अवैध रूप से प्रवेश ले लिया हो जहाँ उनके प्राण एवं स्वतन्त्रता को धमकी दी जाती थी बशर्ते कि वे बिना किसी बिलम्ब के स्वयं को प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर दे और सही कारण बता दें। अभिसमय के अनु० 31 के परिच्छेद (2) में प्रावधान किया गया है कि संविदाकारी राज्य इस प्रकार के शयारणार्थियों पर ऐसे किसी भी आवागमन पर प्रतिबन्ध नहीं लगायेंगे, जब तक कि वे आवश्यक नहीं हो।
4. शरणार्थियों का निष्कासन (Expussion of Refugees)- अभिसमय का अनु० 32 यह प्रावधान करता है कि संविदाकारी राज्य किसी विधिक शरणार्थी को उनके राज्य से राष्ट्रीय सुरक्षा एवं लोक व्यवस्था के आधारों को छोड़कर किसी अन्य आधार पर निष्कासन नहीं किया जायेगा और यह निष्कासन सम्यक विधि प्रक्रिया का पालन करके ही किया जायेगा। संविदाकारी राज्य उस समय के दौरान ऐसे आन्तरिक उपायों को लागू करने के अधिकार को आरक्षित रखेंगे जिन्हें वे आवश्यक समझेगे।
5. चल और अचल सम्पत्ति (Movable and Immovable Proprties) - संविदाकारी राज्य शरणार्थियों को चल व अचल सम्पत्ति के अर्जन एवं उससे सम्बन्धित अधिकारी को उसी प्रकार से देगे जैसे कि अन्यदेशीय (Aliens) को दिये जाते हैं (अभिसमय 1951 का अनु० 13 ) ।
6. सिविल अधिकार (Civil Rights) - संविदाकारी राज्य शरणार्थियों को न्यूनतम अधिकार जैसे कार्य करने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता और न्यायालय में जाने का प्राधिकार प्रदान करेंगे। अभिसमय के अनु0 33 में यह प्रावधान किया गया है कि कोई भी संविदाकारी राज्य किसी शरणार्थी से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा जिससे कि उसके प्राण एवं स्वतंत्रता उसके मूलवंश, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह अथवा राजनैतिक विचारधारा के कारण संकट में पड़ जाये।
7. न्यायालयों में पहुँच (Access to Courts) - अभिसमय के अनुच्छेद-16 पैरा-1 के अन्तर्गत यह कहा गया है कि किसी शरणार्थी को सभी सविदाकारी राज्यों के राज्य-क्षेत्र के न्यायालयो तक पहुँच की स्वतन्त्रता होगी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें